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Full text of "Manidhari Shri Jinchandra Suri"

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प्रकानक --- 
शंकरदान वुमैराज नाहटा 
५1६, सर्मेनियन स्ट्रीट, 
च्टकत्ता 1 


स॒द्रक :- 
सरावतप्रित्ाद धिह 
न्यू राजस्थान प्रेस, , 
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करकत्ता | 


ध्रीजिनचच्छग्ररि-- 


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मणिधारी 


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(२) 


ल्याय से यह्‌ चरित स्वतन्त्र रूप से प्रकाशित करते हुए हमे हषं 
ोत्ता डे । 

हमे यद्‌ देख कर दुःख दोता ३ किं छोगों मे सादियिकं स्चि 
कावडाही अभाव द! खास कर राजस्थानी ओर जेन 
साहियके प्रति तो हिन्दी भापा-भापियाका स्ख वड़ादी 
विचारगीयदै! यद्रि चह विचार करिया जाय तो प्रमाणित 
दोगा कि ये दोनो साहित्य भारतीय भाषाओं मे सस्छृते को दौड 
कर वाकी किसी भौ भाषा के सादित्य-मडार से टकर ठे सकने 
है पर जेन समाज ओर राजस्थानी ससार अपनी उस 
सादित्य निधि को इस ध्रकार शुलाये चेठा द मानो उससे उसका 
उं सम्बन्ध दी नदीं दे! यदि दम आर भी संङुचित टष्टि से 
बिचार करे तो मालूम दोगा कि, खरतरगच्छ मे दादाजीके 
हजारो भक्त हे! साथ ही दादाजी के माननेवाखों की तादाद 
अन्य रच्छों मे भौ काफी है! भावुक श्रावक दादाजी के मदिर, 
पाटुकाजो कै स्थापनाडि कार्यो मे दिर खोटकर “ खच्च करते दै । 
सुदत्त होकर उनकी सेवा-भावना का ध्रसार होताद्ै! पर 
सवते अधिकं दुःख तो इस वाव का ई कि, हम जिनकी अर्चना, 
सेवा ओर भक्तिभदशैन के ल्यि इतनी धनराशि व्यय करते है 
उनकी तियो का, उनके अप्रतिम चरित्र को जानते कौ ओर 
च्प्टिपात भौ नदीं करते। चहश्नाति की भरणोन्सुखता का ही 
चोततक दै । जागृत जातिया कभी भौ ठेा नदीं कर सकतीं! 
इससे कोई मारा मतछ्व यद नदीं सममे कि हम पूजा-अर्चना 


( ३ ) 


की अवदेटना करने की सिफारिश करते ई पर हमारा नम्र 
निवेदन तो इतना ही हे कि, खोग पूजा कर्ट--दिन दूनी करं पर 
साथद्ी इस वत्तकानानभी प्राप्त करने का प्रयासकरं कि 
हमारे आराध्य देवो ने, हमारे पूल्यवर आचार्ये संसारको जो 
अतुटनीय नान दिया & वह्‌ क्या द-उन्दोने संसार के चयि 
क्या क्या रत्नछोद्‌६। आशा ह समाज हमारे इस निवेदन पर 
गंभीरता स विचार करेगा 

आज वंगा सादित्यः इतनी समृद्धि पर इसीधयि है फि 
घंगाी जाति ने उसको गौरव के साथ देखा हे । अपने टेरक, 
सादित्य-घछ्टा्ज को उसने उ आसन पर वैढाया दहै । उसने 
अपने साहित्य की यित्ति पर अपनी जाति का निर्माणकिया 
दै] पर हमारा समाज सादिय से एक दम उदासीन । वह्‌ 
पृजा करता &, पर यह्‌ नदद जानता कि वद्‌ क्यो ओौर किस 
प्रकार के महान्‌ पुरुप के महान. आदशं कौ सर्चना करता है । 
यद स्थिति दुःखद्‌ है अर उज्ज्वल भविष्य की सूचना नहीं 
देती । दमने इसके पूर्वं जेन साहि के ९० प्रन्थ प्रकाशित 
चिविष्ु। जिनमे दो तो दादाजी आचारी के जीवनचसित्र 
टी द भौर र एेतिद्टासिक जन कान्यां का श्रत्‌ संप्रह दै । यदि 
<न समाज इसको समुचित आद्र के साथ स्वीकार कर छेत्ता 
तो दिन पर दिन इस प्रकारके भ्रन्थों को शीघ्रातिशीत्र प्रकाशित 
करने का प्रयास किया जाता। भास्तीय चिद्धानों नेतो 
दन भन्थो का वहू ही आद्र क्रिया दै! भारतीय पत्रों ने इनकी 


॥ 


वहूत दी प्रशंसा की इ] पूज्य सुनिराज आ्रीखव्धिसुनिजी ने 
युगघ्रथान ऋजिनचच्रचूरि ओर दादा अ्रीलिनछ्शल्चूरि इन 
दोनों भन्थां के आवार पर संस्छन कर्न्यो का † 
द! परहने नाज की ओर ते जला चादिए उत्साह नदीं 


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मिला] र्रिमी च्नमण्ठेबाधिारस्ं मा षट्पु कदाचनकी 





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चारत्र वहु दय सलिप्र प्ल्तादेष्ल 


उस ससय छा अन्य इषक्हासख भी प्रायः अंघचारमय 


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च्यवस्ा => सालवाद इसमे प्रकाशित 
वस्व ल्क का भो सबुव्राद्‌ इसम ब्रकारत 

श इसका इसलिये व्यि भी अधिक ईक 

साथ द्ध इतका नद्‌त्व इउसाचख्चयं भा अयवक दैक 





माचार्यः द्धी यही एकनाल ~ = उपट्व्य ४ 
आचायन्ना का चदय एकेना छति हमं उपर्ञ्य इ । 


प्रति यसि श्रीमजनन्चन्व्लो क ख 
त यन्त श्रद्खुद्कन्ट्‌चन्देजा क सन्ह्‌ 





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छ्लाया ओर भापामुवाद्‌ किया द। इसके स्थि हम उनके 
आभारीदै। 


पूज्य श्री मणिधारीजी का चित्र था पूर्तिं आदिन मिल 
सकने के कारण उनके समाधि-स्थान के चित्र को ही देकर संतोष 
करना पडता दै ! इसकी प्रापि दमे पूज्य शरीजिनहरिसागरसूरीजी 
की कृपा से श्रो केशरीचंदजी वोहरा दि्टीनिवासी दारा हृद 
जिसके च्यि हम येनो ही महानुभावो के आभारी हे । 


इस चरिते का मुख्य आधार जिनपाखोपाध्याय रचित शुर्वा- 
वरी" है । अतः उपाध्यायजी का उपकार तो हम शब्दों हयार 
व्यक्त ही नहीं कर सकते । यह्‌ सूचित करते दमे दं होता दै किं 
इस भ्रन्थरन्न का संपादन पुरातन्त्वाचा्थं श्रीजिनयिजयजी जसे 
सप्रसिद्ध निद्या ने किया दै ओर अव वहं स्िघी जेन 
मन्थमाला' से. प्रकाशित होने जारहा ईै। 


हमने जिस समाधिरथान के चित्र का उर्ङेख उपर किया 
द उसके सम्बन्ध मेँ हम यर्दा यह्‌ सूचित कर देना उचित सम- 
मते ह कि इस स्थान पर श्री मणिधारीजी के देदावसान के वादं 
स्तूप निर्माण हभ था भौर वह्‌ स्तूप श्रीजिनङ्कशरसूरिजी के गुरः 
करिकाल्फेवटी श्रीजिनचन्द्रसूरिजी के समय मे विधमान था । 
इसका प्रमाण ह्मे गुर्वावरी से ही प्राप्त दोतः दै 1 उसमें छिखिा दे ८ 
करि श्रीजिनचन्द्रसूरिजी ने संवत्‌ १३७५ में उसकी दो बार वात्रा 
की थी । इस समय वा प्र चरणपाडुकरा था सूति नदीं द । 


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अन्तिम जेन तीर्थकर श्री महावीर स्वामी एवं महात्मा बुद्ध 
प्रायः समकारीन थे 1 दृदयदीनता एवं दम्भ का विरोध कर 
इन मदान्‌ आत्माओं ने संसारको कार्ण्य का उपदेश दिया 
था । परन्तु बौद्ध धम्मं अव भारतवपं से चिरीन हो चुक्रा दे। 
उसके विहार एवं मट॒ अव बुद्धं शरणं गच्छामि, धम्मं शरणं 
गच्छामि "सधं शरणं गच्छामि के वाक्यों से प्रतिध्वनित नदीं 
होते! जिस धर्म का चक्रवती महाराज अशोक एवं हपंवर्धन 
ने प्रसार किया था उसके भारतीय अचुयायी अव अंगुलियों पर 
गिने जा सकते दै। दस महान्‌ परिवर्तन का कारण क्या 
धार्मिक अलयाचार था क्या पुष्यमित्र ओर शशाक की तट- 
वासने इस ध्म फा नाश कर दिया? भारतीय इतिहासका 
प्र-प्र चिद्या कर करेगा करि नदीं । बौद्ध धरम पर अन्त तक 
भारतीय राजा्ओं की छपा रदी, अन्त तक्र उसके स्थि विद्यसे 
ओर संघारामो फी सृष्टि दती रदी। उसे किसौने नष्ट नदीं 
किया, वह्‌ स्वयं ही नष्ट हो गया । वह्‌ विखासिता, शिथिरता, 
एवं उत्साहदीनता के वोम से दव गया ओौर फिर न उठ सका । 
सहजयान, वज्यान) कुखयान आदि की सृष्टि कर चह केव 


( २ ) 


स्वयं अनाचार-प्रस्त नदीं हुआ, अपितु दसरा को भी अनाचार 
अस्त वना कर भारत के पतन का मुख्य कारण वना । 

विस्तीय आठवी शताब्दी फ आसपास अनमं भी इसी 
पत्तन की तरफ किसी न क्रिसी अशमे अग्रसर द्यो चुक्रा था। 
आचार्य रवर श्रीदरिभद्र के कथनानुसार कई जैन साधु मन्दिरं 
में रहते, उनके धन का उपभोग करते, मिष्टान्न. घृत, तम्ब 
आदि स अपने शरीर ओर जिह्वा कोत्र करते. ओर दत्य, 
गीतादि का आनन्द छते! यदि जन धर्मके विपय में इनसे 
प्रन करिया जाता तो उहकाटीन कई धर्माध्यक्षो क अनुसार यही 
कह कर टाङ'देते कि यह्‌ चियय अत्यन्त सुषम ह, श्रावको को 
मति क स्वि अगम्य ह! केशटटुच्चन का इर्दोनि परित्याग कर 
दिवा था, स्नियों कौ संगति को चे सर्वथा त्याज्य नही समभन 
ये, धनी गृदस्थो का चिरेष मान करत, ओर अस्य भी कड जिन 
शिक्षा के विरुद्ध आचरण किया करते थे] यदि प्रभावक 
चरित के कथन का विश्वास क्रिया जायतो उस समय के कई 
वड वङ़ आचाय भी इस अआचारसैथिल्य से सर्वथा अस्यष्ट नदीं 
ये। कन्नौज के सम्राट्‌ चागम द्वितीय के रुर सुचिख्यात 
श्रीवप्पभद्ि हाथी पर सवार होते थे, उनके शिर पर चमर लाए 
जते ये; ओर उनक्रा राजाओं क समान सम्मान किया 
जात्ता था | 

श्रीहसिभद्राचा्यं ने इस स्थिति को सुधारने का प्रयत्न 
किया 1 परन्तु उन्द पूरी सफलता न मिरी 1 स्वयं श्रीदरिभद्रा- 


(३) 
चायं के प्राचीन स्थान चित्तौड में चैत्यवासियों का प्रायल्य था, 
डर गुजरात सो एक प्रकार से उनका घर ही था। वे पदे 
्वावडं के, ओर तदनन्तर चौषुक्यों फे अनेकं वं तक गुरु रट । 
उनका विरोध करना कोई साधारण कायं न था । परन्तु पतन 
एवं वोद्धधमं के समान मरण कौ तरफ अग्रसर होते हुए जिनो- 
पदेश का उद्धार करना आवश्यक था। भतए्र चन्द्रक 
शिरोमणि श्रीजिनेश्वरसूरि ने चैत्यवासिरयो कै प्रचर्तम दुगं 
पत्तन मे ही उनका बिरोध किया ओर दुभराज चौटुक्य की 
सभा में उन्हे परास्त कर, अपने गच्छ फे च्यि "खरतर नामकः 
प्रसिद्ध विरुद किया । नवाङ्ग वृत्तिकार सुविख्यात द्‌शंनिक 
श्रीअभयदेवसूरि ने अपनी पुस्तक-स्चना एवं उपदेश हारा इस 
कार्यं को अग्रसर करिया । उनके शिष्य ॒श्रीजिनवहभ अपने 
समय के अस्यतम विद्वान्‌ थे । उन्दने केवर अनेक प्रस्थो की 
ही रचना नहीं की, अपितु समस्त राजस्थाने) बागड ओर 
माख्वा में विद्र कर सत्य धमं का उपदेश दिया ओर विधि- 
चेत्यो[कौ स्थापना की । प्वर्चरी, के कथनानुसार श्री हरिभद्रा- 
चार्य] के अन्थों का मनन कर श्रौ जिनबहसूरि ने बिधिमाग 
कां प्रकाशन किया ( श्लोक १४) । जिन जिन बातोंपरश्री 
इरिभद्राचार्य ने आाष्तेप किया था चे सव विधिव मे वर्सित 
थी! यहाँ रात्रि के समय नृत्य ओर्‌ प्रतिष्ठा न दती; रंडियां न 
नाचतती, ओपैर रात्रि समय सिर्यां चैत्यो मे प्रवेश न करतीं। 
जाति ओर ज्ञाति का यहा कदाग्रहन था; ओर ख्णुड रास 


( % ) 


आदि बर्चितग्रे। श्रावक छोगनते पठने यहा न आन च 
स्तीर च वहां नाम्बृ्ट-चचण दता श्रा । वत्य दासः कड़ा तथा 
जिनोष्टेशा चिन्द् अस्य कार्य चां सवश्रा निषिद्ध भर॑। 
चिनौढ्‌, नरवर, नागौर, मनेट आदि वियिचत्यां म वे रिश्नापुं 
ग्रशस्तिद्पमेचगणादी गः थीं। 
श्रीजिनदनत्तनृरि इनक नयोग शिष्य थे। इनका चरित्र उम 
यमाना में जीय द्धी प्रकाशिन हमा] अतः यद्र इनना द्री 
कदना पर्याप्र हागा कि वरे अन्यन्त प्रभावशागटी एव निर्भीक उप- 
देषा धरे! यद्वि सव धर्माचाय इनक खमान- 
प्स्मड चा पमे मा च्रिमर चा पर्यत्तड 1 
भानियच्ता हिया सासा सपक्य युणक्रारिया ॥"“ 
ह सक्तो क्या ससार में कभी धम की अवनति टो सकती ह १ 
इस टथच्राय पृन्तिका मे अगरचन्दजी णवं भवरखाटजो 


४ 


नक्र सुजिष्य णवं पटधर श्रीजिनचन््रूरि काचर 
1 पुम्नक्र वदी ग्बोज के साथ टिखी रड 
चिद्टान्‌ स्वक्रा की उस वात से मं सवथा सहमत दह 


[1 


सृग्जी द्वारा प्रतिवोवित मदनपाल कोड सामान्य च्चावरक 
मात्र नदी चच्कि दिद्धी का राजा था! 

चाद्यानां क अधीन होने षर भी किसी अन्ववशीय राजा 

का द्रिद्धी म राज्य करत्र रदना कोई आयं की चात नर्दीदे। 

चिग्रदराज्ञ चतुर च आशिका अर्थात्‌, दासी को दिष्टी पदे 

जीता थ, किन्तु संवत्‌ १२२८ ते बद भीमसिद्‌ नामक चीोदाने- 


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( ^ ) 


तर वंश का राजा राज्य करता था । पुराने विजेता अधिकतर 
विजितव॑श को सर्वथा अधिकार-च्युत न करते थे। यदि राजा 
ने अधीनता स्वीकार कर ङी ओर करदेना स्वीकार क्रियातो 
यह पर्याप्त सममा जाता था । विग्रहराज के शिरारेख मे केवल 
इतना दी छिखा दै फि उसने आशिका फे अ्रहण से श्रान्त अपने 
यश को द््ठी अर्थात्‌ दिष्टी मे विश्राम दिया) इसका यह 
सत्त्व दो सकता दै कि दिष्टी के साजा ने विग्रहराज की अधी- 
नता स्वीकार की। यह शिररेख हमे यह मानने के च्यि 
विवश नदीं करता करि नौहान-सम्राद्‌ ने दिष्ी फे राजवंश 
ओर राज्य को ही समाप्त कर दिया । श्री जिनपार उपाध्यायं 
का कथन सवथा स्पष्ट हे, ओर उसके आधार प्रर हम निस्स- 
क्कोच कह सकते है कि सम्बत्त्‌ १२२३ मे योगिनीपुर अथात्‌ 
दिष्टी मे रजा मदनपार का राज्य था । वे सर्वथा स्वतन्त्र थे या 
पराधीन- यह दसरा चिपय है ओौर इसका निर्णय अन्यत्र उप- 
रभ्य देतिद्ासिक सामग्री के आधार पर किया जा सकता दै । 

इस सुन्दर पुस्तिका को छिखने के ल्यि अगरत्न्द्जी एवं 
भंवरखाख्जी दोनों दी बधाई एवं धन्यवाद कै पत्र हे । भग- 
वान्‌ से प्रार्थना दै किये इसी तरह चिरकाल तक नवीन-नवीन 
एवं शोधपूणं पुस्तकों सा हिन्दी सादि कौ बृद्धि कसते रहे । 


तीकानेर 


4 दशरथ शर्मा 
न्न ० ३,१९५६ 


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मणिधारी श्रीजिनचन्द्रसरि 


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से ५ 
जन समज में सुप्रसिद्ध दाढा सन्नरफ खरतरगच्छं के 
ववार ‹ आचार्या में श्रीजिनदत्तसूरिजी के अनन्तर 
मणिधारौ श्रीजिनचन्द्रसूरिजी का पुनीत नाम आतादै) ये 
चडे प्रतिभाशाी विदधान एवं प्रभावक आचाय थे । केवल २६ 
वर्प की अल्पायु पाकर इन्होने जो काय्यं करिये वे सचञुच 
आश्चर्यजनक ओर गौरवपूरण द । शरवस्यं श्रीजिनदत्तसूरिजी रे 
इनकी प्रतिभा की सच्ची परख की थी, उनके छोकोत्तर प्रभात्र की 
गहरी छाप श्रीजिनचन्द्रसूरिजी के जीवन मे अदित पाई जाती 
दै। मणिधारीजी का व्यक्ति महान एवं असाधारण था । 
दसो का सध्िप्त परिचय इस खघ पुरितका मे दिया जा रहा दै । 


१ श्रीजिनदत्तसूरि, चरित्रनायक श्रीजिनचन्दरसूरि, श्रीजिनकयलसूरि ओर 
युगश्रवान श्रीजिनचन्द्रसूरि--इनमे से पिछले दो आचार्यौ का चरित्र टम पूर 
प्ाद्रित कर चुके दँ । श्रीजिनदत्तसूरिजी का चरित्र शीघ्र हौ प्रकादित 
करेगे । 


२ मणिधारी श्री जिनचन्द्रसूरि 


17, 111 1 न 4 ८ 4 


जन्म 


^ ^ 1) 


जेसटमेर के निकटवरतीं विक्रमपुर ° मे साह रासर नामक 
पुण्यवान श्रेष्ठि निवास करते थे । उनकर देल्दणदेची नामक 
सुशीला धर्मपत्नी थी । उसकी स्गर्मा कृधि स सं० ११६७ 
माद्या श्छ ८ के दिन ज्येष्टा नक्षचरमे हमारे चरि्रनायक 
श्रीजिनचन्द्रसूरिजी का जन्म हुमा था! ये आक्रति के वडेही 
सुन्दर, सुडोट ओर छावण्यवान थे 1 


१ यद स्थान ( धोदकरण ) फटौवी मे ४० मौल परव भीमौ 
नाम से प्रमिद्ध है! यद्यपि इम समय गा जनौ की वस्तौ एव अन मन्दिर 
व्रिद्मान नदीं है, फिर भी कड भ्वगावन्नेप इनस्तत" पाये जति ह । यदा 
कै मन्टिर की मूतिया जेसल्मेर क मन्दिर मेँ विराजमान करी गड ह । 

