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Full text of "Banarasivilas"

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श्री नानूलाल स्मारक भंथमाला का द्वितीय पुष्प 


भी वानृ्ात स्मारक प्रथ माला द्वितीय पुष्प 


जन लक वतकल८ पकटगलकामनकमपनका 


बनारसीविलास 


किक ७७० 8५७ भा ०० कु ०-8 क०- आह हा ह  कु २७ कस ५०० हु 


संपादक :- 
श्री मंवरल्ाह जैन स्यायतीर्थ 
थी कत्तूरचंद कासलीवाल एप, ए., शाती 
ध 
प्रकाशक ४ 
केशरलाल परुशी 
'मंत्री।-भ्री नानूलाल स्मारक ग्रंथमाला 


सूकालोनी, जयपुर 
त्न्ज्ज्ज्ण्ज्ज्फ्स्ज्ण्ज्ल्ण्ज्ण्ज्स्क्ण्ज्ण्ण््ण््भ््य्ज्य्ल्ज्च्ल्य्ज्न्य्य्फ्ज्ज्ज्ब्ज्ण््ज्प्न्न््न्स्न्न्न्न्प्प्ः 
भाद्रपद्‌ लागतमात्र 
सं २०११ | भ्रति (००० | मूल्य १) 


४एए% ्यापर्रपान। 
(१) केशरल्ाब बर्शी 
मंत्री-श्री नानूलाल स्मारक ग्रंथमाला 
“ब्यी भवन” व्यू कालोनी, जयपुर 
(२) बीर पुस्तक भण्डार 
श्री वीर भेस, मनिहारों का रास्ता, जयपुर 
. 


प्र 


मुदक-- 
मैपरलाल जैन 
श्री वीर प्रेस, जयपुर 


अ्क्ाग्की १ 


आदरणोय श्री पं० चैनसुखदासजी न्यायतीर्थ द्वारा विल्यात 
जेन कषि बनारसीदासजी के वनारसीविज्ञास के विषय में श्लात 
हुआ कि यह संग्रह अब प्राप्य नहीं है और इसके प्रकाशन की 
अत्यन्त * आवश्यकता है। में इन्हें कवीर की कोटि का कवि 
मानता हूँ। इनकी आध्यात्मिक कविताओं से सचमुच मनुष्य को 
बड़ी शांति मि्ञती है। इनका जैनों में ही नहीं अजैनों में भी 
प्रचार होने की आवश्यकता है | कवि किसी धर्म देश या जाति के 
संकुचित दायरे में आबद्ध नहीं किये जा सकते। वे सबके 
लिए और सभी के हैं। स्वर्गीय मास्टर साहिब नानूलातजी को 
इनकी आध्यात्मिक- रचनायें बहुत प्रिय थीं। इस ग्रंथ के अवतक 
कई संस्करण निकल्न जाने चाहिए थे। पर यह हमारा हुर्भाग्य है 
कि इस महान कवि की रचनाओं के पठन पाठन का प्रचार औरों 
की कौन कद्दे जेन समाज में भी जितना होना चाहिए उतना 
नहीं है। 


जब पुस्तक ही प्राप्य न हो तब पठन पाठन का प्रचार कैसे 
हो! इस बाधा को दूर करने लिए इस संग्रह को श्री मास्टर 
नावूज्ञाज् स्मारक-कोष की ओर से प्रकाशित करने की अनुमति 
: ही गई। इसका प्रकाशन कितना उपयोगी और सुदूर हुआ है, 


मुसार प्रसिद्ध जेन कवि बनारसीदासजी की ही रचना है। हमारां 
विचार इसे पहल्ले इस संग्रह में जोड देने का था क्योंकि नाटक 
समयसार 'अधे कथानक' आदि की तरह यह वी रचत्ता नहीं है 
जो इस संग्रह के वित्तार को बढ। सके, पर अभी इसे विवादासद 
सम्रमकर इस विज्ञास में जोडना उचित नहीं समझा । 


इसके सम्पाइन में हमें श्रद्धा य पंडित साहब का कामी सदर 
सित्षा है। संग्रह के कठिन शब्दों के अथ भी उन्हीं के लिखे हुये 
हैं। इसके लिये हम उनके अत्यन्त क्तज्ञ हैं। प्रंथमाजञा के मन्हत्री 
महोदय को भी अनेक धन्यवाद है जिन्होंने इसे प्रकाशित कराने 
की उदारता दिखलाकर साहित्य सेवा के पुण्य कार्यमें अपना हाथ 
वटाया । श्रीमान्‌ प॑० अनृप्चन्दजी न्यायतीथे एवं पं० छुरक्षानी 
चन्दजी न्यायतीये को भी धन्यवाद दिये बिना नहीं रह सकते 
जिन्होंने पाठ भेद आदि कार्यों में काफी सहयोग दिया है |... 
भंबरलाल जेन न्यायतीर्थ 
कस्तूरचंद कासशीवाल एम, ए, शांत 


$ म्रत्तावना औ 


हिन्दी भाषा हमारी शष्ट्रभापा है। उसके व्यापक प्रचार की 
ओर सभी का ध्यान है। राजस्थान, उत्तर्मदेश, मध्यप्रदेश, 
भध्यभारत, देहती, अजमेर आदि साज्यों की ते हिन्दी पहिले ही 
 बोलचाज्ञ की भाषा थो; किन्तु अब तो भारत के अन्य सभी राज्यों 
में भी वहों के निवासियों को दिल्ली में बोलचाल (एवं उसके 
अध्ययन की शिक्षा दी जा रही है। इसलिये अब यह आशा ही 
नहीं किन्तु पूर्ण विश्वास है कि आगे आने बाले दर्षो में हिन्दी 
अंग्रेजी भाषा का स्थान ले लेगी । 
किन्तु हिन्दी तो सैकड़ों वर्षों से भारत की प्रमुख भा के 
रूप में चल्ली आ रही है। इसकी वृद्धि एवं उन्नति के लिये सेकड़ों 
णवं हजारों साहित्य-उ्पासकों ने अपने जीवन का झधिकांश समय 
इसी फवित्र कारये के लिये दिया था। इन्ही ज्ञात एवं अज्ञात 
साहित्यसेषियों की सेवा के पतस्वरूप आज हमें हिन्दो को सष्ट- 
भाषा का सम्मान अदान फरने का खोभास्य माप्त हुआ है। 


हिन्दी भाषा के जन्म काल की ओर यदि हम दृष्टि झल्तें तो 
हमें पता चल्षेगा कि हिन्दी का जन्म ७-८ वीं शताब्दी में ही हो गया 
था । यह पहिले अपन शा फे -रुप में हमारे सामने आयी और 
फिर इसी का नया चाम-संस्करण हिन्दी के रूप में हुआ। हिन्दी 


जिला 


हनन 


साहित्य के प्रमुख विद्वान डा० रामचन्द्र शुकत्ञ ने यद्यपि १० वीं 
शताब्दी से ज्ञेकर १४ वीं शताब्दी तक को हिन्दी साहित्य का आदि 
काल माना है, किन्तु डा० हजारीप्रसादजी द्विवेदी में जो बत्त मान में 
हिन्दी के उच्चकोटि के विद्वानों में से हैं, शुक््लजी की इस मान्यता 
का अपने 'हिन्दी साहित्य के आदिकात्न” में खंडन किया है। 
उनका मत है कि हिन्दी भाषा १० वीं शताब्दी से भी पूरे प्रचत्षित 
थी और उसका रूप अपभ्रश भाषा था। इसलिये अपभ्र श को 
उन्होंने स्र॑ हिन्दी के महापरिद्त राहुल सांकृत्यायन ने 
पुरानी हिन्दी कहकर सम्बोधित किया हे। थही नहीं, किन्तु 
भहाकवि स्वयम्भू को जिन्होंने आठवीं शताब्दी में अपन्र श में 
पउमचरिय ( जैन रामायण ), हरिषंश पुराण आदि भहाकाव्यों 
की रचना की थी, हिन्दी भापा का आदि कवि कहा है। क्योंकि 
अधिकांश अपश्र श॒ साहित्य जेनाचायों द्वारा लिश्ा हुआ है, 
इसलिये इसी आधार पर उसे हिन्दी भाषा के कोल से अज्लग कर 
देना अथवा हिन्दी का काज्न विभाग करते समय उसका कोई . 
ध्यान नहीं रखना हिन्दी साहित्य के इतिहास को असत्य रूप में 
उपस्थित करना है। भाननीय हजारीप्रसादब्षी द्विवेदी ने भी 
अपनी “हिन्दी साहित्य का आदिकाल” पुस्तक में इसी सम्बन्ध में 
अपने निम्न उद्गार प्रकट किये हैं--/इधर जैन-अपभ्र श-्चरित 
काव्यों की जो विषुक् सामग्री उपलब्ध हुई है वह सिफे धार्मिक समभ- 
दाय की मुहर लगने मात्र से अत्ग कर दी जाने योग्य नहीं है । 
स्वयम्भू, चतुमुंख, पुष्पदन्त और धनपाल जेसे कवि केवल जैंन 


लि आम 


होने के कारण ही काव्यक्षेत्र से बाहर नहीं चले जाते। धामिक 
साहित्य होने मात्र से कोई रचना साहित्यिक कोटि से अत्ग नहीं 
की जा सकती | यदि ऐसा समझा जाने त्गे तो तुलसीदास का 
रामचरितमानस भी साहित्य क्षेत्र में अविवेच्य हो जाएगा और 
जायसी का पद्मावत भी साहित्य-सीमा के भीतर नहीं घुस सकेगा । 
पस्तुतः लौकिक निजन्धरी कहानियों को आश्रय करके धर्मोपदेश 
देना इस देश की चिराचरित प्रथा है। कमी कभी ये कहानियां 
पौराणिक और ऐतिहासिक घरित्रों के साथ घुल्लादी जाती हैं! यह 
तो न जैनों की निजी विशेषता है और न सूफियों की। हमारे 
सहित्य के इतिहास में एक गलत और बे-बुनियाद बात यह 
चत् पढ़ी है कि ज्ौकिक प्रेम-कथानकों को आश्रय करके धर्म- 
भावनाओं को उपदेश देने का कार्य सूफी कवियों ने आरम्भ 
किया था। बोढ़ों, ब्राह्मणों ओर जैनों के श्रनेक आचायों ने 
नेतिक और धामिक उपदेश देने के ज्षिये ज्ञोक-कथानकों का 
आश्रय लिया था। भारतीय संतों की यह परम्परा परमहंस राम- 
कृष्णदेव तक अविच्छिन्न भाव से चक्ञी आई है। केवल नेतिक 
ओर धामिक या आध्यात्मिक उपदेशों को देख कर यदि हम ग्रन्थों 
को साहित्य सीमा से बाहर निकालने लगेगे तो हमें आदिकाव्य से 
भी हाथ धोना पढ़ेगा, तुलसी-रामायय से भी अलग होना पड़ेगा, 
कबीर की रचनाओं को भी नमस्कार कर देना पडेगा और जायसी 
को भी दूर से दण्डबत्‌ करके विदा कर देना होगा” ' इस प्रकार 
हिन्दी भाषा भारत में ८ वीं शतात्दी अथवा इससे भी पूर्व विद्य 
भान थी एवं यहाँ के निवासियों की बोलचाल् की भाषा थी। 


शा 


अब एक प्रश्न हमारे सामने पैदा होता है कि शराक्षण विद्वानों 
ने अपभ्रश साणा में क्‍यों नहीं रचनाये लिखीं जबकि जैनाचार्यो 
ने इस भाषा में विपुल साहित्य का निर्माण किया। जनाचार्यों ने 
ही नहीं किन्तु मुस्लिम कवि अब्दुर रहमान ने भी सन्देशरासक' 
नाम्रक एक प्रवन्ध काव्य की रचना की जो भू गार रस का उत्तस 
काव्य माना जाता है। हमारी दृष्टि से तो इसका प्रमुख कारण 
यही था कि बदिक धर्म में ज्ञान साधना की कुठ्जी सदा ही एक 
वर्ग विशेष के ह्याथ में रही है. तथा क्योंकि संस्कृत ही एक मात्र 
देव भाषा कही जातो थी और उसी पर उनका पूर्ण आधिपत्य था 
इसलिये उन्होंने संस्कृत भाषा को छोड कर अन्य भाषा में लिखना 
पसन्द ही नहीं किया । क्योंकि अपभ्र श जन साधारण की भाषा 
थी इसलिये उन्होंने इस भाषा में साहित्य निर्माण करना उचित 
नहीं समझा । इतना ही नहीं, उसे स्त्रियों एवं नीच जाति के पुरुषों 
द्वारा उच्चारण करवाया । इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हमें संस्कृत नाटकों 
सें देखने को मित्षते हैँ। क्योंकि अपभ्रश साहित्य अध्किांश 
में जेनाचारयों द्वारा ही लिखा हुआ है, इसलिये उसे हिन्दी 
साहित्य के इतिहास में कोई स्थान नहीं देना अपश्रश एवं 
हिन्दी साहित्य के प्रति अन्याय करना है। लेकिन अब हिल्दी 
साहित्य के विद्वानों का ध्यान इस भाषा के साहित्य की ओर' जाने 
लगा है तथा उसे इतिहास में भी उचित स्थान दिये जाने के 
सम्बन्ध में कुछ विद्वानों ने अपने विचार प्रकट किये हैं | इसलिये 
ऐसी आशा की जाती है कि अगले दस वर्ष पश्चात्‌ इसे हिन्दी साहित्य 


हन्‍ल 6०५ 


में उचित स्थान मित्र ही जावेगा । लेकिन इसमें कुछ गलती जनों 
की ओर से भी हुई। उन्होंने अपने साहित्य को प्रकाश में लाने 
की चेष्टा नहीं की । इसलिये जो कुछ साहित्य यहाँ के विद्वानों को 
मित्ञा उसी के आधार पर उन्होंने हिन्दी साहित्य का इतिहास 
लिंखा | और जव एक बार कोई अधिकारी विद्वान किसी तथ्य को 
उपस्थित कर देता है तो वह जल्दी से था ही नहीं बदला जा सकता 
और आगे होने वाले उसी को सही मानकर चलने लगते हैं । 


इस प्रकार हिन्दी साहित्य का जन्म आठवीं शताब्दी में होगया 
था और इसो के आधार .पर उसका काल विभाग किया जा रहा 
है। प्रस्तुत प्रस्तावना में, क्योंकि जेन हिन्दी साहित्ण के इतिहास को 
ही संक्षिप्त रूप में पाठकों के समक्ष उपस्थित किया जा रहा है 
इसीलिये, जेन हिन्दी साहित्य के ही निम्न काल विभाग करके 
उसका आगे वणन किया जावेगा | 


अपभ्रशकाल- ८ वीं शताब्दी से १२ वीं शताब्दी तक 
अपभ्र श मिश्रित हिन्दी काल १३ वीं १४ वीं शताब्दी 
हिन्दी का प्रारग्भिक काल १४ वो १६ वीं शताब्दी 
हिन्दी का सध्य काल १७ वीं से १६ वीं शताब्दी 
बत्त मान काल २० वीं शताब्दी 
अपभ्र श कूल-८ वीं शताब्दी से १२ वी शताब्दी तक:-- 
८ वीं शताब्दी से १२ वीं शताब्दी तक के समय को अप- 
श्र श काल कह जा सकता है। हिन्दी इस युग में हमारं सामने 


०००» हि >>» 


.. अ्पन्रश के रूप मे विद्यमान थी। हिन्दी का जो वत्त मान रुप है 
वह बहुत कुछ अंश में इसी काल को देन है। अथवा हिन्दी 
भाषा को वर्तमान रूप प्राप्त करने से पहिले इस युग को पार 
करता पडा था। 


८ वीं शवाब्दी से जेकर १२ वीं शताब्दी तक अपन्र श भाषा 
के अनेक महाकवि हुये जिन्होंते अपत्ती खेखनी से इस भाषा में 
सर्वोत्तम रचनाओं का निर्माण किया। ८ वीं शताब्दी में होने चाते 
खयमू अपभ्रश के प्रथम महाकवि हैं। इन्होंने पउ्मचरिय 
( पद्मपुराण ) तथा रिह्णेमिचरि ( हरिबंशपुराण ) ये दो महा" 
काव्य एवं पंचमीचरिठ नामक प्रवन्ध-काव्यों को रचना फी थी। 
भाव, भाषा एवं शै्ञी जो खयस्भू ने इन काव्यों में अपनायी थी 
वही आगे चल कर हमें हिन्दी काव्योँ में मित्रती हे। हिन्दी के 
महाकाव्य रामचरितमानस एवं खयस्भू के पठ्मचरिय ( जेन 
रामायण ) में कई स्थानों में साम्य है। इसीलिये वर्तमान में 
हिन्दी के सिद्ध पिद्यनों ते सयम्भू को हिन्दी का आदि कवि 
कह है। स्वयस्भू से भी पूे $ वीं शताब्दी में मुनि योगीन्दु और 
हुये थे जिन्होंने योगसार नामक आध्यात्मिक ग्रंथ की रचना की थी। 
थोगीन्दु की भाषा पहुत है सरज्ञ एवं स्पष्ट है। हिन्दी भाषा में 
_जो आगे चल कर दोहा छन्द अत्यधिक रूप मे प्रयोग फिया 
_गया वह सब॑अपन्नश की ही देन है। योगीन्दु का एक दोहा 
देशिये-- 


का 6ु००जा 


श्रध परुवई जो रमह छंडपि सम ववहारू | 
सो तम्प्ाइट्टी हवह लहु पावह भव पाठ || 


संरयम्भू के पश्चात्‌ १० वीं शताब्दी में होने वाले कवियों में 
देवसेन, पुष्पदंत, पद्मकीत्ति, रामसिंह धनपाल आदि के नाम 
उल्लेखनीय है। इनमे देवसेन ने दर्शनसार, तर्त्वंसार और 
सावयधम्म दोहा, पुष्पदन्त ने मंहापुराण, जसहर॑चरि एवं शाय- 
कुमारचरिंउ, पंद्यकीति ने पसणाहचरिउ, मुनि रामसिंह ने दोहां 
पाहुड और धनपाल ने भविसयत्तकहां नामक काव्यों की रचना 
फी थी। बसे तो इंस शताब्दी में होने वाते सभी कवियों की रचनायें 
उत्कृष्ट हैं. किन्तु महाकवि पुष्पदन्त इस युग के सवसे उत्कृष्ट 
आचाये हुये जिन्होंने अपनी रचनाओं के बल पर अपश्रश 
भाषा के साहित्य को उच्च स्थान प्राप्त करबाया। इनकी भाव, 
भाषा एवं शेज्ञी सभी उल्लेखनीय है। अप॑भ्रश के स्वयग्भू और 
पुष्पदन्त को हम हिन्दी के तुलंसी एवं सूरदास को कोटि में बिठा 
सकते हूँ लेकिन दुःख की वात तो यह है कि ऐसे महाकवियों के 
साहित्य को भी हिन्दी साहित्य में कोई उचित स्थान नहीं मिला । 


पुष्पंदन्त एवं सूरदास की कृष्ण बालंजीला वरणुन में कितना 
सांग्य है इसका हम एंक उदाहरण पाठकों के सामने उपस्थित 
करते हैं। दोनों कवियों के द्वारा किये हुये वशंन को पढ़ कर 
हम अमुमान लेगा सकते हैं कि उनको भाव, भाषा ण॒व॑ं शैज्ञी 
में कितनी समता है--- 


१००० कै २००००० 


रगतेण रमंत रमंते मंघड, घरिड म्मतु श्रणते। 

संदौरठ तोडिवि भ्रावह्विउ, भ्रद् विशेत्िउ दहिउ पलोहिउ ॥ 
का वि गोवि गोविंदहु शग्गी, एप महारी संथणि संगी | 
एयहि मौल्लु देठ भ्राजिंगणु, ये तो मा मेल्शहु में प्र गण ॥ 


घोरी करत काम्ह घर पाए। 

निप्ति वापर सोहि बहुत सत्तायो, भत्र हरि हाथहि श्रागरे । 

भांखन दधि भेरो सच खायो, पहुत श्रचगरी पीन्ही | 

अब तो देख परो हो शक्ना, तुग्हे मले में चीन्ही। 

दोउ भुज पकरि क्शों कहे जेहो, साखन लेड संगाह । 

ऐेही मो में नेफु न खागो, पता गये सब खाह। 

मुस तन चित विहँति हरि दौन्हो, रिप्र तप गई बुभाई | 

लगी श्यात्त उर लाइ खवालिनो, पूरदास घलि जाह। सहाफति पूरपापत ॥ 


११ दी एवं १२थीं शताब्दी में होने वाले कवियो में फनफामर। 
जिनदत्तसूरि, घीर, श्रीचस्द्र, थशःकीतति और नयनन्दि उल्तेख- 
सीय है। इनमे कनकामर ने करकण्डुचरिय, जिनदत्तसूरि मे 
चर्चरी, उपदेशरसायन रास एवं काहस्वरूप कुल्क, वीर ने जम्वू: 
सामीयरिउ, तयनन्ति ने सुदंसशचरिउ, श्रीचन्द्र ने श्त्नकरण्ड 
शास्त्र, एवं कथाकोश, श्रीधर ने पासणाहचरिठ, भविसयत्तचरिठ 
एवं सुकुमालचरिउ आदि उल्लेखनीय रचनायें है। भद्मकवि 
धवल भी उसी शताछी में हुये जिन्होंने अपनी रचनाओं को बहुत 
हो उत्तम रुप से उपस्थिव किया | तयनन्दि के छुद्ंसशचरिउ भाप 


चुद है... द 


ही अलंकारमय है । शछोप और उपसा कवि के अत्यधिक प्रिय 
अज्लंकार थे-जिनका इस काव्य में स्थान,२ पर उपयोग किया गया 
है। स्वयं वीर ने अपने काव्य जम्बूस्वामी चरिड को वीर एवं 
शृंगार रसात्मक कहा है । 


अपम्र'श॒ मिश्रित हिन्दी काल-- , 


१३वीं १४वीं शताब्दी को हम अपभ्रश मिश्रित हिन्दी काल 
कह सकते हैं। यद्यपि इन दो शताब्दियों में अपक्र श में अत्यधिक 
साहित्य की रचना हुई किन्तु उसके साथ अपश्र शमय हिन्दी 
रचनाये भी हमारे सामने आयीं। अपभ्रश भाषा के कवियों में 
महाकवि अमरकीत्ति, पं० लाख, हरिभद्रे, धाहिल, नरसेन, सिंह 
आदि उल्लेखनीय हैं। इनमें अमरकीत्ति ने छक्कम्मोचएस, लावू 
ने जिणदत्तचरिय, हरिभद्र ने णेमिणाहचरिय, धाहित् ने 
प्रवमसिरिचरिउ, नरसेन ने वड़्‌ढमाणकहा और सिरिपात्नचरिउ तथा 
सिह ने पब्जुए्णकह् की रचना की थी। महाकषि अमरकीत्ति का 
छक्कम्मोवएस बहुत ही सुन्दर एवं सरल काव्य है। इस काव्य मे 
सामान्य पुरुष के जीवन का चित्रण किया गया है। धाहिल् का 
पउमसिरिचिरिउ भी सुन्दर काव्य है जो मुनि जिनविजयजी द्वारा 
सम्पादित होकर प्रकाशित भी हो चुज है। 


जेंसा कि पहिले कहा जा चुका है कि इस काल में जैन 
विद्वानों द्वारा हिन्दी भाषा में भी रचनाये ज्िखा जाना प्रारम्भ हो 
गया था। इसकाल को रची हुई हिन्दो रचनाओं में श्री धर्मेसूरि 


कण १ (० 


का जम्बूलवामी रासा; बिंनयचन्द्रसूरिं की नेमिनाथ्चउपई, अम्बदेव 
कृत संघपतिसमरा रास, और थेल्ह कृत चउबीसी “गीत 
उल्लेखनीय रचनायें हैं। इनमें से प्रथम तीन रचनाओं की “मापा 
को राजत्थानी भी बतज्ाया जाता है किन्तु फिर भी उन्हें. प्राचीन 
हिन्दी रचनाओं की श्रेणी में रहा जा सकता है | वयोंकि प्राचीन 
हिन्दी और प्राचीन राजस्थानी में कोई विशेष अन्तर नहीं है। 
जम्बूंस्वामीरासा का एक उद्धरण देखिये:-- 
. जुंबृशीवि प्िरिम्ह खित्ति तिहिं नयर पहाणउ । 
राजगृह नाम्ेय नयर पहुवी वक्खाणउ ) 
राज कइ सेणिय नरहिंद नर बहहँ दे. सारे । प 
दाप्ठ तरह ( भरहि ) इुद्विवंद मति अम्गकुमारो ॥ #.. 


“चउ्वीसी गीत भी प्राचीन हिन्दी की एक सुन्दर रचना है जो 
अभी जयपुर के वड़े मन्दिर के शास्त्र भण्डार में उपलब्ध हुई है। 
यह संबत्‌ू १३७१ की रचना है तथा घेल्ह इसका कवि 'है। इसमे 
चौनीस तीर को स्तुति की गई है। आदिनाथ स्वामी के स्तबुन 

देखिये-- -, । 
णाप्ति नरिंदर नरेसरू प्रदेवी हुकलता । 
तम्ु उरि रिरहु उवरणों अवध वंदाहि कंठा 
एुणि कहि हु भ्राउत्त पम्माणु जिहि.बेती संखा | , - 
भादिनाय मिए कहिय चाउ.पुव्य चउराती कसा, ॥' 
वृष ताएु तल लंछगु श्रति तरुएु छुताद। 


४ 


गोपुल्त जक्खु भक्‍्केसरू धेणुतइ पंथ परीद॥ी 
घट पयाग तले दिला वोलइ वच्छ निरुत । 
केशामह गिखिर इड़ेवि निव्बाण पहुतु ॥ 
हिन्दी का प्रारम्भिक काल--- 

१४ वीं और १६ वो शताब्दी को हम हिन्दी का आरस्मिक 
काल कह सकते हैं । इन दो शतार्दियों में संस्कृत और अपभ्रंश 
भाषा के कवियों का ध्यान भी हिन्दी भाषा को ओर जाने लगा 
तथा उन्होंने संस्कृत और अपभ्रंश के साथ साथ हिन्दी में 
रचना लिखना प्रास्म्म कर दिया। ऐसे आचार्यो में भट्टारक 
सकतकीतति और ब्रह्म जिनदास का नाम उल्लेखनीय है। 
थे दोनों ही संस्कृत के काफी ऊ चे विद्वान थे क्योंकि अकेले सकल 
कीत्ति ने संस्टंत में आदिपुराण, पुराणंसारसंग्रह, वन्यकुभार 
, चरित्र, यशोधर चरित्र, बद्ध मानपुराण आदि' प्रन्थों की रचंना 
कोथी इसी प्रकार त्रह्म जिनदास ने' भी संस्कृत में ' १२ 
से अधिक रचनायें लिखी हैं जिनमें हरिपंशपुय्रण, पद्मपुराण, 
जम्बूस्थामी चरित्र, हसुमच्चरित्र, त्रतकंथा कोश आदि उल्लेखनीय 
हैं। भट्टारक सकलकीत्ति की हिन्दी रचनाओं में "मोकारफलगीत 
एवं आयधनासार अभी तक उपलब्ध हुये हैं। यद्यपि दोनों ही 
विस्तृत रचनाये नहीं हैं. किन्तु हिन्दी भाषा के विकास जानने 
के लिये ये कुछ उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं । हि 

,/ ब्रह्म जिनदास की हिन्दी रचनाओं , पेर गुजराती भाषा का 
प्रभाव स्पष्ट दिखलाई देता है.। इनकी हिन्दी रचनाओं में आदिनाथ 


ब* ०5 


पुराण, भ्रेणिकचरित्र, सम्यक््वरास, वशोधररास, धनपालराम, 
ब्तकथाकीप श्रादि के नाम उल्लेखनीय हैं । 


इसी शताब्दी में ग्रेताम्यर साधु श्री विनयप्रभ ने गौतमरासा 
की रचना संवत्‌ १४१२ में की थी तथा जिनआयगुरु के शिष्य 
और ठवकर माल्दे के पृत्न॒विद्धणू ने सानपंच्रमी चउपई की 
रचना संवत्‌ १४२३ मे समाप्त की थी। प्रथम रचना में गौतम 
स्वामी का चरित्र चित्रण किया गया है जिसका पर्णन काफी 
सुद्दर हुआ है। दूसरी रचना में श्र्‌तपत्मी की कथा का वर्णन 
किया गया है। गौतमस्वामी रासा के एक पद्म का रसाल्वादन 
कीजिये जिसमें उनकी सुन्दरता का वर्णन किया गया है-- 


जिय सहरारहं कोयलि टहुकठ, जिम. बृसर भह वनि परिसेत बहव उं । 
जिम चंदन सो गंधनति, जिमि गंगाजल लहँं शहद । 
जिय कणयावल तेजिहिं भलकिइ, तिम गोगम सोभा गनिधों ॥ १६ ॥ 


१६ वीं श्ाब्दी में जनों ने दिम्दी भाषा में काफी साहित्य 
लिखा | कुछ उच्च श्रेणी के भी कवि हुए। इन कवियों में संवेग- 
सुन्दर, कककसूरि, वीहल्ल, छीहल, धर्मदास, ठक्कुरसी के नाम 
उल्लेखनीय हैं । संवेगमुन्दर ने सारसीखामणरास की संवत्‌ १४४८ 
में रचना की थी | इसो प्रकार श्री कक्फ़सूरि ने संवत्‌ १५०४ में 

धन्नाचउपई की रचना सम्ात्त की। वीहल्ल कविने १४५७४ मे 
पत्नसहेली की रचना की तथा छीहल कवि ने १४८४ में बावनी को 
समाप्त किया । इसी समय धर्मदास ने भी धर्मोपदेशश्रावकाचार 


ह_ #«३०४ 


को संवत्‌ १४७८ में समाप्त किया। रचना की भाषा बडी सुन्दर 
है। इसमें जेन धर्म के सिद्धान्तों को बड़ी ही अच्छी तरह सम- 
भाया गया है । इस शताब्दी की यह सबसे बडी रचना है। इस 
का एक उदाहरण देखिये जिसमें कवि ने प्रन्‍्थ समाप्ति का समय 
दिया है-- . 
' पर्द्रइते अद्ठृत्तरि यहिह्, संवध्छद कुसलह कने परत । 
निर्मेश वसास्सी अखतीज, बुधवार गुनियहु जानीजे। 
ता दिन पूरों कियो यहु अ'थ, निमंल धर्म भगी जो पथ । 
संगत कर अंर विधनि हरुठु परम सुर्ख मविभन कहु' करण । 
इसी समय श्री चतुरुमत्ञ कबि ने भो नेमीश्वर गीत की रचना 
की थी। यह रचना संबत्‌ १४७१ की है तथा इसमें नेमिनाथ 
स्वामी के विवाह समय की घटना से लेकर राजुल के दीक्षा 
समय का वर्णन किया गया है। 


मध्य काल 


१७ वीं १८ वी और १६ वीं शताब्दी जेन हिन्दी साहित्य के 
लिये ही नहीं किन्तु हिन्दी साहित्य के लिये भी सर्वोत्कष्ट काल 
रहा | इन तीन शताब्दियों में हिन्दी साहित्य की चहुंसुद्ली उन्नति 
हुईं । महाकबि तुलसीदास, बनारसीदास, बिहारी, रसखान, भूषण 
आदि जितने भी उच्च कबि हुये वे सब इन्ही तीन शताब्दियों में 
हुये | इन कवियों ने हिन्दी साहित्य के उत्थान के लिये अपने 
जीवन की बाजी लगा दी। यदि इन तीन शताब्दियों के साहित्य 


को हिन्दी साहित्य से निकाल दिया जावे तो फिर हिन्दी साहिल 
निर्जेन वन के समान मार्लूँम पड़ेगा । 


,. जैन हिलदी साहित्य में भी इन तीन शताब्दियों में अनेक्र कवि 
एवं लेखक हुये जिन्होंने हिन्दी साहित्य के भए्डार को भर दिया। 
दूसरी विशेषता इस काल की यह रही कि १७ वी शताब्दी के 
प्रारम्भ से ही हिन्दी गद्य का स्व॑रूप भी हमारे सामने आया इससे 
हिन्द्दी के पठन पाठन पं स्वाध्याय का और भी प्रचार बढा | 


१७ वीं शताब्दी के ओरम्भिक कवियों में श्री कुमुदचन्द् का 
नाम विशेष उल्लेखनीय है। इन्होंने संबरत्‌ १६०० मे लिखना 
प्रारस्भ किया था। कबि की बाहुबलि छल्द, त्रेपनक्रिया, ऋषमे 
व्रिवाहइलो, शीलगीत आदि रचनायें मिलती हूँ, इनमें भरतवाह्वर्शि 
छन्द विशेष उल्लेखनीय रचना है।, 


ब्रह्म रायमत्न १७ वीं शताब्दी के प्रथम पाद के कवि हैं 
सभी रचनाओं को प्रशस्तियों में इन्होंने अपने आपको मुनि 
अलन्‍तकीत्ति फा शिष्य लिखा है। नेमीधवररास कविंवर की उप 
ज्व्ध रचनाओं में प्रथम रचना हे। इसका रचना संवत्‌ १६९४ 
है। इसके अतिरिक्त हनुमंतकथा, प्रद्य स्तचरित्र, सुद्शनरासो, 
निदोषसप्तमोत्रतकथा, . श्रीपालरासो, भविष्यदत्त कथा आदि 
रचनाये उपंत्व्ध हैं । 


पाण्डे जिनदास ने संबंत्‌ १६४९ में जम्वूस्वाभी चरित्र की रचना 


अककन-न-परानान हद बे 


सम्राप्त की । इसके अतिरिक्त जोगीरासा एवं ज्ञीनेसूयोंद्य नाटक 
इनका और मिक्षता है। |: , , .,, , 

( कविव॒र रूपचन्दजी, १७ वीं शताब्दी के श्रेष्ठ कबि थे । उप 
ल़ब्ध रचनाओं के आधारपरं यह कहा जा सकता है कि इनकी 
कषित्व शक्ति बहुत ही उच्च श्रेणी की थी | कविवर ज्लान कप्ा के 
रस में भीगे रहते,थे। परमार चर्चा ही उनका मुख्य ध्येय था। 
महाकवि बनारसीदास ने इनको आगरा नगर की प्रमुख तथा 
प्रसिद्ध ज्ञानगोंठी , का प्रथम विद्वात होना लिखा है। आपने जो 
कुछ साहित्य लिखा अधिकांशतः वह.आध्यात्सिक रस से अलंकझत 
किया हुआ है.।, आपकी झभी तक- परमार्थदोहाशतक, अरमार्थ 
गीत॑, पदसंप्रह, . गीत पद््मार्थी, -पंच्रंमंगल,. नेमिनाथरास'आदि 
रचनाये प्राप्त हुई हैं।। सभी रचनायें उच्च कोटि की हैं । इसका 
एक उदाहरण देखिये-। 

- गुर बितु भेदन पाइये, को पर को निज, वरतु 
7 ,? ,,गुर बिंदु मव सागए विषे, प्रतत्त गहै को हस्तु ॥. 

रूपचन्द सदगुरुति की, जन वशिहारौ-जाई। 
श्रापन जे सिवपुर गहे, भन्‍्यनि पंथ दिखाह || 
« उक्त कवियों के अतिरिक्त इस शताउद्दी में होने वाले कवियों 
में ब्रह्म गुल्ञाल, त्रिभुवनचन्द्र आदि के नाम विशेष उल्लेखनीय 
हैं । महाकवि बनारसीदास भी इसी शताब्दी के कषि थे, जिनका 
स्थान जैन हिन्दी साहित्य में सर्वोत्छष्ट है। इनका पूर्ण परिचय 
आगे दिया जावेगा। 


जैसा कि पहिले कहा जा चुका है इस शताब्दी में हि्दी गद्य 
की रचनाये भी प्रारम्भ हो गयी थी। इस दिशा में सब्र प्रथम 
रचना समयसार की हिन्दी गद्य टीका है जिसको बैराठ (जयपुर) मे 
राजमल्त ने लिखी थी । इसको इन्होंने संचत्‌ १६०० के आसपास 
समाप्त की थी। महाकबि वनारसीदासजी ने भी इन्हीं की टीका 
के आधार पर समयसार नाटक की रचना की थी । 


इसके अतिरिक्त पं० अख्यराज और श्री पाए्ड द्ेमराज का 
नाम भी विशेष उल्हेख़नोय है। पं” अखयराज कृत चतुर्देश- 
गुणस्थानचर्चा, विपापहारस्तोत्रभापा, कल्याणमन्दिरस्तोन्न टीका, 
भूपाल चौवोसी टीका के नाम उल्लेखनीय हैं। चतुर्दश- 
गुणस्थानचर्चा अस़यराज की स्वतन्त्र रचना है। इसी तरह 
पाएडे हेमराज ने हिन्दी गद्य में प्रवचनसार वचनिका, पद्चा्लि- 


काय टोका, नयचक्र बचनिका, कर्मकारड टीका आदि हिन्दी प्रो. 


की रचना की थी। ये १७ वीं शताब्दी के अन्तिम पाद एवं १८ वीं 
शताब्दी के भारम्भ के कवि थे । 


१८वीं शताब्दी में महाकबि वनारसीदासजी की रचनाश्रों के 
सामने आने के पश्चात्‌ जेन कवियों की काव्यत्व शक्ति भी इुछ 
विकसित हुईं। यद्यपि उन्होंने अपनी रचनाओं का अधिकांश 
विषय धार्मिकता एवं आध्यात्मिकंता तक ही सीमित रखा किन्तु 
इन रसों में ही उन्होंने अपनी काव्यत्य शक्ति प्रदर्शित की | 


कणन्‍न्‍ू» १ (६.ुए०--« 


इस शताब्दी के श्रेष्ठ कवियों में भेय्या भगवतीदासजी का 
नाम लिया जा सकता है। ये आगस के रहने वाले थे। इन्होंने 
अनेक विषयों पर अपनी रचनाएं लिखी हैं कविवर हिन्दी, संस्कृत, 
फारसी, गुजराती आदि भाषाओं के अच्छे विद्वान्‌ थे। आपकी 
रचनायें प्रसाद गुण से परिपूर्ण हैं। कबिवर का 'द्मवित्ञास' 
उनकी विभिन्न रचनाओं का संग्रह है। इन्होंने अपनी रचनाओं में 
जन-कल्याण की भावना प्रदर्शित की है। किसी को रिमाने के 
हिये अथवा अपने आप के आनन्द के लिये कविता रचने का 
इनका विलकुल्ल ध्याव नहीं था। इनके एक पद का नमूना देखिये 
जो कितना मधुर एवं सरल है-- 
कहा परदेशी की पतियारों । 
भन माने तब चले ५म यो, सांस गिने न प्कारों ! 
! सबे वुट्टम्ब छाड इतही पुनि, त्याग चले तन प्यारे ॥ 
दूर दिशावर चलन श्रापही, की न रोकन हाते । 
कोऊ प्रीति करो किन कौटिक, भर त्त होयगो न्यारो ॥| 
' शत मों सचि धरम सो भूलत, झूलत मोह मंमारो । 
इहि विधि काल अनन्त गमायो, पायो नहिं भव पारे.॥ 
साचें पुखतों विधुख्त हेत हो, मम मदिरा मतवारों। 
चेतहु चेत उुनहु रे मश्या, ज्ञाप हो श्राप पंमारो ॥ 


मैय्या भगवतीदासजी के समकाज्ञीन महान संत आनन्द्घन 
हुये। संत-साहित्य के विशेषज्ञ एवं अध्ययनशील विद्वान्‌ 


इस € 


लितीमोहनसेन ने उन्हें जनमर्मी कषि की संज्ञा से सम्बोधित किया 
है। राजस्थानी के प्रसिद्ध विद्वान्‌ श्री अगरचन्द॒नाहटा के शब्दों 
से “आनन्द्घनजी द्वारा रचित चतुविशति जिनस्तवनों एवं पदों में 
अध्यात्म का अखंड प्रवाह प्रवाहित हुआ है। आपके पदों और 
कवोर एवं मुन्द्रदास के पदों में वहुत कुछ समता मिलती है । 


बुलाकीदासजी भी इस शताब्दी के अच्छे कषि थे। इनकी 
माता का नाम जेनी एवं पिता का नाम नलल्ाज् था। कवि की 
साहित्यिक प्रगति में इनकी मात 'जेनी' का विशेष हाथ था। 
इनकी दो रचनाये उपल्च्ध होती हैँ. एक महाभारत (पाण्डवपुराण) 
ओर दूसरा परश्नोत्तर श्रावकाचार ' इनकी दोनों ही रचनाओं में 
कहीं २ काव्यत्व के अच्छे दशन होते हैं । 

कविवर भूधरदासजी का स्थान-सम्पूर्ण जेन साहित्य में उत्कष् 
है। महाकवि कत़ारंसीदासजी के पश्चात्‌ इन्हीं का नाम गिनाया जा 
सकता है। इन्होंने ।पाश्चेपुराण, मूधरशतक एवं अनेक सुट 
पद्यों की [चना की थी ।:ये तीनों ही रचनाग्ने जेन साहित्य में ही 
नहीं किन्तु हिन्दीसाहित्य में भी उल्लेखनीय स्थानवाली हैं | 
इनका: पाश्रेपुराण एक खतन्त्र रचना है जो प्रसाद एवं माधुय गुण 
से ओतग्रोत है इसको इन्होंने संबत्‌ १७५८६ में समाप्त किया था। 

कविवर भूधरदासजी के ही समकालीन श्री द्यानतरायजी हुये । 
इसकी रचनाओं का संग्रह “घर्मविज्ञास” है जो संवत्‌ १७८० में 
पूरों हुआ था।-ये भक्तिमार्ग॑ वाले कवि थे। हिन्दी मे इन्होंने 


6 


अनेक पूजाओं की रचना की जो आज प्रत्येक स्थान पर पढ़ों 
जाती हैं । इनकी भाषा एवं शेत्ञी अच्छी है जिसमें कठिन विपय 
को भी सरज्ञ करके सममभाया गया है। हे 


१८ वीं शताब्दी में उक्त कवियों के अतिरिक्त मनोहरल्ाल, 
खरगसेन, जोधराज गेदीका; खुशालचन्द काला, किशनर्सिंह आदि 
और सी कषि हुये। इनमें मनोहरज्ञाल ने घर्मपरीक्षाभाषा, 
खरंगसेन मे त्िज्ञोक दर्पण फथा, . जोधराज ने सम्यक्त्वकोमुदी, 
घर्मंसपोवर, पंश्मनन्दि पंचविशति आदि तथा किशनसिह ने क्रिया- 
कोश आदि की रचनायें की थी। ये सभी रचनाये कितनी ही 
इृष्टियों से महत्त्वपूर्ण हैं । 

१६ वो शताब्दी में उल्लेखनीय कवियों में पं> दोलतरामजी, 
पं० टोडरमलजी, प॑० जयचन्दजी छाबडा, पृन्दावनजी आदि के नाम 

गिनाये जा सकते हैं। इंस शत्ताब्दी में पद्य साहित्य की अपेक्ता 
गद्य साहित्य का अधिक निर्माण हुआ । हिन्दी भाषा के मचारा- 
धिक्य से एवं स्वाध्यायप्रेमियों की मांय के अनुसार विद्वानों 
ने संस्कृत. एवं प्राहद अपन्न श प्रन्थों का सरल हिन्दी में अनुवाद 
अथवा भाषान्तर किया जिससे हिल्‍्दी भाषा के ग्रन्थों के प्रचार 
में एवं स्वाध्याय में उत्तरोत्तर इंड्धि हो । 


प० दौलतसमजी ने पुश्याश्रवकथाकोश, करियाफोश, अध्यात्म- 
दखडी, वसुनन्दिश्रावक्ाचारं भाषा, पद्मपुराणसाषा, हरिवंशन- 
पुराणभाषा) आदि ग्रन्थें की रचना की थी। इनकी भाषा बहुत 


इन थ_ (.क्‍०-३० 


सरल है। इस पर हूंढारी भाषा का अत्यधिक प्रभाव॑ है। जम॑ 
समाज में इनके लिखे हुये ग्रन्थों की स्वाध्याय का अत्यधिक प्रचार 
है । वे राजस्थान में ही नहीं पंढे जाते किन्तु गुजरात में एवं दक्तिण 
में भी उनका अत्यधिक प्रचार है। 


परिडतप्रवर टोडरसंत्रजी भी इसी शताब्दी के रत्न हैं । अपने 
समय के ये सच श्रेप्ठ साहित्यिक, विद्वान्‌ एवं समाज सुधारक थे | 
ये केवल २८ व तक दी जीये और इतने से अत्पंकात में गोम्मेट” 
सारवचनिका, त्रिलषोकसारबचनिकां, आत्मानुशांसनभाषा,पुरुषा“ 
थैसिद्धथू पाय भाषा एवं मोक्षेमार्गप्रकाश आदि प्रन्‍्थों की रचनाये 
की। आप का ज्लान पारदर्शी था। इसीलिये आप गोंग्मंटसार 
एबं त्रित्ञोकसार जैसे गृह अथ वाले ग्रन्थों की सरल एवं बोधगम्य 
वचनिकार्य लिखीं । मौक्षमागे प्रकाश आपकी स्वतन्त्र रचना हैं. 
इसमें जेनसिद्धान्त का गंभीर विवेचन किया गया है। इसकी भाषा 
भी हृढारी हैं । आजकल के हिन्दी गद्य से वेद बहुत कुछ 
मिलती जुल्नती हैं। क्रिया पदों और कोरक प्रत्ययों के बदलने 
मात्र से ही वह आजकल की खडी बोली वन सकती है। 


पं० जयचनूजी छावडा का गय लेखकों में महा पंडित टोडर- 
मल्नजी एवं दौलतरामजी के वाद का स्थान है । इन्होंने सवार्थसिद्धि, 
परीक्षामुस, द्रव्यसंग्रह; स्वामिकात्तिकेयानुप्रेज्ञा, समयसार, देवागम” 
स्तोन्र, अ्पपाहुड, न्लानाणंव आदि अन्धों की भाषा बचनिका्े 
लिखी । इनकी गद्य शेह्ी सी उत्तम है,। 


श्री इन्द्रावंनजी १६ थो शताब्दी के श्रे छ कवि कह्दे जा सकते हैं | 
उन्होंने छुल्दशतक, प्रबंचनसार टीका, चतुर्विशतिजिनपूजापाठ; 
तेस-चौत्ीसीयूजापाठ। इन्द्ावन-वि्ञास आदि रचनायें की थीं। 
ईनमें रग्भाविक कविश शक्ति थी। प्रत्येक बिंपय को सरल शब्दों 
में प्रत्मुत करना इन्हें खूब आतां था। इसीलिये इनकी कविता में 
स्वाभाषिकता और सरक्षता दोनों ही मित्षतों हैं । 

इसी प्रकार जन हिन्दी साहित्य में और भी कवि, एवं लेखक 
हुये जिल्‍्दोंने अपनी रचनायें लिखकर हिन्दी भाषा के अचार एवं 
पठनपाठन में अत्यधिक सहयोग दिया। यय्यपि अधिकांश जेन 
कवियों में अपनी रचनाओं- के विषय को धर्मश्रधान एवं अध्यात्म- 
प्रधान ही रखा है किन्तु इस प्रकार के साहित्य में भी कितने ही 
स्थानों पर तो हमे उत्तम काव्य के दर्शन होते हँ। इसलिये हिन्दी 
साहित्य के बिह्मनों को चाहिये कि वे जन साहित्य के ख्लोज एवं प्रचार 
की ओर ध्यान दें एवं उसकी रचनाओं को उचित स्थान देने का 


प्रथत्त करे । 
शो 


महाकाब बंनारसीदास 


१७ वो शताब्दी हिन्दी-साहित्य के इतिहास में कई दृष्टियों से 
उल्लेखतीय है। इस शताब्दी में तुलसीशास, केशवदस, वनारसी- 
दास, बिहारी, भूषण, सेनापति, रहीम आदि कितने ही महाकविं 
हुये जिन्होंने हिन्दी भाषा में सर्वोत्मष्ट रचनायें निवद्ध करके उसे 
अमर बना दिया। जेन कवि बनारसीदास भी इसी शताब्दी के 
महान म्रतिभाशाली कवि हैं जिन्होंने दिन्दी में त्रिकालाबाधित 
रंचनायें लिखकर इसके साहित्य भण्डार की श्री वृद्धिकी है। 
घास्तवे में यदि इसे शताब्दी में ये कविगण न हुये होते तो हिन्दी 
भापा इतनी जमप्रिय भाषा न वनी होती जितनो वह आल है। 


वनारसीदासजी का स्थान हिन्दी के भ्राध्यात्मिक साहित्य में 
फेंबीर के समकत्त कहा जा सकता है। वनारसीदासजी फी काव्यल 
शक्ति नेसगिक थी। इनकी सूक निराल्ी थी तथा इनकी शैली में 
आकपण था। पह्दी कारण है कि इनके हार लिखे हुये साहित्य 
को जैन हिन्दी साहित्य मे सर्वोत्क्ट स्थाव दिया गया। लेकिन 
दुःख फे साथ लिखना पडता है कि हिन्दी साहित्य के ऐतिहासिक 
विद्वानों ने अपने हिन्द्ीसाहित्य के इतिहास में नामोल्लेस के 
अतिरिक्त इनकी सेवाओं को कोई मूल्यांकन नशें किया जब कि 
इनके द्वारा लिखा साहित्य हिन्दी के अनेक कवियों के साहित्य के 


समकत्त रखा जा सकता है । कविवर हारा लिखा हुआ अडेफथा- 
नक तो अपने ढंग की प्रथम एवं सर्वोत्तट प्राचीन रचना है | 


वनारसीदासजी का जन्म संवत्‌ १६४३ में जौनपुर नगर में 
हुआ था प्रारम्भ में इनका नाम विक्रमाजीत था लेकिन वाद्‌ में 
बनारस के एक पुजारी के कहने से इनका नाम बनारसीदास रखा 
गया । कवि के पिता का नाम खरगसेन था । ये श्रीमात्न जाति के थे 
ओर बीहोलिया इनका गोत्र था। अर्धकथानक में लिखा है कि 
विहोली गांव राजपूतों की एक वस्ती थी जो एक जेन मुनि के 
उपदेश से जेन वन गयी थी । इसने अपने आपको श्रीमाल जाति 
एवं बीहोलिया गोत्र से प्रसिद्ध किया। 


वनारसीदासजी अपने पिता के इकल्षौते पुत्र थे। बचपन में 
इनका लालन पालन बडे लाड़ प्यार से किया गया था| ७ वर्ष 
की अवस्था से इन्होंने विद्याध्ययन आरम्भ किया। इनके गुरु 
कविवर रूपचन्दजी थे जो स्वयं ही पहुंचे हुये आध्यात्मिक कवि थे। 
इनकी बुद्धि प्रखर थी तथा विषय को जल्दी ही प्रहण करलेती थी, 
इसलिये थोडे अर्से में ही इन्होंने काफी ज्ञान प्राप्त कर लिया। 
इसके पश्चात्‌ इन्होंने पढ़ना बन्द कर दिया लेकिन १४ ब्ष की 
अवस्था में इन्होंने फिर पं० देंवोदासजी के पास पढना प्रारम्भ 
किया तथा नामसाता, ज्योतिषशास्त्र, अलंकारशास्त्र एवं कोकशास्त्र 
का थोडा अध्ययन किया । 


वनारसीदासजी का प्रथम-विवाह १० वर्ष की अवस्था में हुआ 


था । इनकी यह पत्नी बडी सुशीज्ञा संतोषी एवं पतिसेवापरायणा 
थी, लेकिन विवाह के करीब १४-१६ वर्ष बाद इसकी मृत्यु हो गयी । 
इससे वनारसीदःसजी को बहुत दुःख हुआ । इसके पश्चात्‌ कविवर 
के और भी दो विवाह हुये किन्तु वे अपनी प्रथम पत्नी के गुरणों 
का कभी विस्मरण नहीं कर सके। तीनों पत्नियों से आपके ६ 
बालक हुये किन्तु सभी वालक पैदा होने के कुछ दिनों वाद ही 
मर गये | कंबिबर का अन्तिम बच्चा ६ वर्ष का होकर मरा। इस 
बालक को खोकर तो इन्हें जीवन से एक दम निराशा हो गयी 
और उन्हें संसार बहुत भयानक प्रतोत होने लगा, जैसा कि 
उनके निम्न उद॒गार से मालूम पड़ता है-- 


नो बालक हुए मुए, रहे नारि नर दोय | 
ज्यों तरूवर पतमारहों रहे दृठ से दोय ॥| 


युवावस्था के पदापेण करते ही बनारसीदासजी अनंगरंग में 
भस्त हो गये थे। इनके सिर पर इश्क़वाजी का नशा चढ़ गया 
था। रातदिन इनका ऐसी ही बातों की चर्चाओं में व्यतीत होता 
था। इसी समय इनको कविता करने का भी शौक हो गया था। 
लेकिन इश्कबाजी में फंसे रहने के कारण ये #ंगाररस की ही 
अधिकांश कवितायें लिखने ज्गे | इसी समय इन्होंने एक हजार प्ों 
वाली एक पुस्तक की भी रचना की । यद्यपि इस पुस्तक में सभी 
रसों से सम्बन्धित कविताएं थीं लेकिन सबसे अधिक 
इस पुस्तक में जो सामग्रीथी उसका सम्बन्ध अंगाररस 


“>> बेघ- 


से हो था। वनारसीदासजी कितने ही साधु सनन्‍्यासियों के 
जाल में फंसे रहे और जैसा उन्होंने कह बेसा ही बनारसीदास 
जी ने किया। संबत्‌ १६६२ में वादशाह अकबर फी सृत्यु हुई। 
सृत्यु के समाचार सुनकर वनारसीदासजी को इतना अधिक दुःख 
हुआ कि वे यह समाचार सुनते ही गिर पड़े | इसके बाद उनके 
जीपन में परिवत्त न आया। वे साधु सन्यासियों के चक्कर से 
निकल गये तथा शृंगाररस के स्थान में आध्यात्मिक रस का गुरा- 
गान करने लगे । उनको अपने अबत्तक के ज्यतीव जीवन से घृणा हो 
गयी तथा अवतक उन्होंने जो शंगाररस से सम्बन्धित कविताओं 
की रचना की थी उसे भी उन्होंने गोमती नदी में सदा के लिये 
वहा दिया | हिन्दी साहित्य एवं जन साहित्य दोनों के लिये ही 
यह एक अपग्रिय-घटना रही । यदि यह रचना बची हुई होती ते 
जैन कवियों पर जो फेवज्त आध्यात्मिक होने का आरोप लगाया 
जाता है बह सदा के लिये बच जाता । इस के बाद तो कवि का 
सम्पूर्ण जोवन ही दूसरी दिशा में प्रवाहित होना था जेसा कि 
स्वयं-कवि ने कह है+- 
.. तिस दिन सो बनाखो, क्री घमं को चाह। 
; दी भ्रासिखी फ़ाप्रिखी पकरी कु को राह ॥, 


व्यापारिक जीपन -- 


२३ दर्ष तक बनारसीदासजी ने फोई काम घन्धा परम्म नहीं 
किया.। २४ वें वर्ष में कवि के पिता खरगसेवजी ते इन्हें घर रा 


सारा काम काज सम्हला दिया। अभी तक इनको कोई काम 
धन्धा नहीं करता पडा था इसलिये व्यापार में ये अभी अन- 
भिन्न ही थे। छुछ दिलों पश्चात्‌ इन्होंने आगरे में जाकर 
व्यापार कार्य करना चाहा और घर से दो मुद्रिका, चौजीस 
माणिक, नो नीलम, वीस पन्ना और ४ गांठ फुटकर चुनो, २० 
मन घी, २ कुप्पे तेज़्, २४० रुपयों का कपडा तथा अन्य सामान 
जेकर आगरा के लिये रवाना हो गये। मांगे में अनेक कठिनाइयों 
का सामना करते हुये ये आगरे पहुँचे, लेकिन व्यापार में अनमिश्ष 
होने के कारण इन्हें कुछ भी सफत्ञता नहीं मित्ञी और थोड़े ही 
दिनों में घर से ज्ञायी हुयी सारी सम्पत्ति को घाटे मे देकर ख्य 
दरिद्र वन बैठे । इसके बाद इन्होंने आगरे में ही एक दूसरे 
व्यापारी के साथ सामे मे कांये किया लेकिन उसमें भी कोई 
सफलता नहीं मित्री और जितना रुपया कमाया वह सब खाने 
पीने में ही ख़चे होगया। फिर नरोत्तमदास नामक एक अन्य 
व्यापारी के साथ खैराबादी कपडे का व्यापार कार्य प्रारम्भ किया | 
लेकिन उसमे भी उल्टा घाटा ही उठाना पढा ।तब इन्होंने अपना 
सतन्त्र ही कार्य किया और इसमें इन्हें सफलता मिल्ली तथा हु ' 
हो समय मे इन्होंने अच्छा धन कमा क्षिया | अब ये आगरे में ही 
रहने लगे। 
विद्वानों का संपर्क एवं सहयोग-- 

जेसा कि पहिले कहा जा चुका है कि वचपन में वनारसीठासरी 
को प्रसिद्ध आध्यात्मिक कवि रुपचन्दजी से तथा फिर १० देवी” 


उ००७ टै 6२०० 


दौसजी से अध्ययन कर॑ने का अवसर॑ मिला था। आगरे में इनको 
अथेमल्लजो से संसंगे हुओ | अर्थमल्त॒जी सदा ही अध्यात्म रस 
सें सने हुये रहते थे। इन्होंने बनारसीद्रासज्ञी को पं० राजमल्लं 
ऊृत हिन्दी बालावबोधिनी टीका सहित समयसार नामक ग्रन्थ 
स्वाध्याय करने को दिया। इसका स्वाध्याय करने के पश्चात्‌ ये 
निश्चय नय के एकास्त श्रेद्धानी बन गये और बाह्म॑ क्रियाओं को 
स्वेथा छोड बेंठे । लेकिन जब इन्हें पं* रूपचन्दजी से गोम्मट“ 
सार नामक सिद्धान्त ग्रन्थ पढने का सौभाग्य मिला तब इनको 
चस्तु+रिथिति का बोध हुआ। आगरे में इन्हें पं० रूपचन्दजी के 
अतिरिक्त अन्य विद्वानों के साथ रहने का भी अवसर मिला था। 
इन विद्वानों में चतुभु जजी, भगवतीदासजी, धम्दासजी, कु बर- 
पाज्ञजी और जगजीवनजी के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। ये सभी 
विद्वान आध्यात्मिक चर्चा में गहरा रस लिया करते थे ओर रात 
दिन उसी की चर्चा में मस्त रहते थे | 


जैन विद्वानों के अतिरिक्त उन्हें अन्य विद्वानों से भी भेंट करने 
का अवसर मिला था ऐसी भी कितनी ही किवरन्तियां प्रचलित हैँ। 
इन विद्वानों एवं सन्‍्तों में सुनंद्रदासजी एवं तुलसीदासजी के नाम॑ 
विशेष उल्लेखनीय हैं । सुन्दर प्रत्थावढ्षी के सम्पादक पं० हरिना* 
रायणजी शर्मा बी? ४० ने धन्धाप॑ली की भूमिका में एक स्थान पर 
लिखा है--“प्रसिद्ध जेन कवि वनारसीदासली के साथ सुन्द्रदास* 
जी की मैत्री थी। सुन्दरदासजी जब आगरे गये तंव वनारसी" 
एासजी फे साथ उनका संसर्ग हुआ था। वनारसीदासजी 


“>र्पे-« 


तुन्दरदासजी की योग्यता, कविता और यौगिक चमत्कारों से मुख 
हो गये थे। तभी उतन राधा मुककऊंठ से उन्होंने की थी। परन्तु 
वैसे हो त्यागी और मेधावी बनारसीदासजी भी तो थे। इनके 
गुणों से सुन्दरदासजी प्रभावित हो गये इसी से बसी अच्छी 
ग्रशंसा उन्हेंने भी की थी।” 
इसी प्रकार बनारसीदासजी की मंद्ाकषि तुलसीदांसजी से भी 
कितनी ही बार भेंट हुई थी। यह भी कहा जाता है कि इनको 
भदहाकवि ने रामायण की एक प्रति मेंट की थी। कुछ वर्षो के बाद 
जब कविवर की गोस्वामीजी से भेंट हुईं तब तुल्लसीदासजी ने 
रामायण के काव्य सौदय के सम्बन्ध में जानना चाहा जिसके 
उत्तर में कविवर के प्रसन्न होकर निम्न कविता उसी समय 
सुनाई थी-- 
विराजे रामायण घट माँहि । 
मत्मी होय मरतत तो जाग, मूरत माने - नाहिं॥ 
आतमराम्र ज्ञान गन लखन, सीता छुमति समेत । 
शुसोपयोग चानर्‌द्त संदित, वर विवेक रंण-खेत ॥ 
ध्यान धनुष टंकार शोर मुनि, गई विषयादिति भांगे। 
मई भरत प्रिध्याम्रति लंका, उठी धारणा धाग॥। 
जे भ्रन्नान मात्र राहचसकुल, लरें निकांतित हर) 
जूमे राग 'दृष सेनोपति संशयगट चकनूर ॥| 
वितखत कुम्मकाण मंत्र विश्व, पुरलेकित मन दस्याव | 
चकित उदार वीर महिावण, सेतुन॒ण समरभात्र ॥ 


पल मतेएे शाही, शर्य चल हनगात। 

पही मतु्गति परयति सेना, हुटे एपए गुण्यान ॥ 
जिस हद शत चक गदसेग, उदय विषय दीन । 

6 बरध मरी शव मो आप गांव झिरहीन॥ 
इह हि हल छोपु पद छत, हींग मदन सभाम । 

मद दिव( एहि शाधायेय ऐैगिल नि. रा 


तकालीन म्रगल बादशाह भौर बनारसीदासशी-- 


बनासनीदासर्जी ने पे जीवन काल मे तोन मुगल बावशाहों 
फा शासन देखा था। बादशाह 'अ्कर के ये काफी प्रशंसक थे 
इसोलिय उसकी मृत्यु के समाचार मुनकर बनारसीदासजी फो 
अत्यंत दुःख हुआ और वे बैठे २ हो गिर पढ़ें। जहांगीर के 
सामने भी इनमे एक़ बार उपस्थित होना पडा था और उल्ोंने 
“जानी बादशाह ताको मेरी तसलीम है” इन शब्दों में वादशाद, 
क्री सलाम किया था। शाहजद्ां वादशाई के दरबार में तो इन्हें 
प्रतिदिन उपस्थित होना पढ़ता था और वह्दों जाकर इन्हें वादशाह 
के साथ शतरंज खेलनी पड़ती थी और अन्त में उन्हें बडी 
ऊठिनता से छुटकारा मिला था। 
कवि का अन्तिम जीवन-- 


अर कथानक में दिये ५५ वर्ष के जीवन चरिंत के अतिरिक्त 
थ्रागे के जीवन के संम्धन्ध में कोई निश्चित रूप से नहीं कहां 
जा सकता वे कितने वर तक और जीयें। लेकिन इतना अवश्य 


>> रद 


है कि उनका अन्तिम जीवन सुख से ध्यतीत हुआ होगा। इंस 
जीवन में उन्होंने कौनसे साहित्य का निर्माणं किया अथवा केवल 
आध्यात्मिक चर्चाओं में हो अपना जीवन व्यतीत फिया इस 
सम्बन्ध में हमें कोई जानकारी नहों मिलती । 
धतारसीदासजी की रचनायें -- 

उपलब्ध साहित्य के आधार पंर थंह कहां जा सकता है कि 
घनारसीदासजी ने अपने जोबन में नवरसपयद्मावत्नि, नाटक 
समयप्तार, बनारसीबिज्ञास, नाममाज्ञो और अडे कथानक नामक 
प्रन्थों की रचना की थी | इन सभी का संक्तित परिचय पाठकों के 
सामने उपस्थित किया जाता है-- 
नवर सपचावरलि--- 


नव॑रसपद्यावलि की रचना कविंवर ने अप॑नी युवाव॑ध्था में की 
थी। उस समय वे अनंगराग में मस्त थे और झूंगार रस 
का आस्वादन ही उनका प्रमुख ध्येय था । उसी संमय उन्होंने एक 
हजार प्योवाली रचना लिंखी थी। यद्यपि इसमें सभी रसों वाले पद 
थे लेकिन श्र गार रस से सम्बन्धित पद्यों की विशेषता थी। जब 
कवि का इश्कवाजो का नशा दूर हुआ तो उन्हें अपने द्वारा लिखी 
हुई नवरसपद्यावलिं से भी एक दम धूृंणा हो गयी। और एक दिन 
अपनी सम्पूर्ण रचना को गो मंती नदी में वहा दिया। हिन्दी जगत के 
'तिये एवं विशेषत. हिन्दी जैन साहित्य के लिये उनका यह काये अच्छा 
नहीं रहा । यदि यह पुस्तक आज हमे उपक्षष्ध होती तो जैन साहित्य 
केवज्ञ आध्यात्मिक अथवा धार्मिक है यह कहकर के ही उसकी 


उपेज्ञा नहीं की जाती | बनारसीदासजी ने इस पुस्तक के सनन्‍्वश्ध 
में निम्न लिखित पद्य लिखा है-- 

पोधी एक बनायी नयी, मित हजार दोहा चौपई। 

तामे नवर्त्त रचना लिश्ली, पे विसेस्त वरनन भासिस्ी | 

ऐसे कुकवि बनारती भू, मिथ्या अथ बनाएं बए। 


वाटक समयसार ०-- 


नाटक समयसार बनारसीदासजों की प्रमुख एवं सवश्रषठ 
रचना हे । नेन हिन्दी साहित्य में इस रचना का सर्वोत्कृष्ट स्थान 
है । अध्यात्म रस का यह अपूबे प्रन्‍्थ है जिसको एक बार पढना 
प्रास्स करने के पश्चात्‌ कभी छोडने को जी नहीं चाहता । इसकी 
रचना में कवि ने जो अमनी अपूर्व काव्य शक्ति का परिचय 
दिया है वह स्वेथा प्रशंसनीय है। इसका प्रत्येक पद आत्मा पर 
अपना सीधा असर डालता है। उदाहरणाथ दो पय उपस्थित 
किये जाते हैं-- 


राप्त रतिक अ्ररु राम रप्त कृहन छुनन को दोड़ | 
जब समाधि परगद मई तब दुविधा नहिं वोह ॥ 
ऐ ञ( ऐ भर 


आके घर सम्नता नहीं, ममता मगन सदौष | 
रमता राम ते जानही सी श्रपराधी जीव | 
'समयसार की रचना आचार्य कुन्दकुन्द में प्राइत भाषा में 
फो थी। उस पर आचाये अमृतचन्द्र ने संस्कृत टीका एवं कलशों 


“-३९-- 


की रचना की | १६-९७ वीं शत्ताब्दी में पांडे राजमल्तजी ने हिन्दी 


गद्य में बालावबोधिनी टीका लिखी और इन्हीं रचनाश्रों के | 


आधार पर बनारसीदासजी हारा हिन्दी पद्यात्मक्त समयसार की 
रचना की गयी । यद्यपि कवि की यह केवल एक प्रकार से समय- 
सार पर हिन्दी टीका मात्र ही है लेकिन उसमें अपनी अपूबे 
काव्य शक्ति से इतनी विशेषता ल्ञादी कि उनकी यह रचना सर्वथा 
मौलिक मातम देने लगी। इसमें कवि ने शब्दों का चुनाव एवं 
चयन इतना सुन्दर किया है'कि पाठक उसमें अपने आपको खोया 
हुआ अनुभव करने लगता हे । 
पूरे समयसार में ३१० दोहा सोरठा, २४३ सर्वैय्या इकतीसा, 
८६ चौपाई, ६० स्वेय्या तेईसा, २० छप्पय, १८ कवित्त, ७ अडिल्ल 
एवं ४ कुण्डलिया हैं। इस प्रकार सब मिला कर इसमें ७०७ छल्द 
हैं। यह रचना संवत्‌ १६६३ में आसोज शुकत्ञा दशमी रविवार 
के दिन समाप्त हुईं थी । 
आदरणीय नाथूरामजी प्रेमी के शब्दों में समयसार को 
भाषा साहित्य के अध्यात्म की चरम सीमा कहें तो कुछ अत्युक्ति 
नहीं होगी। आगे आने वाले जैन कवि एवं लेखकों पर समयसार में 
बशित आध्यात्मिकता का जो का प्रभाव पडा है वह उल्लेखनीय है । 


भनाममाला[-- 


महाकवि धनंजय छत संस्कृत नाममा्ा का यह हिन्दी पद्य में 
भाषान्तर है। कवि ने संस्कृत पद्यों का हिन्दी अजुवाद, बहुत ही 


र 


बनक पिके कक 

सरल एवं उत्तम रीति से किया है । दिन्दोकोश-साहित्य में यह 
स्वथा उल्लेखनीय रचना है हाईस्कूल चक के विद्याथियों के 
ज्िये वो शब्दों का ज्ञान वढने के लिये यह अत्यधिक उपयोगी 
पुस्तक है। उद्महरणाथे विद्वान के नामों का पर्णन करने वाले पद 
देखिए 4 * 


निपुण विलत्ण मिवुभ बुध ब्रियाधर विह्मद्‌ 
पह प्रबोष पढित चतुर, सुधी सुजन सत्रिमान [! 
' सावत, पोषिद कुशल, तुमन दक्ष धौम॑त | 
शात्रा सज्जय अह्मबिद तह्च गुणैजव संत |! 


१ 


अर्थकरथानक -- 

यह कवि हारा लिखा हुआ स्वयं का जीवन चरित्र है। कवि ने 
इसमें अपने ५४५ वर्य को जीवन' घट नाओ को उसी रूप में उपस्थित 
किया है| इससे यह सिद्ध होता कि भारतीय विद्वान भी आज से 
३०० वर्ष पहिले अपने जीवन इतिहास का महत्त्व समभते थे । 
कवि का यह आत्म-चरित्त ठीक आज जेसे आत्म-चरितों के 
समान लिखा गया है। कविने अपने जीवन की किसी भी घटना 
को लिखने में हिचकिचाहट नहीं की है । हिन्दी के प्राचीन आत्म- 
रितों में ऐसा कोई आत्मचरित नहीं है जिसकी इसको तुलना में 
रखा जा सके । इसमें सब मिलाकर ६७३ चौपाई तथा दोहे है। 
रचना सुन्दर एवं सरल है। इससे ५५ वर्षा के तत्कालीन सामा- 
जिक एवं राजनेंतिक जीवन का सुगमता से पता लगाया जा 


सकता है। संबत्‌ १६६२ में जब बादशाह अकबर का स्वर्गगास 
हुआ तो राज्य में चारों ओर अव्यवध्था एवं अशान्ति आ गयी। 
लोगों की चारों ओर विपत्ति ही विपत्ति दिखाई देने छूगी। करवें 
ने इसका वंडा सुन्दर चित्र खैंचा है.। उसे पढिये-- 


घर घर दर दर दिये कपाट, हटवानी नहिं बेठे हाट | 

हंदवाई गाढी कहूँ भोर, नकद माल निरमर्ी अर 
सत्ते वरत्र श्र मृषण भले, ते सब गई घरती तस्े | 

घर घर सबति वित्वाहे शस्त्र, लोगन पहिरे मोदे वत्त |) 
ठाढ़ो कंबल धधवा खेंस, नारिव पहिरे मोटे बेस । 

ऊँच नीच कोड नहिं पहिचान, घी दरिद्वी सये समान [! 
चौरि धाढ दीते कहूँ नाहि, योहों क्पप्य लोग ढराहिं। 


कवि की इन रचनाओं से तत्काढ्लीन शासन व्यवस्था एवं 
सामाजिक स्थिति आदि का अच्छी तरह पता चत्ञता है.) ये वर्णन 
इतिहास निर्माण के ल्लिए. बडे उपयोगी हैं. । 


प्नारसीविज्ञास--+ 


बनारसीदासजी ने पूर्व वणित सथनाश्नों के अतिरिक्त अन्य 
कितनी ही स्फुट रचनाये भी लिखी थीं। इंसकी कुछ संख्या कितनी 
हैं इसके सम्बन्ध में तो जेन शीद्ध भख्डादों की पूरी खोज होने 
के पश्चात्‌ ही निश्चित लिक्षा जा सकता है, लेकिन फिर भी बतेमाने 
में इन स्फुट रचनाओं की संख्या ६२ है। बनारसीविलांस के 


धारस्म में जो कवितामय विपय सूचनिका दी हुई है. उसमें कवि 
फी ५७ रचनाओं के नाम दिये हुये हैं। इनके सिवाय तीन नवीन 
पदों की खोज भ्रद्धेय नाथूराम जी प्रेमी ने की हैं। तथा अभी कवि 
के २ नवीन पद जयपुर के पाठोदी के मन्दिर के शास्त्र भण्डार की 
सूची वनाते हुये एक गुटके में हमें मिले हैं। संभव है कि कवि 
हारा रचित और भी र॑चनायें खोज करने पर प्राप्त हो सके। 


बनारंसीविलासं नाटक संम्यंसारः अद्ध कथानंक और नाम॑- 
भाला के अतिरिक्त कविं की अब॑ तक सभी उपलब्ध रचनाओं की 
संग्रह है। यह स्व कविका संगह किया हुआ नहीं है किन्तु कवि 
की मृत्यु के पश्चात्‌ प० जंगजीवन शम ने इसका संमह किया हे। 
पंडितजी आगरे फे रहने वाले हो थे। इनकी वनार॑ंसोदासजी की 
रचनाओं से अत्यधिक अनुराग थो, इसलिये उन्होंने उस समय 
तक उपलब्ध संभी रचनाओं का एक रंथान पर संग्रह कर लिया 
और इस संग्रह का नाम बनारंसीबिल्ञास रंख। । इन्दोंने इस कार्य 
को संवत्‌ १७७९ सें समाप्त किया । 

जैसा कि पहले कद्दा जा चुका है वनारंसीविलास एक संग्रह 
अंथ है। इसमें किसी एक विषय को संग्रह से दोकर कवि की 
विविध विफ्यों पर रचित कविताओं का संमह है। समूचे विज्ञास 
को हम मुख्यतया निम्न भागों में विभाजित कर सकते हैं-- 


१, जेने सिद्धान्त से सम्बन्धित कविताये 
' न. अनूदित रचनाये 


“+ ई६ -- 


३. आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी कवितायें 
४. सुभाषित, पद एवं स्फुट कवितायें 


१, जनधर्म सिद्धान्त से सम्बन्धित कवितायें!-- 


वनारसीदासजी जन शास्त्रों के पारदर्शी विद्वान थे। उनका 
गंभीर अध्ययन था। वनारसीविज्ञास में संग्रहीत जेन सिद्धान्त 
विपय से सग्वन्धित रचनाओं में जेनधर्म के गहन तत्वों का जो 
परिचय दिया गया है वह उन्तके जेन सिद्धान्त विषयक गंभीर ज्ञान 
का सप्ट प्रमाण है । सिद्धान्त की गहन चर्चाओं को उदाहरण 
देकर समभाना उन्हें अच्छी तरह आता था। सिद्धान्त के इस 
भाग में विज्ञास की मुख्यतया रचनायें आती हैः-ज्ञान वावती, 
मार्गसा-विधान, कर्मप्रकृतिविधान, साधु वन्दना, क्मछत्तीसी, 
ध्यान वत्तीसी, पंच पद विधान, अप्ट प्रकार जिनपृजा, देश दा 
दश बोल, पय्मार्थ वचनिका, निमित्त उपादान की चिट्ठी आदि । 


अन्ृदित रचनायें:-- 

इस संग्रह में कवि की तीन अनूदित रचनाएं भी हैं । सूचित” 
मुक्तावत्षि, कल्याशमन्दिरस्तोत् और जिनसहस्तननाम । सूक्ति- 
मुक्कावलि आचाये सोमप्रभ की संस्क्षत रचना है। कवि ओर उनके 
साथी कथि कुमारपाल (कौरपाल) ने उसका धुन्दर अश्ुवाद किया 
६ । कवि हयने इसे संवत्‌ (६६१ वेशात् सुद्दी १! को समा 
किया था। यह समय कवि की सबसे मदलपूर्ण रचना नाटक 
सययवाएं की रचना समाणि से कपेव २ वर्य पूर्व का आता है। 


एकमप ३७ हम्यी 


सूंक्कि मुकावत्षि के समी पद सुन्दर एवं हृदयप्राही हैं । एक पथ 
का नमूना देखिये:-- 


वयों मतिददीन विवेक बिना नर, साजि मतंगत ईंधन दोवे | 
कंचन साजन धूल सरे शठ मूद सुधार सो पगधोवे ॥ 
वाहित काग उढाबन कारण, ढार महामणि मूर्त रोवे । * 
थों यह दुर्ल देह बनारति, पाय श्रजान श्रकारधु-खोब || 


कल्याण मन्दिर स्तोन्न श्री कुमुदचन्द्राचायं की संस्कृत रचना 
का हिन्दी पद्मानु॒बाद है। इसे परम जोत भी कहते हैं। बहुत से 
भाई प्रतिदित इसका पाठ करते हैं। इसके प्रथम पद्य का पहिला 
पद्‌ परमजोत है, इसीलिये इसे परमजोत कहते हैं। विस्तार भय 
से हम उसका उदाहरण उपस्थित नहीं कर सकते। श्री जिनसेना- 
चाय के संस्कृत जिनसदस्तननाम स्तोत्र,का हिन्दी पयानुवाद कवि 
की तीसरी रचना है । इन तीनों ही रचनाओं के अनुवाद में कवि 
काफी सफल रहे हैं । - 


आध्यात्मिक एवं रहस्यत्रादी कवितायें।-- 


बनारसीविज्ञास की अधिकांश रचनायें किसी न किसी रुप में 
आध्यात्म विषय से ओतमप्रोत है। ऐसा लगता दे मानो आत्मा 
और परमात्मा के गुशगान में कबि ऐसे सने हुये थे कि उनका 
प्रत्येक शब्द अध्यात्म की छाप लेकर निकल्षता था। ख् कवि 
आत्मा के गुणगान में तह्ीन होकर उसके गुणगान किया करते 
थे और "मेरे अन्तर देखिये घट घट अन्तर राम” को पुकार से 


9 


न रेप ० 


जगत को सावधान किया करते थे । आत्मा का गुणगान करते 
हुये उन्होंने अध्यात्मवत्तोसी में जो निम्न पद्म लिखा हे वह 
देखिये कितना सुन्दर है । 


ज्यों सुवात पल फूल मे दही दूध मे घीजे | 

पावक वठ पाषाण में था शरीर में जीव ॥ 
चेतन पुंदगत् यों मिले, ज्यों तिल में ललि तेल । 

प्रकट एक से देखिये, यह धनादि की खेल | 
पह वाके रस में से वह वारसों लपटाय। 

चुम्बक काषे लोह को, लोह लगे तिह धाय | 
फर् चक्र वी नींद थों मृषा खप्ण की दौर 

धान चक्र की दति में सजग मांति सब दौर ॥ 


अध्यात्म की उत्कष सीमा का नाम रहस्यवाद है। इसलिये 
कवि की कुछ कवितायें जिनमें अध्यात्म अपनी चरम सीमा पर 
पहुँच गया है, रहस्यवाद की कोटि में चक्ञी जाती हैं। हिन्दी के 
प्राचीन रहस्थवादी कवियों में महाकषि कब्रीर का नाम उल्लेखनीय 
है। लेकिन यदि पाठकंगणु बनारसीविज्ञास फी कुछ रहस्यवादी 
कविताएं पढेंगे तो ज्ञात होगा कि कविवर बनारसीद्मस भी कवीर 
की कोटि के ही कि थे। डा? रामकुमार के शब्दों में रहस्यवाद्‌ 
आत्मा की उस अन्तदित प्रवृत्ति का प्रकाशन है जिसमें वह दिव्य 
और अलौकिक शक्ति से अपना शान्त एवं निश्चत् सम्बन्ध जोडना 
चाहती है और यह सम्बन्ध यहां तक बढ़ जाता है कि दोनों में 
कुछ भी अन्तर नहीं रह जाता । . 


