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Full text of "Jyotish Tattva Phalit Khand Part 2"

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5 फाल्निता खण्ड-झछ्िलतीया भागा 

रु (फलिंत-न्योतिंष सम्बन्धी सम्पूर्ण ज्ञान हेतु ) 

५. (अनेक प्रदेशों: में न्योतिंष विद्यालयों में पाठ्यक्रम के रूप में निर्धारित ) 
आधुनिक शैली में अनेक उदाहरण कुण्डलियों सहित एक प्रामाणिक ग्रन्थ 
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फ़्ज्ेड्श सम्बन्धी विशेष सूत्र, तुला से मीन लग्न राशियों तक के सम्बन्ध में गुण, 
स्वभाव, शिक्षा, कैरियर, स्वास्थ्य-रोग, प्रेम-विवाह, व्यवसाय, उपायों आदि के 
सम्बन्ध में सूक्ष्म एवं विस्तृत जानकारी, कुण्डली में सभी ग्रहों का अनेक उदाहरण 
कुण्डलियों सहित भावगत फलादेश, दो-तीन एवं अधिक ग्रहों के योग फल, 
दशा३न्‍्तर्दशाओं द्वारा फलादेश, त्रिशांश, ज्योतिष और रोग, स्त्री जातिकाओं सम्बन्धी 
फल एवं मंगलीक दोष आदि विषयों पर महत्त्वपूर्ण एवं शोधपूर्ण व्याख्याओं सहित 









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पण्डित पन्‍ना लाल ज्योतिषी एम. ए. 
गणिवकर्त्ता, पंचाँग दिवाकर, मुफीद आलम ननन्‍्त्री 


ब्रग्डल देवर दल ज्योतिपरि एण्ड राव 
अड्डा ढोशियारुर, नालन्धर-]44 008 






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ज्योतिष तत्त्व (दो भागों में) 
ज्योतिष सीखने के लिए सम्पूर्ण एवं प्रामाणिक ग्रन्थ 
सर्वाधिकार एवं सर्व कापी राईट्स-लेखक एवं प्रकाशकाधीन 


(०.५ शिंए्आ ४०. 8-63797/2003 











इस पुस्तक का टाईटल, कवर एवं विषय सामग्री के कापी राईटस व ट्रेड 
मार्क एवं पुनमुरद्रीण आदि सर्व प्रकार के अधिकार प्रकाशक के अधीन हैं । 
अतएव कोई लोभी व्यक्ति इस पुस्तक के नाम, विषय सामग्री को हू-ब-हू 
अथवा काँट-छाँट कर पुन: छापने की कुचेष्टा न करे, अन्यथा कानूनी तौर 
पर हरजे-खर्चे का ज़िम्मेदार होगा। 


एडवोके ट-विवेक शर्मा लाजपत नगर , जालन्धर | 











| मणहडूरे आलम ह 
पण्डित पन्‍ना लाल ज्योतिषी गणितकर्त्ता [ पण्डित देवी दयालु ज्योतिष संस्‍्थधाव 


मम्पादक : पंचाँग दिवाकत॒ एवं मुफीद आलम जन्‍्त्री | द्वारा प्रकाशिंत एक अनुपम न्योतिष ग्रन्थ 
जालन्घा || 
॥ 


सह-सम्पाढकीय मण्डल : | 
पं. विवेक शर्मा ॥.«&....8. 
पं. पंकज शर्मा १. (०फ. 


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डड्डर लरहहस्यत्य्युर, | 
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मूल्य : 25 0रु. 


न्ह्व्ल्न्व्ल्य््‌््ब्ल्न्ह््ब) 
फोन : 2457959 (0॥.) 


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2:22 |3293 (7२९८४ंं.) ।. 69 जिलटा चला ता <<...... 
प्रमुख वितरक एवं प्रकाशक : 





जनरल बुक डिपो (रजि.) 