कड छग वीक्रनेर, जिसका नाम भौ विक्रमपुर प्राया जाता है, नाम 
साम्य की धन्ति से आन्नेप करते रह क्रि उस ममय वीकनिर्‌ वमाभौ नही 
थाः लेकिन वास्तव भ यह वात अनानमूलक द । स १२९५ मे घुमति- 
गणि कृत॒ गगणधररसा्थनतक गृददुशृति से स्पष्ट है कि श्रीलिनटत्तमूरिजी 
ने यदा के वीरजिनेधर कौ प्रतिष्टा कौ ची। भूत-येतो को तिरत 
त्रिया का । खरतरगच्छ पटावलीसग्रह मे प्रकाधित्त स १५८२ की सूरि- 
परम्परा प्रगस्तिमें क्सि कि महामारि के उप्र को यान्त कर माहे- 
शवरतु्ायि लोगो को जनवर्मं का प्रत्तिवोच ठेकर यैनौ बनाया वा । 


मणिघधारी ध्रीजिनचन्द्रसुरि ३ 


ह । { भि त 1 1 ^ व + ^, । ति । ^ ^ ^^ ^ 


विक्रमपुर मेँ श्रीजिनदत्तसूरिजी का बड़ा भारी प्रभाव था। 
सूरिजी ने बागड़ देश में व्वचैरी * नामक प्रन्थ रच कर विक्रम- 
पुर के मेहर, वासङ आदि श्रावकं फे पठनाथं बह चर्चरी टिप्य- 
नक विक्रमपुर भेजा । उससे प्रम।वितत हो कर सण्हिया के पुत्र 
देवधर ने चैयवासर आन्नाय का परिदयाग कर सूरिजी को अज- 
मेर से विक्रमपुर छा कर चातुर्मास कराया 1 सूरिजी के अमृत- 
मय उपदेश से वहा पर बहत स भ्यक्ति प्रतिबोध पाये । बहूतों ने 
देशविरति ओर सचचिरति ध्म॑स्वीकार करिया। बहा के 
जिनाख्य मे सूरिजी के करकमलों से महावीर भगवान की 
परतिमा स्थापित की गई । 

एक वार रासखनन्दन बाल्यवस्था मेँ आपके निकट साता 
के साथ पधारे। वाख्क के शुभ रक्षणो को देख कर सूरिजी 
ने उसी समय उनके होनहार एवं प्रतिमासम्पन्न होने का निश्चय 
कर छिया ओर अपने ज्ञान-बल से इस चाक को अपने 
पद के सर्वथा योग्य ज्ञात किया । 


दीक्षा 


विक्रमपुर मँ महती धर्म-प्रभावना कर युगप्रधान गुरुदेव 


१ यह मन्थ अपश्चक्न भाषाकी ४७ याथओंमेदहे। उपाध्याय 
श्रीजिनपालजी कृत श्रृ्ति सहित “गायकवाड ओरियन्यल सिरीज' से प्रकारित 
अपश्च द कान्यत्रयी" मे सुद्ितदो चुका हे। 

२ विद्ेष जानने के लिए गणधरसारधंत्तक वृहदूडति देखनी वािए । 


४; मणिघारी श्रीजिनचन्द्रसुरि 


9.१71.111 ~ नन ~+ ^ 


अजमेर पधार ओर वहीं सं १२०३ क मिती कफाल्युन शुद्धा ६ 
के दिनि श्रीपारश्वनाश् चियिचत्य मे हमरे चरिरिनायक की 
दीक्षा ह 1 आप असाधारण बुद्धिशारी ओर स्मरण शक्ति 
सम्पन्न यै, दो वर्षं के विययाध्ययनमे ही आपकी प्रतिभा चमक्र 
उठी । सभी खोग इम ख्युव्यस्कर सरस्वतीपुत्र सुनि की मेधा 
एव सूरिजी की परख की भूरि भूरि प्रेमा करने खे । 


आचार्यं पद 


सं० १२०४ के मिती शाख शुषा को विक्रमपुर के 
श्री महावीर जिनाखय मे श्री जिनदत्तमूरिजी ने स्वहस्त कमल 


१ उ० श्रौ क्षवाक्न्यागजौ कौ पटरावली में स १२११ लिखा ह टेक्रिनि 
वद ठीक नदीं जात होता 1 म~ १३१० ठीव्राटौ के दिन प्रहाढनपुर मे विरचित 
अभवनिटकोपाष्याव ऊ दवाश्रयक्राव्य वर्ति कौ प्रनसि मे लिखा इ-- 

नन्पटराचखचुलिक्रचर्मल चकर ऽष्ठ्वपौऽपि च 

शरीमान्रो जिनचन्दरसूरि खगुद क्ण्ठौर वा भेपरिम 
य॒ छोनेत्तरद्यन्षपठमपेव्य स्वे पुलिन्दोपम 
मन्वानोऽचुदघौ स्मरस्तदुचिताथाप गरान्वं वच 1६} 
ठी मितौ ने स्तम्भी मे उ° श्रीचन्धरतिलक रचित श्री सभय- 
ङ्मार्‌ चरित्र मं भौ ९ वरे क सप्रस्या मे सूरिपड मिलने का उल्टेख मिलता 
इ । श्रीजिनयालोपाव्याय ने गु्वविन्टी नं भौ यदी वात लिली है 1 पिद्टी 


अन्य पटत्वं ने भौ सूरिषद का चमव स १२०५ हीष्टिखा हे। 


मणिधारी श्रीजिनचन्द्रसूरि ५ 


= [+ र + ^ व, 1, १, १, १।,१।। ~ न~ ^~ 1.1, 1) 


से इन प्रतिभाशादी मुनि. को आचार्यं पद्‌ प्रदान कर श्रीजिन- 
चन्दरसूरिजी नाम से प्रसिद्ध किया । आचार्यं पद्‌ “महोत्सव 
इनके पिता साह रासख ने वड़े समारोह पूरवैक किया । श्रीजिन- 
दत्तसूरिजी की इन पर महती छपा थी । उन्होने स्वयं ' इं 
जिनागम, मंत्र, तन्त्र, ज्योतिप आदि पटा कर सभो चिपर्यो मेँ 
पारंगत चिद्टान वना दिया । ये भी सवदा गुरु सेवा मेँ दत्त 


चित्त रहते थे | 


श्रीजिनदत्त्रिजी का भावी संकेत 


विनयी शिण्य की सेवा से युगप्रथान गुरुजी वड प्रसन्न थे । 
उन्दने इन्हे गच्छं सच्वाखन एवं आत्मोन्नति की अनेक शिक्षाएे 
दी थीं, उनमें एक शिक्षा वडी ही मद्व की थी करि जिसे हम 
गुरुसेवा का अमूल्य छाभ ही कह सकते दै वह शिक्षा यद्‌ थी 
किं “योगिनीपुर-दिष्धी मँ कभी मत जाना।* व्योकिं दिही में 
उस समय दुष्ट देव ओर योगिनि का बहुत उपद्रव था एवं 
श्री जिनचन्द्रसूरिजी का भयुयोग भी उसी निमित्त से नात कर 


१ वाल्ये श्रीजिनदत्तसूरि विभुभिये दीक्षिताः शिक्षिता । 
दत््वाचार्यपद स्वय निजपटे ते रेव सस्थापिता ॥ ६ ॥ 
श्रीमजिनचन्द्रसूरिगवोऽपूत्रनदुनिम्बोपमा, । 
न भस्तास्तमसा कलकविकलाः क्षोणौ वभूुस्तत ॥ ७ ॥ 
[ शालिभद्र चरित्र, ० १२८५ म पूर्णभद्र कृत | 


¢ मणिवारी श्रीजिनचन्द्रसुरि 


^ ^ ~ ^^ ^~ #” ~~~ ~ ^^ ~ ~^ ~ <^ ~ 


इन्दे द्विद्ी जाने का स्वधा निचध क्रियाशध्रा। सूरिजी के भावी 
संवत का वात्पय यदथाकिय डम मम्वन्य म सतक रट] 


गच्छचाय्रक् पद्‌ 
संवन १२११ मिती आपाद श्छ १४ का अजमेर नगश्म 
श्रीजिनदन्तमरिजी मद्दारयाज स्वगं निधे) तभी स गच्छ 
सथच्चाटन क्रा मारा भार उनके उपर आगा) येभी वदी 
योग्यता पूरक उस मदान्‌.पद को निभने छे । 


विहार 
सवन्‌. १२१४ मे श्रीजिनचन्दरभूग्जी व्रिभुवनगिरि ‹ 
पध्रारे। वद्धा परमगुग श्रीजिनदत्तमूरिजी दाग प्रतिष्ितिश्री 


9 ग्रही गताब्डौ के अनाचार्यं शरीग्रय व्नमूरिजी ने व्रिशुव्रनगिरि ॐ 
कटम गजा फो जन वनाव्ाया। जो द्रीधिन दोर श्रौवनेधग्मूरिनो क नाम 
से प्रनिद्धहुषएु थे। 

[ जन सादित्य ऋ सधिप्त इतिदान ए" १६२-५ ] 

म १२६५ मे रचिन (गणवरमावयतफ त्द्‌ वत्तिः र शयुवरधिदी 
श्रीजिनदत्तमग्जिी के व्रिभुवनगिरि पवारने र वहा महाराजा कुमाग्पालः 
को प्रत्रिघोवट्न काउ षावा जाताद्‌ 

दमार्‌ सग्रह ॐ शीवादिदतरमरिवरित्र मे च्रिभुत्रननिरि ॐ दुर्म म रत्त- 
वस्र वादा करो पराजय करने कर वर्णान निट्ना ह । 


मणिधारी श्री जिनचन्द्रसृरिं ५७ 


(1, कि, ^, १ ^ ^ भिनति 0 म 0 0 0 ० 00 0 0 0 १ ०७.०१.७९५ ७ 


शान्ति जिनाख्य के शिखर पर स्वणं दण्ड, क्श ओर ध्वजा 
को महा महोत्सव पूवक चढ़ाया गया । साध्वी हेमदेवी गणिनी 
को इन्होने प्रवर्तिनी पद से विभूपित किया । व्हा से विहार 
कर क्रमशः मथुरा पधारे । बहा की यात्राकर सं० १२१७ के 
फाल्गुन शुषा ° १८ के दिन पूर्णदेव ₹ गणि, जिनरथः चीर मद्र 
वीरनय, जगदहित, जयशीख जिनमद्र ओर नरपति (श्री जिन- 
पतिसूरि° ) को भीमपषटी * के श्रो वीरजिनाख्य में दीक्षादौ 
गुर्वाव्ी में श्री जिनपतिसुरिजी के नेतृत्व मे स° १२४८४ मेँ एक सघ 
निकला उसमे ब्रि्ुवनगिरि से यशोभद्राचारयं के समीप अनेकान्तं जगरपताका, 
न्यायावतार आदि अन्धो क पढने वलि शौरसागर ओर सोमदेव स्थानीय सघ के 
साथ अक्र पूज्यश्रौ के आन्ञासुसार सध मे सम्मिलित होने का उल्छेख है । 
१ हमारे सम्पादित पेतिद्रासिक जैन कान्य सग्रह के अन्तर्गत श्रौ जिन- 
पतिर के गौतद्य मे दीक्षा स १२१८ फाल्युण कृष्ण १० लिखा है पर युर्वा- 
वली म दो स्थानें भ उपरक्त संवत्‌ तिथि मिलने के कारण व प्रस्तुत जीवनी 
का सुल्य आधार गुर्वावखी होने के कारण दमने भौ उसी को स्थान दिया हे । 
२ स० १९४५ मे उवणखेटक स्थान मे श्रीजिनपत्तिसूरिजी ने इनको 
वाचनाचाये पद्‌ से विभूषित किया था । 
३ आपका सक्षिप्त परिचय हमारे "तिद्ासिक जेन काम्य सग्रह" के सार 
भाग प्रष्ठ ९ मे टेखना चादि । गुवविखी मे आपका जीवन अति विस्तार 
से भिल्ता हे, जिसे स्वतन््रषूप या गुर्विखी फे असुबाद्‌ के क्पमे 


श्रफानित किया जायगा । 
® वर्तमान भीरी पाटनपुर एजेन्ती मे डौसाभ्राम से ८ कोश 





८ सणिधारी श्रीजिनचन्द्सूरि 


० = ~ न्न ~ = [5 ,5 , , 1 ^ व 


गई ¡ साह क्षेमन्धर* को प्रतिवोध दिया। वर्हांसे विद्ार 
कर सूरिजी मदकोट ( मरोट ) पधारे। स्थानीय श्री चन्दरपमम- 
स्वामी के विधिचंय पर साधु गोहक कारित स्वर्णदण्डः कटश 
व ध्वजारेपण किया गया । इस मदोत्सव मे साह क्षेमन्धर 
ने ५००] त्रस्म ( अद्रा ) देकर माद ग्रहण की । 





मस्करो से विहार कर सूरि-महाराज सं० ११८ में उव 
( सिन्धु प्रान्तीय ) पधार वहा क्नूपरभटन्तः विन ˆ“ - 
( ) विनयश्चीछ. शुणवद्धंन, मानचन्छरः नामक 4 
साधु ओर जगश्ची, सरस्वती ओर गुणश्री नामक साध्वी 
त्रयको दीक्षा दी। इसी प्रकार क्रमश सूरिजी के समीप ओौर 
भी वहत से च्यक्ति दीक्ित दत्ते गये । 


पश्चिम्जंहै। व्रिगेप जानने क लिए सुनि श्र कऋन्या्विजयजी का न्न 
तीर्थं भीमप्रै अने रामनन्यः गोर्क ठेख पटना चिए जो क्रि अँन युग 
सं° १९८५-८ कँ भाद्रपद्‌-कातिक के अक्रमे च्पाहै। 

१ ये पद्चग्रभाचार्यंके पिताये, जिनसे सं १२४४ मे आगाप्टी 
मे श्रीजिनपतिसूरिनी ने गस््रार्थं क््वाथा। इसका कुट उत्छेख श्रौ 
जिनण्तिमूरिजौ क वाटस्थल ओर विस्तार पूर्वकं वर्णन गुवविली मे 
मिलता इ । 

२ उन भी स्व्रणलेक मे उपदुकत पृणंटेव गणि के साय स० १२४५ 
में श्वीजिनपरतिनूरिजी ने वाचनाचार्यपट दिया था । 

ई स १२ मे श्रीजिनपतिसूरिजी ने इन्दं महत्तरा पद दिया था। 


मणिधारी श्नीजिनचन्द्रसूरि ९ 


=^ «^ [+ स ^ + ^ ^^ त, ^ ^ 011 | कि 1१8, 


सवत्‌ १२२१ मे सूरिजी सागरपाड़ा पथारे। ब्दा सा० 
' गयधर कारित पाश्वनाथ विधि चेय मे देवकुखिका की प्रतिष्टा 
की। वहा से अजमेर पधार कर स्वगींय गुरुदेव श्रीजिनदत्त- 
सूरिजी के स्तूप ' की प्रतिष्ठा की । वहा से क्रमशः विहार कसते हुए 
सूरिजी वन्धेरक पघारे। वहां बा० गुणमद्र २ गणि, अभयचन्द्र 
यशचन्द्र यशोभद्रः देवभदर ओर देवभद्रकी भार्य्याको दीक्षा 
दी गई । आशिका ( हसी ) नगरी मे नागदन्त को वाचना- 
चायं पद दिया । महावन स्थानके श्री अजितनाथ विधिचेय 
की प्रतिष्ठा की। इन्दरपुर के श्री शान्तिनाथ विधिचैत्य के स्वणं 
दण्ड, कटश ओर ध्वज की प्रतिष्टा की । तगला भ्राम में वाचक्र 
गुणमभद्र गणि फे पिता महटाख श्रावकके वनवये हुए श्री 
अजितनाथ विधिचत्य की प्रतिष्ठा की । 


सं० १२२ मे वादी नगर के श्री पाश्चनाथ मन्दिरमे 
उपर्युक्त महरार श्रावक कारित स्वर्णं ॒दण्ड) कटश कौ प्रतिष्टा 
की! अभ्विका-मन्दिर के शिखर पर स्वर्ण-कटश की प्रतिष्ठा 


१ सवत्‌ १२३५ मेँ श्रौजिनपतिसूरिजी ने इस स्तूप करौ वदे विस्तार 
से पुनः प्रति की थी । 

> स० १२८५. मँ उवणखेटक मँ श्रौजिनपतिसूरिजी ने इन्दे वाचना- 
चार्यं पद्‌ से सुक्तोभित कियाधा। इनके पित्ता नाम महलारः श्रावक 


था जिनी करवाई हई तगला भौर वोरल्लिदा की प्रतिष्टा का उल्लेख उधर 
आदी चुकाहै। 





4० मणिधारी श्रीजिनचन्द्रमूरि 

कर मृरि-नद्यारज ने खडी की ओर विद्धार किया। 
न्ठरपद्धी चे नरपाद्पुर्‌ पथे, वदां ज्यातिष शाख क किंचित 
भ्याम से गर्विषट कं ज्योतिषी से घाक्नात्कार हभा । ञ्योनिप 
सस्वन्यी चचा करते हृष मूरिजी ने उसे का कि चर्‌. स्थिर. 
दविस्वमव उन ३ स्वभाव वद्धे ख्रां च्ी मीचख्का 
परात्र दिवा 1 ज्योतिषी के निरत्तर हनि पर नूरिजी ने 
वरषच्छ्क १६ से ६० अंशा चक के समय मार्मशोप सुहत मे 
श्री पाचनाय मन्दिर ऋ नमश एक शविटा १७६ वर्ष॑तक न्थिर 
र्द की प्रतिन्रा से अमावस्या के दिने स्थापित कर -स 
न्यातिपी करो जीत न्धा! ज्योतिषी ठञ्जितत दोकर चदा 
गवा । ऋअलिनपादोपाव्याय रुर्वाविटी मे च्खिते है करि वहं 
शिखा अव (र्वनाका सं“ १२८१) तक वदां चिच्यमान इ । 


पव्रचन्द्राचार्यं से शार्थं 


वदयां स विददार कर आजिनचन्दरस्ररिजी रिजी पुनः खरप पधार । 

= क कि क [य [1 क 
चदं किसी दिन युनि मण्डली सदिव ट्घुचयस्के सूरि महाराज 
 श्रौजिनवक्तरिजी ज ज्दा पवार >र वहून चे च्यतत ऋनं मन्यकंलौ, 


1 


मणिधारी श्रीजिनचन्द्रसूरि ११ 


, का, १, , „त, ^, ^ + + ५५ ॥ 


को अपने पास से होकर वहिभमि जाति देख मात्सयंवश पद्य 
वर्द्राचा्य नामक चेत्यवासी ने उनसे पूषा किये | आचायंजी 
आप आनन्द मेँ दै १ 

सूरि-दां । देवगुरु के प्रसाद से आनन्द में हूं । 

पद्म०--आप आज कल किन क्रिन शास्त्रों का अभ्यास 
करतेदै? 

यदह सुन कर साथ मे रहे हुए युनि ने कहा ~ 

पून्यश्री आज कल (न्याय कन्दी” ‹ का चिन्तन करते दै । 

पद्य०--क्यो, आचार्यजी आपने तमोवाद्‌ का चित्तन कर 
चाद? 

सूरिजी- द्य, तमोचाढ प्रकरण ठेखा हे | 

पद्म०-- आपने उसका अच्छी तरह से मनन किया है । 

सूरिजी--हौ, कर छिया दै । 

पद्य०-अस्धकार्‌ रूपी दहै या अरूपीः एवं उसका सरूप 
करसादे? 

सूरिजी--अन्धकार का स्वरूप केसा दी हो, पर उस पर 
वादं करने का यह्‌ सरमय नहीं हे । वाद विवाद तो राजसभा 


१ यह भरन्थ श्रीधर का घनाय्रा हुदै! इष पर द्षुरोयगच्छ के 
मलधारी श्रीदिवप्रभसूरि ( १३ वीं शताब्दौ ) के शिष्य नस्चदरसूरि ने 
टिप्पण क्सि दै। एवं उन्दी की परम्परा मे रजक्ञेखरस्‌रि ( १५ वी 
शताच्दी ) ने परलिका वनद दै । 





९२ मणिघारी श्रीजिनचन्द्रसूरि 


ग प्रवान सम्यो के समध दोना दी उचित टै। नीति ओर 
वरमार्णो राया अपने अपने पश्च का समर्थन करके वस्तु स्वरूप 
करा तभी विचार द्धौ सक्ता दै) यह्‌ निध्ित दे करि स्वप्र 
स्थापना रने पर भी वस्तु अपना स्वरूप नदीं छोड़ती । 

पद्म - पक्ष चस्थापनामन्रे स वस्तु अपना स्वख्प छोड या 
न द्योड़े पर परमेश्वर तीर्थङ्करो ने "तमः को न्य कहा दैः यह्‌ सर्व 
सम्मत द| 

मूरिजिी--अन्यकार्‌ को न्य मानना कौन अस्वीकार 
करताद? 