“* मै६ं ++ 


कबि के अध्यात्म गीव में आत्मा नायक है और घुमति 
उसकी पत्नी है। सुमति आत्मा के विरह में जल में मछली की 
तरह तडफने लगती है । वह आत्मा का दशन पाने पर समुद्र में 
ब'द्‌ की तरह समा जाना चाहती है.। 


कवि की निम्न पंक्तियां पढिये:-- 


में विरहिन पिय के आधीन, यो तश्षफों अ्यों जल बिन भीन । 
मेरा पनका प्यारा जो मिले । 
बाहिर देखू' तो पिय दूर, घट देखे ध१ मे धरपूर, 
घट भहि ग॒प्त रे निरधार, वचन अगोचर सन के पार | 
भलख अमूरति वर्णन कोय, क्बंधों पिय के दर्शन होय | 


विरह में व्याकुज्ञ सुभति को धीरे धीरे यह अनुभव होने 
लगता है कि आत्मा उसने भिन्न नहीं हे बहु तो उसी के घटमें 
घसती है। तव वह कहती हैः-- 


पिये मोरे घट, में पिय माँहि, जलतरंग ज्यों द्विविधा चाही ) 
पिय सो करता में करतृति, पिय ज्ञानी में ज्ञान विभूत्ति | 
पिय छुख तागा, में सुत्न धींव, पिय शित्र मन्दिर, में शिवनीय |! 


एक दूसरे पद में छुमति के हृदय में आत्मा के अति प्रेम की 
धारा अबाघ रुप से बहने लगती है.। आत्मा की ओर देखते ही 
उसके परायेपन की गगरी फूट जाती है और दुविधा का अंचल 
हट जाता है। इसका एक उदाहरण देखिये:-- 


ऋष्छकक ध्ु दि -न्‍न्‍« 


पालप् तुह तन, पितवन्न-गार्गरि फ्रदि | 

अचरा गौ फहराय, सत्म गे छूटि | 
जिउ सुधि आवत बन में पेत्िउ पेजे। 

छाडउ राज व्गरिया मयऊ अकेलि ॥२॥ 
काय नंगरिया सौतर चेतन, भूष । 

काम लेप लिपटा बल ज्योति स्वरूप ॥३॥ 
चेतन तुहु जनि प्तोवहु नौंद श्रधोर | 

चार भोर घर मूसहिं, पर्वत तोर ॥०)॥ 
चेतन मय॒ऊ अ्रचेतन संगरा पाय। 

चक्सक में भागी देखी नहिं जाय ॥॥ 
चेतुन तुहि लपदाय प्रेम रस फांद। 

जप्त राखत घन तोपि विमल निशि चाद ॥६॥ 
चेनन यह सव सागर धर्म जिहाज। 

तिहि चढ़ बैठों छाढि लोक की लाज ॥॥॥ 


एक दूसरी विशेषता रहस्यवाद में बतलाई गई है वह यह है 
उसमे आध्यात्मिक तत्त्व हो। संसार की नोरस वस्तुओं से बहुत 
दूर एक ऐसे वातावरण में रहस्यवाद रूप ग्रह करता हे जिसमे 
सदेव नंयी नयी उमंगों की सृष्टि होती है। रहस्यवादी के मानस 
भे प्रत्येक समय एक ऐसी स्फूवि. रहती है जिससे वह अनन्त शक्ति 
की अनुभूति में मप्त, रहता है और सांसारिकता से वहुत दूर 
किसी ऐसे स्थान मे निवास करता है जहां न तो सृत्यु का भय है, 
न रोगों का अस्तित्व है और न शोक का ही प्रसार है”, - 


>> हे >> 


अध्यात्मफाग में जीव को यह अनुभव होने लगता है कि 
बिना आत्ज्ञान के ईश्वर का रूप किस तरह आप्त हो सकता है। 
जिसकी महिमा अगम्य एवं अनूठी है तथा जो अगोचर होने पर 
भी हृदय में ही समाया हुआ है । अध्यात्म ज्ञान होने पर शुभ भाव 
दल रूपी पल्लव लहराने लगते हैं. और सहज आनन्द रूपी वसन्‍्त 
का आगमन होने लगता है । सुमति कोकित बोलने त्गती हैं और 
मन रूपी भौंरा मदोन्मत्त हो उठता है। कवि के शब्दों में देखिये:- 


भ्रध्यात्म पिन क्यों पाइए हो, परम पुरुष को रुप। 
श्रघट अंग घट मिलि र्तों हो, महिम श्गम भ्ररूप ॥ 
माया रजनी लधु सई हो, समरस दिन शशि जीत | 
मोह पक कौ मिती घी हो, सशय शिशिर ब्यतीत ॥ 
शुभ दल पद्चव लहलहे हो, आयो सहज बसन्त ॥ 
मुप्रति कोक्लि। गहगही हो, मन मघुकर भयमत ॥ 
पहेली नामक कविता में कवि ने आत्मा की सुमति एवं कुमति 
सामकी दो वनिताओं का खरूप एवं उनका वार्ताल्ञाप के रूप में 
जो आत्मा एवं अच्छे बुरे कर्मोका वर्णन किया है वह उस अवस्था 
का वर्णन है जहाँ वह सदा जागृत रहती है और कभी सुप्त अवस्था 
में नहीं रहती । सुमति अपने सह्देलियों फे संग क्रीडा करती हुई जो 
पहेली उनके सामने उपस्थित करती है और सद्ियां जिस प्रकार 
उसका समाधान करती है उसको कवि के ही शब्दों में पढ़िये:-- 


करे विलात हाथ कौतृहल, भ्रगणित संग सहेली | 
फाहू समय पाय सद्ियन सों, कहे पुनौत पहेली ॥ 


“ धर “+ 


मोरे श्रागन बिख़ा उलझ्ो, विना पवन भछुलाई। 
ऊंचि डाल चड पात सघनवा, छांह पौत के जाई ॥| 

बोली प्त्ति वात में समुभी, कहू भ्र्थ अब जो है। 
तेरे घ अन्तर घट नायक, अदभुत विखा सोहै॥ 

ऊंची ढाल चेतना उद्धृत, बढ़े पात गण मारी। 
ममता वात गात नहिं परसे, छकनि छाँह छतनारी |! 


इस प्रकार बनारसी-विज्ञास की अध्यात्मगीत, अध्यात्मफाग, 
वरवा, शिवपच्चीसी, पहेली, शान्तिजिनस्तुति आदि कविताएं रहस्य- 
वादी रचनाये कही जा सकती हैं । 


सुभाषित, पद एवं स्फूट कवितायें! 


सूक्षियों का ही नाम सुभाषित है। हिन्दी के प्रायः सभो 
कवियों ने अपने २ काव्यों में सुमाषितों का प्रयोग किया है। ये 
सुभाषित मानव को सप्मेरणा देते हूं। बनारसीदासजी ने भी 
प्राचीन कवियों के मांगे को अपनाया एवं अपनी कविताओं को 
सूक्तियों से अलंझृत किया । ज्ञान बावनी, मोज्षपेडी, ज्ञान पच्चीसी 
प्रश्नोत्तरदोहा, अश्नोत्तररत्नमात्रा आदि कविताओं में सुभाषितों 
की भरमार है। इन सुभाषितों के द्वारा कवि ने संसारी मनुष्य को 
तरह २ के उपदेश दिये हूँ। ज्ञान पच्चीसी में प्रयुक्त कुछ सुभा- 
पित देखिये:-- 

ज्यों श्रोषष अंजन किये तिमिर रोग मिट बाय | 
तो सतग॒र उपदेश तें; सशय वेग बिलाय ॥ 


«- धैई ० 
ज्यों सधिद्र नौका चंद, बृहह अंथ भदेश् 

तों तुम मवजल में परे, बिन विवेक धर शेख ॥ 
५ ४ 8 ४६ % »% ४ 
मन जहाज घट में प्रगठ, भव समुद्र घट ांहि | 

गूर्ध मर ने जावही, धाहिर खोजन जाय ॥ 


सुभापितों के अतिरिक्त बनास्सीदासजी के कुछ पद भी 
मिल्षते हैं जो गागर में सागर की कहावत्त को चरिताथे करने 
चाले हैं। सभी पद्‌'अध्यात्म रस से सने हुये हैँ । तथा संसार की 
वास्तविक दशा को बतलाने वाले हैं। कि एक पद में जगत्‌ के 
प्राणियों को सरवोधित करता हुआ कहता है। 


चेतन तू तिंहुकाल भ्रकेशा | 
नदी नाव पंजोग मिले ज्यों, त्यो कुटट व का गेला ॥चितना। 


एक दूसरे पद में वे जीव को उल्हयना देते हुये कहते हैँ:-- 
चेतन तोहि न नेक संभार | 
मज़ पिख लो दिए घंघन बेटे, कोन परे निखार ।पितन॥ 
जैसे भाग परान पाठ में लज़िय न परत लगार। 
मदिरापान फत मतदारो, ताहिन क्चू विचार ।पितना। 
एक पद से जब वे कहते हैः-- 
हम बेंठे धपने मौन सों। 
दिन दश कै महिमान जग्त जन पोलि पिगार दीन सी ॥) इस बेटे ॥ 


ब>» धूप न 
इसे पढ कर आत्मा में एक नवीन कदर दौडती है और संसार 
की विचित्र दशा पर अवश्य विचार उतन्न होता है। 
इस श्रकार कवि के सभी पद जिनकी संख्यां २७ है, भाव- 
पूरे एवं सुन्दर हैं। 


सुभाषित एवं पदों के अतिरिक्त कवि द्वारा लिखी हुई बुछ 
स्फुट रचनाये भी हैं जिनका उल्लेख करना भी यहां आवश्यक है। 
इन रचनाओं में हमें कि की वहुमुद्धी अतिमा का पता क्ञयता है | 
सोलह तिथि, षट्द्शेनाष्टक, चातुबेस्ये, अस्ताविक फुटकर कविता, 
गोरखनाथ के बचन, बेच्य आदि के भेद आदि रचनाओं को स्फुट 
कविताओं में स्थान दिया जा सकता है । 


कवि के समय में भारत में मुसलमानों का राज्य था। हिन्दू 
और मुसलमान आपस में धर्म के नाम पर लड़ते थे । उससे कवि 
को घृणा थी । कवि की भावना के अनुसार दोनों धर्म भिन्न २ 
होते हुये भी दोनों का परमात्मा एक ही है. “मेरे नेनन देखिये 
घट घट अन्तर राम” | इसका उदाहरण कवि के शब्दों में पढियेः- 


एक रूप हिन्दू तुरक, दूजी दशा न कोय | 

सन की द्विविधा मान वर भये एक सौ दोय ॥| 
दोऊ भूले सद्भ में करें बचत की देक | 

राम राम हिन्दू कहें, तुके सलामलिक | 
इसके पुस्तग वांचिये, वे हू पटे कितेव | 

एक वस्तु के नाम्न दय, जैसे शोमा, जेब ॥| 


«+« भ्रु४ »- 
तिनक्रो द्विविष जो हें रंग विरंगी चाम, 
मेरे नेंनन देखिये, घर घर श्न्तर राम || 

गोरखनाथ के सम्प्रदाय का कवि के समय में काफी प्रचार 
था इसीलिये गोरखनाथ के वास्तविक उपदेशों को कवि ने अपनी 
कविता में उपस्थित किया । सुन्दर एवं सरल शब्दों में कवि ने 
किस प्रकार गोरखनाथ के वचनों को उपस्थित किया है वह पठनीय 
है। इसकी एक चौपाई देखिये । 


माया जोर कहे में ठाक, भायां गये कहाने चाकर । 
माया त्याग होय जो दानी कह गोरख तीनों भ्रन्लानी ॥ 


हिन्दी गध लेखक के रूप में! -- 

बनारसीदासजी की प्रायः सभी रचनाएं पद्यों अथवा डंदों 
में हो है किन्तु गय्य में भी उनकी दो रचनाएं बनारसी विज्ञास 
में है। इन दोनों के नाम “परसार्थवचनिका” और “उपादान 
निमित्त की चिट्ठी” हैँ। ये दोनों निबन्ध १७ वीं शताब्दी के हिन्दी 
गय के नमूने हैं। ये निबन्ध त्रजभाषा में लिखे हुये हैं लेकिन 
अवधि भाषा का भी उन पर पर्याप्त प्रभाव दिखलायी देता है। 
इसके अतिरिक्त कहीं २ हूंढारी भाषा का भी प्रभाव इनमें दृष्टि- 
गोचर होता है। 

हिन्दी भाषा के अतिरिक्त कवि पञ्नाबी भाषा के भी अच्छे 
जानकार थे । उन्होंने जो मोत्पेडी नामक कविता लिखी है वह 
पञ्ञावी भाषा की सुन्दर रचना है| 

जयपुर कस्तुरचन्द कासलीवाल 

ता० १४-४५-५४ ई० 


ग़ाद्वि पत्र 


पंक्ति अशुद्ध मुद्रित 
७ सचनिका 
१५. विरघौ 

४. अड्भत 

१७ इहे 

३ मेघातीत 
८ [वश्नामों 

४  बज्व्यपी 
११ कोपद्बानव 
११ श्रेयस्नरोः 
६ काचखंडमन 
८. गुणिसग 
१६ . कुए्ग 

४. विसरे 

१७. घन 

१९२ उछल 

६ जतु 

१० सताप 

६ ऐसो 


शुद्ध पाठ 


विश्रामी 
बज्व्यापी 
कोपद्वानल 
श्रेयलरो 
काचखंडमन 
गुणिसंग 
कुरंग 
बिस्तर 


घन 


कुल 
जंतु 
संताप 
ऐसी 


पृष्ठ संख्या 
७ 
४६ 
५४ 
४६ 
५६ 
६१ 
६४ 
उर्‌ 
७२ 
७६ 
उन 


थ्व 


५ ह# मे # 


धर 
श्र 
६२ 
ध्डे 


>+ खूं बा 


पंक्ति अशुद्ध मुद्रित 
८ कल 

१० सूजी 

१३. गिशाचर 
१ ताको 

१३ संतम सुपुंज 
२ प्रव 

१४ राजाको 
६ बनारसी 
१६ तिन में 
२०. विपरात 
४  कषायक 
८ मनमथको 
४ बढ 

३. नाभि 
१८. मठभावको 
२३ ह॑ 

१३ व्याज्ञीस आठ 
१७ घर 

१६. सम 

२२ प्रव 

१०७ मनहार 


शुद्ध पाठ 


सूजि 
निशाचर 
ताकी 
संतमस पुंज 
भव 


वानारसी 
तामें 


कषायके 
मनमंथको 


सृगनामि 
मूढभावको 


चालीस आठ 


भच 


ध्छ 


मरनहार 


पृष्ठ संख्या 
ध्ष 
ध्श्‌ 
६७ 
ध्प 
१०१ 
१०२ 
१०४ 
१०४ । 
१०४ 
१०८ 
११५ 
११८ 
११८ 
१२० 
१२१ 
श्र 
१३० 
१३० 
१३१ 
१्श२ 
१३३ 


प्रक्ति 


शि रे 9 6 «० 


अआशुद्ध मुद्रित 


त्यों त्यों त्यों 
बहुरानी 
श्रति 

गये 


कथु 

जिनंद सुमति 
कुश्नति 
शुशुभ अभ 


शुद्ध पाठ 
त्योँ त्यों 
बहुरागो 
श्रुति 
ये 

कुंधु 


जिनंद अभिनंद्‌ सुमति 


कुश्रुति 
शुभ अशुभ 
साधे 
विमल 
जव 
भोग न जुरे 
उपभोग 
घेय 
उपंग 
कम - 
निहार 
भीत 
शिवपथसाधक 
लेयना 
तिहुंदादी 


न चूना 


प्रष्ठ संस्था. पंछि अशुद्ध मुद्रित शुद्ध पाठ 
१३४ ७ करंकसा रंकसा 
१३४ १८. हरुवे तन हरुपेतन 
१३४ २१ परे परे 
१३५ १ पापी पानी 
१३५ ४ हुहं वादी दुहुंवादी 
१३४ १६ तुसाडा तुसाडा 
श्ह्र &  चोरा चोरी 
१४२ *६  धर्मध्या घर्मध्याद 
१४३ ६ विपरीत विपरति 
१४४ ९१९ थातें यातें 
१४७ ६ ज्यों ज्यों 
श्छ्७ १० परिगृह परिग्रह 
४६. ६ शुर्कष्यान शुक्लध्यान 
१५० १६ चडले चढ़ डोले 
१४२ ५८५. पावनके पवनके 
श्श्रे 5  वंदवान वादवान 
, ११४ २ मयमत मयमंत 
१५ ७. विराम विराग 
श्श्प छू भग भंग 
श्श्ष श्शझ आप न आपने 
१४५६. २ हदुस्मात दुरमति 


िननओर २>कननक 


स्ज झ जय 


पसंस्या पंक्ति अशुद्ध मुद्रिति .. शुद्ध पाठ 


(४६ ४ रच हर सच 
१६२ २०. उमरामिय ' ” उबवमाय 
१६४ १७ पढिता * प्रंडिता 
१७५ १६. श्रखद्धित ,. श्रल॑डित 
(श्र १६ पुरुषमढ़न॑. पुरुषमंडन 
७... ४ हैँ रे 
१७६ १२ पुहुष पु 
१७६ १८ पुपशर 
१७७. ' है लिनपत्त जिनपूजत 
१७७ २०... इसके इनके 
१७६. १६ वीं पंक्ति जिनधर्म! शीर्षक के आगे सीचे 
लिखा दोह्य और पढ़ें $ 
१७६. १७ वो पंक्ति (दोहा नं० ३) का शीषेक 'आगम! पंढे 
१८१ ७. चचत्त चंचल 
श्पः ११ बुल्ञान कुलीन 
रैघर ६ पख्ोखन 7 खोजन 
शैघरे ६ चि6द्रप चिद्रप 
१६२ १०... जाग जोग 
१६३ १ दन द्म 
$ जो पर तजि आपाभजै, जहाँ घुदिष्टि जुत कमे 


अशरण रूप अजोग पथ सो कहिए जिनधम (१४) (क)) 


पृष्ठ संख्या 
रै८३े 
१८३ 
१०३ 
१८४ 
१्प४ 
श्प्छे 
474 
१६१ 
श्ध्द 
१ध्६ 
१६६ 
२०३ 
श्र३ 


पंक्ति 


परदाष 
परेवा वरे 
वषाद 
बाचा 


पटठपेवन 


ओमहाबीरसामिने नमः 


बनारसीविलास. 


२७-0५७५७५»+०क कौ 





विषय सूचनिका, 


सबेया हकतीता 


प्रथम सहस्धनाम सिल्दूरअकरधाम, बावनीसवेया वेद 
'निरय पचासिका । त्रेसठशलाका मागना करमकी प्रकृति 
फल्याणमन्दिर साधुवन्दन सुवाधिका | पेड़ी कम की छतीसी 
पीछे ध्यनकी बतीसी, अध्यातम बतीसी पंथीप्षी ज्ञान 
रातिका । शिवकी पचीसी भवसिन्धुकी चतुर्दशी, अध्यात- 
१७ ३१८ भ* 
सफाग तिथिषरोड़सनिधासिका ॥ ! ॥ 

वेरहकाठिया मेरे मनका सुप्यारागीत, पंचपद विधान 
सुमति देवीशत है | शारदा बड़ाई सबदुर्गा निय नाम, 

२ शासिका पाठान्तर है। + विलासिका पाठान्तर है । 


ऋपेकरपिकर री पक पिन पेड १9 बन. 
ह7+ बी रयिकनिनाकिजमनी चकित यम मा 
लंड 











२| वनारसीपित्ास 


न्‍अकलनातानधनन नानक + कप नी कान घर. विनन्‍नन. 





२६ २७ रे८ २5५ ३० ३१ 
नौरतन कवित्त तु पूजा दानदत्त हे ॥ दशवोल पहेली सुप्रशन 
३२ इ३ ३8 3ज्‌ 
प्रश्नोत्तमाला, अवस्था मतान्तर दोहरा वरणत है । अक्नि- 
88 ३७ ३८ ३५० 
तके छन्द शान्तिनाथछुन्द सेनानव, नाटकक्पित्त चार, 


926 
वानी मिथ्यामत है ॥ २॥ 


8१ 5 श्न्‌ 84 
फुटठकरसबेया बनाये बच गोरखके, वेद आदिमेद 
8३ छ्रण्‌ 86 
परमारथ वचनिका । उपादान निमित्तकी चीठी तिनहींक़े 
७ ८ एप 0 
दोहे, भेरों रामकल्ी ओ विल्लाबल सचनिका ) आशाररी 
"रे ज्र्‌ णज्‌३ ज्‌्ह_ह णण पद 
बरवे मु घनाश्री सारंग गौरी, काफी श्रो हिंदोलना 
मलाग्की मचनिका | भूपर उद्योत करो भव्यनके हिरदेगे 
विरधी बनारसीबिलासकी रचनिका ॥ ३ ॥ 
॥ दोहा ॥ 
ये बरणे संत्तेपसों, नाम भेद विर्तन्त । 
इनमें गधित भेद बहु, तिनकी कथा अनन्त !| 


महिमा जिनके पचनकी, कहे कहां लग फोय | 
ज्यों ज्यों मति पिस्तारिये, त्यों त्यों अधिकी होय [१ 


॥ इति त्रिषयसूचनिका || 


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बनारसावलास ४] 


अथ जिनसहखनाम । 
दोहा 
परमदेव परनामकर, गुरुको करहूं प्रणाम । 
बुधिबल वरणों ब्रद्यके, सहसअठोत्तर नाम ॥ १ ॥ 
केवल पदमहिमा कहों, कहों सिद्ध गुनगान । 
भाषा प्राकृत संस्कृत, तिविध शब्द पस्मान || २॥ 
एकारथवाची शबद्‌, अरु हेरुक्ति जो होय | 
नाम कथनके कवितमें, दोप न त्ञागे कोय || ३ ॥ 


चोपई १४ मात्रा 


प्रथम्ोंकाररूप इेशान। करुणासागर क्ृपानिधान | 
ज्रिभुवननाथ ईश गुणबिन्द । गिरातीव गुणंमूल अनिन्‍्द ॥ १ ॥ 
गुणी गुप्त गुशवाहक वली। जगतद्वाकर कोतूहली | 
कमवर्ती करुणामय क्षप्री। दशावतारी दीरघ दमी॥ २॥ 
अलख अमूरति अरस अखेद | अचल अवाधित अमर अवेद 
परभ परमगुरु परमाननद। अन्तरजासी आनंदकन्द ॥३॥ 
प्रानिनाथ पाचन अमलान | शीलसदन निर्मल परमान | 
त्त्वरूप तपरुप अमेय। दयाकेतु अविचल आदेय॥ ४॥ 
शीलसिन्धु निरुपम निर्वाए। अविनाशी अस्पशे अमान । 
अम्ल अनादि अदीन अछोम | अनातइू अज अगस अलोभ | ५ ॥ 
२ वाणी का अधिपय 


ड्था 
मर. इरमकरयानाहनेल्‍न्‍मानानकननकन्मीमा 


[४ बनारसी बिलास 


परी रीयरीअमभिक 








नी बन्‍ीप सह चर कह पडा चकर पाता एड. €ही पाता प्र चक्र पका पक बहा ३८ रुका कही पता का बह सके. 


झनवस्थित अध्यातमहूप | आगमरूपी अघट अनूप | 
झपट अरूपी अभय असार। अनुभवर्संडदन अलघ अपार ॥| ६॥ 
बिपुन्पतशासन दावार। दशातीत छउद्धरन उदर। 
पुंडरीशंचत + 

नभषत पुंडरीकबत हँस । करुणामन्द्र एनविध्येंस ॥७॥ 
निराकार सिहचे निरमान । नानारसी लोकपरमान। 
सुखधमों सुलक्न सुखपाल। सुन्दर गुणमन्दिर गुणमाल ॥ ८॥ 
दोहा 


अम्बरबत आकाशवत, क्रियाहुप करतार। 
केंबलरूपी कौतुकी, कुशशी करुणागार॥ १२॥ 


इति ओंकार नाम प्रथमशतक॥ १॥ 
चोपई 


ज्ानगल्य अध्यातसगम्य | रमाविराम रमापति रम्य। 
अप्रसाण अघहरण पुराण। अनप्रित ज्ञोकालोक प्रमाण ॥ १३॥ 
झपासिन्धु कूटस्थ अछाय। अनसव अनारूद असहाय | 
गम अनन्‍्तरास गुणमास । करुणापालक करुणाधाम॥ १ १४॥ 
लोकविकाशी लक्षण॒वन्त | परमदेव परजह्ा अनन्त। 

दुराराध्य दुगेस्‍्थ दयात्ञ । दुरारोह दुर्ग द्विगाल ॥१५॥ 
सत्यारथ झुलदायक सूर। शीलशिरोमणि करुणापूर । 

क्षानगर्भ चिद्रप निधान। नित्यानन्द निगम निरजान॥ १६॥ 


१. कमल के समान २. पाप नाशक 











बनारसीबिलास ५|, 





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अकथ अकरता अजर अजीत | अबप अनाकुल॒ विषयातीत ॥ 
मंगलकारी मंगलमूल । विद्यासागर विगतदुकूल ॥ १७॥ 
नित्यानन्द विमल निरुजान | धर्मघुरंधर धर्मनिधान। 

ध्यानी धामवान धनवान | शीलमिकेतन बोधनिधान॥ १८॥ 
लोकनाथ लीलाधर सिद्ध | झृती कझृतारथ महासम्रद्ध । 
तपसागर तपपुन्ठ अछेद | मवसयभंजन अमृत अभेद ॥ १६ ॥ 
गुणावास गुणमय गुणदाम। स्वपरप्रकाशक रसताराम | 

नवल पुरातन अजित विशात्न | गुणनिवास गुणएम्रह गुणपाल ॥२०॥। 


दोहा 
लघुरुपी लालचहरन, लोभबिदारन बीर । 
धारावाही धौतमल, पेय धराधर धीर॥२१॥ 
इति ज्ञानगम्यनाम द्वितीयशतक | २ |॥॥ 


पद्धरिछन्द । 


चिन्तामणि चिन्मय परम नेस । परिशामी चेतन परमछेम। 
चिन्मूरति चेता चिह्िलास। चूढामणि चिन्मय चन्द्रभात ॥२१॥ 
चारित्रधाम्॒ चित्‌ चमत्कार | चरनातम रूपी चिद्ाकार । 
निषोचक निर्मम निराधार। निरजोग निरंजन निराकार ॥२३॥ 


निरभोग निरास्रव निरादह्वर।नगनरकनिवारी निर्विकार। 
आतसा अनक्षर अमरजाद। अक्षर अवंध अक्षय अनाद ॥ २४ 


१. वत्त्र रहित २६ पहाड़ 


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[६ बनारस , .. 


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के... अअ नमक वनकनजकनीननमन..हवनबकनमनाचणननन 


' आगत अनुकापामय अडोल् | अशरीरी अनुभूती अलोल। 
विश्वम्मर विस्मय विश्रटेक | ब्रजभूषण ब्रज नायक विवेक ॥ २४॥ 
छल्नमंजन छायक छीनमोह । मेधापति अकल्लेवर अकोह | 
अद्रोह अविग्रह अग अरंक। अद्भ तनिधि करुणापति अबंक ॥२क| 
सुखराशि द्यानिधि शीलपुज । ऊरुणासमुद्र करुणाप्रपुंज । 
वृज्जोपम व्यवसायी शिवस्थ। निश्वल्न विमुक्त भर व॒ सुथिर सुस्थ॥२७॥ 
जिननायक जिनकुजर जिनेश । गुणपु'न गुणाकर मंगलेश | 
क्षेमंकर अपद अनन्तपानि। सुखपुंजशील कुलशील खानि ॥२८॥ 


करुणारसभोगी भवकुठार | कृषिवत कृशानु दारन तुसार। 
केतवरिपु अकल कलानिधान | घिपणाधिप ध्याता ध्यानवान ॥२६। 
दोहा 
२ 
छपाकरोपम छुल्रहित, छेश्रपाल छेत्रक्ञ। 
अंतरिक्षवतत गगनधत, हुत कर्मा कृतयज्ञ ॥ ३० ॥ 
इति चिन्तामणि नाम तृतीयशतक | ३ ॥ 
पद्धरिछन्द । 
लोकांव लोकप्रभु लुप्तमुद्र | संदर सुखधारी सुखसमुद्र । 
शिवरसी गृढरूपी गरिष्ठ। वल्रूप बोधदायक वरिष्ठ ॥ ३१॥ 
विद्यापति धीधव विगतवाम । धीव॑त बिनायक बीतकाम । 
धीरस्व शिक्नीहुम शीलमूल । लीलाबिलास' जिन शारदूल्न ॥ ३२ ॥ 
परमारथ परमातम पुनीत। त्रिपुरेश तेजनिधि त्रपातीत । 
तपराशि तेजकुल्ल तपनिधान | उपयोगी उम्र उदोतवान || ३३ ॥ 


१ कृषाय रुपी अप्रि को नष्ट करने के लिए बफे के समान २. चन्द्रमा 


सम 2१ के ८2७, आर, ९ अप, अगे। ब्रमि.अपिजडपि: #गिए 7३. पड हरि /र मी कर >ग या. #म..#ग७#०१ ९.०० ./ग३+2१४३०२५४३०९./००.#०१,#० #ग#३९,#१,/९.#०, 2ग#९,/०३ हे... २९८०९ #व..०./#० # थे #कि कि ही 





वनारसीबिलास ७ | 


्क ०. अयक न क्कन भा. ब् छक का ब्रज हो ऋ... माख्िक अीष्का आए की, 








उतातहरण उद्यम्रधाम । ध्रजनाथ विमज्ञर विगतनाम | 
चहुरुपी बहुनामी अजोप । विपहरण विहारी विगतदोष ॥ ३४ ॥ 
द्वितिनाथ छुमाथर छुमापाल । दुर्गेभ्य दयाणंव दयामाल ॥ 
चतुरेश चिदातम विदानंद ] सुबहूप शीलनिधि शीलकन्द ॥ ३४५॥ 
रसव्यापक राजा नीतिबंत। ऋषिहप महपि महमहंत | 
परमेश्वर परमरछपि प्रधान। परत्यागी प्रगठ प्रतापवान। ३६॥ 
' परतक्षपरससुख परममुद्र | हन्तारि परमगति गुणसमुद्र ॥ 
सब्न सुदर्शन सद्ाइप्त। शंकर सुवासवासी अ्रत्निप्त ॥ ३७ ॥ 
शिवसम्पुटवासी सुख्लनिधान | शिवपंथ शुभंकर शिक्ावान ॥ 
असमान अंशधारी अशेप | निट्ठ नदी मिजेड़ निरबशेष ॥ ३८॥ 
दोहा 
विस्मयधारी बाधमय, विश्वनाथ विश्वेश। 
बंधविमोचन बज्वत, बुधिनायक विदुषेश ॥ ३६ ॥ 
इति ज्ोकांत नाम चतुथे शतक ॥0॥ 
छन्दरोडक । 


महामंत्र मंगलनिधान मतहरन महांजप | 

मोक्षस्वरूपी सुक्तिनाथ मतिमथन महांतप ॥ 
नित्तरक्ष निःसह् नियमनायक मंदीसुर । 

महादानि महज्ञांनि मद्दाविस्तार महांगुर ॥ ४० ॥ 
परिपूरण परजायरूप कमत्स्थ कमरत्बत । 

गुणनिकेत कमलांसमूह धरनीश ध्यानरत ॥ 


८] चनारसीविल्ञांस 


परी, 
७ लसनकलन नमन 3ॉ-ककन-ना थम. 





भूतियान भूतेश सारछुम भर्मे उछेद्क। 

सिहासननायक निराश निरसयपदचेदक | ४१॥ 
शिवकारण शिवकरन सविक बंधव भवनाशन | 

नीरिरेश निःसमर सिद्धिशासन शिवआसन॥ 
सहाकाज महाराज सारजित मारविहंडन। 

शुणंमय द्रव्यस्वरूप दशाधर दारिद्खंडन॥ ४२॥ 
जोगी ज्ञेग अतीत जगत उद्धरन उजायर। 

जगतवबंधु जिसराज शीलस॑चयसुखसागर ॥ 
भहाशूर सुख्सदन तरनतारन त्तमनाशन। 

अयनितनाम अनंतधाम निरमद्‌ निरवासन॥ ४३॥ 
चारिजबत जलजबत पद्म उप्पम पंकजबत। 

महारास सहधाम महायशबंत भहासत॥ 
लिजझुपालु फरणालु धोधनायक पिद्यानिधि। 
प्रशसरुप प्रशमीश परमजोगीश परमविधि | ४४॥ 


परशुछन्द | 


सुरसभोगी २ शील समुदायकी चाल-- 
शुभकारनशील 8ह सील राशि संकट निवारन 
जिगुणातम दपतिहर परमहंसपर पंचवारना॥ 


परम पदार्थ परमपथ, दुखसंजन दुरलत्ञ। 
ततोषी सुखूपोषी सुगति, दमी दिगस्वर दत्त | ४४५॥ 


इंति महांमंत्र नाम पंचम शतक ]। ५॥ 


कर 





वनारसीबिल्ास ६] 
रोडक छन्द | 
परमप्रवोध परोक्तरूप, परमादनिकन्दन। 
परमध्यानघर परमसाधु, जगपति जगवंदन॥ 
जिन जिनपति जिनसिंह, जगतमणि बुधकुलनायक | 
कल्पातीत कुलालरूप, शग्मय दृगदायक ॥ ४६ ॥ 
कोपनिवारणधमरूप; गुणराशि रिपुंजय | 
करुणासदन समाधिरूप, शिवकर शूत्रुजय ॥ 
परावत्तेरुपी असन्न, आवमग्रमोद्मय २ 
निजाधीन निह न्द्‌, त्रद्मवेदक व्यतीवभय ॥| ४७ ॥ 
, अपुनभंव जिनदेव सबंतोभद्र कलिलहर। 
धर्माकर ध्यानस्थ धारणाधिपतेि धीरधर ॥ 
ख्रिपुरगर्भ त्रिगुणी त्रिकात्न कुशलातपपादप । 
सुखमन्दिर सुखमय अनन्तलोचन अधिषादप ॥| ४८॥ 
जोकअग्रवासी त्रिकात्साखी करुणाकर 4 
गुणआश्रय गुणधाम गिरापति जयतप्रभाकर ॥ 
शीरज धौरी धौवकर्म धम्मेग धासेश्र। 
शुणरत्रराशि रजहर रामेश्वर ॥ ४६ ॥ 
'निरलिज्ी शिवलिन्वधार बहुतुं ड अनानन १ 
गुणकदम्व गुणरसिक रूपगुणअंप्रिपकाचन ॥ 
'निरअंकुश निरधाररूप विजपर परकाशक 4 
विगतास्तब निरवंध बंधहर बंधविनाशक ॥ ४० ॥ 


१ गुण रुपी वृक्षों के बन 


25 ० ०६ «० ८० #९/#०५०० #*/६ #,. 


2१३००, &-. ०९५०० ./९३५./४- ३१५०३ /7० २१९ ५ ह यक 








[ १७ वनारसी विज्ा्त 


वृहत अनडू निरंश अंशगुणसिन्धु गुणाज्ञय | 
लक्ष्मीपति लीलानिधान वितपति विगतालय ॥ 
चुद्धबदन गुणसदन चित्रधर्मा सुखथानक। 
श्‌ 





ब्रक्माचारी वज्ञचीय वहुविधि निरवानक ॥ ४१॥ 
दोहा 

सुखकदम्व साधक सरन, सुजन इृष्सुखबास | 

बोघरूप वहुलातमक, शीतल शीलबित्ास ॥ ५२॥ 

इति श्रीपरमप्रवोधनामक पषष्ठ शतक ।क्षा 

रूप चोर । 

केवलज्ञानी केवलद्रसी | सन्‍्यासी संयमी समरसी । 
लोकातीत अलोकाचारी । त्रिकालज्ञ घनपति धनघारी ॥१४॥ 
चिन्ताहरण रसायन रूपी | मिथ्यादत्नन महारसकूपी । 
निश्वतिकतों सषापहारी | ध्यानघुरंधर धीरजधारी . ॥श्शा 
ध्याननाथ ध्यायक वल्वेदी । घटातीत घटहर घट भेदी । 
उदयरूप उद्धत उतसाही | कलुषहरणहर किल्विषदाही ॥५श्षा 
बीतराग बुद्भधीश विषारी | चन्द्रोपप वितन्द्र व्यवहारी। 
अगतिहुप गतिरूप विधाता | शिवविलास शुचिम्य सुखदाता ॥१५॥ 
परसपवित्र असंख्यप्रदेशी | करुणासिधु अचिन्त्य अभेषी | 
जगतसूर निम्मेल उपयोगी | भद्ररूप भगवन्त अभोगी ॥श८॥ 


२ बरह्मयवीज अथवा वज्वीज भी पाठ है । २ स्मापति भी पाठ है| 
३ अगनिरूप भी पाठ हे । 


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चनारसीविलास ११ ] 


भानोपम भरता भवनासी । इन्द्रविदारण वोधविलासी । 
कौतुकनिधि छुशली कल्याणी । गुरू गुसोँह गुणमय ज्ञानी ॥५६॥ 
निरातंक निरवेर निरासी। मेघातीव प्ोक्षपदवासी । 
महाविचित्र महार्सभोगी। भ्रममंजन भगवान अरोगी ॥६०। 


कल्मपर्ंजन केवलदाता | धरोदधरन धरापति धाता | 
अज्ञाधिपति परस चारित्री। परमतत्त्वचित्‌ परमविचित्री ॥६९॥ 
संगातीत संगपरिहारी । एक अनेक अनन्ताचारी । 
उप्र हपी ऊरधगामी। विश्वह्प विजयी वश्रामी. ॥६श॥ 
दोहा 

धर्मविनायक धर्मधुज, धर्मरूप धर्मज्ञ । 

रत्नगर्भ राधारमण, रसनातीत रसज्ञ ॥ ६३ ॥ 

इति केवलज्ञानी नामक सप्तम शतक | ७॥ 


रूप चोफ | 


परमग्रदीप परमपददानी | परमग्रतीति परमविज्ञानी ] 
परमज्योति अधहरन अगेही। अजित अखंड अनंग अदेही ॥६॥। 
अतुल अशेष अरेप अलेषी | अमन अवाच अदेख अभेषी | 
अकुल अगूह अकाय अकर्मी | गुणधर गुणदायक गुनमम्भी॥६५॥ 
निससहाय निम्मम नीरागी। सुधारूप सुपथग सौमागी। 
हतकैतवी मुक्ततसंत्तापी । सहजस्वरूपी सबबिधि व्यापी ॥56॥ 


१ पाठ भेद-धाराधरन। २ पाठ भेद-परमरसज्ञानी । 


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महाकौतुकी महद॒विन्नाती | कपटविदारन करुणादानी। 
परदारन परमारथकारी। परमपौरुषी पापप्रहारी ॥ ६७॥ 


केवलनह्म कंगन | हतविभाव हतदोप हतारी। 
भविकदिवाकर मुनिम्ृगराजा | दयातिधु भवर्सिधु जहाजा ॥६८) 
शंसु सबेदर्शी शिवपंथी | निरावाध निःसंग निम्रन्थी | 
यती यंत्रदाहक हितकारी । महामोहवारन वलघारी ६६!॥ 
चित्री चित्रगुप्त चिदवेदी ! श्रीकारी संसारउछेदी। 
चितसन्तानी चेतनबंशी। परमाचारी भरसविध्यंसी |॥७० || 
सदाचरण स्वशरण शिवगामी । बहुदेशी अनन्तपरिणामी। 
वितथभूमिदारनहल्पानी । भ्रमचारिजवनदृहनहिमानी. ॥७९॥ 
चारु चिदृष्ढित इन्दातीती।दुगेरूप दुल्लेस दु्जीती । 
शुभकारण शुभकर शुभमंत्री । जगतारन ज्योतीश्वर जंद्री ॥७२॥ 
दोहा 
जिनपुद्नच जिनकेहरी, ज्योतिर्ष जगदीश | 
मुक्ति मुकुन्द मद्देश हर, महदानंद मुनीश ॥७३॥ 
इति श्रीपरमप्रदीप नाम अष्टम शतक ॥5॥ 
मंगलकंमला की ढाल । 

दुरित दल्नन घुखकन्द ए। हत भीत अतीत अमन्द ए। 
शीलशरणहत कोप ए। अनभसंग अनंग अलोप ए॥| ७४ !! 


१ परम-पाठ भेद है ! २ इन ( सूर्य ) यह भी पाठ है। 








हंसगरभ हतमोह ए। गुणसंचय गुणसन्दोह ए। 
मुलतमाज सुख गेह ए। हतसंकट पिगत सनेह ए॥ ७४॥ 
चोभदलनन हृतशोक ए। अगणित वत् श्रमज्ञालोक ए। 
भृतसुधम कृतहोम ए। सतसूर अपूरष सोम ए॥ ७६॥ 
हिसवत हतसंताप ए । बज्चव्य/पी विगतालाप ए। 
पुस्यस्वहृपी पूत ०। छुखसिधु स्य॑ संभूत ए ॥ ७७॥ 
सम्यसार भ्रुतिधार ए | अविकलप अजल्पाचार ए। 
शांतिकरन धृतशांति ए। कल्रूप मनोहरकान्ति ए || ७८ ॥ 
सिंहासन आहड़ ए। असमंजसहरन अमूढ ए। 
लोफजयी हतलोभ ए। क्ृतकर्मोवजय घृतशोभ ए॥ ७६ ॥ 
मृत्यु जय अनजोग ए । श्रत्तुकम्प श्रशंक भ्रसोग ए। 
छुविधिरुप सुमत्तीश ए। श्रीमान्‌ सनीपाधीश ए॥ ८० ॥ 
विदित विगत अचगाह ए। कृतकारज रूप अथाह ए। 
वद्ध मान गुणभान ए | करुणाधरलीजविधान ए॥ ८१॥ 
अच्यनिधान अगाध ए। हतकलिल निहतअपराध ए। 


साधिहप साधक धनी ए। महिमागुणमेरु मद्दामनी ए ॥५२॥ 
उतपतिवैश्न बवान ए। त्रिपदी त्रिपुंज त्रिषिधान ए। 

जगजीत जगदाधार ० । करुणागृह- विपतिविदार ए ॥ ८३॥ 
जंगसाक्षी बरचीर ए। गुणगेंद महागंभीर ए। 

अभिनंदन अभिरात्त ए। परमेयी परमोद्दाम ए॥ ८४ ॥ 


१ उत्टृंष्ट रूप धारी। २ पाठ भेद-महामुनी। रे पाठ भेद परमेन॑ । 


[ १४ बनारसी विल्ञास 


(जज नि, पा. कप किक. 


'सकरीकटीयक चित कक. 





दोहा 


श्‌ 
सुगुण विभूतीवेभवी, सेम्ुुबीश संबुद्ध 
सकलविश्वकर्माअभव, विश्वविज्ञाचन शुद्ध ॥ ८५॥। 


इंति दुरितदलनताम नवस शतक ॥ ६ ॥ 


मंगल कमलाकृद की हाल 


शिवनायक शिव एव ए। प्रवल्लेश प्रजापति देव ए। 
सुदित महोदय मूल ए। अनुकम्पा सिंधु अकूल ए॥ ८६॥ 
नीरोपम गतपंक ए । नीरीहत निर्गेतशंक ए। 

नित्य निरामय भौन ए । नीरन्ध् निराकुल गौन ए ॥ ८७ ॥ 


परमधभरथसारथी ए। घृत फेवल रुपझतारथी ए । 
ह 
परम पित्त भंडार ए | संवरमय संयमधार ए || ८८ ॥ 


शुभी सरवगत संत ए । शुद्धोधन शुद्ध सिद्धत ए। 
नैयायक नय जान ए। अविगत अनंत अभिधान ए ॥ ८६ | 
कर्मनिजेरामूल ए। अधसंजन सुखद अमूल ए | 

अद्भुत रूप अशेष ए। अवगमनिधि अवगमसेप ए॥ ६० ॥| 
चहुगुणरत्नकरंड ए । अह्मांडरमणजह्य ढ ए। 

चरद वंघु भरतार ए | मह॒दंग महानेतार ए ॥ ६१ ॥| 
गतप्रमाद गतपास ए | निरनाथ निराथिय निरास ए। 


१ बुद्धि के ईश्वर । २ पाठ भेद-नित्य । 


शक अअि्शचव्ययरपर्ििशिंि-++ब>्मि-त्ेंुाचाै++5 परी य दी पारीषदरी परी पर १ या जहर अर पिकनिइटएरी कह चाह शी चाचा पक 














वनारसीबिज्ञास १४ ] 


'लन+--.त#.-3 न न>न-म- +न- 3 पनननननन+-मन+-+म+न-नन-न- 3 3+3»++न न +-न नमन निननननन नान--नन-यन 3मनन+ ५ ++ल3निन+-ननन मन वन निन+नीनन+-नी न तन-ननिननीन-ीन तीन निननम-ननन- लक ननीतश-॑-लिभनिनी नी नी नी न नल न क ननन+" 
सिर चा ७० सरीफरी री या रन ५० बरी जरीकडा७ करी परीयनी जरीयर ऋरीषाी टीजर फल फाननर उरी कट उरी पट पट चर पापा २८७ न्‍टी जाट चर धर भ+ पेररत पका. म९ी पट चर ० ३धीफधयट पक मच न्‍ट 


महाजंत्र महास्वामि ए। महदर्थ महागतिगामि ए॥६२॥ 
महानाथ महजान ए। महपावन महानिधान ए। 
गुणागार गुणवास ए। गुणमेरु गंभीरवित्ञास ए ॥ ६४ ॥ 
करुणामूल निरंग ए | महदासन महारसंग ए । 
लोकबन्धु हरिकेश ए। महदीश्वर महदादेश ए॥ ६४ ॥ 
महविभु महबिधिवंत ए धरणीधर धरणीकत ए। 
कृपाब॑त कलिप्राम ए। कारणमय करनविराम ए।| ६५ || 
मायावेलगयन्द ए | सम्मोहतिमिरहरचन्द ए । 
कुमति निकन्दनकाज ए। दुखगजर्भजनमृगराज ए॥ ६६॥ 
परमतत्त्वसत संपदा ए। त्रिगुणी त्रिकाल्दर्शीसदा ए। 
कोपदवानवनीर ए। मदंनीरद्‌हरणसभीर ए॥ ६७॥ 
भवकांतारुठार ए। संशयमृणालअसिधार ए। 
लोभशिख़रनिधोत ए। विपदानिशिहरणग्रभात ए॥ ध्८॥ 
दोहा , 
संबररूपी शिवरमण, श्रीपति शीलनिकाय । 
महादेव मनमथमथन, छुखमय सुखसमुद्ाय ॥ ६६ || 
इति श्रीशिवनायक नाम दशम शतक ॥ १० ॥ 


दोहा 
इति श्रीसहसअठोतरी, नाम मालिका मूल । 
अधिक कप्तर पुनरुक्कि की, कविग्रमादकी भूल || १०० ॥ 


१ करन--उन्द्रिय । ै 


कक अतीत पक पड 3 विदा बह्पिकीयिक चेक... पक अे उीचक पक कर सकी जऑ की... रन नी. शी #न. 


[ १६ घनारसी विलास 


बरी 








ए-सरीयररं का. परीनोक वही उप "पाकर हरी सात सही याही" हरि पानी. कहर यह बरी री पारी कर दी इक हट. दही चेक पी पक चली पट कट पक चिकयी चेक पे पक पक पक करी सर. 


प्रमर्पिंड त्ह्मांडमें, लोकशिखर निवसंत | 

निरखि नृत्य नानारसी, वानारसी नमंत )| १०१॥॥ 
महिमा नह्मविल्लासकी, मोपर कही न जाय | 

यथाशक्ति कछु बरणई, नामकथन गुणगाय॥ १०२॥ 
संबत सोलहसो निवे, श्रावण सुदि आदित्य । 

करनत्ष॒त्र तिथि पंचमी; प्रगत्यों नाम कविच ॥ १०१॥ 


इति भाषानिनसहस्नाम । 





9 
भ्री सोमप्रभावाय विरचिता ' 
बे १ 
पृक्त मक्तावला 
तथा 
स्वगीय कविवर बनासीदासजीकृत 
घाषागक्तमक्तावकी 
( सिंदृरपकर ) 
शादूलविक्रीडित । 
सिन्द्रप्रकरसत १ फरिशिरः क्रोडे कपायाटवी- 
दावाचिनिचयः प्रभोधदिषसप्रासस्भवूर्योदय! | 
इक्तिस्रीकुचकुम्भकुहकुपरस! श्रेयसरों! पन्नव- 
प्रोन्लासः क्रमपोनंसय तिमरः पा प्रमोः पातु ब:॥१॥ 
छणपय | 
शोभित तपगजराज, सीस सिद्र प्रदृधि। 
वोधांदघस आरंभ, करण फारण उदात रवि ॥ 
भगत तमरे पत्नव, कपास फॉतार हतासन। 


बहुगुणरत्ननिधान, मुफ़िम्मलाक्मलाशन ॥ 
शपिधि अनेक उपशा संदित, घरण बरण संतापार। 


जिनरायपाभ नरज्योति भर. नमते ग्नार्गम और प शी | 


उसकज ५ 222७: २०७७) -पालकानक था ७०७० ०नदभ्याह १०७० थन-भप४०4क 2.४०... ामोक/*क हा ३. मीक3३४०नक 





£ पाठभ-चयरण। + पठभर-जिनशय पाय | 


०७० >उ+ पाननाधान ०>ग०>नरान्यकक. ५2७०० छलरक७००मक+कक 





' 8 जयमाममकककक मत ३७३३5... कमाया... हननाक+ मे, शरण. ० के. ०० करी अपटकबी 


2मरामप१ुरिदी०पएम्मोकअंंआाक ग्रिड ७८ उपक.. रद ध ८७. फेहमककक-०१० जकपक॥र०२ाडकन+..अोफलय, 


बनारसी वितात 
शादूलविक्रीडित । 
सन्त! सन्‍्तु मम प्रसन्नमनसों थाचां विचारोधता 
उतेष्म्मः कमलानि तत्परिमर् वाता वित्वन्ति यत्‌। 
कि वाम्यर्थनयानय! यदि गुणोःस्त्यासां ततस्ते सं 
कतोरः प्रथनं न चेदय यशःप्रत्यथिना तेन किम ॥२॥ 
ढोपकास्तवेसरीछन्द । 
जैस कमल सरोवर वासे । परिमल तासु पवन परकाशे । 
त्यों कवि भाषहिं अक्षर जोर। संत सुजस प्रगटहि चहुओर॥ 
जो गुणवन्त रसाल कवि, तो जग महिमा होय | 
जो कवि अक्षर गुणरहित, तो आदरे न कोय॥ २ |! 
धमोधिकार 


न्व्थ् 
है| 


[ 








इ्ख्वज्ा 
ब्रिवगंसंसाधनमन्तरेण पशोरिवायुरविफर्ल तरस्प । 
तत्रापि धरम प्रवर॑ वदन्ति न त॑ बिना यद्भबतो5थकामों ॥| 
ढोधकान्तवेतरीछन्द । 
सुपुरुप तीन पदारथ साधहिं | धर्स विशेष जान आराधहिं। 
घरम प्रधान कहें सच कोय । अर्थ काम धर्महिंते होय ॥ 
धर्म करत संसारसुख, घ्मे करत निवोन। 
घर्मपंथसाधनविना, नर तियच समान ॥ ३॥ 





१ पाठभेद-जगमहिजश । 


०..०22:८-:::::2----:::::-::-2:-::::६-- मसि दूर 2० रत अनपरपिजरग-िपिन्‍ाए५०० #+ ० हरकत 
निखिल नितिन 








, बनारसीबिल्ास १६ ] 


सकने तनमन +लत व ५०५ ता थाकन सब ६ पराजन पा पलपम८+म ला ह ३अ २9 ०४2 न हपमम८ ८ प  ++ अर पान न क+ ३५4 +टन ५2 उलल+२ थक भा 5५ ५ान५  अंयामनकण १48०० ३बकलए,. 3टअमनननममकनत पावन 5५ बकहन्‍> घन, 
##७./2०. #9० #77१/ /#/» .# ०. अर, वि राव हव५ /2 यम #2 ० ८ जा >०ग डरने पिडी मिट 


यः प्राप्य दृष्प्रपमिद॑ं_नरत्व॑ धर्म न यत्नेन करोति मूहः । 

के शप्रवन्धेन से सब्धमच्धी चिन्तामणि पातयति प्रमादात्‌ ॥ 
कपितत मात्रिक (३१ मात्रा ) 

जैसे पुरुष कोई धन कारण, दींडत दीपदीप चह यान | 

आवत हाथ रततचिन्तामणि, ढारत जलधि जान पाषान॥ 


कैसे अ्रमत श्रमत भवसागर, पावत नर शरीर परधान | 
धर्मजतन नहिं करत बनारसि” खोबत धादि जनम अन्नान ॥ ४॥ 


सन्‍्दाक्रान्ता 
स्वरस्थाले क्षिपति त रजरः पादशोच विधत्तो 

पीयूषेण प्रवरकरिं वाहयत्यधमारम ॥ 
चिन्दारत्न॑ पिक्िरति कराद्धापसोड़ायनाथ 

यो दुष्प्रापं गमयति प्रुधा मत्यलन्भ प्रमत्तः | ४ ॥ 


मतगयन्द ( सर्वेया ) 
ज्यों मतिहीन बिवेक विना नर, साजि मतत्नज इंधन ढोवे। 
कंचन भाजन धूल भरे शठ; मूढ सुधारससौ पग धोवे ॥ 
बाहित काग छड़ावन कारण, डार महामणि मूरख रोने। 
त्ौ यह दुर्लभ देह 'बनारसि' पाय अजान अकारथ खोबे ॥2॥ 


शादूलबिकीडित । 


ते पत्त रतर' वपन्ति मवने प्रोन्मूल्य कल्प मं, 
चिन्तारत्ममपास्य काचशकलं स्त्रीकुेते ते जढाः 


१९७० 2५ /५//५५००६/०५//५/३९/११ ५४०९ #१६ २९/९-#५५००,००५/६९/०५:७/१६/%, '४००५/४९#५/३५। 








ई [ ४२० बनारसी वितञास 


'परी पारी क 'जारी सारी पी सिटी पारी ऋरियारी परी यरी यपिकीिरी परी री की भी कम परी की फटी की. उमा फ्री फीफा चीीकी यीकीकीजीजी 


विक्रीप द्िरद॑ गिरीन्द्रसदर्श क्रीशन्ति ते रासमभं, 
ये लब्ध॑ परिहृत्य धर्ममधमा धावन्ति भोगाशया ॥ 


कवित्त मात्रिक ( ३१ मात्रा ) 





ज्यों जरमूर उसारि कल्पतरु, वोषत मूह कनकको खेत | 
ज्यों गजराज बेच गिरिवर सम, ऋष कुबुद्धि भोत्न खर लेत ॥ 
जैसे छांढ़ि रतन चिन्तामणि, मूरल कांचखडमन देत । 
तैसे धर्म पिसारि बनारसिः धावत अश्रधम विपयसुखहेत ॥६॥ 
शिखरिशी । 
अपारे संसारे कथमपि पमासाध नभदं 
धर्म य: कुयोहिपयसुखतध्णातरलितः 
प्र उन्पाराबारे प्रवरभपह्ाय प्रवहरां 
स प्ुख्यों मूखोगामुपलमुपतव्यु' प्रयतते॥ ७ ॥ 
सोरठा । 


ज्यों जल बूड़त कोय, तज बाहन पाहन गहै। 
त्यों नर मूरव होय, धर्म छांड़ि सेवत त्रिषय ॥७॥ 


शादेलबिक्रीडित । 
भक्कि तीथंकरे गुरो जिनमते संघे च दिसानत 
स्तेयात्रह्परिग्रहव्युपरम॑ क्रोधाधरीणां जयम । 


* १ धत्रा। २ गधा | 





(नर हरी जन 5. 3 ०० 2१ /#भ 2० ७० #% /#7१३७#% /##६ अ० आर कह 





बनारसीविज्ञास २१ ] 


सोजन्य॑ गुशिसिद्ठामिन्द्रियदर्म दान॑ तपोभावनां 
वैराग्यं च दुरुध्ध निईवेतिपदे यद्यसिति गन्तु' मन! ॥८॥ 


पटपद । 

जिन पूजहु गुरुनमहु जेनमतबेन बलानहु । 

संघ भक्ति आदरहु, जीव हिंसा न विधानहु ॥ 
भूठ अदत्त कुशील, त्याग परिगह परमानहु | 
क्रोध मान छल्न लोभ जीत, सजग धिि ठानहु ॥ 


गुणिसग करहु इन्द्रिय दसहु, देहु दान तप साथजुत । 
गहि मन बिराग इद्विविधि चहहु जो जगमें जीवनमुकत | ८॥ 
पूजा घधिकार । 
पाप॑ लुम्पति दुर्गेति दलयति व्यापादयत्यापद | 
पृण्य संचिनुते भ्रियं वितनुते पृष्णाति नीगेगताम । 
सोमाग्यं विदधाति पल्नवयति प्रीति प्रशते यशः 
खर्ग' यच्छति निद् तिंच रचयत्यचौहतां निर्मिता॥६॥ 


३१ मात्रा सवेया छन्‍्द | 


लोपै दुरित हरे दुख संकट; आपे रोग रहित नितदेह। 
पुरय भेंडार भरे जश प्रगटे; मुकति पंथसों करे सनेह॥ 


१ पाठसेद-नहि जानहु। २ पाठभेद-सजनता । 


[ २२ बनारसीवबिलास 


जन्‍न्‍ाकक, 








रचे मुद्दाग देय शोभा जग; परभव पेचावे छुरेह। .. 
कुगति बंध दलमलहि 'बनारसि?, बीतराग पूजा फल येह ॥६॥ 
सवगंस्तस्य गृह्ज्गणं सहचरी मांम्राज्यलद्मीः शुभा 
सोभाग्यादिगुणावल्िपिलसति सवेरे वुवेश्मनि । 
संसार! सुतरः शिव करतलक्रोड़े लुठत्यज्ञता 
य; भ्रद्धामरभाजन जिनपतेः पूजां विधततो जन) ॥१०॥ 
देवलोक ताको घर आँगन; राजरिद्ध सेवें तसु पाय | 
ताके तन सौभाग आदि गुन; केलि वि्ञास करे नित आय ॥ 
सोनर तुरत तरे भवसागर्ण; निर्मित होय मोक्ष पद पाय। 
द्रव्य भाव विधि सहित 'बनारसि; जो जिनवर पूजे मन लाय |१० 
शिखरिणी । 
कदाचित्नातडू; इुपित इव पश्यत्यमिमु्ख॑ 
पिद्रे दारिदरय' चकितमिपनश्यत्यनुदिनिस्‌ | 
विरक़ा कान्‍्तेव त्यजति कुगतिः सन्यम्रुदयों 
न मुश्वत्यस्य्ण सुहृदिव जिनाचो' रचयतः ॥१ १॥ 
ज्यों नर रहे रिसाय कोपकर; त्यों चिन्ताभय बिमुख बखान। 
ज्यौं कायर शंके रिपु देखत . त्यों दारिद भज्जे भय मान ॥| 


ज्यों कुनारि परिहरे खंडपति; त्यों दुर्गति छंढें पहिचान । 
हितु ज्यों बिभो तजे नहिं संगत; सो सब जिनपूजाफल् जान ॥१९॥ 


यनारसीविलास श्र ] 





शादेलविक्रीडित । 
यः पृष्पेजिनमचति स्मितसुरक्षीनोचने: सोषच्य ते 
यरत॑ बन्दत एकशब्निजगता सो5हनिंश॑ पन्धते । 
यस्‍्त॑ स्तोति परत्र वृत्रदमनस्तोमेन स स्तूयते 
यस्‍्त॑ ध्यायति क्लप्तकर्मनिधनः सध्यायते योगिमिश॥ 
जो जिनंद पुज्ने फुल्लनिसों ; सुरनि-नैन पूजा तसु होय । 
बंद भावसहित जो जिनवर; बंदनीक त्रिभुवनमें सोय ॥ 


जो जिन छुजस करे जन ताकी; महिमा इन्द्र करे सुरतोय । 
जो जिन ध्यान करहि वनारसि'; ध्यावहिं मुनि ताके गुण जोय॥१श॥ 


गुरु अधिकार | 


वशस्थविल्लम्‌ | 
अवृधपुक्क पथि यः प्रवत्त ते प्रवत्त पत्यन्यजन च निश्यृहः । 
स सेवितत्यः सहितिपिणा गुरः सतय॑ तर॑स्तारपितु' क्षमः 


परम ॥ १३॥ 
आभावक छन्द । 
पापपंथ परिहरहि , धरहिं शुभपंथ पग । 
पर उपगार निमित्त , बखानहिं मोज्षमग | 
सदा अबंछित चित्त; हु तारन तरन जग । 
ऐसे गुरुकी सेवत; भागहिं करम ठग ॥ २३ ॥ 


“०्ग्ब2:252.252...:557५ टी जारी पल टीपकरपेजर टीका आय धपनपलरीयटी पड विश, पट पिता पल पा पिला * कर सा पेजर पे पट पका पट पक यह पट" न ४ ५०२०८०८६०६६::८::::--------- 








। २४ | बनारसीबिज्ञार 


कण्पकग३/११# मर रेट अर रिकनर कप पि#्िजतपिजरऐरे,.ग.#पिजयि.#न्पि. पेड पक पर्यटन पे मर, पेड "हे... .+र५ ९ #.ग#५>ए०र पक मं सरी२कम जप अमान करयकरीम कप पिडरपिकी 


विदत्ययति बुवो्ध बोधयत्यागमार्थ' 
सुगतिक्षुगतिमागों पृण्यपापे व्यनक्कि | 
अवगमयति कृत्याद्ृत्यमेद॑ शुरुयों 
भपललनिधिपोतस्त॑ बिना नाएति कथित्‌॥ १४॥ 


गाता छन्‍्दे | 


मिथ्यात दत्नन सिद्धांत साधक, मुकतिमारग जानिये। 

करनी अकरनी सुगति दुरगेति; पुरय पाप बखानिये॥ 

संसारसागरतरनतारन , गुरु जहाज विशेद्विये । 

जगमाहि गुरुसम कह बनारसि', और कोउ न देखिये ॥ १४ ॥ 
शिखरणी । 


पिता माता आराता प्रियसहचरी छूनुनिवहः 
सुहत्ययामी माधत्कारमटरथाश्वः परिकर! । 

निमज्जन्त जन्तु' नरककुहरे रह्षितुमलं 
गुरोधमाधमंप्रकटनपरात्को5पि न पर; ॥१४॥ 


भज्तगयन्द । 

मात पिता सुत बन्धु सखीजन;मीत हितू सुखकारन पीके। 
सेवक राज मतंगज घाजि; महादत् साजि रथी रथनीफे ॥। 

दुर्गति जाय दुखी विलल्ाय; परे सिर आय अकेलहि जीके। 
पंथ कुपंथ गुरू सममावत; और सगे सब स्वारथहीके ॥ १५॥ 











ज्ज्य्ज्ज्ज्््स्ज्ज्ज््ज्ज्ज्ल्््््श््ञ्ट््स ह->अन-- का मकर" ! 28-22 कक - अपनी मध्य २७०७३ तप -+य4-क + कर ५७ ८४3 -भ७.५७+++- पथ» ५७७» छ+->३५७५+५30५-33+फे+कमममाप--मक 
रे (22७ ७99/#७/०-४०२७//० /०९/४०० ४०५ /१५/०१ १३ ०*१३?११ ०९ /नेजन्येकरव 


कि घ्यानेन मवल्वशेष॑विषयत्यामेस्तपोमिः छूत॑ 
पूर्ण भावनयालमिन्द्रियजय पर्याप्तमाप्ताणम: । 
कि त्वेक मवनाशन छुरु गुरुप्रीत्या गुरो! शासन 
से ग्रेत विना विनाथबलवत्त्ाथांय नाल शुणाः 
पर्तु छन्‍्द | 
ध्यान धारन ध्यान घारन, विपे सुख त्याग | 
करुचारस आदरन; भू मि सेन इन्द्री निरोधन ॥ 

* ज़त संजम दान तप; भगति भाव सिद्धांत सोधन ॥ 
थे सब फाम तन आपहीं; ज्यों बिन नायक सेन || 
शिवसुख देतु 'बनारसी; कर प्रतीत गुरुवेन | १६॥ 

जिनभताधिकार । _ 
शिखरिणी | 
न देव नादेव न शुभगुरुमेन॑ न कुशुरु 
ने धर्म नाप न घुणपरिशद्ध' न पिशुणस्‌ | 
न छुत्पं नाइत्यं न हितमहित नापि निषुणस्‌ 
विल्लोकन्ते लोक! जिववचनचनुतिरहिता) ॥१७॥ 


कु डल्या छन्द । 


देव अदेच हि नहीं लखे; सुगुरु कुगुरु नहिं सूझ। 
धम्म अप गने नहीं; कम अकर्म नचूम॥ 


#7९ (3० छ 9९.०५ ##रप्क, 





[२६ वनारसीविताह 


कर्म अकर्म न वूस; गुण रु औगुण नहिं जानहिं। 
हित अनहित नहिं सघे; निपुण मृरख सहिं मानहि ॥ 
कहते वनारसिः ज्ञानटृष्टि नहिं अंध अवेवर्ि। 
जेनवचनहदगहीन; लेख नहिं देव अदेवहि॥ १७ ॥ 
शाईलक्क्रीदित । 


मानुष्यं विफल वदस्ति हृदय व्यर्थ! वृथा श्रोत्रयो- 
निभाएं गुगदोपमेदनकलां तेपामसंभाविनीम | 
दुवारं नरकान्यकुपपतन मुक्ति बुधा दुलंभां 
सा: समयो दयारसमयो येपां ने कर्शातिएि। 
2! मात्रा सब्ेया छन्दे । 
ताको मनुज जनस सव निप्फल, मन निः्फल निप्पल जुगढ़ान। 
गुण अर दोप विचार भेद विधि; ताहि भहय दुलेस है ज्ञाव। 
ताको छुगस नरक दुख संकट; अगस पंथ पढ़वीं निर्वानि । 
जिनमतवचन दयारसगर्मित; जे न सुनत सिद्ध त वखान ॥ (८) 
पीयूर्प विषवजलं ज्वलमवत्ते जस्‍्तमः स्तोमव- 
न्मित्रें शाजववत्थ्ज भुजगवस्न्तामणि लोहा ! 
ज्योस्स्ां प्रीष्ममधमंवत्स मन॒ते काहएयपण्यापएं.. 
पनेंद्र' मतमन्यदशनप्तमं यो दुर्भतिर्मन्यते ॥१६/ 
छणय॑ । 


अमृतकह विष कहें; नीरकह पावक सानहिं। 
तेज तिमरसम गिनदि; मित्रकहं शत्र वखानहिं । 
मदन मिल कनिकीशलललिक,.....5........६ ५ 20:220:8/0 0 0०. कक कक कक कक जा >.>-- 3 














। चनारसीबिलास २१७ ] 


धरम कामिनी 
श्र 








ज्ज्ल्स्स्य््स्््स््ण्ण्ण्ण्ण्ण्णल जज तन 5 


पहुपमाल कहि नाग; रतन पत्थर सम तुल्लदि 
चंद्रकिरण आतप स्वरूप; इहि भांति जु भुन्नहि ॥ 
करुणानिधान अमलानगुत; प्रगट 'वनारसि! जेनसत | 
रसव समान जो सनधरत; सो अजान मूरख अपब॥ १६॥ 
धर्म' जागरयत्यधं॑पिघटयत्युत्थापवत्युलप॑ 
हि मिन्‍्ते मत्सरम॒च्छिनत्ति हुनयं मभाति मिथ्यामतिस्‌ । 
चैराप्यं वितनोति पृष्यति छूपां प्रष्णाति तृष्णां च य- 
ताज न॑ मतमर्चति प्रथयति ध्यायत्यधीते कृती ॥२०॥ 
मरहठा छनन्‍्द्र । 
शुभ धर्म विकारी, पापविनारे; कुपथउथापनहार । 
सिध्यामतखंडे, कुनयविहंडे; संडे दया श्रपार ॥ 
सृप्णामदमारे, सग पिडाए यह जिनआगमसार | 
जो पूजें ध्यावे; पेँ पढावें; सो जगमाहिं उदार ॥२०॥ 
संघ अधिकार । 
रत्नानामिव रोहणल्तिपरः खे तारकाणशामित 
खर्ग! कल्पमदीरुद्यमिव सरः पड़ रुद्मणामिव | 
पायोषिः पयसामिपेन्दुमह्सां स्थान शुणानामसा- 
पित्पालोच्य विरच्यतां भगवतः संघसय पूजाविधि! ॥| 
३१ मात्रा सपेया हन्द् | 
जैसे नममंदल तारागण; रोहनशित्तर रतनरी सान। 


स्यों छुस्लोक भूरि फलपट्रम; ज्यों सरवर अंतुज पन् जान | 


आधआओ 
कि. छ कक रथ कक कि ७ कक च, ७७७ 5 १७ न्यस  # कह 38 2.2७ पक का २० 


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श्८ ] ' बतारसीबितास 


5 8 05333 3 के पल 
ज्यों समुद्र पूरन जलमंडित, ज्यों शशिक्षविसमूह छुलदान । 
तैसँ संघ सकल गुणमन्दिर, सेवहु भावभगति मन आन ॥२॥॥ 
यः संधारनिरासलालसमतिष्रु कत्यथमुत्तिप्टते 
य॑ तीथ' कथयन्ति पावनतया येनास्ति तान्‍्य। समः | 
यस्मे सगपतिनमस्पतति सतां यस्माच्छुम जायते 
स्पृर्तियंस्य परा वसन्ति च गुणा यसिमिन्स संधोष्च्ये तामू॥ २१॥ 
जे संसार भोग श्राशा तज, ठानत मुकति पन्‍्थकी दौर | 
जाकी सेष करत सुख उपजत, जिन समान उत्तम नहिं और ॥ 
इन्द्रादिक जाके पद वंदृत, जो जंगम तीरथ शुचि ठौर । 
जामै नित निवास गुन संपति, सो श्री संघ जगत शिरमौर ॥ २२॥ 
लक््मीस्तं खयमस्युपेति रमसात्कीतिस्तमालिह्ति 
प्रीतिस्त॑ मजते मतिः प्रयतते त॑ लब्युपुकए्ठया । 
:भीर् परिरब्धुमिच्छति हुहुप् क्विस्तमालोकते 
यः संघ॑ गुणसंघकेलिसदन श्रेयोरुचि! पेषते ॥ २३ ॥ 
ताको आय मित्षे सुलसंपर्ति, कीरति रहें तिह जग छाय | 
जिनसों प्रीत बढ़े ताके घट, दिन दिन घर्मेबुद्धि अधिकाय | 


द्विनद्चिन ताहि लखे शिवसुन्दर, सुरगसंपदा मिले सुभाय | 
धवानारसि? गुनरास संघकी, जो नर भगति करे मनलाय ॥ २३ | 
पल मम वन 











१ पाठभेद--मंडन 








बनारसीविलास १६ | 





यह्ुक़: फलमहंदादिपदवीमुरुय कृपे! सस्यव- 
चक्रिलत्रिदशेन्द्रतादि तणवर्थासड्डिक गीयते | 
शक्ति पन्महिमस्तुतो न दवते वाचो5पि वाचस्पते! 
संघ! सो5घहरः पुनातु चरणान्यातेंः सतां मन्दिरम ॥ 
जाके भगति मुकतिपद्पावत, इन्द्रादिक पद"गिनत न कोय । 
ज्यों कृषि करत धानफत्न उपजत, सहज पयार घास भुस होय ॥ 
जाके गुन जस जंपनकारन, सुरणुरु थकित होत मद्खोय | 
सो श्रीसंघ पुनीत बनारसि', दुरित हरन बिचरत भविज्ञोय ॥ २४॥ 
अहिंसा अधिकार | | 


क्रीडाभू! सुकृतस्य दृष्कृतरजः संहारवात्या भवो- 
दन्वन्नौव्यंसनाभ्रिमेषपटली संकेतदूती भ्रियाम्‌ । 
निःश्रेशिश्विदिषोकसः प्रियसल्वी पुक्त! कुगत्यगेला 
सत्तेषु क्रियतां कृपेव मवतु क़ोशेरशेपेः परे! ॥ २४॥ 
सबया ३१ । 


सुझतकी खान इन्द्र पुरीकी निसेनी जान 
पापरजखंडनको, पौनरासि पेखिये | 


भवदुखपावकबुझायवेको मेघमात्ा, 
_ कमला मिलायवेको दूती ज्यों विशेखिये | 
मुगति बधूसों प्रीत; पालवेकों आलीसम, 
कुगति किवार दिढ़। आगल्सी देखिये ॥| 


१ पाठभेद--कुगति के द्वार दिह । 


अलनानीलययन ननलननननननलनप ७ सलथ>-न न न कितने अ्न- «मनाया म० कपनन कन- <न “नम “नमन ५५ नकनज सका अनना पन-न८+--- ५-८ -++७+५२५३०७५०७५४५०/-९ अप जान घन -९+ाक» ५४२३७ फक +-++प ० पप्नमनमन: 3>क; +॥५३७+नफऊ५५५ .-अानजजरम> 3 जन. 


[ ३० वनारसीविल्ञास 


ना. स्‍ानांकाक 








2७ ३५२५८२५२ ५८०३ /५-पपपडीकीपियापिकीीकीय 


ऐसी दया कीजे चित, विहूलोकप्रांणीहित, 
और करतूत काहू; लेखेमें न लेखिये ॥ २५॥ 
शिखरिणी । 
यदि ग्रावा तोये तरति तरणियंध दयते 
प्रतीच्यां सप्तार्नियेदि भजति शैत्यं कपमपि । 
यदि चमापी् स्पादृपरि सकलस्थापि लगतः 
प्रतत सच्ानां तदपिन वधः क्रापि सुकृतम्‌ ॥२६॥ 
आभावक हन्द । 
जो पच्छिम रवि उगे; तिरे पापाण जल। 
जौ उलटे भुषि लोक; होय शीतल अनल ॥ 
जो सुमेरु ढिगमगे, सिद्ध कहं लगे मल | 
तब हू हिसा करत; न उपजत पुण्यफल ॥ २६॥ 
सालिनी । 
से कमलवनम्त वोसर॑ मास्वदरता- 
दम्तम॒रगवक्त्रात्साधुवादं विवादात्‌ | 
रुगपगममजीशाज्जीवित कालकूटा- 
दमिलपति वधादः प्राणिनां प्ममिच्छेत ॥ २७॥ 
सवेया ३१ । 


अगनिरमे जैसे अरविंद न विलोकियत; 
सूर अॉयवत जेसे.बासर न मानिये। 








बनारसीबिलास ३१ ] 


सांपके बदन जैसे अमृत न उपजत; 
कालकूट खाये जेसे जीवन न जानिये ॥ 
कल करत नहिं पाइये सुजस जेंसे; 
बादतरसांस रोग नाश न बखानिये । 
प्राणी वधमांहि तेसें; धर्म की निशानी नाहिं, 
याद्ीते बनारसी विवेक मन आनिये॥ २७॥ 
शादूत्न विक्रीडित | 


आयु्दीधतरं वषुवरतरं गोत्न॑ गरीयस्तरं 
वित्त' भूरितरं बल् बहुतर॑ सवामिलमुचेस्तरम । 
आरोग्यं विगतान्तर त्रिजगति शाध्यलमल्पेतरं 
संसाराम्बुनिषि करोति छुतर॑ चेतः कृपादोन्तरम्‌॥२८॥ 
३१ मात्रा स्वेया छन्द 
दीरघ आयु नाम कुल उत्तम; गुण संपति आनंद निवास। 
उन्नत विभव सुगम भवसागर; तीन भवन महिसा परकास॥ 
भुजबलवंत अन॑ंतरूप छवि, रोगरहित नित भोगविज्ञास॥ 
जिनके चित्तदया तिनकेरुख; सब (ुख होहि बनारसिदास ॥र२८। 
सत्यवंचन अधिकार | 
पिधासायतर्न विपत्तिदलन देवे! कृताराधन॑ 
पुक्क; पथ्यदन जलामिशमन व्वाप्रोरगस्तम्भनम | 
श्रेय;संवनम समृद्विजनन सोजन्यसंबीवर्न 
कीते। केलिवन प्रमावभवन सत्यं वच! पावनम्‌ ॥२६॥ 








[ 3२ बनारसी विज्ञास 


| अहटीनफेलक परी पटरी पक पे चर चेताया पाल पटरी पयनीहरी पका नाग फ. 