अंड्डा ठीडशियाबउपुग, जालन्धव। फोन : (087)-2457959 










॥ श्री हरि ॥ 
॥ श्री गणेशाय नम: ॥ 
सरस्वत्यै नमो नित्यं भद्गकाल्येँ नमो नमः। 


प्राकूकूच॒न 
जे 
अप्रत्यक्षाणि शास्त्राणि विवादस्तत्र केवलम्‌। प्रत्यक्ष ज्योतिषं चन्द्रार्की यत्र साक्षिणौ॥ 

अनादिकाल से मानव अज्ञात एवं अगोचर को जानने के लिए सम्वेदनशील एवं जिज्ञासु रहा है। उसकी इसी जिज्ञासा 
प्रवृत्ति के कारण चिन्तन शील प्रबुद्ध मनुष्यों ने अपने परिवेश से सहस्नों मील दूर संचरणशील ग्रह, नक्षत्र एवं ताराओं के 
स्वरूप एवं उनके पारस्परिक प्रभावों का गहन निरीक्षण, अध्ययन एवं चिन्तन करना प्रारम्भ कर दिया था। 

मानव कल्याण की भावना को ध्यान में रखते हुए एवं मानव जीवन को स्वस्थ, सुव्यवस्थित एवं नियमित रूप प्रदान 
करने के लिए ही हमारे प्राचीन ऋषियों ने अध्यात्म एवं वैदिक ज्ञान, दर्शनशास्त्र, संगीत, आयुर्वेद, ज्योतिष आदि शास्त्रों 
का प्रणयन किया। ज्योतिष शास्त्र का एक अन्य नाम ज्योति: शास्त्र भी आता है, जिसका अर्थ प्रकाश देने वाला अथवा 
प्रकाश के सम्बन्ध में ज्ञान करवाने वाला शास्त्र होता है, अर्थात्‌ जिस शास्त्र से संसार का मर्म, जीवन-मृत्यु का रहस्य और 
जीवन के सुख-दुख के सम्बन्ध में पूर्ण प्रकाश मिले, वह ज्योतिषशास्त्र है । छान्दोग्य उपनिषद्‌ में ब्रह्म का वर्णन करते हुए 
बताया है कि, '' मनुष्य का वर्तमान जीवन उनके पूर्व संकल्पों और कामनाओं का परिणाम है तथा इस जीवन में वह जैसा 
संकल्प करता है, वैसा ही यहां से जाने पर बन जाता है । अतएव पूर्ण प्राणमय, मनोमय, प्रकाशरूप एवं समस्त कामनाओं 
और विषयों के अधिष्ठानभूत ब्रह्म का ध्यान करना चाहिए।'' 

इससे स्पष्ट है कि ज्योतिष के तत्त्वों के आधार॑ पर वर्तमान जीवन में सात्त्विक कर्मों, ज्ञान और भक्ति द्वारा शुद्ध चित्त 
होकर ज्योतिःस्वरूप त्रिगुणात्मक प्रकृति के द्वारा निर्मित समस्त जगत्‌ सत्त्व, रज और तमोमय है। सभी ग्रहों में भी रात, 
रज एवं तमादि गुणों की न्‍्यूनाधिकता रहती है। गुरु शुभ चन्द्रादि सत्त्व गुणी ग्रहों के प्रभाव से जातक में दया, करुणा, 
उदारता एवं परोपकारिता की भावना अधिक होती है। सूर्य, शुक्र आदि ग्रहों के कारण रजोगुण तथा शनि, मंगल, राहु 
आदि ग्रहों के प्रभाव से तामसिक वृत्तियों का उद्रेक होता है। जन्म के समय जिन-जिन रश्मि वाले ग्रहों की प्रधानता 
होती है, जातक में वैसे ही स्वाभाविक गुणों एवं वृत्तियों की बहुलता होती है । अतएव स्पष्ट है कि संसार की प्रत्येक वस्तु 
एवं प्राणी आन्दोलित अवस्था में रहता है, तथा हर वस्तु एवं प्राणी अपनी प्रकृति एवं गुणों के अनुसार ग्रहों द्वारा प्रभावित 
होता रहता है। 

धर्मशास्त्रानुसार भी जो मनुष्य श्रुति-स्मृति आदि धर्मशास्त्र की मर्यादा अनुसार कर्म करता है । दया और धर्म में प्रीति 
रखता है। सत्यवादी एवं सत्य का आचरण करने वाला, ब्रह्मज्ञ अर्थात्‌ ईश्वर परायण है । उसको ग्रह पीड़ित नहीं करते, 
अर्थात्‌ दुख नहीं देते। 

ग्रहा न पीडयन्त्येव श्रुति स्मृत्युक्त सारिणम्‌ | 
दया धर्मरतं बालं ब्रह्मा सत्य वादिनम्‌ ॥ 