पृज्यघ्री ने वार्चाटाप क समय ज्यो ज्यो शिष्टता ओर विनय 
परदर्न च्या त्यो त्यों पद्यचन्दराचार्यं अदृद्धार मे उन्मत्त दो 
ए क्रोपके अव्रेग सं उनक्र नेत्र खट द्यौ गए शरीर कपे 
खना अओीर कदने चो-“जव मेँ प्रमाण रीति से 'अन्यकार द्रव्य 
ड" इतं स्थापित कदेगा तच तुम क्या मेरे सामने ठद्दर सकोगे ।* 

चुनिजी- क्रिस की योन्यता है ओर किसकी नही, यद्‌ तो 
मौक्रा पुने प्र राजसभा मे स्वतः विदित हो जायगा! पञ्ु- 
प्रायो की जंगल द्यी रणभूमि दै, आप द्मे खुवयस्क सममः कर 
अपनी शक्ति को अधिक न ववासि ! माम ई ¢ द्धोटे शरीर 
चषि सिद की ददा सुन कर पर्व॑ताति गजराज आ डर 
जाने द 

इन दनां आचायी का विवादं सुन कर कौतुक देखने क 
चपि बद क्रितने दी नागरिक एकव द्यौ गए! दोनों पक्के 


मणिधारी श्रीजिनचन्दसूरि १३ 


००९१५०९ 9५ = १,०५.०७७. ०००१५७० ५५ नन ५.७ ७ ~ [^ 1, श + ^ 1/1 


श्रावक अपने अपने आचायं का पक्ष लेकर एक दूसरे को परस्पर 
अहंकार दशानि कगे ! वात वदृते बदृते राजसभा मे शस्त्राथ 
निशित हुआ । निश्चित समय पर शाखां प्रारम्भ हभ । 
श्रीजिनचन्द्रतूरिजी ने वडी विद्टता के साथ विपक्षी कै युक्ति 
ओर प्रमार्णो को रह्‌ कर स्वपक्ष का स्थापन किया । 

पद्यचन्द्राचायं शास्त्रार्थं म परास्त हो गये । राज्याधिका- 
रियो ने समस्त जनता के समक्ष श्रीजिनचंद्रसूरिजी को जयपत्र 
समर्षण किया । चाये ओर से सूरिजी कौ जयध्वनि प्रस्फुटित 
हई । सूरिजी की विद्त्ता एवं सुविष्ित मागं की वडी प्रशंसा 
हुई । श्रावक रोगों ने इस विजय फे उपलक्ष मे बड़ा महोत्सव 
किया । सूरिजी के भक्त श्रावकं की (जयति नाम से प्रसिद्धि 
हुई ओर पद्मवंद्राचा्यं के श्रावकं (तकः करने लगे ! इस 
प्रकार यशस्वी आचार्यं श्रीजिनचन्दरसूरिजी ने करद ठिन तक 
वहां ठहर कर सिद्धान्तोक्तविधि से अच्छे सथवाड के साथ 
चहा से प्रस्थान किया । 


म्टेच्छोपद्रय से संघ रक्षा 
क्रमशः विहार करते हुए मागे मे बोरसिदान भ्राम के समीप 
संघ ने पडाव डाला । उसी समय वहा म्लेच्छों के आने की खवर 
खगने से सथवाडे के लोग भयभीत होने लगे। संव को म्लेच्छों 
के भय से व्याज देख कर सूरिजी ने कदा--'भाप छोग आङ्कर 
व्यो हो रदे दै? 


[19 


१८ मणिधारी श्री जिनचन्दरधूरि 





साथे छोगां ने कदा--भरावन्‌) देखिये, वह ग्टैच्छीं 
की वेना रही, इम दिशा मे आकाश धृ स आच्छादित 
हये रहा ३। वह्‌ देखिवि--तंनिकां का कोटा भी पुनाः 
देत्ता ६। 


पूज्यश्च नै सावधान होकर सव सं कटा-मदानुभावो ! 
ध्यं रखो अपने <, वट आदि चलुप्पदां को एकत्र कर खो । 
प्रतु श्रीजिनदत्तघूरिजी सव का मला कर । 


तत्पश्ान पृल्यश्ची न मन्तघ्यानपूरवंक अपने वण्डेसं सवके 
चासो ओौर कोटक करार वाटी >ेखा खीचदी] सथवाड 
के दोग गोणी मे धरस् गये। उन छोर्गोने धोखा पर चदे ह्‌ 
हजारो ग्ट का पडाव करे पास्रसि जति हुण देखा परन्तु 
म्ट्च्छा ने सव को नदीं देखा, वे केवट काट को देखते हृष्‌ दर्‌ 
चष्ट गत्र । सव छोग निर्भय दयोकर चटे, बौर क्रमशः दिष्टी के 
समीप जा पूर्हुच | 


सुरिजी क पथारे करी सुचना पाकर दिष्टी के दक्र छोर, 
सा० याद्दण, मा छख, सरा० सदीचद्र आदि सव क शुख्य 
श्रावक वड़ं समारोह क साथ सूरिजी कै वन्दनां सन्ध 
चट पडे । 


मणिधारी श्रीजिनयन्छरसरि १५. 


(0 1, १,११.१.१। ~ ~+ ०५.०२ (न 


सहाराजा मदनपाङ* प्रतिचोध 


दिही नगर कै प्रधान लोगो को सुन्दर वेशभूपा से अलंकृत, 
सपरिवार सवारियों पर आरूढ होकर नगर से वार जाति 
१ पिच पट्टावलिकारो ने मदनपाल को भौमा श्रावकं ल्खिा है 
परन्तु गवव्िली से स्पष्ट है कि उम समय वे दिर के महाराजा थे । यदपि 
भागतीग्र एतिहासिक भ्रन्ो मे उनका उत्ठेख नही पाया जाता पर तवर 
राजवचावली छुद्ध एव परिपूणं उपख्व्ध नहीं है तथा उस समय दिष्टी के 
दासक कौन थे इगफे जानने के किए भी कोई सुरादि साधन उपलज्ध 
नही है अतएव गुरवावलो तिमिराच्छन्न भारतीय इतिहास पर एक नवीन 
प्रकाश डाखतौ है। गुचधिलीकार के कथन में सन्देह का कोई भी [कारण 
नही हो सफ़ता कयो कि इमक्रे कर्तां उ० जिनपा करौ दीक्षा स ९२२५ गँ 
हु थौ अत हमारे चरिच्रनायफ़ फे साथ में रहने वकि गौतार्थो के सुय से 
खनी हुड सत्य घटना को दौ सक्रकित परिया गया है 1 उपाध्यायजी चरिच्र- 
नायक के प्ररिप्य थे एव उनका समय भी अति सज्निकट अत्ति जिनचन्द्र- 
सूरिजी के स्व्गेवास के दो वपे पश्चात्‌ हौ आपकी दीक्षा हुई थी । इसरिए 
पट्यवलिकारो का कथन यहं तक राह्म हो सक्रता है कि मदनपाल के 
आग्रह से सूरिजी दिष्ौ परि ये ओर वह आपका अयन्त भक्त था अतः 
उपे श्रावक शब्द से सम्योधित र दिया है । 

क्षमाकल्याणजौ की पट्टावली मे उस समय दिली का शासक्र पातसाह 


क्सि दहे पर वह सवधां घ्रान्तिसूकक ही हे । 


१९ सणिधारी श्चीजिनचन्ध्रेमूरि 


[र 





हृए देख कर राजव्रासाद मे वेढे हए महाराजा मदनपाठ ने 
चिम्मय पूर्वक अपने प्रधान अधिकारियों से पृष्धा--शये नगर 
के विशिष्टं छोग बादर क्यों जा रद ई उन्दने कटा--“राजन्‌ ! 
अदयन्त सुन्दर आच्रृतिवाले अनेक शक्ति सम्पन्न इनक गुर 
महाराज अये है ये खग भक्तिवश उनक्रे स्वागतार्थं जाति दै । 

कौतृहल्वश्व महाराला के मन मे भी सूरिजी क दर्खनाकी 
उत्कण्ठा जागृत हुदै ओर राजकमचारियों को आच्ना दी कि- 
हमरे पदर घोडे को सजा ओर नगरमे बोपणा करदो कि 
सवं राजकीयपुरुष तंयार होकर शीव्र हमारे साथ चट 1 

राजान्ना पाकर हजारो सुभट छोग अश्वा होकर नरपति 
के पो दो गये । महाराजा मद्नपाढ श्रावक रोगों से पूर्व ही 
ससैन्य सूरिजी के निकट जा पर्वे 1, 

साथ वषे टोगो ने राजा साहव को प्रचुर भेट दैकर सत्छरत 
क्रिया] पृज्यश्रीने भी अगरृतमय धर्म देशना दी। राजा 
साहव ने उपदेश्त रवण कर कहा -महाराज ! आपक्रा श्युभा- 
गमन क्रिस स्थान से हज ई  पूल्यश्री ने कटा--इस समथ 
हम स््रपही से आ रद्‌ हं । राजा साहव ने कदा- आचार्य 
भगवन्‌ ! उविये ओर अपने चरणचिन्याससे मेरी नगरी को 
पवित्र कीज्ि 1 

पृज्यश्रीः श्रीजिनदन्तघूरिजी के दिये इए उपदेश को स्मरण 
कर छ्य भी नेवोे। तव उन्दः मौन देख कर पुन" राला 
साहव ने कटा “आचार्यं महाराज ! आप चुप क्यो ह ¶ क्या 


1 


0, १, ` । 


मणिधारी श्रीजिनचन्दरसूरि १७ 


[ +न ५०४८ न ०५१०५ ग ० 00 9४9 


नगर मे आपका कोई प्रतिपक्षी है १ या भापके परिवार योग्य 
अन्नजख की प्राचि मे असुविधा दै! अथवा ओर कोई कारण 
द? जिससे मागे्मे अयिहृए मेरे नगर को छोड कर आप 
अन्यत्रजा रहे दै 
सूरिजी ने कदा-- "राजन्‌ ! आपका नगरः प्रधान धर्मकषे्न 
हण परन्तु“ “** ^" 
साजा- तो फिर उष्यि ओर शीघ्र दिही पधायियि! आप 
विश्वास रख्िये कि मेरी नगरी मेँ जाप की भोर कोई अङ्खरी भी 
नही उठा सकेगा । दिष्टीश्वर मदनपार्‌ के पिरप अनुरोधवश 
श्रीजिनदत्तसूरिजी की दिह्ठीगसमन निपेधात्मक आनना का उल- 
घन करते हए उन्हे मानसिक पीडा अनुभव होती थी; फिर भी 
भवितन्यता फे वश से दिष्टी की ओर प्रस्थान करना पड़ा । 
आचार्यश्री फे प्रवेशोत्सव के उपलक्ष्‌ मे सारा नभर वन्द्र- 
चारू, तोरण ओर परताकाओं से सजाया गया । २४ प्रकार के 
वाजित्र चजने खगे । मद्र खोग विरुदावी गने खगे । सधवा 
स्तर्या मङ्ख गीत गाने छर्गी । स्थान स्थान पर्‌ चरस्य होने खमा । 
काखो मनुष्यों को अपार भीड़ के साथ महाराजा मदनपाल 
सूरिजी की सेवामें साथ चर रहैथे। प्रवेशोत्सव का यद्‌ 
दृश्य अभूतपूर्वं था। छोगों का हदय आनन्द से परिपणे 
हो गया । 
सूरिजी फे पधारने पर नयरवासियों मे नवजीवन का 
संचार होने खगा । उनके उपदेशाग्रत की कटी से अनेक छोगों 


1 





4८ मणिधारी श्रीजिनचन्दसुरि । 


११०.४.०.१४.१.२...१.१..१,.१. न~~ ~^ ~^ ^^ 


की चन्तप्र आत्मार्ये शान्ति-छाम करने ख्गीं । चपि मदन- 
पाट भी अनेक समय दानार्थं आकर मूरिजी के उपदेशो का 
लाम उ्टाति ये । द्वितीया के चन्रमा की भांति उनका धर्मेम 
दिनादिन वट्ने गा । 





श्र° कुखचन्द्र प्र गुरु-कृषा 

श्रीजिनचन्दरमृरिजी को दिही मेँ रहते हए कई दिन वीत 
ग । एक दिन अपने अटन्तः भक्त श्रावक कुख्चन्दर का धना- 
भाव क कारण दुर्बट देख कर दयां भाचावं महाराज ने क्म 
कस्तूरी, गोरोचन आदि सुगन्धित पदार्था से टिले हए सन्त्रा- 
ध्र युक्त यन्त्रपट छ्टचन्द्र को देते हट कदा--इस यन्त्रपट् को 
अपनी यष्टि रमाण वासक्षेप से प्रतिदिन पूजना; यन्त्रपटर पर 
चटा हया वह्‌ निर्माल्य बासक्घेप पारे आदि क संयोग से सोना 
दा जायगा 1 छटचन्द्र भी सूरिजो कौ वतदाई हृं विधि के अचु- 


सार पूना करने गा जिसे वद्‌ अल्पक्राढ मे करोडपति हो 
खया । 


देवता प्रतिबोध 
„ प दिन चरिमद्यराज दिही के उत्तरीय दरवाजे स वदि- 
भूमिजार्देथे! उस दिन महानवमी अर्थात्‌ नवरातरिका 
अन्तिम दिन था मागं मे जाते हुए मास के च््यि ठ्डते हए 
दा मिथ्या देववार्थो को देखा । द्चादु हदयवाे चारय 


मणिधारौ श्रीजिनचन्दरसूरि १९ 


[01 11 ० ०.१.०७ 0५००५१५०. 





११ 


महाराज ने उनमे से अतिवरु नामकं देवता को प्रतिचोध दिया | 
वह भी उपशान्त होकर सूरिजी से कहने खगा--आपके उपदेश 
से मेने मासवलि का परित्याग कर दिया दै परल्तु छपा करके 
ममे रहने के किए कोई स्थान वतछावे जहा रहता हुआ में 
आपके आदेश का पालन कर सकं । 

सूरिजी ने का--अच्छा, श्रीपाश्वनाथ बिधिचेत्य मे 
परेश करते समय दृक्षिणस्तस्भ मे जाकर निवास करो । 

देवता को इस प्रकार आश्वासन देकर सूरिजी पौषधशालरा 
मे पधार उन्दने सा० छोड, सा० छुखचन्द्र, सा० पार्हण 
आदि प्रधान श्रावको को सारी वात कद सुनाई ओर श्रीपाश्ैनाथ 
मन्दिर के दक्िणस्तम्भ म अधिष्ठायक की मूर्तिं उत्करीणं करने 
का संकेत किया । श्रावको ने भी वैसा दही किया, सूरिजी ने बडु 
विस्तार से उसकी प्रतिष्ठा कर अधिष्ठायक का नाम “अतिव” 
प्रसिद्ध किया, श्रावक रोग अधिष्ठायक की अच्छे अच्छे मिष्टास्नों 
हारा पूजा करने कगे ओर अत्तिवरू भी उनके मनोवांछित पूणं 
करने खगा । 


स्वगवास 
इस प्रकार धमं प्रभावना करते हए सूरिजी ने अपना आगु 
शेप निकट जान कर सं० १२२३ फे तीय भाद्रपद छृप्णा १४ को 
तुर्विध संघ से क्षमतक्षामणा की ओर अनशन आराधना क 


२० मणिधारी श्रीजिनचन्द्रमूरिं 


साथ स्वरम सिथारे *। अन्त समय मे श्रावको के समक्ष आप 
श्री ने एक भविष्यवाणी की कि “शहर के जित्तनी ही दूर्‌ हमार 
देद्-सस्कार किया जायगा, नगर की अवादी उतनी ही दूर्‌ तक 
चढ़ जायगी, इन शब्टों को स्मरण कर श्रावक छोग सूरिजौ कौ 
पयित्रटेह को बडे समारोह क माथ अनेक मण्डपिकार्थो से 
मण्डित नि्यानि-विमान मे विराजमान करः नगर के बहुत दूर 
(ग गाए] चन्टन कर्मादि सुगन्धित द्वयो से सूरि-मदाराज करी ) 
अन्त्येष्ठक्रिया की गं ° | 

सूरिजी कौ देह के अन्तिम दशन करते हुए श्री० गुणचन्द्र ° 
गणि पूज्यश्री के गुण वर्णनात्मक कान्यो; से इस प्रकार स्तुति 
करने खो-- । 


1१, 11 क, व) ~ ~^ ^ ^^ ^ ^ 1 कि, +) 11 





१ पटावय्यों मँकििादै कि आपा सर्मवासत योगिनी केद्ल 
से हज था। 

२ यह स्थान अभी दिष्टी में कुतुव मौनार के पास चड़ ढादाजी' के नाम 
से प्रमिद्धहे। पटाव््यौँ मदम स्तूपर का भविता खोडिया( खज) 
क्षे्रपाक लिखा है। 

३ स० १२३२ पालयुण छुक्ा १० चिक्रमपुरमे इनकै स्तृप्रकी 
प्रतिष्ठा श्रीजिनपत्िपृग्जी ने क्री वी) गणवरसार्षनतफ की श्रहद्वृत्ति 
म इनका परिचय इम ग्रक्रार मिलता है-- । 

ये पट्टे श्राव चे, एक ठु ने ध्नकी हस्तरेखा टेस॒ शह अच्छा 
भण्डारी होगा” नाते र भाग जनि को सम्भावना सै इन्दे ख जजीरसे 





मणिधारी भयीजिनचन्द्रसरि २५ 


8, „क, व, +) 1/1 111 #॥ ४५.०६० ५ ९५ २०६० ^ ० = मण ० ५ 


(१) 
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चयातुचरयमिदं सुदा प्रयतते तद्र पमारोकितु 
मारक्चा्च महर्षयम्तव वन्वः कतुः सदैवोधता 1 
शक्रोऽपि स्वयमेव टदचमद्ठितो युष्मत्प्रमामीष्ते 
तत्कि श्रोजिनचन्द्रसूरिष्ठगुरो स्वर्ग प्रति प्रम्थितः ॥ 


अर्थात्‌--दे सगुरु श्रीजिनच्न्द्रसूरि महाराज । चारो वर्णो के 
रोग सदैव आपका दशन करने के किए सहर प्रयते किया करते 
थे। वसेदीहम साधु रोग भी हमेशा आपकी आज्ञा कै हि 
प्रस्तुत सदया करते थे फिर मी आपदहम निरपराधी छोगोंको 
छोड कर स्वौ सिधार गण उसका ण्क मात्र कारण हमारी सम 
मे यही अता हे कि देवताओं फे साथ स्वयं देवराज शक्रन्द्रभी 

हुत समय से आपके दर्थनों की प्रतीक्षा कर रहा होगा । 

(८२) 
साद्दित्य च निरर्थक समभवन्निलैक्षणं रक्षण 

सन्यीर्मन्त्रपरेरेभूयत्त तथा फेवस्यमेचाध्ितम्‌ । 


चाध दिगा इस विपत्ति के ममय उन्दने छक्ष नपेसारमन् का जपि 
किया निस प्रभाव से जजौर दृट गड ओौर रानि के पिच्े प्रदर म घन्धन 
मुक्त हो कर किमी श्रद्धा 7 धर पहुचे । उसने मदयदो करद्न्दे कोटी 
ल्पालियी! तुहू्कके टुत रोजने परमौये उयफे दाथन स्मे ओर 
राननि फे समय निकल र स्वेठेय लौदे। इम विपत्ति 7 ममयवैरम्य 
पाकर इन्दे श्रीजिनदत्तमूरिणो मदाराज से दीक्षा ्रदणकीौ ची! 


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म्द सणिघारैः श्रीनिनचन््रसुरि 


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केवलया जिनचन्दरसूरि वरते स्वगा विरो ददा ! 