पटपद | 


गुणनिवास विश्वास बास; दारिददुख्ंडन | 
देवअराधन योग ; मुकतिमारग मुखमंडन | 
सुयशकेलि आराम ; धाम सजञ्मन मनरंजन | 
नागबाघवशकरन ; नीर पावक भसयभंजन ॥ 


सहिमा निधान सम्पतिसदन; मंगल सीत पुन्तीत मग । 
सुखरासि बनारसिदास” सन ; सत्यबचन जयवंत जग ॥२६॥ 


शिखरिणी | 
पशो पम्माहुरमीभवति वनवह रिव पैन 
निदानां दुःखानां यदवनिरुहाणां जलमितर । 
ने यत्र स्पाच्छायातप इवे तप)स यम्रकृथा 
कथय॑चित्तन्मिध्याववनमभिथतत न सतिभान्‌ ॥ ३०॥ 


३१ मात्रा सवेया छन्द । 


जो भर्मंत करे निज कीरति; ज्यों बनअप्रि दहें वन सोय | 

जाके संग अनेक दुख उपजत ; बढ़े वृक्ष ज्यों सींचत तौय || 

जामे धरम कथा नहिं सुनियत ; थ्यों रवि वीच छांहिं नहिं होय । 

सो मिथ्यात्व वचन वनारसि; गहत न ताहि विचक्षण कोय ॥३०। 
बंशस्थविलम | 

असत्यमप्रत्यप पूलकारण कुवासनासभ समृद्धिवारणम । 

विपन्निद्ानं परवश्वनोनित कृतापराध ऋृतिमिविबनितम ॥३ १॥ 


हे 8७-९५ विवि मिट. 








बनारसीविलास ु ३३ ] 








रोडक छन्द । 
कुमति कुरीति निवास: प्रीति परतीति निवारन। 
रिट्विंसिद्खिसुलहरन; विपति दारिद दुख कारन ॥ 
परवंचत उतपत्ति; सहज श्रपराध कुलच्छन | 
सो यह मिथ्यावचन; नाहि आदरत विचच्छन॥ ३१॥ 
शादू लबिक्रीडित । 
तस्पामरिजेलमणवः स्थलमरिमित्रं तुरा। फिज्टरा 
कान्तारं नगर गिरिग हमहिमोल्यं मृगारिस ग। । 
पाताल विलमस्रमुत्पलदलं व्यालः धृगालो विष 
पीयूपं विषम सम च बचने सत्याश्रितं बक्ति य: ॥३२॥ 
सेया ३१ । 
पावकर्तें जल होय; वारिधतें थल होय, 
शख्रते कमल होय; प्राम होय बनते | 
कूपते बिबर होय; परबेतत घर होय, 
दास होय, हितू दुरजनते ॥| 
सिंहते कुरग होय; व्यात् स्थालअंग होय, 
विषते पियूष होय; माला अहिफनते । 
बिषम्तें सम होय, संकट न व्यापें कोय 
एते गुन होय सत्य बादीके द्रसते ॥ १२॥ 
अदत्तादान अधिकार | 
मालिनी | 
तममिलपति सिद्धिस्त॑ वृणीते समद्धि- 
स्तममिसरति कीर्तिप्रु अत त॑ भवाति! । 


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है [ १४ वनारसीवित्ञास 





स्पृहयति सुगतिस्त॑ नेदते दुर्गतिस्त 
परिहरति विपत' यो न गृह्मात्यद्त्तम्‌ ॥ ३३ ॥ 
रोडक छन्द | 

ताहि रिड्धि अनुसरे, सिद्धि अभित्ाष धरे मन! 
बिपत संगपरिहरे; जगत विसरे सुजसधन।॥ 
भवआरति तिहिं तजे, कुगति बडे न एक छन। 

सो सुरसम्पति लहै, गहै नहिं जो अदृत्त घन॥ ३३॥ 

शिखरणी 


अदत' नादत कृतसुकृतकामः फिमपि य; 
शुभभ्र णिस्तस्मिन्वतति कलहंसीव कमले 
विपत्तरमाद्‌.रं त्रजति रजनीवाम्बरमणे- 
पिनीत॑ विध वे त्रिदिवशिवलक्मीमंजति तमू ॥ ३४॥ 
( ३१ मात्रा ) सवंया हन्द । 
ताको मिले देवपद शिवपद, ज्यों विद्याधन लहै बिनीत । 
तामै आय रहे शुभ-पंकति, ज्यों कलहंस कमतलसों मीत । 
ताहि विल्लोकि दुरे दुख दारिद, ज्यों रषि आगम रेन वितीत 
जो अदत्त धन तजत वनारसिः पुण्यवंत सो पुरुष पुनीत ॥३१ 
शादूलबिक्रीडित । 
यत्रिवर्तितकीतिधमेनिधरन सवोगसां साधन 
प्रोन्मीलद्धवन्धन विरचितक्निशशयोदवोधनम्‌ । 
दोगत्येकनिवन्धन कृतसुगत्यारल पसंरोधन॑ 
प्रोट्परपस्मधन निधृज्ञति न तद्धीमानदत्त' घनम ॥३४॥ 


ख्ध््य्य्य्य्प्व्श्य्व्श्््य्््श्य्थ््य्थ्थ्््य््त्ल्ल्-----६----<<<::<::-<८:<८::-- न के आम 8 आक 4 आ2400 5-4 2/.40-:20:/4-+4/#4%०४थ० ७५४ ++की०+)४५+५०*५#क कक य आकमिकम 





बनारसीविलास श्श] 
मरहटा छन्‍्द | 
जो कीरति गोपहि, धरम विल्ोपहिं, करहि महाअपराध | 
जो शुभगति तोरहि, दुरगति लोरहि, जोरहि युद्ध उपाध ॥ 
जो संकट आनहिं, दु्गेति ठांनहिं, वधबंधनकों गेह! 
सब ओगुण मंडित, गहे न पंडित, सो अद्चपन येह ॥३श॥ 
हरिणी। 
परजनमनः पीडाक्रिडावन वघभावना- 
भवनमवनिव्यापिव्यापल्नताधनमणएडलम | 
कुगतिगमने मार्ग! स्पर्गापवर्गपुरागलं 
निपतपलुपादेय॑ स्तेयं तृणां हितकांबिणाम ॥३६॥ 
( ३१ मात्रा ) सबैया । 
जो परिजन संताप केलिवन, जो वध बंध कुबुद्धि निवास । 
जो जग विपतिबेत्धनमंडल्, जो दुरगेति भारग परकास॥ 
जो सुरत्ञोकद्वार वह आगल, जो अपहरण मुह्तिसुखवास। 
सो अदत्तघन तजव साधुजन; निजहितहेव बनारसिदास” ॥३६॥ 
शीलाधिकार | 
शादूलबिक्रीडित । 
दत्तस्तेन जगत्यकीतिपटहो गोत्रे मपरीकृचक- 
शारित्रस्य जलाझज्षिगु गगणारामस्य दावानलः | 
संकेतः सकलापदां शिवपुरद्वारे कपादो इ6। 
, . शील॑येन निब॑ वि्ुप्तमलिल त्रेलोक्यचिन्तामणि॥३७| 


[ ३६ वनारसीविलास 





( ३१ मात्रा ) स्या । 
सो अपजशको डंक वजावत, लावत कुल कल्नंक परघान)। 
सो चारितको देत जल्लांजुलि, गुन वनकोी दावानल ढान॥ 
सो शिवपन्थकिवार वन्ावत, आपति विपति मिलनको थान ! 
चिन्तामणि समान जग जो नर, शील रतन निजकरन सल्ान ॥रे७॥ 
मालिनी । 
हरति कुल्कलड़' लुम्पते पापपड़ 
सुकृतम्ुपचिनोति ह्ाध्यतामातनोति । 
नमयति सुरबर्ग दन्ति हुमों श्स्ग 
रचयति शुचि शीलं स्वर्गमोत्तो सल्ीलम ॥२८/! 
रोडक छन्द | 
कुछ कल्नंक दलसलहि, पापसलपक पखारहि। 
दारुन संकट हरहि, जगत महिम्ग विस्तारहि ॥ 
सुरुग सुकति पद रचहिं, छुक्ृतसंचहि करुणारसि | 
सुरगन वंदहि चरन, शीलगुण कहत वनारसि? ॥ ३० 
शादलविक्रीडित । 
व्याप्रव्यालजलानलादिदिपदस्तेषां ब्र्जान्‍त क्षय 
कल्याणानि सपुल्लसन्ति विवुधाः सांनिष्यमध्यासते | 
कीतिः स्फूर्तिमियति यात्युपचयं धमेः प्रणश्यत्यध॑- 
स्वनिगेणतुद्वानि संनिदधते ये शीक्षमादिभ्रते ॥३६॥ 
मत्तगयन्द । 
ताहि न बाघ सुजँंगसकी सय, पानि न वोरे न पावक जाते। 
ताके समीप रहें सुर किन्नर, सो शुभ रीत 'करे अघ टाल ॥ 








बनरसीविल्ास २७ |] 


अरे. िकरान 2१०मिरीे, 2ल्‍9-/०५.#ह#गर न अन्य फष्थ /्षेजम हे 


तातु विवेक बढ घट अंतर, सो सुरके शिवके सुख भाले। 
ताकि छुकीरति होय तिहूँ जग, जो नर शील अखंडित पाले ॥१६॥ 
तोयत्प्रिरपि खजत्यहिएपि व्याप्रोडपि सारड्रति 
व्यालोउप्यश्वति पर्वतो5प्युप्ति च्वेडो5पि पीयूपति । 
विश्नी5प्युत्सवति प्रियत्यरिरपि क्रीडातडागत्यपां- 
नाथो5पि सयूहत्यटव्यपि नृणणा शीलप्रभावाद ध्र्‌ पम्‌ | ४ ० 
पटपद । 
अगनि नीरसस होय, माज्सम होय भुज॑ंगम। 
नाहर मृगसम होय, कुटिल गज होय तुरंगम॥ 
बिप पियूपसम होय, शिखरपाषान खंडमित । 
विधन उल्नटि आनंद, होय रिपुपत्रटि होय हित ॥ 
जीलातलावसम उद्धिजल, ग्रहसमान अटवी विकट | 
इह्विधि अनेक दुख होहिं सुख, शीलवंत नरके निकट | 
परिग्रहाधिकार | 
कालुष्यं जनपन्‌ जडरय रचयन्धमद्र मोन्मूलन॑ 
क्लिक्षक्षीतिकपाज्माकमलिनीं लोभ/म्वुधि व्धेयन्‌ । 
मपोदातट पुद्र जन्छुममनोहंसप्रवास॑ दिश- 
न्कि न कल शकरः परिग्रहनदीपूर; प्रवृद्धि गतः ॥४१॥ 
( ३१ मात्रा ) सबैया । 
अंतर सलिन होय निज जीवन, बिनसे धमतरोबरमूल । 
किलसे दयानीतिनलिनीवन, धरे लोभ सागर तनथूत्न ॥ 





' [४८ बनारसी विज्ञास 


'कारीयी करी सर पक चेक पक. करी चही पत चाबी पा बल 


उठे बाद मरजाद मिटे सव, सुजन हंस नहिं पाषहिं कूल | 
बढ़त पूर पूरे दुख संकट, यह परिम्ह सरितासम तूल॥ ४१॥ 
मालिनी । 
कलहकशभपिन्ध्यः कोपगृप्रश्मशा्त 
व्यसनशुजगरन्प्र' हू पदस्युप्रदोष: । 
सुकृतवनदबाप्िमोवर्दास्भोदवायु- 
नंयनलिनतुपारोषत्यथमथोनराग/ ॥ ४२ ॥ 
मनहरण | 





कलह गयन्द उपजायवेको विध्यंगिरि; 
कोप गीधके अघायवेकी समशान है। 
संकट भुजंगके निवास करिवेकों विज 
बेरभाव चौरको महानिशा समान है ॥ 
कोमल सुगुनधनखंडवेको महा पौंन, 
पुण्यबन दाहिवेको दावानत्न दान है। 
नीत नय नीरज नसायवेको हिम राशि, 
ऐसो परिग्रह राग दुखको निधान है ॥ ४९२॥ 
शादलबिक्रीडित । 
प्रत्यथी प्रशमस्य मित्रमधतेमोहस्थ विधामभूः 
पापानां खनिरापदां पदमसदृष्यानस्य लीजावनश | 
व्याज्ेपस्य निधिमेदस्प सचिषः शोकस्प हेतुः के 
केलीविश्म परिग्रह! परिहतेयोंग्यो विविक्तात्मनाम॥४ ३॥ 


निशिलीशामिकरीलकीलकभानिलनिमकी भी धरम किक आम जार य सन गाया 











वनारसीविलञास १६ ] 


'चमननरन्‍ी नया पित्त तकनीक न हीगक#भाका नवमी 





ही टीबी लिन परत बहता रियर पिन. 


प्रशमको अहित अधीरजको वाल हित; 
महामोहराजाकी प्रसिद्ध राजधानी है । 
अ्रमको निधान दुरध्यावको विलासवन; 
विपतको थान अमिमानकी निशाली है॥ 
दुर्तिको खेत रोग शोग उतपति हेत; 
कलहनिकेत दुरगतिको निदानी है । 
ऐसो परिप्रह भोग सबनिको त्याग जोग; 
आतम गवेपीलोग याही भांति जानी है॥ ४३॥ 
वहिस्तृप्पति नेन्धनेरिद्ठ यथा नाम्मोभिरम्भोनिषि- 
सतहल्लोमधनो धनेरपि धरनेज॑न्तुने संतुष्यति । 
न त्वेष मनुते विम्रुच्य पिभर् निःशेषमन्यं भव 
यात्यात्मा तद॒ह मुधेव विदधाम्येनांसि भूयांसि कि॥ 
पटपद । 
ज्यों नहिं अप्रि अघाय; पाय इंघन अनेक विधि। 
ज्यों सरिता घन नीर; ठपति नहिं होय नीरनिधि॥ 
त्यों असंख धन वढत, मूह संतोष न मानहिं ! 
पाप करत नहिं उरत; बंध कारन मन आनहि | 
परतछ्व विल्ञोकि जम्मन मरन; अथिर रूप संसारक्रम | 
समुझे न आप पर ताप गुन; प्रगट धनारसि? मोह भ्रम ॥४७॥ 
क्रोधाधिकार 
यो मित्र मधुनो विकारकरणो संत्राससंपादने 
सर्पस् प्रतिविभ्यमज्ञददने सप्ताचिष! सोदर! । 


४० | वनारसीबिलास 


चेतन्यस्थ निषृदने विषतरों सत्रह्मचारी चिर॑ 
स क्रोषः कुशलामिलापकुशलेनिंयू लपुन्मूल्यताम्‌ ४५ 
गाताहन्द | 
जो सुजन चित्त बिकार कारन; मनहु मदिरा पान । 
जो भरम भय चिन्ता बढावत, असित सपे समान ॥| 
जो जतु जीवन हरन विपतरु; तनदहनदवदान | 
सो कोपराश वित्ताशि भविजन, लहहु शिव सुखथान ॥ ४५ ॥ 
हारिणी। 
फलति कलितश्रेय: श्रेणीग्रदूनपरम्परः 
प्रशमपयसा सिक्की पुक्कि तपथरणद्र मा 
यदि पुनरक्षों प्रत्यासत्ति प्रकोपहविश्वु जो 
मजति लमते मस्मीमाव॑ तदा विफलोदपः ॥४६॥ 
३१ मात्रा सवेया | 
जब मुनि कोइ बोई तप तरुबर; उपशम जल सोचत चितख्तेत । 
उदित ज्ञान शाखा गुण पह्कलव; मंगल पहुप मुकत फलहेत॥ 
तब तिहि क्रोध दवाचल उपजत, सहामोह दल्ल पचन समेत | 
सो भस्मंत करत छिन अंतर, दाहत विरखसहित मुनिचेत॥ ४६ ॥ 
*  शादूलविक्रिडित । 
संताए॑ तनुते मिनत्ति विनय॑ सौहादधुत्सादय- 
त्युदं गं जनयत्यवद्यचन सते विधत कलिस | 
कीर्ति कुन्तति दुर्मति वितरति व्याहन्ति पुएयोदय 
दत्त यः कुगतिं स हातुमु॒ुचितों रोष: सदोष सतास ॥ 





चनारसीवितञास ४१ | 





न्‍्क दि हसन 2५ ढक 2० #> ३ 





कसतुछन्द | 
कलह संडन कलह मंडन करन उद्व ग । 
यशखंडन हित हरन, दुखविल्ापसंतापसाधन ॥ 
दुरबेन समुच्चरन, धरम पुण्य मारग-पिराधन । 
विनय दमन दुरुगति गन, कुमति रप्न गुणलोप। 
ये सव लक्षण जान भ्रुनि, वजहि ततक्षण 'कोप | ४७॥ 
यो धमम दहृति द्र म॑ं दव हयोन्मआति नीति लतां 
दन्तीघेन्दुकल्ं विधु तुद इव क्लिक्षाति कीर्ति नृणास | 
स्वाथ वायुरिवाम्बुदं विघयत्युन्नासपत्यापद॑ 
तृष्णां धर्म इबोचितः कृतकृपाल्लोपः स कोपः कथपम्‌ ।४८। 
परपद । 
कोप धरम धन दंहे, अगनि जिम पिरख षिनासहि। 
फोप सुजस आवरहि, राहु जिम चंद गरासहि॥ 
कोप नीति दलमलहि, नाग जिम लता बिहंडहि । 
कोप काज सब हराहे, पवन जिम जलधर खंडहि ॥ 
संचरत कोप दुख ऊपजे, वढे ठृषा जिम धूपमहें | 
करुणा विज्ञोप गुण गोप जुत, कोप निषेध महंत कहें॥| ४५॥ 
मानाधिकार, 
मन्दाक्रान्ता 
यस्मादविर्भवति वितर्तिदु स्तरापन्नदीनां 
यश्मिव्शिशमिरुचितगुणग्रामनामापि नास्ति | 


| रयारयल्‍रिए की करी कटी ेरीपकीपिली चती १जी अमर ६ उन्‍म १८०५3 ०८ 
जयन लक नमन ऊन अननन-नकऋनन-न कम पा ++त--न 





ः [धर बनारसी विज्ञास 


# 
जि सशशिनिमिनिशीनीनीजअक की जी 3 न॒॒॒रंबबज भरी एभकमकपाा काका काका कफ कक का भापनकाकमकाफ न्कग्कभ क ग्हम कान कांगपपकपागकाप कन्या कम कर पक न कम कम्का मकान कक तक 
सर ७ वही पट पारी हरी बज जी उन चिट कही का पा चिकरीजरी। न्‍क्‍तनयूशीन्‍ी करी पाती करी आान्‍ स्‍का वा कर. चेक वही वरना पार पा सकी पारी अमर सही चाही "पक चाहटय पिल्‍री चढ चाही हट. पक भार िढ पड डर उप शा कर पक पेड पक चिट पक २ पढ़ पिया री जाम 


यश्र व्याप्त' वहति वधधीधृम्थया क्रोधदार्य 
त॑ मानाद्िं परिहर दृरारोहमोचित्यवृत्त ॥४६॥ 
(मात्रा ३१ ) स्वेया । 
जांदै निकसि विपति सरिता सब; जगमें फैल रही चहुँ ओर । 
ज्ञाके ढिंग गुणप्राम नाम नहिं, माया कुमतिगुफा अति धोर॥ 
अहँवधबुद्धि धूमरेखा सम; उदित कोप दावानल जोर! 
सो अग्रिमान पहार परंतर, तजत ताहि सर्वेत्षकिशोर ॥४४॥ 
शिखरिणी । 
शपालानं मदन्विमलमतिनाड़ी विधटय- 
न्करन्‍्दुवोस्पांशट्करमगणपज्ञागमतणिम्‌ । 
भ्रमन्न वर्या स्पेरें विनयवनवीर्थी विदलयन्‌, 
जन क॑ नानथे जनयति मदान्धो द्विप इंच ॥४ ०॥ 
रोडक छन्‍्द | 
भंजहिं उपशम थंभ; सुमति जंजीर विहंडहि । 
कुबचन रज संग्रहहिं: विनयवनपंकरति खंडहिं ॥ 
जअगमे फिरहिं स्वछन्द; वेद अंकुश नहिं मानहिं। 
गज ज्यों नर मदअन्ध; सहज सब अनरथ ठानहिं ॥(था 
शाइलविक्रीडित । 
ओऔचित्याचरणं विलुम्पति पयोवाह नमस्वानिव 
प्रध्यंस विनय नयत्यहिरित्र प्राणस्पृशां लीवितस | 


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चनारसीविल्ञास ४३ | 





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कीर्ति करपिणीं मतद्भज हव प्रोन्मूलपत्यञ्सा 
मानो नीच इगीपकारनिकर हन्ति त्रिवग नृणाम्‌ ॥४ १॥ 
करिखा हन्द | 

मान सब उचित आचार भंजन करे; 

पवन संचार जिम धन बिहंड॒हि। 
समान आदर तनय विनय लोपे सकल; 

भुुजंग विष भीर जिम मरन मंदहि ॥ 
भानके उद्त जगमाहि बिनसे सुयश; 

हुपित मातंग जिम कुमुद खंडहि। 
मानकी रीति बिपरीति करतूति जिम; 

अधमकी प्रीति नर नीत छोद॒हिं॥ ५१३ 


बसन्ततिलका | 
मुष्णाति यः कुतसमस्तसमीहिताथ 
संजीवन पिनयजीवितमद्भमाजास्‌ | 
जात्यादिमानविषज विषम पिकार 
त॑ मार्दबामृतरसेन नयस्व शान्तिम॥ ५४२ ॥ 
( मात्रा १५ ) चोपाई | 


मान विषम विषतन संचरे। विनय विनारें वा” , 
कोमल गुन अमृत संजोग | बिनशे मान विषस 


अमइरयकामप#न्पाकत गगन अर #. 





[ ४४ वनारसीविलास 


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साय २७ ५००७ २० सा»... पाती काओं- अर हम मा जय भर 2 जय 2 न क बन सन मानएछ न. 


मायाधिकरर, 
मालिनी । 
कुशलजननवन्ध्यां सत्यतरयास्तस॑ध्यां 
कुगतियुवतिमालां मोहमातइशाज्ञाम्‌ । 
शमकऋपलहिमानी दुय शोराजधानीं 
व्यमनशनसहायां दरतो मुख्य माय।म्‌ ॥३३॥ 


रोडक छन्‍्द । 
कुशल जननकों बवॉम) सत्य रबिहरन सांमथिति। 
कुगति युवति उरमाल; मोह कुंजर निवास छिति।॥ 
शम वारिज हिमराशि, पाप स्तांप सहायनि। 
अयश खानि जग जान; तजहु-माया दुख ढायनि॥ ५३॥ 
उपेन्द्रवज्ञा 
विधाय मायां विवियेर॒पायें। परस्य ये वश्चनमाचरन्ति । 
ते वश्वयन्ति त्रिदिवापबर्गतुखान्महामो हसखाः स्वमेद ॥४४॥ 
वेसरि छन्द । 
मोह संगन साया सति संचहि। करि उपाय औरनको बंचहि ! 
अपनी हानि लखे नहिं सोय | छुगति हरे झुगति दुख होय॥शशा 
वंशस्थविलम्‌ । 
मायामविश्वासविल्ञासमन्द्रि 
दूराशयो यः कुरुते घनाशया । 





बनारसीविलास ४५ | 


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सोउनथंसाथ न पतन्तमीक्षते 
यथा विडालो लगुड पय) पिषन्‌ ॥ ५४ ॥ 
पद्धारे छन्‍्दे । 
माया अविश्वास पिलास गेह | जो कर्राह मूह जन धन सनेह | 
सो कुगति बंध नहि लखे एम । तजि भय बिल्ञाव पय पियत जेम ॥५५॥ 
वसन्ततिलका । 
मुग्धप्रतारणपराय ण मु जिद्दीते 
पत्पाटव कपटलम्पटचित्तवृत्त । । 
जीय स्युपप्तमवश्यमिहाप्यक्व्ा 
नापथ्यमोजनमिवामयमापती तत्‌ ॥ ५४६ ॥ 
जभानक हन्द | 
ज्यों रोगी कर कुपथ; बढ़ावे रोग तन। 
स्वादलंपटी भयो, कहे मुझ जनम धन ॥ 
त्यों कपटी करि कपट; मुगधकों धन हरहि । 
करहि कुगतिको बंध; हरप मनमें धरहि।॥ ५६॥ 
लोभाधिकार, 
शादूलविक्रीडित । 
यह गामटवीमटन्ति विकटट क्रामन्ति देशान्तर॑ , 
गाहन्ते गहन॑ सप्ुद्रमतनुक़ शां क्ृपिं कुपते | 
सेवन्ते कुपणं पति गजधठ/संघडदु!संचरं 
सपेन्ति प्रधनं घनान्धितपियस्तन्नो मविस्फूनितम्‌ | ५७॥ 


न्न्य्ल््य्य्ल्य्न्ल्ल््ल््स्ल््च्ज्ल्ल्-ल्लल्िल्त्सटनसिस िीिटीपलीयर जन पे. 


( बह पक उकत या पत पेधरी- जात सारी एक यहा करी हा चिपक फटी करी कर पारी. उरी पक पिन पक पा जार परी ३ परी चाही चाही जारी कामी पिक्‍री चाह फेक घन कह 





४६ ] वनारसीधिलास 





मबहरण । 


सहै घोर संकट समुद्रकी तरंगनिमं; 
कंपे चितसीत पंथ; गाहै बीच बनमें। 
ठाने कषिकर्म जामें; शर्मकी न लेश कहें; 
, संकलेशहूप होय; जूक मरे रनमें ॥ 
तजे निज धामको विराम परदेश धाबे; 
सेवे प्रभु ऋपण मत्तीन रहे मनमें। 
डोले धन कारज़ अनारज मनुज मूह; 
ऐसो करतृति करे; लोभकी लगनमें ॥ ५७॥ 


मूल मोहबिपद्‌ मस्य सुकृताम्भोराशिहुम्भोड्धवः 

क्रोधाप्त ररशिः प्रवापतरणिप्रच्छादने तोयदः 
क्रीडासभकजेविवेकशशिनः स्वमोनुरापत्दी 

सिन्धुः कीतिलताकलजापकलभो लोभ! प्राभूयताम्‌ ।१: 


पूरन प्रताप रबि, रोकिवेकों धाराधर; 
सुकृति समुद्र सोखिवेको कुम्भनंदहे । 
कोप दव पाधक जननको अरणखि दारु; 
मोह विष भूरुहको; महा दृह कंद है ॥ 
परस विवेक निशिमणि ग्सिवेको 
कीरति लता कलाप; दलेन गयद्‌ हे | 
कलहकी केलिभौन आपदा नदीको सिंधु, 
ऐसो लोभ याहूको विपाक दुख हद है॥ १ह॥ 
_ 


बनारसीबिलास ४७ ] 


कलम न नी न नननननमनननननमन+« ५ «+-+++++नन-ककन-नननकनन-ननननन- ५ «+«७+3नन ५ १७५»७७न«नक पा लय पनिनननीिनन न नमन मन न लननन न तन >> > नल «न ननननन+ नमन ननननन+ननन वन नल न नम न सन नाक कननन तन न पल न्‍पनन- न त जम. 
सपा सकरी खत पाटनी ३ वि ३# ६० की परी परी ७ पानी पेइरि पार पट, फटी पिकारी पवार रह पहली पका पिन पारी थक पेड पिन पेड पड की चेक देह पक ९.१ पेय रिया चेक १० फटी एमी चाह” पेधन्‍ रही परी पी. थाह'. पक. पेड पारी कर पक. हट पक २०० सकी १रिक नेहन्‍र कक. 


वसंततिलका । 
निःशेषधमेषनदाहविजम्भमारे 
दुःखोधमस्मनि विसपदकीतिपूमे | 
बाद धनेन्धनसमागमदीप्यमाने 
लोभानले शलमतां लभते गुगोष! ॥ ५६ ॥ 


परम धरम वन दहै, दुरित अंबर गति धारहि। 
कुयश धूम उद्गरे; भूरि भय भस्म विथारहि॥ 
दुख फल्नंग फुंकरे; तरल तृष्णा कल काइहि। 
धन इंधन आगम; सेजोग दिन दिन अति बादहि ॥। 
लहलहे लोभ पावक अबल; पवन मोह उद्धत बहै। 
दज्माहि उदारता आदि बहु; गुण पतंग केंवरा कहे ॥ ५६। 
शादूलविक्रीडित । 
जातः कल्पतरु। पुरः सुरगवी तेषां प्रविष्टा गृह 
चिन्तारत्ननुपस्थितं करतत्ले प्राप्तो निधिः संनिधिम्‌ । 
विश्व' वश्यमवश्वमेव सुलभाः स्वगोपबर्गश्रियो 
ये संतोषमशेषदोपदहनध्व॑साम्गुदं विश्रते || ६० ॥ 
( ३१ मात्र ) सबंया। 
विज्ञस॑ कामघेनु ताके घर; पूरे कल्पवृत्त सुखपोष । 
अखय भंडार भरे चिंतामणि; तिनको सुलभ सुरंग औ मोष ॥ 


ते नर स्ववश करे त्रिभुवनको; तिनसों विमुख रहे दुख दोप | 
सबे निधान सदा ताके हिग; जिनके हृदव बसत संतोष ॥ ६७॥ 


उमया पार फानिपेकपकरी चृकियात परत सकी चूत अकयत फ पक बात परी पक कक यम पका पक सिकरकिबा कक इक 





कट फ चिट भारियारी इत सर जय जानिये कारक करन. 


[ ४८ वनारसीबिल्लास 


५३९० कन्‍प१क्‍८. 
2रीकरत करी कम ४433 








२८३. कमी परी परमार ९० न्‍र पापी +* पाप पैदा पे. पेज परी री पट पा यिवी पक न्‍क पकी कट पक हर पर यपत पक यह" 


सजनाधिकार, 
शिखरिणी । 
बर॑ लिप्त: पाणिः कुपितफरिनो वक्रकुदरे 
बर॑ भम्पापातो ज्वलदसनकुएडे विरचितः । 
वर प्रासप्रान्त! सपदि जठगन्तरविनिहितो 
न जन्य॑ दोजन्यं तदपि विपदां सक्न विदुप! ॥६ १ 
( १६ मात्रा ) चापाई। 
बरु अहिबदन हत्थ निज दारहिं। अगनि कुंड तनपर जाएहि। 
दारहिं उदर करहि विष भक्षन । पे हुष्टता न गहृहि विचक्षन ॥६१॥ 
वसन्ततिलका । 
सोजन्यमेव विदधाति यशभ्षयं थे | 
स्वश्रेयसं व विभव॑ च मवत्षयं च। 
दौज॑न्यमावहसि यत्वुमते तदथंग्‌ 
धान्येष्नल लिपसि तजलसेकसाध्ये ॥ ६२ ॥ 
मत्तायन्द ( सबेया )। 


ज्यो ऋषिकार भग्रों चितबातुल; सो ऋषिकी करनी इस ठाने। 
वीज बंबे न करे जल सिंचन; पावकर्सों फत्को थल भानें || 
त्यों कुमती निज-स्वास्थके हित; दुर्जेनमाव हिये महि आने । 
संपति कारन वंघ विदारन; सज्जनता छुखमूल न जानें ॥ ६२॥ 


#*गकक+गहण्णू+पुम्माएशध्यकन कथा कण पकम्कमंकमकमइाम्कग्गकपपमपाफा कम संध्या“. “न. + न» नल ननीमनिनिवीीवीमिीकीी स्ज्न्ज्म्ज्म्य्म्ज्म्म्म्म्म््ज्स्स्य्स्य्स्य्य्स्स्ल्््््---- 5 शक शीट अमल पीला 
हर पल पिया पेय तर पी पक पहल फीचर सह फे मम ३. कर फहकह ५ यिकर हर" "जन 





चयीीफत परी पा कलनिली पट कक पक्‍र कीच. 


बनारसीबिलास .. +- ४६] 


प्रथ्वी । 
बर॑ विभववन्ध्यता पुजनभावभाजां नृणा- 
मसाधुच रितात्रिता न पुनर॑जिता; संपद) । 
कृशत्वमपि शोभते सहजमायतो सुन्दर 
-विपाकविरसा न तु श्वयधुसंभवा स्थृूलता || ६३ ॥ 
आभानक छन्द । 
वरु दरिद्रता होड, करत सज्जन कला । 
दुराचारसों मिले, राज सो नहि भत्ता ॥ 
ज्यो शरीर इश सहज; सुशोभा देत है। 
,.. सूजी थूलता बढ़े, भरनको देव है ॥ ६३ ॥ 
शादू लकिक्रीडित | 
न ब्रते परदूषणं परगुणं पक्‍्त्यल्पमप्यन्वहं 
संतोष बहते परद्विंषु परावाधासु धत्त शुचम । 
स्वक्ाधां न करोति नोउ्कृति नयं नोचित्यमुन्नद्धय- 
ध्युक्कीउप्यप्रियमंत्षमां नें रचयत्येतचरित्रं पताम ॥६४॥ 
पटपद । 
नहिं जंपद्दि पर दोष, अल्प परगुण बहु मानहि। 
हंदय धरहि संतोप , दीन लबि करुणा ठानहि।॥ 
उचित रीति आदरहि, विमल्ल नय नीति न छंदहि। 
निज सलहन परिहरहि , राम रचि विपय विहंडहि॥ , 
मंडहि न कोप दुरबचन सुनि, सहज मधुर धुनि उच्चरहि। 
कहि 'कबरपाल” जग जाल बसि, ये चरित्र सल्नन करहि॥६४॥ 


अप 4० 29 ढक अ 

















[ ४८ वनास्सीविज्ञास 


कर. कण 7० /7० /#० /०;.# **.#नय.2म,>१०३००.#ग०३१ ११७०० /०१/#१.#०९/००९./०० ५.३०. ७९०० #गए.##न #. की री के पर की 





गुणिसंगाधिकार । 
धर्म घस्तदयों यशरच्यत्नयों वित्त' प्रमत्तः युपा- 
न्क्वाव्यं निष्प्रतिमस्तपः शमदमेः शुल्योउल्यमेथः भ्रवमो 
वस्त्वालोकमलोचनश्व॒ल्मना ध्यानं च वाज्छत्यतो.. 
य+ सड्ढ' गुणिनां विश्युच्य विमति; कल्याणमाकांतति॥ 
मन्तगयन्द ( सेवा ) 
सो करुणाविन॑ धर्म विचारत; नेन बिना लखिवेको उमाहै 
सो दुरनीति धरे यश हेतु, खुधी विन आगमको अबगाहै॥ 
सो हियशून्य कवित्त करे, समता बिन सो तपसों तन दाहै ! 
सो थिरता विन ध्यान धरे शठ, जो सत संग तजे हित चाहै ) 
हारिणी 
हरति कुमतिं भिन्‍्ते मोह करोति विवेकितां 
वितरति रति छते नोति तनोति विनीतताम । 
प्रथयति पशों धत्त धर्म व्यक्षेहतति दुर्मतिं 
जनयति नृणां कि नामीश्' गुणोत्तमसंगमः ॥ ६६ ॥ 
घवाक्षरी 
कुमति निकंद दोय महा मोह मंद होय; 
जंगमगे सुयश विवेक जगे हियसों । 
नीतिको दिढ़ाव होय विनेकी वढाव होय; 
उपजै उछाद ज्यों प्रधान पद लियेसों॥ 
धर्मकों प्रकाश होय दुर्गेतिकों नाश होय; 


न _निशनिममिभम आकलन नल मल न पहला नम नी 22 3-बाक बी बी-3.2-434%44ल्‍4.9.ी.4.ह०4:»4०+0+थय+वदििय मी कम 4 -कीट-# वीक जम खाट... उसका हर खान ही नाम डनफामनयान-.. नही, डे 





चनारसीबित्ञास ५१ | 
बरते समार्थि ज्यों पियूष रस पियेसों । 
तोप परि पूर होय; दोष दृष्टि दूर होय, 
एते गुन होहिं सत-संगतिके कियेसों ॥ ६६॥ 
शादूलबिकरीडिव., 
लब्धु' बुद्धिकलापमापदमपाकतु विहतु पंथ 
प्राप्तु' कीतिमसाधुतां विधुवितु' धरम समासेषितुम | 
रोडू' पाप्विषाकमाकशयितु' स्वगोपवर्ग्नियं 
चेल॑ चित्त समीहसे गुंणवर्तां सड़' तदज्जीकुरु ॥९७॥ 
कु डलिया। | 9 
' कौरा ते मारग गहे, जे गुनिजनसेबंत ! 
ज्ञानकल्षा तिनके जगे, ते पावहिं भव अंत ।| 
ते पावहिं भव अंत, शांत रस ते चित धारहि। 
ते अघ आपद हरहि, धरमकीरति विस्तारहि॥ 
होंहि सहज जे पुरुष, गुनी वारिज के भौंरा । 
ते सुर संपति लहेँ, गहँ ते मारग 'कोंरा!॥ ६७॥ 
हारिणी 


| 
हिमति महिमाम्मोजे चए्डानिलत्युदयाम्बुदे 
. हिरति दयारामे क्षेमज्ञमाभृति वज्ञति। 
समिधति कुमत्यम्नौ कन्दत्यनीतिलतातु यः 
- किममिलपतां श्रेषः श्रेयान्स निगु णिसंगमः ॥ ६८॥ 
पपटद्‌ | 


जो महिमा गुन हनहि, तुदिन जिस वारिज बारहि॥ 
जो प्रताप संहरहि, पवन जिम मेघ विडारहि॥ 





[ ५२ बनारसी विज्ञास 








जो सम दम दलमलहि, दुरद जिम उपचन खंडहि। 

जो सुछेम छुय करहि, वदञ्न जिस शिखर विहंडाहि। 

, जो कुमति अप्रि इंपनसरिस, कुनयलता दृ8 मूल जग । 
सो दुश्संग दुख पु कर, तजहि विचच्षणता सुमग | ६८॥ 


इन्द्रियाधिकार | 
शादू लविक्रीडित । 
आत्मान॑ कुपथेन निर्मेमायतु' यः शुकलाश्रायते 
/ऊत्याकृत्यविवेकबी विततहतों यः कृष्णसपयते ! 
य। पुणयद्रमखएडखएडनविधो स्फूरजरकु ।रायते 
तें लुपबतमुद्रमिन्द्रियगर्ण जला शुभयुभव॥ ६६ ॥ 


हरिगीतिका | 
जे ज़गत जनकों कुपथ ढारहिं, बक्र शिक्षित तुरासे। 
जे हरहिं परम विवेक जीवन, काल दारुण उरगसे ॥| 
जे पुण्यवृत्तकुठटार तीखन, गुपति ब्रत मुझ करें। 
ते करनसुभट प्रहार भविजन, तब सुप्तारग पग घरे॥ ६६;॥ 
शिखरिणी। 
प्रतिष्ठा यक्मिष्ठां नयति नयनिष्ठां विघटय- 
त्यद्रन्पेष्वाधततों मतिमतपसि प्र,म तमुंते | 
विवेकस्योत्सेक॑ विद्लयति दत्त' व विपद॑ 
पद॑ तहोषाणां करणनिवुरुम्॑ कुरु बशे ॥ ७० ॥ 


अष्कन्‍तक/.. ५५०२ /2 के री /टरथ अन अरिष्जलक ० अत बरी: कद सीन न्‍र.ह०- हब है+2 38:20 टोपी गया पताक करार का +न्‍ चर कीबक5जए वजन 5 पाप यकाधभम राय २3 ८२)नर ८2१/३०,क्‍२० ८४१९८ पेइह-/#०गे:प#०%/क /१९८३० 7०६६ था, ८० /१३/०४/ धन 5#क (के आ 
(रमन अपन कपननक पल कान ताक > ०. स्‍ककनल«क ७ न+अननपपथवफअनकलन, 





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चनारसीबिलास ४३ | 
घनाक्षरी । 
ये ही हैं कुगतिके निदानी दुख दोष दानीः 
इनहीकी संगतसो संग भार बाहिये | 
इनकी सगनतासों विभोकों विनाश होय, 
इनहीकी प्रीतसों अनीत पन्‍थ गहिये | 
ये ही तपभावकों विडारे दुराचार धारै, 
इनहीकी तपत बिवेक भूमि दहिये | 
ये ही इन्द्री सुभट इनहि जीते सोई साधु, 
इनको मिलापी सो तो महापापी कहिये || ७० ॥ 
» . शादलबिक्रीडित। 
धत्तां मोनमगारमुज्क्तु विधिप्रागल्म्यमम्पस्पता- 
मस्लन्तगंणमागमश्रममुपादत्तां -तपत्तपपताम । 
श्रेय: पुजनिकुजमञ्ञनमद्दावातं न चेदिन्द्रिय- 
त्रातं जेतुमबेति भस्मनि हुत॑ जानीत स्व ततः ॥७१॥ 
' प्रकेया | 
मौनके बरेया गृह त्यागके करया विधि 
रीतके सधया पर निलासों अपूठे हैं। 
विद्याके अभ्यासी. गिरिकंदराके बासी शुचि 
अंगके अचारी द्वितकारी बन बूठे हैँ । 
आगमके पाठी मन लाय महां काठी भारी 
कष्टके सहनहार रामाहुसों रुठे हैं| 
१ छूठे-पाठ भेद है। ! 


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[ ५४ चनारसीबिलास 


विकसित फिर परी ५ 








इत्यादिक जीव सब कारज करत रीते, 
.. इन्द्रिकके जीते बिना सखंग झूठे है ॥ ७१॥ 
शाइल बिक्रदित । 
धमध्य॑सधुरीणमश्रमरसावारी ग॒मापत्रथा- 
लड्ड॒मीणमशर्म निमितिकलापारीणमेकान्ततः । 
सर्वान्नीनमनात्मनीनमनयात्यन्तीनमिष्टे यथा - 
कामीन कुपथाध्वनीनमजयज्न्ोधमत्ेममाक्‌ ॥७२॥ 


सकया | 
धमंतरुभंजनको महा मत्त कुंजरसे 
आपदा भंडारके भरनको करोरी हैं। 
सत्यशील् रोकवेको पौढ परदार जैसे; 
दुगेतिके मारग चलायवेकों धोरी हैं ॥ 
कुमतिके अधिकारी कुनेपंथके विहारी; 
भद्रभाव इवन जरायवेकों होरी है। 
सृषाके सहाई दुरभावनाके भाई ऐसे 
विषयाभिलाषी जीव अघके अघोरी हैं। ७२॥ 
कमलाधकार | 
शादूल विक्रोडित । 
निम्न गच्छति निम्नगंव नितरां निद्र व विष्कम्मते 
चेतन्यं मदिरिषर पृथ्यति मद धृम्येष प्त उ्धताम। 
चापल्य॑ चपतषेव चुम्पति दवज्वालेव तृष्णां नय- 


हब 4. 


ट्युल्लासं कुलटाइनेव कमला स्वेर॑ परिभ्राम्यति॥७३॥ 


आ2%.०#+»-] 











बनारसीबिलास 


मत्तगन्द छन्‍्द । 
नीचकी ओर हरे सरिता जिम, धूम बढ़ावत नींदकी नाई। 
चंचलता अघटे चपला जिस, अंध करे जिम घूमकी भाह॥ 
तेज करे तिसना दव ज्यों मद; ज्यों मद पोषित मूहकी तांई। 
ये करतूति करे कमला जग; डोलत ज्यों कुलटा विन सांई॥ 
शादूलपिक्रीडित । 
दायादाः स्पृहयन्ति तस्करगणा मुष्णन्ति भ्मीश्रुजो 
गृहन्ति च्छलमाकलय्य हुतअुग्भस्मीकरोति क्षणाव। 
अम्भः प्लाचयते जितो विनिहितं यज्षा हरन्ते हठा- 
हू इत्तास्तनया नयन्ति निधन धिबहधीन॑ धनम्‌॥७४॥ 
सवेया । : 
बंधु विरोध करे निशवासर, दंडनकों नरबै छल जोगै। 
पावक दाहत नीर बहावत, हो धृगओट गिशाचर ढोबे ॥ 
भूतल रक्षित जक्ष हरे करके दुरभ्रत्ति कुसंतति खोबे। 
ये उतपात उठे धनके डिग; दामधनी कहु क्‍यों सुख सोबे || ७४॥ 
शादलविक्रीडित । 
नीचस्पापि चिर॑ चूटूनि रचयन्त्यायान्ति नीचेनतिं 
शत्रोरध्यगुणात्मनो5पि विदधत्युच्चेनु सोत्कीतेनम्‌ ! 
निर्वेद॑ न विदन्ति किंचिदक्ृतज्ञस्थापि सेवाक्रमें 
कृष्टं कि ने मनस्विनोंइपि मनुजा। कुबोन्ति विचार्थिन!॥ 
१. राजा । 


|... ीफबीग्नाद 








[ ४६ बनारसीबिल्ञास 
घवाक्षरा । 
नीच धनवंत्त ताहि निरल असीस देय; 
बह न विल्ोके यह चरन गहत है। 
बह अकृतज्ञ नर यह अज्ञताको घर 
वह मद लीन यह दीनता कहत है | 
बह चित्त कोप ठाने यह वाको प्रभु माने, 
वाके कुबचन सब यह प सहंत है | 
ऐसी गति धार न विचार कछु गुण दोष; 
अरथामिल्ापी जीव अरथ चहत हे ॥ ७४५ ॥ 
शादू ल विक्रीडित । 
लक्ष्मी: सपेति नीचमशव्॒गयः सद्भादिवाम्मोंजिनी- 
संगगोदित्र कए्टकाकु लपदा न क्रापि धत्त पदसू | 
चेतन्यं विपसंनिभेरिष नृणाग्रुज्ञासयत्यज्ञमा 
१ (6 « गुर्णि' ९ मर 
धर्मस्थाननिषोजनेन गुशिमिग्राद्च' तदसपा। फहमू॥४ 
सबेया । 
नीचहीकी ओरको उमंग चले कमला सो; 
,... पिता सिंधु सलिलत्वभाव यादि दियो है । 
रहे'न सुथिर हे सकंटक चरन याको; 
._ बसी कंजमाहि कंजकोसो पद कियो है ॥ 
जाको, मित्रे हितसों अचेत कर ढारे ताहि; ५ 
विपकी बहन ताते विपकोसो हियो है। 
ऐसी ठगहारी जिन धरमके पंथढारी; हि 
करके सुकृति तिन याको फल लियो है | ४ | 
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[ 


चनारसीविज्ञास ४७ ] 
दानाधिकार: 

चारित्रं चिनुते-वनोति विनय श्ञानं नयत्युच्नतिं 

पृष्णाति प्रशम॑ तए- प्रसतयत्युन्मासयत्यागमस ! 





"९ ग्िीएर उरी पक पिन नि, 


* शुणयं कन्दल॒यत्यधं दलयति स्वर्ग दद्ाति क्रमा- 


ब्रियाणवियरातनोति निहित पाशे पदित्रे धनस्‌ ॥७७ - 
कपित्न 


चरन अखंड ब्लान अति उज्ल; पिनय पिंपेक प्रशा अमलान । 
अनघप सुभाष सुकृति,गुन संचय; उच्र अमरपद*+बंध विधान ॥ 
आयगमगम्य रम्द सपक्की- रुचि; उद्धत झुकृति पंथ सोपान | 
ये गुण प्रकट होंय विनके घट; जे नर देहि सुपत्तहि दान ॥ ७७॥ 


दारिद्रथ' न ।समीक्षते - नःमजते दोभोग्यमालम्मते 
नाकीतिंन' पराभेवो5मिलपते न ध्याधिरास्कन्दति ! 
देन्य॑ नाद्रियते दुनोति न दर! क़िन्नन्ति नेवापदः 
पत्ने थ्रो वितरत्यनथंदलन दाव॑ निदान श्रियाम्‌ ॥ ७८ 
पटपद | ह 
सो दंरिद्र. दल मत्रहि; ताहि हुभोग न गंजहि। ' 
सो न लहै अपमान; सु शो विपदा भयभ॑जहि'॥ 
तिद्दि न कोई दुल देहि, वाठु तन व्याधि न बड़ह३। 
- ताहि;.कुयश ,-परहरहि, सुमुख-दीनता न कदूहुइ ॥ 
' ,सो लदृदि उचपदजग्त महें। अप अनरथ नासह्ि सरव। 


कर 3. हनन.» विपणन /का-++अकथथ+9+नसलक8-क इक २७ ६५). 6५ल्‍३89+५०७+>+ साकनक ++.पसनकमन- न 3 ,मकहम-म+२-। कमथतनभका धान. अमजजअक+८०<++-ेब-नाक 


| श८ वनारसीविज्ञास 


न्‍ अंकल अ तन ५» मप+++ पक लानथम+-क «८ ऊऊ कक, 





कहे कं वरपाल सो धन्य नर, जो सुखेत वोचे दरव ॥७८॥ 
लक्मी; कामयते मतिम गयते कीर्तिस्तमालोकतते 
प्रीतिथ स्वति सेवते छुभगता नीरोगतालिड्भति। 
श्रेय/संहतिरम्युपेति बगुते स्वगोंपमोगस्थिति 
'क्रिवोब्ृति यः प्रवच्छति पुमान्पुएयाथ्थमर्थ निनम॥ 
सेया इकतीसा 
ताहिको सुबुद्धि बरे रता ताकी चाह करे | 
चंदन सरूप हो सुयश ताहि चरच। 
सुहाग पावे सुरंग समीप आधे, 
बार बार मुकति रसनि ताहि अरे ॥ 
ताहिके शरीरकों अलिंगति अरोगताई, . 
मंगल करे म्िताई ओति करे परचे। 
जोई नर हो सुचेत चित्त समता समेत, .' 
हेतको सुखेत धन खरतवे॥ ७६॥ 
मन्दाक्रान्ता 
तस्थासत्ता रतिरनुचरी दीतिरुत्करिठता श्री 
लिग्धा बुद्धि! परिचयपरा चक्रवर्तिलऋद्ि! । 
पाणों प्राप्ता त्रिदिषकमला कामुकी मुक्तिसंपतू_, 
सा््तेत्यां वपति विपुल॑ वित्तवीज॑ निज यः ॥ ८० || 
पद्मावती छन्‍्द | 


ताकी रति कीरति दासी सम, सहसा राजरिद्धि घर थावे। 
सुमति सुता उपजे ताके घट, सो सुरलोक संपदा पावे ॥ 





बनारसी विलास [ ४ 


ताको दृष्टि लखे शिव भारग, सो/निरबंध भावना भाषे। 
जो नरत्याग कपट 'कु वर कह, विधिसों सप्तलेत धन बाषे ॥८०। 
तपप्रभावाधिकार । 
) शादज्ञविक्रीडित । 

यत्यूवोजितकर्मशेलकुलिशं यत्कामदावानल- 

ज्यालाजालजलं यहुग्रकरणग्रामाहिपन््रात्रम । 
यतात्यूहतम/समूहदिवर्स यन्नव्यिलत्मीलता- 

मूल तदद्विपिध यथाविधि तपः कुबीत वीतरपृहट! ॥८ १ 

पटपद | 
जो पूरब कृत कमे, पिंड गिरदलन बजधर। 
जो मनसथ दव व्याल, माल सेंग हरन मेघमर ॥ 
जो प्रचंड ईंद्रिय सुजंग, थंभन सुमंत्र चर । 
जो विभाष संत्तम छुपुंज, खंडन प्रभात कर॥ 

जो लब्धि पेज उपजंत घट, तासु मूल हृढता सहित । 
सो घुतप अंग बहुषिधि दुविधि, फरदि पिद्ुधि घंछारदित ॥ ८१॥ 
यस्मादिप्नपरम्पत विषटते दास्यं सुराः बते 

कामः शाम्यति दाम्यतीन्द्रियगणः कल्याणसृत्सपेति । 
उन्मीलन्ति महर्इयः कलयति ध्वंसं वे यः कर्मों 

स्वाधीन त्रिदियं शिवं च भवति शाध्य॑ तपस्तन्न किस ॥ 

घनाक्षरी | । 


जाके आदरत भह्द रिद्विसों मिज्ञाप होय, ह 
भदन अध्याप होय कर्म घन दाहिये। 


& # व ७ 22००० ५२०५७०र++जन्थ 








[ ६० धनारसीविलास 


> ००५3 > ५०2 ० >->ज्>्य्य्य्स्प्ज्ण्स्ल्ज्ज्फ्फ्ज्सण्प्फसससस जप सच + तक वक १०9 _ अमममय4+भ- 3. आह कममममक...3. सारा पान "पक प७७०७++ पान मकान न मकान -आाा 9. 





विधन विनास होय गीरवाण दास होक; हैं 
शॉनिकों प्रकाश होय भो समुद्र थाहिये॥ 
हेवपद खैल होय मंगलसों मेल होय, 
इन्द्रेमिकीं जैल् होव मोखर्पथ गाहिसे ! 
ज्ञाकी ऐसी महिमा प्रकट कहे “कॉरपाल', 
तिहुलोके तिहुंकाल सो तप सराहिये ॥ परे ॥ 
क्ान्तारं ने यथेतरो ज्वलयितं दत्तो दवारिं विना। 
दावाप्रि न यथापरः शमयितुं शक्ती' विनाम्भोधरंगू | 
निष्णातः पवन बिना निरसितुं नान्‍्यो यथाम्भोपरं 
कर्मोर्ध तपसा पिना क्रिमपरो हन्तुं समर्थ॑स्तथा ॥८३ं 
मंत्तगयन्द । 
जौ वर कानन दहनकों दव: पॉंवकर्सों-नहिं दूसरों दीसे | 
जो दवआंग बुमे न ततत्ण; जो न अशख॑ंडित मेत्र बरीसे॥ 
जो प्रधटे नहि जौलग भारुत; तौलग घोर' घटा माह खीसे। 
त्यों घटमें तपवञ्ञविता हढ; कर्मकुलाचल और न पीस ॥छशे॥ 
श्ग्धरा। 
स॑तोपस्थुलमूल! प्रशमपरिकरसकन्धबन्धप्रपत्व! 
पश्चाचीरोधशाखः स्फुरदभयदलः शीलेसंपत्रवालः | 
श्रद्वाम्म/प्रसेकादिपुलकुलवलैश्रयंसीन्दय मो गः 
स्वगादिप्राप्तिपुष्पः शिवपदफक्तदः स्यातपःकल्पइुलः ॥| 


मा की | बम बज बसी रपये मी की ही # समचरी करण: हि 2 कं 
अयाओ. न 


हे न 
अधिक ७०... परमार बे. डक. कत.. बम बन जा अम्कममकमः बा का साफ... पाक... पे या भा, निर्मल पामनम«. धमम+ कक... कुक, का! 


बनारसी वि्ञास ६१]. 


वमआंमसकमकमाकगक् _शल्कनान्‍»बनना-आओककषमाी 0०४६ अ्नपैनशना. द0 जा 2०मरेए पाक. काका नह 55-२० ५ >> | के वानण+पवातक 
चाप रकम सक कव क परररकि अररिया धो २७ 2: करीयरीयरीजरि)। 


पदपद। ' 
सुदठ' मूंल संतोष; प्रशम गुन अबल पेड ध्र व । 
: पंचाचार छु शाख; शील संपति ग्रवाल हुब ॥ 
अभय अंग दलपुंज; देवपद पहुप सुमंदित | 
सुकृतमाव विस्तार; 'मावं शिव छुफल्ञ अ्रखंडित ॥ 
परतीत घार जल सिंच किय; अति उतंग दिन दिल पुषितः। 
जयबंत जगत. यह सुतपतरु; मुनि बिहंग सेवहिं सुखित ॥ ८४ ॥ 
' भावनाधिकार | 
“शदूल्विक्रीडित | 
नीरागे तरुणीकटालितमिव त्यागव्यपेतप्रभोः 
सेवाकष्टमिवोपरोपणमिवाम्भोजन्मनामश्मनि | 
' विष्वग्यपमिवोषरण्ितितले दानाहंदचोतपः- 
जाध्यायाध्ययनादि निष्फल्मनुष्ठान॑ बिना मावनाम्‌ ॥ 
पश्मार्ती छू ।.] 
क्यों नीराग ,पुरुषके सनमुख; पुरकामिनि कंटाज्ञ कर ऊठी | 
ज्यों धन त्यागरहित प्रशुसेवन; असरमें बरषा जिम छूठी ॥ 
ज्यों शिलमाहि कमलको बोवन, पवन पकर जिम बांधिये मूठी | 
थे करतूति होय जिम निष्फत्न; त्यों बिनमावक्रियां सब भू ठा ॥८५॥ 


संवे ज्ञीप्पति पुएयमीप्सति दयां वित्सत्यध॑मित्सांत 
क्रोध॑ दित्सति दानशीलतपरां साफल्यमादित्सति। 


«१०१. /(९५२८०६०९ /०/६ /९/ब.#९:+व मर जब नट 24 जे जम मं सात ८४ ८०८. [न 
विन... अनार +.. साल ऋकान++०० सम». 3 कक पैताज-.. डक थक... न १2 बनी >ननन सिवनी "यो अधनानन.॥ हरी. >& अयाकआ-५ 43७ ओ / नकल». अप न्‍टररज जप: उ१0४र८छ ०७ का सका / कारक का अक-पपापनम१८क० पदक. 


'[ ६२ चनारसीविलास 


कल्याणोपचयं चिकीप॑ति भवाम्भोघेस्तटं॑ लिप्सते 
मुक्निस्तीं परिरिप्सते यदि जनस्तद्भावयेद्धावनाम्‌ ॥८६ 
- ' घताक्षरी | 
पूरब करम दहैँं; सरवज्ञ पद ज्हे; 
गहै पुर्यपंथ फिर पापमें न आवना | 
करुनाकी कल्ला जागे कठिन कषार भागे; 
लञागे दानशील तप सफत्न मुहावना ॥ 
पात्र भवर्सिघु तट खोले मोक्षह्वार पट; 
शर्म साध धर्मकी धरामें करे धावना। 
एते सब काज करे अतखको अंगधरे; 
चेरी चिदानंदकी अकेली एक भावना | ८६॥ 
पृथ्वी । 
पिवेकबनसारिणीं प्रशमशमसंजीबनी 
भवाणपमहातरी मदनदावमेधावलीमू | 
चलाक्षमगवागुरां गुरुकपायशेलाशनिं 
विम्क्निपथवेसरी मजत भाषनां कि परे! ॥८७ 
सबेया इकतीता 
प्रशमके पोषेको अम्रृतकी धारातम; 
ज्ञानवन सींचवेकी नदी नीरभरी है । 
चैचता करण मृग वांधवेकों बागुरासी; 
कामदावानल नासवेको मेष भरी है। 











बनारसीबिलास ६३ | 


प्रवत्त कषायगिरि भंजवेकों बच्च गदा, 
भो समुद्र तारबेकी पौढी महा तरी है। 
मोज्षंपन्थ गाहवेकों वेशरी विज्ञायतकी, 
ऐसी शुद्ध भावना अखंड धार हरी है॥ ८७ ॥ 
शिखरिणी । 
घन॑ दत्त वित्त जिनवचनमभ्यस्तमखिलं 
_क्रियाकाएड चएड रचितमवनों सुप्ठमसकृत्‌ । 
तपस्तीवर' तप्त चरणमपि चीणें चिर॒तरं 
न चेचित्ते भावस्तुपवपनवत्सर्मफलम ॥८८॥ 
आभानक छन्‍्द । 
गहि पुनीत आचार, जिनांगम जोबना | 
कर तप संजम द्वान, भूमि का सोना ॥ 
' ए करनी सब निफल, होय बिन माबना ॥ 
ज्यों तुष बोए हाथ, कछू नहिं आवना ॥८८॥| 
वैरागापिकार । 
हारिणी। 
यदशुभरजःपाथो दप्तेन्द्रियद्िरदाड़ _शं 
कुशलकुमुमीयान॑ माधन्मन/कपिमृहुला | 
विरतिरमणीलीलावेश्म स्मरज़्वरमेषज॑ 
- शिवपथरथस्तद राग्यं विमश्य मवामयः ॥८ह 


[ ६४ बनारसी बिलास 


घाक्षत। , - 
अशुभता धूर हरवेकों -नीर-पूर सम, 
-बिमल विरत -कुल्बधू को -सुहाग है। 
-उद्ति मदन--जुर नाशवबेकों जुरांकुश, 
अक्षगज़ ' थैंभनकों अंकुशकों दांग है ॥ 
चंचल कुमन कपि रोकवेको लोहफन्द, 
<#शल ' कुसुम उपजायवेको “धाग है। 
सूधा मोक्षमारग चलायवेको नामी रथ 
ऐसो हितकारी भयभ॑जन विराग है ॥ ८६ ॥ 
बसन्त॒तिल्लका | 
चण्डानिलः रफ़ुरितमब्दचय दवाचि- 
वृज्ञत्रन्त -तिमिरमएडलमकंपिम्बस । 
चज्र' “महीभनिवह नयते - यथान्त 
-वैराग्यमेकसपि कर्म तथा समेग्रमू ॥ ६० ॥ 
० अभानक छन्द । 
ज्यों समीर गंभीर, घनाघन छय करे | 
बज्र विदारे शिखर, दिवाकर तम हरे ॥ 
ज्यो दव पावक पूर, दह बन्कुंजको। ., 
तयों भंजे चैराग, करमके पु जको ॥ ६० ॥ 
शिखरिणी | 
नमस्या देवानां: चरणवरिषस्या शुभगुरो- 
“स्तपस्था निःसीमक्मपदसुपास्या गुणवताम। 








बनारसीबिलास ६४ ] 


निषधारण्ये स्पात्करणदमपिधा व शिवदा 
विरागः क्राग/शषपणनिषुणो5न्तः स्फुर ति चेत॥ 
पग्मावती छन्द | 
कीनी तिन सुदेचकी पूजा, तिन गुरुवरणकमल चित ज्ञायो। 
सो बनवास बस्यो निशवासर, तिन गुनबेंत पुरुष यश गायो ॥ 
तिन तप लियो कियो इन्द्री दम, सो पूरन विद्या पढ आयो। 
सब अपराध गए ताकों तज, जिन वेरागरूप धन पायो॥ ६१ ॥ 
शाईलबिक्रीडित । 
भोगान्कष्णभुनज्ञभोगपिषमान्राज्यं रज/संनिम्म 
बन्पुन्यन्धनिवन्धनानि विषयग्राम॑ विषान्नोपसम्‌ | 
भूतति भूतिसहोदरां दणतुलं स्रैणं बिदिला त्यज- 
स्तेष्वासक्रिमनाविलो विलभते मुक्ति पिरक़: पुमान्‌॥ 
पनाक्षरी छन्‍्द । 
जाकों भोग भाष दीसे कारे नागकेसे फन, 
राजाको समाज दीखे जेसो रजफोष है। 


सूसे, 
पिप्रै सु् सौंजकों बिचारे विषपोष हे।॥ 
मे बिलोके दृढ दोष है। 
ऐसो जान त्यागे यह महिमा विरागताकी; 
| वाहीको बैराग सही ताके ढिग मोष है॥ ६२। 


डृति २२ अधिकार समाप्त | 














[ ६६ बनारसीविल्ञास- 


न+० 3.3». सरल काननननननननन-+ण ७०3७3 <म.-म-बन-43 ७७३७3 4७ »+>पनननगा 6 आ--ककाआ 





अथ उथदेश गाथां। 
' हपेन्द्रबज्ञा । 
जनेन्द्रपूजा गुरुपयु पासितिः सक्तयानुकम्पा शुभपात्रदानम । 
शुणानुरागः श्रुतिरागमस्य नृजन्भवृत्तस्प फलान्यमूनि ॥६३ 
मत्तगयन्द । 


“के परमेश्वरकी अरचा विधि, सो गुरुकी उपसर्पन कीजे। 
दीन विल्ञोक दया घरिये चित, प्रामुक दान सुपर्ताह दीजे ॥ 
गाहक हो गुंनको गहिये, रुचिंसों जिन आगमको रसे' पीजें। 
ये करनी करिये गृंह में बस, यो जंगमें नरभौ फर्ले लीजे || ६३॥ 


के हु शिखरिणी । है 8 ० की 
: प्रिस॑ध्यं देवाचो' विर्चेय च॑ ये प्रापय येशः 
श्रियः पात्रे बाप॑ जनय नयमार्ग तय सनः 
श्मरक्रोधाधारीन्दलय कफलय प्राणिएु दयां, 
जिंनो# सिद्धान्त भ्रेणु बृणु जवान्युक्रिकमलाम ॥ 
/ हरियीता छन्‍्द । 


जो करे साध 'त्रिकाले सुमरण, जांसे जगयश “िस्तरे। 
जो सुने, परमंनहि 'सुरुँंचिंसों, नीत मारंग पंग धरे॥ 
जो निरख दीन दया प्रभु जे, कार्मक्रॉंधादिक हरे। 

_ जो सुधन सप्त छुंलेत खंरचे, ताहि शिवसंपति बरे || ६४॥ 





ध्षतारसीवि्ञा् ६७ || 


 , शादलविक्रीडित 4 , . 
कृत्वाहत्पदपूजनं. यतिजन नत्वा , विदित्वागम, 
हित्वा सह्मधमंक्षमेठधियां पात्रेषु दच्या धनम्‌ । 
, गला पद्चतिम्ुतमक्रमजुपां ' निलास्तरारिजं 
, स्मृत्वा प्रनमस्तियां कुछ करक्रोडस्थमिष्ट' सुखमू ॥ 
. अल छन्द । ह 


देव पुजहि देव पूज्ि, रचहिं गुरु सेच।, 
परमागमरुचि धरहिं, तजहि दुष्टसंगत ततक्षण । 
गुणि संगति आदरहिं, करहिं त्याग दुभेत्ष भक्षण ॥ 
देहिं सुपात्रहि: दान नित, जपै 'पंचलवकार। ' , 
ये करनी, जे आचरहिं, ते पावे अवपारं॥ ६४॥ 
” हारिणी | रा 
'. असरति यथा कीतिदिज्ु , क्षपाकरसोदरा-.. *॥ 
भ्युदयजननी याति स्फीतिं यथा गुणसन्तर्तिः | 
फहायति यथा वृद्धि, परे! कुकमंहतिक्षमः..|, 
कुशलमुलमे न्याय्ये काये तथा पथि व्तेनम्‌ ॥६६॥ 
दीहा उन्‍्द | हा 
गुन'अरु धर्म सुयिर रहे, यश' अताप गंभीर । 
कुशल बृत्त जिम तद्द लहे, तिहि मारय चत्न वीर |॥ ६६ ॥ 
शिवरिणी । 
करे हाध्यस्त्यांगं+-शिरसि-ग़ुरुपादप्रणमनं- : 
मुखे सत्या वाणी श्रुतप्तधिग् ' च श्रवणयोः । 


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[ ६८ वनारसी वित्ञास 


हृदि सच्छा इत्तिबिंजयि झुजयोः पौरुपमहो- 
विनाप्येश्वयेंग प्रकृतिमहतां मणडनमिदम ॥६७॥ 
कवित्त छन्द । 
बंदन विनय मुकट सिर उपर, सुगुरुचचन कुंडल जुगकान। 
अंतर शत्रविजय भुजमंदन, मुकतमाल उर शुन अमत्ान॥ 
त्यांग सहज कर कटक विराजत, शोमित सत्य बचन मुख पान | 
भूषण तजहिं तऊ तन मंदित, यातें सन्तपुरुष परघान ॥ ४७॥ 
सादू लक्क्रीडित । 
बाब्छा सज्जनसंगमे गुरुजने ग्रांतिगु रोनश्रता, 
विद्याया व्यसनं स्वयोषितिरतिलोकापबाडुबं..। 
मक्तिय्राहति शक्षिरात्मदमने संस्गप्ुक्षिखले, 
यस्येताः परिणामसुन्दरकलाः छाप्यः स एवं लितो ॥६८॥ 
घनाक्षरी | 
गहें जे छुजन रीत गुणी सो निवाह प्रीत, 
सेवा साथें गुरुकी बिनेसों कर जोरकें। 
विदयाकों विसन धरें परतिय संग हें, 
दुजेनकी संगतिसों बेंठे भुल मोरके।॥ 
करें जे करन थिर उमंग बहोरकें। 
तेई जीव सुली होंय तेई मोल मुद्दी होंय, 
तेईं होंहि परम करम फनद तोरके ॥ ६८॥। 





घनारसीविलांस ह ६६ | 


९१००६, 





शादू ल्विक्रीडित | ि 
निन्‍्दां मुश्ष शमामतेन हृदय॑ रवं सिंच धंच बुध, 
सन्तोष॑ भज लोभप्रत्यृज जनेष्वात्मग्रशंसां त्यज । 
सायां वजय कर्म तर्जय यशः साधमिकेष्व्॑जय, 
श्रेयो धारय हंत वारयमद स्व संधृतेस्तारय ॥ ६६ ॥ 
धनाक्षरी । 
परनिन्दा त्याग कर भनमें बैराग धर, 
क्रोध मान माया लोभ चारों परिहर रे ॥ 
हिरदेगें तोष गहु समतासों सीरो रहु, 
धरमको भेद लहु खेदमें न पर रे ॥ 
करमको बंश खोय भुकतिको पन्‍्थ जोय, 
हु सुकृतिकी बीज बोय दुर्गतिसों ढर रे। 
नहिं तो सिधार तू निगोद तेरों घर रे॥ ६६ ॥ 
शआलस्य॑ त्यज श्रयोचममलं सेपरतव पादो गुरोः; 
दुष्पापानि वचांति शृत्यमखिलं जानीद्कृत्य॑ तथा । 
देव पूजय संघमचेय कृपामन्योपकार॑ तप्रो- 
दान॑ सत्ययचों भवाद्भयमयं पंथा ऋजु सदुगतेः ॥११०॥ 
2१ मात्रा सक्षेया छन्‍्द | 
आलश त्याग जाग नर चेतन, बल सेभार मत करहु विलंब । 
इहां न सुख लवलेश जगतमहिं, नि विरषसें लगे न अंब ॥ 
ताते तू अंतर विपक्ष हर, कर विलक्ञ तिम अक्षकदंब। 
गह गुन ज्ञान बेठ चारितरथ, देहु मोष मग सन्मुस्त बंब ॥१००॥ 


अशकथत-न अनमत्ञन्‍पसलननमथ+ &सनवनमम-तककतडअमप-न०भ८+३-पमपारववभ व ७-04- 23. पावना++>कप--++-माय काना, 4+कल-ाफ अनकमन्‍मप “फनी पक-नरक >नओ..अ>0कक+नज “कम्जम्ममप५न्‍्क, 


| ७० वनांस्सीवित्ञास 


मालिनी | 
अभजद॑जितदबाचायपट्टोदंयाद्रि-: * , 
/ चुमशिविजयतिंहाचार्यपादारबिन्दे । 
सधुकरसमतां यस्तेन सोमग्रभेण 
'व्यर्चि'मुनिपनेत्रा ्क्निमुक्तवलीयय । १०१ ॥ 
कवित्त छनन्‍्द । 
जैन वंश सर हंस दिगम्वर; भुनिपति अजितदेव अति आरज । 
ताके पद वादीमदर्भंजन;' प्रघेटे षिजयसेन आचारज॥। 
ताके पट्ट भये सोमग्रभ; तिन ये ग्रन्थ कियो हित कारज | 
जाके पढ़त सुनत अवधारत; हे सुपुरुप जे पुरुप.अनारज ॥१०१॥ 
विभिन्नप्रतियों में निम्नलिश्चित संस्कृत रोक और मिलते 
हैं पर इनका पद्यानुबाद नहीं मिलता। 
मबारण्य॑ गुक्‍्मा यदि जिशमिषुमु क्ि नगरीं 
तदानों मा कार्षोविष्यावपबृत्तेप बसतिम | 
यतशछाणाप्पषां प्रथयति महामोहमचिश- -  ._. 
' दय॑ जन्तुयस्मात्पद्मपि-न गन्तुं प्रति ॥ १-॥ 


पात्रे धर्म निबंधन॑ तद्ितरे श्रेष्ठ दया ख्यापक्ष, 

मित्र प्रीतिविवद्धंन रिपुजने 'पेरापहारच््म | ' 
भृत्ये भक्किधरावहं॑ नरपतो सन्मानसंपादक॑; 

भंद्रादो सुंपशेर्कर वितरण धंववाप्यहों निःफलं ।२।दानञ्,) 


३2 अमन पर पड चिट फिल्मी. 








(कफन-झ-क-क्‍क नल + बम + कली फल--+.33++२००-०७, 
कमी अर यकीफात सता सपिकामीकरी दघ पी सियी परत करत पे हे» 8 मत पीजी लीड 3. के बरीफिनीजर, 














बनारसीबिलास [ ७१ 


वनन्‍न्‍लओ न कक वे 2७2 ७. ७» पाक2ारकनक,. धर आफाक कार, 


यदि वहति हि दंड॑ नग्वहुड जवां ची। .,... 

यदि वसति गुहायां इच्तमूले शिल्रायां । ह 

यदि पठति पुराण वेद्सिद्वांततत्तं, 

यदि हृदयमशुद्धं सबेमेतन्नकिचित्‌ ॥| ३ ॥ (भावना भआ, ) 
यथा च सीद॑ति गुरुपदेशा।ः यथा न स्थु!पिशुनप्रवेशाः 
यथा थ धर्म सममुपेति वृद्धि प्रवत्तनीयं जे तथा मबड़ि! ॥७॥ 





सोमप्रभाचायमभा , थ. यंज्न एसां तेमः पंकमपाकरोति । 
तदप्यमुष्मिन्न पदेशलेशे निशम्यमाने निशमेति नाशं ॥५॥ 
पग्रन्थकत्तीकी ओरसे नामेदि 


दोहा छन्द.। 

नाम! सूक्षिमुक्तावली; 8/विशति अधिकार | 
शत शोक परमान सब; इति प्रन्थविस्तार॥ १॥ 
“कबरपाल वानारसी/” मित्र जुगल इकेचित्त 
तिनहिं प्रन्थ भाषों कियो; बहुविधि झन्द कवित्त ॥ २॥ 
सोलहसे इक्यानवे, ऋतु भीषम वशाख | -; - , 

| सोमवार एकादशी; करनछत्र .सित पाख ॥ ३॥ 

इति श्रीसोमप्रभाचायेवरुचिता सिन्दूरप्रकराप्रपयोया सूक्षिमुक्तावत्ी 


५ ,- भाषाहन्दानुवादसहिता सम्रात्ता। 


१ पाठ भेदः-सोम प्रभावायमसा घ ल्ोके ब॒स्तु प्रकाश कुरुते यथाशु । 
, तबायमुमैरुपदेशलेशः शुभोत्सवज्ञानगुणांस्तेनोति ॥ 











बनारसीविल्ञास 





अथ ज्ञान बापनी 


घनाक्षरी | 


ओंकार शब्द विशद्‌ याके उम्रयरूप, 

एक आतमीक भाव एक पुदगलकों | 
शुद्धता स्वभाव/त्ये उत्यो राय चिदानद, 

अशुद्ध विभाव ले प्रभाव जड़बलको ॥ 
त्रिगुण ब्रिकाल ताते व्यय भर व उतपात, 

ज्ञाताको सुहत वात नहीं ज्ञाग खत्को | 
“बन्तारसीदासजूके” हृदय ओंकारः वास, 

जैसो परकाश शशि पक्के शुकलको ॥ १॥ 
निरमल ज्ञानके प्रकार पंच नरलोक, 

तामें श्रुतज्ञान परधान करी पायो है । 
ताके मूल दोय रूप अक्षर अनक्षुरमें, 

अनक्षर अग्न पिंड सेनमें बतायो है ॥ 
बावन बरण जाके असंख्यात सन्निपात, 

तिनमें तप ओंकार! सजनसुहायों है । 
धानारसी दास' अंग दाद्श बिचार यामें, 

ऐसे 'ओंकार! कंठ पाठ तोहि आयो है ॥ २॥ 
महामंत्र गायत्री? के मुख अद्षरूप मंड्यो, 


आतम प्रदेश कोई परम प्रकाश है। 
3.>-.202.2........०००022222222:--:2------5:- 





बनारसीपिलास [ ७३. 





तापर अशोक वृक्ष छत्रप्वज चामर सो, 

पवन अगनि जलन चसे एक. चास है॥ 
सारीके अकार तामें रुद्र रूप चितवत, 

महातम महावृत तामें बहु भास है । 
ऐसो ओऑंकारः को अमूल चूल मूलरस, 

धवानारसीदासजूक” बदन विल्ञास है॥ ३॥ 
सिद्धरूए शिवरूप भेष अवभेषरूप, 

नररूप न्यायरूप विधिरूप बातमा। 
गुणरूप ज्ञानरुप ज्ञायक गंभीररूप, 

भोगरूप भोगीरूप सरस पुद्दातमा ॥ 
एकरूप आद्रिप अगम अनाद्रूप, 

असंख्य अनंतरूप जातिरूप जातमा। 
चानारसीदास' द्रव्यपूजा व्यवहाररूप, 

शुद्धता स्वभावरूप यहे शुद्ध आतमा ॥ ४॥ 
घुधवाउ हृदे भयो शुद्धता बिसरि गयो; 

परगुण रॉय रहो पर ही को रुखिया। 
निजनिधि निकट विक्रट भई मेन विन, 

ज्षण॒कमे सुखी तामें कणकमें दुखिया ॥ 
समकित जल बिना त्रषित अनादि काल, 

विषय फषायवहि अरणमें घुखिया । 
'बानारसीदास” जिन रीति विपरीति जाके... 

सेरे जानें ते तो नर मूढनमें मुखिया । 


'सनपकपअनय गला, 2/# 3० ०स७०१०#रजक हक. 