इस प्रकार ज्योतिष विज्ञान हमें ग्रह-नक्षत्रों सम्बन्धी कुछ शास्त्रीय सिद्धान्त प्रदान करता है, जिनके द्वारा हम पूर्व कर्मो 
के प्रतिफल को जानकर अपने जीवन को उच्चतर दिशा की ओर ले जाना है। ज्योतिष ज्ञान पर आधारित बनी एक 
जन्मपत्री अथवा जन्म कुण्डली अपने गर्भ में किसी व्यक्ति के जीवन सम्बन्धी प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष अनेक रहस्यों को 
संजोए रहती है। एक कुशल एवं अनुभवी ज्योतिषी की सहायता से मनुष्य अपने जीवन सम्बन्धी अज्ञात रहस्यों का 
जानकर निश्चय ही भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति को प्राप्त कर सकता है | सम्भवत: इसी कारण पुरातन ग्रन्थों अनुसार 
धर्म परायण एवं ईश्वर में आस्थांवान प्रत्येक व्यक्ति के पास एक शुद्ध एवं प्रामाणिक जन्मपत्री का होना आवश्यक माना 
जाता है- 

यस्य नास्ति किल जन्मपत्रिका या शुभा5शुभ फलप्रदर्शिनी | 
अन्धकं भवति तस्य जीवितं दीपहीनमिव मन्दिर निशि॥ मा.सा. 
3 





अर्थात्‌ जिस मनुष्य के पास शुभाशुभ को बतलाने वाली जन्मपत्री नहीं है, उसका जीवन वैसे ही अन्धकार मय होता 
है। जैसे रात्रिकाल में किसी मन्दिर में बिना दीपक के अन्धेरा होता है। 

प्रस्तुत ग्रन्थ ज्योतिष तत्त्व (फलित खण्ड) का ही द्वितीय भाग है। फलित खण्ड के प्रथम भाग में ज्योतिष सम्बन्धी 
महत्त्वपूर्ण विषयों के साथ-साथ मेष लग्न से कन्या लग्न तक प्रत्येक लग्न सम्बन्धी विस्तृत व्याख्या विविध उदाहरणों , 
कुण्डलियों सहित पहले ही दी जा चुकी हैं। यह हर्ष का विषय है कि ज्योतिष तत्त्व के प्रथम फलित खण्ड को प्रबुद्ध 
. पाठकों ने हृदय से सराहा है। सुविज्ञ पाठकों को यह जानकर प्रसन्नता होगी कि “ज्योतिष तत्त्व” गणित एवं फलित खण्ड 
() दिल्ली, हिमाचल व पंजाब के कुछ ज्योतिष कालेजों में पाठ्यक्रम के रूप में भी पढ़ाए जाते हैं। 
. इसकी लोकप्रियता का यह एक प्रत्यक्ष प्रमाण है कि फलित खण्ड का द्वितीय भाग छपने से पूर्व ही फलित खण्ड 
के प्रथम भाग का पहिला संस्करण समाप्त हो गया है। ज्योतिष तत्त्व की उच्चस्तरीय विषय सामग्री को पढ़कर हमें 
पाठकों के अनेक प्रंशसा-पत्र प्राप्त हुए हैं, उनका हम हार्दिक अभिनन्दन करते हैं । अपने पाठकों के प्रेम एवं सहयोग से 
प्रोत्साहित होकर ही ज्योतिष तत्त्व (फलित) के द्वितीय खण्ड में लग्नों एवं ज्योतिष सम्बन्धी अन्य विषय सामग्री के 
विस्तार में वृद्धि की गई है। । 