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विद्धान्ठः छकरिप्यते च्च्मिपि यत्तन्नेव जानीम ॥ 


अर्थान्‌-आपक स्वरम पारमे पर सादि शाल्न निरर्थक 
दयो गया. अर्थान्‌ आप दी उत्कं पारगामी ममनत्न यः वं्तद्यी 
न्याया खण शुच्य द्यो गया, जापक्रा आश्रव दूटं जनिते 
नियथार मन्तरश्चाद्ध के मन्त्रं परस्पर मँ मन्त्रणा करते हु कि 
अव द्मे क्ख का सदारा टना चाद्दिए ¢ अ्थनि--आाप मन्त्र 
शन्कर मी अद्ितीव बाता यै! इसी प्रकार ज्योतिषकी 
अवान्तर भद्‌ रसमट-विया ने आपके वियोग मेँ वंराव्य वश 
युक्ति का आश्रय धिया टः अव चिद्धान्त शाल क्या करि? 
इनका मे पता नहीं ६ । 

(३) 
प्रामापिक्छेराषुनिकविवचः प्रमराणमार्न" स्छुटमघ्रमाण. ! 
दहा ! नहाच्ुरस्थिर्तं त स्वरयोधिरोह जिनचन्मुरेः ॥ 


अथान्‌-आधुनिक मीमिक्छ क ययि प्रमाण साने अप्रमाण 
च्््यद्ध गवा ह स्याच्‌ उखा वदाषन् अव परथ्वा पर नर्य 


रुद्धा, श्ीजिनचन्द्रनृरिजी ! आपकर स्वर्गाधिरोदण से सव शास्र 
मे चड़ी दख्चट मच गई ड । 

इछ प्रकार शुर रण नान करते कस्ते श्रीयु्यचचछरमणि अधीर 
दो टे! उनकी खो ते जश्ु्भो की यारा वने ख्गी! इसी 
चर्‌ अन्य साघु छोन भी रुखख्नेद से चिद द्ौकर परस्पर मे 


४, 1 


मणिधारी श्रीजिनचन्द्रसरि २३ 


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परादमुग्च हुए अश्चपात करने खगे । उपस्थित श्रावक छोग भी 
वस्नाश्वल से नेत्रर्ढाक्रि कर दहिचकियां ठेने ख्गे। इम समय 
चारों ओर मानो शोकसागर उमड पडा था। शुरुविरदह कै 
अतिरिक्त किसी को अन्य कोई वात नदीं सूक पड़ती थी । सच- 
मुच उस अग्रिय दृश्य को देख कर अन्य दर्शक छोग भी अपने 
हृदय को थामने मँ असमर्थं से दयो गर्‌ । 


रस असमशस अवम्था को देख कर कुद क्षण के पश्चात्‌ श्री 
रुणचन्द्रगणि स्वयं ध्यं धारण करफे साधुं के प्रति इस 
प्रकार कहने कगे- 


“हे महासत्वशीट साधुओ 1 आप रोग अपनी आत्मा को 
शान्ति द, खोया हा रन अव लाख उपाय करने पर भी हाथ 
नहीं आने का । पूज्यश्री ने अपने अन्तिम समय में सुमे आव 
श्यक करतन्यों का निर्देश किया ह, मे उनकी आन्नाुसार वेसा 
ही कर्ट॑गा कि जिससे आप सव को सन्तोष दो । इस समय 
आप खोग मेरे साथ साथ चरे आद्‌ ।* 


एम समय दाह संस्कार" सम्वन्धी चिया-कराप को सम्पा- 
दित कर सर्वाद्रणीय भाण्डागारिक श्रीगुणवंद्र गणि पौपधशादा 
मे पधारे । वहाँ धं दिन उद्र कर चतुर्विध संव के साथ वन्ये- 
रक की ओर विष्टार कर दिया । 

भ्रीगुणचन्द्र गणि ने वन्यैरक जाकर श्रीजिनचद्रसूरिजी की 
आज्ञाचुसारे नरपति अनि को श्रीजिनदन्तसूरिजी के बद्ध शिप्य 


सणिधासी श्रीनिननचन्द्रसरि २५ 


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महोत्सव मे देशात्तरीय संघ"भी सम्मित हुमा था। इसी 
समय श्रीजिनचन्दरसूरिजौ के शिप्य वाचनाचायं जिनसद्रभी 
आचाय पद देकर श्वीजिनभद्राचायं नामक द्ितीय श्रेणिके 
आचार्यं बनाये गये । 


पटावलियों की दो चिप वातं 


मणिधारीजी करा उप्यक्त चरित्र उपाध्याय श्री जिनपाद 
रचित गर्वाचरी के आधार पर छिखा गयं दै । पटराचचियों मे 
ओर भी कई वाते पाई जाती दहै, जिन मे बहुत सी वातत भ्रान्त 
ओर असंगत ज्ञात होती दु । रेतिहासिक टि से निम्नोक्तदो 
चति छं तथ्यपूं प्रतीत होने से यहा लिखी जाती है - 

१ श्रीजिनचन्द्रसूरिजी ने महत्तियाण ( मन्त्रिदरीय ) जात्ति 
की स्थापना की थी, जिन की परस्परामे से करै व्यक्तियों 
ने पूवेदश कै तीथा का उदार कर शासन की चडी भारी सेवा 
की है सतरदवीं शताब्दी पय्येर्त इस जाति के यहुत से घर 
अनेक स्थानों मे धे पर इसके वाद क्रमशः उसकी सख्या घटनं 


० ०० 


जिनप्तिमरिजी के उपरनुक्त प्रस ते मानदेव कै ममृदधिततम्पच्च ओर 
जिनपत्तिसूरिजौ पर असीम स्ने ऊ पत्ता ठता । स १२३३ क नाद 
भ कल्यानयन ( करनाल ¶ ) स्वनम्‌ इन्दी मनचटेवने श्रो मद्यपीर स्वामी ए 
प्रतिमा धौजिनपतिस्रिजी से स्थापित करवां वी । उस प्रतिमा सा विनेय चणन 
सिनप्रभस्‌रि रचित चिविध-तीपकलय के ऊन्याचयन क्ख तौ देखना चह्षु1 


॥॥ 


२६ मणिधारी श्रीलजिनचन्द्रमरि 


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चटते नाम रेपद्यो गई! इस जातिके विपयमे हमारा एक 


स्वतन्त्र छे 'ओखवाट नवयुचकः के वपं ७ अंक दमे प्रकारित 
हुआ था, पाठकों के अवटोकनार्थं॑उसे परिशिष्ट म दिया 
जाता हे । 

२ श्रीजिनचन्द्रसूरिजी के ठ्डाटमे मणि थी ओर उसी 
के कारण उनकी प्रसिद्धि भणिधारीजी' के नामसे है । इस 


मणि कै चिषय मे प्वीकारो का कहना हे कि सूरिजी ने अपने 


१ मवेत्‌ १४१० की राजगृह प्रगस्तिम इसका उस्टेख इम प्रकार 
प्राग्रा जाता है :- 
तत॒ पर॒ श्रीजिनचन्छमृगयिभूव निन्मगगुणास्तभूरि 
चिन्तामणिर्मारतले यदीगरेऽध्युवराम वामादिव याम्यलन्म्या ॥>२॥ 
( प्राचीन-जन-ठेच-यग्रद, टेखाद्ः ३८० >) 
मके पटे का इत्छेस द्रमारे “एतिदहामिक-जन-काव्य-समह' ० ४६ मे 
प्रचित शखरतरगच्छ पटावखीमे, जोक्रि श्रीजिनमद्रसृरिजी के समयमे 
रची गड वी, मिक्ता है-- 
“नरमणि ए जासु निलाद्वि, कनदख्ड जेम गयणहि दिणदो” 
(वरतरगच्छ पटवो सग्रह” मे प्रकरादित भूरि परम्परा प्रगस्ति" एव 
पट्टी त्रयमे इमा वर्णन विगेप स्प्रसे मिलता 1 ऊगभग उमी 
प्रकार करा वर्णेन श्रीरलितव्विजयजौ विरचित यनोभदरसुरि चरित्र मेँ उन 
धाचार्वशरी के सम्बन्ध मे पाया जाता है । इसकी समानता वतलाने फे ङि 
उस अरन्य से आवय्यक भवतरण यहा दिया जाता है - 


^~ 


मगिध्रारी श्रीजिनचन्टरसूरि २.७ 


अन्त समय में श्रावक छोर्गाको काथाकि अन्नि संस्कतारके 
ममय हमारी दद क सत्निकट दृध का पात्र रखना ताकि वद्‌ 
मणि निकट कर उसमे आ जायगी पर श्रावक खोग गुम बिरट 
से भ्य्रक्ट होने के कारण पला करना भूक गए भौर भवित्त्यता 
स वह्‌ मणिण्क योगीकं हाथ ख्गी। श्रीजिनपतिूरिजीने 
उस योगी की स्थम्भित्त प्रतिमा को प्रतिष्टित कर उससे चह मणि 
पुनःप्राप्रकर्‌ ढी थी। 

मणिधारी श्रीजिनचन्दरसूरिजी बडे प्रतिभाशारी भं ` अततः 
खरतरगच्छ मे प्रति चौथे पटर का नाम यदी रखाजनेकी 
परिपादी इन्दी से प्रचित होने का पद्रावलियो में उल्टैख है । 


नध्री आचार मद्दाराज इम तान्त को सुन कर अपने ज्ञान का उपयोग 
देकर बोखे--मेरौ 4 मदीने कौ आगुःयाङी दै, मेरे मत्तक मे एक ध्रभाव- 
शाखी मिदि रसेचेनेके लिए यह्‌ ( योगी) कट उपाय फरेमा परन्तु 
तुम धट्येदी मेरे भृतक भरीरमेसेउस मणिकौ निकाछ देना भौर 
पीठ अनि सस्करारे करना--ढम तरह फौ मूचना भक्त श्रावफ़ कौ टेकर चिक्म 
स० १०३९ भं भाचा्यं यशोनद्र समाधि पूरवेक स्वर्गा हुए 1 चार्य 
का एवगयाम युन करवद्‌ योगौ तत्का अपनो स्याव मिद्धि केसरि 
वष्ट आ पूर्ुचा । उमने भायां मार कै मस्तफ़ फौ मणिलेनिकै लिए 
धनेक प्रयनन करिए । परन्तु जब्र उसे माम हृजा कि मणि निकाला गया 
ओर यह्‌ मुत्त क्रिमौ तर कोट उपाय करने पर नदी मिवगा त्तव निराया के 
टरा फोन सहन फते हुषएुउमयौगो का हृद्य फट गगरा ।" 


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निरी श्रीजिनचन््सूरिं 


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मनियारी भ्रीजिनचन्दरसूरि २५ 


आपके शासनकाल मे रचित खरतरगच्छ का चिस्तरृत 
साहिल उपटत्थ नदी ह । अद्यावधि हमारे अवलोकन मे केवल 
ण्क ही प्रत्थं श्रद्मचर्यं प्रकरण" गा० द का आयादहै जो 
कि श्राचकर कपृरमह् की छृत्ति ह । यह्‌ घन्थ दोरा सा वं अप्रका- 
शित दानि वेः कारण उस्र पुस्तक क परिशिष्ट में ठे दिया गया है। 


उपसंहार 


महात्मा भवर हरि की यदहः उक्ति “गुणा पूजास्थानं गुणिपु 
न चिद्धन च वयः" सोखृहो आने सत्य है । मणिवारीजी 
करी दीक्षा करव छः वपं ओौर आचार्यं पद भी ८ वं जेमी खु- 
चय मे योगीन्र युगप्रधान परमपितामह्‌ श्रीजिनदत्तपूरिजी के 
द्वारा होना वहुत ही विस्मयकारक णवे आपकी अदिती प्रतिभा 
का परिचायक £ । चंत्यवासी पद्राचन्द्राचार्यं जैसे वय ण्वं ज्ञानवृद्ध 
आचाय को शस््राध मे परारत करना ओर दिीश्वर म्टागाज 
मदनपार क्रा चमत्करत हा अनस्य शफं व्रनना आपकी विरिष्टं 
जीवनी ठैः उत्तम प्रतीक ह । ग्वेद दकि आपः जीचवनचसिको 
श्रीजिनपालोपाध्याय ने चहु ही संभिप्त सूप मे संकलित किया है 
जिसके कारण मे जापक; सन्ये व्यक्तित्व को पहचानमे मे कटि- 
नता होती ६ पर दम श्रीजिनपालोपाध्याय फो दस सदूप्रयते कर 
टि साधुचाद दिये विना नरी रह मयन्ते, वर्योक्रि आज हमे जो 
कृतु भी वास्तविक उतिरत्त प्रात्र हज दईच्रर उन्दीफीष्रपाका 
सुफल ३ । 


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11 अहं नमः॥ 
फरिषशचिष्ठ { ९) 
श्रीजिनचन्दरघठरिजी महाराजकृत 
व्यकस्या-शिच्तए-कुहछश्रू 
पणमिय वीरं पणयंगिवम्गसम्गापवम्ग-सोक्खकरं । 


सिखिाचधम्मसामि तीस्थयरं तव्वदोपदहरं ॥ १ ॥ 


प्रणम्य वीरं प्रणत्ताद्धि-वमेग्गापवगंसौक्ख्यकरम्‌ । 
श्रीपारश्वंधमस्वामिनं तीर्थकर सर्वढोपदरम्‌ ॥ १॥ 


अ्व--नमस्कार फरनेवाटे भव्यजीव ममृद् फो स्वर्ग नौर मोक्ष ऊे 
सुखदे वे धी महवीरभगवान को एव ध्म के स्वामी ऊ करने 
चाले रव र्पो फो दरमेवदि श्री वा्नाय भगवान को प्रणाम फरफे 1 


साहणीणं श | ॥ 
साहटण साहुणीणं, तह साचय-सावियाण गुणरेड । 
संखेवेण दंसेमि, सुद्धसद्धम्मबवहारं ॥२॥ 


4 4 


३२ मणिधारी श्रीजिनचन्द्रसूरिं 


साधूना साध्वीना तथां श्रावक्राविकाणा शुणदेवोः। 
9 ५ [० £ 
संक्षेपेण दश्चयामि शुद्धसद्धमेन्यवदारम्‌ ॥ २॥ 
अर्थै- सधु मान्यो केलि तथा श्रावक श्राविकरार्ओं कं गुणका 
( छ का } कारण प शुद्ध सद्धर्म के व्यवहार को सक्षेप से दिखाता द्र 


५० ^^ १ 1 त स, ^ 


उकस्षग्गेणं अववाय विं-सिद्रंत सुत्तनिदिदट । 


गीयत्थादइणं वा धमत्थमणत्थसत्थहरं ॥ ३ ॥,. 

उत्सर्गेण अपवादतोऽपि सिद्धान्तसूत्रनिर्टटम्‌ । 

गीतार्थाचीर्णे वा धर्मात्थमनर्थसार्थहरम्‌ ॥ ३॥ 

ऊर्य---उत्मगं अपवाद्‌ से आगम-गन्थों द्वारा निरि ओौर गीतार्वौ से 
आचरितं वह वर्म-व्यवहार अनर्थसमूह को दरनेवाला होता है । 


जसि युर मि मत्त वहुमाणो भरं भयं रुजञा । 
नेहो वि अत्थि तेति, गुखु्ल्वाशो भवे सहलो ॥ ४ ॥ 


येषा गुरो भक्ति-वंहुमानं गौरव भय छलना । 
स्नेहोऽप्यस्ति तेपा गुरुकलवासो भवेत्‌ सफट. | ४ ॥ 
अगै--जिनकरौ गुरु महाराज मे भक्ति है, वहुमान है, गौरव रै गुर 
महाराज से जो टरते ह-खराव काम करने मे ज्जा भी करते है भौर 
दाराज के प्रति स्नेद भी रखते ह उन सानु पुरां का गुरकरल्वाख 
सफल दौ जाता हे । 


न्यचस्था-शिक्षा-कृरक्म्‌ 


१ 
॥ 1 


५ + 1१ 


अबन्नवाहणो सीसा, माणिणो छिद्पेसिणो । 
सघुदधिकयमाहष्पा, गुरुणो रिरिणो व ते नेया ॥ ५॥ 


अवर्णवादिनः शिप्या मानिनश्िद्रपरेभषिण. ! 
स्वबुद्धिशृतमाद्यात्म्या रुरोरिपच इव ते न्नेयाः ॥ ५॥ 


अध--जो दिष्य गुस्मदाराज के अवर्णवादी टै अभिमानी ओर 
छिन््रन्वैपी है अपने करो अधिक बुद्धिमान समभने वलि द उनको चिप्य 


नीं शृ्महाराज कै द्रु जैते मानने चादिये । 


कः ५ णसंजत्तो पै 
नाणदसणसंजृत्तो खेत्तकालाणुसारथो । 
1 [ब ० # 
चारित्त बटमाणो जो पुद्सद्रम्मदेसथो ॥ ६ ॥ 
कञानदशेनसंयुक्तः कषेव्रकाटानुसारगः 
चारित्रे वर्तमानो यः शुद्धसद्धमं देशकः ॥ £ ॥ 
अर्भ-जो सम्यग्‌ दर्षन ओर श्रानम य्युक्तटै केत नौर काल ॐ 
अनुमार ही चाचतर मै वर्वमानर्दैयेदी साधु धस्प छद भौर षय धमक 


उपटेश्फ दो मफते ट। 


१ पेटिणो । 


दित] ३--चस्ति। ४--टेगिौ । 


३४ मणिधर श्रीजिनचन्दपरि 


पासत्थाइ भयं जस्त-माणसे नत्थि सव्वहा । 
सव्यविज्जाय-तत्तन्त॒ खमहयुणसंचभो ॥ ७ 1 


[भ्न ॐ हन क र 
वा्र्वम्थादि भवं चस्य मानसे नास्ति सवेथा । 
सर्वविदयात्वन्न. कषमादिसुणक्युक्त 1 ८॥ 
अर्य--यत्तिन आचार बवाठे परासट्थों वा भ जिनके 


क = जाननच्टार छ गः कि 
मव च््ि-तत्वों > जानच्छार दोत हं । 


=-= = 
न्टःहट 1! =) 

[१ क, च ~~ 
कन्> सथयुक्ते दुःतवं € 1 


पुरो जस्स नन्नस्स जओ दहा विचाइणो । 
भवे ज॒गप्यहाणो बरा सव्वसोक्खकरो युर ॥ ८ 1 
परता 


यस्य नान्यस्य जयो भवेद विवादितः। 


र 
युगप्रवान. सर सर्वसौख्यकरो गुरः ॥ ८ ॥ 


त 
वद्‌ यु 


वि 
४ जिनन्धे खन्यत चि {~ त्रिेर्दी-गरी ह न ~ हो स्च्ता ~ 
अथ-जनक चन्युख च्छ्ना विवादा -ाडाः क्र चव चद दह। सक्ता व 
> = प्रधान ग्द सवं = => ~> ==> = 
द्ग स प्रधान गुद सवद च्छ क्रय वाटर दह 


वारसंगाणि संघा वि चत्त पवयणं फुं | 

पासायमिव खंमाव्व तं धेड स्यायसो॥€॥ 
दरादशाङ्धानि संयापि-उक्दं प्रवचनं स्पुटम्‌ । 
प्रा्ाद्मिव स्तम्भ इव-तदूघरति सदा च सः} ६1 


गी जौरनव चोदने स्वय् द्यते अव्चन कटाहे) 


=-= => ~ हमेना वही ि 
छनज) महल न खन क जनन हन्ना वहा युद रयन क्श्ता दह्‌) 


व्यवस्था-िक्षा-कुरक्रम्‌ ३५ 


तदाणाए पयद्र तो, संवो मन्नह सग्युणो । 
वियप्पेण विणा सम्प, पावए परमं पयं | १० ॥ 
तदान्नायां प्रवत्तन्‌ संघो मण्यते सदृरुणः। 
विकल्पेन विना सम्यक्‌ प्राप्नुयात्‌ परमं पदम्‌ ॥ १० ॥ 
अर्थ--तथोक्त प्रवचनाधार युगप्रधान यरु की अक्ञामे वर्तता हुभा 
सधौ सदगुणी कहा जा सक्रताहै। चिना किमी सकय विक्रय के 


सम्यक्‌ परमपद को वृं प्राप्त करता दे । 


जिणदत्ताणमासज्ज, जं कीरद तयं हियं । 
जो तं रुष मोहा-मवारन्ने भमेडई सो ॥ ११॥ 
जिन-दत्ताज्ञामासाद्य यत्क्रियते तद्‌ दितम्‌ । 
यस्तं ख्वयति मोदाद्‌-भवारण्ये भमित्ति सः ॥११॥ 
अर्यै--ध्रोजिनभगयान कौ दौ हद आत्ता कौ भ्रीजिनदत्ताना को 
पाकर 7 जो अनुष्ठन श्रिया जाता चद्‌ ददितकारी रोता! जे मोष 


से उस का--ध्ीजिनदत्ताज्ञा का उत्छ्यन गण्ता रै, वद भवाद्यी मे 
भटक्ता है । 


पदणं सवण क्ाण', विहारो गुणण' तहा । 
तवो कम्म विहाण' च, सीवणः तुन्नणाई्‌ पि ॥ १२॥ 


मणिधारी घीनिनचन्दरमूरि 


[1 


पठनं श्रावणं ध्यानं-विहासे गुणनं तथा । 
तप कर्म विधानं च, सीवनं तुन्नना्पि ॥१२्‌॥ 
क्रना, एक स्थान से दूसरे स्थान पर 