[७७ बनारसीबिलास- 


अनुभवज्ञानते निदान आनमान छूल्यो, 

सरधानवान बान छुट्टों द्रव्य करसे । 
करम उपाधि रोग लोग जोग - भोग राते, 

भोगी त्रिया योगी करामावहकी तरसे ॥। 
दु्गेति बिषाद न उछाह सुर भौनवास, 

समता सुज्षिति आतमीक मेघ बरसे । 
'बानारसीदासजूके? बदन रसन रस, 

ऐसे रसरसिण ते अरसको परसें ॥६॥ 
आवरण समत्त विसल-भयो ताके-तुले, 

मोह आदि -हने काहु काल गुनकसिया । 
लीन भयो लबलागी मगन विभावत्यागी,, 

ब्योतिके उदोत होत निज' गुन एसिया ॥ 
धानारसीदास' निज-आतम प्रकाश भये, 

आवेंते न जाहि एक ऐसे वासवसिया। 
अरस परस दस आदि' हींअनन्त जन्तु, 

सुरससवादराचे सोई सॉचो रसिया॥ ७॥ 
इस ही सुरसके, सवादी भये ते तो छुनौ, ( 

तीथकरचक्रवति शै्ञी अध्यावमकी। 
बल बासुदेव प्रति वासुदेव विदाधर, 

चारणपुनिन्द्र इन्द्र छेदी बुद्धि भ्रमकी ॥ 
अट्टावीस लवधिके विविध। सघेया साधु; 
सिद्धिंगति भये कीन्दीं सुगम अगमकी । 


स्ल्ल्स््््य्य्श्श्म्भ्य्श्लखच्ल्लंलचल्लनल् य्ल्् चलच्ँचयञ़ख्य््श््य्य््-ः 4:४०202 2 
विधा ीएामि.ी॑मिकिकधिए की हि#मीजाी आम कब 











चनारसीबित्ञास ७५ ] 


'वानारसीदास” ऐसो अमीकु'डपिंड पायो, 

तहाँलों पहुंच कालक्रमकी नः जमकी ॥ ८॥ 
इतर निगोदमें विभाव ताके बंहुरूप, 

तामें हू स्वभाव ताको एक अंश जाये है। 
चहे अंश तेजपु ज बादर अगनि-जैसें, 


' एकतें अनेक रस रसना बढावे है ॥ 
आगे जोर वह्यो प्राण चक्षु भोत्र नरदेह, 

देह देही मिन्न दीखे भिन्नता ही भावे है । 
धवानारसीदास” “निज आनको प्रकाश भयो, 

- शुद्धतामें वास किये सिद्धपद पावे है ॥ ६॥ 
जदे भयो भानु कोऊ पंथी उम्यो पंथकाज, 

कहे नेनतेज थोरोदीप कर चंहिये | 
कोऊ फोटीध्वज नृप छत्रछांह पुरतज, 

ताहि हौंस सह जाय ग्रामवास रहिये ॥ 


संगल प्रचंड तज काहू ऐसी इच्छा भई,; 

एक खर तिज असबवारी काज चहिये | 
धानारसीदास” जिनवचन प्रकाश सुन, 

और वैन झुन्यो चाहै तासों ऐसी कहिये ॥ १० ॥ 
ऊ'चे बंशकी बढ़ाई -प्रीतपनों प्रीतितोई, 

गुण गरपाई पिहुलाई घनो फेर है । 
चचन विज्ञासकों निवास वन सघनाई, 

चतुर नागर नर सुरनको पेर हे ॥ 








[७६ | वनारसीबिलास 


कीरति सराहको अवाह बहे महानदी, 

एतो देश उपमा है सब जग ज़ोर हे। 
हेरि हरि देख्यो कोड और न अनेरे ऐभो, 

बानारसीदास” बसुधामे गिरि सेर है॥ ११ ॥ 
रीति विपरीति रंग राच्यो परगुण रस, 

छायो भूठे भ्रम ताते छूटी निधि घरकी। 
तेरे घर ऋद्धि है अनंत आपरंग आये, 

नेकु जो गरूरी फेरे हाय होय हरकी॥ 

निजत्रियारूठे जेती होंस पूजे नरकी | 
बानारसीदास? कहे मूहुको विचार यह, 

कोटीध्वज भयो चाहे आस करे परकी ॥ १२॥ 
ऋतु वरसात नदी नाले सर जोरचढे, 

बढे नाहि मरजाद सागरके फेलक । 
नीरके प्रवाह तृण काठबृन्दर बे जात, 

चित्रावे् आइ चढ़े नाहों काहू गेलकी॥ 
बानारसीदास ऐसे पंचनके परपंच, 

र॑चक न संच आवे वीर बुद्धि छेलकी।! 
कछु न अनीत न क्‍यों प्रीति परगुणसेती, 

ऐसी रीति बिपरोत अध्यातमशैल्की ॥ १३ ॥ 
ढावरूपातोत ल्ागी पुर्यपाप आंति भागी, 

सहज स्वसाव मोहसेनाबत्न भेदकी । 








हिला 58-40. दा9-5 0 )वीपडर नेक पा>- आपका 


बनारसीवित्ञास ७७ ] 


प्ानकी लबधि पाई झतमलबंधि आई, 

तेज पु'ज कांति जागी उम्रग अनन्दकी | 
राहुके विमान बढ़ें कल्ला प्रगटत पूर, 

होत जगाजोत जैसे पूनमके चंदकी । 
बानारसीदास” ऐसे आ 5 कम भ्रमभेद, 

सकति संभाल देखी राजा चिद्ानंदकी॥ १४॥ 


लिखतपढ़त ठाम ठाम लोक लक्षकोटि, 

ऐसो पाठ पढ़े कछू ज्ञान हू न बढ़िये। 
मिथ्यासती पचि पचि शास्रके समूह पढ़ें, 

बंधीकलवाजे पशुचामढोल महिये ॥ 
दीपक संजोय दीनो चहछुद्दीन ताके कर, 

विकट पहार वापें कबहूं न चढ़िये। 
धानारसीदास' सो तो ज्ञानके प्रकाश भये, 

लिख्यो कहा पढ़े कछू लख्यो है सो पढ़िये ॥१५॥ 
एक मृतपिण्ड जेसे जल्लके सयोग छते, 

भाजन विशेष कोट क्षणकर्में खेद है | 
तैसे कमंनीरचिदानन्दकी प्रण॒ति दीखे, 

नरनारी नपु'सक न्रिविध सुवेद हे॥ 
बानारसीदास” अब बाको धूप याकी तप, 

छूटत संयोग ये उपाधिनको छेद है । 
पुणात्ञके परचे विशेष जीव भेद भये, 

पुर्गल असंग बिना आतम अभेद हे ॥ १६॥ 


९०१ ०००५१००९५२५ 2९५: /१/#ुपू./वव 


[ ७८ चनारसी विल्लास 





#१_/क-रचन्‍ह१५4#०१७/ह न 2#न#०० की धर रनीीयियारक थी #०--क करी सम. सर कान री करीयनहनी- ८ चने एरीी कान की जानी- सर जी समीर 2०० #०५4०म जन "० २" >परनिकामिन का. 


ये ही ज्ञान संबद घुनत सुर ताहि छुन, 

पटरस स्वाद माने तू तो ताहि मान रे | 
पिंड बिरह्व डकी खबर खोजे ताहि खोज, 

परगुण निन्र गुण जाने ताहि जान रे ॥ 

विषय कपायक विल्ञास संडे ताहि छंड, 

'अमत्त अखंड ऋद्धि आने ताहि आन रे ! 
वानारसीदास” जाता होय सोई जाने यह, 

मेरे मीत ऐसी रीत चित्तसुधि ठान रे ॥ १७॥ 
उद्यम करत नर स्वारथके काज सब, 

स्वास्थके ज्यमको हे रहो बहर सो । 
स्वार्थको भजे निरस्वार्थको तज रहो, 

* शहरको बन जाने बनको शहर- सो ॥ 

स्वार्थ भत्ो है जो तू स्वार्थको पहिचाने, 

स्वारथ पिछने बिन स्वारथ जहर सो । 
धवानारसीदास” ऐसे स्वारथके रंगराचे, 

ज्ञोकनके र्वार्थको ज्ञागत कहर सो ॥ १८॥ 
उल्नट पत्षट नट'खेलत मिलत जोक, 

याके उल्लटत भव एक तान ह रहो | 
अज हूं न ठाम आये विकथा श्रषण भावे, 

महामोह निद्रामें अनादि काल स्वैरह्ो ॥ 
धानारसीदास” जांगे जागे तासों वनि आबे, 

“जिनवर उकति अमृत रश च्चेरह्ो। 


+००००८५८०००००३०५०००००००००००८०:००००५०.०५००००८५८५००००८०००८८८८:८००८०००८:८००४:८०००८८००००००८:८०:४८-४ 
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बनारसीविलास - ७६ ]' 


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उल्लटि जो खेले तो तो ख्याज सो उठाय धरे; 

उल्लटिके खेले विन 'खोटे ख्याल है रहो ॥ १६॥ 
कौन काज मुगध करत बघ दीनपश;- 

जागी ना अअगमज्योति कैसो जश्ञ करि हे । 
कौन काज सरिता समुद्र सरजल . डोहे, 

आतम अमत्ञ.ढोह्यो अजहूं,न .डरि है॥ 
काहे परिणाम-संकलेश रूप करे जीव ! 
“  पुण्यपाप भेद-किये कहुँन उधरि है| 
बानारसीदास” जिन उकति अमृत रस, _ 

सोई ज्ञान सुने तू अनंत भव- तरि है ॥ २० ॥ 
खेलत अनन्तकात्न -भये पे न खेद पावे,. 

तीन सौ तेताल राजू मापकी तलकमें | 
केई स्वांग धर खेले वरष असंख्य कोटि 

केई. स्वांग फेर- ज्ञावे पलक पत्कमें ॥ 
खेलें जेते जन्तु तातें खेलने अनन्त गुणे,- 

बानारसीदास” जाने-ज्योतिकी मलकमें। 
खेले ते बहुत ख्याल देखे ते अक्प् जन्तुः., 

देखे ते भी खेल बेठे- ख्याल है खलकमें? ॥२१॥ 
गुरुमुख तुबक” सुबक भरे भरुव सोर, 

कातकी त्बाधिं' कलचंपी” द्रम्यानकी . 
'जामकी! अगसबुद्धि जोग उपजोग शुद्धि, 

“॑ज्ञंक' अरथ ज्वाला? ल्ञागी शुभ ध्यानकी ॥ 


| [ ६० 


बनारसीविलास 


इत 'जझातादल” उत मोहसेना” आई बन, 

बानारसीदास” जू 'कुमक' लीजो न्यानकी | 
जीबे -न अवश्य जाके बन्दूक की गोली” लगे, 

जागे न मिथ्यात जोप “गोली? लागे 'ज्ञानक्ी॥रण। 
बटमें विघट घाट उत्तट , ऊरधवाट, 

परशुण साथें ते अनन्त काल तंथको | 
पुषमना” आदि 'इला पिंगला' की सोंज भई, 

पटचक्रवेधी गण जीत्यो मचमथकों ॥ 
सुलव्यो है कमल 'बनारसी” विशेष ताको, 

सुनिवेकी इच्छा भई जिनमत प्रन्थको ! 
ऐसे ही ज्ञुगति पाय जोगी जोग निधि साथे, 

जोगनिधि साधै तो सिधाबे सिद्धपंथकों ॥ २३ ॥ 
नीच मतिहीन कहे सो तो न वहै केवलीपे, 

कहे कमहीन सो तो सिद्ध परमितको | 
धियागारी धरें धिया सारसुद ऐसी धरी, 

मेधाके मिज्ञापसों सथन निज चितकों ॥| 
मूरख कहे ते साथे परम अवधिवार, 

तहां न विचार कछु द्वित अनहितको | 
“ानारसीदास” तोसो निज ज्ञान गेह आये, 

लोगनकी गारी सो सिंगार समकितको ॥ २४ ॥ 
'यंचलता बाला बैंस भोरी दे दे भूमि फिरे, 

घर तरु भूमि देखे घूमत भरमते । 





न न पड़, हे न्‍- जे ७. सरकमजन परिनमनायानग«मना-भन आरमनम्नक 


परयकरमियर चित हर 2 


बनारसीवितांस [ ८१ 


यों ही पर योगपरणतिसेती परबंध, 
ओदयिक भाव मूह पावे ना मरमतें ॥ 
निजकृत माने तातें घटनि विशेष माने, ' 
' बढ़े परजाय याद्ी कठिन फरमतें । 
धानारसीदास” ऐसे विकल्न विभाव छूटे, 
बुद्धि विसराम पावे स्वभाव धरमतें॥ २५॥ 
छत्रधार बैठो घने ज्लोगनकी भीरभार, 
दीखत स्वरूप सुसनेहिनीसी नारी है । 
सेना चारि साजिके बिरान देश दोही फेरी, 
फेरसार करे मानो 'चौपर” पसारी है।॥ 
कहत बनारसी” बजाय धौंसा बारवार, 
, रागरस राच्यो दिन चारहीकी बारी है। 
खुल्यो ना खजानो न खजानचीकों.खोजपायो, 
राज खसि जायगो खजाने विन ' ख्वारी है ॥२६॥ 
जागो राय चेतन ' सहज दल जुरि आये, 
मुरे कमेरिपुभाव सनमें उमराहवी | 
सरहद भई याकी ल्ोकाल्षोक परिमाण, 
इन्द्रचन्द्र चितवत चोपकर चाहबी ॥ 
वानारसीदास! ज्ञाता ज्ञान सेना बनि आई, 
' आदि छ्तें अन्त बिन ऐसी ही निबाहबी | 
खजानची शुभध्यान ज्ञानकों खजानो पूरो, 


सूरो आप साहिव सुयिर ऐसी साहिबी॥ २७॥ 


[ ४२ वनारसीविलांस 


'मागः उठें बामें यामें 'क्रोषफेन” फेलि रहे, 

तत्रिवलतरंगरंग” दृह नमें आवना। 
वामें ठुण॒काठ धनधान्यपरिग्रह! यामें, 

बामें मलएंक' याहि वंधद्रोह” भावना | 

.श्ानारसीदास? बामें 'आकृति अनेक! उठें, 

यहां 'लकोड! योनि जाति दोष लावना। 
वह्यो जात 'जल्न? तामें येते 'कविभाव” उठ, 

आतसा बहिर तामें कहोंते स्वभावना | २८॥ 
निजकाज सवहीको अध्यातम शैत्षी मांस, 

मूह क्यों न खोज देखे खोज औरवानसें । 
सदा यह लोकरीति सुनी है वनारसीजू' 

वचनप्रशाद लेकु ज्ञानीनके कानमें || 
चेरी जेसें मल्िमति घोव॑त विराने पांव, 

परमनरंजिवेकी सांक ओ विहानमें। 
निजपांव क्‍यों न धौषे ? कोई सखी ऐसो कहै, 

मो सी कोऊ आल्सन और न जहानमें ॥ २६ ॥ 
टेककरि मूरख विरानें घर टिक रहो, 

जाने मेरो यही घर में भी याही घरको | 
घर परमारथ न जाने तातें भ्रमघेरो, 

ठौर बिना और ठौर अधर पधरको ॥ 
पंचको भखायो कहे परपंच व॑चद्रोह, 

संग्रह समूह कियो सो तो पिंड परको! 


कर स्‍महरनहना,रनेरि टिया अति. अ+#०# अमर अमर #*्#ग नेक 
कक 3:3० सा कजकलपाम«+कक-सकाम का 


वनारसीविलास ८३ | 


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वानारसीदास” ज्ञाताबुन्दमें विचार देख्यो 

परावत्त पूरणी जनम ऐसे मरको ॥ ३०॥ 
ठांव मगमद्‌ नाभि पुदुगलगुन, 

विसतरथो पौनतें विशेष हृ'ढे वनमें। 
साहिव के काज मूह अठत अनेक ठौर, 

तनको जो भिन्न माने तो तो तेरे तनमें ॥ 
फंठमार्दि मणि कोऊ मूरख पिसरि गयो, 

तो तो उपख्ानों सांचो भयो दीन जनमें । 
धानारसीदास” जिह फकाजको जगत फिरे, 

सो तो काज सरे तेरे एक दी वचनमें | ३१॥ 
भूल्यो तू निगोद कोझ काल पाय ढॉकि आयो, 

प्रत्येक शरीर पंच थावरमें तें धर यो । 
पुनि विकलिंदी इंदी पंच परकार चार, 

नरक तियच देव, पुनि पुनि संचरथो॥ 
'धवानारसीदास” अब नरभव कर्म भूमि, 

गंठिभेद कीन्हों मोक्षमारगर्मे पे घरथो। 
चेतरे चतुर नर अज हू तू क्यों न चेते ? 

इस अवतार आयो एते घाद उतरथो॥ ३२॥ 
दहे लौण सागरमें नेक हू न ढील करे, 

क्षारजत्ञ बसे वाके त्ञारजल पे नहीं। 
सीतवदासीताहरिकान्तारक्ताभोतस्वाद, 

स्वादी होय सोई स्वादे कोई काहू दे नहीं॥ 








[ ८४ बनारसीबिलास 


आर पारी भरी रिया पिकरी पक ऋरीयिटयीखियी धरती चियीिती परत करी की की गीकत कीएती बन 


सुसरि विभावर्सिघु समता स्वभावश्रोत, 
वानारसी' लगे ताको अमनको में नहीं | 
संगी मच्छ सारिखो स्वभावज्ञाता गहि राख्यो, 
राख्यों सोई जाने भेया कहवेको है नहीं ॥१श॥ 
नेननतें अगस अगम याही बैननते; 
उल्लट पत्वट वहै काज्ञकूट कहरी | 
मूल विन पाये मूढ़ कैसें जोग साधि आयें, 
सहज समाधिकी अगम गति गहरी ॥ 
अध्यातम सुन्यो तो पे सरधान हो न आगे, 
'. ,. - तौतो मैया तें वो वढ़ी राजनीति चहरी। 
बानारसीदास' ज्ञाता जाप सभे सोई जाने, 
उद्‌धि उधानते अधिक मनलहरी॥ ३४ ॥ 
तत्त्व निजकाज कट्यो सत्त परगुण गद्यो, 
..... भनकी लहर मानों डसे नाग कारेसे । 
छिनकमें तपी छिन जपी है के जापजपे, : 
छिनकमें भोगी छिन जोग परजारेसे ॥ 
धानारसीदास” एतो पूवकत बंध वाके: 
ओद्यिक भाव तेई आपो कर धारेसे । 
जब लग मत्त तौलों वत्तकी पहुंच नाहीं, ._ 
तत्त्व पायें मूढमती लागें मतवारेसे ॥ ३५ ॥ 
. थिर थंभ उपल विपुल ज्योति सरतीर, 
शा सत्ता आये आपनी न कोऊ काके दुल्लको । 


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गनारसी विज्ञास ८५ ] 


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भासे प्रतिबिम्ब अम्बु बायुसों अनेक फेन, 

धूजतो सो,दीखे पे न धूजे थंभ थलको ॥ 
जाकी दृष्टि पुरक्षत्नों चेतन न भिन्न चिंते, , 

आचरण देखे सरधान न विमल को । 

“बानारसीदास” ज्ञान आतम सुथिर गुण, 

डोले परजायसों बिकार कर्मजहको ॥ ३६ ॥ 
दृव्यथकी दोउनकी सरहद देहमान्र, 

, भावथकी ल्ोकपरिमाण वाकी इधिना । 

भाव सरहर याकी अल्ोकतें अधिकाई, 

ये तो शुभ काजकारी बातें कछू सिधि ना ॥ 
याके तो अभेद ऋद्धि अमल अखंड पूर, 

वाके सेना परदलल कछू निज रिधि ना। 
धानारसीदास! दोठ मींढि देखी दुनियांमें, 

एक दिसि तेरी विधि एक दिसि विधिना ॥३७॥ 
धर्मदेव नरको बचन जैसो गिरिराज, 

मिथ्याती बचन शुद्धारथकों पटंतरो। 
पारस पाषाण जैसें जाति एक जेतो भेद, 

मूरख दरश जेसे दरश महंतरो ॥ 
धानारसीदास” कंकसार अन्यसार जेसो, 

जनमको थौस जैसो यौस मरणंतरो। 
अध्यातम शैत्ञी अन्य शैज्ञीको विचार ठेसो 

ज्ञाताकी सुदृ्माहिं ल्ागे एतो अंतरो ॥ रे८॥ 


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वनारसीधिलास 






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नरभव पांय पाय बहु भूमि धाय धाय, 

पर गुण गाय गाय वहु देह धारी है। 
नरभव पीछे देह नरक अनेक भव, 

फिर नर देव नर असंख्यात बारी हैं ॥ 
एक देवभव पीछे तियेच अनंत भव, 

'वानारसी? संसारनिवास दुःखकारी है। 
ज्ञायक सुम्रतिपाय मोह सेना विछुराय, 

अब चिदानंदराय शकति सँभारी है॥ ३६॥ 
पामर बरण 'शूद्र! बास तब देह बुद्धि, 

अशुभको काज ताहि तातें वढी लाज है। 
वैश्यकों बिचार वाके कछू करतूति फेर, 

'वेश्यः बास बसे तोलों नादिं जोगराज है| 
'जत्री? शुद्ध परचंड जेतवार काज जाकि, 

वानारसीदास' ब्रह्म अगम अगाज है! 
जैसे बास बसे लोय तामें तेसी बुद्धि होय, 

'जैसी बुद्धि तैसी क्रिया क्रिया वैसो काज है ॥४०॥ 
फटिक पाषाण ताहि मोतीकर माने कोऊ, 

घुघची रकत कहा रतन समान है। 
हंस बक सेत इह्ां सेतको न हेत कछ्ू , 

रीरी पीरी मई कहा कंचनके वात है ॥ 
जैष भगवानके समान कोऊ आन भयो, 

मुद्राको मंडान कह्दा मोच्षको सुथान है। 


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बनारसीवितास ८७ ] 


इम३# एक इन के. 


धवानारसीदास' ज्ञाता ज्ञानमें विचार देखो, 

काय जोग केसो होठ गुण परघान है॥ ४१ ॥ 
चेदपाठवाले त्रह्म कह पे विचार पिना; 

शिव कोई भिन्न जान 'शैवः गुणगावहीं। 
“जैसी” पर जतन जतन निजमिन्न जान, 

धानारसी” कहे “चारवाक' घु'धधावहीं ॥ 
“बौद्ध! कहे चुद्ध रूप फाहू एक देशपसे, 

्यायके करनहार” ऊरध बतावहीं। 
छद्दों दरशनमाहिं छतो आहि.ढिप रहो, 

छूल्यो न मिथ्यात् तातें प्रगट न पावही ॥ ४२॥ 
भेषधर फोटिक नत्यो है लखचौरासी में. 

विना गुरुज्षान चरतै न विषसावमें । 
गुरु भगवान तूही भगवानश्रान्ति छूटे, 

श्रान्तिसे सुगुरुभाषे जैसें खीर तावमें ॥ 
धबानारसीदासः ज्ञाता भगवानभेद पायो, 

भयो है उछाह तेरे वचन कहावमें। 
भेषधार कहे भैया भेषहीमें भगवान, 

भेषमें न भगवान भगवान भावमें ॥ ४३॥ 
मोक्ष चशिवेको पंथ भूले पंथ पथिक ज्यों, 

पंथबलद्दीन ताहि 'छुखरथ” सारसी । 
सहजसमाधि जोग साधिवेको रंगभूमि! 

परम अगम पद पढिवेकी पारसी! ॥ 


मील की अधि फनिानिा मन किया नि आ किया की वि जि मत मात मा याद याद याद यश का फेशदियाशितओों किया किया जे जा के का मा के कक भा शाा॥एर्रणणणनाणणणाआआओरई 





९८०५ / कट शीट डरीपकीष ८ ही. 





| घ८ बनारसीबित्ञास 








भवसिन्धु तारिवेको शबद घरे है 'पोत! 
ज्ञानधाट पाये श्रुतल्ंगर! लेकारसी । 
समकित नेननिको याके बेन 'अंजन! से, 
आतमा निहारिविको'आरसी वनारसी'॥ ४४। 
जिनवाणी दुग्ध! भाहि 'विजया” सुमतिडार, 
- निजस्वाद 'कंदवुन्द! चहलपहलतमें । 
बिवे+ विचार उपचार ए करू भे/ कीन्हों, 
'मिथ्यासोफी” मिटि गये ज्ञानकी गहतलमें॥ 
'शीरनी' शुकलध्यान ,अनहद 'नाद! तान, 
धान! गुणमान करे छुजल सहलमें । 
“'बानारसीदास” मध्यनायक सभासमूह, 
अध्यातमशेली चली.मोच्ञके महत्में ॥ ४५॥ 
रसातल तक्ें पच गोलक अनन्त जंतु; 
“* तामें दोऊ राशि अन्तरहित स्वरूप है । 
कटुक मधुर जौलों अगांनत मिन्नताई; 
- चिकणतामाव एक जैसे तेल्रूप है॥ 
जैसे कोऊ जात अंध चौइन्द्री न कह्दियव, , 
। दृब्यको विचार मृठभावको निरूप है । 
वानारसीदास' प्रमु वीर जिन ऐसो क्यो, - 
आतम अभव्य भैया सोऊ सिद्धरूप है॥ ४६॥ 
लक्ष कोटि जोरिजोरि कंचन अम्वार कियो, 
करता में याको ये तो करे मेरी शोभ को। 


५६५2:७८22:2४५:५०-००५६६००००६२००:००:००४००२०००००००:०००-०:०००००००८००००-००:००००००००००-०४५०००६० 


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चनारसीपिज्ञास प६ १ 








घामधन भरे मेरे और तो न काम कछू, 
' सुख विसरास सो न पाष कहूँ थोसकों ५ 

ऐसो घलवंद देख मोह नप खुशी भयो, 

सैनापति थाप्यो जेसे अहंभार मोभको 
धानारसीदास  ज्ञाता ज्ञानमें घिचार देस्यो, 

लोगनको लोभ लाग्यो लागे लोग लोभकी ॥४७ ॥ 
चावन वरण ये ही पढ़त वरण चारि, 

काहू पढ़ें ज्ञान बढ़े काहू दुख ह दजू। 
चरण भंडार पंच बरण रतनसार, 

भौर ही भंडार भावषरण सुछंदजू॥ 
चरणते भिन्नता घुवरणमें प्रतिभासे, 

सुगुण घुनत ताहि होत है. अनंद जू। 
वानारसीदास” जिनवाणी बरणन कियो, 

' तेरी वाणी चरणाव करे बढ़े इन्द जू ॥ ४८॥ 

शकबंधी सांचो 'शिरीमात्न जिनदास' छुन्यो; 

ताके वंश 'भूलदास” पविरध बढ़ायो हे । 
ताके वंश ज्षितिमें प्रगट भयो खद्नसेन, 

.... बानारसीदास! ताके अवतार आयो है ॥ 

चीहोलिया योव गर वतन उद्योत भयो 

आपगरेनगरः ताहि भेंदे सुखपायो हे । 
धानारसी' बानारसी” खत्ञक बखान करे, 

' त्ञाको वंश नाम ठाम गाम गुण गायो है ॥ ४६॥ 

खुशी ह के मन्दिर 'कपूरचन्द? साहु बेठे, 


विनर शक के के. सके के से सील से जयरनहीषाविशीदिशीकीआधिधि#मिनिमी वी परधविलीभीभिली नी नि विन िजीक विधि औननी आदी 4##0##44###7-######$/० कै स॒' 
ह्रनिानिाा लिए मिमी की की जल ॒नलुलनुरहल_३३३३३३हुइबुबबबइ बुला रा भभभभभएए्ए्भ्भ्ध्ी।ा 


[ ६० बनारसीविलास 





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बानारसीदास” जूके बचनकी वात चली, 

याकी कथा ऐसी ज्ञाताज्ञानमनलावनी ।॥ 
गुणवंत पुरुष के गुण कीरतन कीजे, 

धीतांबर” प्रीति करी सलन सुहावनी । 
वही अधिकार आंयो “अंघते विद्ोना पायो! 

हुकम प्रसादतें भयी है. 'ज्ञानबावनी? | ४०। 
सोलह सो छियासीये संवत कु वारमास, 

पक्त उजियारे चन्द्र चढ़नेको चाष है! 
विजेदशी दिन आयो शुद्ध परकाश पायो, 

उतरा आषाढ़ उडुगन यहैदाव है। 
'ानारसीदास” गुणयोग है शुकल्वाना, 

पौरिषप्रधान गिरी करण कहाव है। 
एक तो अरथ शुभ महूरत चरणाव, 

दूसरे अरथ यामें दूजो बरणाब हे ॥ ५१॥ 
हेतबंत जेते ताको सहज उ८द्ारचित्त, 

आगे कहों एतो वरदान मोहि दीजियो। 
उत्तम पुरुष 'शिरीबानारसीदास” यश, -, 

पन्नगस्वभाव एक ध्यानसों सुनीजियो ॥ 
पबनस्वभाव विसतार कीब्यो देशदेश, ' 

अमर स्वभाव निज स्वाद रस पीजियो। 
बावन कवित्त ये तो मेरी मतिमान भये, 

हंसके स्वभाव ज्ञाता गुण गहलीजियो ॥ ४२ ॥ 

इति श्रीबानारसी नामाझ्वित ज्ञानबावनी | 


_ धनारपीबिलास ध१्‌] 


कक 
2३7० 90, “िक ह)५ध२७ नि नपक पिलक- तन कीये ता मकान ३#३०म एक कि (मय कामिया टमिकामिकानी. मक मकर जि टप कपयक पलक पि्ज कि रे, वषेका ७०. थे. "३ चल ३/ट आम के. 





अथ वेदनिर्णयपंचासि का, 
घूडामणि छन्द । 


जगतबिलोचन जगतहित, जगतारण जग जाना। 
घन्दहु जगचूढामणी, जगतायक परधाना ॥ 
- ्महुं ऋषभत्वामी प्रमुख, जिनचौवीस महत्ता । 
गुरूचरण चितराख मुख, कहूँ वेद॑विरतन्ता ॥ ९.॥ 
सनहरण ( ( खोली ) ' 
प्रेघतीकथित॒वेद अन्तर शुपत भये, 
जिनके शवदमें अमृतरस चुवा है 
अब ऋगुचेद यजुर्बेद शाम ध्थबेण, 
इनही का परभाव जगत में हुआ है ॥ 
फहत बनारसी? तथापि में फहँगा कछु, 
सही सममभेगे जिनका सिथ्यात मुवा है | 
सतवारों मूरुख न भानें उपदेश जेसे, 
उलुबा न जाने किसीओर भानु उवा है २७ 
दोहा । 
ऋहहु वेदपंचासिका, जिनवानी परमान 
नर अजान जान नहीं, जो जाने सो जान॥ ३ ॥ 
जद्यानाम 'युगादिजिन? रूप चतुमु ख धार । 
समवसरण मंडानमें वेद वल्ान चार॥ ४ ॥ 


है ९/०./+०१६ #० :ध >#"र,# ९५, ०५ #,/० ##भ५/म. हरि: पिकािपेक्िकियमिरे#री हरी हर पिन बरी | अीफरीयरर गज पिया जरीपकीी उरि री जटी पारी नरी हरी जी, परी पक यरीयनर पी ि फीड पिया व पर एक जरथ हम अर कयव.. ५; मय अग्रिम 


[ धर बनारसीविलास 


 ब्यूबब्प्क 





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घनाक्षरी । 
प्रथम पुनीत प्रथमानुयोगवेदः जामें, 
त्रेंसठशल्षाका महापुरुषों की कथा है! 
दूजो वेद करणालुयोगः जाके गरम में, 
वरनी अनादि लोकालोक थिति जथा है 
धचरणानुयोग” वेद तीसरो फ्राट जामें, 
मोखपंथकारण. आत्वार सिंधु मथा है । 
चोथोवेद “दरव्यानुयोग? जामें दरवके, 
पटभेद करम उलछेद सरवधथा है ॥५ 8 
प्रथमनेद यथा:--- 
पट्पद । 
'तीथंकरः चौबीस, 'कामः चौदीस मनुजतन। 
'जिनमाता जिनपिता, सकल व्यालीसआठ गन |! 
चक्रवर्तिः द्ादश अमान, एकादश शंकरः। 
नव प्रतिहरः नव वासुदेव;” नव 'रामः शुभंकर 
कुलकर” सहन्त चव॒द॒ह पुरुष, नव 'नारद” इत्यादि नर 7 
इनको चरित्र अरु गुणकथन, 'प्रथमवेद” यह भेद घर ॥# 
द्वितीयवेद यथाः-- 
अगम श्रनंत अज्ञोक. अकृत अनिमित अखंड सम ! 
असंख्यातपरदेश, पुरुषआकार लोक नभः॥ 
ऊरघ स्त्र॒गे अघो पतात, नरत्नोक मध्यभुव । 
दोप असंख्य उदधि, असंख मंडलाकार भर व ॥ 


सन»--->का्+म«क+»७+«»»आभ५८थ+अफकान पक पीट. 














धनारसीबिलञास | ६३ ] 


तिस सध्य अढृह दीपलग, पंचमेरु सांगर जुगम 
यह मंनुजक्तेत्र परिमाण छिति, सुरविद्याधरको सुगम ॥ ७॥ 


मनहरण ! 

सोलह छुरग नवग्रीव नव नवोत्तर, 

पंच पंचानुत्तर ऊपर सिद्धशिला है। 
ता ऊपर पिद्धक्षेत्र तहां हैं अनन्तसिद्ध, 

एकमें अनेक कोऊ फाहूसों न मिल्रा है ॥ 
श्रधोत्ञोक पाताज़्की रचना अनेकविधि, 

नीचे सात नरकनिवास बहु विला है। 
श्त्यादि जगततिथि कही 'दूजेवेद? माहि, 

सोई जीव मानें जिन मिथ्यात उगिल्ा है ॥ ८५॥ 

ई ट्रवीयवेद यथा;- 

मिथ्याकरतूति नाखी सासादन रीति भाखी, 

मिश्रगुणथानककी राखी मिश्र करनी ! 
सम्यकवचन सार कह्मो नानापरकार, 

श्रावकआचार गुन एकादश धरनी ॥ 
परमादीमुनिकी क्रिया कहीं अनेकहूप, 

भारी मुनिराजकी क्रिया प्रमादहरनी | 
चारित्रकरण त्रिधा श्रेणिधारा दुविधा है, 

एक दोषमुखी एक मोलमुल्ली वरनी ॥ १० ॥ 

चोपाई । 
उपशर्म ज्िपक थथावत चारित, परकृत अनुमोदनक्तकारित | 
दिविधि त्रिविधि पनविधि आचार, तेरह विधि सत्रह परकारा ॥११॥ 


हि 8-42. 4-8 02-49-4-42-44<8५-9-40-2-48-20--4-0.4.--4-4.-24.4+ 48-22 -2-.# “03:24: --4+42.20-":4.:2-::0-9-2.--:>*-०2 


8454८ 42 मकर ४७-८१ आन०कम०« तक पारपन<+ ५० 4५ प मनन. 
'न्‍१९८००९२ण- मय .धन 2९:7० ९ ०.३० रण #०:#ीए.+० #बै.धर मा ८० 6. ०५ ०० २यहक ८ 








[ ६४ धर्मारसीवितांस 


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दोहा । 
बरनत संख्य असंख्यविधि, तिनके भेद अनंत । 
सदाचार गुणकथन 'यह, ठतीयबेदः विरतंत॥ १२॥ 
“बत॒र्धवेदशयथा:--हूपक पनाक्षरी । 
जीव पुदगल्न धर, अधम्से आकाश काल, 
येहो छुह्दों दरव, जगत के धरनहार। 
एक एक दरबमें, अनंत अनंत गुन, 
अनंत अनंत परजायके करनहार | 
एक एक दरवमें, शर्कात अनंत बसे, 
कोऊ त जनम धरे कोझन सनहार 
निहचे निवेद कर्मभेद चौथेवेद भाहि, 
बखानें सुगुरु माने मोहको हरनहवार ॥ १३॥ 
घोपाई | 
थेही चारबेद जगमाहि।सर्घ अन्य इनकी परकछांहिं॥ 
ज्यों ब्यों धरम भयो विच्छेद | त्यों त्यों त्यों गुप्त भये ये वेद १४ 
दोहा | 
ह्वादशांगवानी बिसल, गर्मित चारों वेद । 
ते किन कीन्हें कव भये, सो सब बरतों भेद ॥ १५ ॥ 
युगलधम रचना कहों, कुकर रीति बखान । 
“अषभदेव ब्रह्मा”? कथा, 'मुनहु भषिक घर कान ॥ १६॥ 
“युगलघमे|घथा,”*-चौपाई । 
प्रथमहि “जुगलंधम” है जैसा | गुरुपरसाद कहहेुँ कछु दैसा॥ 
जन्महिं जुगतनारिनर दोऊ। भाई बहिन न माने कोऊ॥ १७॥ 








बनारसीविज्ञास ६५ ] 


दोहा । 
सुरसे सीरे सोमसे, बहुरानी वहुमिन्र । 
होहि एकसे जुगल सब, कौतूहली विचित्र | (८॥ 


मनहरण । 
सबहीके चित्त अतिसरतस्वभावी नित्त, 
सबहीके थिरचित्त कोऊ न सुगुलिया। 
हिये पुण्यरसपोष सहजसंतोष लिये, 
गुननके कोष दुखदोषके उगलिया ॥ 
कोऊ नहिं लरे कोऊ काहूको न धन हरे, 
कोऊ कबहूँ न करे काहकी चुगलिया। 
समतासहित संकलेशतारहित सब, 
सुखिया सदीव ऐसे जीव हैं जुगतिया || १६ ॥ 
भूषन नवीन वस्ध मल्नहीन सबहीके, 
घर घर निकट कल्पतरुवाटिका । 
नाहीं रागद्ग पभाव नाहीं बंधको बढाव, 
नाहीं रोग ताप न वि्ञोके कोऊ नाटिका ॥| 
विविधपरियत्रह सबके घर देखिये पे 
काहके न पोरि परद्वार न कपाटिका । 
अतपअदहारी सब समृदुतनधारी सब, 
, सब ऐसी परिपाटिका॥ २० ॥ 
दोहा । 
छर धर नाटक होहि नित, घर घर गीत सेंगीत । 
कबहुँ कोड न देखिये, बदनपीत भयभीत ॥ २१॥ 


रख 
दल... वन न ननपन--+-3नन+ >> “>> वन न .>+ वन काम ५3 कान+ ५ +4-++न-मम- न थिलन--++ 3.33 ३4आ# भा» ४3०७-५३ ८५4३४ ५७७१ 5 फनिनानन तन - पालन प-+->-५३५०-फनआ#१३७७-५ ००००१ मक. 
दर जमकर कार नह उरी पड काम वाह उरी पीपयाहर शाह वाह पाही पा हरी कट पिकात यार काटी माही यहा. थे सता चाहा यही फल २ ९०) ३> डी पाली पेड सिफर पा पा रेट कक यम पा चाल नाक जमीमे बारी पढ़ी दे दे वही बपात. के पड यह पतन पाता दी चर भार पक. सार पाक पक, 


मनहरण । 
जिनके अल्प संकलप विकल्प दोऊ, 
रा थोरों मुखजलप अलपअहमेवता। 
जिनके न कोऊ अरि दीरध शरीर धरि, 
त्रिपतिकी दशा घरे विपति न बेबता ॥ 
जिनके विपे वढ़ांच पत्योपमतीन आब, 
सबे नर राव कोऊ काहूको न सेवता। 
ऐसे भद्गमानुष जुगल अवतार पाय, ह 
' क्वरि करि भोग मरि मरि होंहि देखता॥ २२ ॥ 
जिनके जनम भाहिं सातपिता भर जाहिं, 
व्यापे न वियोग दुख शोक नहिं धरना। 
अपने ऑंगूठाको अमृतरसपान कर, _ 
जिनको अपनो तन वद्ध मान करना॥ 
अन्तकाल जिनको श्रसातावेदनी न होय, 
छोंक आये अथवा जेंभाई आये मरना। 
जिनको शरीर खिर जाय ज्यों कपूर उड़े, 
ऐसो जिनवानीमें “जुगलधस” बरना॥ २३॥ 
चोपाई । 
जुुगलधम जब ज्षेय मरोरा। बाकी काल रहे कछु थोरा॥ 
प्रगटहिं तहां चतुदेशप्रानी । “कुलकर नाम कहये ज्ञानी ॥ २४ | 
सब सुजञान सबकी गति नीकी । सब शंका मेटहि सबजीकी | 
होहि विछिन्न कल्पतरु ज्यों ज्यों | कुलकरए आगम भाषहिं त्योंत्यों॥ 


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| अरमान, 





बनारसी|वलास | &७ ] 





दोहा। | 
क्यो सबनि भरि भरि जनम, हरि हरि भांति कहाव। 
धरि घरि तन भरि मरि गये, करि करिं पूरण आब ॥ २६॥ 
इह्विधि चवदृह मनु भये, कछु कछु अन्तरकाल । 
तीन ज्ञान संयुक्त सब, मति श्रति अवधि रसात् ॥ २७॥ 
|... चाप । न 
तेरह मनुके नाव जु आने । नाभिराय चौदहें बखाने ॥ 
मरुदेवी तिनका वरनारी। शीलब॑त सुन्दरि सुकुमारी ॥ २८॥ 
ताके गर्भ अये अबतारी | ऋषभदेवजिन! समकितघारी | 
तीनज्ञान संयुक्त सुद्याये | अगणित नाम जगतमें गाये ॥२६॥ 
ऋषभदेव कथन: 
दोहा ।, 
“ऋषभदेव” जे जे दशा; धरों 'किये जे काम । 
ते ते पदगर्भित भये, प्रगट जगतमें नाम॥ ३० ॥ 
जे “ब्रह्माके” नाम सव, जगतमाहि विख्यात | 
ते गुणसों करतूतिसों, “ऋषभदेव” की बात | ३१ ॥ 
चोपाई । 


रे 


जनपम्रत नाम भयो शुभवेता | “आदिपुरुष” अवतार, अकेला ॥ 
मातापिता नाम जब राखा । “ऋषभकुमतार” ज़गत सब भाखा ॥३२) 
“त्ामि” नाम “राजा” के जाये । 'तामिकमलउत्पन्न” कहाये। 
इन्द्र नरेन्द्र 'करें जब॒सेवा। तब कहिये “देवनकों देवा”,॥३३॥ 


रिल्‍म परम न्‍न्‍य. ४०१७८१/९४०९७/९% 0 2१७८. १ 2१ व 2. 2 








[ ध्य बनारसावलास 


जुगलरीति तज॒ नीति उधरता । वात कहेँ सष्टिके “करता” । 
असिमसिक्षषिवाणिजके दावा। ताकारण “विधि”न्ञास 'विधादा)॥ 
क्रियाविशेष रचीं जग जेती। जगत “विरक्वि” कहूँ प्रभु सेती ॥ 
जुग की आदि प्रजा जब पाले । जब जग नाम “प्रजापति” आलें।३५ 
दोहा । 
कियो,चृत्य काहू समय, लटी अप्सरा वाम। 
जगत कहे त्रह्मा रचो, तिय “तिलोत्तमा” सलाम ॥ ३६॥ 
चपाई | 
शुरुषिन गये सहयमुनि जब हीं। नाम “सवयंभू” अगटो तबहीं ॥ 
ध्यानारुढ़ परमतप साथे। “बरमइष्ट” कह जगत अराधें ॥३ण। 
“भरतखंढके” आगणी जेंते । प्रजो “भरतराजा” के तेते । 
०परतनरेश” “ऋषभ” की साखा। वातें लोक 'पितामह? भाखारे८ 
केवलज्ञानहप जब होई | तब “ब्रह्मा” भाषे सब कोई । 
क॑चनगद़गभित जग भासे । नाम “हिरण्यगर्भ” परकासे ॥ ३६ ॥ 
दोहा । 
कमलासनपर बेठिके । देहिं धर्म उपदेश । 
चमर छत्र लख जग कहे । “कमलाशन” लोकेश ॥ ४० ॥ 
चोपाई । 
आतमभूमि रूप दरसावे ।! तबहिं “आत्ममू” नाम कहावे ॥ 
सकलजीबकी रक्षा भालें। नाम “सहस्तपातु” जय राले॥ ४१ ॥ 
समवसरनमहि चौमुखि दीसे | “चतुरानन” कह जगत अशीसे | 
अत्षरविना “बेद” घुनि भासे । रचना रच “गणधर” परगासि४२। 


मिफक कल के कम 2०#०००मम 











बनारसीबिलास - * ६६ ] 


 भ्षारवेद” कहिये तब सेती । दवादशांगकी रचना एवी | 
जब धुनि सुनि अनंतता गहिये । तब प्रभु “अन॑त्ातमा कहिये ॥४३॥ 
“आदिनाथआदीश्वर” जोई | आदि अ्रन्तविन कहिये सोई ॥ 
करे जगत इनहींकी पूजा | ये ही “रद्म” और नहिं दूजा ॥४४॥ 
जवल्षों जीव मृषामग दौरे । तबलों जाने “ब्रह्मा” और ॥ 
जब “समकित” नेननसों सूझे। “जह्मा ऋषभदेव” तब बूफे ॥४४॥ 
दोहा । 
/श्रादीश्वर नद्या? भये, किये विद! ज़िन चार | 
नामभेद मतभेदसों, बढ़ी जगतमें रार ॥ ४६ ॥ 
अहालोक कथन;-- 
चोपाई । 
और उक्ति भेरे मन आते । सांचीबात छबनको भावे ॥ 
“त्रद्म ब्रद्मतोक”को बासी । सो वृत्तान्त कहों परकासी ॥४५७॥ 
कु'डल्या | 

ऊपर सब सुरतोक के, “ह्मलोक” अभिराम । 

सो “सरवारथसिद्धि” तसु, पैचानुत्तर” नाम ॥| 

पंचानुत्तर नाम, धाम एका अवतारी | 

जहां पू्े भव बसे, ऋषभजिन समकितघारी ॥ 

“ब्रह्म लोकसों चये, भये “बद्मा”? इहि भूपर | 

तातें लोक कद्दान, देव “तह्या” सब ऊपर ॥ ४८ | 

चोपाई । 
“आदीश्वर” युगादि शिवगामी । तीनलोकजनशअंतरजामी | 

ऋषभदेव त्रह्मा जगसाखी । जिन सब जैनधमविधि भाखी ॥ ४६ || 





[ १०० न्‍ वनारसीवित्ञास 


ऋषभदेवके अगनितनाऊ । कहों कहां क्लों पार न पाझू॥ ', 


5 


वे अगाध मेरी मति हीनी । ताते कथा समापत कीनी ॥ ४० | 
. - पदपद। 
इह्विधि ब्रह्मा भये, ऋषभदेवाधिदेव मुनि । 
रूप चतुसुं ख धारि, करी जिन प्रगट वेद्धुनि ॥ 
तिनके नाम अनंत, ज्ञानगभित गुनगूमे। 
में तेते बरणये, अरथ जिन जिनके बूमे ॥ 
यह “शब्द्ह्मसागर” अगम, परमत्रह्म गुणजलसहित | 
किमि लहे “चनारसि” पार पद, नर विवेक सुजबलरद्दित | ५१ ॥ 
इति वेदनिर्णयपंचासिका 


अथ त्रेशुठशुलाकापुरुषोंकी नामावत्री 
,. क्लुछन्द। ु 
नमो “जिनवर” नमो जिनवरदेव चौवीस। 
नरहादश “चक्रधर” नव “मुकुन्द” नव “पतिनारायण” । 
नव “हत्तघर” सकल पिलि, प्रभु त्रेशट शिवपथपरायण ॥ 
ए महंत त्रिभुवनमु छुट, परमधरसघनघाम । 
ज्यों ज्यों अनुक्रम अबतरे, त्यों त्यों बरनों नाम | १ ॥ - 
सोरठा । 
केंई तदभव सिद्ध, निकटभव्य केई पुरुष |” 
मृषागंठि उरविद्ध, सुमति शल्लाकाधर सकल | २॥ 





बंनारसीविज्ञास १०१ | 


सनी कर कहर फकरनिकीये 











पंसुछन्द | 
'कऋषभजिनवर” ऋषपभजिनवर “भरतचक्रीश .) 
“आ्रीअजित जिनेश” हुव, “सगर” चक्रि “संमंबतीयंकर) 
“अभिनंदन सुमति” जिन, “पद्मग्रभ सुपास श्रीशंकर” ॥ 
“श्रीचन्द्रप्भु सुविध” जिन, “शीतल” जिन अ्रेयांश। ' 
“अश्वप्रोव” प्रतिहर भयो, “हलधर विजय” सुबंश ॥ ३॥ 
तोरठा । 
हरि “त्रिष्टि” जिन जाय, “बासुपूज्य जिन ह्वादशम | 
५तारक” प्रतिदरि बाय हलघर “अचल हिप्ृष्टि” हरि ॥ ४॥ 
| .. बलुछन।..... 
“विमल” ज़िनवर विमल जिनवर “मेंरु” अतिविषूतु । 
ध्ध्ते स्वय्भू” हरि, जिन “अनंत मधु” प्रतिदामोद्र | 
वत्न 'सुप्रभ” नाम हुव, “पुरुषोत्तम” हरि तासु सोदर ॥ 
“घर” जिनेश “निशुभ” प्रति, नारायण नरभेस । 
राम “पुदशेन” नाम हुव, हरि “तरसिह नरेंस ॥ ५॥ 
सोरठा । 
“मघव” नाम चक्रश, चक्री “सनवकुमाए? हैकी पर 
चक्री “शांति” नरेश, भयहु “शांति” जिंतु ग्रेतरिकर ॥ 
बलुडझल ॥/ ३९. 
“कंथु” चक्की ४ कुंु” चक्की, “कुथुर :सेबेज् | 
“/झर” सावभौस हुव;:/अर” जिनेश “प्रहलाद”? प्रति 


के ७: ७२2७२७३९८०५३९७०९७९५/१८/०७८०/०५४३८१६४:६२१२५०७३९/०५२१३१९००७३७००७/५/७/२७/०/१:७२७२९/७०+००१७२७०१४७०१७०१५३७०००:१७००९००९०५/०५०७) कर दटू:जुर 








अनननज+-म-ननक. >2ग+- हक, 


[ १०२ वनारसीधिलास 


चतभद्र 'सुनंदि” हुब, “पुडरीक” हरि बंधु तासु घर ॥ 
/ सावभौम “सुमौम” हुव, ' बलि” प्रतिदरि अवतार । 
“लन्दिमित्र” वल्देव हित, केशव “दत्तकुमार”॥ «॥ 
सोरठा । 
“पद्म” चक्रि जिन “सल्लि, विजयसेन” पटखंडदजित | 
“मुनिमुत्रव” हरि अ्न्लि, चक्रवरति “हरिपेश” हुव | ८॥ 
बरतुछन्द | 
भयहु “रावण” भयहु रावणनाम प्रतिकृष्ण । 
रघुनन्द्न “राम” हुव, वासुदेव “लक्ष्मण” गणिजै | 
“जम” जिनवर “नेमि” ज्ञिन, “नरासंघ” प्रतिहरि मणिम॥ 
हलधर “पद्म मुरारि” हरि, “अद्वदत्त” चक्रीस । 
पास जिनेसुर “बीर” जिन, नर तीनत्रिवीस | ६ ॥ 
सोरठा । 
त्रिभुचनमाहि उदार, त्रेशठ पद उत्कृष्ट जिय | 
भाषिभूत उपचार, बन्दे चरण “बनारसी ॥ १० ॥ 
तीर्थंकर नामाव्ञी:--पटपद । 
ऋषभ अजित संभव जिनंद सुमति धर | 
श्रीपद्सप्रभ भ्रीह्रपास, चन्द्रप्रभ जिनवर ॥ 
सुविधिनाथ शीतल श्रेयांसप्रभु वासुपूज्य वर। 
विमल अनन्त सुधर्म शांति जिन कुथुनाथ अर ॥ 


प्रभु मल्लिनाथ त्रिथुबनतिलक, सुनिर्ुन्त नि नेमि नर | 
पारस जिनेश वीरेश पद, नमति “बनारसी” जोर कर ॥१६॥| रे 


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बनारसोबिलास ... १०३ ] 
चक्रवर्तिनाम:--दोहा | 
भरत सगर सघवा सनत,--क वर शांति कुथेश। 
अर सुभौम पदमारुची, जय हर्षण अद्येश ॥ १२॥ 
प्रतिनारायण नामः-दोहा | 
अश्वप्रीव तारक मधू, सेरु निशु भ प्रहत्ताद । 
बत्निराजा रावण जरा, सन्ध सुप्रतिहरिवाद ॥ १३॥ 
नारायणनामः--दोहा । 
त्रिपिष द्विपिष्ट स्वयंभु पुरु/-पोत्तम नरसिहेश । 
पुण्दरीक दत्ताधिपति, लखमण हरिमथुरेश ॥ १४ ॥ 
बलभद्रनाम--दोहा | 
विजय अचल बल धमघर, सुप्रभ सुद्शन नाम । 
सुनंदि नंदिमित्रेश रघु, नाथपदम नवराम ॥ १५॥ 
इति श्रीत्रेशठशलाकापुरुषोंकी नामावक्ती 


अथ मार्गणाविधान लिख्यते 


दोहा । 


बन्दहुं देव जुगादिजिन, छुमरि सुगुरु मुखभाख | 
चबदृह मारगणा कहहु, वरणहु वांसठ साख।॥ १॥ 
चोपाई । 
१ १ । प्र च््‌ 


संजम भव्य अदहार कपाय । द्रशन ज्ञान जोग गति 
० ११ रे २३३ 


' क्लेश्या समकित सैनी वेद ड््द्रय सहितचतुदर भेद 


» [ २०४ वनारसी|बलस 


>्य्फिनरीयिलर पिककी किक फीकी फीकी 


ए चौद॒द सारगणा सार। इनके वासठ भेद उदार ॥ 

वासठ संसारी जिय भाव | इनहि उलंधि होय शिवराव ॥ ३ ॥ 
संजम सात भव्य हे भाय | द्विविधि अहारी चार कषाग्र। 
दर्शन चार आठविधि ज्ञान | जोग तीन गति चारविधान ॥ ४॥ 
पट काया ल्लेश्या पट होय | घट सम्कित सेलीविधि दोय ॥ 

वेद तीनविधि इन्द्रिय पंच | सकल ठीक गति वासठ संच॥ ४॥ 


इनके नाम भेद्‌ विस्तार। वरणहुं जिनवादी अनुसार । 
वासठरूप स्वांग धर जीव | करे रृत्य जगमाहि सदीब ॥ ६॥ 
प्रथम असंजम रूप” विशेष | देशसंजमी दूजों सेष ॥ 

तीजो 'सामायिक सुखधाम। चौथा :छेद्वथापन नाम ॥७॥ 
पंचस पद्‌ परिहारि विशुद्धि। सक्षम सांपराय पट बुद्धि ॥ 
जथाख्यात चारित सातमा। सातों स्वांग घरै आतमा॥८॥ 
भव्य अभव्य स्वांग.घर दुधा | करे जीव जग नाढक मुधा ॥| 
अनहारक आद्वारी होय। नाचें जीव स्वांग घर दोय॥६॥ 
कंवहूं क्रोध अग॒नि लहलहे | कवहू' अष्ट महामद गहै॥ 
कबहू' मायामयी सहूप। 'कवहूं सगन लोभ रसकूप ॥ १० ॥ 
चार कषाय चतुविध भेष | घर जिय ताटक करे विशेष ॥ 
कह चह्ुदशंनंसों लखे |अचक्षुदशनसों चले ॥११॥ 
कह अवधि दशन सु प्रयुज। कहू' सुकेवत्षद्रशन पुंज॥ 
धर दशन भारगणा चारि। नांटक नटे जीव संसारि॥ १६९॥ 
कुमतिज्ञानं मिथ्यामति लीन | कुश्रति कुआगम सें परवीन | 


धघरे विभंगा अवधि अजाम । सुमति ज्ञान समकित परवान ॥ १३॥| 
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'कनक 


बनारसी विल्ञास १०४ ] 





सुभ्नतिज्ञान परमागम सुणे। अवधि ज्ञान परमारय मुणे ॥ 
मनपजय जानहिं मनभेद। केवलज्ञान प्रगट सब वेद ॥ १४॥ 
एही आठ 'ज्ञानके अंग। नये जीव इनरूप रखंग।| 
सनोजोगमय होय कदाचि । बोले बचन जोगर्सों राचि॥ १४) 
कायजोगमय मगन स्वकीय । नाचे त्रविधि जोग घर जीय॥ ' 
सुरगति पाय करे सुखभोग | समसुखदुख नरगति संजोग ॥१६॥ 
बहुदुल अल्पसुखी तिरजंच। नरक मद्दादुख है सुख रंचं॥ 
चहुंगति जम्मन मरण कल्लेस | नटे जीव भानारसभेस ॥१ण। 
प्ृणिवी काय देह जिय धरै.। अपकायिकमय हो अबतरे॥ 
अगनिकायसहिं तपत स्वभाय । वायुकायमहिं कहिये वाय ॥१८॥ 
चलसपत्ती रूपी दुखमूल।लहि त्रसकाय धरे तन थूत्र॥ 
घटकाया षटविधि अवतार । धरि धरि मरे अनन्ती बार॥ १६॥ 
घरे कृष्णलेश्या' परिणाम । नीललेश्यमय आतमराम | 

फिर धारे लेश्या कापोत। सहज पीततक्तेश्यामय होत ॥२०॥ 
चेतन पद्मलेश्य परिवान। करे शुकललेश्यां रसपान ॥ 
इद्दिविधि घट लेश्यापद पाय। जगवासी शुशुभ अभ कमाय॥२१॥ 
घर मिथ्यात्व कूठ सरदृहे। वमि समकित सासादन गहे॥ 
सत्य असत्य मिश्र समकाल । सीधे समकित ज्ञायक चाल ॥२२॥ 
उपसम धोध धरे बहुबार। बेदे वेदकहूप विचार॥ . : 

धर षट समकित स्वांग विधान | करे नृत्य जिय जान अजान॥२१॥ 
सैनीरूप असेनीरूप | दुविधिस्वांग जिय धरे अनूप॥ 
पुरुषवेद तृूण अगनि उछाह। त्रियवेदी कारीसादाह॥ २४॥ 
चलद्वदाह नपुसकवेद | नटे जीव' धर रूप ब्रिमेद | 


* १०३६ वनारसीबिलांस 





थावरमाहिं इकेद्री होय ! श्रस संखादिक इच्किय दोय॥ २५॥ 
पिपीलिकादिक इन्द्री तीनि। चौरिन्द्रिय जिय अमरादीनि॥ 
पचेन्द्री देवादिक देह।सव बासठि मारगणा एह॥ २६॥ 
जञावत जिय मारगणारुप | तावत्काल बसे भवषकूप॥ 

जब मारगणा मूल उछेद | तव शिव आपे आप अभेद ॥रण) 


" दोहा । 
ये वासठ विधि जीवके, तनसम्वन्धी भाव | 
तज तनवुद्धि “वनारसी” कीजे मोक्ष उपाव ॥ श८॥ 
इति वासठ मागेणा विधान 





अथ कर्मप्रकृतिविधान 


वल्तुछन्द । 

परमशंकर परमशंकर, परमभगवान्‌ 
परव्रह्म अनाढ़ि शिव, अज़ अनंत गणपति विनायक | 
परमेश्वर परमगुरु, परमपंथ उपदेशदायक। 
इत्यादिक वहु नाम धर जगतबंध जिनराज । 
जिनके चरण “बनारसी” बंदे निजहितकाज॥ १॥ 

दोहा । 

नम्तों केचली के वचन, नमों आतमाराम | 
कहीं कमंकी प्रहति सब, सिन्न भिन्न पद नाम॥ २॥ 


2०५८३ /१५८7१०/०७०/००० कटी जी, 








धनारसीविज्ञास 3 क.) १०७ ] 








चौपाईं ( १४ मात्रा ) 


एकदि करम आठविधि दीस | प्रकृति एकसौ अड़तात्नीस॥ 
तिनके नाम भेद विस्तार। बरणहुं जिनवाणी अनुसार ॥ ३॥ 
प्रथभकर्म “ज्ञानांवरणीय” । जिन सब जीव अज्ञानों कीय ॥ 
दितिय “द्शेनावरण” पहार | जाकी ओठट अलख करतार ॥ ४॥ 
तीजा कम “वेदनी” जान । ताझ्तों निराबाध गुणहान॥ 
चौथा “महामोह” जिन भनै। जो समकित अरु चारित हने॥५॥ 
पंचम “आवकरम” परधान। हने शुद्ध अवगाहप्रमान। 
छट्टा “नामक” बिरतंत | करदि जीवकों मूरतिवंत ॥६॥ 
* गोत्र” कमे सातमों बखान | जासों ऊंच नीच कुल मान ॥ 
अष्टस * अन्तराय” विख्यात | करे अनन्तशकतिको घात ॥ ७॥ 
दोहा । 
एही आठों करमसल, इनमें” गर्मित जीव । 
इनहिं त्याग निम्मेल भयो, सो शिवरूप सदीब ॥ ८॥ 
चोपाईं । 

कहो कमतरु डाल सरीस । प्रकृति एकसो अड़तात्षीस ॥। 
“प्रतिज्ञानावरणी” जो करम्में। सो आवरि राखे मतिधम ॥ ६॥ 
“अतिज्ञानावरणी” वतन जहां | शुभश्रुवज्ञान फुरे नहिं तहां॥ ' 
४अवधिज्ञान आवरण” उदोत । जियको अवधिन्नान नहिं होत॥१०॥ 
मनपरजय आवरण” प्रमान | नहि. उपजे मनपजय ज्ञान ।॥ 
“फेवलज्ञानावरणी” कूप | तामदिं गरसित केचलरूप ॥११॥ 


बरणी ज्ञानावरणकी, प्रकृत्ति पंचपरकार | 
अब द्शन आवरण तरु, कहहु' तासु नव बार ॥ १२॥ 





[ १०८ बनारसीविलास 


“बल्लुद्शेनावरणी” धंघ | जो जिय करे होहि सो अंध । 
“अचखुदशनावरण” बघेव | शवद्‌ फरस रस गंध न वेब ॥ १३॥ 
“आवधिद्र्शनावरण!” उदोत। विज्षत्त अवधिद्शेन नहिं होत॥ 
“केवलदशेआवरण” जहां ) केवल्द्शन होय न वहां ॥ १४॥ 
"त्यानग्रद्धि” निद्रावश परे | सो आणी विशेष बतभरे॥ 

उठि उठि चले कहै'कछु वात । करे प्रचंड कर्मडतपात ॥ १५॥ 
#पतिद्रानिद्रा उदय स्वकीय । पलक उघाड़ सके नहिं जीव ॥ 
“प्रचलाग्रचला” जावतकाल । चंचल अंग घहे मुख लाल ॥ १६॥ 
“त्िद्रा? उदय जीव दुख भरे। उठ चाले बैठे गिरि परै॥ - 
रहे आंख “अ्चल्ासों” घुली | आधी मुद्रित आधी खुली ॥ १७॥ 
सोबतमाहिं छुरति कछु रहै । वारवार “लघु निद्रा” गहै ॥ 

इति “दर्शनावरणि” नवधार | कहों वेदनी दृयपरकार।॥ १८॥ 


दोहा । 


“साता” करम उदोतसों जीव ज्थियसुख बेद। 
करम “असाताके” उदय, जिय बेदे दुख खेद ॥| १६ ॥ 


चोपाई । 


अब भोहनी दुविधि गुरुभने | इक द्रशन इक चारित हने ॥ 
दर्शनमीह तीन विधि दीस। चारितमोह विधान पचीस ॥२ना 
प्रथम मिथ्यातमोह की दौर। जिय सरदह और की और ॥ 
दूजी मिश्रमोह की चात्न। सत्य असत्य गहे समकाल || २१॥ 
समकितमोह तीसरी दशा। करे मल्रिव समकित की रसा॥ 
झब कषाय सोलह॒बिधि कहोँ । नोकपाय नवविधि सरदहों ॥ररा। 





न्‍सनमननकनाम»«9णनककन्‍कानननननन-ननन-न+नकबनन पे. गण 
सा कमारदीनआानगरनय “ताला अनकूनकन-न... सके 
| ज--« नामक करण. वावलाराम»कत अमान भाणकना इन कम. चाकू 
मानते “ननानननमक--«-+++ननमम» धाम. 


बनारसीबिलञास १०६ ] 


प्रथमकषाय कहांबे कोप | जाके उदय छिमागुण लोप । 
द्वितिकषाय मान परचंड.। विनय विनाश करे शतखंड ॥२१॥ 
तीजी माया रूप कषाय । जाके उदय सरलता जाय॥ 
लोभ 'कपाय चतुर्थमभेद | जासु ,उद्य संतोष उछेद्‌ ॥ २४॥ 
दोहा । 

ये ही चारकपाय मल, अनुक्रम सूक्तम थूल | 

चारों कीजे चौगुने, चन्द्रकला समतूल॥२५॥ 
अनन्तानुबधीय कपाय । जाके उदय न समकित थाय ॥ 
अग्रत्याख्यानिया उदोत। पंचम्रगुशथानक नहिं होत ॥२६॥ 
प्त्याख्यान कह्ावै सोय। जहां सर्वेसंयम नहिं दोय॥ 
सो संब्वल्ञन नाम गुरु भनें। यथाख्यातचारित जो हने ॥२७। 
क्रोध मान माया अरु क्ञोभ । चारों? चारचारविधि शोभ ॥ 
ए कषाय सोलह दुख॒धाम । अब नव नोकषाय के नाम ॥ र८ ॥ 
रागद्रषकी हांसी जोय | हास्य कषराय कह्दावे सोय॥ 
सुखमें मगन द्दोय जिय जहां | रति कपाय, रस बरसे तहां ॥२६॥ 
जद्दां जीवको कछु न सुहाय | तहां मानिये अरति कपाय || 
थरहर कंपे ,आतमभराम । जामहिं सो कषाय भय नाम ॥रेना 

* रूदन बिल्ञाप वियोग दुख, जहां होय सो सोग। 
जहां ग्लानि मन ऊपने, सो दुगद्वा रोग ॥ ३१॥ 


नगर दाह सम परगठ दीस | गुप्त पजावा अम्रि सरीस | 
महा कल्ुपता धरें सदीव। लेद नपु'सकधारी जीव ॥३२॥ 











[ ११० बनारसीवितास 





अब वरनों तियवेदकी, रचना सुनि गुरु भाष । 
कारीसाकीसी अवनि, गर्मित छत्न अमिल्ाष ॥ ३३ ॥ 
ज्यों कारीसाकी अग॒ति, घुओँ न परगट होय | 
सुल्ग छुज्ग अन्तर दहै, रहै निरन्तर सोय ॥ १४॥ 
त्यों वनितावेदी पुरुष, बोले मीठे वोल । 
वाहिर सब जग वश करे, भीतर कपटकलोल ॥ ३४ ॥ 
कपट लपटसों आपको, करे कुगतिके वंध । 
पाप पंथ उपदेश दे, करे औरको अंध॥ ३६॥ 
आपा हत औरन हमे, वनितावंदी सोय। 
अब लक्षण ताके कहो, पुरुष वेद जो होय ॥ ३७॥ 
ज्यों ठण पून्राकी अगनि, दीखै शिखा उतंग। 
अल्परुप आलाप घर, अल्पकालमें भंग | ३८॥ 
तेसें पुरुषवेद धर जीव । धर्म कर्ममें रहे सदीव ॥ 
महासगन तप संजस माहिं। तन ताबे तनको दुख नाहि।॥ ३६॥ 
चित उद्वर उद्धत परिणाम । वुरुपचेद्‌ धर आवमराम ॥ 
तीन मिथ्यात पचीस कषाय । अट्ठाईस प्रकृति समुदाय || ४० ॥ 
अब सुन आयु चार परकार | नर पशु देव नरक थिति धार 
माहुष आयु उदय नर भोग । लह तिरजंच आयु पशु जोग ॥४९॥ 
देव आयु सुरवर विख्यात | मरक आयुसों नरक निपात ॥ 
घरनी आयुकर्मकी वान। नामकर्म अब कहों वखान ॥४२॥ 
पिंड प्रकृति चौदद् परकार | अद्टाईंस अर्पिंड वित्तार ॥| 
पिंडमेद्‌ पेंसठ परशत्त । मरित्रि तिराणव होंदि समस्त ॥ ४३ ॥ 


जशनसज न जे हरे विलेन पिनव पकननाछ कक, नथमडानाफतीयया.. अभय कायल 5» अत 





बनारसीविलास १११ | 
ते तिराणवे कहू' बल्ान | हिंड अपिड वियात्रिस जान।' ' 
प्रथमपिंड प्रकृती गतिनाम । सुर नर पशु नारक दुखघाम ॥४७॥ 


तोरठा । 


छुरगतिसों घुर गेह, नरशरीर नरगति उदय । 
पशुगतिसों पशुदेह, नरक घसाबै नरक गति ॥ ४५॥ 
भपाई | 
' चहु गति आजुपूरवी चार | द्वितिय पिंड प्रकृततीा अवधार ॥ 
मरण समय तज देह स्वकीय । परभव गमन करे जेब जीव ॥४६॥ 
आतुपूरवी प्रकृति पिरेरि। भावीगति में आने घेरि ॥ 
आनपूरवी होय सद्दाय | गह्टे जीव नूतन परजाय ॥ ४७॥ 
हृतिय अक्ृति इन्द्रिय अधिकार । इग हुग तिग चदु पंच विचार | 
फस रसन नासा धग कान | जथाजोग जिय नाम बखान ॥४८॥ 
तन इन्द्रिय धारे जो कोय । मुख नासा द॒ग कान न होय ॥ 
सो एकेन्द्रिय थावर काय | भू ज् अगनि वनस्पति वाय ॥४६॥ 
जाके तन रसना हय थोक | संख गिडोला जलचर जोक ॥ 
इत्यादिक जो जंगम जन्त । तेद्दे इंद्री कहे सिद्धन्त | ४०॥ 
जाके तन मुख नाक हजूर | घुन पिपीलिका कानखजूर || 
इत्यादिक तेइन्द्रिय जीव | आंख कानसों रहत सदीव ॥ ४१॥ 
जाके तन रसना नासा आंखि | विच्छु सत्तम टीड अति माखि॥ 
इत्यादिक जें आतमराम। ते जगमें चौइंद्री नाम॥ ५२॥ 
देह रसत़ नासा हृ॒ग कान | जिनके ते पंचेंद्री जान ॥ 
नर नारकी देव तिरजंच । इन चारहुके इन्द्री पंच॥ ५३॥ 








[ ११२ वनारसी विल्ञास 


चौथी प्रकृति शरीर विचार | औदारिक वैक्रियक अहार ॥ 
तैजस कामोण मित्र पंच । औदारिक भानुष तिरजंच॥ ४५४॥ 
वैक्रिय देव नारकी धरे ) मुनि तपबल आहारक करे।। 
तैजस कार्माण तन दोय । इनको सदा धरे,सबकोय ॥ ५४ ॥ 
जैसी उदय तथा तिन गही । चौथी पिंड' प्रकृति यह कही ॥ 
अब बंधन संघातन दोय | प्रकृति पंचमो छठवीं सोय॥ ५६॥ 
बंधन उदय काय बँंधान | संघातनसों दिह संघान।॥ 
दुहकी दश शाखा हृय खंध | जयाजोग काया संबंध || ५७॥ 
अब सातसी प्रकृति परसंग। कहाँ तीन तन अंग उपंग ॥ 
ओदारिक वेक्रियक अद्दार | अ'ग उपंग तीन तनधार॥ ५८॥ 
दोहा । 

सिर नितंव उर पीठ करि, जुगल जुगल पद टेक | 

आठ अंग ये तनविषे, और उपंग अनेक || ५६५॥ 
तेजस कार्माण तन दोय | इनके अंग उपंग न होय॥ 
कहहुं झाठमी प्रकृति विचार। पद संस्थान रूप आकर )। ६० ॥ 
जो सर्वंग चारु परधान।सो है संमचतुर्त संठान।॥ 
ऊपर थूल अधघोगत छाम । सो निगोधपरिमंठल नाम | $१॥ 
दवेट थूल ऊपर कृश होय। सातिक नाम कहद्ावें सोय ॥ 
कूबर सहित वक्र वपु जासु | कुबज अकार नाम है ताछु ॥६१॥ 
लघुरूपी लघु अंग विधान | सो कहिये वुमन संठान॥ 
जो सबबंग असु दर मुंड। सो संगान कहावै हुंड॥ ६३॥ 
कही आठमीमझृति छुमेद | अब नौमी रहंनन निवेद॥ 
है संहनन हाइ़को नाम। सो पटविधि थंभे तन घास ॥ ६8॥ 


बनारसीविल्ञास ११३ ] 





बज्न कील कीलित संघान+ ऊपरि वज्भपट्ट बंधान॥ 
अंतर हाड -बनञ्नमय बाच। सो है. बज्ञबुधभनाराच || ६४५ ॥ 
जहेँ सब हाढ़ बज्लमय ज़ोय | बञ्जधमेल सो झविचल होय | ,, 
ऊपर - ,बेढरूप  छामान | नाम ,बजनाराच बखान।॥ ६६॥ 
वज्न समान. होहि जहेँ हाड। ऊपर बज्रहित पट आड।|। 
वज्रहित कीजलीसों विद्ध। सो नारोच नाम, परसिद्ध ॥ ६७॥ 
जाके हाढ़ बत्नमय नाहिं। अद्भ वेध कीली नसमाहि॥ 
ऊपर बेठबंधन नहिं. होय | अठ नराच कहाबे सोय॥ ६८॥ 
जहां न होय बज्रमय हाड |.नहिं पटबंधन कीली गाढ़॥ 
कीली बिन दिह बंधन होय | नाम कीलिका कहिये सोय ॥६६॥ 
जहां हाढसों हाड़ न बंधे। अमित परस्पर संधि न संध॥ 
पर नसाजाल अरु चाम। सो सेवेंट संहनन' नाम || ७० ॥ 
ये संहनन छविधि घरणई । नवमी प्रकृति समापति भई॥ 
दृशमी प्रकृति गसन आकाश | ताके दोय भेद परकाश ॥७१॥ 


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| 0.“ दोहा। ._ 
शुभंविहद्यायगतिके उदय, भक्षी चाल जिग्र घार। 
अशुभविद्दाय उदोतसों; ठाने अशुभ विद्वार॥ ७२॥ 
पद्धरेछन्द। . े 

छात्र कहूं ग्यारमी प्रहृतिसंच । (जो बरणभेद प्रकार पंच |, - 
सित अरुण पीतःदुति हरित' श्याम । ये-ब॒णे-प्रकृति के पंच नाम।७३, 
जो वर्ण प्रकृति जाके :उदोत ।ताको शरीए तिह- ब्रण होत॥ 
रस नाम प्रकृति वारमी/जान॥ सो पंच्रभेद विवरण बखान-।|७४॥ 


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[ ११७ वनारसीबिलास 





कटु मधुर तिक्त आमल कपाय | रसउदय रसीती होय काय। 
जाको जो रस प्रकृती उदोत। ताके तन तेसों स्वाद होत ॥७श॥ 
तेरहीं प्रकृति गेंघमयी होय। दुगेध सुगन्ध प्रकार दोय॥ 

जो नीव जो प्रकृति करे बंध | तिह उदय ताछु तन सोह गंध ॥७8॥॥/ 
अब फरस नाम चौदवीं वानी । तिस कहों आठ शाखा वखांनि॥ 
सीकनी रुत् कोमल कठोर | लघु भारी शीतल तप्त जोर ॥०७॥ 


दोहा । 


प्रकृति चीकनीके उदय, गहे चीकनी देह । 

रुखी प्रकृत उदोतरसों, रुखीकाया गेह् ॥ ७८॥ 

कठिन उद्यसों कठिन तन, मृदु उदोत मृदु अंग। 

तपत उद्यसों तपततल; शीतउद्य शीतंग ॥ ७६ ॥ 

पद्धरिउन्द । 

जह भारी नाम परक्ृति उदोत | तह भारी तनघर जीव होत ॥ 
लघुप्रकृति उद्यधर जीव जोय । अति हरुई काया घरे सोय ॥5०॥ 
ए पिंडप्रकृति दशवार भाखि। इनहीं की पेंसठ कही साखि॥ 
अब झद्भावीस अपिण्ड ठामि | तिनके गुणरूप कहों बखानि॥८६॥ 
जब प्रकृति अगुरुलधु उदय देय। तब जीव अगुरुलधु तन धरेय॥ . 
उपधात उदय सो अंग व्याप । जासों दुख पावे जीव आप ॥८२॥ 
परघात उद्यसों . होय अंग | जो करे औरंको प्राण भंग ॥ 
उस्सासप्रकृति जब उदय देय । तब प्राणी सास उसास ल्लेय ॥८१॥ 
आतंप उदोत तन जथा भान । उद्योत उदय तन शशि समान | 
बरस प्रकृति उदय धर जीव जोय । ज॑गम शरीरधर चले सोय ॥८४॥ 
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१११ ] 








थावर उदोतघर प्राणघार। हि थिर शरीर न करे विहार ५ 
सूत्तम उदोत, लघु देह जास । सो मारे मरे न और पास ॥5५॥ 
घादर उदोत तन थूत्न होय | सबद्दी के मारे मरे सोय ॥ 
परजापति प्रकृति उदय करत । जिय पूरी परजापति धर॑त ॥पक्ष। 
जो प्रकृति अपजोपत घरेय । सो पूरी परज्ञापत न ज्ञेय ॥| 
प्रत्येक प्रकृति जाके उद्दोत। सो जीव वनस्पति कांय होत #८७। 
जब तुचा काठ फल पूल पात | जहूँ बीज सहित जियराशिसात ॥ 
जो एक देहमें जीव एक। सो ज्ीवराशिकहिये प्रत्येक॥ ८८ ॥ 
प्रत्येक धनसपत्ति ह्विविधिज्ञान । सुप्रतिष्ठित अ्रप्रतिष्ठित बखान ॥ 
जो धारे राशि अनन्तफाय | सो सुप्रतिष्ठित कहिये छुमाय ॥८ध॥। 
जामें नहिं होय निगोदधाम। सो अग्रतिष्ठित श्रत्येकनाम ॥ 
अब साधास्णवनसपति काय। सो सूच्छूप चादर द्विविधि थाय ।६ण 
सूच्छुम निगोद जगमें अमेय । चादर यह दूजा नामघेय॥" ' 
घरि मिन्न भिन्न कामोण काय । मिलि जीब अनन्त इकत्र आय ६९ 
संग्रहहि एक नो कम देह । तिस कारण नाम निगोद एह॥ 
सो पिण्ड निगोद अनन्तरास | जियरूप अनंतानंत भास ॥ध्सा 
भर रहे लोकनभर्में सदोव। ज्यों घढ़ामाहि भर रहे घीष ॥ 