ज्योतिष तत्त्व (फलित) के द्वितीय परिवर्धित भाग के आरम्भ में फलादेश सम्बन्धी कुछ विशेष उपयोगी नियमों का 
वर्णन किया गया है, जो कि प्रथम भाग में स्पष्ट एवं विस्तृत रूप से वर्णित नहीं किए गए थे। द्वादश लग्नों के क्रम को 
जारी रखते हुए द्वितीय भाग में तुला से मीन लग्न तक, प्रत्येक लग्न के अन्तर्गत आकाश में लग्न/राशि का विस्तार, 
नक्षत्रों का आधिपत्य, सत्त्वादि गुण, स्वभाव, तत्त्व, काल पुरुष में राशि का आधिपत्य, मुख्य गुण-विशेषताएं आदि। 
प्रत्येक लग्न में शुभाशुभ एवं योगकारक ग्रह, लग्न-जातक का शारीरिक गठनें, व्यक्तित्व, चारित्रिक विशेषताएं, शिक्षा एवं 
कैरियर, व्यवसाय, आर्थिक स्थिति, प्रेम सम्बन्ध और वैवाहिक एवं गृहस्थ सुख, स्वास्थ्य एवं रोग आदि के सम्बन्ध में 
शुभाशुभ दशा-अन्तर्दशा का विवेचन, प्रत्येक लग्न की स्त्री जातिका का फल तथा उनके सम्बन्ध में उपयोगी उपायों का 
वर्णन दिया गया है। साथ ही प्रथम भाग की भान्ति सूर्यादि ग्रहों का द्वादश भाव/राशियों में स्थिति का विस्तृत फलादेश 
उदाहरण कुण्डलियों सहित दिया गया है। ॥ 

इसके अतिरिक्त ज्योतिष सम्बन्धी यथा पूर्वत: उद्घोषित विषयों का भी विस्तारपूर्वक समावेश किया गया है। जैसे 
#कुण्डली में दो, तीन चार, पांच, छः एवं सात ग्रहों का फलादेश, #फलित ज्योतिष में प्रसिद्ध योगों का 
वर्णन, »विंशोत्तरी दशा-अन्तर्दशाओं तथा योगिनी दशाओं का विस्तृत फलादेश, #सप्तवर्गों में द्वादशांश एवं 
त्रिशांश कुण्डलियों का फल ३£ज्योतिष शास्त्र एवं रोग विचार, #£/मंगलीक योग सदैव अनिष्टकारी नहीं स्त्री 
जातिका सम्बन्धी विशेष फलादेश, इत्यादि अनेक उपयोगी विषयों का समावेश किया गया है। आशा है ज्योतिष विद्या 


में विशेष रूचि रखने वाले सुविज्ञ पाठकों एवं विद्वान ज्योतिषियों के लिए ज्योतिष तत्त्व, फलित खण्ड या द्वितीय भाग, 


ज्योतिष सम्बन्धी उपयोगिता की दृष्टि से प्रथम भाग से भी अधिक पसन्द आएगा। 
पाठकगण ग्रन्थ रचना के मेरे प्रयासों से यदि लाभान्वित हो सकें तो मैं स्वयं को कृतकृत्य समझूंगा। मनुष्यकृत किसी 
भी रचना में कुछ भूल रह जाना सदा सम्भव होता है। सुविज्ञ पाठक वृन्द प्रस्तुत पुस्तक में कहीं त्रुटि अनुभव करें, तो कृपा 
“करके उसके सम्बन्ध में मुझे, संकेत करने का कष्ट करें, तो मैं आभारी रहूंगा, ताकि उस आगामी संस्करण में उस 
सम्भावित त्रुटि का निराकरण किया जा सके। परम पिता ईश्वर की कृपा से प्रकाशित किया गया वर्तमान ज्योतिष तत्त्व 

फलित खण्ड का द्वितीय भाग कहां तक सफल हो पाया है ? इसके निर्णय की कसौटि भी सुविज्ञ पाठक ही रहेंगे। 
| सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामयाः 
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्‌ दुख भाग भवेत्‌॥ 


श्रावण शुक्ल पूर्णिमा, संवत्‌ २०६० बि. मंगल कामनाओं सहित 
प्रविष्टे २८, श्रावण, मंगलवार पण्डित पन्‍ना लाल ज्योतिषी 


दिनांक 2 अगस्त, 2003 ईसवी गणितकर्त्ता तथा संपादक मण्डल 
ु पंचांग दिवाकर, मुफीद आलम जंत्री उर्दू-हिन्दी व तिथ पत्रिका पंजाबी 
45. | | 











(5) 













































बृश्चिक लग्न: शुक्र का द्वादश भावफल 
बृश्चिक लग्न: शनि का द्वादइश भावफल 
बृश्चिक लग्नः राहु का द्वादश भावफल 7-73 
बृश्चिक लग्नः केतु का द्वाइश भावफल: 73-75 
बृश्चिक लग्न में द्वि एवं त्रिग्रहों योगों का फल 75-76 
बृश्चिक लग्न की उदाहरण कुण्डलियां 77-83 



