अर्थ-- पदाना, नाना, च्णन 
तपश्चर्या न्व्ाविधान ओर मीना 


जनि स्य॒ विदार क्सनाः युनना, 
दर्न आदि । 
भोयण' सुवण जाण ठाण दाणं निसेहण । 
धारणः पोत्थयाईण, आणाए गुस्णो सया ॥ १३ ॥ 
भोजनं शयनं चानं स्थानं दानं नियेधनम्‌ । 
वारणं पुस्तकादीना-मान्नया गुरो, सदा । १३॥ 
अथ-- भोजन क्राः सोना, गमन करना, स्थिति करना, दान करना, 
न्ति करना, पुस्तक आद्िक्ो का वारण करना इन्यादि अनुष्ठान गुरु को 
यन्न दी क्रे चादि । 
तं कञ्जंपि न कायव्वं, जं गुरु न सन्तियं । 
गुरुणो जं जहा विवि, इल्जा सीसोँ तहाय तं ।॥१४॥ 
तत्कायसपि नो क्तन्यं यद्‌ गुरुभिने सानितम्‌। 
शुरो यद्‌ यथा नु वते कर्याच्छिप्यस्तथा च तत्‌ ॥१४॥ 
दी नदीं चद्िये जो गुर्ओं के अचमत न हो 1 


अर्य- पता कार्यं करना 
ञो काम फरमविं निष्य को चाये क्रि वह उसी 


जव ञं 





५ । पुयव्राडभ च 
पुरयवर्णि। 


च्यवस्था-श्रिक्चा-कृलकरम्‌ ३७ 


1 [न 


वायणा घूरिणो सत्ता, निसेञ्जा पयफवसा । 
चरकी पृषठिवदधो य, पायराहो-पाय पुंखणं ॥ १५॥ 


1 ^^ ५ ५ = न न 


चाचना रुरेयुक्ता निपद्या पदकम्बला] 
चुष्किका प््िपटृश्च-पादाधः पादग्रोखनम्‌ ॥ १५॥ 
अ्थै--आचार्य महाराज से वाचनां का दोना युक्त है । आमन त 


कम्बल चौकी पीरफटक भौर फते के नीचे पादर्रोदछन भी आचर्य महाराज 
केच््िष्टते है) 


अर्थं - वाचनायार्यं के लि निपद्या-भासन पदर चौकी पीटकलकर 
पदतल पादेन होना युक्त है । 


पाएलुं चंदणं सत्त न कष्युराद चखेबणं । 
साबिया धवले दिति, एसो सुगुरु दिक्खिभो ॥ १६ ॥ 
पादयोश्वन्दनं युक्तः न कप्यरादिक्षेपणं। 


श्राविका धवलान्‌ दद्त्येप रुगुरट टः ।॥। १६ ॥ 
व्येप ( विधिः ) सुगुरुदर्शितः ॥ 


अव--अगपूजा के समय आचायटेव के चरणों मँ चटन ल्यगाना 
गुद. न किकपूर्‌ आदिकफा येना। आचाय देव के सामने श्रत्रिफं 
भ्रव डेती हँ मगर गीते गती ह । प्ते सुगुरुटेखे गयेद्। अया 
यह सुगुरु का फरमान दै । 


[1 | 


८ सणिधारी श्रीजिनचन्रमुरि 


अ्--वाचनाचार्य क चरणो मे चन्दन पृजादी दुक्त ह, न क्रि ऋय 
यादि रा डालना] श्रात्रिकर्ण धत्रल दतती द--नगल गानी ह्1 ब 
युगं का फरमान ह 

भम्ि न ¢ ऋ क 
पटुजिणवव्छमर सरिस बाणायरिथा वि होड जद कोवं । 
कृप्पूर्‌वाखिवं [चान्यं [91 ४ [ 

कुप्पूर्‌वानखिवणं तस्त निर करई युत्त 1 १७॥ 
्रभुजिन वहम सद्शो-वाचानाचार्योऽपि भवति यदि कोऽपि । 
कर्मुरवास केषं तस्य-शिरसि त्रियते युक्ताम्‌ ॥ १८ ॥ 

यर्म-- मर्थं च्चे शौजिनवन्छमजौ मदागज के जते वात्रनाचा्र टि 


नडे दो तो उनके मस्तच परर कर्ूग्वान क्र उाल्ना युक्त दी ह 1 


करद बायनिक्डेवा उज्बायस्सय सगथ | 
अक्रघण्य स्कष्पूर न दि्यंति य तस्र ॥१८॥ 
क्रियनि वासनिनभेप-उपाध्यायस्य च संगत्त. | 
यश्चतान सकरम्धूरान्‌-न दीयन्ते च तच्छिरसि ॥ १८ ॥ 
अर्थ--च्पाध्यावजी मद्यादि क्रः उपर वास्त-क्षप क्म करना षगन ह ॥ 


करर गदित अर्ता को उनक् मस्तक पर्‌ नदी त्मने चाहिये 1 


जा सिदटाणियओ श्री, सो दाद्‌ पवयणयहुत्ति । 
पवयणयपभावणा हेड , तस्त पदसारभा ञ्जा ॥१९॥ 


व्यवम्था-श्निक्चा-ख्कम्‌ ३९, 


यः सिदस्थानीयः सूरिः स भवेत प्रचचनप्रभुरिति । 
प्रचचनप्रभावनादैतोः, तस्य पदसारकः कुर्यात्‌ ॥ १६ ॥ 
अर्थ-जो सिह कै जसे होति हवे आयार्यं प्रवचन के स्वामी होते 
ह। पमा जन ऊर प्रवचन कौ प्रभावनाके हेतु उनकी पद्रपूजा पधरा- 
वणौ विस्तार से करे । 


वसदट्ाणिया जे उ सामन्नेण' तु कीर ते सि। 
जंग इाणियाण' तु ज्तौ पंखेवओ समासेण' ॥२०॥ 
वरपभरथानीया ये तु सामान्येन तु क्रियते तेषाम्‌ । 
जंदुकरथानीयानां तु युक्तः स्भेपतः समासेन ॥ २० ॥ 
अर्ै--जो आचाय ये कै संस प्रवचन कौ चते ह उनङी पदपृना 
सामान्यसे फी जती, ओौरजो नाममात्र के आचार्य--जघ्ुफ स्थानीय 
सौगाल फे जसे ६, उनक्री पटपूजा संकेप से करनो. युक्त होती द । 


अद्ाहियादपव्वेयु निज्खछद्‌ छनं गिहेसु जुत्तमिण । 
सामन्नसाहुवत्थाद दाण दियहे न चत्त तं ॥२१॥ 
अष्टाहिकादिपर्वंयु ठीयते छनं गृहेषु युक्तमिवम्‌। 
सामान्य साध्ववस्थायामिदानीं दीयते न युर्तं तत्‌ ॥२१ ॥ 
अथ--जष्दिआदि पयौमे [ गृस्थोके] धर्यं [{ आचाय 7 
श्वि} च्च ख्गणाया जताद्ट। यष युकटट। आजकल सप्मान्य मायु 
भनस्ना गे दिया जाता है ष्‌ यु नद ह । 


४० सणिधारी भ्रीजिनचन्दमृरि 


तदुत्ववयणासत्तो विहाराइसु अड्ड । 
अकहियो क ऋ 
उक्रहियो गुख्णा नेय छेद किंपि न मिच्ह ।॥ २२॥ 
तदुक्तवचनासक्ते विदारादिपु वर्तते। 
अकथितो गुरणा नंव छाति किमपि न यजति ॥ २२॥ 


= ~~~ =^ «~ + ~^ ~ ==> 


अर्य---पूत्रक्तं आवचारयेदेवर के वचनां मेँ आसक्त होता हया साथ 
विदहाराटिक मे प्रगरत्तिक्रतादहै। गुर कै चिनाक्हे नु ल्नाहन 


र 


# 


च्छ छःउता ह्‌ । 


सावि गुरुणा जत्थ जो अल्जादण पालगो । 
तेण ताथ वि अन्जायो, परणिन्जा गुर्तए ॥२३। 
स्थापितो गुरणा चत्र च आर्यादीनां पाटकः । 
तेन॒ ता अच्यार्या. पाटनीया गुरुतया । २३॥ 
अधे--जटा पर जिसक्रो रुव्मदाराज ने आरयादिकों क पालन रा 
म्रने वाला नियुक्त वा हे उनको चाहिये क्रि गुर-आचार्यं के उक्ते ही उन 
आर्यां कौ रक्षा करे । 


गुरु आणारए वड तो सो अन्जारिं पि सायर | 


गुरष्व मन्नणिज्जोचि तदुत्च करणा सया | २४॥ 


शूवाजनाचां वत्तन्‌ स आर्याभिरपि सादरम्‌ । 
गुरि माननीय इति तदुक्तकरणान खदा ॥ २४ ॥ 


व्यवस्था-शिक्षा-ङखकम्‌ ८१ 


1 व, ^ + 1 न १५०५ | क । स, १, 1१, 


अ्थ--आर्याा को भी चाददिये फि वे गुह आज्ञा म वतमान उस पाफ 


कीगुरुकेजसे हौ हमेशा उसकौ कटी दुद अनाकोकरते हुए सादर 
सन्मान कर । 


जह को विदेद्‌ अञ्जाण' वस्था सयणोतयं । 

धेतव्वं तं तदाणाए तारि समणीदिं नस्तदा ॥ २५ ॥ 
यदि कोऽपि उदादयार्याभ्यो-वस्त्रादि स्बजनस्तत | 
गृहीतव्यं तत्‌ तदाक्ञया ताभिः श्रमणीभिर्नान्यथा ॥ २५॥ 
अर्थ--यद्वि कोई स्जन-सम्बन्धी आर्याभा फो वलन आअदित्रताहैतो 


उम पालफ की आक्षा म उन श्रमणीर्यो करो ग्रहण करना चादिये। नही 
तो नहीं। 


सयणा्हिं पि जं दिन्नं तंतस्तप्पिति भावो । 
जद सो तासि तं देद्‌, तया गिष्टंति तागोवि ॥२६॥ 


स्वजनादिभिरपि यदत्त-तत्तम्मायरपन्ति भावतः। 
यदि स ताभ्यो ददाति तदा गृणन्ति ता अपि॥२६.॥ 
अ्प--स्यजनादिनेजो फु दिया भावसे उम-पाटकफ फो अपण 


करना चाहिपे । यदि वद-पाखक उस चस्नदिको उन्दडेतो उस ममयं 
उनफौ ग्रहण फरन। चादिये । 


जई तस्स न निचेयन्ति तं गिण्टंति जदामई। 
आणा भद्रा तया अज्जा पावंति यन मंडङि॥२७] 


४२, मणिधारी भ्रीजिनचन्दरसरि 


~ १५५८ 
[० का, १९११,१,१.१ १२, व , र स 0111 ५“ ५ 


यदि तस्मे न निवेदयन्ति तद्गृणृहन्ति यथामति । 
आननाघ्रषछठा सा आयां प्राप्रोति च न मण्डलीम्‌ ।। २७ ॥ 
अर्य--यदि उस पालक को निवेदन नहीं करती है भौर यथामति- 
स्वेच्छा से अहण करती है तो वे आययि आना से ष्ठ ओौर मडलि 
समुदाय में रहने योग्य नहीं है । 


जह्‌ सो न देड अज्जाणं रुद्धवत्थाई रोह । 
सुगुरुत्ताओ चुक्छो मण्डर पावए कर्द ॥ २८ ॥ 
यदि स न ददायार्याभ्योः छन्धवस्त्रादि ोभतः। 
खशरुतातश्च्युतः मंडी प्राप्ुयात्‌ कथम्‌ ॥ २८ ॥ 
अर्थ--यदि वह पालक लोभ से पाये हए वस्त्रादि उन आर्याओ को 


नहीं देता है तो वह अपने गुरुत्व से र्ट होता है। वह कैसे मडि 
का पान करेगा ? सर्वथा नहीं । 


देषस्स नाण द्वं तु साहारण धणं तदा | 

सावगेदि तिहा कां नेयव्वं बुद्धि भायरा ॥ २९ ॥ 
देवस्य ज्ञान द्रव्यं तु साधारणं धनं तथा । 
शरावकेस्तरिधा कृत्वा नेयं बृद्धिमादरात्‌ । २६ ॥ 

अर्थं ~ श्रावको को देवद्रन्य, ज्ञानदरन्य ओर साधारणद्रव्य रसे 


धार्मिक धन के तीन भेद करने चाये, ओर तत्परता से उसक्रौ शद्ध 
करनी चाहिये 1 


ज्यवस्था-दिषक्षा-कुरखकम्‌ ४३ 


[ [1 1, शा, ११.५१ ~न ~ ~ 


साहू वा साहृणीथो घा कारित्ता नाणपूञणं | 
गिष्डता सयं जति आणा महाय दुर्गं ॥ ३०॥ 
साधवो वा साध्न्यो वा कारयित्वा ज्ञानपूजनम्‌। 
गृणूहन्तः स्वयं यान्त्या-ाच्रष्ठाश्च दुर्गतिम्‌ ॥ ३० ॥ 
अर्थ -- साघु ओौर साध्विये आनपूजा करके स्वय प्रण करते हता 
आताश्रष्र दो कर दुर्मति मे जति दे । 
धञ्ओ स्ख खद्धो, सद्रीवा करटं करे । 
चूक ति दंसणाओ ते दोडं तदपभावगा ॥ ३१॥ 
संयतः संयती श्राद्धः श्राद्धी वा कर्द क्रियात्‌ । 
श्यन्ति दशैनात्ते-भूत्वा तदप्रभावकाः ॥ ३१॥ 
अर्थ-- साधु, साली, श्रावक आर श्राविक्रा यदि ए दरूसगसे कल्‌ 


करते तोवे सम्यक्त्व मेध्रष्ठ तेद आरवे णास्नकी दौट्णा 
फरमेवलि दते 


गिरीणं जे उ गेहाओ, आणित्ता्णपाणगं । 
निक्ारणं विच्छडता, जति ते सगदं कदं ॥ ३२॥ 
गृद्रिणां ये तु गृहा--दानाय्यासनपानकम्‌ । 
निष्कारणं क्षिपन्तो यान्ति ते सुगति कथम्‌ ॥ ३२॥ 
अर्थ-जो साधु साघ्यी गृषष्यो के परमे अमण पान आदि आदार 
फ़ोलखाकरदे अकारणद्ोफेकदेतेद्धच क्ते नुग्तिमे जा स्ते ई! 


य्‌, मणिधारी श्रीजिनयचन्सरि 


[1 ^, , का, 1, त, = < ^~ ~ = ~ 21 


यदि तस्मं न निवेदयन्ति तद्गरणहुन्ति यथामति । 
आन्ना्रषठा सा आर्या प्राप्रोति च न मण्डलीम्‌ 1] २७1 
अर्थ--यदि उम पाल को निवेदन नहीं करती ई ओर यथामत्ति- 
स्वेच्छा से थण करती हतो वे भाययि आना सै षह जौर मडलि 
समुशय भ रहने योगब नदीं हे 1 


सो न दे्‌ अज्जाणं छदवत्थहई कोहो ] 
खशुरत्ताओ चुक्छो मण्डर पाव कर्द ॥ २८ ॥ 
यद्धि सन दढादयार्याभ्योः छन्धवस्वादि छोभत। 
खणुरतातश्चयुतः मंडी प्राप्तुयात्त्‌ कथम्‌ ॥ २८ ॥ 
अर्थ--यदि वद पालक ऊोभ से पाये हुए वस्रादि उन आर्या को 
नदी ठता तो बह अपने गुकत् से ठ होता वद्‌ कैसे मडि 
का पालन क्ररेगा? स्था नहीं! 


देवस्ते नाण दव्वं तु साहदारण धणं तहा | 

सात्र तिहा काडं नेयव्यं बुद्धि मायरा 1 २९ ॥ 
देवस्य जान ठरव्यं तु साधारणं धनं तथा| 
श्रावकेस्तरिवा कृत्वा नेयं बृद्धिमादरात्‌ 1 २६ ॥ 

अयं - श्रावं को देक्रव्य, ज्ञानद्रव्य भौर साधारणद्रनय एते 


धार्मिक धन के तीनभेद रने चाहिये, ओौर तत्यरता स उसकी वृद्धि 
करनी चाद्ये । 


न्यवस्था-रिषक्षा-कखम्म्‌ ४३ 


११ 1 111, 1, | १, १,, ,  , 1, , ', स म 1१.१११ न 


साहू बा साहृणीयो चा कारित्ता नाणपूखणं । 
गिषण्ठता सयं जति आणा मदाय दुर्ग ॥ ३० ॥ 
साधवो वा साध्न्यो चा कारयित्वा त्ञानपूजनम्‌ | 
गृणन्तः स्वयं यान्त्या-त्रा्रष्ठाश्च दुर्गतिम्‌ ॥ ३०॥ 
अर्थ-- साधु ओर माधििये सानपूजा करकं स्वय प्रहरण क्रत हताये 
आताभ्र्ट दौ कर दुेत्ि ओ जति ह। 
ञ्य सद्द कष्टो, सद्धी वा करं करे । 
चकति दंतणायो ते होड तदपमावगा ॥ ३१॥ 
संयतः संयती श्राद्धः श्राद्धी वा कटं क्यात्‌ । 
भ्रश्यन्ति दश॑नात्त-भूर्वा तदध्रभावकाः ॥ ३१॥ 
अर्थ-- साध्‌, साघ्वी, श्रावक्र ओौर श्राविका यदि एक दृ से क्ण 


~ = ॐ, 


करते £ तोय मम्ययत्य सेभ्रष्ठ रोते भरवे घासनकौी दटणा 
परनेवाटे रोते हं 


गिहीणं जे उ गेदाओ, आणित्तास्रणपाणगं । 
निकारणं चिच्छडंता, अंति ते सुदं कहं ॥ ३२॥ 
गृहिणा ये तु ग्रहा--दानास्यासनपानकम्‌ । 
निष्कारणं क्षिपन्तो यान्ति ते सुगति कथम्‌ ॥ ३२॥ 
भर्थ-जो साधु माघी चृदम्पोके चरमे अमण पान आदि साद्रर्‌ 
फोर करके अकारणष्टो पकरेतेह यने सुगतिनेजा म्तेर्ह! 


४४ भणिवारी श्रीजिनचन्दरमरि 


~ ~~ ~ ^ 
1 [1 1 


संगति यजे दव्वं गुर्णं न करति य। 
ते वि भष्टाहमा धिदा भमंति भवसागरे ॥ ३३ ॥ 


संगरणृहन्ति च ये ए्यं, गुख्व न कथयन्ति च । 
तेऽपि शरष्ठा अधमा धृष्टा भ्रमन्ति भवसागरे ।३३॥ 


अर्थ- नो माय घान त्रन्य का सग्रह त्ते ह भौर गुरुको नदी 
कटने चे नी भ्रष्ट अत्रम शौर ध्रौटे नवमागर में भक्ते ह-- 
वते हं । 


अवेखाए न साहणं बसहीए साविगागमा । 

साहृणीए विसेतेण ना सदायाद्‌ संगो ॥ ३४ ॥ 
 अवेदायां न साधूना वसतौ श्रायिकागमः। 
साध्या चिग्पेण नासदायादौ सद्खत. ॥ ३४ ॥ 


अयं--विना समय मायुओ के स्थान मँ श्राविका का आना उचिन 
नीह 1 विगेयदल्पमे माव्वीयोका आना भौ सगत नदीष्टै, दय 
दाव अवस्था मं सगत हो सस्ना ड) 


गीयत्था गुरुणो जं जं खित्त काराई जाणगा | 
करिति तमगीयत्थो जो ज्जा दंनणी न सो ॥ ३५ ॥ 


गीतार्था शुरवो यद्यन्‌ क्षे काटादि जायका. । 
छन्त तदगीतारथो चत्‌ छया दर्शनी न सः ॥ ३५॥ 


च्यरयम्था-रिष्चा-कय्कम्‌ चक ५, 


[)) [1 


अथ-क्षेत्र फलादि को जानने वटि गौताथं गृडलोग जौ करते ् 
उमफ़ो विना मममे जो अगीताशव आचरते ई वे मम्यक्तौ नीद 


सुद्धमृद्धम्मकारीणं जे युगुरुणमतिए। 
सुद्धं खद सणं लिति सम्मातिद्धिसदावदं ॥ २६ ॥ 
शदधसद्ध्मकारिणां ये सुराख्णामन्तिके 1 
शद्धं सदर्शनं खान्ति, स्वर्ममिदधिसुखायदम्‌ ॥ ३६ ॥ 
अर्भ-- ददर सद्म को करनेवटे गुरभो फे पाम जो शद मम्यगद्णन- 
मम्यक्ल सेते द्ध! उनक्ै व्थ्यि वह गुण स्वग-मिदधि के युगकरो 
करनेवाय होता दै । 


सावियाओ पि एवं जा गिन्हंति य यु्दं्षण । 

तासि प्रीरदन्वाहदं दोजा सुगुरुषेतियं ॥ ३७ ॥ 
श्राविका अप्येवं या गृण्न्ति व मुदर्शनम्‌। 
तासां शरीगद्रन्याणि भवेयुः सुगुरुसत्कानि । ३७॥ 


अर्म-जो श्राविक्राय भी एम प्रकार रर्छनफो प्रहण फनी दं । 
ये तन, धन से शमे मे मद्व ततर रदती ६! 