* सुद्षम अरु चादर दोय साख। पुनि नित्य अनित्य दुभेद भाज॥६१॥ 

' जो गोलकरूपी पंचधाम । अंडर खंडर इत्यादि नाम ॥ 
के सावनरकके हेट जान । पुनि सकललोकनभमें बखान ॥६४॥ 
दोहा । 
एक नियोद शरीरमें। जीप अनंत अपार। 
' घर जन्म सब एकठे, मरहि एक ही बार-॥ ६४ ॥ 





[ ११६ वनारसीबिलास 


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मरण अठारह वार कर, जनम श्रठारद् वेब | 

एक रवास उस्वांसमें, यह निमोदकी टेव ॥ ६६॥ 

एक निगोदशरीरमें, एते जीव बयान । 

तीन कालके सिद्ध सब, एक अंश परिमान ॥ ६७॥ 
- बढ़े न सिद्ध अनंतता, घंटे न राशि निगोद । 

जैसेके तेसे रहें, यंद जिनवचनविनोद ॥ ६८ ॥ 

तातें बात निगोदकी, कहे कहांलों कोय। 

साधारण प्रकृतीउद॒य, जिय निगोदिया होय ॥ ६६॥॥ 

यह साधारण प्रकृतिलों, वरणी चौदह साख। 

वाकी चौदह जे रहें, ते वरणों मुत्र भाप ॥ १०० ॥ 

पद्धरिहन्द । 

थिरण्क्ृति झय बिरता अभंग। अत्थिर उदोतर्सों अधिर अंग ॥ 
शुभप्रकृति उदय शुभरीति सबे । जहेँ श्रशुभदद्य तहेँ अशुभपवे॥१॥ 
सौभागप्रकृति जाके उदोत। सो प्राणी सबको इष्ट होत । 
दुभोगप्रकृतिके उदय जीब । सबफो शअनिष्ट लागे सदीव ॥ २॥ 
जहँ सुस्वरप्रकृति उदय बखान। तहेँ कंठ फोकिता मधुरघान॥ 
जो दुस्वरप्रकृति उदोत धार । ताकी ध्वनि ज्यों गदभपुकार ॥ ३॥ 
आदेयप्रकृति जाके उदोत | ताकी बहु आदर मान होत ॥| 
जब अनादेय को उदय होय। तब आदर मान करे न कोय ॥|!। 
जसनामउदय जिस जीव पाहिं। ताकी जस कीरति जगत सा्हि॥ 
जहें प्रगट भालमह' अजसरेख। तहें अपजस अपकीरति विशेख ॥श। 
निर्माणचितेरा उदय आय । सब अंगउपंग रचे वनाय ॥ 
तीथकरनामप्रकृति उदोत । लहि जीव तीर्थकरदेव होत ॥ ६॥ 


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बनारसीविज्ञास , रद | 


दोहा । ; 
ये तिरानवे और दश, तन सम्बन्धी आन। ' 
मिलहिं एकसौतीन सब, हो्िं नाम की वान | ७ ॥ 


,.. चषहै।- , 
नामप्रकृति संपूरण भई | पिंड अपिड कही जो जुई ॥ 
पिण्डप्रकृति चौद॒ह वनि रहो | तिनकी पैसठ शाखा कही ॥ 
अट्टाइस अप्तिंड वरनई । ते सब मिल्लि तिरानवे भहैं॥... 
बरनों गोत करम सातमा । जासों ऊँच नीच आतमा ॥ ६ ॥ - 
अचगोत उद्योत प्रवान | होवे जीव॑ उच्चकुलधान || -, ,, , 
नीचगोत'फञ्ञ संगति पाय। जीव नीचकुल छपजे आय ॥ १०॥ 
... दोहा। 
गोत्रकर्मकी दयप्रकृति, तेहूं कही वखानि | 
अंतराय अब पंचविधि, तिनकी कहों कहानि ॥ ११॥ 
चौपाई । ह 

अंतराय अष्टम वटमार। सो है भेद पंच परकार ॥ 
अंतराय तरुकी है डार। निचहे एक एक विवदार ॥ १२॥ 
कहों प्रथम निहचे की बात | जामु उदय आंतमगुण घात ॥ 
परगुन त्याग होहि नहिं' जहां | दान अन्तराय कंहि तहां॥ १३॥ 
आतमतंत्त्वन्ञाभकी हान । ज्ञाम॑अन्तराई सो जांच) . 
जबलों आतमंभोग न होय | भोगअन्तराई है सोय ॥ १४ ॥ . 
बारवार' न जमे उपयोग | सो है अन्तराय उपभोग ॥ 





ध्ष्ष | बनारसीविल्ञांस 








। अधष्टकर्मको करे न जुदा | वीरज अन्वरायका उदा ॥ १५॥ 
निहचे कही पंच परकार | अरब घुन अन्तराय विवद्वार ॥ 
छतीवस्तु कछ्ु देय न सके | दान अन्तराई बल ढके ॥ १६॥ 
उद्यम करे न संपति होय। लाभ अन्तराई है सोय॥ 
विषयभोग साममी छवी। जीव न भोग कर सके रती॥ १७॥ 
रोग होय के भोग. झुरे। भोगअन्तरायबल फुरे ॥ 
एक भोगसामग्री सार । ताकी भोग जु बारंबार ॥ १८॥ 
कीजे सो कहिये उपभोग | ताहू को न जुरे संजोग॥ 
यह उरभोगधांतकी कथा । वीरजअन्तराय घुन जथा॥ १६ | 
शक्ति अनंत जीवकी कही। सो जगदशामाहि दब रही॥ , 
जगमें शक्ति कमंआधीन । कबहू सबल कंषहू बलहीन || २९ ॥ 
तनइन्द्रिययल फुरे न जहां | वीरजअन्तराय है तहां ॥। 
तातें जगतदशा परवान । नय राखी भांखी भ्गवानत्र॥२१॥ 

दोहा । 

ये वरणी व्यवहार की, अन्तराय विधि पंच || 

अन्तर बहिर विचारतें, संशय रहै न रंच॥ २२ ॥ 

स्पादवाद ज्ञिनके वचन, जो माने परमान | 

सो जाने सब नवदशा, और न कोऊ जान ॥ २३ ॥ 

सर्वधातियाकी प्रकृति, देशवातियाबान ॥। 

' बाकी और अघातिया, ते सब कदों बखान॥ २४॥ 
केवलन्नानावरणी वान । फेवलद्रश आवरण जान॥, 
निद्रो पंच चौकरी तीन। प्रकृती द्वाद्श ्ञीजे चीन ॥ २४॥ , 


“८०००-०० 


बनारसीबिल्ञास ११६ ] 








अनंतवंध अप्रत्यास्यान । प्रत्याखान चौक त्रिक जान ॥ 
सब सिथ्या मिश्रित मिथ्यात । ए इकत्रीस ! “7 “५ "*”" 
' दोहा । 
सर्वंधातियाकी कद्दो, विंशति एक वखान | 
अब बरणों छुबीसविंध; देशधातियाबान ॥ २७॥ 
चोपाई । 
फेवलज्ञानावरणी बिना। बाकी चार आवरण गिना ॥ 
केवलद्रशआवरण छोड़ | बाकी तीनों लीजे जोड़ ॥ २८॥ 
चारभेद संज्वल़नक पाय । नवविधि नोकपाय समुदाय ॥ 
समयप्रकृति मिथ्यात बखान। अन्तरायकी पॉचों वान॥ २६॥ 
ए छज्बीस प्रकृति सब भई | देशधातियाकी वरनई ॥ 
चाकी रही एकसौ एक। ते सब कद्दी घाति अतिरेक ॥ ३० 


दोहा । 
द्विविधिगोत्र हय वेदनी, आयु चारविधिजानि॥ 
मिल तिरानवे नाम की, एकोत्तरशत वानि॥ ३१॥ 
चपाई । 


जे घातदिं सब आतमद्व। ते ही कहदी घातिया सवे॥ 

जे कछु घात करदिं कछु ना4। देशधातिया ते इन माहि ॥ ३२ ॥ 

जे न करदिं आतमबल घात । ते अप्नातिया कहीं विख्यात ॥ 
अब सुन पुण्यपापके भेद्‌। भिन्न भिन्न सब कहों निवेद ॥ ३३॥ 


घ 





जन चआनययओ७त 3» सनक. 2 ३. ज 


[ १९२ बनारसीनिलास 


आतलुपूरवी चार विधि, क्षेत्रविषाकी जान ) 

चार आयुबत्नकी अकृति, मबविपाकिया बान॥ ४४ ॥ 

घाति अधाति त्रिविधि कहे, पुण्य पाप हय चाक | 

बंध उदय दोऊ कहे; वरने चार विपाक ॥ ४६॥। 

अब इन आठों करमकी, थिति जघन्य उतक्ृष्ठ | 

कहों बात संक्तेपसों, सुनों कान दे इष्ट ॥५७॥ - 

सोपाई । हे 

प्ञानावरणीकी थिति दीस | कोडाकोडीसागरतीस ॥ 
यह उत्कृष्टद्शा परवान । एकमुहर्त जघन्य बखान | ४८॥ 
द्वितिय दशनावरणीकर्म । थिति उत्कृष्ट कहों सुन समे ॥ ' 
कोडाकोडी तीस समुद्र | एकमुहरतकी थिति छुद्र॥ ५६ ॥ 
तीजा कम वेदनी जान। फोडाकोडीतीस बख्ान ॥ 
यह उत्कृष्ट महाथिति,जोय । जघन भुहररतबारह होय ॥ ६० ॥ 
चौथा महामोह परधान । थिति उत्कृष्ट कही भगवान ॥ 
सागरसत्तरकोढाकोडि । ल्घुथिति एकमुद्रत जोडि ॥ ६१ ॥ 
पंचम आयु कद्दी जगद्रीस । उत्कृष्ठी सागर- तेतीस ॥ 
थिति ज़घन्य सुमुहरतएक,। यों गुरु कहदी विचार विवेक ॥ ६२ 
छु्म नाम कर्मथतिं कह्दों। कोडाकोडी बीस सरदहों ॥ 
सागर यह उत्कृष्टविधान | आठसमुहूते जधन्य बल्लान ॥ ६३॥ 
गोत्रकर्म सातवां सरीस । उत्कृष्टी थिति सागरवीस ॥ 
कोढाकोढिकाल परंमान | लघुथिति आठ मुहरत 'मान॥ ६४ ॥ 








बनारसीविल्लास श्स्श्तु 


अष्टम अंतराय दुखदाति ।उत्कृष्टी थिंति कहों बखानि ॥ 
सागरकीडाकोडी तीस । लघुधिति ५क्मुहरत दीस ॥ द५॥ 
चरनी आठों क्मकी, थिति उत्कृष्ट जघन्य ॥ 
चाक्ती भध्यम और थिति, तेर्सख्यथा अन्य ॥ ६६॥ 
अब चरजलों पल्शेपमकाल । तथा सागरोपमकी चाल ॥ 
कूपभरे जे रोम अपार | ते धरने नाना परकार ॥ ६७॥ 
पल्योपभके भेद अनेक । तातें यहां न वरना एक ॥| 
जोजन कूप रोमकी कत । कही जेनमत्में विस्याव ॥ ६८॥ 
कूपकथा जैसी कछु कही । स्तरे पत्योपम कहिये सही ॥ 
पल्योपभ दश कोड़ाकोड़ि | सब एकत्र कीजिये जोड़ि ॥ ६६ ॥ , 
एक सामरोफ्स सो काज्ञ । मह अस्ान- जिनसतकी चाल ३ 
यहै सायरेपमकी कथा। यथा छुनी मै वरणी तथा ॥| ७० ॥ 
आठकम अत्ताज्ञसों, प्रकतिमेद पिस्तार। ” 
के जान जिन केवली; के जाने मनधार ॥ ७१ ॥ , 
अल्पबुद्धि जेसी मुझ पाहि। तैसी मैं चरनी इसमाहि ॥ 
थंढित गुनी हँसो मत काय । अल्पमत्ती  भाषारूवि होय || ७र ए्‌ 
कर्मकोंड आगम अगम, यथाशक्ति मन आन। 
भापा में रचना कही, वालवोधमें जान ॥ ७३॥ 
हे ु फलसा-योताछन्द | 
यह के प्रकृतिविधान अविचल, नास अन्ध सुहावनां | 
इसमाहि गरभित सुप्वचेतन, गुपत धारह भावना॥ 


१७३०० 2० #९ ३५ हिष्कतयि,#०,//०९, #९६.॥५ ही #भ हरेक) #पिी- (3९५ 3५ #५ #९.+..)१.# +># अर तय.) / कान अगर अत 2५ 2० /#०/७ /१ 3००० >> समपपरिवरिक, 
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श्स्ट बनारसीविलांस 
>> ववखचि वि चिििमििगिििि्ल्ल््स््स्स् 





जो जान भेद वखान सरदहिं, शब्द अर्थ विचारसो | 
सो होय कर्मेविनाश निर्मेल, शिवस्वहूप “बनारसी”॥ ७४ ॥ 
. दोहा । 
सबत्‌ सन्रहसी समय, फाल्गुणमास वसन्‍्त । 
ऋतु शशिवासर सप्तमी, तब यह भयो सिद्ध त ॥ ७४ ॥ 
इति भ्रीकर्मप्रकृति विधान 





अथ कल्याणमन्दिरस्तोत्र भाषानुवोंद 
दोहा । 
परमव्योति परमातमा, परमन्नान परवीन। 
बंदों परमानंद्मय, घट धट अंतरत्ञीन ॥ १ ॥ 
चोपाईं ( १५ मात्रा ) 

निर्मेयकरन परम परधान | भवसमुद्र जलतारण जान 
शिवमन्दिर अघदरण अनिन्‍्द | वन्दहु, पासचरणअरबिन्द ॥२॥ 
कमठमानभंजन वरबवीर | गरिमासागर गुणगंभीर ॥ 
सुरगुरु पार कहें नहिं जाठु | में अजान जंपों जस वाठु ॥श) 
प्रभुस्वहूप अति अगम अथाह | क्यों हमसे 8६ द्ोय निवाह। 
ज्यों दिनअंध उल्लूको पोत | कहि न सके रविकिरनडदोत ॥४॥ 
मोदद्दीन जाने सनमांहिं। तोड न तुमगुण वरणों जाहि॥ 
प्रतयपयोधि करे जत्ल बौन | प्रगर्ट् रतन गिंगे तिहि कौन ॥ 
तुम असंख्य निर्मंलगुणखानि | में मतिहीन कहों निजबावि ॥ 
ज्यों बालक निज वांह पसार। सागरपरिमित कहे बिचार ॥॥ 


मना»ालकननमनमभान नमक 








बनारसीबिल्लास १२४ ] 





| अल ००क>++नन--मन-न मनन जनननम-पमना- पान आमक. 


जो जोगीन्द्र करहिं तप खेद | तड न जानहिं तुमगुणभेद ॥ 
' भगतिभाव मुझ मन अभिलाल | ज्यों प॑सी बोलहिं निज भाव |». 

तुम जेसमहिमा अगम अपार ।'नाम एक त्रिभुवन आधार ।॥ 
'आबे पवन प्मसर होय | प्रीपम्तपत निवारे सोयः ॥०॥ 
: तुम आंवत भविजन मनमाहि |'कर्मनिबंध शथिल हो जो हिं। 

ज्यों चंदनतरु बौजहि-भोर । ढरहिं भुजड्न लगे चहुओर ॥६॥ 

तुम .निरखतजन ' दीनदयाल ॥ संकटतें छूटाहं ततकाल॥ 

ज्यों पशु घेर लेहि निशिचोर | ते तज भागहिं देखत मोर ॥१०॥ 

तू भविजन तारक किम होह ! ते चित धार तिरहिं जै तोह ॥ 

यह ऐसे करि जान स्वभाउ | तिरे मसक ज्यों गर्मितवाउ ॥११॥ 

जिन सब देव किये वश वाम | तें छिनमें जोत्यो सो काम ॥ 

ज्यों जल करे अपभ्निकुलहानि | बड़वानत्ञ  पीष सो पानि ॥१९॥ 

तुम अनन्त गरुवा गुण . लिये | क्योंकरभक्ति घर निजहिये॥ 

हे लघुरूप 'तिरहि संसार । यह अभुमद्िमा ,अकथ” अपार ॥११॥ 

क्रोध निवार कियो मनशांति। कर्म छुभटजीते किहि भांति ॥ 

'यह पठतर देखहु संसार ! नीलबृक्ष ज्यों दहे ठुसार '॥१४॥ 

मुनिजनहिये कम्रतत निज टोदि। सिंद्धरप समध्यावदि तोहि॥ 

कमलकर्शिका विन नहिं और। कमलवबीज उपजनकी ठौर ॥१श॥। 

जब |तुद्द ध्यानधरे सुनि कोय-। तब विदेह परमातम होय ॥ 

जेसे धातु शिक्षातन त्याग। कनकत्वरूप घवे जब आग ॥१॥ष॥ 


जाके मन तुम करहु निवास | विनस जाय क्‍यों घिम्रह तास ॥ 
'क्यों महन्त विच ,आबे कोय। पिम्रह् मूल निवारे सोच ॥१७॥ 


को ली हसवीदनीम वीक वि. पहिनियाधियकियि दीदी कविकािकीयकीकी दानिीओ ।#2३८2०३.#वा ५७ अमर. #7 (मकान कक कान # वि (मं किकीविन्‍गिन्‍ी. 
हम अिवानिश जरदीया अशिभानिानिशानिक जा गा जामिया जय कक मा मा ाणणणणणााा 








[ १२६ ; धनारसीबितास 


करहिं विवुध जे आतम ध्यान | तुम प्रभावतें होय निदान || 
, जैसे लीर सुधा अनुमान। पीवत विष विकारकी हान ॥१८॥ 
तुम भगढंत विमल गुणलीन | समलरूप मानहिं मतिहीन || , 
ज्यों नीलिया रोग दृग गहै। वर्ण पिवर्ण संखसों कहे ॥१६॥ 
के दोहा । “: 
निकट रहते उपदेश घुनि, तरुवर “ भये अशोक | 
ज्यों रवि ऊगत जीव सब, प्रगट होत भुवित्ञोक ॥ २० ॥ 
सुमनदृष्टि जो छुरकरहि, द्ेठ वीठमुख सोहि। 
त्यों तुम सेवत सुमनजन, बंध भ्रधोमुख द्योहि॥ २१॥ 
उपजी तुम हिय उद्धित, वाणी सुधा समान | 
जिहिं पीवत भविजन लह॒हिं, अजर अमर पद्थान ;२२॥ 
कहहिं सार तिहुज्ञोकको, ये सुरचामर दोय । 
भावसहित जो जिन नमें, तसु गति ऊरध होय॥ २३॥ 
सिंहासन गिरि मेरु सम, प्रभुधुनि गरजित घोर । 
श्याम सुवन घनरूप लख, नाचत भविजन मोर ॥ २४॥ 
छवि ह॒त होंहि -अशोकदल्न, तुमभामंडत्त देख । 
वीतराग के निकट रह, रहत न राग विशेक्ष॥ २५॥ 


शीखि कहे तिहुंत्ञोकको, यह सुरदु दुभि नाद । 
शिवपथ सारथिवाह जिन, भजहु तजहु परमाद ॥ २६॥ 
तीन छत्र त्रिभुवन उद्ति. मुक्तागण छविदेत। 
त्रिविधिरूप धर सनहुँ शशि, सेवत नखतसमेत।॥ २७॥ 
ह पद्धरिछन्द । 
प्रभु तुम शरीर दुति रतन जेम | परताप पुज़ जिम शुद्ध देम॥ 
अति धवलसुजस रूपा समान | तिनके गढ़ तीन विराजमान ॥ २८) 


शान का जा 











वनारसी विलास २७ ] 


अर वनलतीलफलमाशा-प पनमम ०५ पपर-4 मकान नमन ७-७२ <७-33»-3 3०५3-५७ ७० -2--+3५७3+ ५3» -333»५+3+०७+ 3७33-3५ क-3-4३०+ अमन भा +५+«५० ५५५०७ ल्‍५५«५७५+3»७++++पमभ-3५॥७०७-७-कआ५ न ५५-५० 
जग एक भातपयुता पकाप्स यह वही करम-काेअन्स जिक्र अन्य का कटी का पक 'ऋ"ह ६०-सक रे? एक कम कमा आम कु ३०8 वन्य पार्क पिला कती पक चर सम के पाकर पेड ३ सह पक पटरी पक, 


सेवहिं छुरेन्र कर नप्तित भांत्त | तिन शीसमुकुट तज देहिं माल ॥ 
तुष चरण लगत लहलह प्रीति । नहिं रमहि और जन सुमनरीति॥२६।॥ 
प्रभुभोग विमुत्न तन कमे दाह। जन पार करत भवजल निवाह॥ 
' ज्यों माटीकलश छुपक होय। ले भार अधोमुख तिरद्दि तोय ॥३०॥ 
तुम महाराज निर्धेन निराश | तज विभव विभव सब जग विकाश ॥ , 
अत्तर स्वभावसैलिसे न कोय । सहिमा अनन्त भगवंत सोय ॥३१॥ 
कोप्यो सु कमठ निज बेर देख। तिन करी धूत्ञ बषों विशेख ॥ 
प्रभु तुम छाया नदिं भई ह्वीन | सो भयो पापी लंपट मल्षीन ॥३१॥ 
गरजंत घोर घन अंधकार | चमकंत विज्जु जलमुसलधार॥ 
चर॒पंत कसठ धरध्यान रुद्र | दुस्तर करंत निजभवसमुद्र ॥३१॥ 
क्सतु छनन्‍्द | 
मेघमाली मेघमाली आप बल फोरि। 
भेजे तुरत पिशाचगण, नाथ पास उपसगे कारण | 
अग्नि जाल भलकंत सुख, धुनि करंत जिमि मत्तवारण ॥ 
कालरूप बिकराल तन, मुंडमाल तिह कंठ। 
हो निशंक वह रंकनिज, करे कर्महदगंठ ॥ 
चपाई । 
जै तुम चरणकमल तिहुंकात | सेवहिं तज मायाजंजाल | 
भाव भगतिसन हर॒ष अपार। धन्य २'जंग तिन अवतार ॥३५॥ 


भवसागरमहं फिरत अजान। में तुम घुजश सुन्यों नहिं कान ॥ 
जो प्रभुनाम मंत्र मन धरे।तासों बिपति भुजंगम डरे ॥३क। 





5 


[ ११८ बनारसीबिलास 


मनवांछित फल जिनपदसांहि | में पूरव भव पूजे नाहि। 
साया' सगत फिरयो अज्ञान। करहिं रंकअन मुझ अपमान ॥३ेण। 
मोहतिमर छायो- दृग मोहि। जन्मान्तर देख्यो नहिं तोहि ॥ 
तौ ढुजन मुझ ,संगति गह। मरसछेद के कुबचन कहें॥|३८॥ 
 छुन्यो कान जस पूजे पाय। नैनत देख्यो रूप अघाय ॥ 
भक्ति हेतु न भयो चित चाव | दुरूदायक किरियाविन भाव ॥३६॥ 
महाराज- शरणागत पाल । पतितउधारण दीनदयाल ॥ 
प्रुमिरण करहुनाय निज शीस । मुझ दुख दूर करहु जगदीश ॥४ ० 
कुम निकन्द्नमहिमा सार | अशरणशरण सुजश विसतार ॥ 
नहिं सेये प्रभु तुमरे पाय। तो मुझ जन्म अकारथ जाय ॥४६॥ 
सुरगण वन्दित दया निधान। जगतारण जगपति जगजान || 
दुखसागरतें मोहि निकासि | निर्भयथान देहु सुखराशि॥४श॥ 
में तुम चरणकमल गुन गाय । वहुविधि भक्ति करी मनलाय ॥| 
जन्मजन्म प्रभु -पावहुँ तोहि। यह - सेवा फल्ष दीजे - मोहि ॥४३॥ 
दोधकान्तं वेसरी छन्द । पट्पद 
इह्विधि भ्रीमगवंत, सुजश जे भर्विजन भाषहिं | 
ते निज पुण्य भंडार, संच चिरपाप अणासहि ॥' 
रोमरोम हुलसंति अंग प्रभु गुणमनध्यावर्हि | 
स्वगेसपदा - सुज, वेग पंचम गति. पावहिं॥ 
, चह कल्याणमन्दिर कियो, कुम्ुद्चन्द्र की बुढ़ि। 
, भाषा कहदत बनारसी, कारण समकितशुद्धि, ॥४४॥ - 
५३५ इति-श्रीकल्याणमन्दिरस्तोत्र॑ ॥7,: 


क्ज 





बतारसीविलास १२६ ] 





अथ साधुबन्दना लिख्यते 


दोहा । 

श्रोजिनभाषित भारती, सुम्ारि आन मुखपाठ । 

कहों भूल गुण साधुके, परमित विशतिझाठ ॥ १ ॥ 

पैचमहात्रत आदरन, समति पंच परकार | 

प्रवल पंच इन्द्रिय विजय, घट अवशिक आचार ॥ २ ॥ 

भूमिशयत्त संजनतजन, चसनत्याग कचलोच | 

एकबार तघुअसन तिथि-असल दंतवन भोच ॥ ३ ॥ 

चोपाई | । 

थावर जन्तु पंच परकार। चार भेद्‌ जंगम तन धार | 
जो सन जीवनको रखपाल। सो छुसाधु वन्दह' तिरकाल॥७॥ 
संतत सत्य वचन मुख +है। अथवा मौनविरत धर रहै | 
सृयावाद्‌ नहिं. बोले रती। सो जिन मारय सांचा जंती॥५॥ 
कौड़ी आदि रतन परजंत | घटित अघट धवमेद अनंत ॥ 
दत्त अदत्त न फरसे जोय। वारण वरण मुनीश्वर सोय ॥६॥ 
पशु पंखी नर दानव देव। इत्यादिक रमणी रति सेव॥ 
वजहिं निरन्तर मदन विकार । सो मुद्रि नमहु जगत दितकार॥७॥ 
द्विविधि परिमह दशविधि जान । रंख असंख अनन्त बखान ॥ 
' सकल सगवज होय निराश | सो भुनि कहे मोक्ष पदचास ॥५॥ 
अधोद्प्ट मारग अलुसरे। प्राशुक भूमि निरख पग घरे॥ 
सद्‌य हृदय साथे शिव पंथ। सो तपीश निरभय निर्भन्‍्थ ॥६॥ 








[ १३० बनारसीनिलार 


निरसिमान निरवय अदीन । कोमल मधुर दोष दुख हीन ॥ 
ऐसे सुबचन कहै स्वभाव । सो ऋषिशाज नम धरि भाव १० 
उत्तम कुल श्रावक संचार । तासु गेह प्राशुक आहार ॥ 
भुजे दोष छियालिस टाक्त । सो मुनि बंदों सुरति संभाल ॥११॥ 
उचितवग्तु निजहित परददेव | तथा धर्म उपकरण अचेत |! 
निरख जतनसों गहे जु कोय । सो पुनि नमहु जोर कर दोय ॥१श॥ 
रोगविकृति पूरव आदान । नवदुवार मल अंग उठान ।! 
ढारे प्राशुक भूमि «्हार। सो मुनि नमहु' भगति उरघार ॥१श॥ 
कोमल कर्केश हरुव सभार | रुक्त सचिक्ण तपत तुसार ॥। 

इनको परसन ढुख छुखलहें | सो मुनिराज जिनेश्वर कहें ॥१४॥ 
आमल कटुक कषायल प्रिष्ट | तिक्त क्षार रस इष्ट अनिष्ट ॥ 
इनहिं स्वाद रति अरति न वेब । सो ऋषिराज नमहिं तिहें देव |१५ 
शुभ छुगंघ नाना परकार | दुखदायक दुगेन्ध अपार ॥ 

नासा विषय गनहि समरतूल। सो मुनि जिनशासनतरुमूल ॥१॥॥ 
श्यामहरित सित लोहित पीत | बरण विचरण मनोहर भ त | 

ए निरखे तज राग विरोध । सो मुनि करे कर्ममल शोध ॥१ण। 
शब्द कुशव्दहिं समरस साद। श्रवण सुनत नहिं. हर॒प विषाद ॥ 
थुति निदा दोऊं सम सुणे। सो मुनिराज परम पद मुणे॥(८॥ 
सामाइक साथे तिहु काल । मुकति पंथकी करे सभाल ॥ 
शन्रुमित्रदोड॑ सम गणे। सो मुनिरान करमरियु इसे ॥१६ा 
अहत सिद्ध सूरि उवस्ाय। साधु पंच पढ़ परम सहाय॥| 
इतके चरणन में मन लाय। तिस भुनिवरके वन्दों पाय॥२०। 


ल्््श्््ुंव्ु्ँचल्ल््््च्लचल्प्च््क्ल्ल्््््_्__्__॒ के आय चलिशलिनॉजआकिल 
शिव मन्कनक कक जज नवीभाविवीभीभीकीडी#मीडबैआआ 





बनारसीविल्ञास १३१ ] 








पावन पंचपरम पद्‌ हृष्ट । जगतमा्दि जाने उतकिष्ट ॥| 
उठाने गुणधुति बारंबार।सो मनिराज है भवपार ॥२१॥ 
ज्ञान क्रिया भुखधारे चित्त । दोष दिल्ोक करे आहिच ॥ 
नित प्रविक्राणक्रियारसल्ञीन । सो सुसाधु संजम प्रबोन ॥२२॥ 
अजिनवचन रचन विसतार । द्वादर्शांग पर्मागम सार 
सतिजमति मान करे सब्माड | सो मुनिवर बंदहु घर भार १२३॥ 


फाउसग्य मुद्रा घर नित्त । शुद्धस्वरूप विचार चित्त ॥ 
त्यागे ज्रिविधिजोग ममकार। सो मुनिराज नमो निरधार धरशा। 


प्राशुक शित्ञा उचित भूखेत। अचल अंग समभाव सचेत ॥ 
पश्चिमरेन अल्प निद्राल। सो योयोश्वर बेचे काज् ॥२५॥ 
घर्मध्यान जुत परम विचित्र । अन्तर बाहिज सहज प्रवित्र ॥ 

न्हान बिल्लेएन बजे त्रिकाल। बन्दों सो मुनि दीनदयात्र ॥२६॥ 


स्तोकेज्ञाजविगल्ित भयहीन। विषयवासनारहित अदीन | 

नगन द्गम्बर मुद्गराकर | क्षे मुनिराण जगत सुखकार॥२७५ 
सधने केश गभित रलकीच | कस असंख्य उतपति तसुबीच | 
कऋच लु थे यह कारण जाब । खो मुसरि नमहु.जोरजुयपाव ॥२८५।! 
ऋुधा चेदनी उपशम द्वेत। रस अनरस समभाव ससेत ॥ 

शकवार लघु भोजन करे। सो मुनि मुकति पंथ पगधरे ॥२६१ 
देह सहारी साधन म्रोष् | तबत्तों उचित कायबल पोप ॥ 

यह विचार थिंवि लेहिं अहार । सो मुनि प्ररम धरम घनघार ॥३०॥ 
जहेँ जहेँ. नवदुवारमतप्ात | तहें तहें अमित जीव उत्पात ॥ 
यह लख तजहिं दंतवन काज । से शिवपथस.घक ऋषिराज ॥३१॥ 


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«रॉ बनारसीविलास 


ये अरष्टाविस मूल गुण, जो पा्हिं निरदोष | 
सो मुनि कहत “बन्तारसी” पाव अ्विचल भोष ॥ ३९॥ 
इतिहाधुवन्दना 


अथ मोक्षपेडी लिख्यते 
दोहा । 

इक्क समय रुचिवंतनों, गुरु अवरखे सुनमल्न । 
जो तुझ अंद्रचेतना, पहे तुसाड़ी अन्न ॥ १॥ 
ए जिनक्चन सुहावने, सुन 'चतुर धयल्ला। 
अक्खे रोचकशिवतनो, गुरु दीनदयज्ञा॥ 
इस बुक बुध लह॒तहै, नहीं रहे मयल्ला । 
इसदा मरझ न जानई, सो द्विपद चयज्ञा ॥ २॥ 
निसदौ गिरदा पेचसों, हिरदा कलमल्ला । 
जबिसना संसे तिमिरसों, सूके मलमन्ला ! 
खने जिन्‍्हादी भूमिनौ, छुज्ञान कुदल्ला । 
सहज तिन्हादा पहजसों, चित रहे दुदल्ला ॥ ३ ॥ 
जिन्दा इक करमदा; दुविधा पद भन्ना। 
इक्क अनिष्ट असोहणा, इक भाक ममला ॥ 
दिन्हां इकन सूसई, उपदेश अहल्ला । 
बेककटाछे लोपना, ज्यों चंद गहल्ला ॥ ४ ॥ 
लिन्हां चित इतवारसों, गुरषचन न भज्ला । 
ज्षिन्दां आमें. कथन यो, ज्यों कोदों दल्ला || 


बतारसीविलास द२० | 


ध्ररपरौपपन मन यपिियीगिक फीपि' 


बरसे पाहन भुम्मिमें, नहिं होय चहल्ला। 

बोये बीज न ऊपपजे, जल जाय बहल्ला॥ ५॥ 

चेतन इस संसारमें, तू सदा इकता। 

आपे रूप पिशाच, हो ते झप्पा छल्ला ॥ 

शआपे धुम्यां गिरि पया, किणिदित्ता ट्ला। 

जिन्हसों मिलन बिजोग है, तिनसों क्‍या तल्ला || $॥ 
इस दुनियांदी मोजसों, तू गरबगहल्ला । 

भया भार खम पुरुष, ज्यों छप्पर विष बल्ला ॥ 
सुपनेदा सुख मात तें, अपना घर घन्ला | 

फिरा भरमकी भौंरमें, तू सहज विलल्ला ॥ ७॥ 


जोग अडंवर तें किया, कर अंबर मन्ला । 

अंग विभृति लगायके, लीनी मृग छल्ला ॥ 

है बनवासी तें तजा, घरवार महल्ला। 
अप्पापर त पिछाणियां, सब भूठी गल्ला ॥ ८॥ 
माया मिथ्या अग्रसोच, ये तीनों सल्ला । 

तिह बादी करतूतसों नियदा उरभज्ञा ॥ 
ज्यों रुधिरादी पुट्सों, पट दीते तज्ला । 
रुघिर,नलहि पसालिये, नहिं होय उजल्ला ॥ ६॥ 
जब लग तेरी समभमें, होंदी हल चज्ला 
सुजश बढ़ाई लाभनो, करदा छत्न बल्ला ॥ 
तबल्ग तू स्याणा नहीं, क्या मारइ कल्ला । 
सोर करंदा पातण, ज्यों कूले लज्ला ॥ १० ॥ 











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पफ्क्का 7 उज्नरसीबित्ास - 





20.2 /#५ १००५ #घ गज 


किए तू' जकरा सांकलां, क्रिण पकरा पल्ला । 
मिद्मकरा जो उरमिया, उर जाल उगल्ला ॥ 
चेतन जद संजोगमें, ते ढांका मज्ला | 

तुद्दी छुडावहि आपको, लख रूप इकल्ला॥ ११॥ 
जो मैं दारिद मानिया, हे ठल्लमठल्ल । 

जो तू मानहि संपदा, भरि दामहू गल्ला ॥ 

जो तू हुवा करंकसा, अरु मोगर मल्ला | 

सो सब नाना रुप हे, नाचे पुदुगल्ला ॥ १२॥ 
जो कुहूप दुरलच्छणा, जो रूप रसल्ला। 

वे संघा भरि जोबना, बूढा अरु बल्ला ॥ 

लंब ममोला ठींगना, गोरा अरु वल्ला | 

सो सब नानाहप है, निहचे पुत््ला॥१३॥ 
जो जीरण हो मरपडे, जो दोय नवल्ला। ह 
जो मुरमाने सुकके, फुला अरु फल्ला ॥ 

जो पानीमें वह चले, पावकर्मे जल्ला। 

सो सब नानारूप हो, निहचे पुद्ुज्ला ॥ १४ ॥ 

एक कम दीसे दुघा, ज्यों तुलवा पल्ला | 

हरुबे तन गुरुषेतसों, अध ऊरघ थल्ला ॥ 

अशुभरूप शुभरूप हे, ढुह दिशिनों चल्ला । 

धरे दुविधि विस्तार जौं, वट विरख जटल्ला ॥ १५॥ 
पवन परे रे जो उडे, साटो विच गल्ला। 

जो अकाशमें देखिये, चल्त रूप अचल्ला॥ ५ ' 


ख््््च ् य्ञखच्ल्ललयच्श्श््ुंश्शश्शधश्श्लस्ाः 





नारसीविलास १३४ ] 


न्‍दताकर-करअासतचरमआ5०-ा रन ४४ ऊरक+ए७६3३0७५3.4६४ ५५७4-५७ भ+-जकम 42०3०. अरा-+-पपलन-नरपथ5०-मा नम. 
॥० अकरििकीयसन# पापा मे परम े हे 4३.७... 3७ नानक ३धआमाम्मेकाफ अममइरिमयामदात 3 कील... फरए॥ >०अिकीी * कम कया #+ #0,/९५/००९//०%:' 


पापी पावक पौन भू, चहुंधामें रहना । 

सो सब नाना रुप है, निहचे पुद्ल्ला ॥ १६॥ 
खिणरोवे खिणमे हंसे, जो मदमतवल्ला। 

त्यों दहु बादी मौजसों. वेहोश समझना ॥ 
ईकसबीच विनोद है, इकमे खलफल्ला | 
सुमचृष्टी सदजन करे, दुहुसो हलभन्ला॥ १७॥ 
जति दुहूंकी एक जौ, मणि पत्थर उल्ला। 

जल विथार संकोच सों कहिए नदि नल्ला ॥ 

उद्धव जलपरवाहमे, जौ भौर घुलल्ला। 

त्यों इस कम विपाकद़े, बिच ऊ'चा खल्ला॥ १८॥ 
दुहुदा अधिर स्वभाष है, नहिं कोई अट्ल्ला | 

ऊ'च नीच इक सम करे, कतिकाल पटल्ला || 

अध ऊरध ऊरघ अधो, धिंति उथल पुथल्ला | 
अरहट हार विहरमें, क्या ऊपर तज्ला ॥ १६॥ 
पाया देवशरीरज्यों, नल्ननीर उछल्ल । |[ 
भव पूरण कर ढहि पयो, फिर जल व्यों उल्ला ॥ 
पुण्य पाप बिच खेद है, यह भेद न भन्ला। ..._. 
ज्ञान क्रिया निरदोष है, जहें सो महज्ला॥ २०॥ | | 
बतनु तु साढा मोहमें, जो रोद रुदल्ला । 

थिति प्रवाण तुम नो भया, गुरुल्नान दुहज्ञा ॥ 

अब घट अंतर घटगई, भव भीर चुहनज्ला।._ 

परम चाह परगट भई, शिव राह सहल्ला ॥ २१॥, 





१३६ |, बनारसी विलास 








ज्ञान दिवाकर ऊगियो, भति किरण प्रवल्ला। 
है शत्त खंड बिहंढिया, भ्रम तिमर पटल्ा। 
सत्य प्रताप भंजिया, दुर्गती दुुला। 

अंगि अंग,रे दल्मिया, जौं तूल पहल्ला ॥ २२॥ 


दोहा । 
यह सतगुरुदी देशना, कर आस दीवाढ़ि। 
लड़ी पैडि भोखदी, करम कपाट उघाड़ि ॥ २३ ॥ 
भव थिति जिनकी घटगई, तिनको यह उपदेश | 
कहत बनारसिदासः यों, मूढ़ व समुझे लेश ॥ २४ ॥ 
॥ इति श्रौमोषपेडी ॥ 


झथ कर्मछत्तीसी लिख्यते . 


दोहा । 

परम निरंजन परमगुरु, परमपुरुष परधान | 
वन्द्‌हु, परमसमाधिगत, भयभंजन भगवान ॥ १ ॥ 
जिनवाणी परमाण कर, सुगुरु शीख मन आन ) 
कछुक जीव अरु कमको, निणेय कहों वत्ान॥ २॥ 
अगम अनंत अलोकनभ, तामें जोक अकाश | 
सदाकाल ताके उदर, जीव अजीब निवास ॥ ३॥ 
जीव द्रव्यक्री है दशा, संसारी अरु सिद्ध । 

पंच विकल्पअजीव के, अखय अनादि असिद्ध ॥ ४॥ 
््त्श्््ं्य््श्शश्यश्य्थ्श््लश्श्ु्ल्ंल्िशश्श्लशलल््््््््््5ू<5ू 





जा 


बषनारसीचिज्ञास १३७], 





गगन, काल, पुदल, धरस, अरु अधर्म अभिधान। 
अब कछु पृद्क्ञ द्ृव्यको, कह्दों विशेष विधान ॥ ५॥ 
चरमदृष्टिसों प्रगट है, पुल द्रव्य अनंत । 

जड़ लक्षए निर्जीब दल, रूपी मूरतिबंत ॥ ६॥ 

जो त्रिुवन थिति देखिये, थिर जंगम ओकार। 
सो पुद्कल परवानको, है अनादि विस्तार || ७ ॥ '. 
अब पुद्लके बीसगुण, कहों प्रमट समुमायं। « 
गणित और अनन्तगुण, अरु अनन्त परजाय।॥ 7॥ 
श्याम पीत उन्ज्चल अरुण, हरित मिश्र बहु भांति। . 
विविधवण जो देखिये, सो पुदलकी कांति ॥ ६ ॥ 
आसल तिक्त कषाय कट, ज्ञार मधुर रसभोग। 

ए पुद्लके पांचगुण, घट मानहिं सबल्ोग ॥ १५, ॥ 
तातो सीरो चीकनो; रुखो नरस कठोर | 

हलक। अरु भारीसहज, आठ फरस गुणजोर ॥ ११ ॥ 
जो सुगंध दुरगेधगुण, सो पृद्नलकों रूप । 

अब पुद्ल्त परजायकी, महिमा कहों अनूप ॥ १२॥ 
शब्द, गध, सूक्षम, सरल, लम्ब, वक्र, झघुथूल |. 
बिछुरन, भिदन, उदोत, तंस, इनको पूद्रल मूल॥ १३ | 
छाया, आकृति, तेज, दुति, श्त्यादिक बहु भेद। , 

ए पुदुल्परजाय,स॒ब, प्रगृटहिं - होय उल्केदू॥ १४ ॥ 
केई शुभ केई अशुभ, रुचिर, भयानक सेष | ' 
सहज स्वभाव विभाव गति, अरु साम्तान्य विशेष॥ १४॥ 
गर्भित पुद््षपिंडमें, भरत अमूरति देव । 








हम मल जज सा... मल" ंबौबं६ या ंआा७ल्‍ल्‍७७७॥७७४७८७८्एशभश/श॥॥ शा 


[ हम ' ह वनारसींबिलास 
फिरे सहज भवचक्रमें, यह अनादिकी ठेव॥ १६॥ 
पुदक्षकीं संगति करे, पुह्ल्दहीसों ग्रीति। 
पुद्लकी आप गणे, यहे भरमकी रीति ॥ १७॥ 
जे जे पुद्लकी दशा, ते निज मानें हँस । 
याही भरम विभावसों, बढे करमको बंश | १८॥ 
ज्यों ज्यों करमें विषाकवश, ठाने अ्मकी भौज | 
त्यों त्यों निज संपति दुरे, जुरे परिग्रह फोज ॥ १६ | 
ज्यों वानर मरा पिये, विच्छू डंकित गात । 
भूत लगे कौतुक करे, त्यों भ्रमको उत्पात ॥ २०॥॥ 
श्रम संशवकी भूलसों, जहे न सहज रवकीय । 
करम रोग समुमे नहीं, यह संसारी.-जीय | २१ ॥ 
कम रोगके दे चरण विषम दुहंकी कल) 
एक कांप प्रकृती लिये, एक ऐंठि असराक्त ॥ २२॥॥ 
कंपरोग है. पाप पद, अकर रोग है पुण्य | 
ज्ञान रूप है आतमभा, ढुह्नू रोगसों शून्य ॥ २३॥ 
मूरख मिथ्याहष्टिसों, निरले जगकी रॉस । 
डरदिं जीव सब पापसों, करहि पुण्यकी होंत ॥ २४ ॥ 
' डपजे पांपविकारसों, सय तापादिक रोग ।' ' 
चिन्ता खेद विथा बढ़े, हु खमाने सबल्ोग | २६॥ 
उपज पुस्यविकारसों, विपयरोग वित्वार। 
आरत रुद्र विथा बे, सुख मानें संसार ॥ २६ ॥ 





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पघरनारसीबिज्ञास १३६ ] 


दोऊ' रोग समान है, मूह न जान-रीति। 
कंपरोगसों भय करे, अकररोगसों प्रीति | २७७ 
ममिन्न २ लक्षण तखे, अगट दुहू की भांति । 
णक लिये उहं गत, एक लिये उपशांति ॥ २८॥ 
कफच्छपकीसी सकुच है, बक्र तुरगकी चाह | 
आअंधकारफोसो समय, कंपरोगके भा ॥ २६ ॥ 
चकरकूद्सी उमेंग है, जकरबन्दकी चाल ॥। 
मकरतचांदनीसी हिपै, अकररोगके भाल ॥ १० ॥ 
त़म3दोत दोऊ' प्रकृति, पुन्‍्लकी परजाय १ 
मेदज्ञोन बिन मूढ़ मत, भटक'सटक भरमाय ॥ २९ ४ 
दुहुँ रोगको एक पद, दुहुं सों मोत्त न होय १ 
बिनाशीक्ष दुद्डु की दशा, बिरत्ला चूके कोय ॥ ३२ ४ 
कऊ गिरे पहाड़ चढ़, कोऊ बूढ़े कृप । 
भस्य दुहुको एक सो, कहिवेको ढ रूप ॥ ३३ ॥ 
' अववासी दुविधा धरे, तातें लखे न एक 4 
रूप न जाने जल्नधिको, कूप कोषको भेक ॥ २४ ॥ 
मात दुह्ु की वेदनी, (पता दुहूं की मोह । 
दु्लु बेड़ीसो बंचि रहे, फहवत कंचन लोह'। ३४५ ॥ 
जाति दुह्व की एक हे,'दोय आहट ज्ये छोय | 
हे आधचरे सरदहे, सुरबल्लम है सोय ॥ ३६ 
के चित जैसी दशा, ताकी तसी दृष्टि । 
पंडित भव खँदित करे, भरृढ वढावे सृष्टि ॥ 39॥ 
रतिकाा छचीती। *. कम छत्तीती। ' 














सम्यी००७...--पि- मई 


[ १४० बनारसीबिलास 





३९..३१,2०३/९५/०८/०९३०३./*१९५/४.९/००९..>मू#प /२३/िह चिकनी /गह>रयिडी पिलिल्‍रिपिकरी पेपर कि कान 


. भ्रथ ध्यानवत्तीसी लिख्यते 


ढोहा । 
ज्ञान स्वरूप अनन्त गुण, निरावाध निरुपाधि ! 
अविनाशी आनन्दमय, वन्दृहु' त्द्मसमाधि )| १ |) 
भानु छदय दिनके समय, चन्द्र उदय निशि होत ! 
दोऊ' जाके नाम में, सो गर सदा उदोत ॥ २ ॥ 
चोपाई ( सोछामात्रा ) 





चेतह पाणी घुन गुरुषाणी | अमृतरूप सिद्धांत चलानी! 
परगट दोऊ' नय समुझाषे । मरमी दोय मरम सो पादें॥ ३ ॥| 
चेतन जड अनादि संजोगी | आपहि करता आपहि भोगी | 
सहज स्वभाव शकति जब जागे | तब निहचेके मारग लागे ॥ ४ ॥ 
फिरके देहबुद्धि जब हो । नयव्यवह्वार कह्ावे सोई | 

भेदभाव गुन पंडित बूके । जाको अग॒म अगोचर सूमे॥ ५ ॥ 
प्रथमहिं दान शीज़ तप भावे । नय निहचे विवद्ार लखावें ! 
परगुणत्यागबुद्धि जब होई। निहचे दान कहाब सोई॥ ६॥ 
चेतन निज स्वभावमहें आवे। तब सो निमश्चयशील कद्यवे | 
कर्मनिजरा होय विशेषे । निश्नय तप कहिये इद लड़ ॥ ७ ॥ 
विमलरूप चेतन अभ्यासे | निम्वयभाव तहां परगांसे | 

अब सदगुर व्यवद्वार बखाने | जाकी महिमा सब जयजाने ॥ ८ ॥ 
मनवचकाय शकति कछु दीजे | सो व्यवह्दरी दान कहदीजे | 
मनवचकाय तजे जब नारी । कहिये सोई शील विवहारी ॥ ६ ॥ 


ख्श््श्श्श्ल््य्य्य््य्श्श्श्श्श्श्श्श्््ल््ः 


बनारसीपिलांस १४१ | 





मनवचकाय कष्ट जब सहिये । धासों विवहारी तप कहिये। 
मनवचकाय लगनि ठहराव | सो विधहारी भाव कहाने ॥ १०॥ 


दोहा । 


दान शील तप भावना, चारों सुख दातार । 
निहचे सो निहचे मिले, विवहारी विवहार || ११॥ ' 


चपाई।..| 
[ सुन चार ध्यान हितकारी | साधहिं मुक्तिपंथ व्यापारी ॥ 
मुद्रा मूरति छवि चतुराई। कल्ामेप वल्वेस बढाई॥ १२॥ 
फरस वरण रस गंध छुसाला। इद्द रुपस्थध्यानकी शाखा ॥ '. 
इनको संगति मनसा साथे । लगन सीख निज गुण आराधे ॥१श॥ 
रहै मगन सो मूड कहावे | अलख लखाव विचच्छण पांबे ॥| 
अहत आदि पंच पदलीजे | तिनके गुणकी सुमरण कीजे ॥१४॥ 
गुणकी खोज करत गुण लहिये । परमपद्स्थध्यान सो कद्दिये ॥ 
चंचलत। तज चित्त निरोधे । ज्ञानदृष्टि घटअन्तर शोषे॥ १५॥ 
भिन्न भिन्न जड़ चेतन जोबे । गुण विज्षेच्छ गुणमादि समोवे ॥ 
यह पिंडस्थध्यान सुखदाई | कर्मनिरजरा हेत उपाई।॥| १६॥ 
आप संभार आपसों जोरे । परशुण्सों सब नाता बोरे॥ 
लगे समाधि ब्रद्ममय होई। रूपातीत कहाब सोई॥ १७॥ 
दोहा । 
यह रुपस्थपद्स्थविधि; अरु पिंडस्थविचार'। ' 
रूपातीत वितीत भक्त, ध्यान चार परकारं॥ ६-॥ | + 











वी 3७ ला, ३०+24 ०74९४ ०७७७४७७एशशआशआशआआआआशशशशाशञिशल 


कक 


१४२ | बनारसी विल्ांस 





चोपाई | 
ज्ञानी ज्ञान भेद परकाशे। ध्यानी होय सो ध्यान अभ्याे ॥ 
भ्राते रौड़ कुध्यानहिं त्यागे | घमंशुकलके मारग लागे॥ १६ ॥ 
आरत ध्यान चिंतवन कद्िये | जाकी संगति दुरगतिलहिये॥ 
इष्टविनोग विकलता भारी । अरि अनिष्ट संजोग दुखारी ॥ २० ॥| 
तनकी व्यथा मगन मन भूरे | अग्र श्ोचकर चांछृति पूरे ॥ 
ए आरतके चागें पाये। महा। मोहरससों लपठाये॥ २१॥ 
अब सुन रौद्र ध्यानकरी सेली। जहां पापसों मतिगति मैली॥ 
मनउदाहसों जीव पिराणे | हिये हृर्पधर चोरा साथे॥ २२॥ 
विकसित भूटवचन मुलभाखे। आनंदितचितविषया राखे ॥ 
चारों रौद् ध्यानके पाये | कर्मबन्धके हेतु बनाये ॥ २३ ॥ 


दोहा । 
शारतरौद् बिचारतं, दुखचिन्ता अधिकाय। 
जैसे चढ़े तरंगिनी, महामेघ जलपाय ॥ २४॥ 
चोपाई । 
आते रौद् कुष्यान बखाने। धर्मध्यान अब सुनुहु सयाने ॥ 
केवल भाषित वाणी माने । कर्मनाशको उद्यम ठाने ॥ २४ ॥ 
पूरवकर्म उदय पहिचाने । धरुषाकार लोकथिति जाने || 
चारों धर्म ध्या के पाये। जे सप्तुके ते मारण आये ॥ २६ ॥ 
अब सुन शुवल ध्यानकी बातें | मिटे मोहकी सत्ता जातें । 
ओग साध सिद्धांत विचारे। आतभ गुण परगुण निरवारे ॥ २७॥ 


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बनारसीबिलास १४३ | 


उपशम ज्ञपक श्रेणि आरोहै | परथक्त दितके आदि पद सो है॥ 
उपशम पंथ चढ़े नहिं कोई | ज्षपकपंथ निर्मेत मन होई।॥ ९८॥ 
तब मुनि लोकालोकविकासी । रहहिं कम्तकी प्रकृति पचासी॥ 
केषल ज्ञान लहै जग पूजा। एक वितके नाम पद दूजा ॥ २६॥ 
' जिनवर ओयु निकट जब आबदे। तहां बहत्तर प्रकृति खपाबे |॥ 
सूक्षम चित्त मनोबल छीजा । सृक्षम क्रिया नाम पद तीजा ॥ ३० ॥ 
शक्ति अनंत तहां परकाशे | ततखिन तेरह प्रकृति विनाश ॥ 
पंच लघृत्तर परमित बेरा। अष्ट कर्मको होय निबेरा॥ ११ ॥ 
चरण चतुर्थ साध शिव पाबे | विपरीत क्रिया निवृत्ति कह्ावे। 
शुक्त ध्यानके चारों पाये। भुक्तिपंधकारण समुमाये ॥| ३२ ॥ 
शुक्त ध्यान औषधि लगे, मिटे करमको रोग | 
कोइल्ा छांडे कालिमा, होत अप्रिसंजोग ॥ ३३॥ 
यह परमारथ पंथ गुन, अगम अनन्त बखान । 
कहत बनारसि अल्पमति, जथासकति परवान ॥ ३४॥ 
इति ध्यानवत्तीती 





अथ अध्यातमबत्तीसी लिख्यते 


शुद्ध वचन सदगुरु कहे, केवल भाषित अंग | 

लोक पुरुषपरिमाण रुव, चौद॒द रज्जु उत्ंग | १॥ 
धृतघटपूरित ल्ोकमें, धमे अधरम अकांस। 

काल जीव- पुल सहित, छद्दों दवेको बास॥२॥ 


१ उग२+ 0२७ पि*च।+ 4९ ९३४०९२+१७४+ ९८९ ९०/९४९८० ९०/३४/५४७0 सिर ८ ३८४०७८०९८८४९८९९८०६८/९७८/ ९४“ +७/०९० ३४१९८ ७००९/३७४ ०० १७०१४०९४०२:४९७/०९४०९३/०७०१६// ४: चि: पि// पे की 
(हि सम मन पकासर +० ९» धरम» ५२७८ थ न छा भय. कर छाप मम, 








[१४४ प्रनारसीवित्ञास 


छह्ों दरब न्यारे. सदा, मिले न काहू कोय | 

छीर नीर ज्यों मित्न रहे; चेतन पुहल दोय॥ ३॥ 
चेतन पुद्ल यों मिलें, ज्यों तिलमें खलि तेल । 

प्रगट एकसे देखिये, यह अनादिको खेल॥४॥ 
बह वारक रससों रमे, बह वासों लपठाय। 

चुम्बक करपे लोहको, लोह लगे तिहे घाय॥ ५॥ 
जड़ परगट चेतन शुपत, द्विविधा जखें न फोय। 

यह दुबिधा सोई लखे, जो सुविचज्षण होय॥ ६॥ 
ज्यों सुबास फल फूलमें, दही दूधमें, घीव। 

पावक काठ पषाणमें, त्यों शरीरसें जीव ॥७॥ 
कमेस्वरूपी कम्ममें, घटाकार घटमाहिं। 

गुणाप्रदेश प्रच्छन्न सव, थात्रे परगट नाहिं॥८॥ 
सहज शुद्ध चेतन बसे, भावकर्मकी ओठ। 

द्रव्यकम नोकमसों, बँधी पिंढकटरी पोट ॥ ६॥ 
ज्ञानहप भगवान शिव, भावकर्म चित भर्म | 

द्ृव्यकमं तनकारमन, यह शरीर नोकसे॥ १०॥ 
ज्यों कोठीमें घान थो, चमी माहिं कनबीच। 

चस्मी धोय कन राखिये, कोठी धोए कीच | ११॥ 
कोठी सम नोकमे सल, द्रव्य कम उयों घान । 

भाव्रकरममल . ज्यों, चसी, कन समान भगवान | १२॥ 
दृब्यकर्म नोकर्ममल; दोझ. पुद्ल जाल। 

भावकर्म गति ज्ञान मति, द्विविधि तह्वकी चाल ॥ १३॥ 








बतारसीविलास १४५] 


ट्विविधि त्रह्मकी चालसों, द्विविधि चक्रको फेर | 

एक ज्ञोनको परिणमन, एक कर्मों घेर॥ १४॥ 
ल्ञानचक्र अन्तर गुपत, कर्मचक्र प्रत्यक्ष । 

दोऊ चेतनमभाष ज़्यों, शुक्तपक्ष, .तमपक्त ॥ १५॥ 
निज गुण निज परजायमें, ज्ञानचक्रकी भूमि। 

परगुण पर परजायसों, कर्मचक्रकी धूमि ॥ १६॥ 
ज्ञानचक्रकी ढरनिमें! सजग भांति सब ठौर। 

कममचक्रकी नींदसों, मषा रवप्रकी दौर ॥ १७ ॥ 
ज्ञानचक्र ज्यों दरशनी, कर्मचक्र ज्यों अंध | , 

ज्ञानवक्रमें निज्जेरा, कर्मचक्रमें बन्घ ॥ १८ ॥ 
ज्ञानचक्र'अनुसरणको, देव धर्म गुरु हार 

देव धर्म गरु ज़ो लखें, ते पावें-भवपार ॥ १६ ॥ 
भववासी ” जाने नहीं, देवधरमगुरुमेद । 

पर-थो मोहके.फन्दर्मे; करे मोत्तको खेद ॥ १८ ॥ 
उदय छुकम कुकमके, रुते चतुगेति, माहि।,...|“_ 

निरखे वाहिजर॒ष्टिसों, रहें शिवमारग नाहि॥ २१॥ 
देवधम गुरुहैं निकट मृढ़ु,न'. जाने ठौर। 

बँधी <ृष्टि; मिध्यातसों, लले औरकी -और।| २२१ . 
भेषधारिको गुरु कहे, पुण्यवत्तको देव । , » 

धर्म कहै कुल रीतिको, यह, छुकमंकी देव॥ २३॥ ' 
देव निरंजनकों कहे, धर्म वचन परवान । 

साधु पुरुषको गुरु कहै, यह सुकमको ज्ञान ॥ २४॥ 


अल + कल >+++>-+++-+3 कल 'अलके 


श्श्दट ] बनारसीबिलास 





जान मान अनुभवे, करे भक्ति मन ल्ाय। 

परसंगति आख्रव संणे, कमंबन्ध अधिकाय॥ २४॥। 
कर्मबंधतें श्रम बढें, अमतें लखे न बाद । । 

अंधरूप चेतन रहे, विना सुमति उंदूघाट॥ २६॥। 
सहज़मोह जब उपशम, रुचे छुगुरु उपदेश । 

तब विभाव भवथिति: घटे, जग ज्ञान गुण लेश ॥रण 
ज्ञानजेश सो है सुमति, लखे मुकतिकी लीक । - 

निरखे 'अन्तरदृष्टिसों, देव घ॒ममे गुरु ठीक ॥ रू। 
ज्यों मुपरीक्षित जोंहरी; कांच ढाल मणि लेय ॥-॥६ 

त्यों सुबुद्धि मारग गहै, देव धर्म गुरू सेय॥ २६॥ 
दशेन चारित ज्ञान गुण, देव धर्म गुरु शुद्ध 
परखे आतम संपदा, ते सनेह विरुद्ध ॥४३०,॥ 
अरचै दर्शन देवता, चरचे चारित धर्में। “ 

दि परचे गुरुज्ञानसों, यहै सुमतिको कमे॥ ३१ / 
सुमतिकरमतें शिव सयै, और उपाय न कोय । ' 

शिवस्वरूप परकाशसों, आवागमन न होय ॥ रे२ || 

+ मुमतिकंस सम्यक्तसों, देव धर्म गुरु छर। 
कह्दत बनार्ति? तत्त यह, लहि पा सवपोरे॥ े३े ॥ 
हे इति भ्री्रष्यातमवत्तीपी 








घनारसी|बलास . १४७ ] 


अथ श्री ज्ञानपच्चीसी लिख्यते “” 
सुरनर वियेंग योनिमें, नंरक निगोद भवंत । 
महा मोहकी नींदसाँ, सोये ' फाज्न अनंत ॥ १७४ 
अररके जोरसों, भोजनंकी रुचि जाई) ' 
तेंसे कुकेस्मके उदय, धर्मंघचन न सुहाइ॥ २॥ 
लगे भूले ज्वरंके गये, रुचिसों लेय” अद्दार 4 
अशुभ गये शुभके जगें।. जानै- घंसघिचार ॥'३॥ 
जैसे पवन 'भाकोरतें, जज्षमें 'बठे' तरंग।/ ।"६ 
त्यों मनसा चचल भेई, परिंगहक प्रसंग ॥,8४ 
जहां पवन नहिंसंचरे, तह न जल कल्लोल। - 
त्यों सव परियृह त्यागलों, मनंसाहोय, अढोल-॥ ४ ॥ 
' अ्यों काह!विष्धर दसे 'रुचिंसों! नीम चबाय | 
'त्वों तुम मसतासों सढ़े. मर्गन विपयसुख ।पाय॥ ६॥ 
' सी रसन परंसे नहीं निर्विष तन जब होंय। 
" झोह घटे ममता -पिटैं। विषय ने बांछे'कोब ॥ ७॥ 
ज्यों सहिद्र नौका चढ़े, बूडई अंध अदेख। 
त्यों तुम भचजलमें परे, विन विवेक धर भेख || ८॥ 
जहां अखंदित गुंण लगे, खेंबट शुद्धविचारं। _ _ 
, , आत्म रुचि नौका चढ़े, पांवहु अब ज्त पार॥ ६॥ 
ज्यों अंकुश माने नहीं, महमित्त गज़राज। 
त्यों मन हष्णामें फिरे, गणे न काज अकाज ॥ १० ॥ 


5 कक के कक कक कक कप जमकर जाम भी सो 2भचत-- 2>२८३१#नकानत #"पद ११० #म्कयिा रच किक #गय काम .आन ९७०१ #११कानप ७० 4४९ 60% #मिकि के. 
बनने पनलम नाना न पर »री तनमन तप «न नमन के पतन «नेम कक सम मन पक मम ऊ ५ आपनन पर पर पअकभ तल पन» न र+ 3 कम तप. 














(३५ 2०५ ०३, हम. 2७ 





गा 


[ १्ष्प बनारसीविलास 


ज्यों नर दाव पउरपावके, गदहि आने गज साधि। 
त्यों या मनवश करनको, निर्मल ध्यान समाधि ॥११॥ 
तिमिररोगसों नेन ज्यों, लखे औरकी और । 
त्यों तुम संशयमें परे, मिथ्या मतिकी दौर॥ १५॥) 
ज्यों औषध अंजन किये, तिमिररोग मिट जाय। 
त्यों 'सतगुरुष्पदेशते, संशय वेग विलाय ॥ १३॥ 
सब जादव जरे, द्वारावतिकी आग ! 
त्यों मायामें तुम परे, कहां जाहुगे भाग॥ १४॥ 
दीपायनसों ते बचे, जे तपसी निम्नेन्थ । 
वज माया समता गहो, यहै मुकतिको पंथ.॥ १४॥ 
ज्यों कुधातुके फेटसों, घटवढ़ क॑चनकांति । 
पापपुण्य कर त्यों भये, भूढातम वहु भांति॥ १६॥ 
कंचन निज गुण नहिं तजे, बानहीनके होत । 
घटघट अंतर आतमा, सहजस्वभाव उदोत॥ १७॥ 
पन्ना पीट पकाइये, शुद्ध कनक ज्यों होय 
त्यों प्रगटे परमातमा, पुस्यपापमलखोय || १८॥ 
पे राहुके प्रहसों, सूर सोम छविदीन । 
संगति पाय कुसाधुकी, सज्जन होहि मीन ॥ १६॥ 
निवादिक चन्दत करे, मलयाचत्ञकी घास । 
दुब्जनतें,सज्जन भये, रहत साधुके पास ॥ २० ॥ 
जैसे ताल सदा भरे, जल आवे चहुँ ओर । 
तेसे आखबद्दारसों, कर्मबंधकी जोर ॥| २१ | 


बनारसीविलास १४६ ] 








ज्यों जल आ्वत मूंदिये, सूले सरवर पानि। 
तैसें संबरके किये, कर्म निम्जरा जानि ॥ २२ ॥। 
' ज्यों बूटी संजोगत, पोरा मूल्षित होय । 
त्यों पुदूगलसो तुम मित्ते, आतमशक्कि ' समोय ॥ २३॥ 
मेल खटाई मांजिये, पारा परगठ रूप | 
शुल्कध्यान अधभ्यासतें, दशेनत्ञान अनूप ॥ २४ ॥ 
। * कहि उपदेश बनारसी, चेतन अब कछु:चेतु । 
आप बुमावत आपको, उदय करनके हेतु ॥ २४॥ 
इति श्रीज्ञानपत्नीती 


अथ शिवपच्चीसी लिख्यते 


, दोहा । 
प्रद्विलास विकाशधर, चिदानन्द गुणठान । 
बन्‍दों सिद्धसमाधिमय, शिवस्वरूप भगवान ॥ १॥ 
मोह महातम नाशिनी, ज्ञान उदंधिकी सींव | 
बन्दों जगतबिकाशनी, शिवमहिसा शिवनींव ॥ २॥ 
-  झौपाँ। | 
शिवस्वरूप भगवान अवाची। शिवमदिमाझ्लुमवसति सांची॥ 
शिवमहिमा जाके घट भासी | सो शिवरूप हुवा अधिनासी ॥३॥ 
जीव और शिव और न होई। सोई जीववबर्तु शिव सोई॥ 
जीव ताम कहिये व्यवद्वीरी। शिवस्वरूप निहचे' गुणधारी | ४ ॥ 








[ १४० बनारसी बिलास 


३३७००.०७ ८०९./००५०५५/१य..३११..३९./७ //५./१४*, 





करे जीव जब शिवकी पूजा । नामश्रेदते..होय,न दूजा॥ 
बिधि; विधानसों पूजा-ठाने | तब शिव, आप; आपको जाने ॥५॥ 
तन संडप सनसा जहं 'वेदी?,। शुभलेश्या बह सहज सिंफेदी! ॥ 
, भातमरुचि 'झु डी! बछ्ानी । तहां /जलहरी? “गुरुद्री वानी ॥॥॥ 
भावज्षिंग सो मूरति! थापी।जो उपाधि,सो" सेद्रा - भ्रव्यापी ॥ 
निगु शरूप ' निर॑जन 'देवा। सशुशस्वरूप करें विधिसेवा॥ ७॥ 
समरस 'जल' अभिषेक करांबे। उपशम रिसचन्दंन घसिलाब॥ 
सहजानन्द पुष्प उपजाबे | गुणगर्सित 'जयेमांलः चढाबे॥८॥ 
ज्ञानदीपकी 'शिस्रा? संवार । स्याह्मद घंटा मुनकार ॥ 
अगम अध्यातम चौर ढुल्लांने । ज्ञायक धूप! स्वरूप जगाबे॥६। 
निहचे दान 'अंधेविधि होवे। सहँजशील गुर 'अक्षत ढोवे॥ 
तप 'नेवज काढे रस पागे। विमलभाव फल राखइ आगे ॥१०। 
जो ऐसी पूजा करे, ध्यानमगन 'शिवज्ञीन | ' :! 


॥ 8४ है है. ॥ 


शिवस्वरूप जंगंमें रहे, सो साधक पैरबीन॥ ११ ॥ 
सो,परवीन मुनीधर सोई शिवमुद्रा, मब्ति जो होई॥ 
सुरसरिता करुणारसवाणी । सुमति गौरि अद्ध ज्ञ बखानी » ११॥ 
त्रिगुणमेद जहें नयन्त_विशेख्ा | विमज्ञभावसमकित शशिल्षे्वा ॥ 
, “सुगुरु शीख सिंगी उर बांधे | नयविवह्दार बाधम्बर कांचे ॥ १३॥ 


कबहू,तन-केल्लाश -कल्लोले | कबहु ,विवेकबुत्ल चढ़ ,ड णे;॥| 
रु डा परियाम् -त्रिभंगी |- मनसा चक्र, फिर :सरवंगी ॥-९४ | 
<2००००००००००-०----०००००-००००००००००००००६ दि:हप की +क की ज 


जी 








बर्तारसीबिलास ॥॒ १४११ | 





शक्ति विभूति अंगछबि थाजे | तीन गुपति तिरशूल बिराजे।' 
कंठ विभाव दिपमे विष सोहै । महाभोह विषहर नहिं पोहे ॥१४॥ 
संजम जटा सहज सुख भोगी | निहचेरूप ,द्गम्बर-जोगी।॥ * 
प्रह्म समाधिध्यान गृह साज | तहां अनाहत उमरूँ बाजे ॥ १६ ॥) 
पंच सेद्‌ शुभज्ञान गुण, पंच बदन परधान। 
ग्यारह प्रतिमा साधते, ग्यारह रुद्र समान ॥ १७॥ 
संगल करन मोखपद ज्ञाता। यातैं शंकर नाम विख्याता ॥ 
जब मिथ्यामत तिमर विनाश | अंधकहरण नाम परकाशे ॥१०८॥ 
ईश महेश अखयनिधिरवामी । सबे नाम जग अंतरजामी ॥ 
त्रिभुवन त्याग रमे शिवठामा । कहिये त्रिपुरहरण तथ नामा ॥१६।॥ 
अष्टकर्मसों भिड़े अकेला । महारुद्रं, केहिये तिहिं वेला।॥ 
सनकामना रहे नहिं फोई। कार्मदहन कहिये तबंः सोई ॥ २० ॥ 
भबवासी भवनाम“घेरावै | मंद्ादेव यह उपमा पावे ॥ 
आदि अन्त कोई नहीं जाने शंभुनाम सब जगत बखाने ॥ २१ ॥ 
मोहदरण हर नाम कहींजे | शिवस्वरूप शिवसाधन कीजै॥ 
तज करनी निम्चयमें आबे | तब जंगभंजन बिरद्‌ कहाने ॥ २२॥ 
विश्वगथ जगपति जग जाने | स॒त्यु जय तम सृत्यु न माने.॥ 
शुक्ष ध्यान गुण जब आरोहै | नाम कपूरगौरं तब सोह्दे ॥ २३॥ 
इद्दविधि जे गुण आदरे, रहे राचि जिह-ठॉव । 
, -॥ बिहदे जिहे मारग अनुसंरे;ते सब शिवके नोव ॥रे४॥ 


अीघन-तसिस सन नननम-ननननना- नमन न»»०+ ७५3८ महा 











नांव जथाम्रति कल्पना, कहू अगट कह गृह । 
गुणी बिचारे वस्तु गण,नॉव बिचारे मूढ़ ॥ २४५॥ 
मूह मरम जाने नहीं, करे न शिवसों प्रीति। 
: पंडित लखे 'बनारसी, शिवमहिमा शिवरीति ॥२ह॥ 
हति शिवपच्ीती 





अथ भवशिन्धुचतुद शी लिख्यते 
जेरों कीहू पुरुषको, पोर, पहुंचवे काज 


सारगमाहि समुद्र तृहां, कारणरूप जहाज ॥ १॥ 
दैसें उम्यकबंतको, और न कछु इलाज । 
भवसमुद्रके तरणको, मन जहाजसों काज॥ २॥ . 
मनजहाज घटमें .प्रगट, भवसमुद्र घटमाहिं । 
मूरत से न जानहीं, वाहिर खोजन जाहिं॥ ३॥ 
मूरखहके घटविषे, जलजददाज अरु पौन | 
हगमुद्वित मालीम तह, लखे सेभारे कौन १॥ ४॥ 
, फमसमुंद्र विंभाव जल, विषयकषाय तरंग | | 
बढवागनि ठृष्णा प्रबल्ल, ममता धुनि सरबंग ॥५॥ 
भरम भँवर तामें फिरे, मनजद्दाज चहु' और । 
ग्रे खिंरे बूढ़े तिरे, उदय' पावनके जोर ॥श। 





जी हक के ०. 