तुला लग्न में शुभाशुभ योग... 0 
तुला लग्न जातक की प्रमुख विशेषताएं १0 



































































शारीरिक संरचना, चारित्रिक विशेषताएं 0/ लग्न 
स्वास्थ्य और रोग 4१ | मूलभूत विशेषताएं, अपक म धनु 84 | 
शिक्षा-कैरियर, व्यवसाय, आर्थिक स्थिति. 2 राशि की स्थिति, शुभाशुभ योगकारक ग्रह 85 
तुला लग्न की स्त्रियां . १3-१4 | पनु लग्न-शारीरिक गठन -85 
दशाफल तथा उपयोगी उपाय ह 44-5 चारित्रिक, स्वभावगत विशेषताएं 86 |. 
तुला लग्न: सूर्य का द्वादश भावफल 45-7 स्वास्थ्य, रोग, शिक्षा एवं कैरियर, व्यवसाय. 86-87 
तुला लग्नः चन्द्र का ढ्ादश भावफल 8-20 ।भनु लग्न की स्त्रियां ह 88-89 
तुला लग्नः मंगल का द्वादइश भावफल 20-22 |[दशाफल एवं उपयोगी उपाय । 89-90 
तुला लग्नः बुध का द्वाइशश भावफल .. 23-25 |भनु लग्नः सूर्य का द्वादश भावफल 90-92 
तुला लग्न: गुरु का द्वादश भावफल 25-27 |भनु लग्नः चन्द्र का द्वादश भावफल - 92-94 
तुला लग्नः शुक्र का द्वादश भावफल 27-29 धनु लग्न: मंगलकाद्वादश भावफल ..... 95-97 : 
तुला लग्न: शनि का द्वादइश भावफल . 29-3। ।पनु लग्न: बुध का द्वादश भावफल 97-99 
तुला लग्नः राहु का द्वादश भावफल 32-34 । पनु लग्नः गुरु का द्वादश भावफल .. 99-0॥ 
तुला लग्नः केतु का द्वावाश भाफल .. 34-36 । धनु लग्नः शुक्र का द्वादश भावफल १04-१03 
तुला लग्न में ग्रहों का शुभाशुभ योग 36-37 |धनु लग्न: शनि का द्वादश भावफल.._ 04-06 
तुला लग्न-में तीन ग्रहों का फल 37 ।पनु लग्नः राहु का द्वादश भावफल .. 06:7 07 
तुला लग्न की उदाहरण कुण्डलियां . 38-47 |पनुलग्नः केतु काद्वादश भाफल 08-09 
बृसश्चिक लग्न द्विएवं त्रिग्रही योगों का फल - १09-700 
मूलभूत मुख्य विशेषताएं, भचक्र में बुश्चिक 48-49 |भतु लग्न की उदाहरण कुण्डलियां ._ -6 
राशि की स्थिति, शुभाशुभ योग 9 :॥)] मकर लग्न _ रा 
चारित्रिक विशेषताएं एवं स्वभाव, स्वास्थ्य ... 49-50 |[मेलंभूत मुख्य विशेषताएं, भचक्र में. वा7 
जचर कैरियर, व्यवसाय, आर्थिक स्थिति. 5-52 [मकर राशि की स्थिति, शुभाशुभ ग्रह 5 
बृश्चिक लग्न की स्त्रियां 52-53 गुण, स्वभाव, विवाह सुखादि .. ॥2! 
दशाफल तथा उपयोगी उपाय... 54 ॥मकर लग्न की स्त्रियां... १422-23 
बृश्चिक लग्न: सूर्य का द्वादश फल... 55-57 [दिशाफल, उपयोगी उपाय... [23_24 
बृश्चिक लग्न: चन्द्र का द्वादश भावंफल.. 57-59 [कर लग्न सूर्य का द्वादश भांवफल _ 324«१26 : 
बृश्चिक लग्न: मंगल का द्वादश भावफल 59-6॥ मकर लग्नः चंद्र का द्वादश भावफल -426-॥28 