सावया साविया ओ वा गुरुचचातं धणादयं। 
जे न वांछति तं दार दिन्नेपि गुरणा पुरा ॥३८॥ 


॥ 41 


गुरच्वाचट्वनाद्क्रम्‌ 1 


[^ 
1 


यं 


ग्न्य 


॥, 


न 
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रत्व ‡८ 


रः 


आआविक्ववा 


८१५११०५५ ०१ १००५९ 


आरतरिच्छः 


0 


पुन 1 य ॥ 





(1, 


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€] युग्म 


सव्वहय 1 


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हि सन्वह्‌ 


दृसत्सठः तत्या | 


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स्वमतिवश्रा 


{ज 
च क्न्य 





३६ ॥ 


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जवरखीवं पि सायरं 1 ४० ॥ 


धण वन्व्रर्याचय; ज्र 


1 (* 
ध 
11, 


न्यवस्था-शरिक्षा-कुलकम्‌ ४७ 


0 त त, त, 1, 0 ^, 


तद्राण्ाण साहूण, मन्नवत्थाइचि्तण 1 
कुणति समणीणं न, तेति सम्मत्तमतिथि किं ॥ ४१॥ 
तत्स्थानस्थानां साधूना-मन्नवस्त्रादिचिन्तनम्‌ । 

कुर्वन्ति श्रमणीना न, तेपा सम्यक्खमस्ति किम्‌ ॥ ४१॥ 


अथै धार्मिफ बुटुम्ब स्वानीय साघु भौर स्वीयो के अन्न-चस्त्न सादि 
श्री यदित ध्रावक चिन्ता-मार मभाल नहीं रखतेतो उनम सम्यक्त हेता 
षेक्य अर्थात्‌ नदीं दोतता। 


जयो वोचं सुस्घ्रस धम्मरायो गुरुदेवाण समादीए्‌ । 
वेयावच्चे नियमो सम्मरिषस्त लिगादं ॥ ४२॥ 
यत्त उप्तं शुश्रूपा, धर्म॑सागो रुरुदेवानां समाधौ । 
चंयतरत्ये नियमः सम्यच्प्टेरिद्गानि ॥ ४२॥ 
अर्थे दरीलिये कदा दै कि सुर्यो कौ छश्रूमा करना, धर्मं पर राग 
रखना, गुर्ओं फी समाधि फो वदना, चेयायप्य फरने फा नियम रयनाये 
राम्गग्र्टि फे चिः दै । 


साहण कण्पणिज्जं जं नवि दिन्नं कहिं चि (किंचि) तदहि । 
धीरा अहुत्तकारी, युसावगा तं न भुंजति ॥ ४३॥ 


साधूनां कल्पनीयं यन नापि कर्टिचिन किथ्िततरहि । 
धीरा यथोक्तकारिणः सुष्रापका तेन युखन्ते॥ ४३ ॥ 


४८ मणिधारी श्रीजिनचन्धसुरि 


नण 


अर्म- तथोक्त कर्मों को करनेवटे यौरञश्रावक कटी पर ङछमी 


१०११७५०० ८००००००५०१०७.०१ ० 





- 
साधुर्मो क च्वि ज ऋ्यनीय होता ह" उपे खाधुरओं छो त्रिना दिये 
नदीं भोगते ह । 


बमरदी्यणापणमत्तपाणवत्य पत्वाहं । 
जवि न पठ्जत्तथणो थोवा वि हु थोवयं दे ॥४४॥ 
वसति-सयना-सन अक्तपान वस्त्रपात्राणि । 
यद्यपि न पर्याप्नथनः स्तोकादपि स्तोकं देयात्‌ ।॥ ४४ ॥ 
अर्य- यद्यपि श्वत्रक पर्याप धनवान दोन पर म वनति स्थान 
न्या-चथारा आसन भान-पानी-गौपघ-वस््र-धात्र यादि थोडे भी योडाटे 


एगं विसोचगं सद्र तिसु रणसु दे्‌ जो । 
अदिगं वा उपबादसु घम्मत्ति हाद नन्नहा ॥४१॥ 
एतद्‌ विसोपकं ( भानं ) ्द्धस्त्रिपु स्थानेषु ददाति यः। 


अधिकं वा उत्सवादवियु सम्यक्त्वी भवति नान्यया 11४॥ 


४41 


अर्थ-त्तीन स्वानो म-देवगस्नान तर्यो की मद्‌ ओँ धावक एक 
दिस्ा दे उत्मवादिन्नं न अविक भौ ठे। अन्यथा सम्यक्व 
नदीं दौ नता 


अग्माहणं तु जम्मरो य॒ नामाकरण मंडणं । 
पत्ता विवादो य वंति उस्पवा इमे ॥ ४६ ॥ 


च्यवत्था-तिक्षा-ढुखकम्‌ ४९ 


+ ^ न 1 +त 2 ^ ३ 81, 0 ^ क, 


सीमन्तोन्नयनं तु जल्म च नामाकरणं युण्डनम्‌ । 
पुत्रादीनां विचादश्च भवन्ति उत्सवा इमे ॥ ४६॥ 
अर्व--सीमतरर्म-जन्म, नामङरण, मुण्डन, पुत्राटिफौ के विद्राहये 
उपसव फे रथन दते ईह! 


उस्तमगेणासणा्ईहणि कण्पणिञ्जाणि जाणिड । 
आद्ाकम्माद दोसेण, जाणि चत्ताणि दूर ओं ॥४७॥ 
उत्स्गणासनादीनि कर्पनीयानि न्नात्वा । 
आधाकर्मादि दोचेण ्ात्वा याज्यानि दूरतः ।॥ ४५ ॥ 
अर्भ---उल्मगे से कत्पनीय भसन प्रान आदि फो जन कर मधु ले, 
र यधाम आदि दोपू्ण जानकर दूर्‌सेदो यागदटे। 


दायव्वाणि जणं तु जेण वुत्तं जिणागमे । 
पिडं सेज्जं च यत्थं च पत्तं सिज्जंमवेण उ ॥ ४८ ॥ 
टात्तव्यानि यतीना तु येन प्रोक्तं जिनागमे। 
पिण्डः शच्या च स्त्रं च पात्रं च सय्यंभवेन तु ॥ ध्य ॥ 
अर्प--यत्िर्मोका यने सोस्य पिट, मय्या, वस्र भौर पात्रश्रौ सम्य 
भवानार्गं ने दक्र्ध॑फालिस--निनागमं गे फटा द उसे जने । 


प्व युव्रहुहा सुले योत्तमलथि जदट्टियं । 
तदायथायओ वावि नाणादत्तयु दंसियं ॥ ४६ ॥ 


५० सणिधारी श्रीजिनचन्दमृरि 


१०८१०११० ८०.०० ८०.८००... ००.००.० 


एवं युवहुधा सूत्रे प्रोक्तमस्ि यथास्थितम्‌ 1 
तथापव्रादतश्चापि नानासूत्रेषु दशितम्‌ ॥ ४६ ॥ 














अर्थ--उत प्रकार सूत्र मे यथास्थित उत्सं मार्ग बहुत प्रत्र से कदा 
हया दहै तया अपवाद मौ नानाक्पचे सनो र्म दित हे। 


अर्च्चतियाववाएणं कि पि कत्थड जपियं | 
गीयत्थौ तादिस्ं पप्य, कारणं तं करद य ॥ ५० ॥ 
आलन्तिकापवादेन करमपि छत्रचिल्ल्पितम्‌ । 


गीवार्थस्वादश्ं प्राप्य कारणं तत्‌ करोति च ॥ ५० ॥ 


अर्थ॑--क्दीं > आत्यतिक अपवाद चे भी ङ्का हुमा होता है, 
उस्कोषरतैदी शाप्त होने पर गीतार्थं आचरते ई 1 
तंकरंतो तद्य सो वि मन्जिज्जा तो भवण्णवे | 
एका आणा जिणाणंतु तं इुणंतो तयत्वरे ॥ ५१ ॥ 


तल्छर्मन्‌ तथा सोऽपि मनज्जेन्न भवार्णवे । 
एषान्रा जिनानां तु तां उर्वन्‌ तयुत्तीर्यात्‌ ॥ ८१ ॥ 


अ र [9 मीतार्य न ९ (व 

- वे गीताय उम--अपवाद को आचरते हुए भवसमुद्र म नीं 
दूबे प्रत्युत य चिने्वरो को आना है उसको करते हए उत संसार सागर 
घर पार उतर जते ई । 


व्यवम्था-धिभा-कुल्कम्‌ ५१ 


[^ स, 1110 ॥ ॥ 





1, , त, त, 1 


जथो भणिय मिणं र्ते 
तंथरणंमि असुद्धं दृण्टवि गिदतं दितयाणऽदियं । 
आडरदिद्ितेणं तं चेष हियमसंधरणे ॥ ५२॥ 
यतो भणितमिदं सूत्रे ५ 
संस्तरणेऽशुद्धं योरपि गृण्ठतो ददतो ऽदितम्‌ । 
आतुर र्ान्तेन तच्य॑व॒द्वितमसंस्तरणे ॥ ५२॥ 
अर्व दमत्पि सूत्रम ग्द फा जि- 
मुपे निदि दते दए भ॒द्धसेने वटे भौर देने यटिदो्नाफा 
अद्धिति ष्टोतादै। तेोगोगी कैः उदाहरण से निर्वाह न ्टोने पर शद्रद्र 
त्ने भौरदेने बरटिद्धोनं फा दित दौता दर 


“नय किं पि अणुन्नायं, पडिसिद्धं वाबिजिणवरिदेहिं । 
एसा तेमि आणा "कञ्जे सच्चण होयन्नं' ॥ ५२ ॥ 
न च क्रिमप्यनुत्नातं प्रतिषिद्ध वापि जिनवर्नटः। 

ए्पा तेपामाक्ञा, काय्यं सत्येन भचितन्यम्‌ ॥ ५३ ॥ 

भर्थ--श्रीतीथफर भगवान ने एकान्त स्य न स्रिसी काय का भनु- 

मोदनो करियाहि, नक्रिमी षा निपेधदहौ कियाद! यद्‌ उनी अन्ना 
है 9 नकां करते हुए सभि से पदि दोना चाहिये \" 


५ रथनिङ्ग सत्र (ए ११० ) फो पटली परिम 1 
"दोष्टूतनि गेण्टन दतयाणडद्धिय 1" 


८२ मज्िामी श्रीजिनचन्धममि 


[ण क कक कक क ~~~ ^~ ^ ~~ ~ ~^ ~ ~~ ~~ ~~~ ~ ^ 


मा कृड अड तिनिच्छं, अदिया सेख्ण जई तरड मम्म । 
अदियापितरम्ब पृणा, जह जागा न दायन्ति॥ ५४॥ 


मा क्ररोतु चदि चिकिन्ां अध्यासं यदि तरति सम्यच्‌ । 
अध्यासतः पुनयदवि यागा न द्वीयने।। 4४ ॥ 
अचिकि मनक्मे वदि भट प्रकाम ददन च्म्ना गत्य 


तो यदिच्छीनभे निन मदन क्गन दए भग-सन उचन यर जा 


कन्तारराह मद्राणा उम (१) गेन्न माई कल्जयु | 

सव्वायरण जचणाए कृण जं चाहु करणिन्ं ।॥ ५४ ॥ 
कान्ताररोद्‌ विकटाध्वनि ग्टान्यादरि-कारयपु 1 
सर्वाद्रण यवनया क्रराति यन्सायुकरणीयन्‌ ॥ ‰५ ॥ 


[र भ 


। 


अय- मयत यटवौ वादित्र पार्‌ ञ्रत हृद्‌ चिच्छ्टं मानं > अनि 
परया रोगदं कवी जो गने योग्यं कऋनदोताद् उसको माघ 


मर्वहिर सै यनना पूर्वै ज्रता द 1 


जचञ्जाव सुरणा अद्रमसदण द्रमसुद्धेण वात्त क्यच्व | 
वसह बारसत्रात्रा अटत सक्षणा मात्रा ॥ ५६ ॥ 


चावच्ीवं गुसो. शुद्धाघु्रेण वापि कर्तन्यम्‌ । 


वृषभस्य ढाद्यावपं अषटादल् भिक्षो मासान्‌ 1 ५६1 


व्यवग्या-शिक्षा-ककफम्‌ ५३ 


अ्थ--यनिजीवन गुदे णौ रशा परिप्थिति ॐ अनुद्ध्य शुद्र धथद 
तरौकरेसे भौ करली दी जरिये! चे कौ गर्‌ वपं परयत सौर भिषू- 
पाधु की अण्रारेह मास त्तक। 


असिषे ओमोयरिए राय प्रु सए य गेदन्ने । 

एमादकारणेदि आदाकम्माहनयणाए | ५७ ॥ 
अरिवेऽवमोदरिफै (दर्िक्षे) राजप्रष्िष्टे मये च ग्छान्ये 1 
दयादिकारणे-सधाकरस्मादि यतनया ॥ ५७ ॥ 


अर्थ--आणिव जौर दुप्ार क उपभ्थित्त मे पर, राजाके प्ररि 
हि जनि षर, भयकी अवरस्थाभ, चीमारी फो अवस्था मे, ए्खादि कणोम 
यत्तना से आधारम आदि त सेवन होता दे। 


जयो सिद्रेते पृत्त-- 
काले चिय जयणाएु मच्छर रदियाण उज्जमंताणं । 
जणजत्ता रदियाणं, दोह जहचं जण सया ॥ ५८ ॥ 
यतः सिद्धान्ते प्रोक्तम्‌- 


काठ एव॒ यतनया मात्सयैरहितानायु्यमचताम्‌ । 

जनयात्रारहिताना भवतति यतिच्वं यत्तीना मदा ॥ ५८॥ 

सर्भ~- सत्तमे फरमाया है [सयदा माल रढिनः पयमने उयम 
शीर, ठोकयाना मेरि सापुभे, फी माद फी यतना टौ यत्तिषणा 1 
स्थन गमये साणसधृ ो सपूर्ं। 


५४ मणिधारी श्रीजिनचन्दरसूरि 


= १0५ ११०५ .००.०२.०३. 


सारंबणो पडतो बि अप्पाणं दुग्गमे वि धारेह । 
इय साठंवणसेवी धारेह जह्‌ अद भावं ।॥ ५४६॥ 





सारम्बनः पतततोऽप्यात्मानं दुर्गमेऽपि धारयति । 
इति सःखम्बनसेवी धारयति ययशठभावम्‌॥ ५६ ॥ 
अर्थ- सहारे वाला व्यक्ति दुर्ग॑ममागे मे गिरते हुए भौ भत्माकी 
रका कर ठेता है । इसी प्रकार सकारण अपवाद का तेवन करने वाल भौ 
यद्वि सरक भाव को रखता है तो अपने आप को दु्ैति से वचा च्ताहै। 


वत्त सिद्धन्तरुत्त ु-गीयत्थेदिं वि दंसियं | 
तमित्थारुवणं दद, सुदु पुट न सेसयं ॥ ६० ॥ 
प्रोक्तं सिद्धान्तसूत्ेषु-गीतार्येरपि द्र्ितम्‌ । 
तद्त्रारम्बनं भवति सुष्टु भ्रष्टं न रेपकम्‌ ॥ ६० ॥ 
अ्थ-सिद्ान्तसू्रौ भँ कष्टा हुआ ओर गीतार्थं आचाय द्वारा दर्दित 


मार्ग हौ यहां प्र ाल्न दोता है जो कि भली प्रकार पृष्टा इया समा 
हआ होता है । दूसरा नदीं । 


साहम्मियाण जो द्वं, ठेद नो दाउमिच्छद्‌ | 
संते पित्ते सगेहेवि होज्जा फ तस्स दंसणं ॥ ६१ ॥ 


साधर्मिकाणा यो द्रन्यं लाति नो दातुमिच्छति । 
सति वित्ते स गेदेऽपि भवेत्‌ किं तस्य दशनम्‌ ॥ ६१ ॥ 


न्यवेस्था-रिक्षा-कुनङ्म्‌ ५५ 


अर्व--जो साधर्पि्योकैद्रव्य कोटेकेतारै आर भपमे परमे धन 
के ष्टोनेि षर भीदेना नदीं चाना टै उमको भी कमा दयीन मम्यक्त दो सतना 
है? भर्थाच्‌ नदी! 


सयं च किहियं दिन्नं जाणतो विह जप्‌ । 
मया न किहियं दिन्नं नो जाणामिच्चि मग्ग ॥६२॥ 
स्वयं च छितं दत्तं जान्नपि खट्ट जल्पति । 
मया न लिखितं दत्तं नो जानामीति मारितः ॥ ६२ ॥ 
अ्थ--गुदने ल्पा साधमीं नेदियाद्धैःफिरमौ जो मागने पर्‌ 
जानता भाभी क्दूताट, नेनि किचादै नतुमनै दिया, नम 
जानता दी टं । 


पच्चक्खं सो युसाचादई लोए चि अपभावणं । 
कृणंतो चिदिह मूर सो दंमण मदद.मं ।॥ ६३ ॥ 
प्रयक्नं स मृषावादी खोफे ऽप्यप्रभावनाम्‌ । 
एुवंपेदयति मूलं स दशंनमषटव मस्य ॥ ६३॥ 
भध - पट्‌ प्रययर्भ गृपागापौ द लोफ म अप्रभावना निदा फो करता 
हुआ सम्यत म्प धमरे भारो पेद फो जसको फाटताद्ै 1 


समं साहम्मिएणा पि. राउरं देररं करे । 
दीरयं धरणं जुद्धं, सो पिह न्द्‌ दंसणं ॥ ६४ ॥ 


५८ सणिधारी श्रीजिनचन्षुरि 


एकाक क क 





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समं साधर्सिकेणापि रजद्ध देवछ्छं र्यात्‌ । 
दढन धरणं युद्धं सोऽपि खट नाशयति दनम्‌ ।। ६४॥ 
अयनो माधमिन्र के साथ ओ राज ठरवार्‌ करता है दीलणा- 
तिरस्कार करता ह, धरणा ठेता है, बुद्ध करता है कह अपने सम्यक्ते का 
नाय करता ह्‌ 1 
साह वा साव्रमोवावि सराहुणी सावियाह्‌ वा 1 
वाडिप्याया वि ञं संति गुरुधम्म द्दुमस्स ते 1 ६४ ॥ 
साधुर्वा श्रावको वापि साध्वी आविकादिर्वा । 
इृ्तिप्राया अपि ये सन्वि गुरधमंहुमस्य ते ॥ ६५॥ 
अर्थ-- जे दारु श्रावक खाष्वौ ओर श्राविकर्ये भौ चंडे वर्म्प पेड 
नी रक्षा करते वाटी बाड के उवे हे वे । 
पालणिज्ञा पयत्तण, वत्थपाणासणणा 1 
सायरं सो न तेसि तु करिज्जा सुवेहणं ॥ ६६ ॥ 
पाठनीयाः प्रयत्नेन चस््रपानासनादिना । 
सादर स ने तेषां इक्या समुपेक्षणम्‌ |) ६६ ॥ 
अयं --वल्न खान परनि आरद से याद्रपरक पालने योग हँ । उनको 
द्द कमौ भी नदीं करनो चाहिये 1 
जह सो वि निग्युणो नार समरईए वि विद्ड। 
सा बाड़ी उक्खया तेण संतति धम्मद्दुरक्खमा ॥६७ 


न्यवस्था-श्रक्षा-कुखकम्‌ ५७ 


यद्वि सोऽपि निगुणो नात्वा स्वमलापि निन्दति । 

सा इृत्तिमत्ता तेन सती धमंदुरक्षिका ॥ ६७ ॥ 

अधं --यदि वह निगुण जान शरफे भौ खच्छन्द्तया निदा करता टै 
तौ उमने उम धर्मनृक्षफौरभिकावाटकोदी तेददोद। 