ए्श्३ | 





जब चेतन मालिम जगे, लखे विपाक नजूम | 

डारे समता हंखला, थक भंषर की घूम ॥अ॥ 
मालिम सहज समुद्रकों जाने सब घिरतंत | 

शुभोपयोग तहेँ रत्न सम, अशुभ भाव जलजंत ॥८॥ 
जन्तु देख नहिं भय करे, रत्न देख उच्छाह। 

करे गमन शिवदीपको, यह सालिमकी चाह ॥६॥ 
दिशि परखे गुणजंत्रसों, फेरे शकति सुखान। 

धरे साथ शिवदोपमुख; व.दवान शुभध्यान ॥ १०॥ 
चहै शुद्ध उद्धत पवन; गहे क्षिपक दिशिन्ीक। 

लह्े खबर शिवदीपकी रहे दृष्टिगति ठीक ॥ ११॥ 
मनजहाज इह्विधि चले, गेहे सिंधुजलवाट। 

आये निज संपतिनिकट, पाबे केवश घाट ॥ १२॥ 
सालिम उतर जहाजसों, करे दीप को दौर | 

तहां न जल न जहाज गति, नहिं करनी कछु और ॥११॥ 
मालिसकी कालिममिटी, मात्षिम दीप न दोय । 

यह भवसिन्धुचतुदंशी, मुनिचतुदेशी होय॥ १४॥ 

इति सिन्धुचतुरदशी 





अथ अध्यातम फाग लिख्यते 
अध्यातम बिन क्यों पाइये हो, परमपुरुषकों रूप। 


झघट अंग घट मिल रहो हो, महिमा अगम अनूप ॥ 
अध्यातमविन क्‍यों पाइये हो ॥ १॥ 


| एृश्प्र बनारसा।वलाप 


सूरत मत मम अर मो का न ३ #+ +. 2१ #। बम हम मी सीरि,ाम री रती उतार /2२>न्‍्य०व ५22 व 








विषस विरष पूरो भयो हो, आयो सहज बसंत। 
प्रगटी सुरुचि सुगंबिता हो, मन मधुकर मयमत ॥ 
अध्यातमबिन क्यों पाइये हो ॥ २॥ 
सुमति कोकिला गह गही हो वही अपूरब बाउ | 
भरम कुदर वादरफटे हा, घट जाडो जड़ ताड॥ 
अध्यातमविन क्यों पाइये हो ॥३॥ 
मायारजनी लघु भई हो, समरस दिवशरशिजीत । 
मोहपंककी थिति घटी हो, सशय शिशिर व्यत्तीत ॥ 
अध्यातमविन क्‍यों पाइये हो ॥४॥ 
शुभ दल पल्लव तह॒लहे हो, होहिं अशुभ पतम्मार । 
मलिन विषय रति साज़्ती हो, विरति चेलिविस्तार ॥ 
, अध्यातसविन क्यों पाहये हो ॥ ५॥ 
शशिविवेक निरमेल भयो हो, थिरता अमिय भक्ोर | 
फैल्ली शक्ति सुचन्द्रिका हो, प्रमुदित नेन चकोर॥ 
अध्यातमविन क्‍यों पाइये हो ॥ ६ 
छुरति अभिव्वाला जगी हो, समकित भानु अमन्‍्द । 
हृद्यकमल विकसित भयो हो, प्रगट घुजश मकरन्द ॥ 
अध्यातमबिन क्यों पाइये हो ॥ ७ 
दिढ कषाय हिमगिर गले हो, नदी निष्जेरा जोर। 
धार धारणा बहचली हो, शिवसागर मुख ओर ॥ 
अध्यातमविन क्‍यों पाइये हो ॥ ८ 
वितथवात प्रभ्भता मिदी हो, जग्यो जथारथ काज । 
जंगलमभूम सुदावनी हो, तप बसन्तके राज॥ 
अध्यातमविन क्यों पाइये हो ॥६ 


घ 





जि कक पकपितग पक चली पक चिरी पक 





जरा 


बनारसीविलास १४४ ) 


समन ममप+-ममाकार न्‍क? साहनेरम/रन्‍रन्‍ग क>४०९०४३५० १३/३९२०-३०४ ६०र २०० इ०/० ३-०५ पेडरय->मफर९/नये या कटरा, 


भवपरणति चाचरि भई हो, अष्टकर्म बनजाल ॥ 

अलख अमूरति आतमा हो, खेले धर्म धमाल ।॥ 
अध्यातमबिन क्‍यों पाइये हो ॥ १० ॥ 

नयपंकति चा्चरि मिल्लि हो, ज्ञानध्यान डफताल | 

पिचकारी पद साधना हो, सचर भाव गुलाल॥ 
अध्यातमबिन क्‍यों पाइये हो ॥ ११ ॥ 

राग बिराम अलापिये हो, भावभगति शुभ तान। 

रीक परम रसलीनता हो, दीजे दश विधिदान ॥ 

ह .. अध्यातमविन क्यों थाइये हो ॥ १२॥ 

दया मिठाई रसभरी हो, तप भेवा परधान। 

शी सल्लिल अ्रति सीयलो हो, संजम ' नागर पान ॥ 
अध्यातमविन क्यों पाइय हो ।' १३ ॥ 

गुपति अग परगासिये हो, यह निल्लज्ञता रीति। 

अकथ कथा मुखस खिये हो, यह गारी निरनीति ॥ 
अध्यातमविन क्‍यों पाइये हो ॥१४७॥ 

उद्धत गुण रसिया मिले हो, अमल पिमल रसप्रेम | 

सुरत तरंगर ह छक्ति रहे हो, मनसा वाचा नेम॥॥ 
अध्यातमविन क्यों पाइये हो ॥१५॥ 

परम ज्योति परगट भई हो, लगी होलिका आंग। 

आठ काठ सब जरि जुके हो, गई तताई भाग ॥ 
अध्यानमबिन क्यों पाइये हो ॥१६॥ 

प्रकृति पचास्ती लगि रही हो, मत्म कैख है सोथ | 


सिम ली जंग नर लीन _ 


[ १४६ बनारसीबिलास 


सह रह पक कह पाकर रह न्‍ही चह सम बारी शा सह चाह न्‍कय चल चकयती सती या पा पा चती चमम९+ पक राम आम 


"*दाय धोय उज्ज्वल भये हो, फिर तहेँ खेल न कोय || 
अध्यातमविन क्यों पाइये हो.॥१७॥ 
सहज शक्ति गुण खेलिये हो, चेत “बनारसिदास !” 
सगे सखा ऐसे कहै हो, मिटे मोहद॒धि फास | 
अध्यातमविन क्यों पाइये हो ॥ १८॥ 
इत्ति अध्यातमघमार | 


अथ सोलह तिथि लिख्यते. 
चोपाई 

परिवा प्रथम कला घट जांगी। परम प्रतीतिरीति रसपागी॥ 
प्रतिपद परम प्रीति उपजाब | वहै प्रतिपदा नाम कहावे ॥ १॥ 
दूज दुषहूँधी दृष्टि पसारे।स्वपरविवेकधारणा धारे॥ 
दर्वित भावित दीसे दोई। हय नय मानत द्वितीया होई | २ ॥ 

ज त्रिकाल त्रिगुण परकासे । त्रिविधिरूप त्रिभुवन आभास | 
तीनों शल्य उपाधि उछेदे। त्रिधा कमंकी परिणति भेद ॥ ३ ॥ 
चौथ चतुर्गतिको निरवारे।कर चकचूर चौकरी चांरे॥ 
चारों वेद समुमि घर आबें। तब सुअनंत चतुष्टय पाबे ॥४॥ - 
पांच पंच सुचारित पाले | पंचज्ञानकी सुर संभाते॥ 
पांचों इन्द्रिय करे निरासा | तब पांबे पंचमगति बासा॥४॥ 
छठ छद्काय स्वांग घर सोबे | छह रस मगन छ आकृति होने ॥ 
जब छहृद्रशनमें न अरूमे | तब छ दवेसों न्यारा सूके ॥ ६॥ 
सातें सातों प्रकृति खिपाषै। सप्तमंग नयसों मन लावे॥ 
त्याग सात व्यसनविधि जेती | निभय रहै सात भयसेती ॥ ७॥ 


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जा कक ज टिया, अरीफल बने जय 


52/4%+ 25+2« अनिल कि निनिनिकिकिि की निकल ५5 । 


आठें आठ महामद भंजे। अष्टसिद्धिरतिसों नहीं रंजे।॥ 
अष्टकमंमलमूल बहावे । अष्टगुणातम सिद्ध कहाबे ॥८॥ 
नौमी नवरस में रस बेबे। तौ समकित धर नवपद्‌ सेबे | 
करे भक्तिविधि नव परकारा | निरसे नवतक्तनसों न्यारा॥ ६।' 
दशमी दशदिशिसों मन मोरे | दश प्राणनसों नाता तोरे॥ 
दशरवधि दान अभ्यंतर साथे | दशत्च्छण मुनिधर्म अराधे ॥१०॥ 
ग्यारस ग्यारह प्रकृति बिनाशे । ग्यारह प्रतिमापद परकाशी॥ 
ग्यारह रुद्र कुलिंग बखाने । ग्यारह विथा जोग जिन माने ॥ ११॥ 
बारस बारह विरति बढ़ावे। बारह विधि तपसों तन तावे॥ 
बारहभेद भावना भाषे | बारह अंग जिनागम गावे॥ १२॥ 
तेरस तेरह क्रिया संभाल | तेरह विघन काठिया टाले॥ 
तेरहविधि संजम अवधारे। तेरह थानक जीव बिचारे ॥ १३॥ 


चौदश चौदह विद्या माने। चौद॒ह गुणथानक पहिचाने॥ 
चौदह मारगना मत आमने । चौद॒दरज्जु शोक परवाने ॥१४॥ 


पन्द्रस पन्द्रह तिथि गनिल्लीजे । पन्द्रह पात्र परसि धन दीजे ॥ 

पन्द्रह जोगरहित जो धरणी | सो घट शून्य अमावस बरणी ॥१५॥ 

पू्नों पूरण अ्रह्मविल्लासी | पूरण गुण पूरण परगासी ॥ 

पूरण प्रभुता पूरणमासी | कहे साधु तुलसी वनवासी॥ १६॥ 
इति षोड्शतिबिका 


अथ तेरह काठिया लिख्यते, 
जे बटपारें वाटमे, करहिं उपद्रव जोर । 
तिन्हें देश गुजरात में, कहृहिं काठिकाचोर ॥ ६ ॥ 











' कर जरीफात उरी का नीकातीकर सकी करी हट पटीपनगीसा व चीफ, 


| श्श्८ बनारसीनिलञास 


न्कक 
अन्‍य अन्करीचेकी।. फिशाममा#ररिकने#रभेआगक ;#7१५ 4०.० 4 &#/कामका४०#८१५ न हम. 2० &#०. 4१ कक, 


त्यों यह तेरह काठिया, करहि धर्मको हानि | 
ताते कछु इनकी कथा, कहहुँ विशेष वखानि ॥ २॥ 


जूआ आलस शोक भय, कुकथा कौतुक कोह | 
कृपणबुद्धि उन्नानता, भ्रम निद्रा मद मोह ॥ ३॥ 


प्रथम काठिया जुआ? जान | जामे पंच वस्तुकी हान | 

प्रभुता हटे घटे शुभ कर्म | मिटे सुज्श विनरी धनव्रम ॥ ४॥ 
द्वितिय कराठिया 'आलसभाव” | जासु उदय नाशे विवसाव॥ 
बोहिर शिथिन्न होहिं सब अंग | अतर धर्मबासना भग॥ ४॥ 
ठग तीसरो 'शौक! सताप । जासु उदय जिय करे बिलाप ॥ 
सूनक पातक जिदि पर होय | धर्मक्रिया तहेँ रहे न कोय॥ ६॥ 
“भय! चतुर्थ काठिया बखान | जाके उदय होय बलह्ान ॥ 
उर कंपे नहिं फुरे उपाय | तथ सुधर्म उद्यम मिट जाय ॥ ७॥ 
ठग पंचम “कुकथा” ब्रकवाद | मिथ्यापाठ तथा ध्यनिनाद ॥ 
जबलों जीव मगन इसमाहि | तबलों धरम वासना नाहिं।८॥ 
"“कौतूहल” छट्टम काठिया। भ्रमवित्ञाससों+ हरपे हिया ॥| 
सपा वस्तु निरखे धर ध्यान । विनशि जाय सत्थारथ ज्ञान ॥ ६ ॥| 
“कोप” काठिया है सातमा। अग्नि समान जहां ' आतमा ॥ 
आप न दाह, औरको दहे। तहा धर्मरुच र॑वन रहे ॥ १० ॥ 
“कुपणवुद्ध” अष्टपत बटपार | जामे प्रगट लोभ अधिकार |। 
लोभ मार्दि ममता परकाश | ममता करे धर्मेकों नाश ॥ ११॥ 
नवमा ठग॒' अन्लान” अ्गाघ । जासु उदय उपजे अपराध ॥ 
जो अपराध पाप है सोय। जहां पाप तद्दा धर्म न हाथ ॥१%॥ 


बे जीसी के करी प हरी जीप मत दीया. कक सकी यह कक... पक सटीक न भरी परी गीजमीफ 
न्ज्जन 








जा ७ ऋ कपिक. पन्‍मए या चलरीचक उक वपकत जा सती सती करी कन या का परी या का 


अममन्‍काजमक>व५५-+न्‍जेमक. सा ० का धण० ाा-भा७०कक- ०७७७ ७#०७७७७५७ा पुन, 


_ पनारसीबिलास ह १४६ | 


नेक के... सन अलननन +ककम+-+& अननननन-पनननन-+ 3 नममक+ का+० नम 
उकटाउ करचकत ३० ७० ७००९५//०५०/#रे>०१७० पक“ ५7९५१ ७० री जा जी ७.० परी पजरीयक २डरिायाही सा पार जारमपार नरक? रह पाप फेल फेर इट 


द्शम काठिया श्रम! विच्छेप | अ्मसों अशुभ करमका लेप ॥ 
अशुभ कम दुरमति की खानि । दुरमात करे धर्मकी हानि ॥११॥ 
एकादेशम काठिया 'नीद” | जासु उदय जिय वस्तु न बींद ॥ 
मन बच काय होय जड़रूप | बूढ़े धन कम्रघनकूप ॥ १४॥ 
ठग द्वादशम “अष्टमद” भार) जामें अकरराग अविकार ॥ 
झकररोग अरू विनयविरोध । जहे अभ्निनय धहें धर्मनिरोध ॥१५॥ 
तेरम चरम काठिया “मोह” | जो विवेकसों करे विछोह |। 
अविवेकी मानुप तिरजंच। धर्मघारणा धरे न रच ॥ १६॥ 
येही तेरह करम ठग | लेहि रतन त्रय छीन ॥ 
यातें ससारी दशा। कहिये तेरह तीन ॥ १७॥ 


इति त्रयोदश काठिया | 





अथ अध्यातम गीत लिख्यते, 
राग गौरी 


मेरा मनका प्यारा जो मिले ।-सेरा सदज सनेही जो मिले ॥टेक ॥ 
अवधि अजोध्या आतम राम | सीता सुमति करें परणाम॥ 
मेरा सनका प्यारा जो मिले, मेरा सहज० ॥१॥ 

उपब्यो कंत मिल्ननको चाब। समता सखीसों कहे इसभाव॥ 
मेरा मनका प्यारा जो मिले, मेरा० ॥२॥ 

मै विरददिन पियके आधोन |यों तल्॒फों ज्यों जल बिन मीन | 
मेरा० ७. “० (]३॥ 


'शरनचएत का कक पक कह करी यरीक पर उतारी गहरी वात जी पलक परी बा पर 3 
न्ज्ज््ल्थ्य्य्््ंल्शस्ण्म्स्ल्न्न्स्थ्श्ख्ख्ख्श्श््क््क्--- री पा वाट नगरीय कम जरीकार स्टित परीयक बक न भा ६० पा की र्क्क कप पक चयतसमन पु पक दर पी पट पक पक यकद पारस (हक “ कर करी परीयारी कया यान बाट, 
कलननविपनन+-स अनननननलन नम नननन पान न नमन नव पर धन ीननपमीकपन- थम न» ऊ स०5०+ न का 3 कम-७+ अमन». 





| १६० िलओ कर 


बाहिर देखू' तो पिय दूर । बट देखे घटमें भर पूर ॥ 

मेरा मनका प्यारा जो मिले, मेरा०॥ ४॥ 

घंटमहि गुप्त रहे निरधार। बचनअगोचर मनके पार॥ 
मेरा०ण ४ * ॥४॥ 

अलख अमूरति वर्णन कोय। कबधों पियको दशेन होय॥ 
मेरा० े ॥ ६॥ 

सुगम सुपंथ निकट है. ठौर | अंतर आह बिरहकी दौर ॥ 
मेरा०ण. ४७ ०“  |॥७॥ 

जउ देखों पियकी उनहार।तन सन सर्वेस ढारों वार॥ 
भेरा० हा ० ॥८॥ 
होहुँ मगन मैं दरशन पाय | ज्यों दरियामें बूंद समाय॥ 
सेरा० ॥६॥ 

पियको मिलों अपनपो खोय । झोज्ञा गल पाणी ज्यों हौय ॥ 
मेरा०ण “०. »«  हश्णा 

मैं जग ढूंढ फिरी सब ठोर। पियके पटतर रूप न ओर ॥ 
मेरा०ण "। “» ॥१॥ 

पिय जगलायक पिय जगसार | पियकी महिमा अगम अपार ॥ 
सेरा०/ "० "४ ॥श्श। 
मय सुमिरत सब दुख मिट जाहि। भोरनिरख ज्यों चोर पत्नाहि॥ 
' ०. "०. #**. .. [शशा 

भयभंज्नन पियको शुनवाद्‌ | गजगंजन ज्यों फेहरिनाद ॥ 
मेरा० ९००७ रेड ॥१७॥ 


्ख्््श््श्ु्श्शथ्खच्ल्््श्शल्लश्््च््ल् ्/यच्च््लच्»्यच्न्‍्य् य्््ट्त-्८ः 








चनारसीविज्ञास १६१ ] 


भागई भरस करत पियध्यान | फटइ तिमिर ज्यों ऊगत भान ॥ 
भेरा०ण ७४ “0११ 

दोष हुर्‌इ देखत पिय ओर | नाग डरइ ज्यों बोजत मोर ॥ 
सेरा०ण हा "०7. ॥१8॥ 

बसों सद्या में पियके गाँ३ |पियतज और कहां में जॉड ॥ 
मेरा०ग. ४ौँए. “०. ॥शणज। 

जो पिय जाति जाति मम सोइ | ज्ञातहिं जात मिक्ते 'सब कोइ ॥| 
मेरा०ण "” “४” परश्णा 

पिय मोरे घट, में पियमाहिं | जल्लतंरग ज्यों ह्विविधा नाहि॥ 
भेरा०ण ४४ ““». ॥१४॥ 

पिय मो करता मैं करतूति। पिय ज्ञानी में ज्ञानचिभूति॥ 
मेरा० ्ट 5 ॥२०॥ 
पिय सुलसागर मैं सुख्सींय | पिय शिवमन्दिर में शिवनींय ४ 
मेरा ॥९२१॥ 

पिय अद्या मै सरस्वति नाम । पिय समाधत्र मो कमला नाम ॥ 
| ह मेरा०.. ४४. »«. ॥२२॥ 

पिय शंकर में देवि भवानि । पय जिनवर में केवलबानि॥ 
मेरा० ७... “«.. ॥रश॥ 

पिय भोगी में भुक्तिविशेष । पिय जोगी में मुद्रा भेष ॥ 
सेरा०ण ०. "”.. परछ 

पिय सो रसिया में रसरीति | पिय च्योहारिया में १रतीति ॥ 
मेरा०ण हा 6०. दरश। 


अरीयल्‍तपाक, 





बद््ू -<एकजफत्रफ ाकफकफएतत7 पलतारसीबवित्ास 


कान फक चर भार पापा? कप पका पा?" तह चकी गा इा पक चक सम सका उप कक पक उ+ पक की था पार "उ साक भी दाम सा बडी यामी कही यही. कह सात या# साकार बकरी न्‍की कक सात 


॥२७॥ 
जहाँ पिय राजा तहां में नीति | जह पिय जोड़ा तहाँ मैं जीति ॥ 
मेरा० बडे हक जा 
पिय गुणम्राहक में गुणपांति | पिय बहुनायक में बहुभांति ॥ 
मेरा० “वन्य 
जहेँ पिय तहें में पियके संग | ब्यों शशि हरिमें ज्योति अभंग | 
मेरा० . “४ “  भनन्‍्धा 
पिय सुमिरन पियको गुणगान। यह परमारथपंथ निदान ॥ 
मेर।० कह ३०॥| 


कहइ व्यत्रहार बनारसी? नाव | चेतन मुम्नति सटी इकठांव ॥। 
मेरा ॥१श॥। 


जहां पिय साधक तहाँ में सिद्ध | जहां पिय ठाकुर वहांमें रिद्ध ॥ 
मेरा । 


॥ इति चेतनछुम।त गीत ॥ 


अथ पंचपदविधान लिख्यते 
दोहा. 
नमो ध्यानधर पंचपद, पंचसु ज्ञान अराधि। 
पंचछुचरण चितारचित, पंचकेंरनरिपुसाधि ॥ १॥ 
चोपाई (१५) 
बन्दों श्री अरहंत अधीश | बन्दों खयंसिद्ध जगदीश ॥ 
बन्दों आचारज उम्रामय | वन्दों साधुपुरुषके पाय ॥२॥ 
एई पंच इृष्ट आधार । इनमें देव णुक गुरुचार ॥ 
सिद्ध देव परसिद्ध उदार ! गुरु अरहंतादिक अनगार॥। ३ ॥ 


जन 


पक पविक, 








बिन व ीवण के | 


धनारसीबिलास १६३ | 


डे लनकनमवपतम७+ ५ कण ८ मा_ानक सह 0<4५ 5५६:49.*+े+++»«७-५५3»»+3०+८मम आज“ 
2.4 डक हम, 2५, कफ, हिवेहस्यिअरित पक पिकतकि./०० / ये; ३; करे #१९९/४९५ +०३५ > ०५ ७०. 


सिद्ध सोई जस करे न कोइ। सयो कदाच न कबहूँ होइ ॥ 
अखय अखंडित अविचलधाम । निर्मेल निराकार निरनाम ॥४॥ 
अब गुरु कहों चार परकार | परस निधान धरमधनधार || 
सरमवंत शुभ कमे सुज्ञान | त्रिभुवनमार्हि पुरुष परधान ॥ ५॥ 
प्रथम परमगुरु भ्री अरहंत । द्वितिय परमगुरु सूरि महंत ॥ 
तृतिय परमगुरु श्रीदवकाय | चौथे परम सुगुंरु मुनिराय ॥६॥ 
परम ज्ञान द्शनभढार । वांसी खिरे परम सुखकार | 

परम उदारिक तनधारत | परम सुगुरु कहिये अरहत ॥७॥ 
धर्मध्यान धारे उतकिष्ट | भाषें धर्म देशना मिष्ट ॥ 

धर्मनिधान धर्मसों प्रेम । धर्म सुगुरु आचारज एम ॥ ८॥ 
चौदह पूरव ग्यारह अग | पढें मरम जाने सरबंग ॥ 

परक्ो मर्म कहें समुझाय । यातैं परम सुगुरु धचमाय ॥| ६ ॥ 
पट आवश्य कमें नित करे । त्रिविधि कमममता परिहरें ॥ 

विपुल कम साधे समकिती । परम छुगुरु सामानिक जती ॥१०॥ 
पंच सुपद्‌ कीज३ चिंतौन | दुरित हरन दुख दारिद दौन॥ 
यह जप मुख्य और जप गौन । इस शुण महिमा वरण कौन | 


दोहा है 
महामंत्र ये पंचपद, आराधे जो कोय | ' 
कहत बनारसिदास” पद्‌, उल्लट सशाशिव होय।॥ १२॥ 
. || इति औ पंचपदविधान ॥| 


[ १६४ बनारसीबितास 
अथ सुमतिके देव्यशोत्तशुतनाम 
नमो सिद्धिसाधक पुरुष, नमो आतमाराम | 
बरणो देवी छुमति के, अष्टोत्तररव नाम ॥॥ १॥। 
॥ रोडक छन्द ।। 
सुमति सबुद्धि सुधी सुबोधनिधिसुता पुनीता । 
शशिवदली सेमुषी शिवमति घिषणा सीता | 
सिद्धा संजमवती स्यादवादिनी विनोता | 
निरदोषा नीरजा निर्मत्ला जगत अतीता ॥ 
शीलवती शोभावती शुचिधमा रुचिरीति | 
शिवा छुभद्वा शंकरो, मेघा दृह़परतीति ॥ २ ॥ 
ब्रद्माणी त्रह्मजा ब्रह्मरति, त्रद्मअधीता । 
पदमा पद्मावती वीतरागा गुणमीता ॥ 
शिवदायिनि शीतला राधिका, रमा अजीता । 
समता सिद्धेश्वरी सत्यभामा निरनीता ॥ 
। कल्याणी कमला कुर्शाल, भवभंजनी भवानि। 
लीज्ञाबती मनोरमा, आनन्दी घुखवानि ॥ ३॥ 
परमा परमेश्वरी परम पढिता अनन्ता । 
असहाया आमोदवती अभया अधहंता ॥| 
ज्ञानवती गुणवती गौमती गौरी गंगा । 
लक्ष्मी विधाधरी आंद सुद्री असंगा ॥ 
चन्द्राभा चिन्तादर्राण, चिद्रिया चिद्ं लि । 
चेतनवती निराकुला, शिवमुद्रा शिवकेलि ॥ ४ ॥ 


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बतारसीविल्ञास १६४ ] 


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चिद्‌वदनी चिद्र[प कल्ला बसुमती विचित्रा | 
अधंगी अक्षरा जगतजननी जगमित्रा । 
अविकारा चेतना चमत्कारिणी चिदंका | 
दुर्गा दशेनवती दुरिवद्दरणी निकलंका॥ 
धर्मधरा धीरज़ धरनि, मोहनाशिनी वाम | 
जगत विकाशिनि भगववी, भरमभेदनी नाम ॥ ५॥ 
घत्तानन्द, 
निषुणनवनीता वितर्थावेतीता, छुजसा भवसागरतरणी | 
निगमा तिरबानी, दयानिधानी, यह सुबुद्धिदेवी वरणी ॥ ६॥ 
इति श्रीसुमतिदे विशतक. 


अथ शारदाष्टक॑ लिख्यते, 


वस्तु छन्द्‌, 
नप्नो केवल नमो केवल रूप भगवान | 
मुख ओंकारधुन सुनि अथ गणधर विचारे॥ 
रचि आगम उपदिशे भविक जीव संशय निवारे ॥ 
सो सत्यारथ शारदा ताछु, भक्ति उर आन | 
छन्द भुजगप्नयातमें, अष्टक कहों बलान ॥| १ ॥ 
भुजंगप्रयात, 
जिनादेशजाता जिनेन्द्रा विख्याता। 
विशुद्धपबुद्धा नमों लोऋमाता ॥) 
दुराचार दुर्नेदरा शंकरानी। 
नमो देविवागेश्वरी जेनवानी ॥२॥ 


बरी पारी सारीसल्‍रीयतीयतीओी.-. नभीषीीपरीषयीर. आमिर 











पिकीकीयकीयरीकीपीयिरीयरी री): 





[ १६६ बनारसी विलांस' 


सुधाधमेसंसाधनी धर्मशाला। 

सुधातापनिर्नाशनी मेघसात्ना || 
मदामोह विध्वसनी भोक्षदानी | 

नमो देधि वागेश्बरी जेनवानी ॥ ३ ॥ 
अखैेबृत्तशास्ाा व्यतीतामिल्लाषा | 

कथा संस्क्ृता प्राकृता देशभाषा ॥ 
चिदानन्दु-भूपाज्ञ को राजधानी । 

नमो देवि वागेश्वरी जेनबानी ॥ ४॥ 
समाधान रूपा अनूपा अछुद्रा | 

अनेकान्तधा स्थादवादांकमुद्रा ॥ 
त्रधा सप्तथा द्वादशाह़ी बखानी । 

नमो देव वागेश्वरी जैनवानी ॥४॥ 
शअकोपा श्रमाना अदंभा अलोभा | 

श्रतज्ञानहूपी मतिन्नानशोभा |) 
महापावनी भावना भव्यमानी। 

नपो देषि वागेश्वरी जेनवानी।॥ ६॥ 
अतीता अजीता सदा निर्विकारा | 

विषेवाटिकॉलडिनी खन्नधारा ॥। 
पुरापापविज्षेपकत कैपाणी | 

नमो देवि वागेश्वरी जेनवनी।॥७॥ 
अगाघा अबाधा निरझा निराशा! ह 

अनन्ता अनादीश्वरी कमेनाशा ॥ 











कक आकर डकट तप धिक्रद्ातीततआ का चुना ५ काका नर 2सपइानके वालटनिदरापक४ंत)अडजक 
80 १६७ ] 


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निशंका निरका जिदंका भवानी । 
नमो देव वागेध्री जनवानी॥ ८॥ 
अशाऊा मुररेफा विचेका विधानी । 
जगजलुमित्रा विचित्रायसानी ॥ 
सममस्ताबलेका निरस्तानिदानी । 
नमो देवि वागेश्री जनवानी ॥ ६॥ 
चस्‍्तुददंद 
जेनवाणी जनवाणी सुनहि जे जीव | 
जे आंगम रुचिधरें जे प्रतीति मन भारहिं भानदि | 
अवधारहिं जे पुरुष समर्थ पद श्रथे जानहि ॥ 
जै हितहेतु “बनारसी” देहिं धर्म उपदेश । 
ते मत्र पावदिं परस सुख, तज संसार कल्लेश ॥१०॥ 
इति शारटाएक 


अथ नवदुगांविधान लिख्यते । 
कवित्त- 

प्रथमदिं समकितवंत लखि आपापर, 

परको स्वरूप त्यागी आप गहलेतु है | 
बहुरि विलोक साथ्यसाघक अवत्या भेद, 

साधक हो सिद्धिपद को सुद्ृष्टि देतु है ॥ 
अविरतगुणथान आदि छीनमोद अन्त, 

नवगुणथान निति साधकको खेतु है ॥ 











८ बनारसीपिलात 


| सिकननास+० न िप-+६ बनाम कनकनमनन-ना ० व नाननननकननन मनन लन-ममबति "तट निनरि गए ले पनननाननननि नमन नानक न 
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संजम चिहन विना साधक गुपतरूप, 
त्यों त्यों परगट ज्यों ज्यों संजम सुचेतु है॥ १॥ 
जेसे काहू धुरुषको कारण ऊरध पंथ, 
कारज स्वरूपी गढू भूमिगरिरश्रुग है। 
तेसे साध्यपद देव केवल पुरुष लिंग, 
साधक सुमति देवीरूप तियलिंग है ॥ 
ज्ञानकी अवस्था दोऊ निश्चय न भेद कोऊ, 
व्यवहार भेद देव देवी यह व्यंग है । 
ऐसे। साध्य साधक स्वरूप सूधो मोखपंथ, 
संतनको सत्यारथ मूढ़नको ढिंग है ॥ २॥ 
जाको सौनभवकूप मुकुट विषेकरूप, 
'अनाचार रासभ आहरूढदुति यूकी है । 
जाके एक हाथ परमारथ कलश दूजे, 
हाथ त्याग शकति बोहारी विधि बूमी है । 
जाके गुणभवण विचार यहे वासी भोग, 
ओपन भगतिरसरागसों अरूमी है ॥ 
सो है देवी शीतल्ञा सुमति सूमे सतनको 
दुरबुद्धि लोगनको रोगहूप सूकी है ॥ २॥ 
कूपसों निकस जबभूपर उदोत भ्ई, 
तब और ज्योति मुख ऊपर विराजी है। 
भुजा भई चौगुणी शकति भई सौगुणी, 
लजाय गए ओऔगुणी रजायढिति छाजी है ॥ 








_अनारसीबिज्ञास ६] 


कु भसों भ्रगत्यो नूर, रासमसों भयो-सूर, 
सूप मयो छत्रसों बुद्दारा शत्रः राजी है। 
ऐपन को रंगसो तो कंचनको अंग भयो, 
छत्रपति नामसयो वासी रीति ताजी है:॥ ४ ॥ 
दोहा । 
जाके परसत परमझुख,द्रसत दुख मिट जाहि। 
यहै सुम्नति देवी प्रगट, नगर कोटउ्यट्माहिं।। ४१ 
कवितत । 

यहै बंधबंधकस्वरूप मानघंदी भई: 

यह है अनंदी चिदानंद अनुसरणी। 
यह ध्यान अगनि प्रगट भये ज्वालामुखी, 

यहे चंडी मोह महिषाठुर निदरणी ॥ 
अह्टे अष्टभुजी अष्टकमकी शकति भंजे, 

यहै कालबचनी उलंघे कालकरणी | 
यहै अबल! बली विराजे त्रिभुवन राणी, 

यहै देवी सुमति अनेकभांति चरणी॥ ६ ॥ 
यहै कामनाशिनी कमिज्ा कलि में कहते; 

यहै ब्रक्षाचारिणी छुमारी है अपरनी। 
यद है भगौंत यहै दुर्गा दुगेति जाकी, 

यहै छत्रपती' पुर्यपापतापहरनी ॥ 
यहै रामरमणी सहजरूप सीता सत्तो, 

यहै आदि छु दरी विवेकसिंदचरनी। 





[ १७५ बनारसीबिलास 
यहै जगमाता अलनुकंपारूप देखियत, 
यहे देवी सुम्नत अनेकभांति बरनी॥७॥ 
यहे सरस्वती हंसवाहिनी प्रगट रूप, 
यहे भवभेदिनी भवानी शंभुघरनी। 
यहै ज्ञान लच्छुनसों लच्छुमी विज्ोकियत, 
यहे गुणरतनभंडार भारभरनी 
यहै गंगा त्रिविधि विचारमें त्रिपय गौनी, 
यह मोखसाधन को तीरथ की घरनी । 
यहै गोपी यहे राधा राधे भगवान भावै, 
यहै देवी सुमति अनेक भांति बरनी | ८ |! 
यहे परमेश्वरी परम ऋद्धि सिद्धि साधे, ह 
यहे' जोग माया व्यवहार ढार ढरनी | 
यह पदमावतती पदस ज्यों अलेप रहे, 
यहै शुद्ध शकति मिथ्यात को कतरनी || 
यहै जिनमहिसा बखानी जिनशासन में, 
यहे अखढित शिवमहिमा अमरनी। 
यहै रसभोगनी वियोग में वियोगिनी है, 
यहै देवों सुमति अनेकभांतिवरनी ॥ ६ ॥ 


| इति श्री नवदुगों विधान ६ 














बनारसीपित्ञास -१७१ ] 


कक, 


अंथ नामनिर्णयविधान लिख्यते, 
दोहा 
काहू दिन काहू समय, करुणाभाव समेत । 
छुगुरु नामनिर्णेय कहै, भविक जीव हितहेत ॥ १ ॥ 
जीव द्विविधि संसार में, अधिररूप थिररूप। 
अथिर देहधारी अलख, थिर भगवान अनूप ॥ २॥ 
कवित्त ( ३१ वर्ण ) 
जो है अधिनाशी वस्तु ताको अविनाशी नाम, 
विनाशीक वल्तु जाकों नाम विनाशीक है । 
फूल मरे बास जीवे यहे अ्रमरूपी बांत, 
दोऊ मरे दोऊ जीबे यह बात ठीक है ॥ 
अनादि अनंत भगवंत को सुज्रस नाम, 
भवसिधु तारण तरण तहकीक हे। 
अवतरे मरे भी धरे जे फिर फिर देह, - 
विनको सुजस नाम अधिर अल्लीक है॥ ३॥ 
,.. दोहा 
थिर न रहे तर नांम की, जथां कथा जलरेख | , 
एते पर मिथ्यामती, ममता करें विशेख ॥ ४ ॥ 
कवित्त 
जग में मिथ्याती जीव भ्रम करे है सदीव, 
अम के प्रवाह में वहा है आगे बहेगा | 


'पम कप पक व 
|] 





४ 





[१७२ बनारंसीषितास 


नाम राखिवे को महारभ करे दंभ करे, 
यों न जाने दुर्गति में दुःख कौन सहदैगा । 
बार बार कहें मोद भागवंत घनवंत, 
,... मेरा नाव जगत में सदाकाल रहेगा। 
याही ममता सों गद्दि आयो है अनंत नाम, 
आंगे योनियोनि में अनंत नाम गहेगा।। ५ ॥ 
दोहा 
बोल उठें चित च्‌ कि नर, छुनत नामकी हांक | 
वदै शब्द सतगुरु कहें. हैं भ्रमकृप धर्मांक | ६ ॥। 
कवित्त 
जगत में एक एक जनके अनेक नाम, 
एक एक सलाम देखिये भ्रनेक जनमें । 
वा जनम और या जनम और आगे और, 
फिरता रहे पै याकी थिरता न तनमें | 
कोई कलपना कर जोई नाम धरे जञाको, 
सोई जीव सोई नाम माने तिहूँ पन में | 
 ऐसो विरतंत छख संतसों सुगुरु कहे, 
तेरो नाम 'अ्रम” तू विचार देख सन. में ॥ ७॥। . 
दोहा 
नांम अनेक समीप तुव, अंग अंग सब ठौर । 
जासों' तू अपनो कहे, सो भ्रमरूपी ओर ॥ ८॥ 


बनारसी विल्ञास १७३ ] 


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कवित्त 
केश शीस भाल भोंद बरुणी पत्षक नेन, 
| गोलक कपोल गंढ नासा मुख भ्रौन है । 
झधर दसन ओंठ रसना भमसूहा तालु, 
घटिका चिबुक कंठ कंधा डर भौन है।। 
काँख फटि भुजा कर नाभि कुच पीठ पेट, 
अंगुली हथेली नख जंघाथल भौन है। 
नितम्ब चरण रोम एते नाम अंगन के, 
तामें तू विचार नर तेरा नाम कौन है ॥ ६॥ 
दोहा 
नाम रूप नहिं जीवको, नहिं पुद्ल को पिंड | 
नहिं खमाव संजोग को, प्रगट भरमको मिंड ॥ १०॥ 
यह सुनामनि्णेयकथा कही छुगुरु संछेप। 
जे समुमहिं जे सरदहें, ते नीरस निरलेप॥ ११॥ 
इति भ्रीनामनिर्णयविधान 


अ्थ नवरत्नकवित्त लिख्यते 

१ २ 8 8५०५ ५ 
धन्वन्तरि छुपणक अमर, घटखपर बताल | 

|| छ ४ ५ 
बररुचि शंकु बराहमिह (२). कालिदास नव ज्ञाल ॥९॥ 

रे बे 8 ७ ६ 
विमलचित्त जाचक शियिल्त, मूह तपस्ती प्रात | 

८ ० 

क्पणर्बादि तियनरपती, ज्ञानवत्त नव वात ॥२॥ 








छप्पय 
विभल चित्तकर मित्त, शत्र छुलवल वश कजञ्य | 


६>4-9+ 49-2० .2७५:2५/७० ३ ०">पकविकिए.42३ न्याय 











| १७४ ः बनास्सीपिलास 


] उन्‍हें सन कन डे कक जम सा ढ/री पानी यही चाही हनी जी पी 3० जहा कही भजन पेज पीजी कमी जहर कह पढ़ १०-२० 


प्रभु सेवा वश करिय, ज्ञोभवन्तहिं घन दिल्वय ॥ 
युवति प्रेस चश करिय, साधु आदर वश आतनिय | 
महाराज , गुणकथन बंघु समरस सनमानिय ॥ 
गुरुनमन शीस रससों रसिक, विद्या बल बुधि मन हरिय। 
मूरख पिनोद विकथा वचन, शुभ स्वभाव जगवश करिय॥ ३॥ 
जाचक लघुपत लहै, काम आतुर कलंक पद । 
रोभी अपजस लहै, असनलालची लहै गद ॥ 
उन्नत लहे निपात. दुष्ट परदोष लहे तकि। 
कुमन विकल्ता लहै लहै संशय जु रहे चकि | 
अपमान कहे लिधेन पुरुष, ज्वार बहु संकर सहे। 
जो कहे सहज करकश बचन, सो जग अग्रियता लहै॥४॥ 
शिथित् मूल दि करे, फूल चूटे जलसींचे । 
ऊरध डार नवाय, भूमिगत ऊरध खोंचे । 
जे मत्ीन मुरमाहि, टेक दे तिनदि छुघारइ। 
कूड़ा कंटक गलित पत्र, बाहिर चुन ढारइ ॥ 
लघु वृद्धि करइ भेदे ज्ुगत बाड़ि सेवारे फत्त भले | 
माली समान जो श्ृप चतुर, सो घिज्से सपति अखे ॥५| 
भृद ससकती तपी, दुष्ट सात्ती ग्रहस्थ नर। 
नरनायकु आलसी, बिपुल धनदंत कृपण कर ॥। 
धरमी दुसद्द स्वभाष, वेद पाठी अघरम रत। 
पराधीन शुचिवन्त, भूमिपालक निदेशहत।॥ 
रोगी द्रिद्रपीडित पुरुष, वृद्ध नारि रसगृद्धंचित । 
एते ब्रिडम्व संसारमें, इन सब कहें घिक्‍कार नित-॥ ६॥ 








बनारसीबिलास ७४] 


अलसी +>नलनेञतन  पनन+- न ८ पानहमनननतन तन नल ज तप न न पतन बन 
सा सडक 02 (री पारी फ्री सही कह करी चार पारी पी पारी ि-ामरे:आ>...क सन जानी पाक चैक सिर पर सा ९९४१ ९५४० पाक सी? ९५८०१ २०आ? युग पाक ए०#' एक आम सह ९९छ पक चाह भाक भा रकम िआर की ९७ बह#?१ 


प्रात धर्म चिन्तवे, सहजद्दित मंत्र बिचारे। 
चर चल।य चहुं ओर, देशपुर प्रजा सम्हारे ॥ 
राग हंष हिय गोप, वचन अमृत सम बोणे । 
समय ठौर पहिचान, कठिन कोमल गुण खोले । 
जतन करे संचय रतन, न्यायप्तित्र अरि सम गने । 
रणमें निशक हो संचरे. सो नरेन्द्र रिपुंदल इने ॥ ७ ॥ 
कपण बुद्धि यश हनें, कोप दृह प्रीति बिछोरे | 
दूंभ विध्यंसे सत्य,छ्षुधा मर्यादा तोरी ॥ 
कुव्यसन धन छय करे, विपति थिरता पद टारइ | 
मोह मरोरे ज्ञान, विषय शुभ ध्यान विडारइ ॥| 
अभिमान बिछेदे विनय गुण, पिशुनकर्म भुरुता गिले | 
कुकल्ञाअभ्यांस नासहि सुपथ, दारिद्सों आदर टलै॥ ८ ॥ 
तियबल योवन समय, साधुबल शिवपथ घवर | 
नृपबल तेज प्रताप. दुष्टटल बचन अठम्बर | 
निर्धनवर्न सुमिल्राप, दानिसेवा वाचकबल !। 
, _ बाणिजबल व्यवहार, ज्ञानवल वरविवेकदल् || 
! विद्या- विनय उदारबल, गुणसमूह प्रभुनल द्रब। 
परिवार स्क्‍्वल्ल सुविचार कर, होहिं एक ' समता सरब ॥ 
' नरपतिमेंडर नीति, पुरुषमडन सनधीरज । 
पंडितमं्डंन विनय, तालसरसंडन नीरज ॥ 
कुलतियमंडन लाज, वचनमंडन प्रसन्नमुख । 
: मतिमंडन कवि धर्म, साधुमंडन समाधिसुख ॥* 








| >>... नारसीबिज्ञास 


अनरकारतभ #िकरन नए 6० मय भ.#म ७ टन पातकजमक ++ 2७ पान कहथ 23 &०९०/०मे# ५, #०. ७०९, #० न ज०.व.४० 6६... 2 न #०९.#-१५ ८ #४ 


भुजबलसमथ संडन क्षमा, ग्ृहपति मंडन बिपुल्ल घन । 
मंडन सिद्धान्त रुचि सन्त कहँ, कायामंडन छवन घन ॥१०। 
ज्ञानवन्त हठ गहे, निधन परिवार बढ़ावै। 
विधवा करे गुमान, धन्ों सेवक हो घावे ॥ 
बुद्ध न ससमे धर्म, नारि भर्ता अपमाने। 
पंडित क्रिया विहीन, राय दुबु द्धि प्रमाने ॥ 
कुल्नवंत पुरुष कुलविधितजे, वंघु न माने बंधुहित | 
सन्यासधार धन संग्रहै, ए जगमें मूरल विद्ित॥ ११॥ 
इत्ति-श्रीनवर्‌त्न कवित्त, 





अथ अप्टप्रकारजिनपृूजन लिख्यते 
दोहा | 

जलघारा चन्दन पुहुष, अक्तत अरु नेवेद। - 

दीप घृप फल्न अर्धयुत; जिनपूजा वसुसेद ११ 
जल-मलिन वस्तु: उज्ज्वल फरे, यह खभाव. जलसाहि। 

जकसों जिलपद् पूजतें, कतकलडू सिट जाहि।॥ २॥ 
घन्दन-तप्तवस्तु शीतल करे, चन्दन शीतल आप। 

चन्द्ससों जिन पूजत, मिटे मोह संताप ॥ ३ ॥! 

पुष्प-पुष्प चापधर पुप्पशर, धारे सनमथ ' वीर । 

यातें पूजा पुष्पकी, हरे मदनशरपीर ॥ ४॥ 
अज्ञत-तन्दुल्ल धवत् पथिन्न अति, नाम-सु अक्षत तास | 








बनारसीबिज्ञास - १७७ ] 


अक्षतसों जिन पूजतें, अक्षय गुणपरकास ॥ ५॥ 
नेवेद्र-परम अन्न नेवेय विधि, छुधाहरण तन पोष | 

जिनपजते नेवेयसों, मिटहिं छुधादिक दोष | ६॥ 
दीपक-आपा पर देखे सकल, निशिमें दीपक होत । 

दीपकसों जिन पूजतें, निर्मतज्ञानय्योत ॥ज। 
धूप-पावक दहै सुगंधिको, धूप कहांवे सोय । 

खेबत धूप जिनेशको, कम दहन छत्त होय ॥८॥ 
फल्न-जो जैसी करनी करे, सो तेसा फन्न लेय ! 

फल्न पूजा जिनदेवकी, निश्चय शिवफल देय ॥६॥ 
अर्घ-यह जिन पूजा भ्रष्टविधि, कीजे कर शुचि अंग । 

प्रतिपूजा जलघारसों, दीजे अघे अमंग ॥१०॥ 

, इति अष्य्परकार जिन पूजन 








अथ दशुदानविधान लिख्यते, 

गो सुबर्ण दासी भवन, गज सुरंग परधान | 

कुलकल्षत्र तिल भूमि रथ, ये पुनीत दशदान ॥१॥ 

अब इनको विवरण कहूँ , भावितरूप बखानि। 

अलखरीति अनुभवकथा, जो सममे सो दानि ॥र॥ 

। चोपाई । 

गो कहिये इन्द्री अभिधाना। बहुरा उमेंग भोग पय पाना ॥ 
जो इसके रसमाद्दि न राचा। सो सबच्छ गोदानी साँचा ॥श। 


[ १७८ बनारसीबिलास 


कनक घछुरंग घु अक्षर वानी | तीनों शब्द सुधर्ण कहानी | 
ज्यों त्यागे तीनहुँकी साता। सो कह्ििये सुधरण को दाता॥४॥ 
पराधीन पररूप गरासी। यों दुववुृद्धि कहावे दासी॥ 
ताकी रीति तजे जब ज्ञाता। तब दासीदातार विख्याता॥५॥ 
तन मन्दिर चेतन घरवासी । ज्ञान दृष्टि घट अन्तरभासी ॥ 
सममे यह पर है गुण मेरा। मन्दिरदान होहि तिहि बेरा ॥6॥ 
अष्ट सद्दामद धुरके साथी। ए छुकर्म कुद्शाके हाथी॥ 
इनको त्याग करें जो कोई। गजदातार कट्दावें सोई ॥७)! 
मनतुरंग चढ़ ज्ञानी दौरह। लले तुरंग औरमें औरइ॥ 
निज हको निजरूप गहावे। सो तुरंगको दान कहावे॥८ां 
अविनाशी कुल्के गुण गाव । कुल कलित्र सदूबुद्धि कद्दावे॥ 
बुद्धि अतीत धारणा फेल्ली। वह कल्नत्रदान की सेली॥8॥) 
, अ््मविलास तेल लि माया । मिश्रपिंड तिल नाम कहाया ॥| 
पिंदरूप गहि द्विविधा मानी | द्विविधा तजें सोइ तिदानी ॥१०॥ 
जो व्यवहार अवस्था होई। अन्तरभूमि कहावे सोई॥ 
तज व्यवहार जो निश्चय माने | भूमिदानकी विधि सो जाने ॥११॥ 
शुकल ध्यान रथ चढ़े सयाना । मुक्तिपन्थ को करे पयाना॥ 
रहे अजोग जोगसों यागी। वहे महारथ रथको त्यागी ॥१२॥ 

ये दशदान जु में कहे, सो शिवशासनमूल | 

झानवन्त सूक्षम महै, मूढ़ विचारे थूल॥१शा। 

ये ही हित चित जानको, ये ही अहित अजान । 

रांगरहित विधिसद्दितं हित, अद्दित आनकी आन ॥७॥ 

इ्ति 


। इृदि दशदानविधान, 
नशशिफिकशिक न ननक की करन जी की आम ज पर यडो कि जीजीनपीयि पीजी डीजीपी पी निननी विधिक /4 ४३%. 





बनारसीधिल्ास्‌ १७६ ] 
अथ दश्‌ बोल लिख्यते. 
क्‍ चोपाई । 
मु जिनकी भांति कहों समुझाई । जितपद कट्दा सुनो रे भाई | 


घस स्वरूप कहाबे ऐसा | सो जिनधम बखानो जैसा |९। 
आगम कहो जिनागम सांचा । घरणों बचन और जिन बाचा ॥ 


सत भाषहुँ जिलमत समुझावहुं। ये,.दश बोल जथारथ गावह9ँ ॥२॥ 
'जिन-दोहा | 
सहज वन्यवंदक रहित, सहित अनन्तचतुष्ट । 
जोगी जोगश्रतीत मुनि, सो जिन आतस सुष्द ॥३॥ 
जिनपद। 
विधि निषेध जाने नहीं, जहेँ अर्ंड रस पान । 
विमत अवस्था जो धरे, सो जिनपद्‌ परमान ॥8॥ 


घम । 


जहिये बस्तु अबस्तुमें, यथा अवस्थित जोय | 

जो स्वभाष जमे सधे, धमम कहाब सोय ॥५॥ 
, जिनघम्मे। 

पुरुष प्रमाण परंपत, वचन बीज विस्तार | 

परे अथेकी अग्रसता, यह आमम की ढार ॥६॥ 
लिनआयम | 

जहां द्रब्य घट तत्त्व भव, लीकालोक घिचार । , 

५ विषरण करे अनंत नय, सो जिन,आगम सार जा 


[ १४७० ह बनारसीबविलास 


वचन | 
कहुं अत्र मुद्रा धरे, कह अनच्षर घार | 
सृषा सत्य अनुभय उमय, वचन चार परफार॥८॥। 
जिनवचन। 
जाकी दशा निरक्षरी, महिमा अक्षर रूप । 
त्यादवादजुत सत्यमय, सो जिनवचन अनूप ॥६।॥| 
मत | 
थापे निजमतकी क्रिया, निन्‍दे परमत रीति । 
छुलाचारसों बेंधि रहे, यह मतकी परतीति ॥१०॥ 
जिनमत | 
अ्देत्‌ देव सुसाधु गुरु, दया धर्म जहँ होय । 
केवल भाषित रीति जहें, कहिये जिनमत सोय ॥१ शा 
इति दशवोल. 





अथ पहेली लिख्यते. 
कहरानामाकी चाल, 
कुमति सुमति दोऊ त्रजवनिता, दोउठको कनन्‍्त अबाची। 
बह अजान पति मरम न जाने, यह भरतासों राची॥१॥ 
यह सुबुद्धि आपा परिपूरण, आपापर पहिचाने | 
लख लालनकी चाल चपतता, सौतसाल उर आने ॥ २ || 
करे विल्ास दांस कौतूहल, अगणित संग सह्देली । 





नारसीविज्लाल पी 


मोरे आंगन विरवा उलह्यो, बिना पवन मकुलाई। 
ऊंचि डाल बढ पात सघनवों, छाहँ सौतके जाई।॥ ४॥ 
बौले सखी बात में समुमी, कहूँ अथ अब जो है| 
तोरे घर अन्तरघटनायक, अद्भुत बिरवा सो है ॥ ५॥ 
ऊंची छात्र चेतना उद्धत, बड़े पात गुण भारी। 
ममता बात गात नहीं परसे, छुकनि छाह छुव नारी ॥ ६॥ 
उदय स्वभाव पाय पद चचत्न, यातै इत उत ढोजे। 
कबहूँ घर कबहूँ धर बाहिर, सहज सरूप कल्नोले॥७॥ 
कबहूँ निज संपति आकर्षं, कबहूं परसे माया। 
जब तनको त्यॉनार करे तब, परे सौति पर छाया॥ 5५॥ 
तोरे हिये ढाह यों आये, हों कुज्ञांन वह चेरी। 
कहे सखी सुन दीनदयाली, यहै हियाली तेरी॥६॥ 
दोहा 

'हिय आंगसमें प्रेम तरु, छुररत डार गुणपात। 

सगनरूप हो लहतहै, बिना हन्ददुखबात ॥| १०॥ 
भरमसाव ग्रीपम भयो, सरस भूमि चितमाहि। 

देश दशा इक सम भई, यहै सौतघर छाहिं॥ ११॥ 

इति पहेला । 


अथ प्रश्नोत्तरदोहा लिख्यते। 


प्रश्ष-कौन वर्तु वपु माह है; कहों आधे कहाँ जाय | 
ज्ञानप्रकाश कहां शंहे, कौन ठौर ठहराय॥ १॥ 


[ १८ 


बनारसीपिलास 


उत्तर-विदानंद वपुमाहिं है, अममहिं आये जाय। 
ज्ञान प्रकट आपा लखे, आपमाहिं ठहराय॥२॥ 
प्रश्न-जांकी खोजत जगत जन, कर कर नानासेष। 
ताहि बतावहु, है. कहों, जाको नाम अलेष ॥ ३॥ 
उत्तर-जग शोधत कछु औरको, वह तो और न होय । 
चह अखेल निरसेष मुनि, खोखन हारा सोय ॥ ४।। 
प्रश्ष-उपजे घिनसे थिररहै, वह अबिनाशी नाम। 
भेदी तुम भारी भल्रा ।, मोहि बतावहु ठाम ॥ ५॥ 
उत्तर-उपजे विपसे रूप जड़, बह चिट्रप अखड। 
जोग ज्ुगति जगमें से, वसे पिण्ड ब्रह्म ड ॥ ६। 
प्रश्ष-शब्द अगोचर वस्तु है, कछू कहों अनुमान | 
जैसी गुरु आगम कही, तेधी कहो सुजान॥ ७॥ 
उत्तर-शब्द अगोचर कहत है, शब्दमाहि पुति सोय । 
स्थादवाद शैली अगम, बिरज्ञा वूमे कोय ॥ ८॥ 
प्रश्ष-चह अरूप हू रुपमें, दुरिके कियो दुराव। 
जैसे पावक काठमें, प्रगठे होत लखाब॥ ६॥। 


उत्तर-हुतो प्रगट फिर गुपतमय, यह तो ऐसो नाहि। 
है अनादि ज्यों खानिसें, कचन पाहनमार्ि ॥ १० ॥ 
इति प्रश्नीत्तर दोहा । 


न्‍सन्‍न्‍कअटानपअ++काण परम कसमन पका 


अथ पश्नोत्तरमाला लिख्यते । 
नमत शीस गोषिन्दर्सों, उद्धव पूछत एम,। 
के विंध यम के विधि नियम, कहो यथावत जेस ॥ १ ॥ 





बगरसीषिलास १८३ ] 


य्म्म्म्म्म््म््स्््््स्््ट्स्स््स्सस्स्सस्स्स्स्््््््सडञििा्््डस्स 


समता कैसी दन कहा, कहा तितिक्षा भाव | 

घीरज दान झु तप कद्दा, कद्दा सुभर विवसाव ॥ २ ॥ 
कहा सत्यरति है. कहा, शौच त्याग धन इृष्ट | 

यज्ञ दक्षिणा बलि कहां, कहा दया उतविष्ट॥ ३॥ 
कहा लाभ विद्या कहा लजा लक्ष्मी भूह । 

सुल्न अरु हुख दोऊ कहां, को पंडित को मूह ॥ ४॥ 
पैथ कुपथ कहो कद्दा, स्व नरक पितौन | 

को बंधव अरु गृह कद, धनी दरिद्री कौन ॥ ५॥ 
कौन पुरुष किये ऋपण, को ईश्वर जग मा्हि। 

ये सब प्रश्न विचार मन, कही मधुप हरिपाहिं।॥ ६ ॥ 
नारायण उत्तर कहे, सुन उद्धव भन ल्ाय ! 

द्वाद्श यम द्वादूश नियम, कहूं तोहि समुझाय ॥ ७॥ 
दया सत्य थिरता क्षमा अ्रभय अचौय सुमौन। 

ज्ञाज असग्रह अस्तिमत, संग त्याग तियवौन ॥ ८॥ 
हरि पूजा संतोष गुरु, भक्ति होम उपकार | 

जप तप तीर॒य द्विविधि शुचि, श्रद्वा अतिथि अह्दार ॥६॥ 


सोरठा । 
कहे भेद चौबोस, भिन्न २ यम नियमके | 
रहे प्रश्न चौबीस, तिंनके उत्तर अब खुनहु ॥ १० ॥ 
घसता ज्ञान छुधारस पीजे | यम इन्द्रिनको निमह कोजे ॥ 
सुकटसहन तितिज्ञा वारज | रसना मदन जीतवो घीरज ॥ ११॥ 
दान अभय जहें दंढ न दीजे | तप कामनानिरोध कहीजे ॥ 
अन्तरविजयसूरता सांची । सत्यत्रक्ष दशेन निरवाची ॥ १२॥ 





[ १८४ घनारसीबिलास 
रतु अनत्तरी ध्वनि जह होई। करम अभाव शौचविध सोई ॥| 
त्याग परम सनन्‍्यास विधाना। परम धरम धन इृष्ट निधाना ॥१शा 
भव धारणा यज्ञकी करनी । हित उपदेश दक्षिणा वरनी ॥ 
प्राणायास बोधवल अक्षा। दया अशेष जनन्‍्तुकी रक्ता॥ १४। 
लाभ सावशुसगतिपरकाशा । विद्या सो जु अश्रविद्यानाशा ॥ 
लाज कुकर्म गिलानि कहावे। लक्ष्मी नाम निराशा पावे॥ १५॥ 
सुखदुखत्यागबुद्धि छुलरेखा । दुख विषयारस भोगविशेजा ॥| 
पंडित बंध मोज्ञ जो जाने | मूरख देहादिक निज माने ॥ १६॥ 
मारग श्रीमुख आगम भाषा । उत्पथ कुधी कुसन अभिलाषा ॥| 
घुकृतिबासना स्वगेविज्ञासा। दुरित उचछाह नके गतिवासा ॥ १७॥ 
वंधव हितू स्वगें सुख दाता । गृह सानुषी शरीर विख्याता ॥ 
धनी सो जु गुणरक्ञभंडारी। सदा दरिद्री रृष्णाघारी॥ १८॥ 
कृपण सो जु विषयारसलोभी । ईश्वर त्रिगुणातीत अछोमी ॥ 
चहुत कहां कगि कहों विचक्षण | गुण अरु दोष दोहुके लक्षण ॥१६॥ 
दोहा । 

हांष्ट सुगुन अरु दोषकी, दोष कहते सोय | 

गुण अरु दोष जहां नहीं, तहां गुन परगट होय ॥| २० ॥ 

इति प्रशोत्तरमातिका, रद्धवहरिसंवाद | 

भाषा कहत “बत्तारसी” 'सालु? सुगुरुपरसाद || २१ ॥ 

इति प्रश्नोत्तर्मालिका | 








बनारसीवित्ञास श्ष्श ] 





अथ अवस्थाष्टक लिख्यते । 
दोहा । 


चेतनलक्षण नियतनय, सबे जीव इकसार | 

मूह विचत्षण परमसों, त्रिविधि रूप व्यवहार ॥ १ ॥ 
मूह आतमा एक विधि, त्रिविधि विचज्षण जान | 

दिविधि भाव परमातमा, षदटषिधि जीव बखान ॥ २॥ 
विधि निषेध जाने नहीं, हित अनदित नहीं सूक । 

विषयमगन तन क्षीनता, यहै।मूढ़की बूक ॥ ३ ॥ 
जो जिनभाषित सरदहै, भ्रम सशय सब खोय । 

समकितवंत असंजमी, अधम वििचत्तण खोय ॥ ४ ॥ 
चेरागी त्यागी दमी, स्वपर -वित्रेकी होय। 

देशसंजमी संजमी, मध्यम पंडित दोय ॥ ५ # 
अश्रमाद .गुणथानसों, त्ञीणमोहलों ;दौर + 

श्रेणिघारणा जो धरे, सो पंढित शिरमौर ॥ ६॥ 
जो केवत्ञ पद आचरे, चढ़ि सयोगिगुणथान । 

सो जगम परमातमा, भववासी भगवान ॥ ७.॥ 
जिहिपदमें सबपद्‌ मगन, ज्यों जलमें-जज्ञ घुन्द । 

सो अविचतल परमसातमा, निराकार निरदुन्द॥८॥ 


इति अवस्याष्टक। 


[ १८६ हा बसारसीविल्ञास क्‍ 


अथ षट्दर्शनाष्टक लिख्यते, क्‍ 


शिवमत बौद्ध रु वेब्सत, नेयायिक मतदक्ष। 
सीमाँंसक्तत जेनसत, परदद्शेन परतक्ष ॥ १॥ 
शैबमत | 
देव रुद्र जोगी सुगुरु, आगम शिवपहुख भाल । 
गने कालपरणति धरम, यह शिवमतकी साख ॥ २ ॥ 
बौद्धमत । 
देव बुद्ध गुरु पाघड़ी, जगत वस्तु छिन औध । 
शुन्यवाद आगम भजे, चारवाक मत वौध ॥ ३॥ 
वेदान्तमत । 
देव ब्रह्म अत जग, गुरु बेरागी भेष। 
वेद प्रन्थ निश्चय धरम, मत वेदान्तविशेष ॥ ४॥ 
। न्यायमत | 
देव जगतकरता पुरुष, गुरु सनन्‍्यासी होय। 
न्याय प्रन्थ उद्यम धरम, नेयायिक मत सोय ॥ ५॥ 
मीमांसकर्मत | 
देव अ्र॒लख दरवेश गुरु, माने कर्म गिरंथ। 
धर्म पूर्वक तफलउद्य, यह मीमांसक पंथ ॥ ६॥ 
| जेनमत | 
देव तीर्थंकर गुरु यती, आगम केव्ति बैन | 


धर्म अनन्त नयातमक, जो जाने सो जेन ॥ ७॥ 
ज्श््य््ख्स्ल्स्टल्म्स्स्च्च्च्््््--- पटड पा ेत22256056:0:42 





षनारसीवित्ञास श्ष्७ ] 


ए छद्ठमत छे भेदसों, भये छूट कछु और । 
प्रतिषोद्स पाखंढसों, दशा छचानवे और ॥ ८॥ 


हति बटदर्शनाष्टक, 





अथ चातुर्वर्ण लिख्यते. 
जो निमश्चय मारग गहै, रहै ब्रह्म गुणलीन। 
जह्मारष्टि सुख अनुभव सो '्राह्यण” परवीन ॥ १॥ 
जो निश्चय गुण जानके, करे शुद्ध व्यवहार । 
जीते सेना मोहकी, सो कृत्री! भुजभार॥२॥ 
जो जाने व्यवहार नय, हृह व्यवह्ारी होय। 
शुभ करणीसों रम रहै, 'नेश्य' कह्ावे सोय ॥ ३ ॥ 
जो मिथ्यामत आदर; रागहेषकी खान। 
विनविवेक करणी करे, शूद॒वर्ण सो जान॥ ४॥ 
चार भेद करतूतिसों, *'च नीच कुलनाम,। 
ओर वर्श्संकर सबे, जे मिश्रित परिणाम ॥ ४॥ 

इति चातुर्व॑र्ण । 





अथ अजितनाथज्ी के छंद. 


गोयसगण॒हरपय नमो, सुमरि सुगुरु रविचन्दः । 
सरसुति देवि प्रसादल्नहि, गाऊं अजित जिनन्द्‌ ॥ १॥ 


[ एप्प धनारसी पिल्ञास 


। छुन्द्‌, । 
श्री. अवध्यापुरं देश घुहायाजी | 
राजे तहं जिवशन्र्‌ रायाजी॥ 
राया सुध् निधान सुन्दर, देवि विजय तसु धरे । 

' तप्तु छद्र विजय विमान सुरवर, स्वप्न सूचित अवतरे॥ 
तब जन्स उत्सव करहिं वासव, मधुर धुनि गावहि छुरी | 
आनन्द त्रिसुवन जन 'बनारसि? धन्य श्रीभ्रवध्यापुरी ॥ २॥ 

महियत्न राज्ञिष अजित जिनंदाजी। 
गज वर लच्छन निर्म्न चंदाजी॥ 
चन्दा उद्त इच्चाक वंशहि, कुमति तिमर विनासिये | 
रूय साठ चार सुचाप परिमित, देह कंचन भासिये।॥ 
दिढ़ पालिराज छु गद्य संजम, मुकति पथ रथ साजियो ! 
उत्पन्न केवल सुख “बनारसि” अजित महियत्ञ राजियों॥ ३॥ 
गढ़ योजनमहि रचें सुद्देवाजी ! 
अष्ट प्रतीहवार करहि सु सेचाज़ी ॥ 
सेवहिं अशोक प्रसून बरसत, दिव्यधुनि तह गाजहीं | 
भामर सिद्दासन प्रभामउत्न छत्न तीन विराजहीं ॥ 
, नवदेव दुद्मि सभा बारह, चौतिसों अतिशय सही। 
घुर अछुर किन्नरगण 'बनारसि' रचित गढ़ योजन मद्दी ॥ ४ ॥ 
ज्त्ष बहन्तरि पूरव आया जी | 
भोग सु जिनवर शिवपद्‌ पायाजी | 
शिवपद्‌ विनायक सिद्धि दायक, कर्म भद्दारिपु भंजनों। 
परणे शिषैराबाद संडन, भविक जनमनरंजनो॥ 





रे 


बनारसी बिलास १८६- ] 


सोलैसे सत्तर समय आश्वनि, मांस सितपल्र बारसी । 
विनबत दुहू कर जोर सेवक, सिरीमात्न 'वनारसि? ॥ ५॥ 
रईति भौभ्नजितनाभ के छन्द, 


अथ शान्तिनाथजिनस्तुति. 


वाकीमहम्मद्‌ खान के चंदवाकी ढाल | 
सहि एरी ! दिन आज सुद्दाया मुझ भाया आया नाहिं घरे। 


' सहि एरी | मन उदृधि अनन्दा सुख, कन्दा घन्‍्दा देह धरे ॥ 


ध्चन्द्‌ ज्ियां मेरा चल्नम सोहै, नेन चक्रोरहिं छुक्स करे | 
जगश्योति सुई कीरतिछाई, बहु दुख तिमरवितान हरे ॥ 
सहु कालविनानी अम्नतवान्री, अरु मृगका लांछन कहिए । 
श्रीशान्ति जिनेशनरोत्तमकों प्रभु, आज मित्षा मेरी सहिए !॥१॥ 
सहि एरी ! तू परम सयानो सुरक्षानी रानी राजत्रिया | 
सहि एरी ! तू अ्रति सुक्षमारी, घरन्यारी प्यारी प्राणप्रिया ॥ 
प्राणप्रिया लखि रूप अचंभा, रति रंभा मन लाज रहीं | 
कल्धौत कुरंग को ल फरि केसरि, ये सरि तोहि न होंदि कहीं ॥ 
अनुराग सुद्दाग भाग गुन आागरि, नागर पुन्यहिं लह्विये | 
मिल्लि या तुक कन्त नरोत्तमको प्रभु, धन्य सयानी सहिये ! ॥२॥ 
दोहा । | 
विश्वसेव कुलकमलरधि, अचधिरा उर अवतार । 
' घनुष छु चाल्िस कनकतन, वन्दहुँ शईन्‍्त कुमार ॥३ | 


वह का चार पारी यही जारी यार परी कक करन पे कर पिकी पक 


गा आ ५।- अंक“ “४. 3-5. - 7५४०३; ।ांघणणा_नणणणाणओं 
बड़ ऋन्‍क 


[ १६० बनारसीपिलास 


प्रिमगी छन्द, ( १०, ८, ८, ६ ) 
गजपुर अवतारं, शान्ति कुमारं, शिवदातारं, सुखकारं। 
निरुपम आकार, रुचिराचारं, जगदाधारं, जितमार ॥ 
कृतअरिसंहारं, महिमापारं, विगतविकारं, जगसार | 
परहित संसारं, गुणघिस्तारं, जगनित्तारं, शिवधार ॥ ४॥ 
सकल सुरेश तरेश अरु, किन्नरेश नांगेश | 
तिनिगणवन्दित चरणुजुग, वन्दहुु शान्ति जिमेश ॥ ५॥ 
भ्रीशान्तिजिनेशं जगतमहेशं, विगतकलेशं भद्दे शं ! 
भविकमलद्निश, मतिमहिशेशं, सदनमहेशं, परमेशं॥ 
जनकुमुदनिशेशं, रुचिरादेशं, धर्मघरेश चक्रेशं। 
भवजलपोतेशं, महिमनगेशं, निरुपमवेशं, तीर्थेशं॥ ६ ॥ 
करत अमरनरमधुप जछु, वचन सुधारसपान ! 
बन्दृहु शान्तिजिनेशवर, वदन निशेश समान || ७ ॥ 
वररूप अमान, अरितसभानं, निरुपमज्ञानं, गतमान॑ | 
गुणनिकरस्थान. मुक्तिवितानं, लोकनिदानं, सध्यानं॥ 
भवतारनयानं, कृपानिधान, जगतप्रधानं, सतिमान | 
प्रगटितकल्यानं, बरमहिमानं, शिवपददानं, मृगजान॥८ा 
भवसागर भयभीत बहु, भक्तलोकप्रतिपात्न । 
बन्द॒हु शान्ति जिनाधिर्पति, कुर्गातल़्ताकरवात्ञ ॥ ६ ॥ 


भजितभवजाले, जिवकलिकालं, कीतिविशालं, जनपाल॑ | 
गतिविज्ञितमराल, अरिकुज्कालं, वचनरसालं, वरभालं | 
मुनिजलजमृणालें, भवभयशालं, शिवररमाल॑, छुकुमाल॑ | 


सल्‍्रड्येडतपेएटगपआम्रि,हान्‍प परेशान पेकरिचडरर ये जा 0+र तह पर फट पट चेक पे पक चर कट पट कस घेर पक चर च#३० च८ह कप ३००१३ चाह पक" ५८ सन पेड पैक कल चिट न्‍ कफ फट चर पेपर पे पक 





मियां 


बनारसीविलास . १६१ ] 


प्स्सफिपफसफफपपप<प पक फपपपपपपपपपपपपपन्‍पपप ८८८८ ८5८ ््पप८ 
भवितिरुषतसालं, त्रिभुवनपालं, नयनविशाल्त॑ गुणमालं॥ १० ॥ 
कलश-छप्य । 

दवीर हिमालय हंस, कुन्द शरदअ निशाकर । 

कोर्तिकान्तिवित्तार, सार गुणगणरत्ञाकर ॥| 

दुःझति संतति धाम, कामविद्द षिविदारण | 

सानमतंगजसिह, मोहतरुद्लन सुवारण | 
श्रीशान्तिदिव जय जितमदन, 'बनारसि” बन्दत चरण | 
भवतापहारिहिमकर बदन, शान्तिदिव जय जितकरण ॥ ११॥ 

हृति भ्रीशान्तिनाथ जिनसतुति, 





अथ नवसेनाविधान लिख्यते, 
वेसरी छन्द्‌ 
प्रथमहिं पत्ति नाम दल क्षेन । तासों त्रिगुण कहावे सेन ॥। 
सेन त्रिगुण सेनामुख ठीक । सेनामुखसों त्रिगुण अनीक॥ १॥ 
कीले त्रिगुण बाहिनी सोइ | वाहनि त्रिगुण चमूदल होड़ ॥ 
त्रिगुण बरूथनि दक्ष परचंड । तासों त्रिगुण कहाके दंंढ ॥ २॥ 
दोहा । 
दूंढ कटक दशगुण करहु,,वन अछौहिणी जांन। 
हयगय रथ पाय्रक सहित, ये तब कटक बलान ॥ ३ ॥ 
, पत्ति। 2 
एक मतंगज एक रथ, तीन तुरंग प्रधान | , 
सुभट पंच पाय सह्दित, पत्ति कटक परवान ॥-४-॥ 


करीषक 


[ १ध्२ बनास्सीविज्ञास 


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'सरम०अअ०-भमक पना- वग3७ <७०>क---++माम+५+ककननमआ «का» »+8»+.' 


सेना | चौपाई: 
नव तुरंग रथ तीन छुभायक | हसस्‍्ती तीन पंचदंश पायक | 
बल चतुरंग और नहिं लेन | यह परवान कहाबे सेन | ५॥ 
सेनामुख | 
सत्ताइस घोड़े नव हाथी | पैंतालिस पायकनर साथी | 
नवरथ सहित कटक जो होई । दल सेनामुख कहिये साईं॥ ६॥ 
अनीकनी | 
मच सतंग सात अरु बीस | पवन वेग रथ सत्ताईस | 
आअनुग एकसौ पैंतिस ठीक | हय इक्यासी सहित अनीक | ७॥ 
बाहिली । आभानक छन्द | 
इक्यासी गजराज घोर्घन गाजने । 
इक्यासी परमान मद्दारथ राजने ॥ 
तीन अधिक चालीस तुरंगम दोयसो | 
अनुग चोरसौप॑च बाहिनी होय सो ॥ ८॥ 
चमू | गीला छन्द | 
गज दोयसेतेताल रथवर, दोयसौ तेताह्न | 
है सातंसो उन्तीस  परमित, जातिवन्त रसात्न ॥| 
जहँ सुभट बारदद सौ सुपायक, अधिक दश अरु पंच | 
सो चमूदत्न चतुरंग शोमित,संहित नर तिरजच ॥ ६॥ 
बिरूधिनी | 
रथ सातंसे उनंतीस कुजर, सातसे उनतीस | 
हय एक विंशति से खतासी,'वपत उन्नत सीस ॥ 
छत्तीससौ बंलर्बत पायक, अंधिक पेंतालीस । 
सो है बरूंथनि कटक दुद्ध २, 'वटक !सुन्दर दीस॥ ३०॥ 


वनारसीविज्ञास. १६३ || 


दृंढ-रोत्ा ! 
कुंजर दोय हजार एक सौ झसी सात गनि | 
जेते गज तेते प्रमान रथराज रहे बनि॥ 
नवसौ पैतिस दसहजार- पायक प्रचंड व्ष | 
पैसठसे इकसठ, तुरंग यह दंड नाम दल्न ॥१९॥- 


अत्तोहिणी-छपय। 








गज इकवीस हजार, आठ-सौ सत्तर:गज्नहि। 
रथ इकपीस हजार, आठ सौ सत्तर सजहि ॥| 
एक लाख अरु नव॒हजार, नर घुभद .सुभाग्रक। 
तिस ऊपर तीनसो अधिक पंचास सुपरायक। 


तहत तुरंग. पैसठ संहस, 

छसो अधिक और ,लिय- 
इह्बिधि अभंग चतुरंग दक्र, । 
- *झत्तौहिणी-प्रमाण किय ॥ १२।॥ 


इति नवेस्तेना विधान 


[ १६४ वनारसीविल्ञास 


अथ नाटक समयसारसिद्धान्त के पाठान्तर 
कलशोंका भाषानुवाद 


मनहर। 
प्रथम अज्ञानी जीव कहे में सदीव एक, 
दूसरो न और में ही करता करम को। 
अन्तर विवेक आयो आपापर भेद पायो, | 
भयो वोध गयो मिंट भारत भरम को॥ 
भासे छेंह द्रव्यनके गुण परजाय सब, 
नाशे दुख लख्यो मुख पूरण परमको। 
करमको करतार मान्यो पुद्ल् पिंड, 
आप करतार सयो आतसम धरमको॥ १॥ 


दोहा |. 
जीव चेतना संजुगग, सदाकाल सव ठौर। 
ताते, चेतनभावको, कर्ता जीव न और ॥ २॥ 
गीतिका 
जे पूर्वकम्मेउद्यविषयरस, 
भोगमगन रुदा रहें । 


आगम विषयघ्तुख भोग बांछ॒हि, . 
ते न पंचमगति लहें ॥ 


वन्य... अनन्‍»%ंओ हओबपमनकाकाम७ «-२५वआकाकाम»-पा#४७०७+ कमान का व 


कस डी 





5 कान कलनिपिकमन+०पनल न्‍्ड न ह लि आलिया इ >> 


चनारसीविलास ६५ 








जिस हिये केवल वृत्त अंकुर, 
शुद्ध अनुभव दीप है। 
किरिया सकल तज होहि समरस, 
तिनहिं मोज्ञ समीप है ॥२॥ 


कीऊझ विचत्तण कह मो हिय। 
शुद्ध अनुभव सोहये 4 
मैं भावि नय परिमाण निर्मल, 
निराशी निरमोहयसे॥ 
समध्यान देवत्ल माहि केवल, 
देव परगट भासहीं !। 
. कर भ्रष्टयोग विभावपरिणति, 
अष्ट कर्म विरवाशहीं | ४॥ 


इति नाटक कलश भाषावुवाद 


के (न पतन ये तय ये शत रानिमया नी पल ती अल ममनअननसनसस< ७ &# ३८. जा 35 9०./५ 4% #कली अम्मा जीत प्री २०७४० कया ५: ९+० काम 9० ७०० 4० ##. 


अर १ कक डिनर मे जअजोग्ना की नी चर 
दादा +2 दस सदमे ८७] 
दिल जडीपीटप फएशिए शनि मिएए कट फटा: 
न 








[ श्ध्द. वनारसोविज्ञास 


"न्‍ 


अथ प्रास्ताविक फुटऋर कविता लिख्यते, 


मनहर | 

पूरव कि पश्चिम हो उत्तर कि दक्षिण हो, 

दिशि हो कि विद्शि कहृड वहां घोइये। 
पढ़िये पढ़ाइवे कि गढ़िये गढ्ाइवे कि... 2. 