मकर लग्न: मंगल का द्वादंश भावफल - १28-30 


बृश्चिक लग्न: बुध का द्वादश भावफल 62-64 _ १28- 
मकर लग्नः बुध का ट्वादश भांवफेल..__30-32 


[बृश्चिक लग्नः गुरु का द्वादश भावफल _ 








(6) 
मकर लग्नः गुरु का द्वादश भावफल 












32-34 ।मीन लग्न की उदाहरण कुण्डलियां 204-208 






















































मकर लग्न: शुक्र का द्वादश भावफल १34-436 

मकर लग्न: शनि का द्वादश भावफल 36-38 |िग्रही योगों द्वितीय खण्ड 

मकर लग्न: राहु का द्वादइश भावफल ._439-१40 न प्र गो के 3-32 209-26 

मकर लग्नः केतु का द्वादश भावफल 47-742 यह ग्रहों के योगों 5२०० 27-220 

मकर लगन में द्वि एवं त्रि-ग्रही योगों का फल42-744 दच हि सपयाहों | अं 22-224 

मकर लग्न की उदाहरण कुण्डलियां १45-449 | 2 पड एवं सप्तग्रही योगफल 225-228 
कुम्भ लग्न 'फलित ज्योतिष में प्रसिद्ध योग 229-235 

मूलभूत मुख्य विशेषताएं, भचक्र में कुम्भ... १50 दर पल पड 





राशि की स्थिति, शुभाशुभ व योगकारक ग्रह 457 
कुम्भ लग्न- गुण, स्वभाव, व्यवसाय, विवाहादि 452-454 
कुम्भ लग्न की स्त्रियां १55-56 
दशाफल व उपयोगी उपाय 56-457 
कुम्भ लग्न: सूर्य का द्वादश भावफल 58-459 
कुम्भ लग्न: चन्द्र का द्वादश भावफल 60-१6॥ 
कुम्भ लग्न: मंगल का द्वादइश भावफल 64-63 
कुम्भ लग्न: बुध का द्वादइश भावफल 63-64 
कुम्भ लग्नः गुरु का द्वादशश भावफल 65-66 
कुम्भ लग्न: शुक्र का द्वाइश भावफल 66-68 
कुम्भ लग्न: शनि का द्वादइश भावफल 68-70 
कुम्भ लग्नः राहु का द्वादइश भावफल 70-477 
कुम्भ लग्न: केतु का द्वादश भावफल 472-473 
कुम्भ लग्न की उदाहरण कुण्डलियां 74-79 


ग्रहों की विश्येतरी दशाओं का वण् 236 
चंद्रस्पष्ट से नक्षत्रों के भोग्यकाल 236-237 
ग्रहों की अन्तर्दशा जानने की विधि 238 
दशान्तर्दशा फलादेश सम्बन्धी नियम 238-39 
भावेश अनुसार विशोतरी दशाफल 240 
दशाफल में लग्नगत ग्रहों का शुभाशुभ 240-24॥ 
सूर्य महादशा में अन्तर्दशाओं का फल 24-242 
चन्द्रमहादशा मे अन्तर्दशाओं का फल 243-244 
मंगल में अन्तर्दशाओं का फल 244-245 
राहु में अन्तर्दशाओं का फल 245-247 
गुरु में अन्तर्दशाओं का फल 247-248 
शनि में अन्तर्दशाओं का फल 248-249 
बुध में अन्तर्दशाओं का फल । 249-25] 







































