आणा वितेण सा भग्गा गुरुणा सोक्खकारिणी | 
मिच्छदिष्ितमो भो वि लद्धु तर्लक्खणावरिं ॥६८॥ 
आत्तापि तेन सा भ्रा गुपेः सौरम्यकारिणी | 
मिथ्याृषितया सोऽपि लब्धुं तरक्षणावलीम्‌ ॥६८॥ 
भ्थ-उगने मिध्यारिगावमे, सौर मिध्यादटि दे चि-ुमत्ि की. 
परपरा पने फो परमनुन फरनेवाटी गृसमहारानं फौ भात्रा भो 
गाण्ठितिफरदौ) 
जणद्‌ निववुदं जन्तु-जायं फरमणुत्तरं | 
गुरुधम्मदूमार्दितो तेण तं पिद हागियिं॥ ६९ ॥ 
जनयति निरति यत्त॒ जान फरमनुत्तरम्‌। 
शुरधमद्रुमान तेन नद्मि सदु दारितम्‌ ॥*६॥ 
अयज निएतमौ वहा करना रेपे प्पे वन्न दषा 
भयुस्पस उमये भो उमनें निमे फेः एयर दमा 
नोयणं पिदुतोदहर जा दाडं जाणड तयं। 
परदृव्वयणं शोच्या जा रोसेण न सिष्य | ७० ॥ 


५८ मणिधाम श्रीलिनचन्दरमूरि 


जन न त ००१ १,1,१,॥ न 1 








५८००५०५ १ 





^-^ 


मोदनमपि खट स ददाति यो दातुं जानाति तकन्‌ । 

परटुर्बचनं श्रत्वा यो रोपेण न जीयते 1 ५० ॥ 

अथं-दूसरे क द्धन को युनकम् जे रोपमेपूर्ण नीह जता 
बद्री महापु दूसरो को वर्मे प्रेरणा क्म्तादई यौरभ्रग्णा क्लाभी 
जानता ष्ट 


नाहंफारं करेदत्ति मायामोदषिचञ्जिथो । 
भुव्वंजीवदियं चित्त जस्सस्थि सुविवेयथो !\७१। 
नाकारं करोतीत्ति सायामोहविवजितः। 
सर्वजीवष्ितं॑चित्ते यस्यास्ति सुविवेक्रतः ॥७१॥ 
अवं--निसमे चित्तम उुव्रिवेक से स्तर जीवों का दित रहा हसा है 1 
वट्‌ मायामोह से रदित व्यक्ति कभौ अद्श्नार करो नदी करता । 
जा कावि गुस्णो आणा सुद्रसद्धम्मसराहिगा । 
कहिया हियाय सम्मं कायन्धा विहिणा य सा 1 ७२॥ 
या कापि गुरोयना शुद्धसद्धर्मसाधिका। 
कथित्ता दित्ताय सम्यच्छ्‌ कर्तैन्या विधिना च सा ७२) 
अर्थं --ज॒द्ध सदरम को साचने बाखी जो कुछ मी युर महाराज श आना 
म्री 1 दततक ल्िकदी है 1 दिपो के विविपूरवक उते पालनी चाद्ये ! 
संखेवेण मिहुत्तमागममयं गीयत्यसत्थोचियं, 
कीरंतं गुणहेउनिव्यदकरं भव्याण स॒व्वरेसि ं ¦ 


ल्यवल्था-्िषक्षा-कुखकम्‌ ५९ 


साहं समणीगणस्सय सया सडदाण सडदीण य, 
सिक्खत्थं जिणचंदस्रिपयवीतेसादगं सव्वहा ॥७३॥। 
मन्मपेणहोयतमागममयं गीतार्यशास्नोचितं । 
छेद गुणहेतु, निव तिकरं भ्याना सर्वेपां यत्‌ ॥ 
साधुनां श्रमणीगणम्य च सदा श्राद्धाना श्राद्धीनां च । 
शिध्रार्थं जिनचन्दरसूरिपदवौसंमाधकं सर्वथा 1५३॥ 
र्व - यहां सक्षेष मे आगमनम भौर गीताधी के निदान्त कं अनुद 
गुण फरण करो प्रकटानि वाला, सव भव्यान्मान कौ निप्रत्ि उरग बाला सषु 
सानो सरुषा को आर धरावर श्राविका ममू को लिक्षा तरेते के यथि स्था 
ध्रीजिनचन्धमृरि ( तीथकर आर नायाय>) पद को साधनपाया पिपय 
पह दमम मपिणचद्सूरि' दनद मै फत्ता ने स्यनाम भौ सृति 
12/18 
एयं जिणदचाणं करद जो कारवेद्‌ मन्नेद । 
सो सन्बदुहाण खं जनंजङि देड सिव मेद्‌ ॥७४॥ 
एता जिनटत्ताप्ता करोति च क्रापयति मानयति । 
स सवटुःपेभ्यो न्प जलय ददाति भिचमेति ॥५९॥ 
सम म प्रर जिन भगवनको षौ [छर पौिनश्ततूत 
गृष्पचे ) भ्न नो तो भायम्ना दकम म पक्त शरव्राता ६, मानता 
त करसथदुय पो ण्ट स्यालदकद पौर मोमो पयित ६। 
साधु-ताभ्वी-द्रावक-ध्याविक्ा गिन्ता बुलक्म्‌ 


ग्नम्‌ 


| 
करशिकषेष्ट ( द} 
1 ॐ नसो वीतरागाय ॥ 
श्री कपूरमछ् विरचितम्‌ 


बद्मचर्य परिकिरणम्‌ 


पड्म रयणाई रया, भासुरकिरणेदिं नहयरं चित्तं । 
देरविदमउछिलच्छी, नमिय जिणं वसद कमकमङे ॥ १॥ 
णिनियञअणंगवीरः, सुद्धप्पा ऋायमाण त वीरं। 
निभिय सिरिधम्मसिदहरं, वंभवयं सु नध चोच्छामि ।२। युग्मं 
तं ्व॑भवयं दुवि, दव्वं भावं जिणेर्हि णिदि 1 
जो चरइई सम्मणाणीः णिन्वाणसुदहं च पावेड।॥ ३॥ 
वंभ भणियइ आया, तस्ख सरूवं च चरइ जो साहू 
सो भाववंभचरणं इत्थीवायेण दव्बो य 1४) 
नरतिरियदेवइत्थी उवखाद््य धाओ दारुचित्तंगा । 
मणचयणकायचाये नवकोडिव्सिद्ध सो साह ।॥५॥ 
चारितमोदउद्ये इत्थीरूतेण रंजिओ मूढो । 
ते खुद अवयठाणा पुगखदव्वस्स परिणामा 1! ६ ॥ 
परिदरह एस इत्यी ङच्छियमटधाओ असुदठाणं च । 
सूडपडणगट्णधस्मा रागचिसं कारिणी वही ॥ ७॥ 


बरह्मच परिकरणम्‌ ६१ 


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जह. धद महराभरियो चंदणछुधुमेदि पृ्यो उवरि । 

स कटं हव वियुद्धो तद अमुरसरीरगणं जाण॥पय॥ 
जह अस्थि भक्वंतो सुण्न गल्नहि सदिरनिस्सरद । 

तं णियमटेण रज्ज तह मृष्टो रजण विसण्॥६॥ 
पुन्वुटयविसययुक्वं भुनंतो जीउ वंधण पाव | 
पुनघ्एणं खीयड सो णाणी जो परिघ्यड ॥ १०॥ , 
जो परदेिरना णिगरहण य करड्‌ अणुययं। 
अप्पसहावे युर सो गीरावो वह साह ॥११॥ 
इयं असासद वुंढी तमि पेम न धायये। 
काण्ड एगमप्पाणं नं प्रविष्ट धुवं पयं ॥ १२॥ 
असु असाम जो पमया चय अलुद्रधक्रारिणा । 

र्ट दिव्वमष्ाच्च्छी सा गा वरहु चरगणा ॥ १३॥ 
सुट भु सामः जा मोष्टागिभि णिज्ो य सिरिवसः। 

पुणरपि न देढठ गमणं अरग भागिणी सुजला ॥ १५॥ 
तम्मिय जराण मस्यू अमियरसं अषरपाणिचंराभा। 
सारमहुसिद्धिरमणी अणतयुष्काग्णी लच्छी ॥ १५॥ 
जड चय: अण त्यी गिम्मन्यर्यणरि मुज गम्‌ । 
आयर तया लच्छी णिग्यममुट दह सा ग्मा॥ {६॥ 
जो दव्रह यौीयरागा पेवन्मदस्यणभृमियसरीगो 1 

मनो रमर सिद्धिरमणी नय अन्नो जिनवमे भणणद ॥ १८ ॥ 
परं पिसुद्धिमान्य६ चं पयर मिद्धिन्न्यीयमंदधिर । 

भंजद अणंनसुक्रं नुदं निदं मदाषिव्यं ॥१८६॥ 


६२ मणिधारी श्री जिनचन्द्रसुरि 


सपरं वाधा सदहियं विदधिन्नं वंधकारणं विसमं । 
इय पंचमटवियुक्कं तं युद्धं जिणवरो भणड्‌ | १६ ॥ 
अडसयमायससुत्थं णिपन्नं णिचतं हवइ सिद्धं । 
ददे अ्णतगुणं अणोवमं तं महादिनव्वं।) २०॥ 
संपुण्णविमल्णाणं दंसणयुहसत्तिवीरियनिवासं । 
सिद्धं बुद्धं णिच्च तं वदे छोयसिहरत्थं ॥ २१॥ 
तित्थयर्चक्वहरी ग्भ धारंति पुरिसरयण च) 
ते सल्ि्नइ इत्थी अह सीख्वदईैय न य अन्नं | २२॥ 
सासंगि दोसढीवर्िं णियगुणस्यणेरदिं दुंचियो होड । 
प॑चमहब्वयनासो भजतो दुग्गद्रः जाद्‌ ॥ २३॥ 
तम्दाहुजिणिन ट्टी अप्पसुहं दुक्छकारिणी वहुगा 1 
व्दिर्दि रागमावो सो सिवसुक्खं च विग्घक्ररो ।॥ २४॥८ 
अरिणिजियजिणराये रागा य जेहि रक्लिया चित्ते । 
तिरि कह हवई पसन्नो जिर्हिं कदिढय तेर्दिं सवुद्रो ॥। २६ ॥ 
त दीय सिद्धिरुच्छी अभियकरा पुन्नचंदसारिच्छा । 
मरदादिवसगराई जिदं कारणि चडइय वहुदत्थी ॥ २६ ॥ 
तिहि गदि सुद्धचरणं सुद्धप्पाधम्मखायमाणाणं । 
छद केवट्णाणं भरदाइयसिवसुह पत्ता ॥ २७ ॥ 


यदुक्त ढदाश्रुतत्कन्धे 1 
आयगुत्तेु बुद्धप्पा धम्मे उिवरा अणुक्तरे । 
इदेव क्भते कित्ति पच्छाय सुगतिं वर॥ र< 


रह्मचरं परिकरणम्‌ ६३ 


जो कायठ परमप्पा णाणमयं रागभावरहियं च। 
सो गच्छ सिवदोयं उज्जोयंतो दसद्विसाथो | २६ ॥ 
जो चर चंभचरणं अणेगगुणक्तेणि थारुद्‌ साहू । 
सो पाव सिद्धं णीरायो जो व्ह चिस्ये ॥ ३०॥ 
आगाहणा य तिचिहा णाणं दंसणचरित्ठाणंगे। 
नं तिय मयसो आया आरादट सिद्धुष्टफज्ञे ॥ ३१॥ 
जो - सयणत्तयमडयो णियदरच्यं सुध्कारण भणिय। 
अन्ने जे पररदव्वा युह्टाऽयु्टं वंधदर त्ति॥ ३२॥ 
गृषटटव्येणं पन्नं अयुह पाति एण्ड जो रागो । 
परिणामोऽनन्नगयो दुक्क्पयकारणं समण्‌ ॥३३॥ 
जो मुद्धणाणसूवं संजमनचसाहिमाचगण्‌ अप्पा | 
मोऽसम्यदुः्वकरारणफम्मपयरे सारव्रय शुणड ॥ ३४॥ 
जो परदव्य गिन्दह अवराएी एर वण छोये। 
पररय जो नणगिन्द्‌ सोमान वर॑धष्‌ कोट।। ३५॥ 
छप्पाउ चुख्लाह सो वमद सत्तञद्रकम्मररि । 
अप्पधम्माजो न नुमो कम्पेहि अवंधगो पारा ३६॥ 
जो अप्पाणं जाणड एुगलकम्माओ भावो अन्नं । 
सुद्धं जाणग भावं सो सन्म जाणषए्‌ सन्य ॥ ३५॥ 
सो रयणत्तयधस्मो स्रा पटर जाया भणति सव्वन्न्‌। 
सं भ्य परमपदं पमायरद्िण सदकज्जे ॥यद॥ 
नेदसण भे पिच्डुद नं णाणं जण रुण जीवातं । 


ॐ 


मुणिञ्णि मपि रफ्यट न व्रणं अपद सन्यन्नू ॥३६४ 


६४ मणिधारी श्रीजिनचच्दसृरि 


५ ^ ^ ^= 0 ५ ० १५१५... 





न १० ज =+ क 


जो परद्त्रेण रवो भियद्न्वसदहावमावणारीणो 1 

सो तेण बवीदरागो भवियो भवसागरं तरड 1] ४०॥ 
पाख्यह वंभचरणं भिम्मलणीरागसणसंमादहीए । 

सो वयद वंभलोयं अणंतसदठाणनं भणियं 1 ४१ ॥ 
संपयवंभवयावो (आासुरेनिज्जवरविमाणं च 1 
पावदूमणुन्नमोयं | तत्थ चुया णिच्चुयं जंत्ि ॥ ४२॥ 
एत्र पवयणसारं वंभवयं अमियपाणसारिच्छं 1 . 
जो चर भव्नजीवो सं्तारतिसं निवारेद ॥ ४३॥ 
भावं जिणपल्नत्तं णिस्संक्रिय जोह सद्हदइई जीवो । 

सो हव सम्मदिदी अभियसुं पावए विटं ॥ ४४ ॥ 
एसो प्रयणसारो सिरिजिणवरगणदरेर्दि पन्नतो । 
शरुजिणदत्तयसाया डखिदियो कप्यृरमल्छे्दिं 1 ४५ ॥ 
संपद गणादिपवरो गणिम्मल्टुणरयणरोदणसरिच्छौो 1 
सिरिजिणर्च॑दमुणिढो दीवग इव दीवए छोए ॥ ४६॥ 

1 इति श्री्रह्मचर्यपरिकरण सम्मतं ॥ 


--"०4०^०~ 


परिष्चेप्ट { ३} 
मदत्तियाण जाति 


प्रस्तुत निवन्धमे टम एक भमी जात्तिका परिचय दने 
जिसका नाम मात्र शिला-लेयां ओर कत्तिपय प्राचीन प्रन्थोमे 
ही थवभेष ष्ट! जिस जाति वालो ने पू प्रास्तीय जेन तीर्था 
प जीणद्धार आदि मे मदत््वपृण भारा लिया द अधवा दृमरे 
शव्छामेयां क फि वत्तेमान पूवं प्रान्तीय जनतीथं जिनः 
सदद्रन्य ओर्‌ आतमभोगके ष्टौ सुषरिणामदे, एव जो केचन्य 
2०५ च॑ पूर्वं ष्वः अन्ड म॑स्या मे चिदामान ये, इनकी लाति 
का आज णक भी व्यक्ति हृटिगोयर नष धोता, यष्ट कितने यद 
पद्‌ की चात ६" । 


नाम ओर प्राचीनता 


भ्म जाति फा धृभनाम प्रसिद्ध सफ-मापा म 'महत्तियाण 
भीर गिरेग्यदि मे "सव्रिदटीय' भी पाया जादा 


१ ददि फ गदर (सिदान } युद्धय म मतद प ९.६ 
क 


र वन यन्तन स्प [वनिन म हमार ८ यन के उप 


+ ~ =+ २७५ 
5 क; 1 {६1 


६६ मगिघारी श्रीजिनचन्द्रसूरि 


१ ११ 
[9 1, त ` 1 ता, ^ 1 क 


शिरो कै कथनानुसार इस जाति की उत्पत्ति 
अन्त प्राचीन दै । प्रथम तीर्थकर श्री क्रृपभदेव भगवान के 
पुत्र मदाराजा श्री भरत चक्रवर्विं के प्रधान-मन्तरी श्रीद के 
नाम से उनकी सन्तति का नाम भी (मन्वरिदरीय' प्रसिद्ध हा । 
मस्ती शब्द्‌ का अपश्र'श महता” है, अत्तः उनके वशर्जो कौ 
जात्ति का नाम भी उसी शब्डानुसार 'महत्तियाणः कराने खगा 
सा नात होता द। - 


प्रतिवोधक आचार्य 


हस जाति को प्रत्तिवोध देकर जेन वनाने का श्रेयं खरतर 
गन्छाचायै श्रीजिनचन्द्रसूरि ` को &। शिखा-टेखो ओर 
पश्व मे इस सम्बन्ध मे जो उल्टेख ध्राप्त ई, उनके आवश्यक 
उद्धरण इस प्रकार हैः- 
१ “नरमणिमण्डित मस्तकाना प्रतिबोधित प्राग्देशोय मदत्ति- 
याणि श्रावक वर्गणा" 
( हमार संग्रहस्थ १६ वी शताब्दि मे छिखित पद्रावरी ) 
२ “नर्मणि मण्डित भारो महत्तियाणं श्रावक प्रतिवोधकः” 
श समयसुन्द्रजी छत खरतरगच्छ पदटरावी 
३५ डतभाखः श्रीजिनदत्तसूरिभिः स्वहस्तेन प्र 


१ भ्रीत्रपभजिनराज प्रथम चचवत्ति श्री भरत महाराज सकल मन्नि- 
मदय श्र मत्रि ध्रीदल सतानीय मदत्तिभाण जाति + ( पवपुरौ विखज्ख ) 
२ श्रीजिनेचन्सरि --ये श्रीजिनदत्तपूरिजी के दिष्य 1 


भह्टत्तियाण साति ६७ 


स्थापितः पूर्वस्यां दशवर्षाणि स्थित्वा महु्ति-आण श्राद्धः 
प्रतिघोधकः। 
( परतरः गच्छं पायरी मंप्रहुः पर० ११) 
£ ‹ श्रीजिनचन्दरसूरि " ( सम्ेगररगस्ताला ध्रकरणकर्नां ) 
चिदस्य क्नातीय रान्याधिकारिणोऽपि श्राद्धाः जाता तेभ्यः प्रति 
पातिशादिना चष्ट महच्च दत्तम्‌ ततस्तेपा भ्महत्तीयाण' इति गोत्र 
म्धापना एता । तदगोन्नीयाः श्रावकाः "जिनं नमामि) वा जिन- 
चन्दर शुम नमामि, नान्यम्‌” ति प्रतिन्ञावन्ता बभूवुः" 
( क्षमाफस्याणजी पत पदट्रावी, म ० प संप्रहर प्र० २३ 
५ ‹ श्रीलिनचन्दरमृरि ( सथेगरंगशाल्य कर्त्ता ) :-धनपाल 
फटाकजाता महुत्तिआण ोत्रीया इति । 
"महु्तिभाणडा दुर नम कठ जिण के जिणचंदट” 
( गरतर गन्छ्ु पदटावटी संप्र प्र ४५} 
६ न्श्री प्रूदत्रतर्‌-गच्छीय नस्मणिमण्टिति भारथ 
नेजिनचन्दरमूरि प्रतिचोभधित महनि-जाण श्रोमव कारितः 
( पायापुरौ सीरधस्य सै० श्य फन ल्य श्री पूरणचन्यलौ 
नार एन जन टेव सत्र । ) 
उपरो £ अवतरणां मे नं० १-२-३-६ मे मणिपागनी भौर 
न॑ ४-५ में मरगसयाया क्ता जिनचन्दरमूत्जि फो एम जानि 
फे प्रतिरोधक आचाय हिम्य £ किन्तु उमम भी परिचय श्रायः 


१ दर्त्‌ धिर श पे नमिदाग्णम त ददथ । 


[| 


&८ सणिधारी शरीलिनचन्द्रधूरि 





सणिवारी्प छादी दिया द अवः जात दोता दै कि नाम सास्य 
क्री श्रान्ति द्धे वे वान संवेगरंगश्लारक्त्ता श्रीलिनचन्छरसूरिजी 

{ इन दोनो आचार्यो के समय मे ख्म- 
भग १०० चर्या का अन्तर ई. षरन्तु दोनो का एक्त ही नाम 
भ्रान्ति द्यौ जाना सम्भव इन प्रमाणो से 


न निर्विवादं = <-> ~ ~. जाति = प्रतियोधक 

6 चनन सद्धद््‌ करि इख जाति सर प्रात्वाधक खरतर 
गच्छानय = श्री जिनचरठरि "क 

गच्छाय आनजनचन्रघुर ४] 