नाचिये नचाइये कि गाँइये गवाइये ॥ 
न्हाये विन खाइये कि' न्हायकर खाइये कि, 

खाय कर. न्हाइये कि न्हाइये न खाइये। 
जोग कीजे भोग कीजे दान दीजे छीन लीजे, 

जिहि विधि जाने जाहु सो विधि वताइये॥१॥ 
' दिशि ओ विदिशि दोझ जगत की मरजाद, 

पढ़िये शवद्‌ गढ़िये सु जड़ साज है । 
नाचिये सुचित्त चपल्लाय गाइये सुधुनि, 

न्हाइये सुजन शुचि खाइये छुनाज है ॥ 
परको संजोग सुतो योग विषे खाद भोग, 

दीजे लीजे मायासो तो भरम को काज है| 





कक ही बे 


बनारसीविलास १६७ ] 


इनतें अतीत कोऊ चेतनको पुज तोमें, 

ताके रूप जानवेको जानबो इलाज़ है| २॥ 
लोभवन्त मानुष जो औगुण अनन्त तामें, 

जाके हिये दुष्टता सो. पापी परधीन है । 
जाके मुख सत्यवानी सोई तपको निधोनी, 

जाकी मनसा पवित्र सो तीरथथान है ॥ 
जामें सज्वनकी रीति ताकी सबदहीसों प्रीति, ' ' 

जांकी भली मदह्दिमा सो आभरणवान है । 
जामें है सुधिथा सिद्धि ताही के अहूटकद्धि, 

जाको अपजस सो तो मृतक समान है ॥ ३॥ 
कंचनसंडार पाय रंच न मगन हूजे, 

पाय नवयोबना न हूजे जोबनारसी। 
काल असिधारा जिन 'जगत बनाए सोई, 

कामिनी कनक मुद्रा दुहु को बनारंसी || 
दोऊ षिनाशी सदीव तृहे अवनाशी जीव, 

या जगत कूपबीच ये द्वी डोबनारसी । 
इनकी तू संगत्याग कूपसों त्रिकसि भाग, 

प्राणी मेरे कह्दे ज्ञाग, कहत 'घनारसी” ॥ ४॥ 

४० 6 । । ( पादान्तयमक ) 
जीयके बधेया बामविद्याके सवैया दावा- 
: नक्षके दपैया बन ओखेटक केरसी । 

जुआरी लबार परधन के हर॒नहार, " ' 


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[ (ध्ड बनारसीविज्ञास, 











री स्टीफ कि रिकरी प 


, चौरीकेकरनहार द्वारोीके अशरमी ॥ 
मांस के भखेया सुरापान के चखया, 
परवूके लखैया जिनके हिये न नरमी | 
रोषके गहँयी परदौषके कहैया येते, 
पापी. नर नीच निरदे महा अधरमी.॥ ५ ॥ 
मत्तगयन्द । 
सम्यक ज्ञान नहीं उर अन्तर, कीरतिकारण भेष बना।वें। 
भौन तजें वनवास यहें मुख, मौन रहें - तपसों तन जावें॥ 
जोग अज्ञोग कछू,न विचारत मूरख लोगन को . भरम्थे । 
फैल करे बहु जेन कथा कदि. जैन बिना नर जेन कदावे ॥ ६॥ 
धीरन तात जमा जनती:-परसारथ भीत. महारुचि मासी ! 
ज्ञान सुपुत्र सुता करुणा, सति .पुन्नवधू समता . अतिभासी ॥ 
उद्यम दास विवेक सहोदर, बुद्धि. कल्नत्र शुभीदय दासी | 
भाव कुट'ब सद्त जिनके-ढिग. यों मुनिको कहिये गृहवासी ॥ ७॥ 
मनदर । 
. मालुष जनम तह्यो सम्यक-दरश,गह्ो/ 
अजहेूँ पिंषे विज्ञास त्याग मन बावरे | 
संपति बिपति'आये:हरप विषाद छोड़, 
ताहो ओर पीठ ओढ़ >सी बह बाबरे ॥ 
भौधिति, लिकट आई समता घुथाह पाई - 
गयो-है:निघठि-जल * म्थ्याव डुबावरे । 


दृट्ैगो करम फाम्र-छूटेगो जगव,वास, 


(000:9-8०2ी-पएर:तप्करेगपी पर थक्रि:५०::पविप्रपरीद दि पदक विपिखिकितसदियाओे की पवन 9०३45 ० ०००० बह. ३42] «लता 








रची किस ना हक, 
'केवल उदे संपीप' आयो परेबाशधरे॥ ८॥ 
5 ( पादान्तयमक ) 
जामें सदा उतपांतः रोगनसों छीजे गाव, 
+कछू'न उपाय छिन लिन आयु 'खपनो । 
कीजे बहु पाप'ओःनरक' दुख चिन्ता व्याप, 
#आपदा कल्ञापः में" विज्ञाप - ताप तपनो | 
ज्ञामं परिगहको |वषाद-मिथ्या बकवाद, 
भिषेभोग 'सुखको सवाद जैसो सपनो । 
ऐसो है जगतवास- जेसो- ज्वपत्ञा- विलञास 
तामें. तू मंगन भयौ नया धर्म अपनो ॥ ६॥ 
मत्तगयंद | के 
पुण्य सँजोग जुरे! रथ” पायक,साते  मतंगत़तुरंग तबेत्ते । 
मान विभो झेंग यो>सिरभार/ कियो विस्तार-परिमह से-ले ॥ 
बंध बढ़ाय करी थितिःपूरण,स्अंतःचले उठ “आप अकेले । 
हारि हमालकी पोटसी 'ठीरिके/और:द्वारकी-ओट व्दे खेते ॥१०॥ 
& हे अपेय ; 
धान यान मिष्टान, मोस -मादक नवतिञ्ञ । 
लवण दिंगु भरत तैल, वनिजकारण नहिं लक ॥ 
पशुभाड़ा पशुर्वाणज. शस्र विक्रय न करिको । 
जहाँ निरन्तर अप्ति करम, सो वणिज.न कित्म ॥ 
मधु भीक् लाख विष वणिज तज, कप तत्ाव न.सोखिये | 
लहिये न धरम,ग्रृह वासबस, हिंसक.जीव-न पोखिये ॥ ११ ॥ 











च्र्ट्््ओिललफचतडल्फचलग:टचटरएज्ट[-चयलालालयानादबाादललिकाानकानपपानानफानननना०कनन- 


[ २०० बनारसीबिल्ञास 





+ मुकताको स्वामी चन्द मूगानाथ महीनन्द, 
गोमेदक राजा राहु क्षीज्ञार्पत शनी है । 
केतु लद्दसुनी सुरपुष्प राग देव गुरु 
पन्नाको अधिप बुध शुक्र हीरा घनी है ॥ 
याही क्रम कीजे घेर दक्षियावरत फेर, 
माणिक सुमेरवीच प्रभु दिन मनी है । 
आठों दुल आठ ओर, करणिका मध्य ठोर 
कोलफेसे रूप नौ गृही अनूप बनी है॥ १२॥ 
चात़्क दशाकी मरजाद द्श बरस लों, 
बीस ल्ञों बंदृति तीसल्ों सुछुषि रही है ॥ 
चालीस लों चतुराई पंचास ज्ों थूलताई, 
: साठ ल्ञग ल्ोचनकी दृष्टि लहलही है ॥ 
सत्तर लो श्रवण असी ज्ञों पुरुषत्व निन्‍या- 
नंवे लग इंद्रिनकी शकति उम्रही हे । 
' सोल्लों चित चेत एंक सौ दशोत्तरज्ञों आयु,. 
सातुष जनम ताकी पूरीथिति कही है ॥ १३॥ 
चौदृह विद्या ओके नाम यथा-- 
..* हछृप्पय। 
ब्रद्यज्ञान चातुरीवान, विद्या हय वाहन । 
परम धरम उपदेश, बाहुबल जल अवगाहन ॥ 
सिद्ध रसायन करन, साधि सतंमझुर गावन | 
वर सांगीत प्रसान, जृत्य वाजित्र वजाबान ॥ 





हिल ननफ 


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घनारसीविलास २०१ ] 


व्याकरण पाठ मुख वेद धुनि, ज्योतिष चक्र विचारचित। 
चैद्यक विधान परवीनदा, इति बिया दशचार मित॥ १४ ॥ 
छत्तीस पौन (जाति ) के नाम कवित्त, .- 
शोसगर दरजी त॑बोली रंगवात् ग्वाल, 
बढ॒ई संगतरास तेली घोबी धुनि्ण। 
फदोई कहार काछी कुल्ाल कक्षाल साली, 
कु दीगर कागदी किसान पटबुनियों ॥ 
चितेरा बिंघेरा वारी लखरा ठठेस राज, 
पटुषा छपपरबंध नाई भारभुनियों | 
छुनार लोहार सिक्षीगर हवाईगर, 
घीवर चमार एही छत्तीस पचुनियों॥ १५॥ 
एक सौ अड़ताल्ीस प्रकृति 
चरतु छन्द्‌. 
सत्ततुद्ृह्दि सत्ततुद्ृह्दि तुरीय गुण थान । 
तह तीन व्युच्छतिभई नवठाण छत्तीस जानहु | 
दशमें पुनि इक लोभ वारमें सोलह ख्िपानहु। 
बदत्तर तेरम नसे, तेरह चौदम एवि । 
एम पैड़ि अड्ताल सो, होय सिद्ध तोढेबि | १६॥ 
छुणय | 
एक जान है तोरि, तीन रम चार न भासहु | 
पंच जीत षटराख, सात तज आठ विनाशहु॥ 
, नव संभारि दश धारि, ग्य उमहिं बारह भावहु। 


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[ २०२ बनारसी वि्ञास 


तेरह तिर चौदहें चढ़त, पन्द्रह विलगावहु॥ 
सोलहन मेटि सत्रह' भजहु, अ्रद्टारह् कह करहु धय । 
सम गरि उनीस वीसहि विरोचि, बानारसि? ' आनंद मय ॥१७॥ 
तात्पय--दोहा । 
शुद्ध आतमा एक जिन, राग हंप हृय बंध | 
तीन शुद्ध ज्ञानादि गुण, चारों विकथा धंध ॥ १८॥ 
प्रबल पंच इन्द्री सुभट, पट विधि जीवनिकाय | 
जुआ आदि सांतों' व्यसन, अष्टकर्म' समुदाय ॥ १६ ॥ 
ब्रह्मचय्य की धाढ़ि'नव, दृश मुनिधर्मविंचार । 
न्यारद प्रतिमा श्रावकी; बारह भावन सार ।॥ २० ॥ 
तेरह थानक जीव के। चौदृह गुण ठानाई। 
पन्द्रह जोग शरीर के, सोलह भेद कहाइ ॥ २१ ॥ 
सन्नह विधि संयम सही, जीव समास उनीस | 
दोष अठारह जान सब, पृद्लके गुण बीस ॥ २२॥ 
इति प्रस्ताविक फुटकर कविता, 





अथ 'गोरखनाथ 'के वर्चन ' 
चौपाई | 
जो मग देख भामिनी माने। लि देख जो पुरुष प्रमाने॥ 
जो विन चिह् नपु सके जोवा । कह गोरख तीनों “घर खोबा ॥१॥ 
जो घर त्याग कद्दावे जोगी। घरवांसीको कहे ज्ु भोगी। 
अन्तरभाव न परखे जोई। गोरख बोले मूर्ख सोई।॥ २॥ 











बनरसोवित्ञास ' २७३ |] 





पढ़ प्रन्थहिं जो ज्ञान बल्लाने। पवन साध परमारथ माने। 
परम तत्त्व के होहिं न मरभो । कह गोरख सो महा अधर्मी ॥१| 
माया जोर कहे में ठाकर | साया गये कहाबे चाकर | 
माया श्याग होय जो दानी | कह गोरख तीनों अज्नानी॥ ४ ॥ 
कोमल पिंड कहावे चेल्ा । कठिन पिंडसों ठेल्ञा पेला | 
जूना पिंड कह्ावे बूहा । कह गोरख ए तीनों मूढा॥ ५॥ 
बिन परिचय जो वस्तु विचारे | ध्यान अप्ति बिनतन परजारे। 
ज्ञानमगन विन रहे अबोज्षा | कह गोरख सो बाला भोज्षा ॥ ६ || 
सुनरे बाचा चुनियों मुनियाँ। उत्नट बेघसों उल्टों दुनियां। 
सतगुरु कहै सहजका धंवा। वाद विवाद करे सो अंधा ॥ ७॥ 
इति गोरखनाथ के वचन. 


अथ वेय आदि के भेद, 


वेचलक्षण 
कमे रोगकी अकृती पावे । यथायोग्य श्रोषाध फरमावे। 
उदय साड़िकाकी गति जाने | सो सुबेय मेरे मत माने ॥ १॥ 
ज्योतिषीलत्षण 
नथरस रूप गिरद पहिचाने | वारह राशि भावना भाने॥ 
.. सहज संक्रमण साथे जोई । ध्योतिपराय ज्योतिषी सोई॥२॥ 
वेध्णव्क्षण दोहा । 
तित्ञक तोप मात्षा बिरति, मति मुद्र( श्रुति छाप । 
इस लक्षणसों वैषणव, समुझे हरि परताप ॥ ३॥ 


वकणकीजीीफ की जा जी. आडा सरपनररयिएरयकिपिकर पानीपत आशय यार फ.. “री पिन जी. पपयरारीयक नए पेममपता सर उरी पक चर. बरी का बहा चाट. टिरीयारी डरती कत मी करा ढत.. मप्र पहन, 
3 पम+> मकर. जा. 23). साधना थे 38. +दआआ34+७+५७ रा .९७- 3३५७७ ३७»७५०९बफाकथ++३५७ 3०३७4 >> कामना + के ९-३५. अमर >कपपेतनम-भनन्‍ी. -पीक+3 «०. )५4७०७७००००० 0 करजक >क+ चइ७+०#ाल्‍ नाक, 











[ २०४ बनारसीविलास 


'#0-ीगकन्‍री, 


जो हरि घट में हरि लखे, हरि थाना हरि बोइ। 

हरि छिन हरि सुमरन करे, विमल वेषणव सोइ ॥ ४॥ 

मुसलसानलक्षस- 
: जो मन मूसे आपनो, साहिब के रुख होय। 
ज्ञान मुसल्ला गह टिके, मुसलमान है सोय ॥ ५। 
गहब्वर क्षण 
' जो मन त्ञावे भरमसों, परम प्राप्ति कहें खोय। 
जहें विदेकको घर गयो, गवर कहावे सोय ॥$ . 
' एक रूप हिन्दू तुरुक' दूजी दशा न कोय। 

सनकी दिविधा सानकर, भये एक्सों दोय | ७ | 
दोऊँ भूले भरम में, कर वचनकी टेक | 

'राम राम! हिन्दू कहें, तुझे 'सल्ामात्रेक' ॥८॥ 
इनके पुस्तक बांचिये, वेहू पढ़े कितेब । 

एक वस्तु के नाम द्वय, जेसे शोभा! 'जेव” ॥ ६ ॥ 
तिनको द्विविधा-जे लखें, रंग विरंगी चाम | 

मेरे नेनन देखिये, घट घट अन्तर राम ॥ १०॥ 
यहै गुप्त यह है प्रगट, यह वाहिर यह माहि। 

जब ज्वग यह कहु हू रहा, तब लग यद्द कछु नाहि ॥११॥ 
ब्रह्मज्षान आकाश में, उढ़दि सुमति खग होय | 

यथाशक्ति उद्यम करहिं, पार न पावहिं कोय ॥ १२॥ 
गई वस्तु सोचे नहीं, आगम चिंता नाहि। 

वत्तेमांन बरतें सदा, सो ज्ञाता जगमाहिं।॥ १३ ॥ 


2../>५२३१५२०५/ न >/गक/नकमक भाग बी, 


य्त्श्श्श्श्श्श्श्श्््ल्े्लय्यंा्य्श्श्य्श्श्श्श्व्््स्स्््ि-- 





बनारसीविज्ञास २०४ |] 


जनम न नमन तन पान तक फल अन ५ कवच न+ ० फल न नल न तन न + कलम >ड सन न नील लिन तन न कन-+<. 
वियन्‍नकिवकीिक, अप ऋकम» का. सर... स्‍वयिकी सेहत कही. सशमपिकरीयदक. कक के केक... १6 वि कीचालत,...3 पेड फेक, पक धनीचता... पकरसन्‍मी २... रीपिओ सरकारी आती चरी। 





जो बिल्लसे सुख संपदा, गये ताहि' दुख होय | 

जो धरती बहु दणवती, जरे अग्निसों सोय॥ १४॥ 
धन पाये सन लहलहै, गये करे चित शोक | 

भोजन कर केहरि लेख, वररुचि केसो बोक॥ १४ ॥ 
माया छाया एक है, घटे बढे छिनमाहि। 

इनको संगति जे लगें, तिनदिं कही सुख नाहि ॥ १६ ॥ 
जे मायासों राचिके, मनमें राखहिं वोक। 

के तो तिनसों खर” भत्रो, के जंगलको रोम! ॥ '७॥ 
इस माया के कारणे, जेर कटाबहिं सीस | 

ते मूरत क्‍यों कर सकें, हरिभक्तनकी रीस॥१८॥ 
लोभ मूल सब पापको, दुखकी मूल सनेह । 

मूल अजीरण व्याधिको, मरणमूत्र यह देह॥ १६ ॥ 
जैसी मति तेसी दशा, तैसी गति तिद्द पाहि | 

पशु मूरत भूपर चल्नहिं, खय पंडित नभमाहि ॥ २० ॥ 
सम्यकददृष्टी कुक्रिया, करे न अपने वश्य । 

पूरव कर्म उदोत हे, रस दे जाहिं अवश्य ॥ २१॥ 
जो महंत हौ ज्ञानविन, फिरे फुल्ञाये गाल | 

आप मत्त और न करे, सो क़लिमाहि कल्ञाज्न ॥ २२ ॥| 
ज्यों पावक विन नहिं सरे, करे यद्पि पुर दाह | 

त्यों अपराधी मिनत्रकी, होय सबनको चाह ॥ २३॥ 
कत्तो जीव सदीव है, करे कर्म स्वयमेव | 

यह तन ऋत्रिम देहरा, तामें चेतन देव ॥ २४ ॥ 


87१ -+२१९३३०३०४/१९३-#१ ९ #िकत धन हपिक्मि.#तिय #ति>#म आन, 





( २०६ बनारसीबिल्लाम 


अननरनननन मनन गाना जद न्‍नओणर ऑफ आििजिीओओओटओलनओिलजीलआओणडओण 
कक मा यही १ >ही सर करी अत बारे बारी बानी जी । कक का यही यही पी यही हध सिरे पारी चित यही परी उहरीीयरी अप चटरी पडरी फटी री जी 


केवलज्ञानी कमको, नहिं कर्ता विन प्रेम । 

देह अक्ृन्निम देहरा, देव निरंजन एम ॥ २४॥ 
भूमि णत घन धान्य गृह, भांजन कुप्य अपार | 

शयनासन चौपद ट्विफ्ठ, परिगह दश परकार )। २६॥ 
खान पान परिधान। पट, निद्रा मूत्र पुरीस। 

ये घट कम सबहिं करे, राजा रंक सरीस॥ २७॥ 
उचित वसन सुरुचित असन, सल्विल पान सुख सेन | 

बढ़ी नीति लघुनीतिसों, होय सवनकों चेन ॥ रं८ 


चतुदंश नियम 


बिगै दरव तंबोज्ञ पट, शीज्ञ सचित्त स्नान | 
दिशि अद्दर पान रु पुहुप, सयन विलेपन यान ॥ २६॥ 
शील्ञवन्त मंडे न तन, अधि पद गहे न संत | 

पिताज्ञाव न हनें पिता, सती न भारह कंत॥ ३०॥ 
कामी तन संडन करे, दुए गहे अधिकार। 

जारजात सारहि पिता, असति हलें भरतार ॥३१॥ 
ज्ञानद्दीन करणी करे, यों निजमन आमोद | 

ज्यों छेरी निज खुरहितें, छुरी निकासे खोद ॥ ३२॥ 
राजरऋरद्ध सुल्ल भोगवें, ऐसे भूढ़ अजान। 

महा सन्निपाती करहि, जेसे शरवत पान ॥३३॥ 
जहेँ आपा तहें आपदा, जह संशय!तहेँ सोग। 

सतगुरु विन भांग नहीं, दोझ जालिभ रोग ॥ ३४॥ 
जे आशाके दास ते, पुरुष जगत के दास। 


करनी पारी कक बरी धजर पान की पारी पक ० थक ऋ जम 
चल अअनकन»«+->«न+ «५० गा उसफमक. नमक मनन 


सतभरीकाफा फच्टणकाआाछ, 








3:44. 454+ वि जनरल लटक जल ल 
आशा दासी जास की, जगत दास है तास ॥ ३५॥ 
संसारी उद्धार तज, धरे रोक पर प्यार । 
ज्ञानी रोक न भादरे, करे दुरब उद्धार ॥३६॥ 
कारण काज न जो लखे, भेद अमेद न जान। 
वर्तुुप सप्तुके नहीं, सो मूरल परघान -॥ ३७॥ 
देव घस गुरु प्रन्थ मत, रत्न जगतमें चार। 
सांचे त्ीजे पराखके,कठे दीजे ढार ॥ शे८॥ 
अ्रद्टारहदूषणरहित, देव सुगुरु निरमंथ । 
घसे-द्या पूरवअपर,--मतअविरोधि सुप्रन्थ,॥ ३६-॥ 
सुनिके वाणी जेनकी,-जेन धरे मन ठीक. 
जेनधरम बिन जीवकी, जै-ल होय तहदकीक | ४० ॥ 
उपजे उर सन्‍्तुष्ठता, दृग दुष्टता न होय | 
सिटे मोहमदपुष्टटा, सहज सुष्ठठा सोय ॥४१॥ 

-.... ईति पेचलक्णादि अस्ताविकू कविता .. _ 


बे 





और अनगफगटज>त>लआ न. 





अथ परमार्थवचनिका लिख्यते | 
एक जीवद्रन्य ताके अनत शुण अनन्त प्रस्योय.. एक 
एक गुणके असंख्यात प्रदेश, एक' एक अदेशनिबिपे अनन्त 
कमबगंणा, एक एक कर्मेवगेणाविषै अनन्त अनन्त पुद््न परमागु, 
एक एक पुद्कत् परमाणु अनन्त गुण अनंत पश्योयसहित 
विराजमान. यह एक संसारावस्थित जीव पिंडकी अवस्था 
याहीभांति अनन्त जीवद्रब्य सापिदहूप जानने, एक्रदीव द्रव्य 


'पाभचरान २ ०३७१०९५/०७४० ,३५ ८१९५/९..०९५/९/०९./०९/००९, १९.३९ ०१५. #व. ९, ३ 2१ बम:२०५/#मि५ > ५३७० &#...अए+/पतीयेरीपिकीपे,ली करीपेरीमिकरमिनारीपकात कम... सन कमान बमडिी्षीक लि मद की ता कीज ही, 
अललनननन«- पतन जाधमकने त्यनपपन-ान मनन नकल पकननमपप न टिका पलक धरमम«नभ २. उप उन सपनपाजमापपााका भा वधम+प पक करन पा उनऊत कक फनपा-न ८. बमल-+५+अनऊजन-+भपमाकभा डक पानानलनमाय- पथ» लक पक अभी. अपर >पाननकपननक न. 








[ श्०८ बनारसीविज्ञास 





अनंत अनंत पुद्गलद्ृव्यकरे संयोगित (संयुक्त ) मानने। 
तांको व्यौरो,-- 

अन्य अन्यहूप जीवद्रन्यटी परनति; अन्य अन्यरूप 
पुदरक्नद्॒व्यकी परनति ताको व्यौरौ-- 

एक जीवद्॒त्य जा भांतिकी अवस्थात्िये नानाकाररूप 
परिनमैं सो भांति अन्य जीवसों मिले नाहीं | वाकी और भांति | 
आहदीभांति अनंतानंद स्वरूप जीव द्रव्य अनन्तानंत स्वरूप 
अवस्थालिये वर्तोदिं। काहु जीबद्॒व्यके परिनाम काहु जीवद्रव्य 
ओरस्यौ मिल्ञ३ नाहीं। याही भांति एक पुद्ल्त परवानू एक 
समयमाहि जा भांतिकी अवस्था घर, सो अवस्था अन्य पुद्रल 
परवानू द्रव्यसों मिले लाहीं. तातै पृह्रल ( परमार ) द्वव्यकी भी 
अभ्य अन्यता जाननी | ह 

अथ जीचद्रव्य पुद्लद्॒व्य एक छेत्रावगाही अनादिकालके, 
तार्में विशेष इतनौ जु जीवद्रन्य एक, पृद्टलपरवानू द्रव्य अनतानंत 
चलाचलरूप आगमनगसनरूप अनंताकार परिनमनरूप बधमुक्तिशर्त 
लिये वत्तेहि | 

अथ जीवद्रब्यकी अनन्त अवश्था तामे तोन अवस्था मुख्य 
थापी | एक अशुद्ध अवस्था, एक शुद्धाशुद्धलप मिश्र अवस्था, एक 
शुद्ध अवस्था, ए तीन अवस्था संसारी जीवद्रव्यकी। संसारातीत 
सिद्ध अनवस्थितरूप कहिये। . - - -- 

: झब तीनहूं अवस्थाको विचार-एक अशुद्ध विश्वयात्मक 

द्रव्य, एक शुद्धनिश्चयात्मक द्रव्य, एक मिश्रनिश्वयात्मक द्वव्य | 








वनारसीबिलास २०६ ] 


कर फकी पर सम पक+ उकी सी बहा गप# था पा# सा पहह रत भा न्‍#" पम्प 





अशुद्धनिश्चय द्रव्यकों सहकारी अशुद्ध व्यवहार, मिभ्रद्वव्यकों 
सहकारी मिश्र व्यवहार, शुद्ध द्रत्यकौ सहकारी शुद्धयवहार | 
भ्रम निश्चय व्यवहार फो विवरण लिर्यते । 
निश्चय तो अभेदरूप द्वव्य, व्यवहार दृव्यके यथास्थित भाव । 
परन्तु विशेष इतनो जु यावत्कात् संसारावस्था तावत्काल व्यवहार 
कहिये सिद्ध व्यवह्दारातीत कहिये, यातें जु ससार व्यवहार एक 
रूप दिखायो. संसारी सो व्यवहारी, व्यवहारी सो संसारी। 
श्रव तीनहू अवस्था फो विवरण लिख्यतें। 
यावत्काल मिथ्यात्व अवस्था, तावत्काल अशुद्ध निग्चयात्मक 
दृब्य भ्रशुद्धव्यवहारी | सम्यग्दष्टी होत मात्र चतुर्थ गुशत्यानकस्यों 
दादशम गुणस्थानकपयन्त पिश्रनिश्चयात्मक द्रव्य मिश्रव्यत्रह्री | 
केबलन्नानी शुद्धनिश्चयात्मक शुद्धभ्यवहारी । 
श्रव मिश्रय तो दव्यकों खरूप, व्यवहार ससारावर्थित भाव, 
ताको विवरण कहै हैं--- 
पिध्याहष्टी जीव अपनौ स्वरूप नाहीं जानतौ तादे परस्वरूप- 
बिपै मगन होय करि कार्य मानतु है ता. काये करतो छतो अशुद्ध- 
व्यवहरी कहिए। सम्यर््टी अपनो स्वरूप परोक्ष प्रमानकरे 
अनुभवतु है। परसत्ता परस्वरूपसों अपनो कारये नाहीं मानतौ 
संतो. जोगद्वारकरि अपने स्वरूपको ध्यान विचाररूप क्रिया करतु 
है, ता कार्य करतो मिश्र ब्यवद्वारी कहिए,' केवलज्ञानों यथारुयात- 
चारित्रके बलकरि शुद्धात्मस्वरुपको स्मनशील् है ताते शुद्धव्यवह्वारी « 
कद्दिए, जोगारूड अवस्था विद्यमान है तातें व्यवह्गरी नाम कहिए | 


िमशीमदीयीआ जीना दावा 8.2 3. चई 
११७० क॒७५४७५ 8५-५०» ॥०७+ काका, 





[ २१० बनारसीबिल्ञास 


शुद्धव्यवह्रकी सरहद त्रयोदशम गुनस्थाकसो लेइकरि चतु्देशम 
गुनस्थानकपयत जाननी । असिद्धत्वपरिणसनत्वात्‌ व्यवहार: | 
श्रथ तीनहू' व्यवहारको स्वरूप कहे हैं -- 

, अशुद्ध व्यवहार शुभाशुभाचारहूप, शुद्धाशुद्धव्यवह्वार शुभोप- 
योगमिश्रित स्वरूपाचरनरूप, शुद्धव्यवहार शुद्धप्वरूपाचरनरूप । 
परन्तु विशेष इनको इतनौ जु कोझ कहे कि-शुद्धस्वरूपाचरणात्म 
तौ सिद्धहृविष छतौ है. उद्ं भो व्यवहार संज्ञा कहिए--सो यौं 
नाहीं-जातें संसारी अवस्थापयेन्त व्यवह्यर कहिए। संसारावत्था 
के मिटत व्यवहार भी मिटी कहिए । इहां यह थापना कीलनी है 
ताते सिद्धव्यवुद्दारातीत ! कहिए । इति व्यवह्रविचोर समाप्त: | 

अथ श्रागमश्रध्यातमको स्वरूप कष्यते | 
आगम-वस्तुकी जु स्वभाव सो आगम कहिए। आत्माको जु 
आधकार सो अध्यातम कहिए। आगम तथा अध्यात्म स्वरूप 
भाव आल्द्रव्यके जानने |ते दोझभाव संसार अवस्थाविषे 
त्रिकालवबर्ती मानने । ताको व्यौगौ--आगमरूप कर्मपद्धति, अध्या- 
त्मरूप शुद्ध॑चेतनापद्धति | ताकौ व्यौरो कर्मेपद्धति पौह्लीकद्रव्यरूप 
अथवा भावरूप, द्वव्यहूप पृटलपरिणाम भावरूप पुद्ुल्ाकारआंत्मा 
की अशुद्धपरिणतिरूप पारिणाम-ते दोऊपरिणाम आगमरूप थापे | 
अब शुद्धचेतनापद्धति शुद्धात्मपरिणाम सो भो द्रव्यहूप अववा 
भावरूप । द्रव्यरूप तौ जीवत्वपरिणास-भावरूप ज्ञानद््शेन सुल- 
“वी आदि अनन्तगुणपरिंणाम, ते दोडऊ परिणाम अध्यात्महूप 
जानने | आगम अध्यात्म दुहु पद्धतिविषे अनन्तता मानती | 








2 नल नन लक जलन नल टली गिल 


बनारसीबिलास २११ | 


भनन्तता कहा ताको विचार-- 


अनंतताको स्वरूप. दृशन्तकरि दिखाइयतु है. जेसे-- 
वववृत्तको बीज एक हाथविषे ज्षीजे. ताको विचार दीधे दृष्टिसों 
कीजे तो वा बटके बीजविंबे एक बटको वृक्ष है. सो वृत्त जेत्तो कछु 
भाषिकाल होनहार है तैसो विस्तारतिये विद्यमान वामे वास्तव॒रूप 
छतो है. अनेक शाला प्रशाख्रा पत्र पुष्पफलसंयुक्त है फत्र 
फञ्ञविष अनेक बीज हों।ह। या भांतिकी अवस्था एक बटके 
वीजविष विचारिए | भी और सूच्मदृष्टि दीजे तो जे जे वा बट 
वृक्षविष बीज हैं ते ते अंवगर्मित बटवृक्ष॒संयुक्त होंहि | याहो भांति 
एकवटविष अनेक अनेक बीज, एक एक बीज विष एक एक बढ, 
ताको विचार कीजे तो भाविनयप्रवानकरि न वटबृत्षनिकी मर्यादा 
पाइए न बीजनिकी मयोदा पाइए । याहो भांति अनंतताकों ख्वरूप 
जाननो । ता अनंतताके रबरूपको फेवलज्ञानी पुरुष भी अनन्तही 
देखे जाणे कहै-अनन्तको ओर अंत है ही नाहीं जो ज्लानविषे 
भाषे । तातें अनन्तता अनन्तद्वीरूप प्रतिभासे, या भांति आगम 
अध्यातमकी अनन्तता जाननी. तामें विशेष इतनौ ज्ु अध्यातमकौ 
स्वरूप अनन्त आगमको स्वरूप अनन्तानंतरूप, यथापना प्रवान- 
करि अध्यात्म एक द्वव्यात्रित | आगम अनन्तानन्त पुह्लद्॒व्याशित। 
इन दुहु'को स्वरूप सवेधा प्रवार तौ केवक्गोचर, अशम्मात्र मति 
श्रतज्ञानमराह्य ता्तें सबंथाप्रकार आगमी अध्यात्मी तो केवली, 
अँशमात्र मतिश्रतज्ञानी, ज्ञातादेशमात्र अवधिज्ञानी मनःपर्यय 
ज्ञानी, ए तीनों यथावस्थिव ज्ञानप्रमाण न्यूनाधिकरुप जानने । 








बन 


[ ११२ बनारसी ग्लाम 





म्रिथ्याइष्टी जीव न आगमी न अध्यात्मी है। कहददेतें यातें जु कथन 
मात्र तौ प्रंथयाठके वलकरि आगम अध्यातमकों स्वरूप उपदेश- 
मात्र कहै परन्तु आगम अध्यातमकों स्वरूप सम्यकू प्रकार जानें 
नहीं | ताते मूह जीव न आगमी न अध्यात्मी, निर्वेदकत्वात्‌ 
अब मद तयाज्ञानी जीवको विशेषपणों शोर भी छुनो,-- 

ज्ञाता तो गेक्षमागें साधि जानें, मूढ़ मोज्षमा्गं न साथि 
जाने काहे-याते सुनो--मूड जीव आगमपद्धांतकों व्यवहार कहै 
अध्यात्मपद्धतिको निश्वय कहे त्तें आगम अग एकान्तपनी साधिके 
मोक्षमाग दिखाने अध्यात्म अंगकों व्यवहारे न जाने यह 
मूहह्ट्टीको स्वभाव, वाहि याही भांति सूमे काद्देतें ?- यपैं--जू 
आगम अंग बाह्मक्रियारुप प्रत्यक्ष प्रमा॥ है ताको स्वरूप साधिवो 
सुगम । ता बाह्मकिया करता सतोौ आपकू' मूह जीव मोक्षको 
अधिकारी माने, अन्तरगर्मित को अध्यात्मरूप क्रिया सौं अंतर- 
दृष्टि ग्राह्म है सो क्रिया मूइजीव न जाने । अन्तरहरष्टि के अभाषसों 
अन्तर क्रिया दृष्टिगोचर आवे नाहीं, तातें मिथ्याइष्टी जीव मो 
माग साधथिवेको असमथे । 

_ श्रथ सम्पकह्टीकी विचार इनौ-- 

सम्यग्द्ट्टी कहा सो सुनो--संशय विमोद्द विश्वम ए तीन भाष 
जाम नाहीं सो सस्यग्इष्टी । संशय विमोह विश्रम कह्दा ताको स्वढ्प 
दृश्टन्वकरि दिखायतु है सो सुनो-जेसें च्यार,परुष काहु एर्स्थानक 
विषे ठाढे। तिन्‍्ह चारिहू के आगे एक सीपको खड किनही और पुरुने 
शआनि दिखायो । प्रत्येक अत्येक्रतें प्रश्न दीनी कि यह बहा है सीए 


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बनरसोविज्ञास २१३ ] 


है के रूपी है. प्रथमही एक पुरुष संशेवालो बोल्यो-ऋछु सुध 
नाहीन परत, किधो सीप है किधौ रूपो है मोरी दिश्टिविषे याको 
निरधार दोत नाहिने | भी दूजो पुरुष विमोहबालों बोल्यो कि-कछू 
मोहि यह सुधि नाहीं कि तुम सीप कौनसों कहतु है हूपी कोनसों 
कहतु है मेरी दृष्टिषप कछु आवतु नाहीं तातैं हम नांदिन जानत 
कि तू कक्ष कहदतु है अथवा चुप हे रहे बोले नादी गहलहूपसौ। 
भी तीसरो पुरुष विश्रमवालो बोल्यो कि-यह तौ प्रत्यक्षप्रमानरू पो 
है याकों सीप कौन कहे मेरी दृष्टिवंष तो रूपो सूमतु है ताते 
सर्वेथाप्रकार यह रूपो है सो तीनों पुरुष तौ वा सीपको स्वरूप जान्यो 
' नाहीं। ताते तीनों मिथ्यावादी | अब चोथौ पुरुष बोल्यो कि यह 
तौ प्रत्यक्ष प्रभान सीपको खंड है यामें कद्दा धोलो, सीप सीप सीप, 
निरधार सीप, याको जु कोई और वस्तु कहै सो प्रत्यक्प्रमान आमक 
अथवा अंध. तैसें सम्यग्ट्शेको स्वपरस्वरूपविंप न संसे न विमोह 
न बिश्नम यथाथेरष्टि है तातें सम्यग्दष्टी जीव अन्तस्टृष्टि कर 
मोज्ञपद्धति साधि जाने । बाह्यमाव बाह्यनिमित्तरूप माने, सो निमित्त 
नानारूप, एक रूप नाहीं. अन्तरदष्टिके प्रमात मोक्तमाग साथे सस्य- 
खान स्वरूपाचरनकी कमिका जागे मोक्षमांग सांचौ। मोक्षमागंको 
साधिवोय है व्यवहार,शुद्द्वव्य अक्रियारूप सो निश्च । ऐ से निश्य 
व्यवहारकौ स्वरूप सम्यग्दष्टी जाने मूहजीव न जानेन माने । मूड 
जीव बंधपद्धतिका साधिकरि मोक्ष कहै,'सो बात ज्ञाता माने नांदीं। 
कह्दिते यातें जु बंधके साधते बंध संधै। मोक्ष सथे नाहीं। ज्ञाता 
जब कदाचित्‌ः घंधपद्धत विचारे तव जाने.कि या - पद्धतिसों मेरे 
द्रष्य अरादिको बन्धरूप चल्यो आयो है-अब या पद्ध॑तिंसों मोह 


इक... 


[ २१४ बनारसीबविज्ञास 


आगे #१९३/१०७३१०४गा, 44९०३. #०९.॥म ५ ५३०३ 4 9५ 6०0 #१५ ५2०० (५७... ५9५ 720... ०७ 48० /#य५ 4१२५ #ो५ 46०० 67% (7०० :#7९५ #०५ (#7५ ९५ 4 ४० # के ८8०, 


तौरि वहै तो या पद्धतिकों राग पू्षकी त्यों हे नर काहे करो ९ | 
छिन मात्र भी बन्धपद्धतिविषे मगन होय नाहीं सो ज्ञाता अपनो 
स्वरूप विचारे अनुभवे ध्यावे गावे श्रवन करे नवधासक्ति तप क्रिया 
झपने शुद्धल्वरूपके सन्मुख होइकरि करे। यह ज्ञाताको आचार, 
याहींको नाम सिश्रव्यवहार ॥ 


श्रव हेयज्षेयउपादेयरूप ल्लाताकी चाल ताको विचारलिरुयते-- 


हेय-त्यागरूप तो अपने द्वव्यकी अशुद्धता, शषेय-विचाररूष 
अन्यपटदवव्यको रवरूप, उपादिय--आचरन रूप अपने द्रव्यकी 
अशुद्ध ता; ताको व्यौरौ--गुणस्थानक प्रमान हेयज्ञेयठपादेयरूप 
शक्ति ज्ञावाकी होइ। ज्यों ज्यों ज्ञाताकी देय क्लेयडपादेयरुप 
शक्ति बद्ध मान द्दोय त्यों त्यों गुनर्थानककी बढ़वारी कही है. 
गुनस्थानकप्रवान ज्ञान गुणस्थानक प्रमान क्रिया। तामें विशेष 
इतनौ जु एक गुणर्थानकवर्ती अनेक जीव द्वोंदि ती अनेक रूपको 
ज्ञान कहिए, अनेक रूपकी क्रिया कहिए। भिन्न भिन्नसत्ताके 
प्रवानकरि एकता मिले नाहीं। एक एक जीव द्रव्यविषे अन्य 
अन्य रूप उददीक भाव होंहि तिन उदीकभावानुसारी ज्ञानकी अन्य 
अन्यता जाननी | परंतु विशेष इतनौ जु कोऊ जातिको ज्ञान ऐसो 
न होइ जु परसत्तावलंबनशीली होइकरि मोक्षमागं सात्ञातू कह 
काहतें अवस्थाप्रवान परसत्तावलंबक है | ज्ञानकों परसत्तावलंबी 
परमार्थताी न कहै। जो ज्ञान द्योय सो स्वसत्तावलंबनशीली 
होइ ताको नाउ ज्ञान । वा ज्ञानकी सहकारभूत निमित्तरूप नाना 
प्रकोर फे उदीकभाव होंहि। तिन्ह उदीकभावनको ज्ञाता तमासगीर | 











ज्न्ग्ग्ग' 


अनाससीबिञास 8] 


न कत्तो न भोक्ता न अवलंबी ताते कोऊ यों कहै कि या भांतिके 
उदीकभाव होंहि सबेधा तौ फलानो गुनस्थानक कहिये सो भूठो | 
तिनि द्रव्यको स्वहप सर्वथा प्रकार जान्यो नाहीं | काहेतै--यातै 
जु और गुनत्थानकतिकी कौन बात चल्नावे केवल्षीके भी उदीक- 
भावनिकी नानात्वता जाननी । केवलीके भी उद्दीकभाव एकसे होय 
नाहीं। काहू केवलीकों दंड कपाटरूप क्रिया उदे होय काहू केवली 
कौ नाहीं। तो फेवलीविषे भी उदेकी नानात्वता है तो और 
गुनर्थानककी कौन बात चलाबे। तातें उदीक भावनिके भरोसे 
ज्ञान नाहीं ज्ञान स्वशक्तिप्रवान हे। स्वपरप्रकाशक ज्ञानकी शक्ति 
ज्ञायक प्रमान ज्ञान स्वरूपाचरनहूप चारित्र यथा अनुभव भ्रमान 
यह ज्ञाताको सामथ्यपनौ | इन बातनको व्यौरो कह्ातांई लिखिये 
कहांतांई कहिए। बचनातीत इन्द्रियातीत ज्ञानातीत, तातें यह 
विचार बहुत कहा लिखहिं। जो ज्ञाता होश्गो सो थोरी ही लिख्यो 
बहुतकरि समुमैगो जो अज्ञानी होयगो सो यह- चिट्ठी सुनेगो 
सही परन्तु समुझेगा नहीं यह--वचनिका यथाका यथा,हुमति- 
प्रवान के वक्षिवचनानुसारी है | जो याहितुणैगो समुकैगो सरदहेगो 
ताहि कल्याणकारी है भाग्यप्रमाण | 
इति परमार्यवचनिका , 


अथ उपादान निमित्तकी चिट्ठी लिख्यते-- 
प्रथम हि कोई पूछत है कि निमित्त कह्दा उपादान कहा 
तांकौ व्यौसै--निमित्त तौ सयोगहूप कारण, ,उपादान वस्तुकीं 


विररपरपरपरीयरी यानी मिपिल्‍पिक 














२१६ |] घनारसी धिलास 


सहज शक्ति | वाक्ो व्यौरो - एक  द्रव्याथिक निमित्त उपादान, एक 
पयौयारथिक निममित्ततपादान, ताको व्यौरो-दृव्याथिक निमित्त उपा- 
दान गुनभेदकल्पना | पर्योयाथिक निमित्त उपादान परजोगकल्पर्ना: 
ताकी चौमंगी. प्रथम ही गुनभेद कल्पनाकी चौमंगीको वित्तार 
कहीं सो केसै,-ऐसे-सुनौ-जोचद्रज्य ताके अनन्त गुन, सब, 
गुन असहाय स्वाधीन सदाकाल | ताभे दोय गुण प्रधान मुख्य 
थापे, तापर चौमंगोको विचार एक तो जीवको ज्ञानगुन दूसरो 
जीवको चारित्रशुन । 


ए दोनौ गुण शुद्धहप भाव जानने | अशुद्धल॒प भी जानने यथा- 
योग्य स्थानक मानने ताको ब्यौरो--इन दुहेकी गति शर्त न्‍्यारी २ 
स्यारी न्‍्यारी, जाति न्यारी न्यारी, सत्ता न्यारी न्‍्यारी ताकौ व्यौरों,- 
ज्ञानगुणकी तौ ज्ञान अज्ञानहूप गति, स्वपरप्रकाशक शक्ति, ज्ञान- 
रूप तथा मिथ्यात्वरूप जाति, द्रव्यप्रसाण सत्ता, परंतु एक विशेष 
इतनो जु'ज्ञानरूप जातिकों नाश नाहीं, मिथ्यात्वरूप जातिको नाश, 
सम्यग्द्शन उत्पत्ति प्येत, यह तौ ज्ञान गुगकोी निणेय भयो | अब 
चारित्र गुण॒को व्योरी कहे हैं।-संकलेस विशुद्धलप गति; थिरता 
अथिरता शक्ति, मंदी तीब्ररूप जाति; द्रव्यप्रमाण सत्ता'। परंतु एक 
विशेष जु मंद्ताकी स्थिति चतुदेशम गुणस्थानकपयन्त | तीघ्रताकी 
स्थिति प॑चमगुणस्थानक पर्यन्त | यह तौ दुहुकी गुण भेद न्यारां 
न्यारो कियों | अब इनकी व्यवस्था ज्ञान चारित्र के आ्रर्ध:न न 
चारित्र ज्ञानके आधीन | दोऊ असहाय रूप यह तौ मर्यादा 
बध। . , । ; 


मर धन धाम न #एमग.#१२ ##० 2०. साए॥०. 4७; #" ल्‍ीगनहनप्रिकरि ८7०) गे #०३//०९/०६ ८. 











बनारसी विलांस २९७ | 


१ समीच " 





कया "९०/० ५ चाट पक चह 





श्रथ चोभगीको विचार--शानगुन निभित्त 
चाजिगुय उपादान रुप ताक़ो ब्योरौ-- 


एक तो अशुद्ध निरमित्त अशुद्ध उपादान दूसरों अशुद्ध निमित्त 
शुद्ध उपादान । तीसरो शुद्ध निमित्त अशुद्ध उपादान, चौथो शुद्ध 
निमित्त शुद्ध उपादान, ताको व्यौरो- सुच्मर्दष्टि देइकार एक 
समयकी अवस्था द्रव्यकी ख्ेनी समुच्चयहूप मिथ्यात्वक्री वात नाहीं 
चल्लावनी । काहू समे जीवकी अवस्था या भांति होतु है जु जानहप 
ज्ञान विशुद्ध चारित्र, काहू समे अजानरूप ज्ञान विशुद्ध चारित्र, 
काहूसमै जानहूप ज्ञान संकज्षेस रूप चारित्र, काहू समे अजानरूप 
ज्ञान संकल्षेस चारित्र, जा समे अजानरूप गति ज्ञानकी, सकतेस- 
रूप गति चारित्रकी तासमैं निमित्त उपादान दोक अशुद्ध | काहू- 
समें अजानरूप ज्ञान विशुद्ध रूप चारित्र तासमें अशुद्ध निमित्त 
शुद्ध उपादान । काहू समैं जानरूप ज्ञान संकत्तेसहुप चारित्र तासमें 
शुद्ध निमित्त अशुद्ध उपादान । काहूं. समें जानरूप ज्ञान विशुद्ध 
रूप चारित्र तासमैं शुद्ध निमित्त शुद्ध उपादान, या भांति अन्य २ 
दशा जीवकी सदाकाल अनादिरूप, ताको व्यौते--जान रूप 
म्नानकी शुद्धता कहिए विशुद्धहप चारित्र की शुद्धता कहिए । अज्ञान 
रूप ज्ञानकी अशुद्धता कहिए संक्केश रूप चारित्रकी अशुद्धता कहिये 
झब ताकौ विचार सुनो-मिथ्यात्व अवस्था विषे काहू समें जीवको 
ल्ञान गुण जाण रुप है तब कहा जानतु है! ऐसो जानतु है-- 
कि लक्ष्मी पुत्र कलत्र इत्यादिक मौसों न्यारे हैं प्रत्यक्ष प्रमाण । 
हों मरूंगो ए इहां ही रहेंगे सो जानतु है। अथवा ए जादिंगे, 
र्श््श्ख्च्श्य््य्य्य्ख्ख्श्श्श्श्श्लश्ख््््््--+ 


५... भा सवा 4 ३2७३३ 2प३थ4५ा प-मपुआााााा 





११५८ ] धनारसीधितास 


हों रहगो, कोई कोल इन्हस्यों सोहि एक दिन विजोग है ऐसो 
जानपनों मिथ्याहट्टीको होतु है सो तों शुद्धता कहिए. परन्तु 
सम्यक् शुद्धता नाहीं गर्मितशुद्धता ज्व बस्तुकौ स्वरूप ज्ञाने तव 
सम्यक्‌ शुद्धता सो भंथिसेर बिना होई नाहीं परतुं गर्भित शुद्धता 
सौ भी अकाम निजेरा है वाही जीवको काहू समें ज्ञान गुण अजान 
रूप है गहलहप, ताकरि केवल बंध हे. याही भांति मिथ्यात्व 
अवस्था विष काहू समे चारित्र गुण विशुद्वहूप है तातें चारित्रा- 
वर्ण कम मंद है | ता मंद्ताकरि निजेरा है । काहसमै चारित्रमुण 
संकलेशरूप है तातें केवल तीत्रब॑ंध हैं। था भाँति करि सिथ्या 
अवस्थाविषे जासमे जानरूप ज्ञान है जौर विशुतारूप चारित्र है 
ता समे निजेरा है। जा समें अजानरूप ज्ञार्न' है संकलेस रुप चारित्र 
है दासमें बंध है तामें विशेष इतनौ जु अल्प निजेरा बहु बंध, तातें 
मिध्यात अवस्थाविषेकेवल बन्ध कहो । अल्पकी अपेज्ञा जैसें-काहू 
पुरुषकों नफो थोड़ो टोटो बहुत सो ' पुरुष टोढाउ ही कंहिए। 
परंतु बंध निजेरा विना जीव काहू अवस्थाविषे नाहीं। द्टान्त 
ऐसो--जु विशुद्धताकरि निजेस न होती तौ एकेन्द्री जोब निगोद 
अवस्थास्यों व्यवह्वरराशि कौनके वत्त आवतो ९ उह तो ज्ञान 
गुन अजानरूप गहत्तरुप है अबुदरूप है ताते ज्ञानगुनको तो 
बल नाहों | विशुछूप चारित्र के बलकूरि जीव व्यवहार राशि 
चढतु है. जीवद्रव्यविषे कषाइकी संदत्ता होतु है ताकरि निजेरा 
होतु है. । वाही मंदता प्रमान शुद्धता जाननी। अब और भी 
विस्तार सुनो-- 


९०#अ#यि.अप्पिकासिि। >> (०० अमिलिई ० हहपक पक #हिए २०» 4० /७००: 49९ #्नेनराधी जरिया 4४१०५ ७न.#१३#० ५३०७ #+०. 








७ रजरेकरयिन्पिक कर सकी करी पाती. 


0:44 /0»4% लि लिन टन लक. 


जानपनो ज्ञानको अरु विशुद्धता चारित्रकी दोक मौक्षमागों- 
सुसारी है ताते दोऊबिये विशुद्धता माननी | परन्तु विशेष इतनौ जु 
गर्ित शुद्धता प्रकट शुद्धता नाहीं । इन दुह' गुणकी गम्मित शुद्धता 
.जबतांई ग्र थिभेद होय नाहीं तबताई मोक्षमाग नसपे | प्ररन्तु ऊरप- 
ताको करहि अवश्य करि ही। ए दोऊ गुणकी गर्भित शुद्धता जब 
प्रंथिसेद होह तब इन दुहकी शिक्षा फूटे तब दोऊ' ग़ुन धारा- 
प्रवाहरुप मोक्षमागकों शरल्नहिं ज्ञानगुनकी शुद्धताकरि ज्ञान गुण 
निमेत्ञ होहि ! चारित्र गुणकी शुद्धता करि चारित्र गुन -निर्मल 
होइ। वह केवल जञानको अंकृूर, वह जथाख्यातचारित्रकों अंकूर | 


इहां को उटंकना करतु हे,- कि तुम कह्ो जु ज्ञानको 
जाणपनौ अरु चारित्रकी विशुद्धता हुहुंसयों निजेरा है छु ज्ञानके 
जाणपनौ सो निजेरा यह हम मानी। चररित्रकी पिशुद्धवासों 
निबेश केसे ? यह हम नाहीं समुझी-ताको समाधानः-- 


सुनि भैया ! विशुद्धता थिरतारूप परिणामर्सों कहिये सो थिरता 
जथाख्यातको भंश है वापै विशुद्धता में शुद्धत आईं।॥ भी वह 
उटंकनावारो धोल्यौ--तुम पिशुद्धतासों निजेरा कही, हम कहतु 
है कि विशुद्धतासों निजेरा नाही शुभबन्ध है-ताकी सामाधान,-- 
कि सुन मैया यह तौ तू सांचो विशुद्धतासों शुभवन्ध, संक्केशतासों 
अशुभवन्ध, यह तो हम भी भानी परन्तु और भेद यामें है सो 
सुनि--अशुभपद्धति. अधोगतिको परणमन है शुभपद्धति 
उद्धं गतिकौ परनमन है तातें अधोरूपसंसार उद्ध रूप मोक्स्थान 
पकरि, शुद्धता बामें आई मानि मानि, यामें घोलो नहीं है विशु- 





िन्कीनक नकल न क नली कसी कस पी के. के से कमी बीिपविआ/कि+धीकमिजकि पी .न्‍ी००७8-+4-:40-ल्‍4-“-:ल्‍:4- 36:46 अं ज#दथी+॥:##क#प/#0# 0 #0#+4:#+# ४ गहैनईएलस्‍आ 








[ २२० बनारसीबितास 











ता सदा काल सोक्षुको मांगे है परन्तु प्न्थभेद बिना शुद्धताको 
जोर चल्नत नाहीपे ! जैसे कोऊ पुरुष नदीमैं डुवक मारे फिर 
जब उछल तब दैवजोगशों ऊपर ता पुरुषक नौका आय जाय तो 
यद्यपि तारू पुरुष है तथापि कौन भांति निकले १ वाको जोर चले-£ 
नाहिं, वहुतेरा कलवल करे पे कछु बसाइ नांही, तेसें विशुद्धताकी 
भी ऊठ़ ता जाननी | ता चास्ते गसित शुद्धता कद्दी। वह गभित 
शुद्धता मेंथिसेद भये मोक्षमागंकी चली। अपने स्वभाव करि 
बद्धमानरूप सई तब पूर्ण जथास्यात प्रगट कहायो । विशुद्धताकी 
जु ऊद्ध ता वह बाकी शुद्धता | 

ओर सुनि जहां मोक्षमार्ग साध्यौ तहां कह्मौ कि “सम्यग्दशन 
ज्ञानचारित्राणि मोक्षमागें:” और यौं भो कह्यो कि “श्ञानक्रिया- 
भ्याँ मोक्ष” ताको विचार-चतुर्थ गुणर्थानकर्यु' लेकरि चतुदंशम 
गुणरथानकपयेन्त मोज्ञमा्ग कहो ताको व्यौरो, सम्यक्रूप ज्ञान- 
धारा विशुद्धरूप चारिजधारा दोऊघारा मोक्षमागको चली छु ज्ञानसो 
ज्ञानकी शुद्धता क्रियासों क्रियाक्ी शुद्धता । जो विशुद्धनामे शुद्धता 
है तो जथाख्यात रूप होत है। जो विशुद्धतामें ता न होती वो 
ज्ञान गुन शुद्ध दोतो क्रिया अशुद्ध रहती केवलो विषै, सो यो तो 
नहीं थार्में शुद्धता इती वाकरि विशुद्धता भई | इद्ां कोई कहैगो 
कि ज्ञानकी शुद्धताकरि क्रिया शुद्ध भई सो यों नाहीं। कोऊ गुन 
काहू गुनके सारै नहीं सब असद्दाय रूप है। और मी सुति जो 
क्रियापद्धति सवंधा अशुद्ध होती वो श्रशुद्धताकी एती' शक्ति 'नाहीं 
जु भोज्मार्गको चले तातें विशुद्धंतामे जथास्येतंको अंश है तंते 





बनरसोविल्ञास २२१ | 


न्‍९>>कम ० कननकन- ०५3७ ५७०६७ >क+ ७५ ५+-+4-++५+43 4४4७-७३ ०-क ३७५५8 काना मन->न५+3+ ++43»५33७-+५4+++ आ#«०-व७ +मन-ानन 
कारक पक चके चधा 2० रयतनउक कम पिकाऑभकातयक फिलशार गत सिक ऋ चाह कर बेड कक पटक काका कॉगडाों.. स्‍धिकीक फॉका पा. गे की पक ऋििकरिकीपहीकापिक पिकी करी परी चाही पक 


वह अंश क्रम क्रम पूरण भयौ। ए भइया उटकनावारे-ते 
विशुद्धतामै शुद्धता मानी कि नाहीं. जो तौ तें मानी तौ कछु और 
फहिचेकौ कार्य नाहीं । जो तें नाहों मानी व तेरौ द्रव्य याही भांति 
कौ परनयो है हम कहा करि हैं जो मानी तौ स्थावासि | यह तौ 
द्व्यायिककी चौमंगो पूए्न भई । 





निमित्त उपादान शुद्द अशुद्धत्प विचार-- 


अब पयोयागिककी चौभंगी सुनो एश% तो वक्ता अ्ज्ञानी, 

भेता भी श्रत्नानी सो तौ निमित्त भी अशुद्ध उपादान भी अशुद्ध | 

दूसरो वक्ता अबानी श्रोवा ज्ञानी सो निमित्त अशुद्ध और उपादान 

शुद्ध। तीसरो वक्ता धानो श्रोत्रा थज्ञानी सो निमित्त शुद्ध 

उपाद।न अशह् । चौथी वक्ता ज्ञानो भोता भो जानी सो तो निमित्त 

भी शुद्र उपादान भी शुद्ध | यह पर्यायाथिककी चौभंगो साधी। 
इहृति निम्ितत उपादान शुद्धाशुद्धरूपविवार वचनिका 





अथ निमित्त उपादान के दोहे लिख्यत । 


दोहा । 
गुरुपपदेश निमित्त विन, उपादान बलहीन | 
ज्यों नर दूजे पांव विन, चलवेकी आधीन॥ १॥ 
ही जाने था एक ही, उपादानसों काज | 
थके सहाई पौन विन, पानीमाहि जद्ाज | २॥ 


[*१५२ बनारसीविल्ास 


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दोनो दोहों का उत्तर, 

ज्ञान नेन किरिया चरन, दोझ शिवसगधार | 

उपादान निहचे जहाँ, तहँ निमित्त व्योहार ॥ ३॥ 
उपादान निज गुण जहाँ, तह निमित्त पर होय | 

भेद ज्ञान परवान विधि, विरक्षा बूमे कोय ॥ ४ ॥ 
उपादान बल जहेँ तहाँ, नहिं निमित्तकों दाव । 

एक चक्रसौं रथ चले, रचिकों यहै स्वभाव | ४॥ 
सधे पस्तु असह्याय-जहेँ, तह निमित्त है कौन।.... 

ज्यों जहाज परवाह में, तिरे सहज विन पौन || ६ ॥ 
उपादान विवि निरवचन, है निमित्त उपदेश । 

बसे जु जैसे देशमें, करे सु तैसे भेस॥०७॥ 

इति निर्मित उपादान के दोहे, 





अथ अध्यातमपदपक्रि लिख्यते, 
(१) 


राग मेरव 
या चेतनको सब समुधि गई। 
व्यापत मोहि विकल्ञता भई, या चेतनकी० टेक 
है जढहप अपावन देह । 
तासौ राखे परमसने६, या चेंतनकीं० || १॥ 
आइ मिले जन स्वारथबंध | 
तिनहिं 'कुटब कहे जा बंध ॥ 





वनारसीविज्ञास २२३ ] 


रन्‍न्‍मककनन»% ५०००७ अ कामना मा नम मकर न +अस७ ५-७७ पभम “रकम नअसस आम + परम मकर नअक्क-न 
कान ० छ चार छ#-/भम्क जा पे का ९ शत पक फट फेक चमक ०९७) पक कत कम जल चछ कक जम ज््सस्स्सल्जस्ससज्सससस्सस सेट स्क जज 


आप अकेला जनमे मरे | 

सकल लोककी ममता धरे, या चेतनकी० | ९ ॥| 
होत विभूति दानके दिये। 

थह परपंच विचार हिये | 
भरमंत फिर न पावइ ठौर | 

ठाने मूढ और की और, या चेतनकी० ॥ ३॥ 
बंध छेतकी करे जुखेद। 

जाने नहीं मोक्षकों भेद । 
मिंट सहज संसार निवास | 

तब सु 6 था चेतनकी० ॥श॥। 


राग रामकत्षी-- 
चेतन तू तिहुकाल अकेला, 

नदी नाव संजोग मिले ज्यों, त्यों छुटंबका मेला, चेतन० ॥ टेक ॥ 
यह संसार असार रूप:सब, ज्यों पटपेखन खेला | 

सुख संपति शरीर जलबुदबुद, विनशत नाहीं बेला, चेतन० || १॥ 
मोहमगन आतमगुन भूलत, परि तोहि गलजेल्ा | 

मैं में करत चहूँ गति डोल्ञत; बोलत जेसे छेल्रा, चेतन० ॥ २॥ 
कहत 'बनारसि' मिथ्यामत तज, होय सुगुरुका चेला | 

तास बचन परतीत आन जिय, 2 रा सुरमेला, चेतन० ॥ ३॥ 

- इ३्‌ 


ल्‍ 2 रॉमकरली । 





राग रांमकल्ी 
मगन है आरांधों साधो! अस्त पुरुष अभु ऐसा॥ टेक ॥ 
जहाँ जहाँ जिस रंससों राचे/ तहाँ तहाँ तिंस भेसा, मगन० ॥ १॥ 


२२४ ] बनारसीबिलास 


ज्स्स्ज्ज्न्न्स्ज्ण्न्स्स्ण्ण्य्य्ज्ज्ज्न्न्य्य्य्ज्य्श्य्ज्स्स्य्य्स्य्स््ज्च्ल्यन्ज्ण्प्प्च्य्स्ल््ञ््च्स््डटड55ड<55 पड चेक पिकट पा० ९८०५. 





सहज प्रवान ग्रवान रुप में, संसेमें संसेसा | - 
धरे चपलता चपत्न कहावे, ले विधान में में सा, मगन० ॥ २॥ 
उद्यम करत उद्यमी कहिये, उद्यसरूप उदे सा | 
व्यवह्वरी व्यवहार करम में, निहचे में निहचे सा, मगन०॥ ३े॥। 
पूरण दशा धरे संपूरण, नय विचार में तैसा ! 
द्रवित सदा अजे छुखसागर, भावित उतपति खैसा, मगन० ॥ ४ || 
नाहीं कहत होइ नाहीं सा, है कहिये तौ है सा । 
एक अनेक रुप हो वरता, करों कहाँ तो कैसा, मगन० | ५॥ 
कल्पित वचन विज्ञास वनार्रास” वह जेसेका तेसा, मगन* || ६ !! 
(४) 
दोहा । 
जिन प्रतिमा जिनसारखी, कही जिनागम माहि। 
पे जाके दूषण लगे, बंदनीक सो नाहि। १॥ 
मेटी मुद्रा अवधिसों, कुमती कियो छुद्ेच। 
विधन अंग जिनवबिवकी, तजे समकिती सेव॥ २ |) 
(५) 
अज्ञानी की दशा 
रूप की न झांक हिए करम को डांक पिये, 
न ज्ञांन दवि रहो मिरगांक जसे धन में। 
जोचन की ढांक सो न माने संदूगुरु हांक, 
डोले मूढ़ रंक 'सो निशंक तिहूँपन में।॥ 
« ढंक एक मांस की डल्षी सी तामें तीन फांक; 
तीन को सो आंक लिख्नि रख्यो कहूँ तनमें | - 





वनारसीविलास २२४ | 
स्ल्ल्ल्ज््स्स्स्ल्ल्य्य्््य्य्य्य्य्य्स्य्य्य्य्स्य्य्स्स्य्प्य्य्य्य्स्स्श्य्ल्स्ज्ख्ल्ज्ज्ज्ज्फ्ल्फ्फ्ज्ज्स्स्ज्जा 


त्ासों कहे नांक ताके राखने को करे कांक, 
त्ांक सो खड़ग वांधि वॉक धरे मन में ॥ 
कॉच बाधे शिरसों सुमणि वा धे पॉयनि सो, 
जाने न गेबार कैसा मणि केसा काँच है| 
योँही मूढ भूंठ में मगन मूठ ही को दौरे, 
भूठ वात माने वे न जाने कहा सॉच है॥ 
भाण को परखि जाने जौहरी जगत माहीं, 
सांच की समझ जान-लोचन की जांच है। 
जद्दां को जुबासी सो तो तहाँ को मरम जाने, 
जापे जैसो स्वांग तापे वैसे रूप नाच है॥ 
(६) 
राग-विज्ञावल । 
रेसे क्यों प्रभु पाइये, सुन मूरख प्राणी 
जैसे निरख मरीचिका, मंग भानत पानी। ऐसें० ॥ १॥ 
ज्यों पकवान चुरैलका, विपयास्स त्यों ही। 
ताके लालच तू फिर, भ्रम भूलत यों द्वी। ऐसें० ॥ ॥ 
देह अ्रपाधन खेटकी, अपको करि मानी । 
भाषा मनसा करमकी, ते मिजरर जानी। ऐसें> ॥ ३॥ 
लाव फद्दावति लोककी, सो तो नहीं भूले । 
जाति जगतकी फलपना, तामें तू भूल्ें। ऐमें० ॥९॥ 
मादी मूमि पहारकी, तुद्द संपत्ति चूमे। 





ब्न्न््-श्<ःड्खज््््ज-््सतर्सकचस ्च्यस्स्स्ल्स्स्स्स्ण्ड्स्ज्ज्ड्ज्ज्ल्स्ड्ट 


प्रगट पहेली मोहकी, तू तऊ ने बूफे। ऐसे० ॥ ५॥ 
हैं कबहू निज गुनविषै, निजदृष्टि न दीनो। 
पराधीन पंरवस्तुंसों, अपनायत कीनी, ऐसे> || ६॥ 
ज्यों मृगनाभि सुवास सो, हू ढ़त बन दौरे । 
त्यों तुममें तेरा धनी, तू खोजत और, ऐसें० ॥७॥ 
करता भरता भोगता, घट सो घटमाहीं । 
ज्ञान विना सदूगुरु विना, तू समुमत नाहीं, ऐसे॥८॥- 


(७) 
राग-बिलावल 
ऐसे यों प्रभु पाइये, सुन पंडित आनी। 
ज्यों मथि माखन काढिये, दृधि मेति मथानी, ऐसे० ॥श॥ 
ज्यों रसलीन रसायनी, रसरीति अराधे। 
त्यों घट में परमारथी, परमारथ साथे, ऐसे३ ॥शा 
जैसे वेध विथा लहै, गुण दोप विचारं। 
तैसे पंडित पिंडकी, रंचना निरंबार, ऐसे०  ॥श॥ 
पिंडस्वरूप अचेत है, पभ्ुरूप न कोई । 
जाने माने रंवि रहे, घट व्यापक सोई ऐसे० ॥४॥ 
चेतन लच्छन है धनी, जड लच्छन कोया। 
चंचल लच्छन चित्त है, भ्रम लच्छन मायां, ऐसे ॥श| 
तच्छ्न भेद्‌ विलेच्छकों, छु विलंच्छेन बेदे, 
सत्तसरूप हिये धरे, भ्रमरूप उछेदे, ऐसें० ॥६॥ 


जी  ाशिऑसरीरईड, 


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२२६ ] वनोरसीविल्ञा्स 











बनारसीविलास २२७ ] 


ज्यों रजसोघे न्‍्यारिया, धन सो मनकी गे | 
त्यों मुनिकर्म बिपाकमें, अपने रस भीले, ऐसे०॥ ७॥ 
ओप लखे जब आपको, दुविधापद मेटे | 
सेवक साहिब एक हैं, वब को कि भेंटे ! ऐसें० ॥ ८॥ 
(८) 
राग--आतावरी 
तू आतम गुन जानि रे जानि, 
साधु वचन मनि आनि रे आनि, तू आतम०॥ १॥ 
भरत चक्रपति पटखेंड साधि, 
भावना भावति लद्दी समाधि, तू आतम० ॥२॥ 
प्रसनचंद्ररिषि भयो सरोष, 
मन फेरत फिर पायो सोष, तूआतम० .. ॥३॥ 
राबन समकित भयो उदोत, 
तब वांध्यों तीथंकर गोत,तू भरातम० . ॥8॥ 
सुकल ध्यान धरि गयो छुछुमात्न, 
पहुँच्यो पंचमगति तिहें काल, तू आतम० . ॥5४॥ 
दि प्रहदरकरि द्िसाचार, 
गये झुकति निजगुण अवधार, तू आतम० . ॥ ६॥ 
देखहु परतछ म्गी ध्यान, 
करत कीट भयो ताहि समान, तू आतम० ॥ ७॥ 
कहत बनारसि! वारंवार, 
और न तोहि छुड्वनहार, तू आतम० ॥४॥ 


,. [ शश्८ ब्रनारसीविलास 


न्‍वरयललक00+क+ नाक त-ा6०७३० ०-८: परम+ब नया ३ ५ +9०-+० पान >क.+०५७७००- आप १»33 पपतयात काटे कक 
' अधिक परियिकी पक पती ऋाननकी करी कि लक मय करा: कक कह कुछ कीमती पारी भिनीकी नी नी करीणी सीजाका 


(६) 


रगग--श्रातावरी । 
रे मन ! कर सदा सन्तोप, 
जातें.मिदत सब दुखदोप, रे मन० ॥ १॥ 
वढत परिगृह मोह बाढ़त, अधिक ठपना होति। 
वहुत इंघन जरत जेसें, अगनि ऊँची जोति, रे भन ॥ 
लोभ लालच मूढजनसो, फेहत कंचन दान | 
फिरत आरत नहिं विचारत, धरम धनकी हान, रे मन ॥ ३ ॥ 
नारकिन के पाइ सेवत, सकुच मानत संक | 
ज्ञानकरि बूमे बनारस” को जृपति को रंक, रे मन०॥४॥ 
(१० ) 
राग--बखा । 

वातम ठुहूँ तन चितवन गांगरि फूटि । 

शँचरा गौ फदराय सरम गे छूटि, वालम ॥ १॥ 

हूं तिक रहें जे सजनी रजनी घोर। 

घर करकेउ न जाने चहुदिसि चोर, बा० ॥२॥ 

पिड छुधियावत वनमें पेसि3 पेलि। 

छाडउ राज डगरिया भयठ अकेलि, बा? || ३ || 

संबरी सारद्सामिनि औ गुरु भान। 

कछु वसा परसारथ करों वल्ात, वा०॥४॥ 

काय नंगरिया भीतर चेतन भूष। 

करम लेप लिपटा बल ज्योति स्वरूप, वा०॥ ४॥ 


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बनारसीविलास २२६ ] 








दृशेन ज्ञान चरणमय चेतन सोय। 

पियरा गर॒ंघ सचीकन कंचेन होय,बा० ॥| ६॥ 
चेतन चित अवधार घुगुरु उपदेश। ु 
कह इक जागल्ि ज्योति ज्ञान गुन शैंस, बा० || ७॥ 
अथिरहूप सब देखिसि छिन बेराग। ' 
चेतन आपुहि आप 'बुमांवे ल्ञाग बा०॥ ८॥ 
चेतन तुद्दु जनि सोवहु नींद 'अधोर । 

चार चोर घर मूं सह्दि सरबस तोर, वा? ॥६॥ 
चेतन तु घनसावन कोलक्विरात। 

निसिदिन करे अहेर अचानक घात, बा० ॥ १०॥ 
चेतनहो तुहूँ चेतहु परम पुनीत। 

तजहु कनक अरू कामिनी होहु नचीत, वा० ॥ ११॥ 
परेहु करमवस चेतन ज्यों नटकीस। 

कोउ न तोर सहाय छाडि जगदीस, वा० ॥ १२॥ 
चेतन बूकि विचार धरहु सन्तोष | 

राग दोष दुइ बंधन छूटत मोप, बा० ॥ १३ ॥ 
मोहजाल्ञ में चेतन सब जग जानि। 

तुहु कुबाज तुहु घामहु सब्रत भुल्ान, बा० ॥ १४॥ 
चेतन मयेहु अचेतन सगति पाय। 

चकमक में आंगी देखी नहिं जोय, वा०॥ १४५॥ 
चेतन तुद्दि ल्पटात प्रेमरस फांद । ३ 
जस राखल घन तोषि विमलनिशिचांद, चा० ॥ १६॥ 





| २३० बनारसीविलास 








चेतन तोहि न भूल नरक दुख बास | 
अगनि थंभ तरुसरिता करवत पास, बा० ॥ १७ ॥| 
चेतन जो तुहि तिरत़्ग जोनि फिराड | 

वांध पांच ठग बेग तोर अब दाठ, बा०॥ ई८॥ 
देवजोनि सुख चेतन सुरग बसेर। 

ज्यों विन नीव धौरहर खसत न वेर, बा०॥ १६॥ 
चेतन नर तन पाय बोध नहिं तोहि। 

पुनि तुहु का गति होइंदि अचरज मोहि, वा० ॥| २०॥ 
आदि निगोद निकेतन चेतन तोर। 

भव अतेक फिरि आयेहु कतहु न ओर, बा०॥ २१॥ 
विषय मद्दारस चेतन विष समतूत् | 

छादहु वेगि विचारि पापतरुमृूत्न, बा० ॥ _२॥ 
गरभवास तुहूं चेतत ऊरध पांव। 

सो दुख देख विचार धरमचित लाव, बा० ॥ २३ || 
चेतन यह भवसागर धरम जिहाज | 

तिह चढ़ बेठो छोड लोककी ज्ञान, वा०॥२४॥ 
दृह या दुहु अब चेतन होहु उचाट । 

कह या जाउ भुकतिपुरि संजम वाट, बा०॥ २४५ ॥ 
उधवागाय सुनायेहु चेतन .चेत | 

कहत 'बनारसिः थान नरोत्तम देत, बा० ॥ २६॥ 





टाल पलतन>न+ता०-गमाहनक्‌ ००००० ० नया "गकनुकगूफाटनान-गिपपानक सन 'न्‍रल्‍न- 23+ननककनभणणएख। पएएयएएण 





धनारसीबिलास २३१ | 
(११) 


रागन_-धनाभ्री - 

चेतन उल्टी चाज् चले, जड़संगततै-जड़ता व्यापी निज 
गुन सकल टल्ते, चेतन० टेक ॥ १ ॥ हिितसों विरचिठगनिसों राचे, 
मोह पिसाच छल्ले | हेसि हँसि फंद सवारि आप ही, भेलत 
आप गल्ले, चेतन० ॥ २॥ आये निकसि निगोद सिंधुतें, फिर तिह 
पंथ टल्ते। केसें परगट होय आग जो दबी पहारतले, चेतन० ॥३॥ 
भूले भवश्रम वीचि 'बनारसि! तुम सुरक्षान भत्ते । धर शुभध्यान 
ज्ञाननौका चढि, बैठे ते निकले, चेतन० ॥ ४॥ 

(१२) 
राग--रागधना श्री । _ 

चेतन तोहि न नेक संभार, नर सिल्त्ञों दिवबंधन बेढ़े 
कौन करे निरवार, चेतन० ॥ १॥ जैसें आग पषान काठ में 
लखिय न परत लगार | मद्रिपान करत मतवारो, ताहि न कछू 
विचार, चेतन०। २॥ ज्यों गजराज पस्लार आप तन, आप हि 
डारत छार | आप हि उर्गलि पाठकों कीरा, तनहिं लपेटव तार 
चेतन० ॥ ३ ॥ सहज कबूतर जोटनको सो, खुले न पेच अपार | 
और उपाय न वने 'वनारसि? सुमरन भजन अधार, चेतन० ॥४8॥ 

(१३ ) 
रांग>_-सारग | 

दुविधा कब जै है या मनकी हु? | कब निम्रनाथ निरंजन 

सुमिरों, तज सेवा जन जनकी, दुविधा० ॥१॥ कब्र रुचिसों 





[ १३२ बनारसीबिलास * 


पीबै दगचातक, बू द अखयपद' घनकी | कब शुभध्यान, धरों 
समता गहि, करू' न ममता तनकी, दुविधा० ||२॥ कब घट 
अंतर रहे निरन्तर, दिद्वता सुगुरु वचनक्री | कब सुख लहों भेद 
परमारथ,'मिटे धारना धनकी, दुधिधा० ॥ ३॥ कब घं॑र छोड़ 
होहु' एकाकी. लिये लालधा वनकी | ऐसी दशा होय कब मेरी 
हों धतिवलि वा छनकी! हुविधा० | ४ | 
(१४) 
राग--सारंग | है 

हम बेठे अपनी मोनसों, दिन दशके महिमान जगत जन्त 
बोलि विगारें कोनसौं, हन बेढें० ॥ १।) गये बिल्लाय भरम के 
बादर, परमारथपथपौनसों | अब अंतरगरत भई हमारी, परे 
रा्रारैनसों, हम बेठे० ॥ २॥ प्रघटी छुधापानकी महिमा, सन 
नहिं लागे बौनसौं। छिन न सुहायें और रस फीके, रुचि साहिब 
के लौनसौं, हम बेंठे० ॥ ३ ॥ रहे अघाय पाय सुखसंपति को 
निकसे निज भौंनसों। सहज भाव सदगुरुकी संगति, छुरमे 
आंधागौनसों, हम बेठे० ) ४॥ 
(६४) 
रोग--पारं गज दावनी | 

जगत में सो देवतको देव। जासु चरन परसे इन्द्रादिक 
होय मुकति स्वयमेष, जगतमें ॥ १ ॥ जो न छुधित न ठृषित न 


भयाकुत्, इन्द्रीविषय न वेब | जनम न होंय जरा नहिं' व्याषे 
म्िठी मरनकी ठेव, जगतमें॥ २॥ जाके नंहिंविषांद'भहिं“वित्मय; 


रत नर नार»ण»»»-> कक, पोज साहाभमतााकाव॥ल्‍ 3०० 





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| । 











बनारसीविज्ञास २३३ ]' 


कर यम पकीयिकी पकीीचक चेक कार सम कीवीीकीअीपटीी 





'उह भी न्‍री करी. 


नहिं आठों अहमेव | राग विरोध मोह नहि जाके. नहिं निद्रा 

परसेव, जगतमें० ॥ ३॥ भनहि तने रोग न श्रम नहिं चिता, 

दोप अठारह भेव | मिटे सहज जाके ता प्र+की, करत वनोरसि! 
» सेव, जगतमें० ॥ १॥ 


| ' -(६) 


राग-सारंग वृ दावनी | 





विराजे “रामायण” घटमाहि | मरमी होय मरम सो जाने, 
मूरल माने नाहि, बिराज रामायण० ॥ १॥ आंतम “राम” ज्ञान 
गुन ह्छुमृन!ः सीता” सुम्रति समेत। शुभपयोग “बानरदत्व” 
मंद्ित, वर विवेक.“ रणखेत” विराजे० | २॥ ध्यान 'धनुप टकार! 
शोर सुनि, गई विपयदिति भाग | भई भरंम मिथ्यामत लंका! 
उठी धारणा “आंग' विराज० ॥ ३॥ जरे अज्ञान भाव राच्सकुत्न 
हरे निकाछित/पूर' । जूसे! रागंढ ष सेनापति संसे 'गढ” चकंचूर, 
विराजे० ॥ ४॥ बलखत 'कुमकरण” भवविश्नम, पुलकरित मन 
“दरयाव” | थक्षित उदार बीर 'महिरावण” 'सेतुबंध' समभाष, 
विराजे० ॥ ४ ॥ मूछित 'पंदोद्री! दुराशा, सजग चरन हलुमान!। 
घटी च॒तुर्गेति परणति 'सेना,” छुटे छेपकगुण 'वान विराजे० 
॥ ६॥ निरंख्ि सकति गुन 'चकल्॒द्शन! उदय 'विभीषण? दीन | 
फिरे कवध' मही 'रावणकी? प्राशभाव शिरदीन, विराजे०॥ »॥ 
हह विधि सकल साधुघठ अंतर, होय सहज 'संम्राम” | यह चिच- 
हारदृष्टि रामायण, केवल निश्चय 'राम' विराजे० ॥ ८॥ 


इकअर. के अमर... डर परी एनरमिपमम सम चिजमचक... कि कपिकरीरपिक. नि यरीपितीयरीयिएर एफ पिल शक पिारगीक फिट पर पक फट ७१८ पिन िकत पेज पिलार फट फल कट पेड फिर करी पड र्रिकि प्रीमियर, परी का बनाम पारी यन 


(१७) 

श्रालाप दोहा । 

जो दातार दयाल हैं, देय दीनको भीख । 

त्यों गुरु कौमल भावसों, कह्टे मृढकों सीख ॥ १ ॥ 

पुगुरु उचारे मढसों, चेत चेत चित चेत । 

समुझ समुझ गुरुकी शवद, यह तेरों हित हेत ॥ २ | 

शुक सारी समुर्भों शवद, समुमि न भूलहिं रंच । 

तू मूरति नारायणी, वे तो खग तिरजंच ॥ ३॥ 

होय जोंहरी जगतमें, घटकी भआखें खोलि। 

तुला संबार विवेककी, शब्द जवाहिर तोलि ॥ ४॥ 

शब्द जवाहिर शब्द गुरु, शब्द त्रह्यको खोज। 

सब गुण गर्मित शब्दमें, समुक शब्दकी चोज ॥ ५ ॥ 

समुझ सके तो समुम; अब, है दुलेभ नर देह । 

फिर यह संगति कब मिले, तृ चातक हो मेह ॥ ६ ॥ 

(१८) 
राग-गीरी । 

भौद भाई ! सम्ुक शवद यह मेरा, जो तू देखे इन आऑखि- 
नसौ तामे कछू न तेरा भौंदू० ॥ १॥ ए आँखें अमहीसों उपजी, 
भ्रमद्दी के रस पागी | जहेँ जहाँ भ्रम तहें तहेँ इनको भ्रम, तू 
इनही को रागी, भौंद भाई० ॥ २॥ ए ओऑंखे दोठ रची चामकी, 
चाम हि चाम विलोब | ताकी ओट मोह निद्रा जुत, सुपनहप तू 
जोबे, भौंदू भाई० ॥ ३॥ इन ऑखिनकी कौन भरोसो, ए बिनसे 


मी करीयरानआ, 


२३४ वनारसीविलास 








ल््य्क्य्थ्थ्शश््््र्जिजज5 स्लफ:जज डफडफखकफकइइललंॉ?८६रडससससकलसअ सन” 





वनरसीविज्लास ०» २३४- | 


छिन माही । है इनको पुदगज्सों परचे, तू तो पृद्ठ नाहों, भोदू 
भाई० ॥ ४॥ पराधीन वल्न इन आंखिनको, विनु प्रकाश न धुमे | 

: सो परकाश अगनि रवि शशिको, तू अपनों कर बूमे, -भौंदू 
भाई० ॥ ५ ॥ खुले पक्षक ए कलुइक देखदि, सुंदे पल्क नह 

सोऊ | कहें जांहि होंहि फिर कबहूँ, भ्रामक ओंखें दोझ, भौदू 
भाई० ॥ ६॥| जंगमकाय पाय ए प्रगटें, नहिं. थावर के साथी। 

तू तो इन्हें मान अपने दृग, भयो भीमकी हाथी, भोंदूभाई० ॥७॥ 

तेरे दृग मुद्रित घट अंतर, अन्धरूप तू डोले | के तो सहज खुले 

ते आंखें, के गुरु संगति खोले, भौवू भाई! समुझ शवद यह 

मेरा। झ॥ 

(१६) 


राग-गौरी । 


भौंदू भाई देश्िहिये की आंखे, जे करपै “अपनी सुख 
सपति भ्रमकी संपति नाखें, भौंदू भाई ॥ १॥ जे आंखे अमृतरस 
वरखें, परसे केवलिवानी | जिन्ह आंखिन विज्ञोकि परमारथ, होंहिं 
कृतास्थ पानी, भौंदू भाई० ॥ २॥ जिन आंखिनदि दशा केवलिकी 
कमल्षेप नहिं लागे। जिन आंखिन के प्रगट होत घट,-अलख 
निरंजन जागे, भौंदू भाई० ॥ ३ ॥ जिन आंखिनसो निरखि भेद 
गुन, ज्ञानी ज्ञान बिचारे। जिन आंखिनसों लखि स्वरूप मुनि, 
ध्यानधारणा धारे, भौदू भाई ॥ ४॥ जिन आंखिनके जगे जगतके, 
लगें काज सब भूठे । जिनसों गमन होइ शिवसनमुख, विपय 
विकार अपूठे, भोंदू भाई० ॥ ५॥ जिन आंखिनमें प्रभा परमकी 


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[. २३६ वनारसॉवलास 


कहकर फट । 


परसह्दाय नहिं लेखें । ले समाधिसों तके अखंडित, ढके न पलक 
निमेखे, भौंदूं। भाई० ॥ ६॥ लिन आंखिनकी ज्णेति अगिके, 
इन आंखिनमें भासें । तव इनहूकी मिटे विषमता, समता रस पर 
गासे, भौदू भाई० ॥ ७॥ जे आंखें पूरनस्वरूप धरि, लोकार्क्नोक 
लखाब । अब यह वह सब विकलप तजिक, निरविकतल्षप पदपाव 
भौदू भाई० ॥ ८॥ 





(कर आयरन करी भा. परीयानी भीयात थार भर गहरी पिज कतरी करी दही पाती चाही पक कनरी चिकन पक. न कह कार चशीरिकी सात सजी गा. 





(२० ) 
राग-काफी | 
तू श्रम भूल ना रे प्रारी, तू० धरम, बिसारि विषयछुद्ध 
सेवत, वे मति हीन अज्ञानी, तू श्रम० ॥ १॥ वन घन छुत जन 
जीवन जोवन, डाम अनी ज्यों पानी, तू अ्रम० ॥२॥ देख 
दगा परतच्छ वततारसि ना कर होड़ बिरानी, तू भ्रम० || ३॥ 
(२१) 
राग-काफी | - 
चिन्तामन स्वामी सांचा साहिब मेरा, शोक हरे तिहूँ लोकंको, 
उठ ल्ीजतु नाम सवेरो, चिन्तामन० ।॥| १ ॥ सूरसेमान उद्येत है, 
जग तेज प्रताप घनेरा। देखत मूरत भावसौं, मिट ज्ञाव मिथ्याति 
अंधेरा, चिन्तोमन स्वासी० | २॥ दीनदयाल निवारिये, दुख 
संकट जोनि वसेरा | मोददि अरभंयपद दीजिये, फिर होय' नहीं 
भवफेरा, चिन्तीमन० ॥ ३॥ बिंब बिराजत आगरे, थिर थान 
थयो शुभवेरा। ध्यान धरे विनती करे, 'बनारसि? बंदा तेरा, 


विन्तामन० ॥ ४।॥ ; 
इति अ्रध्यातमपदपंवित | ग 


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गनारसीबिलांस २३७ | 





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अथ परमारथहिंडोलना लिख्यते। 


सदज हिंदना हरख हिडोलना, झुक्रत चेतनराव । 
- जहाँ धर्म कम सेनोग उपजत, 'रस” स्वभाव विभाव | टेक || 
अहेँ सुमनरूप अनूप मंदिर, सुरुचि भूमि घुरंग। 
तहें ज्ञान दशेन संभ अविचल, चरन आड अभग ॥। 
मरुवा मसुगुन परजाय विचरन, भौंर विमत्ञ विवेक | 
व्यवहार निश्चय नय सुदंडी, सुमति पटली एक । सहज० ॥ १ ॥ 
पट कील जहां पडद्रव्य निणेय, अभय अंग अडोल | 
उधम रढ्ष्य मिलि देहि भोध, शुभ अशुभ कल्लोत्न ॥ 
संवेग संवर निकट सेवक, विरत बीरे देत । 
आनंदकंद हुठंद साहिब, सुख समाधि समेत, सहजहिं।॥ २॥ 
जहेँ खिपक उपशम चमर ढारइ, धर्म ध्यान वजीर | 
आगम अध्यातम अंगरक्षक, शान्तरस वरवीर ॥ 
गुनथान विधि दश चार विद्या, शकतिनिधिविस्तार | 
संतोष मित्र खवास धीरज, छुजस खिनमतगार, सहज० ॥ ३॥ 
धारना समिता क्षमा करुणा, चारसखि चहुँ ओर | 
निजेरा दो 'चतुरदासी, करदहि खिजमत जोर ॥ 
जहेँ विनय मिलि सातों सुद्दागनि, करत धुनि मनकार । 
गुरुषचनराग सिद्धान्तघुरपद, ताल अरथ विचार, सहज० ॥४॥ 
श्रहृदन सांची भेघमाला, दाम गजत घोर | 
उपदेश वर्षा अति मनोहर, भविक चातक मोर ॥ 


रा पियमयरीकमीीयकरिक, 





जरा टीका िटीजत हमर शत नरक 
| लक पलपल न-कन-मपनन-थकन+ करना कप. 


[ 2१८ बनारसीविलास 


न्‍ब-, 3.७ममकक७-3४७ ९... >७७स 3-3... क्‍>---+>र. 
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अनुभूति दामनी दमक दीसे, शील शीत समीर | 

तप भेद्‌ तपत छेद परगट, भावरंगत चीर, सदृज० ॥ ४॥ 
कब॒हूं असंख प्रदेश पूरन, करत वंस्तु समाल। 

कबहूँ विचारे कर्म प्रकृती, एकसो अड़ताल ॥ 

कबहूँ अबंध अदीन अशरन, लखत आपहि आप | 

कवहूँ निरंजन नाथ मानत, करत घुमरन जाप, सहज० || ६ || 
कबहूँ गुनि गुन एक जानत, नियंत नये भिरधार | 

कबहूँ छुकरता करम किरिया, कहदत विधि व्यवहार ॥ 

कवहूँ अनादि अनंत चिंतित, कबहुँ करहि उपाधि | 

कवहूँ छु आतम गुणसेभारत, कबहुं सिद्ध समाधि, सहज० ॥०॥ 
इह्िभांति सहज हिंडोल भूलत, करत आतम कांज | 
भचतरनतारन दुखनिवारन, सकल मुनिसिरताज ॥ 

जो नर विचच्छन सदंयलच्छन, करत ज्ञानविज्ञास । 

करजोर भगति विशेष विधिसों, नमत 'काशीदास” || ८॥ 


इति पंरमारयहिंडोलना | 


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अष्टपंदी मेल्हार 
देखो भाई! महापिकल संसारी, दुखित अंनादि मोहके 
कारन, राग हंष अम भारी, देखो भोई मध्दाविकेल संसारी | १ ॥ 
दिसारंभ करत सुत्र समुर्में, सृषा वोलि चतुराई। परधन हंरत 
समर्थ कद्दावैं, परिमह बढत बढाई, देखो भाई० ॥ २॥ वचन 


वर 








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बतारसीबिज्ञास २३६ ] 


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राह काया रह राडें, मिटे न मतचपलाई । याहैँ होत औरकी 
और, शुभ करनी दुखदाई, देखो भाई०॥ ३॥ जोगासन करि 
कम निरोधे, आतम दृष्टि न जागे। कथत्ती कथत महंत कहावे 
ममता मृल न त्यागे, देखो भाई०॥ ४॥ आओगम वेद सिद्धान्त 
पाठ सुनि, हिये आठमद आने । जाति लाभ कुक बत्त तप बिद्या, 
प्रभुता रूप बखाने, देखो भाई? ॥ ५५ जड़ों राचि परमपद्‌ 
साथे, आतमशक्ति न सूमे | विना विवेक विचार दरवके, गुण 
परजाय म वूमे, देखो० ॥ ६॥ जसवाले जस सुनि संतोपे, दप 
वाले तम सोप | गुनवाले परगुन्कों दोपै, मतवाल्े मत पोपें, 
देखो० ॥ ७ ॥ गुरु उपदेश सहज उद्‌यागति, मोहविकत्षता छूटे । 
कहत “बनारति” है करुनारसि, अलख अंख्रय निधि लूटे, 
देखो+ ॥८॥ 
शत्पष्टपदी मल्हार सम्पूर्ण | 





रगिन 

मूलन चेटा जायोरे साधो, भूलन०। जाने खोजकुद्ध ब सब खायो 
रे साधो० मूलन० ॥ टेक | जन्मतं साता ममता खाई, भोहज्ञोभ 
दोइ भाई। कामक्रोध दोह फ्राका खयि, खाई हंरपनादाई, साधो० 
॥ १ ॥ पापीर्पापपरोसी खायो, अशुभकरम दोह मामा | मात नगरको 
राजा खायो, फैज् परो सथगांभा, साधो० ॥ २॥ दुरमवें दादी खाई 
दादों, मुंखदेखत ही मूझ। मंगलांचार बधाये बाजे, जब यो 
बालक हुओ, साधो० ॥ ३॥ नाम धरंथों बालेककों भोंदू, रूप 


अर 2१ .आ० 2 22, 


[ २४० बनारसीबिलास 


| ललनननननन न नमन बनना नमन सती लनपत ननपसन का नननन-म ८-५ पलमन+ पाक“. 
सर क /+ अ #ा ७ 4०० /#+ #१९ ०७ १ # /०५ /&#१ 2९.० /#९ #९ /#१ #0 ४०५ #7० +० 670 क्‍#ि। क्‍ानन #ऋ० ५8६५ 8 67 :#०५४३० .धाक आग 47५१० ##०.#१#१#० गे कान #ए#०० #० क्रम आन ही. 





चरन कछु नाहीं | नामधरते पांडे खाये, कहत 'बनारसि? भाई, 


साधो० ॥ ४॥ 5 
राग-नगला | 


वा दिनको कर सोच जिय ! सनमें वा दि्‌० टेक | 
बनज किया व्यापारी तूने, ढांडा ल्ादा भारीरे। छ»ोछी पूजी 
जूआ खेला, आखिर बाजी हारीरे ॥ आखिर बाजी द्वारी, करले 
चल्ञनेकी तय्यारी | इक दिन ढेरा होयगा वनमें, वादिन० ॥ १॥ 
सूठे नेना उन्नफत वांधी, किसका सोना किसकी चांदी। इकदिन 
पवन चलेगी आंधी, किसकी बीबी किसकी बांदी, नाहक चित्त 
लगाबे धनमें, वादिन० ॥ २ ॥ मिट्टीसेती मिट्टी मित्रियो, पानी से 
पानी ।मूरखसेती मूरत मिल्रियो, ज्ञानी से ज्ञानी | यह मिट्टी है 
तेरे तनमें, वादिन० ॥ ३ ॥| कहत 'बनारति? सुनि भवि प्राणी, 
यह पद है निरवानारे | जीवन मरन किया सो नाहीं, सिरपर 
काल्ना निशाना रे | सूक पडेगी बुढ़पेपनमें बादिन० | ४ ॥ 

रागेन 

कित गये पंच किसान हसारे । कित० टेक ॥ 
वोयो वीज “ खेत गयो निरफल, भर गये खाद पनारे। कपदी 
लोगों से सामाकर,*** **'हुए आप विचारे ॥| १ || आप दिवाना 
गह गह बेठी लिखलिख कागद डारे। बाकी निक्सी पकरे 
मुकद्दम, पांचों होगये न्‍्यारे ॥२॥ रुकगयो कठ शबद नहिं 
निकसत, हा हा कर्मसों हारे। बानारसिः या नगर न बसिये, 
चह्ञगये सींचनद्वारे ॥ ३ ॥ 


शरीफमियिदारमररियरीय न, 
ल्शश--:-जल्अच्थििकिथ्साेॉेॉेेेि्ये्ेेँ्ेथयययथथथख्््ऑिऑि५+---- ७.०२०५#०,नन्‍मतग>तन्‍ पिन बरीजीरीारा अर जरीनरीयरीयाकरीनीज, 3 टी कनी री कमीज करीजता, बरीजटीओ पी व्लाओटीक ० अल सकी अ । का 





[२४० के बनारसीविज्ञास 


दो नये पद 
राग रामकछ्ी 


स्दरे प्रगदे देव निरंजन | 
अटको कहा कहा सर भटकत कहा कहूँ जन रंजन॥ म्हारे ॥१॥ 
खंजन द॒ग दृ॒ग नयनन गाऊ चाझ चितवत रंजन। 
सजन घट अंतर परमात्मा सकत्न दुरित भय रंजन ॥ 


॥ र्हारे॥ग। 
वोही कामदेव होय काम घट बोदी सुधारस मंजन। 


ओर उपाय न मिले बनारसी सकल करमषय लंजन ॥ 
॥ रहारे॥१॥ 





राग आातावरी 


साधो लीज्यो सुमति अकेली जाके समता संग सहेली ॥ साधोणा 
ये है सात नरक दुख हारी, तेरे तीन रतन घुभकारी। 
ये है अष्ट मद्दा मद त्यागी, वजे सात व्यसन अनुरागी ॥ 

॥ साधो०॥१॥ 
तज क्रोध कपाय निद्माती, ये है मुक्तिपुरी की रानी। 
थे है मोहस्यों नेह निवारे, तजे लोभ जगत उधारै॥ 

॥ साधो० ॥१॥ 
ये है दशेन निरमत्ष कारी, गुरु ज्ञान सदा सुभकारी। 
कहे वनारसी श्री जिन भजिले, यह मति है सुखकारी ॥| 


है) कककणन., ॥॥:8४ 


. रसीविलास २४१ ] 


बनारसीविलास के संप्रहकर्ता 


नगर आगरेमें अगरबाल आगरो जो, 

गगें गोत आगरेमें नागर नवत्ंसा। 

संघवी प्रसिद्ध अभेरज राजमान नीके 

पंच वाला नतनिमं भयो है कंवलसा।॥ 
ताके परसिद्ध लघु मोहनदे संघशन, 
जाके जिनमारग विराजत धवलसा। 
ताहदीको सपूत जगज्जीबन सुद्ड जेन, 
बानारसी बेन जाके हिये में सबलसा | 

समे जोग पाइ जगज्जीवन विख्यात भयो, 

ज्ञानिन की मंडलीमें जिसको विकास है । 

तिनने विचार कोना लाटक बनारसी का, 

आपुके निहारिवे को आरसी प्रकाश है ॥ 
ओर काव्य घन्ती खरी करी है वनारसी ने, 
सो भी ऋमसे एकत्र किये ज्ञान भास है । 
ऐसी जानि एक ठौर, कीनी सब भाषा जोर, 
ताको नाम घर-थो यो बनारसीबिलास है।॥। 


दोहा 


सन्रहसे एकोत्तरे, समय चेन्न सित पाख। 
ठितियामें पूरत भई, यह बनारसी भाख | 
इति भ्री कविवर बनारतीदासकृत ववारप्ती विलास समाप्त | 








टिप्पणियां एवं प्राठ्मेद 


[ यहां इस ग्रंथ के कठिन स्थलों की टिपणिया एवं श्र दिये जाते हैं | 
प्रथ के मूल शब्दों के घागे जो शब्द कोष्ठक मे दिये गये हैं थे पाठान्तर है। 
ट्पपणिया एवं श्र पाठान्तरों कौ नहीं है, किन्तु मुद्धित पाठों की हैं । कई 
स्थानों पर केवल पाठ मेद हो देदिये गये हैं-उनके भरथे देने करी जरूरत नहीं 
पम्भी गई। संग का श्रष्ययने "के प्म्य पाठकों के ये श्र श्रौर 
पाठान्तर जरूर देखलैना चाहिए। --सम्पादक | 


पुृ० २--वचनिका-गय | पिर्धौ-बढ़ो । जग ( कौ )-तक । 

पृ० ३--करहुँ ( करि, करों )-करके | अक्ष-भगवाल | परसान 
( परधांश )-अवधि । छ्िरुक्ित ( दुरुवित )-दो घार कहना । ज्षम्ी 
( छमी )-चमाधान । परमान् ( परवान ) प्रमाण स्वरूप। निवोण 
( निरवान )-मुफ्ति स्वरूप । 

पृ० ४--पुण्दरीकबत हंस ( पुरढ्रीकपनहंस ) .। दुराराध्य 
( दुराशाधि )-कठिनता से आराधना करने योग्य 

पु० ५४--तसित्यानन्द॒॒ विमत्ष निरुजञान , ( नित्यानित्य विकत्ष 
निरुढन ) ( नित्यानंद्‌ विमल निरुढ़ान ) ( नित्यानित्य 
विम्क्ष निर्मान )। बोध निधान (घोष विधान) (बोध 
वितान )-ज्ञान का खजाना । गुणमय ( गुणधन ) । स्वपर प्रकाशक 
( सुपर प्रकाशक )-अपने और दूसरे के प्रकाश करने वात्ने। 
0 पलट कल सजी लक लक अल 











[२ बनारसी वेलास 





गुणप्रह (गुणगृह )-गुणों के घर | चिन्तामशि ( चिस्तामयि )-एक 
प्रकार का रत्न जो चिन्तवन करते ह. सब कुछ देदे। चिन्मय 
( चिन्मृष ) ( चिन्मुख )-चेतन्य मय । चारित्रधाम ( चारिश्रधार )- 
चारित्र का स्‍थान | निर्मम ( निमेत)-समत्व रहित | 


१० ६--अबक ( अवंक )-सरल । पु ज. (प्रज्ञु ज) (अभु ज)- 
समूह । विमुक्त (विमुक्ञ)-कर्म रहित । छुपाकरोपस (छपाकरोछम)- 
चन्द्रमाके समान । कृतयज्ञ (कतजग्य|-जो उपासना कर चुका है। 
छुप्तमुद्र ( लुप्तमद्र )-जिसवा शरीर नष्ट होगया है । धौररव 
(धीरस्थ ) घीर है आत्मा जिनझा। शि्षीहु म (शीजद्र म )- 
शीलइच्ष । ददोतवान ( उद्योतवान )-प्रकाशवाल्ले । 


१० ७--दुर्गम्य ( दुरगंम )-जो कठिनता से जाने जा सकते 
हैं | दयाणंघ (दयारनव )-दूया के समुद्र | महर्षि( महारिषि )- 
महामुनि। परमेश्वर ( परमेपुर ) | परमऋषि , परसरसी ) 
(परमरिसी)। परममुद्र (करममुद्र)(सुबकरसमुद्र)-उत्वृ '्ट स्थितिवात्ते। 
शशेष ,अभेष)-पूर्णता स्वरूप । निद्न न्दी(निरदुन्दी)-रागह ष रहित । 
निरवशेष (निर विशेष)-पूर्ण | हुधि नायक (बुघनायक)-बुद्धि के 
नेता । मोक्षस्वरूपी ( भोखस्वरूपी ) | महाज्ञानि ( महाजानि )- 
विशाल ज्ञान वाले | कुम्नला समूह(करुणा समह)-त्च्ष्मी के पुज। 

-., १० ८--मारविहंडन (मानविहंडन) कामका नाश करने वाले । 


द्ृ्यत्वरूप ( दरवर्वरूप ) नित्य | पद्म (पदुम) उप्पम-कमल 
के समान । महायशवंत (महाजशवबंत)-अत्यंव यशत्वी | संकट 








टिप्पणियां ु ३] 





निवारन ( कंटक निवारन )-संकर्टों के नाशक। 


पृ० ६ - व्यतीत भय (वितीत भय) भय रहित । कुशज्ञा (कुशल्षी) 
प्रवीण । 


पृ० १०--ज्षच्मीपति ( लदिमापति ) (लद्धिमीपति।-अनन्‍्त 
चतुष्टय लक्ष्मी के स्वामी | मिथ्यादत्नन ( विधादलन )-असत्य के 
विनाशक । घटातीव ( घटानीत )-धटनाओं से रहित। विषारी 
( विचारी )-विष को दूर फरने वाले। व्यवह्दरी ( विषद्वारी )- 
असंख्य प्रदेशी ( असंत् प्रदेशी )। निम्भल (निरमल ) | 

पृ० ११-६६ द्व विदारण ( दुद्‌ न्चारण )-हुविधा के विना- 
शक | सब विधिव्यापी (से वियापी )-हर जगह मिल्तने वाले । 

१० १२-विज्ञानी ( बिनानी )-जानने घाज्ने | निम्रंथी ( निर- 
प्रंथी )-परिपरद रहित । यंत्रदाइक३( यंत्रदोदत ) ( यत्र दाहन )- 
शरीर को नष्ट करने वाले । भरस विध्वंसी ( भरम विधंसी )-अम 
को दूर करने वाले | चिंकित ( चिदंक्ृत )-चेतन्यतक्षण । व्योती- 
श्वर ( ज्योतीयुर )-प्रभा के स्वामी | अनंग (धसंग)-कामरद्दित | 

पृ० ११-शांति करन (संति करन) । घृतशान्ति (घृतसंति) । 
कान्ति ( फंति )। अशंक ( असंख ) | असोग (असोझक) | विधान 
( निधान ) | अक्षय निधान ( अखतमनिधान ) | 

पृ० १४--मुगुण ( सगुण )। विश्व (बेश्)। वित्त (विज्ञास) 


(पवित्त) | शुद्धोघन(सौधोद्नि)-बुड् । बंधु(बंध) | मदृदंग(नहदंग) 
(सहदग) | निरायिय ( निराधिप ) | 





[४ वनारसीबिज्ञास 


पृ० १५-महास्वामि ( सहस्वाति )। महदथे ( महदघे )। 
गुणागार - ( गुणाकार )। भद्दारसंग ( मद्दारस रंग ) ! कल्षिमराम 
( कल्षप्राम ) । चेन्न (मोइ) । त्रिगुणी (विगुण) | त्रिकालदर्शी सदा 
( त्रिकालद्रशी दशा ) मनमथमथन ( मनमथदद्दन -काम 
फो मथन करनेवाल्ले ! 


पृ० १६--ब्ह्मांड' ( जहमंढ )-सम्पू् विश्व | मोपर (मोपे ,- 
मुझपर । * 








सक्निपक्ाबली 

५० १७--कांतार ( कन्तार )-वन । हुतासन-आग । 

१० १८--परिमल-सुगन्ध | रसाज्न-रसिक । 

पृ० १६--हींढत-(हंडत) धूमते हुए । वाद्-व्यथ । वाहित 
(बाहित ) (बोहित )-वडी नौका | त्यों यह दुलेभ देह 
बनारसि ( त्यों नरदेह दुलंभ दनारसि )। 

पृ० २१-पूजु ( पुज्ञहि )-पूजी । गुरु नमहु (गुरु नमदहि)। 
बंखानहु ( वस्ानद्दि ) ।चहहु ( चद्दद्दि )-चाइते हो। श्राप्रे-आ्राप्त 
करवाती है । नित देद ( नरदेह )। 

पृ० २२--रूंड पति-अपडी स्त्री से विरक्ति रखने बाला पति | 
सो सव ( ते सब )। हु 

पू० २३--मुरनि- नेन--दैवांगनाओं की आंखों से-। करहि 
( कर॑त )-करते हैं । ४ 








ध्ातल आरा: आय) 





झा 0०००, 


टिप्पणियां ४] 


धान थी. आम #|ा 63९22९८//2९ ,/व०पर'-मि। 60: किक, #वि+वीपे। भरकम #7ि. पहि 2म.७ का हि 20१०७ +० एम, का. ७क. 2९ /७ ८2५ ७१५ /१५०७काि ##,३०३,/११९ #। # 





१० २४--सुखकारन ( सुख कामिनि ) | पीके-प्रियजन के | 
पृ० २४-बूम--सममते । 

पृ० २६--ग़ुण रु औगुण नहिं जानदि ( गुक गुण अगुण न 
 ज्ञानहिं )। श्रवेवहिं--जानते | अमृतकहं ,(अमृत कु-अमृत को | 
नीरकहं ( नीरऊुं )-जल को । मित्रकहं ( मित्रकुं )-मित्र को । 


पृ० २७--कहिं. (कु )-को | तुल्नहि-सममते हैं । भुल्नहि- 
भूक्ते हैं । अपत-निलेज । रोहण शिवर-एक पर्वत जिसभ॑ रन 


उपन्न होते हैं. । 


पृ० २८--गुणमंदिर ( गुणमंद्धित )-गुर्णों के स्थान | शुचि- 
पवित्र | जंगम-चलता हुआ। तीरथ-संधर से तरने का उपाय | 
गुणरास ( गुणरासि ॥ 


पृ० २६--जंप्रन-बोलना,कद्द ना | पयार-पयाक्ष खाखला पृत्ता | 
खान ( ख्ानि ) | आंत्ी-सखी | 

पृ० ३०--ज्ञेखिए ( पेखिए) | अरबिन्द-कमत्ञ | सूर- सूरज | 
अर थवत-आंथना । 

पृ० ३१--काज्कूद-जहर | जीवन ( जीवत ) बाढत रखांस- 
अज़ीण बढते हुए । वित्तद्या ( चित्तदयात्ष )। तिनके रुख-उनके 
त्षिए | 
पृ० १९-आराम-बाग | मीत-मित्र!| तोय-ज्ष | रवि-सूरज | 
विचक्षण-विवेकी | ह ह 


विकरिन.2 व्यय. हवन हि: छष #त. 


[६ वनारसीबितात 


१०३३-कुरंग-दरिण । ब्याज्र-सांप | पियूष-अमृत | अहिफन- 
सांप का फण। सत्यवादी के दरस ते ( सत्यवादी द्रशन तें ) | 

पृ० १४-बिसरे (विस्तरें )-फेले । 

पु० ३९--गोपदि ( गोपें )-छिपाना। विज्ोपहि, ( विज्ञोपे ) 
नाश करना । लोरहि-ल्िपटना । उपाध-माग़े । 

पु० ३६-सल्लान-मैत्ा । दलमल्द्दि ( दलमले ) बोरे-डुबोवे । 


पृ० ३७--भालै--भन्ति भांति देखना | खंडमित-टुकडे जितना। 
किलसे -कल्लेश को आप्त करवाना | तमथूल-सोटा शरीर । 

पृ० ३८--समतृज्ञ-समान | गयन्द-गजेन्द्र | अधायवेको-सतुष्ट 
फरनेको । नीतनयनीरज-नीति और न्याय रूपी कप्तल | 

पृ० ३६--वालहित-बचपन द। मित्र । विज्ञासवन-क्रीडाक्षेत्र | 
दुरित-पाप | कन्नहइनिकेत-कल्ञह का घर। गवेषी-खोजनेयांज्षा । 
याद्दी-याकी । 

पृ० ४०--मनहु- मानों । असित-काज्ा | दवदान-अग्नि के 
देने के समान | तिद्दि ( तहं)-उसको | 

पृ० ४१--यश- ( जश )। दुरबेन-खोदे चचन। समुच्चरन 
( समुधरन )-बोजनना | आवरहि-हकता है। नाग-हाथी । बिहंडदि- 
तोढता है। धूपमहँ ( धूपगह )-गर्मी में | गोप-हकना | 

“”.. पृु० ४२--सरिता-नदी | गुणग्राम-गुणों का समह | बधबुद्धि- 


"हिंसा का आव । पटंतर-समान | सवज्ञ किशोर-सम्यमन्दष्टि । वेद 
शास्त्र । 


ही-न्‍१०३६९०३०६-३६ 5 











टिपणियां ७ ] 


सिम  लपकपमज न कक मल अनिल इनकम कशकलनलय शक +कबतनउकर कट 


१० ४३-भीर--भीड | मारतंग-हाथी । नीत-नीति । 





१० ४४--कुशल्-पुण्य । जतन को-(जनन कहेँ)-उत्पन्न करने 
के लिए | शमवारिज्ञ-शांति रूपी कम । उपाय ( उपाउ ) | बंचहि.. 
ठगता है । 

प० ४४--एम-इसतरह । मुगध-भोत्ा । 

पु० ४६--पंथगाहे-रास्ता पकड़ा है । विराम-विश्राम | 
अनारज-अनाये निकुष्ट। धाराधर-बादल । कु भनंद-अगस्त्य 
ऋषि ज्ञो सारे समुद्र को पीगया था। जनन को-उलत्ति के 
लिए | अराशि-वांस । दारु-लकडी । भूरुद-इत्त । कंद-मूल | 
निशिमणि-चांदू । कत्माप-समूह । गयन्द-हाथी । कैलिभौन- 
कीडागृद । याहू ( याह्दी )| विपाक-फ | 

पु० ४७--हुरित अंबर-पापकूपी आकाश | गति धारहि-गति; 
धारण करता है। विधारह्दि-फैज्ञाना बिखेरना | फल्ंग-अग्निकण | 

कोटहि ( कह ) निक्ाज्ञती है. । बाई ( बहू ) बढ़ता है । 
उज्महि-जलाता है. ! केंवरा इस पद्म का बनाने वाला 
कु वरपाल कवि | औ ( अरु )-और | मोष-मो | स्ववश ( वश्य )- 
अधीन | सबे ( बसे )-निधान-खजाना । 

पु० ४प--बरु-शष्ठ | अह्िवदुन-सांपकासु ह। परजारहिं-जतः 
देना | दारहिं-चीरडालना । गदृहि-भहण करते हैँ | चितवातुल- 
पागल, उन्मत्त | कृषिकार-किसान । भाने-नष्ट करता ह्टै। 

१० ४६--घरु-चाहे। सज्जन कक्ञा-सब्जनता के काये | सूजी 


िशिषिनिक किक कम नक कक के 3 ५ 2 2...20233/232%%%04 «७ +# का. ााचलनननबबई 








[८ वनारसीवित्ञास 








, काम. थानों कमा... आधा कारन... विन... अशनननन-+.. सिननरनीननीयननननन+ मरनस्‍िनल+-+++>-नतनपश * 
(2 फ- पर इनरफतीच८यघ9> गति री की बी जीनी सनी परी री यरीपरीपरपकमपरान पर निकारी कान आनमहग किन पिनक नढि' 








( सूजि )-सूजकर । जंपहि-कहता है | सलहन-राघा, प्रशंसा । 
विहंडहि-छोढता है । मंडहि-मांडता है । 

१० ५०--उमाहै-उत्साह करते हैँ। सुधी विन ( सुधी बन ) 
अच्छी बुद्धि के बिचा । 

पु० ५१--तोष-संवोष । वारहि-नष्ट करता हे । 

पु० १९--दुरदू- हाथी । मूलजग-मृत्षस्थान | घुसंग-अच्छडा 
मागे। उरग-सांप | मुद्रा करे-वंद करते हैं। करन छुभट- 
इन्द्रिय रूपी योद्धा । 

पृ० १३--विभोको-बिभव का । बूढे है-बोलते हैं। काठी-वष्ट | 

पृ० ४४--करोरी-तहवीलदार, -करोढर्पात, रोकढिया | घोरी- 
अगुआ । अधोरी-घृणित-भच्ष्याभक््य का विचार न करने वाला । 

पु० ५४- घूम-घूमना । तिसना दृव-ठृष्णा की आग । धूम की 
भाई-धुबां की सलिनता पोषित (पोषति) पोषण करती है । तांई- 
समान | सांई-स्वामी-पति । नरबे-राजा । जोबे-देखे । निशाचर- 
चोर | हृगझओोट-छिपऋर | ढोवे-लेजाते हेँ। जक्ष-यक्ष दामधनी- 
पेसे का मालिक | 

१० ५६--कमल्ा-लक्ष्मी | कंज-कम्रत। चरन-चारित्र । 

पृ० ४७--अनघ-पापरहित) सोपान-सीढी । घुप्तहि-सुपात्र । 
इलमलद्दि-नष्ट करता है! गंजहि-दु.ख देता है। निरादर करता है | 

पु० £६--रमा-जक्ष्मी । चश्चे ( अरचे )-स्पर्श करता है । 
मिताई-मिन्रता | परचे-परिचय | 


हा पिया पिन री नी पक स्‍तर पार पर कर पा. जनम रन पजर पेन पिआामन++ मान एक एप पिन. पक पर पेकआ..ल्‍पवा सह सक पिल्‍कर दर २० फेक कत. पक या. यान तमरयदरी पानी ये पक. मजा आर पारित केटटपिजन पक ओध्षिक, 





टिपणशियां - हू ] 


पर 








१० ४६--सप्तखेत-धन खरचने के सात क्षेत्र | वच्नधर-इन्द्र 
सन्मथ-काम । दवज्वाज़्माल-अप्नि की ज्वाला का समूह। सगहरन- 
परिग्रह का हरण करने के लिए। संवमसुपुज (संतमसपुंज)-अन्घ- 
कारका समूह । लब्धि-अपने स्वरूप की प्राप्ति ! विवुधि-विद्वान | 
मदल-कासवासना । 


प० ६०--गीरबाण-देव। भो-भच । दूध आग-बनकी झग्नि | 
परीसे-बरसे | खीसे-नष्ट हो। कुल्ञाचल्न-द्विमवान भ्रादि कुल पर्षेत | 

पु० ६१--पेड-तना । 'भ्रुव-निश्चल्ष । प्रदाल-कोंपल । हुव- 
होती है। परतीत-श्रद्धा 


१० 8२--अज्ञख-परमात्मा । चेरी-चेल्ी | करणमृग-इन्द्रियहुप 
हिरण। वागुरा-ल्गाम । 

पु० ३३--गदा-एक हथियार जिसमें सिरे पर एक छट्ट, 
रहता है। पौढी-पौही हुई, पी हुई। तरी-नौका | पेशरी-खचर | 
विज्ञायत की-दूसरे देश की | जोबना-देखना | 


१० ६४--धूर-धूल । जुर-बुकर । जुरांकुश-चुखार को दूर 
करनेवाती एक औषधि। अक्षगज-इन्द्रियहूपी हाथी | ल्ोहफंद- 
लोहे का जात । दाग-चिन्ह। भयंजन ( भवर्भजन )-भय को दूर 
करनेबाले। समीर-हवा । दिवाकर-सुरज । दृवपबक-बनकी आग | 


पु० ६४--यश ( गुन )-क्ोति । समाज-बेमव । रजकोष-मिट्ट 
का ढेर। सोष-सोत्ष । 


+२3०-8०-4०-. ७-३७. ७५० ६०के ७७० तीन: पक कहर पर फरहपर आर ि#न्‍से पाठ पेन पाकर घन्‍ सर ७०३४० ९# २.#" जहर कह" जहर कन्पिल्‍नककी, 





[ १० वनारसीविज्ञास 





पृ०६६--सो-इसी तरह। उपसरपन-पूजा | सुपत्तहि-सुपात्रोंको 
परमानहि ( परमागम)-शास्त्र । प्रभु जे-अनुभव करता है. । 

पु० ६७--मुपात्रहिं (सुपत्तह)-अच्छे पात्रों को । कुशल्न-पुर्य 

पु० ६८--कटक-कढा। कर-हाथ | करन-इंद्रिय। बहोरके- 
इकट्ठाकर, लौटाकर । 

१० ६६--सीरो-शीवल | जोय-देख | अन्तर विपक्ष-भीतरी 
शत्रु काम क्रोधादि । विज्ञक्ष-क्ग्जित । अक्षकदंब-इन्द्रियों का 
समूह | बम्ब-रणभेरी | 

पृ० ७०--पद्‌ ( पट्ट )। बादीसद्भंज़न ९ वाद्मिद्संजन )- 
वबादियों के अभिमान को दूर करने वाला | बिजयसेन (विज्यमिह) 
हें सुपुरुष (होहिं सुरुख) (होंदि सुद्ी )। 

ज्ञान वापनी-- 

पु० ७२--शब्द्‌ ( शबद्‌ )-ध्वनि। विशद्‌ ( बिहद्‌ )-निर्म्र ! 
शुद्धता स्वभाव लये-शुद्धस्वरूप की अपेक्षा । राय-राजा। चिदानंद्‌- 
आत्मा | विभाव-विकार । ले ( ये )-ज्षेकर । त्रिगुण-तीनरूप । 
नरक्ञोक-दुनियां में | अनक्षर अम्र-अनक्षरात्मक । पिण्ड-शरीर | 
सेन में बतायो हे-अनक्षरात्मक श्रुव का उदाहरण संकेत है। 
बावन वरण-अज्तरात्मकभु त ज्ञान ४२ अत्तरों द्वारा प्रकट 
होता है | संनिपात-संयोग अथोत्‌ ५९ बर्णों के संयोग से बनने 
वाल्ले असंख्यात संयोगी अच्र होते हैँ । तिन में ( तामें )-उनमें । 
महामंत्र गायत्री-णमो अरिहंताएं आदि अपराजित मंत्र । 


टिप्पणियां ११ ] 


अखिव्टीधन्‍रय । 





१० ७३--सारी-चौपड़ खेलने की गोटी । अमृल् चूल-पर 
से माथे तक । मू्रस-प्रधान रस । गुणरूप ( गुरुरूप )- 
गुणात्मक | मुहातसा-अच्छा लगने वालां। जातमा-व्यक्तिरृप | 
घुन्धवाउ-पागज्पन । रुखिया-द्प करनेवाज्ञा या उस ओर 
भुकने वाला ।घुल्चिया-फोंका हुआ। अरण-बोंस | 


१० ७४--निदान-आगामी भोगों की बांछा | आनमान-पर 
पदाथे का आदर। करसं-खेंचता है। राते-आसक्क होता है। 
सुक्षिति-अच्छी भूमि। अरस-जिसमें रस नहीं है. | रसन-जीम । 
तुलें-लिए । गुनकसिया-गुणों का धात करने बाला । पसिया-स्पश 
करने वाला | परस-स्पश | दूस-दशा । अद्वावीस लवधि-अट्ठाईस 
मूलगुण !_अगम की-जिसका पाना मुश्किल है। छुग्म-सरत्त । 


पु० ७४--अम्रीकु ढ पिंड-अमृत का कुड अथवा अस्त का 
पिंड। दीखे ( देखे )-देखता है। कर-दहाथ । नृपह्ुत्रद्मांइ-गजा 
की छत्र छाया | प्रामवास ( नेसवास )-प्राम में रहना । मंगल 
प्रचंड-तेज चलने वाला द्वाथी अथवा घोड़ा । खर-गधा । ऐसी 
(ऐसो)-इस प्रकार । तासों ऐसी (वाको बंसो) | गरवाई-बढप्पन | 
पिहुलाई-अभुता | सघनाई-सघनता । नागर-चतुर, शिष्ट या 
नगरवासी 


पु० ५६--अनेरो-टेढा, खराब, तिकम्मा | गहूरी-अभिमानी | 
सरजोर-बल्वान, जबदेस्त । बढेनादिं मरजाद (घढें न मरयाद 
कछ्ू ) | फैज्की-फेलने की । चित्रावेल-एक प्रकार की लता जो 





वनारसीबिलास 


॑जक+ अमा... कक / ककमाक0७ मा, 


की >जह* पाप पेलरमपेल्‍रनेक. मनर सिकरीपेत +ित उरी ९ पर सम ३०-३५/रपेरपेनर पड... ९८३ कटी की पिडरी-कडरि री पक पटक फती चिज चेक की पक करी घत, 


न्ष् 


[ 





मन चाहा फल देती हे ! आई ( वाइ )॥ पंचन के परपंच-पांचों 
इन्द्रियों के उत्पात | बल भेदकी-वक्त को भेदन करने वाली | सहज 
स्वभाव मोह सेना वल् भेद की (सहज सुद्दाय मोह सेन भई संदकी) । 


१० ७७-इमग-उत्साह | अनन्द-आनन्द । बढ़े ( छूदे )-आगे है 
बढ जाने पर। दंधी कल्नदाजो पशुचाम ढोल संहिये (पर 
विकास सयो भवद॒धि किये )-वे अपनी कल्लावाजी को वांधते हैं 
और वे पशुके चमडे से मंढे हुए ढोले की तरह है। छते-होने से । 
दीखे (सेवी )-दीगने से । 


१० ७८--कहर-आफत । पिण्ड-एक । विरमंड-सम्पूर्ण 
जगत | आन रे-है भाई आओ । मिल्तत लोक््-लोक इकट्ठे 
हो जाते हैं। एकतान-एकाग्र | स्वैर्मा-सो रहा है। च्वैरहो- 
चूरदा है । 

पृ० ७६३--अगम ज्योति-आत्मम्योत्ति | ढोहै-अवगाहन करे 
डोह्यो-अवगाहत किया । न उघरि है-उद्घधार नहीं होता है ! 
भवतरि है ( गुण भरि है )। तलक-तक । -वनारसीदास-(बना- 
रसी ज्ञाता ) | खलक-दुनियां | तुबक-छोटी तोप । सुबक-हलका। 
छुन्दर-कोमल । कल्चम्पी-यन्त्र को दवाना । जानकी अथीोत 
जाप्गी,वन्द्क या तोप का पल्नोता । रंजक-ताप या बन्दक वी 
प्याल्ञी में रखो जाने वाली तेज और थोड़ी सी वारूद | 


पृ८ ८७- कुमक-सद्दायता । पत्षपात-तरफदारी । न्यानकी- 
जानकी । दरघधवाट-उम्साग, सोदामागं । जो पें-जिसपर 


कस फनी... इन हरी. 0८4 जी ८७0१४४/५4७ ८ #ट३ टी, न्सभाती बन वी कफ नही. बानी. 
७७. 322०५००० ०, उमके &> मनन अपानमाक-मक नरक क-कान-माकान-भ>० का“ ७न.५७७+&+नजनकनन ५७५3 नमन अमनकनन-नका लय. परम न. पान लआमआ 


टिपपणियां १३ ] 


१, शा पक न 





४५० अथवा अर 


अथवा यदि | छुपमना ( सुपुमना )-माढी तन्त्र का.बह महत्त्वपूरं 
भाग जो भेरूदर्ड के भीतर रहता है (59॥9 (००), इस 
नाडे के प्रत्येक बाजू से ३१ नाहियां निऋल्षती हैं नो शरीर फे 
विभिन्नभागों में जाती हैँ | इज्ञा-हठओेग की साधनभूत सुपुम्ना 
के बाई' ओर स्थित स्वतन्त्र नाड़ी मंडक्ष के कन्दों की एंक्ति। 
पिंगज्ञा-हठयोग से सम्बन्धित सुषुमना के दाहिना ओर स्थित 
स्॒तन्त्रनाडी मंडल के कन्दों की पंक्ति। सोज-समझक | पटचक्रबेधी 
गण-शरीर के भीतर कुण्डलिनी के ऊपर के छः घचक्र-आधार, 
स्वाधिप्ठात़, मणिपूरक, अनाहत, विशुद्धि,प्जा | मनमथ (मनमं०)- 
कामदेव | घियागारी-बुद्धिमान । सारछुत-विद्वान । मेधा-बुढ्धि 
दैस-वयस, उम्र | भौरी ( फोरी )-घूमना। 


पृ० ८१-सेना चारि-चतुरज्ग सेना | चौपर पस्तारी है (चौपर 
की सारी है )। धोसा-एक प्रकार का वाजा, नगारा, डका । खसि 
जायगो-खुस जायगा, चला जायगा । मुरे-मुढ्गये । उमाहवी-उत्साह 
पेदा होगया | सरह₹-अवधि, सीमा । चोपकर-उत्साह करके आदि 
छत-आदि से। सुरो-बहादुर । 

पृ० ६२-शाग उठ ( माग कुड )। कुलकोढं-शरीर केः भेद 
का कारणभूत नोकम वर्गणा के भेद को कुछ 'कदते हैँ ७ इन छुक्षों 
की संख्या करोड से कम नहीं होती | मांक-में । विराने-दूसरे के । 
विद्यन-प्रातःकाल | अघर पधर-विना सहारे के। पंच को -भखायो- 
पांचों इन्दियों के बशीमूत | अमधेरो-भ्रम ने घेर'लिया। 
वंच-ठगना । द्रोह-हिंसा | परकी पिंड-पर का सम्रह | 


सच यरयरत.. समीप कम मय + ७ #पडमे # रवि 


सच विन “ नल 





[ १४ वनारसीबितांस 








आई 


पृ ८१-परावत्त पूरणी-केवल्ल पंच परावत्तेन को पूरण 
करने बाला | मृगमद-कस्तूरी | नामि-हिरण की नाभि | उपखानो- 
कद्दावत | तेरे एक दी ( जिन देवके )। भूल्यो ( दूल्यो )-धूमता 
रहा | निगोइ-साधारण वनस्पति एकेन्द्रिय जीव । डांकि आयो- 
एछल आया। अजहूँ तू-अजहूँन)। सीतवदा सीता-ये नदियों 
फे नाम हैं। , । 
पृ० ८४--म-डर ! कालकूट-जहर । कहरी-आपत्ति का फारण ' 
समाधि ( सुभाद /-ध्यान | चददरी-चहल पहल। उद्धि उधान- 
समुद्र का उठाव | उपल-पाषाण | 
पृ० ६१--थल्षका (थत्ञ को)-जमीन पर का | विमल्ल (निर्मल) 
इधिना-अवधि । अखंड ( विमत )-खण्ड रहित । मीढि देखी- 
सोचकर देखने से | मिथ्यादी | अथिर )। नरको वचन ( वचन 
रचन ) | शुद्धारथ ( सिद्धारथ ) | पटंतरो-( आानंतरों )-समान ! 
कंक-क्त्रिय, एक बडा आम । दौस-द्न । 
पृ० ८६--बानारसी संसार निवास (बद्तवानारसी संसार )। 
पामर चरण-द्दीनवर्ण । अगाज-अवक्तव्य । ताहि ( देखे )-उसे । 
घु घची रकव-लाज् घिरमी । रीरी-पीतल । पीरी-पीतल | 
ब्रान-वरण-बानी । सुद्रा को मंडान-वाह्य सेष का धारण करना | 
पृ० ८७--धुन्ध धावहि-अज्ञान की ओर दौढता है । छतो- 
मौजूद | आहि-है | विवसाव-उद्यम | खोर-दूध । ताव-गर्मा | 
गुरुज्ञान ( गुणज्ञान ) । तूही (तूमी) | कहे ( माने )। 
छुखरथ-पुखदायक सवारी | र॑गभूमि-नाव्यूशाला । 


जै 


टिपएयां १४ ] 











१८/९८/५८२२ ७मी७ 7*८०९०३०//१५८+९/०९/+५./०९,#३, 


पृ० ८--पोत-जहाज | तारिवेको ( तरिवेको )। भ्रतल्लंगर- 

शास्ररूपी लंगर | हें कारसी-(कौ डारसी) ढल्ेगा। विजया-भांग | 
कद बन्द-कंदों का समूह | कसूंभो-ल्ञालरंग | मिथ्यासोफो-मिथ्या 
'मत। शीरनी-मिठाई । पंच गोल्क-रकन्ध, अख्ढर, आवास पुलवि 

और शरीर ये बत्तरोत्तर असंख्यातत्ञोक असंख्यात ज्ञोक गुणित 
हैं। इनसे निगोदिया जीवों के शरीरों का परिमाण जाना जाता है। 
अ्म्धार-इकट्ठा, ढेर । 

पु० ६६--थोभ-अन्त । बडे वृन्द-बड़े श्ञोग | खलक-दुनिया । 

पृ८ ६०--कौरपाल-कवि के साथी जो ख्य॑ एक अच्छे कवि थे | 
पीताम्बर-एक सज्जन साधर्मी माई। विजेदशी-आसोज सुदी १० । 
उदुगन-नक्षृत्र । 

चेद निरय पश्चासिका । 

१० ६१--अन्तर-बीच मेँ । गुप्त-नष्ट होगये, लुप | मुवा है- 
मरगया है। उबा-उगा। संढान-संडप | 

पृ० ६२--थिति-स्थिति | जथा-यथाथे। मथा-मथन किया है । 
नभ-आकाश । प्रूव ( घुच )-निश्च | 

पृ० ६३--जुुगम-दो । उगित्ञा-उगत् दिया है। घरनी-पथिवी | 
करण त्रिधा-अधःकरण, अपूवंकरण और अनिवृत्तिकरण । 
श्रेणी धारा-कश्षपक ओेणी और उपश् श्रेणी | दोषमुखी-गिरने 
वानी । मोल मुखी-ऊ चे चढते वाली है। पनविधि (पंचविधि)- 
पांच प्रकार का ! 


साफ २५ 2 | /६ कम अषजीयिज,. भी सयकमपेकीपनीयैरनेन्‍म.. फनी एच रपन्‍न जद न्‍तभ का हज 
-...............0.08 >...>००अर अर करााकाथ७नमाकनाभवकरकानम 


न जक कक 00३... रथ (पेन: कम. एयर, #परे/ममपऐ ये: अफिए/#०ऐ:य>#ममि#विन्‍.#क 22५ #िजपिआरि न 


[ १५ वबनारसीबि 


,#० ८३ भ५ ढक रत बम सती ध मत पेज थी पीप कि डी कक. ह१ ८० ीपरीपरीपीयन्‍री द्रीयराा, ही बमक, 








पृ० ६४--निवेद-बेराग्य ! 

पृ० ६५--सोम-चन्द्रमा । सुरसे-+म स्वत । सीरे-ठंडे। 
अति-सब । रागहष-(राग बेर)। पोरि-द्रवाजा । परद्वार न 
( परदा न )-परदा नहीं है। कपाटिका-क्रिवाड । वदनपीत-पीला 


मुंह । , 

पृ० ६६--मुख जलप-मु ह से बोलना । अहमेवता-अह कार । 
धरित्रीपति-राज। । वेबदा-जानता । मरोरा-परिवतेन । 

पृ० £७--हरि हरि भांति-अहमिन्द्रों की तरद्द । नावज्ञु 
(नाउ न )। 

पृ० ६८--जग ( जिन ) ! 

पृ० &६--सृषामग-भू ठा माय । कद्दात-कट्ठाबत । 

त्रेशठ शलाका पुरुषों की नामावल्ली | 

१० १०१-न्रिप्रष्टि (त्रिविष्टि )। जिन ( जित )। 

पृ० १०२--नेमि नर ( नेमि जिन ) | जोरकर ( रैन दिन १ । 

पृ० १०३--त्रिपिष ( त्रिविद्धि )। 

मार्गणा विधान । 

पूृ० १०४--विभंगा अचधि-भूठा अवधिश्नान । 

पृ० १०५--इनरूप रसंग-इन रूप होकर । नटे-नाटक करता 
है। कारीसादाइ-छाणे की आग की ज्वाजा । वनद्वदाह-वनापि 


को ज्वाला । ३ 
कम अक्ृति विधान | 


पृ० १०८--पुरति-होश | ह 
पृ० १०६--समतूल-बरावर । दुगन्छ्वा-घृणा। पजावा-कुम्हार 
का हाव | 


टिपणियां १७] 


पृ० ११०-आल्ाप ( आताप )। 
प१०११३--नसमाहि ( तसमांहि ) | सेवट-असंप्राप्तसपा- 
भैटेका संहनच । 





पृ० ११४--हरुई-हल्का ! 

पृ० ११४-जब ( ज़र ) | अमेय-अपरिमित ! 

पु० ११६--भात्र महेँ-साथे में । 

पृ० ११७--जुई-जुदी । होगे ( पा )। फल् ( कुछ )| बट- 
सार-लुठेस । ५ 

पृ० ११५६--भोग ( जोग )। चीन ( बीन )। 

पृ० ११६--त्रिक ( प्रिय ) सीन | कहों ( कर ) ( करों /। 

चृ० १२०--पंचसंगात ( पंच दस गांस )। 

, १० १२२-चाक (बाक)।* 

१० १२४-जंपों-कहताहूं । पोत्न-पुत्र । 

पृ० १९४--पटतर-उपमा-समानता । तुसार-वर्फ। टेहि- 
देखकर | धर्वैं-जलाती है। विप्रह-लढाई और शरीर । 

पृ० १२६--नीलिया £ पीकषिया ) एक ऐेग जिससे चीजें पीली 
दिखने लगतो हैं | हेड-नीचा। वीट-इंठल्न । 

प० १२०--देहिं ( देव ) देते हैं। बिन्छु-बिजली। हुस्तर 
( दुत्तर ) जो तेरा नहीं जा सके | सल्॒कंत ( मूकंत )। मुडमाल 
(रुढ भाक्ष )। 

प० ११८--सेये अभु तुमरे पाव (सेवे हुमसे प्रमु पाय ) 








श्द बानरसी विल्ञास 





साधु वंदना 

पृ० १ २६--सुमरि आन-स्मरण में लञाकर | अवशिक ( आव- 
सिक ) ( आवश्यक )-अवश्य करने योग्य | तिथि असन-खडे २ 
भोजन करना । लघु असन-हलका भोजन करना । मोच-छोडना । 
संतत-सदा | सृषा-क्ूठ | रती-रत्ती मर भी । घटित-घढा हुआ | 
अघट-नहीं घढा हुआ । फरसे-स्पशे करे | मदन-काम | आठुक- 
जीव रहित। तपीश ( तपसी ) तपस्वियों के ईश | 

पृ० १३०--निरवद्य-पाप रहित । संचार ( साचार ) (आचार) 
जाकर | सुरति-सावधानता। अचेत-जोव रहित । पूरव-कारण । 
आदान-लेना | नवदुवार- दो आंख, दो कान, दो नाक के छिद्र 
एक मुह, गुदा और 'लिंगेन्रिय ये मल बहने के नो द्वार हैं। 
निद्दार-ठट्टी, पेशाब आदि | हरुष-हलका । सभार-भारी | तपत- 
गर्स | तुसार-ठंडा | भीत-दिवात् | सुणे ( गिये )। 

पृ० १११--ठाने-करे। प्राछ्षित्त-प्रायश्चित्त। सज्काउ-त्वाध्याय | 
निद्राल-निद्रा छेने वाले। वंचे-दरण करता है। मोष-मोत्ष। 
थिति-खंडे होकर |-मत्न पात-मत्र का गिरना । 

मोत्ष पेडी 

१० १३२--इक्क-एक । रुचिवंतनो-श्रद्धानवाला शिष्य | 
- अक्खे-कहता है । मल्ल-बहादुर | तुसाढी-तुम्हारी | अल्ल-पहि- 
चान। छयल्ता-छैला । रोचकशिक्खनो-रुचिवाला-शिष्य | 
मयत्ता-मेला | इसदा-इसका। हिपदु-दों पर वाला। वयल्ला- 


मममके. 


टिपणियां १६ | 


वेत्र। जिसदौ-जिसका | गिरंदां-गद। पेच-सरोड। कल्मत्ता- 
विकत्ष । महमल्ता-गढबढ, अस्पष्ट । जिन्दादी-जिनकी। भूमितौ- 
हृदय रूपी भूमिको । कुदल्ला-कुदाज्ो । तिन्हादा-उत्तका | वहज- 
रहाव | दुदल्ला-दुविधा सहित | जिन्हा-जिन्होंने । करमंदा-कर्म 
का दुविधा-दो प्रकार का। मन्ना-अच्छा ज्ञगता है। झाक ममल्ला- 
अच्छा दिखने वाला। अहल्ला-व्यथे। बंक कटाद्दे लोयना-वांके 
ओर कढाज्ञ सहित आंखों से । मल्ला-माना । कोंदो दल्ला 
फोदों को दक्नने के बराघर है। 
पृ० १३३--पाहन-पत्थर। चहल्ला-चहल् पहल, भीतर में 
पहुँचना, फीचड। बहल्ता-बह जाता है। अप्पा-अपने को | 
उल्ला-ठग लिया है | गिरि-पहाद्ध । पया-पढ्गया। किणि-किससे 
दित्ता-द्या। टल्ता-धक्का। तर्त्ञा-ताल्लुक संघंध। गरब 
गदल्‍्ला-अभिमान से पागल | खम्-बोक उठाने बाला । पल्ला-बल्ली 
जो छुप्पर के नीचे लगाई जाती है । घल्ला-नष्ट किया | घुपनेदा-सुपते 
का | विज्वल्ला-विज्ञाला। अंबर-फपढा। मल्ता-मलौन | गल्ला- 
गष्प हंकता । अ्रसोच-लिदान । सल्त्ञा-माया, मिथ्यात्त और 
निदान ये तीन शल्य | जियदा-जीवको | उरमक्त्ा-उक्षमा दिया। 
रुधिरादी पुट्सौ-खुन के सपक से। रुधिरानज्र-खून का नात्ा। 
होंदी-होगी। करदा-करोगे। कल्ज्ञा-गप्प-गरदन । करंदा-करता 
हुआ। 
१० १३४--सिदृमफरा-एक प,्ंछर की सकडी। टांका महत्ा- 
यम रिया ! यम ठत्ता-ठाता होकर धरथवा ठाती बात है। 
(52 


[२० बनारसी विज्ञास 











गल्ला-अनाज दंगेरह । मोगर मल्ला-थोथा मोटा । वेसंधा-बालक। 
बल्ला-बडा । करला-काज्ा | नवल्ता-नया | फल्ला-फलवात्ा। 
जज्ला-जलने वाला । दुधा-दो प्रकार का | तुलदा-ताकडी | पह्चा- . 
पात़्ढा | हरु वेतन-हलका। गुरु केतसौ-भारी | थल्ला-स्थान । 
दुह दिशिनो-दोनों ओर। चल्ला-चलायमान | जटल्ला-जटा | 
परेर-प्रेरणा पाये हुए | गल्ता-गल्नना । 

पृ० १३४०--चहुघा-पानी, आग, पवन और पृथ्वी में। 
रल्शा-मिला हुआ है। मद मतवबल्ला-मदोनन्‍्मत्त | दुहुँवादी- 
दोनों से। समल्ला-मल सहित। खलफल्ला-आकुल्ञता। हल 
भल्ला-समान भाव अथवा आइुलता दायक सममना। विथार- 
विस्तार | बुल्ज्ञा-बुदवुदा | खल्ता ( थल्ला ), थ्ष । अरहटद्दार- 
अरहट के घडों की माता । भल्ता-अच्छा । बतनु-घर । तुसाडा- 
तुम्हारा | रोह रुहल्ला-धक्का देना। दुरहत्ा-दुलेम | चरल्ता- 
चहल पहल | सहल्ता-सरत्त | 

पृ० १३६--प्रवह््ञा-जबदेस्त । विहंडिया-नाश कर दिया। 
दुहल्ला-तीत्रदुख । आगि अंगारे-अग्नि के अंगारे में | तूल् पहल्ला- 
रुई का ढेर । सतगुरुदी-सतगुरु की.। देशना-उपदेश | आखवदी- 
आख़व की। वाहि-रोकना । लड़ी-पप्त करली | मोलदी-मोक्षकी। 


कर्म छत्तीसी 
पृ० १३६--परमससमाधिगत-परम ध्यान को प्राप्त। अगम- 
जहां जा नहीं सकते | अज्ञोकनम-अलोकाकांश । 





टिपणियां ११ | 
पृ० १३७--अभिधान-नाम। चरप्र हृष्टि-अंतिम दृष्टि अथोत्‌ 
ज्ञान | जगप-चलने वाज्ा | सीरो-ठंहा ।'हज्कका ( हरुवा )। 
पृ० १३८-दुर-दूर होती है । अकर-अकढ़ | रोंस-रविश | 
१० १११--सात्-शिर । बकर कूद्सी-बकरी के कूदने की 
तरह। मकर चाँदनी-कमर राशि की चांदनी । बृढ़े-डूबता है। 


भेक-मठक | 
ध्यान पत्तीसी 


पृ० १४०--निरुपाधि-रागह् प रहित । प्रह्म समाधि-शुद्धात्मा 
का ध्यान | 

पृ० १४१--अक्षख-अहृश्य । जोवे-देखे । विलेच्छ-पिज्ञय 
फरके | 

१० १४२--अप्रशोच-निदान | हिये-हृद्य में । १रंगिनी-नदी 
सयाने-हे सममदार। , ! 

१० १४३--छीजा-नष्ठ हुआ । वेरा-समय। निवेरा-नाश ! 
विपरीत ( विपरति )-व्युपरति-क्रिया-निवृत्ति नाथ को चौथा 
शुक्त ध्यान | 











अध्यात्म बत्तीसी 


१० १४४--करपे-खींचता है । धाय-दौड कर | पावक्ष-आाग। 
थें (याते ) भावकम-रागहेष। द्रृव्य-ब्लोनावरणशादि कर्मों का 
संघ | नो कम-शरीरादि। तन-शरीर | फारमन-कार्माण | 
पत्ती-भूसा, तुप । 
फअ+-+ न ््-०००००००००००००००८०००-०००००००-७- 


२२ | बनारसीबविज्ञास 





पृ० १४४--ढरनि-उतार चढाव, घुम | 


पृ० १४६- वाद-मार्ग । उद्धांट-खुलना । 


ज्ञान पच्चीसी 
पृ० १४७--पवन ( पौन ) हवा | 


वृ० १४८--दाव-जंगत्न । उपाव के-उपाय करके | गहि आने- 
एकड़ता है | साधि-वश में कर के। फेट-सम्भिश्रण | वान- 
बानी वर्ण । पे-पूर्शिमा | अथवा अमावस्वा| सर-सूरज । सोम- 
चंद्रमा | 

पृ० १४६--समोय-मोहित करके । अभ्यासते ( परगालतें )। 
चुद्धावत ( छुडावत ) 

शिव पच्चीसी 

पृ० १५०--जह ( जहं ) जहां | गह ( गच ) प्रहण करने 
से । कुण्डज्ञी-सुषुमना नाढी के मूलाधार के निकट की एक कल्पित 
वस्तु । जलद्दरी-शिव मृत्ति के ऊपर टांगने का मिट्टी का सह्िद्र 
जल घट | उपाधि-परिम्रह, वाह्मवस्तु, धर्म चिन्तना | अव्यापि- 
सब जगह नहीं रहने वाले | निगु ण॒ रूप-सत्व रजतम से परे | 
सगुण स्वरूप-सत्वादि गुण सहित। अगम-ज्ञान का “अविषय 
अथवा हहूँच के परे । पागे-सना हुआ । सिंगी-सींग का बाजा | , 
वाधम्बर-वाध का चम्॒ढा। सरवंगो-सवोग। 


टिपणियां २३) 


पृ० १४१-पोह-पोषण करते हूँ। विभूति-राख | पंच'बदन- 
पांच मुह। अघक हरण-अघक का नाश करने वात्ते। त्रिपुर 
हरण-च्रिपुर नाम के राज्षस- का.नाश करने थाल्ते। काम दहल- 
काम को जलाने वाले। कपूर गौर-कपूर के समान गौर वर्ण! 
जिद ठाव-जिस स्थान में | 
| भव सिन्धु चतुर्दशी 
१० ११५२--सम्यकबंत को ( सम्रकितवंत ) | माल्ीमतहं 
( सालमतहां ) ( साज्षिम तहां )। धुनि-शब्द । 
१० १५३--बादबान-पात्ञ | चहै (बहै)। गेहे (कटे) (घंटे) । 
अध्यातम फाग 
१० १४२ अघट-लजो सिल नहीं सकता। 
पु० १५४--विषम-रागढे पात्मक । सयसंत-सदवात्ा | वाउ- 
हवा | छुदर-फोहरा । द्वशशि-दिन का चांद | सुरति-अलुभव ! 
हिमगिर-हिसालय | वितथ-सू ठ । 

._१० १५४--चाचरि-नौकरानी । धसात्ष-कत्षाबाजी, होली का 
गीत | सीयल्ञो-5ंडा । निरनीति-निणंय । सुरत-अनुभव । तताई- 
तातापन | भस्मल्लेख-धूत्र की रेखा । 

सोलह तिथि न 
१० १५६--रसपागी-अनुभव से भरी हुई। हुहँधी (दहूंघा ) 
दोनों प्रकार की । त्रिधा-तीन प्रकार । चारे-चार । 


१० १५७--सिद्ठि (रिद्धि)-अणिमा, महिसा, गरिमा, लिमा 
आाप्ति, प्राकाम्य, ऐशित्व और वरशित्व ये श्राठ सिद्धियां हैं। 
नि 720000:2::5:. 





[२४ बनारसीविलास 





तावे-तपावे । काठिया-राहगीरों को लूटने वाले । 
तेरह काठिया 
१० १५७--चटपोरें-लूटे । दाट-रास्ता । 
पृ० १४८--कोह-करीध | विवसाव-उयम | आपन ( आपा )- 
खुदको | घटपार-छुटेरा । 
पु० ११६--दुरमति-खोटी बुद्धि | 
अध्यातम गीत 
पु० १६० जउ-जो | उनहार-सूरत, समानता | पटतर-समान | 
भोर-प्रातःकाल | गजरगजन-हाथी को ढराने वाला । 
पंच पद विधान 
९० १६२--पंचकरन-पांचइन्द्रिय। उ्राकथ ( उबमाय ) 
उपाध्याय | 
पु० १६१--जस-जिसे | गौन-गौण अमुख्य। 
सुमति के देव्यशेत्तरशतनाम 
पु० १६४--शोभावती ( सोभागवत्ती ) | 
शारदाएक 
पु० १६४--दुमैंहरा-खोटी नीति को हरण करने थाली | 
पृ० १६६- छुधाताप ( मुधाताप )। अखेइब्शाखा-आत्मइत्त 
की डाली | समाधान रूप-समस्याओं का हल करने वाली | 


टिपणियां - २५ ] 








मी 





पु० १६७--निरंका-कलंक रहित ! मुदेका-प्रश्ष रहने पात्ती । 
निरस्ता निदानी-निदान ( भोगों फी बांछा ) नष्ट करने वाल्ली | 
नवदुगों विधान 
१० १६८--गिरिभ्र ग-पहाड का शिक्षर। रासभ-गघा। 
पृ० १६६--महिषामुर-एक राक्षत। अपरत्ती-अविवाहित | 
पृ० १७०--अलुकेंपा-दया । राधे-भगवान की भावना 


करती हे। 
रु नाम निर्णय विधान 
, पृ८ १०१--अज्ञख-जिसे देख नहीं .सकते। झज्ोक-सूठा । 
पृ० १७२-देभ-पाखण्ड । तिहुंपन-बाल्य यौवन, और 
वृद्धावस्था | तुब-सुम्हारे । 

१० १७३-परुणी-आंखों के आगे के बाल | गोलक-आंख का 
भोला । गंढ-गा्तों के ऊपर का हिस्सा | श्रोन-कान। अधर-नीचे 
का ओठ | दशन-दांत | घटिका-गुट्टी, गक्ते को हड्डी ।चिघुक-ठोडी । 

नवरत्न कषित्त 

१० १७३--मित्त-म्रिन्न | किब्मय-कीजिए | 

पृ० १७४०-द्िज्जय-दीजिए । आनिय-लाइये । लघुपत- 
छोटापन। असन क्ालची-भोजन का शोलुपी ॥ गद-रोग । तकि- 
ताक कर || चुकि-चूफने बांत्। अखे-नहीं नष्ट झेने धाी। 
ससकफती ( ससकरी )। ह 

पृ० १०४०- चर-गुप्तच₹। विद्ोरे-मष्ट करे। पिशुन्त कमें- 
चुगज्ी । गिलले-नष्ट करे । धर्म ( कम ) | 





ही आह न 


[२६ बनारसीबविलास 


१० १७६--लवन-लावण्य | घन-अत्यंत । 
... झष्टपकार जिन पूजन 
पृ० १७१--पृष्पशर-पुष्प रूपी तीर । 
दशदान विधान 


- -पू० १७७-भाषित रूप-भावमय । वहछुरा-गायका वहुडा। 
पृ० १७८०“पयाता-प्रयाण । 


दशबोल 

० १७६ छह दोहे के पहले “जिन घर? शीर्षक के नीचे 

यह दोहा और है । छटा दोहा “आगम” शीषक में सममनां 
चाहिए । है 
जिन धर्म 


जो पर तजि आपा भजै, जहां सुदिष्टि ज्ुत कर्म । 
अशरण रूप अजोग पथ, सो कहिए जिनधम।) 


पहेली 
१० १८०--कत-पति। अवाची-अवेक्तव्य | साज-दुख । 
. १० १८१--विरवा-वृत्त | उल्नहझो-लद्द॒लद्दा रहा है| मकुलाई- 
दिलता है । उद्धव ( भ्भत ) | दौं-में । चेरी-दासी। , 
प्रभोत्तर दोहा 
'- पुृ० ६८२-खौजत ( सोधत ) दुरिके-्दूररहकर । हुराब- 
छिपांव | पाहन-पाषाण ।' णा 


१ ७#००ि.पिजमरंबररि रकम व, 





८ 


टिपणियां  *रे७] 








प्रशनोच्तर माला- 
पृ० १८२--एम्-ऐसे | जेम-जेसे | 
१० १८२--तित्तित्ता-सहनशीज्ञता । मधुप-उद्धव' ।'हरिपाहि- 
रिकेपास | , 
पृ० १८५४--अद्दोभी-क्षोभरदित | 
अवस्थाश्क 
पृ० १६४०-लंगम ( संजम )-चल्षने वाला । 
'. - दृशनाएक 
पृ० १८६-पाधदी-पादरी | दरवेश-संन्यासी | पूर्ष कृत फंत् 
उदय ( पूंदे कंत कम सदय )।.... 
च्‌ 


* पृ १०७--मुजभार-बाहुबत् बातों | . 
अजितनाथजी के छंद 

- पृ० १५७-गोयम-गोतम | गणहर-गणपर | पय-पद !' 

पृ० १८८०-रायाज्ी-राजाजी । महियत्-महान। राजि६- 
शोमित होते हैं । घय-शत्त। शिषैराबाद ( रिखैराबाद )| 

शांतिनाथनिनसुति . , 

पृ० १६५६-बल्तम-पति। सहिए-सखी | कल्धौत-सुबर्ण । 
नागरि-श्रेष्ठ 

१० १६००-जितमार-काम देव को जीतने वाले । मदन महेश- 
क्रम को वश में करने वाले । करवाल-तल्वार+ मराक्ध॑-इंस । 








'[ रफ८ बानरसीबिलास 


१० १६१०-हीर--हीरा । 
नवसेना विधान 
१० १६१--पत्ति-पयादा | कटक-छात्रनी | 
प१ृ० १६२--चमूदल्न-फौज । पायक-पयादे । 
कलशों का आपानुवाद 
पृ० १६४--पंचम गति-सोक्ष ! 
फुटकर कविता 
पृ० १६९७--परधीन ( १रधान )। डोबनारसी-डुब्ोने वाला | 
_ 2 १६८--दारी-व्यभिचारणी स्त्री अशरमी-निलेज्न । पील 
'करें-पाखंड करते हैं। बाब-हवा | । 
पृ० १९६ --हमाल-हमाली करने बात्ा ।.नवनिज्ञ -मक्खन | 
पृ० २००--उमही है-रहती है; ! 
पृ० २०१--शीसगर-शस्त्र बनाने वाला | काद्दी-जाति विशेष । 
क्ुदीगर-कपडे पर कुदी करने वाले । वारी-पत्तल बनांने वाला | 
राज-कारीगर, सकान बनाने वाल । सिकत्ीगर-ओज़ार के धार 
करने वाज्ा | सत्ततुद्ृहि-सडसठ । खिपानहु-क्षय करना । पेडी- 
प्रकृति | 








गोरख नाथ के वचन 

पृ०२०२--भग-योतनिं । 

पृ० २०३--कोमल 'पिण्ड-बच्चा । कठिन पिर््च-जवान । जूना 
'प्रिण्ड-पुराना शरीर 

पेद्य आदि के भेद 

पृ० २०३--स क्रमण-राशिका बदलना | 

पृ० २०४- मुसल्ज्ञा-नमा ज॒पंडने की दूरी | 

पृ० २०४-जेर (जोर ) (चोर )-जो।  ''. ४ 


टिप्पणियाँ का 
व्य््व्््व््श््च्थ्च्थ्््थ्य््य््य्य्य्म्प्न्प्प्स्प्प्प्स्प्स्प्स्प्स्प्ल्ः 
ल्कन्कन्य्कक्कक्पनक न कफर कफ का सफ छक्का का >> ०0ंसंसीशरसी 


पृ० २०६--छुप्य-चांदी और सोने के अतिरिक्त सब कुछ । 
'पुरीस-दट्टी । सरीस-समान । छेरी-बकरी | 


,निमित्त उपादान के दोहे 

पृ० २१९१-हपादान-जो स्वयं कार्य रूप परिणत हो उसे उपा 
दान कारण कहते हैं, जेसे घड़े करा उपादान पट्टी है। 

निम्ित्त-जो स्वय कार्य रूप परिणत न हो किन्तु काये दी 
उत्पत्ति में सहायक हो उसे निमित्त कारण कहते हैं, जेसे घडे की 
“उत्पत्ति में दृष्ड,कुभार, चाक आदि + 

पृ० २२३--पट पेखंन-एक प्रकार का खेल | नाहीं वेज्ा 
( जैसे छेज्ना )। जे - - 

पु० २२५--बसन-कपड़ा । पामी-द्वाथ | चुरेल का पकपान- 
जिससे खूब खाने पर भी भूख न मिटे । खेटकी-शिकारी । 

पृ० २२६--पिह-शरीर । । 

पृ० २२७--रज-मिट्टी । न्यारिया-मिट्टी में से चोँदी सोने को 
शोधने वाल्ञा। भीजे-लबलीन होता है । मनकीजें-मन क्वगा 
देता है। भर गी-भंवरा ।' 


१० २९८--पा-पेर | बात्मम-प्यारे । तुहु तन-तेरा | गागरि- 
घद्ा | अचरा-अ'चला। गौ-गया। फहराय-उढ़कर | पेसिए- 
प्रवेश किया । पेज्षि-पैज़्करके । ढगरिया-गढ़ी | 


पृ २२४--पियरा-पियाका । गरुव-अभिमाना | सचीकन- 
चिकना | जागलि-जागेगी | जनि-मत अघोर-धोर | तोर-तैरा | 
किक हैं। सरवत्-सबकुछ । कोक्ष किरात-भील पगैरद। 


शिक्वार। वनसावज्ञ-पन सें रहने वाला । नचीत-निश्चिन्त | 
नेटकीस-नांटक का पात्र । तोपि- छिपाकर । 
5:-००००००००००००००००००००००००००००००५०.....००................0ह..0हहहतहतह0त. 


१*'एएएए ंंंंऑ इड:डइड:::::2334333:43333:33.43+4:%:9:2क::4% 








2 लीपली- नी पजरपान कप कम. जी पिकी, 
अलल्‍ब्दीषन--पननमननन-भ-भ 


| ३० बनारसीभिलास 
व्स्स््््य्य्य्सय्यस््प्च््स्स्प्स््स्प्म्सि 

पु० २३०--करवत-करोत | पास-नजदीक । पांचठग-पांच 
इन्द्रियां | धौरहर-मकान । वेर-दैर। निकेतन-मकान | कतहु- 
कहीं भी। बाट-मा्गे । 

पृ० २३१--विरचि-उपेज्ञा करके। संभार-छंभात् | निखार- 
हटाना। लगार-जरा सी । छार-राख, मिट्टी | पस्तार-धोकर | 
पाठ को कीशा-रेशम का कीडा । 

पृ० १३२--वलि वल्ि-धलिदहारी | राधारौन-राधा के रमण 
अथीत्‌ परमात्मा। वौनसौ-बमन से | क्ौन-सौंदय । भौन सौं- 
मकान से । आवागौन-आना जाना | बेब-अनुभव करता 

प० २३३--सेव-सभेद | दिति-देत्यों की माता | “निकांछित- 
इच्छा का भाव | वज्लखत-रोता है। दुरयाव-उदार । 

पृ० २३४--चोज-विशेषता | 

पृ० २१५०-परनै-परिचय | भीमकां-हाथी | करपै-खींचे । 


» परमारथ हिंडोलना 
१० २३७ -घटकील-छुद स्थान पर कीलें।, मरुषा-छेद॒दार 
पत्थर जिसमें हिंडोला की रस्सी वांधी। जती है | पाटल्वी-पृटिया | 
कर्म निरोपै-क्रिया को रोकवा है । 


१० २३५--मूल्ैन बेटा जाया: मूल झा कह योग | 
संधो-शद्धोपयोग | उलषफ़- कप व