शस उनर चन्यन्त्र शण करो इटवा एवं अयने उपक्रारी खरतर- 

गच्छाचार्चा क प्रति अनन्य अद्धा का अच्छा परिचय मिख्वा दे! 
र = र [प क [प 

उपयुक्त वात नी पुष्टि स्वरख्य ङस लाच्वि चाये मे जिन- 


विम्ब चर जिनाय की सभी प्रतिष्टां खरतर गच्छाचाचौ 


बाजनछ््तच्चूरिजी ॐ पट्ाभिपेक महोत्खव मे भी इसी 
जाति के ठक्छट विजयसिद् ने वहूुवसा व्रन्य व्यय र किया था; 
जला क श्राजिनह्न्तय्युरि पञ्नभिपेक सास मे ठिला हैः 





आहत्तिय्राण जाति ६९ 


~ 1 


न्न विजयनिष्ट यकर पयरो माः्तिश्राण दनि सार! 
तड नाघ्नु उन तए अप्पियड तउ गोन्दष्ट सड गणधार्‌ 1८1 
त॒ शुम्र धर सदणडे जणरिन्य्यान्ड नामु 
ने सिदिय संच शमुदार नद्ध महनिभाण ननिरामु॥ ९1 
( षटमारे सम्पादित "फतिदासिक-जन-काव्य मंगर” ¶० ६६) 
उपर्युक्त प्राच रयकुर चिजयमिंह फी रुरुभक्ति फी प्रसा 
यदी २ उपमान दवाय इमी राम मे ठम प्रकार वणिनदैः-- 
त्यादि ण श्नाहि निगद भ्हू, नेमि जिन नारायण 
पाम्‌ ए जिम भररणन्दु जिने मेणिय सुरः बीर निगु, 
निण परिष गषगुर भनि सहनिक्नाण परि सन्दपिय षू, | 
पदिगन्नणु ति पटिमुन्न व्रिनयमीषटु यनि ज्व न्व्यिड ध, 
परमान टष्‌र्‌ विजयसिह फे पुत्ररक्न षर यथिय मौ 
गाढ अभ्यथना से खरतरगन्द्रीय श्रीनरणव्रभाचाय ने "पटा- 
चस्य वाटावनोध प्रति" फी रचना कौ थी, जंत्नाकि एस भरन्थ 
की निम्न प्रशस्ति सेतान एना 8 
“संघ, १४११ वरप सोपोरसय दिवम शनि श्रौमदणनिट 
वत्ते मदागज्ञाथिरास पानमाि भी पीरासमाटि पिजयरा्यं 
ग्रवर्यमाने आरी चंद्रगच्दादटकार श्रीम्यरनरगददानिपति शी जिन- 


प्न्दरतृरिरिप्यन्धि भ्रातर्णत्रभसृरिभिः भवीम (िदन्ययं 


क श र 
घशाग्रतंस ट्र चाः नुन पर्मानि दष्वुर पिससि7 रन 
श्री सिमभामरन ग्रभानयः श्री 

[न { [॥ { 
मस्तक भीजिनभम्‌ फपफषरपुर्‌ सरसि नात्‌ परमाः 


| 


७० मणिध्रारी श्रीजिनचन्द्रसूरि 


प १ ०१0 ० न १ ^ ८ ०५ ^ ^ न ७५००० ^ 


ठक्कर वदिराजक्त॒गाढाभ्यर्थनया पडावश्यकच्ति सुगमा 
चाङाववोधक्रारिणी सकर सत्तोषकरारिणी छिलिता ) 
छ. 1 शुभमस्तु 1 छः 17 

( स० १४८२ खचित प्रति, वीकानेर नानभंडार मेसे) 


कुखीनता 


इस जाति की कुरीनता ओर उ्वकाः ओसखवार, श्रीमाछादि 
जातिया से किसी तरह न्यून नदीं थी 1 श्रीजिनपतिसूरिजी 
चरत समाचारी ‹ के अन्त मे खरतरगच्छं मे आचार्यो, उपा- 
ध्यार्यो, महत्तरा आदि पदो के योग्य कुलो की जो न्यवस्था की 
गई दै उनमें मद्तिभाण जाति को भी वीसा ओसवाक, श्रीमा 
कौ भाति आचार्यं पद्‌ के योग्य वतछाई गई द । 


रेखां की ची 
इस जातिवा्ो के निर्माण कराये हुए जिन निम्ब ब जीणो 
दवारा के उल्लेखे बहुत से शिरे इस समय उपङन्ध 
ई। जिनमे से वावृ. पूरणचन्दजी नादरः दवारा सम्पादित "लैन 
ख्ल स्मरः क भाग १-२-३ आदि के ठेखों की संवतानुक्रम सूची 
तथा अन्य सूचिया नीचे दी जाती दै}! जिससे पार्त को 
उनक उत्कप एवं सुया का संप्र परिचय हो जायमा | 





१९० श्री जयमागरजौ सरलित श्रोजिनदत्सूरि चरित्र उत्तरा 
मे प्रक्रायित 1 


सष्टनियाण जानि ५१ 
सं० १४१२ जापाद र्मा ६ २३६ 
सं० १४३६ फाल्युन चा ३ १०४५६ 


स॑° १८०४ फाल्गुन श्वा £ 
१५९१, १७२१ १८४६, {८५४ १८५४१ १८४६ 


२५०; २३६१ 


सं १४१६ वशाग्व शर्ट १३ ८२ 

० १४१६ आपाद्‌ एषणा १ २४२११ २१६१ ४६८ 
४१६.) २८११ २१५१ २१८, ४८, १६१ 

० {४१६ आपाद एरष्णा १८ १८४ 

स० ९५१६ आषाद शु १८ ६०३ 

खण १५०३ वेशाय शटा १३ १५५५४ 

सं० ५५९७ मापि परल्णा ५ १६ 

सं० {६८६ हणाय सुदि ५५ २५१ 

सं० ९१ (६) ~+ =^ ५७६ 

० १ वशाया १६२, १६०. १६१ 

मं० ९७०२ माप शद {३ श्य 


(+ £ [अकाः न 
धीम तुद्धिनागगमरिजी सप्रति “जन धातुं प्रनिना 


ल्य संण्ण" भा १-२म:- 
अ ११९६ शापाद मृदि ५ 
० ६४१२ सपाद था > {४५५ 
1. 1, 


७२ सणिधारी भरी जिनच्च्ूर 


~= ~ ८ श्त च 


सुनिराज श्रीजचन्तविनयजी मम्पादित (उवढनिरि 
शिच संहः म :- 

सं १४८३ छ्खांक १५७६ 
हमि संगृित श्वीकानेर जन ख्व संह मे :- 





म ~~~ ^^ ^^ +^ ~ 


सं १५२३ वै यु> १३ अजितनाथजी क्रा मन्द्र 
श्रीजिनविजचजी सम्पादित श्राचौन ख सयः भा० २ मः- 


क 6 च 
मत्रा क नम 
उवेक्त शिरटेलों मे इस जाति के वहत से गोत्रो के नाम 
=पख्च्य होत ह जिनकी नामावदी इतत प्रकार ई 


४१९ $६१ (इ ) मेदः १६९७ 
च््डा १९२ महवा १६€ 
चैद्य १७६० १९०, १९८, २४५ पाटडिा १६९७ 

२०१ १९६, १९्‌ मोष्वान ३६६७ 
लिय १९२ 


दन्यत्र १६९५७ 


महतिथ्राण जाति ८ 


~ ~ 11 [7 


11 


जाट २३९, २५८६ जूक १६९४ 

दन्द्रा १९ मूट ११९५७ 

ट्र १९ नगाद्र ४८७ { सुद्धिनागरम्‌रि 
नानूया १९२, ६० (जिन्तन्भार >) मम्याटिति " } 
चटिया १६५ मृनामठ ५६ ( जि्नपि° सम्पा 
मुदतोय १५६११ १५२ भा १-२)} 


रोटिया ९० 

जिम जाति कः गोत्रां फी सस्या केवट प्रतिमा ठया मे एतनी 
प्राप्त लो उस जाति वाखा फी जमसंस्या कितनी अधिक ष्टानी 
प्वादियि उसका भनुमान पाटकगण स्यं कर्‌ ट । 


निवातस्थान भोर गृह-वंस्या 

स जातिवान् का निवासम्थान कौन कौन सै परान्न 
अर्‌ किन पिन नगसं म था, एसफे विपय म सतगावीं शताष्ी 
मे न्यिद्ए मारि सप्ते फः णक पत्रमे भन्दा प्रका पडता] 
यद्रपि एस पत्रमे थोर तेम्धानां (चग पौ सन्या फः साध) 
फष्ठीनामर्तोभीकाः विभगप उपयोगी एनसे पाट्नकांकी 
जानकारी फ लि, उसका सश षएम यह उदभूत्‌ करने ६। 

श्री महुत्तियाण शयरतर्‌ श्राचक एन टमि प्राम वसः दुः. 
९ घर २८ चिष्रार। सव्र पपिटिया 
= पर २० गाणिक्रपुर्‌ 


्, १८ 
4 "र्यासमदन्‌ वपर ग २ पर 21} 


७४ सणिधासै भ्रीजिनचन्दस्रि 


कित का 








मौ प 


३ घर १ पटणड्‌ 
धर २ वारि (चाड) 
५ घर ३ मागख्पुर 
द घर १ वांगर सङ 
५७ घर्‌ र उरु्पुर्‌ 
ख घर २० सदहारणपुर। गंगापारेपि केपि । 
& घर २० अमदाचादे 
माजन सवं घर १०० 

इससे पदि के शिरारेखों ओर खरतरगच्छं की इहत्‌ 
गर्वा मे दिही, जवगपुर ( जौनपुर ), डाङासड, नागौर आदि 
स्थानोंमें मी इस जाति क प्रतिद्धित धनीमानी आवर्कोके 
निवास करने का उल्लेख पाया जाता दै! विहार तो इनका 
प्रमुख निवासस्थान था. जिसका परिचायक वहा अच मी "मह्‌- 
त्तिवाण भुय" नाम से प्रसिद्धं एक युद्धा दे ओर वौ उन्दी के 
वनाय हुए जिनाख्य ओर ध्मेशाखा विद्यमान है ! 

चौदहवीं शताव्डि से सतरहवीं शताब्दि पर्य्यत मंत्निदलीय 
खोगों की चड़ी भारी जादोजटाटी ज्ञात होतीदहै।! चे केवल 
धनवान ही नहीं परन्तु बडे-वडे सत्ताधीश एवं राजमान्य च्यक्ति 
थे । अपने उपगारी खरतर-गच्छाचा्यां की सेवा, तीर्थयात्रा, 
संधभुक्तिः ओर अहन्तभक्ति मे इस जारिवारं मे राखो रुपये 
खुरे दयाथ से ज्यय कर अपनी चपटा छक््मी का सदुपयोग 
किया था। 





५ ५ 


महरिथाण जाति ५९९ ५, 


परतर गन्द शहद गुर्वाचिन्टी' मे उनके मुद्धन्यां करा मनोत्त 
पत्रं भ्ापनीय वणन भी मिदना ह, जिसका सेश्नि्र सार य 
ल्िपा जाता४। 

मेघन १३५५ मे कदिकान्टफवली श्रीजिनचन्दरमृरि फेः साव 
दिद्ी कः रक्सुर विजयर्सिह, सूदा ( छालामङ फ) अननगररसिहने 
फन्दयद्धि पाश्यनाथ की यात्राफी थी आर यद्य ठत सेनने व्रा 
समत द्रव्य देकर इन्द्रपद प्राप किया धा, वं दयी पप मे उदकुर 
प्रतापसिष ग पुत्रगाज अचलर्मि ने तुनुचुद्चीन गृर्राण से सवत्र 
निवाधि यात्रा फः निमित्त फरमान प्राम कर्‌ संवर सरिति हरिविना- 
पुर, मधुरा आदि अनेकततौथाफी यप्राफीभी। ्वं मार्गमे 
कुलुयुदीन सुरताण की फद से द्रमकपुमेय आचाय को दु्ाया धा। 

मैन १३५६ म टक्छुर आपाद फ पत्र जगन्निटमे 
श्रीजिनकुन्दपूरिजी जादि सं के साथ आारागण तागक्ना 
आद्धितीर्भाफो यात्रा फीथी। स १३८८ मे सयपनि ग्यपति 
फः संघ मे मन्तिद्रटीय सेट यथनपाल भी युस्यं सृश्चायफामं थ । 
संत दद्म श्रीतिननुप्णन््सृग्जी स्मय. साय धामू नगर 
म पध उम समय ददु उय्यतणा ने संप्यात्सत्य टि पयां 
त्राय उमे धमकी प्रमायनाफायो | सत ४३ म श्रीतिन- 
पूदारमृरिमी प, जाटारे पभास्ने प्र मन्पिरन्याय मष भवातगोत 

द ह्य पतततुन्‌ प पररय स, [मग्न ह कय मक {६ भो 
¡1 $ हण" धः भमरम शै मूर पोषम दक रन । 


क # 
२. दष एर हाप क रद वट 2 सन्प ४ 


७६ मणिवारी श्रीजिनचन्द्रदरि 


केः पुत्र म॑० सटस्वणस्िह्‌ आदि ने फाट्युन ऋणा ६ सं टगात्तार 
१५ दिनों तक पृल्यश्री कै पास प्रतिष्ठा; त्रव्रदण. उ्यापनादि 
नन्दिमहोत्सव चदे समारोह से सम्पन्न करवाव 1 सं १३८ 
काट्युन च्ष्णा ६ क्तो राजनृह ऋ भ्वंभारगिरि” नामक पवेत क 
शिखर पर ठ प्रतापसिह्‌ क वंशधर अचटर्सिद नै चतुविंशति 
जिनाटय निर्माण कराया था. उसके मृढनायक्त योग्य श्रीमद्धावीर्‌ 
स्वामी ग्वं अन्य तीर्थद्तें की पापाण रं धातुनिर्मित चिम्बों 
की प्रविष्टा ग्रीजिनङ्कशव्युरिजी क कऋरकमर्खो ने सम्पन्न ड थी ° 1 


उपहार 


उम प्रकार उपटन्ध सराधर्मो केट्राराजो छं भी इल जाति 

के चिषयमेंब्नात द्या वद इस ख्छमें संधिपमरल्पसे रिख दिया 
गया ह] इससे वरिग्रप जानकारी स्खनेवाट सज्जना से अल- 
सेध टँ कि वे इस सम्बन्य मं विग्य प्रकाल डाख्ने की दपा कर। 
{ आस्सव्रा नवयुवक चप ७ञ्क६स उद्धव || 





१ ख १४३ न उच्मी्णं राजय पाच्च जिनाल््य प्रसि ज शनी जिन 
कुनलगूनिकी > द्वारा व्िपुलनिरि पर पमेव वी सूतिक तिष्द्ी 


। । 


छा उन्टेचद्ध1 उक्त प्रश्रित वदे मदतरङःद् यर अद््राद 
जिनविनग्जी घल्ाद्ित श्राचीन अन टे सग्रह सै भी प्र्रायित द्ध । 


‰ 


किलिप तप्मप्कछीः 





भजर 

भभितनाध विधिच््य 
भिगम्य 

सनेकान्न जय पताका 
भभयतुमार ष्रिश्र 
भभयनन्द्र 
अभयनिनसोपाभ्याय 
अपेत प्रयप्रयौ 
भानि { हसी ) 
शषाप्नापती 

धन्द्र 

उ ( विन्पुदशम्प ) 
वरप 

प्रगभरपर 

रदषा ननयाप्प-नप्रट 
भ्परषतकर भवदुपक 

* ४१५५ शोच् 


भरद एद 


= ५ ~+ न ८ > 


@‰ + ‰ =+ 


५१९ 

ट 
७३५६ 
५ 
€ 


॥ 
॥॥ 


फन्यानयन २५ 
फप्‌र्म् धार २१९ 
फरुम राता ६ 
फज्याप्यिल्यनी ८ 
मूनुयमानार २० 
मारपा मारना ६ 
रयन गा" 4%,१८११५ 
साका ४११५ 
सूमन्धर ८ 
शररत १५१२८५७० ६,०९ 
ग्रनरगष्षट पट्रादने ६ 
म्दटतरणम" पटा ऋष्ट २ 


शभोहटवा ( चन } पोषाय ० 
गधर्मालणएठः दषणप्रनि 

1 ५ ¶ ४९ # 2, 
शयेर ¶ 


1181131, । 


1) 


३ भुन शम्थः ४,८२८.५ 


(२) 


शुगभव्रागणि ९, जिनप्रभसुरि र्थ 
गुणवर्दन ८ जिनभद्र, जिनभ्राचार्य दष 
गुणधी ८ जिनमप्रघूरि २६ 
गाव्वविखी €५७,८,१५ जिनरथ ७ 
गोद शार ८ जिनवदधमसूरि १० 
चचरच्री ३ जिन्क्षेखरोपाघ्याय १० 
चन्द्रतिर्क उपाध्याय  जेसल्मर ४ 
(चनप्रनविधिनवे <] सनदी सीमपष्ठी अने रामसैन्य ८ 
जगदित्त ७ जैनसाित्य दा सक्षिप्तइतिहास € 
जगी ८ अंनयुग < 
ज्यदवाचायं २४ डीसा ७ 
जयद्र ७ तगखा आसम # 
जिनङ्शल्सुरि १ त्रिभ्ुवनगिरि ६१७ 
लिनचन्रमूरि १,२०४५५०६१००१ॐ वट्‌ १५ 
९५. ०,२२,२३.२९ दिद्धी ( योगिनीुर-जोयणिषुर ) 

२९०२८०२ ९०३० ५.६,१५.१७,१८; 

जिनचन्द्सूरि अष्टकम्‌ ३० २० २९३० 
जिनदत्तसूरि १०२०३०४.४०६०९०१०; दरुणदे २,३० 
१४,१५०१७.२ १०२३; दवप्रभसूरि (मचख्धारिं ) ११ 

२६५२८५२० दैवम ९ 

जिनपिसुरि ७,८९.२ ०००४,२५०२७ धनेश्वरसूरि ६ 


“निनपालोंयाघ्याय २०४०१००१५२५०२९ नरचन्दरसूरि 


११ 


६ २ 


रपति सुनि ०,२.३ 
सरपारधुर च 
स्यायपन्दरनणो १ 
ञ्पायायनार ५७ 
नागम ९ 


पद्रजन्ापायं १०,११.१२,१२,२२९ 


पृद्रतधरम्‌ 2, 
धथ्नाणार्यः ८ 
प्रथूर्नय ९ 
प्रहा नपर द 
प्रभ्यीरामे ग्ारज्ा २४ 
वार्ह ग्यम १ ४,१५ 
पाण्नगर ५ 
वादनाभ ३१ 
पानां पिधिचनय ( भनिर ) 
११११ *५५२। 
प्रदा्वतर सदयाय १९ 
पट्य 1 ५१,८ 
भभ? त 
क ॐ 
भगणो ( -पेहकरम ) > 
सा ९,०६ 
+. २९ 


71 4 
= १.२ {¦ ५४ 1 ९" 


न्‌ म 
9 दख ॥ 1१) 1 
1१ + 1 च [ १ ५१ र ‡ र १ 


) 


मी श्ानैर्‌ ४ 
भष्मि २९ 
सीमपठी, नोल | 
अभग ६४ 
मनवा मषाराया १५११६,१८,२५ 
भर्यनर ( मराद) < 
अआसिया ( मन्ति ) > 
स्यार भाय ९, 
सायन ५ 
सापीर्‌ ग्रामी ३,०.५६ 
घाायन्ये भार १४ 
मेर्यपरि > 
सानन ८ 
भाय ८ ८,>५ 
पा ४ 
दामः = 
पल्भः ९, 
पदाभि ‰१,३ 9 
मोमा 3 
पगदधनय भ पदषनस- ५ 4 
(+^. ५ ८ 
(111, ४ 


( £ ) 


रास २५२०५०३० 
ख्यपह्ी ५१६ 
श्दरपदठीय याखा १० 
कङितिविजयजी २६ 
टवणलखेटक ७५८ 
सोहर स्कर १४१९ 
ज्यवस्थाङुरुक २८ 
वागड देश्व ३४२४ 
वादी ९ 
वादस्थर ८ 
वादिेवसूरि चरित्र ६ 
वासर ३३ 
विक्रमपुर (विकमयपुर) २, ३४.२०.३० 
विनयद्चीर ८ 
विविधतीर्थ-कल्प ` २५, 
चीर जिनेश्वर २ 





वीर जिनाख्य 
वीरभद्र 

वीरनय 

वोरसिदान 
श्ान्तिनाथ विधिचैत्य 
द्वाक्िभद्र चरित्र 
शीरूसागर 

श्रीधर 

श्रीमा 

सरस्वती 

सागरपाडा 

छमति गणि 
सूरि-परम्परा-प्रशस्ति 
सोमदेव 

दर्पपुरीय गच्छ 
देमठेवी गणिनी 


९१ 


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११ 


‰ पुस्तकं के दिप्यण मे भूक से हसक स्थान म वोरसि दा छपर गया ई) 


पाष्क सुध्ारलें।