मीन बग्न केतु में अन्तर्दशाओं का फल 25-252 
मूलभूत विशेषताएं, भचक्र में मीन राशि की स्थिति 480 ।|शुक्र में अन्तर्दशाओं का फल 252-253 
शुभाशुभ एवं योगकारक ग्रह 484 |योगिनी दशाओं का फल 254-255 
मीन लग्न-गुण, स्वभाव, विशेषताएं, विवाह 82 | चतुर्थ सर्वण्ड । 
सुख, आर्थिक स्थिति, व्यवसाय द्वादशांश फल विचार 256-257 
मीन लग्न की स्त्रियां 84-85 ।माता पिता की आयु व स्वास्थ्य 227 
दशाफल व उपयोगी उपाय 85-86 ।त्रिशांश कुण्डली निर्माण व फल 257-260 
मीन लग्नः सूर्य का द्वादश भावफल 86-487 पंचम ख़ण्ड 
मीन लग्न: चन्द्र का द्वादश भावफल १87-१89 |ज्योतिष और रोग विचार 26-262 
मीन लग्न: मंगल का द्वाइश भावफल १89-49] |27 नक्षत्रों से सम्बन्धित रोग 262-265 
मीन लग्न: बुध का द्वाइश भावफल 9-93 (द्वादश भावों एवं नवग्रहों से रोग विचार 266 
मीन लग्नः गुरु का द्वादश भावफल 93-95 ।भावों एवं राशियों द्वारा रोग 267-268 
मीन लग्न: शुक्र का द्वादश भावफल 95-496 (राशियों के तत्त्वानुसार रोग 268 
मीन लग्नः शनि का द्वाइश भावफल 97-98 ।जन्मकुण्डली से रोग विचार 269 
मीन लग्नः राहु का द्वाइश भावफल 99-200 |मंगलीक दोष-सदैव अनिष्टकारी नहीं 270-273 
मीन लग्न: केतु का द्वादश भावफल 200-202 स्त्री जातिका विचार 274-277 






मीन लग्न में द्विग्रही, त्रिग्रही आदि योग... 202-203 [पुस्तक सूची 278-280 


प्रमुख विंवतरक-जनरल बुक डिंपी, अड्डा होशिंयारपुर, जालन्धर । फोन नं. 2457959 





ज्योतिष्ातत्त(फलित)  :  - -- « ४ के 2 _न्ल्सता तत्त्व ( फलित ) 2 


जिन्म कु जल मे फलादश कथन में कुछ उपयोगी जियम] कुण्डली में फलादेश कथन में कुछ उपयोगी नियम 


जन्मपत्री से भविष्य कथन करते समय कुछ विशेष नियमों को ध्यान में रखना परमावश्यक होता है । इस सम्बन्ध में 
हमने ज्योतिष तत्त्व (फलित-प्रथम भाग) में पृष्ठ 47 से 5] तक के पृष्ठों पर फलादेश सम्बन्धी 26 विशेष नियम 
उल्लिखित किए हुए हैं । पाठक उनका अनुशीलन अवश्य करें | पाठकों के लाभार्थ कुछ विशेष उपयोगी नियम पुन: दिए 
जा रहे हैं । आशा है, जन्मपत्री एवं कुण्डली द्वारा फलाद्ेश करते समय उपयोगी सिद्ध होंगे। ह 

(१) जिस भाव का फल देखना हो, उस भाव/राशि पर शुभाशुभ ग्रहों की स्थिति एवं दृष्टि आदि । इसी भान्ति, भावश 
ग्रह की शुभाशुभ स्थिति तथा उस पर अन्य ग्रहों की दृष्टि, योगादि का विचार अवश्य करना चाहिए। 

(2) ()) यदि छठे गृह का स्वामी छठे भाव में हो, तो ऐसा जातक अत्यन्त साहसी और शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है। 

(॥) यदि ग्यारहवें भाव का स्वामी ग्यारहवें भाव में ही हो, तो वह जातक विपुल धन का स्वामी, भूमि-सवारी आदि 
सुखों से युक्त एवं सौभाग्यशाली होता है। हें 

(3) वृहद्‌ पाराशरी अनुसार त्रिकोण भाव (5,9) लक्ष्मी के स्थान हैं तथा केन्द्र (, 4, 7, 0) -ये भगवान्‌ विष्णु 
के स्थान हैं। यदि दोनों स्थानों के स्वामी विष्णु और लक्ष्मी ( लक्ष्मी-नारायण ) की कृपा का सम्बन्ध उपरीव0 ४: 
भावों में से किसी एक भाव में हो जाए, तो यह योग श्रेष्ठ शुभ फलदायी व राज योगकारक माना जाता है । ऐसा जातक 
विशेष भाग्यशाली होता है- 


लक्ष्मी स्थानं त्रिकोणं च विष्णुस्थानं च केन्द्रकम्‌ । 
तयो:ः सम्बन्ध-मात्रेण राजयोगादिकं भवेत्‌ ॥ पाराशर ॥ 

(4) (क) लग्नेश (लग्न का स्वामी) तथा दशमेश-दोनों परस्पर एक दूसरे के भाव में बैठे हों अर्थात्‌ लग्नश दशम 
में हो, और दशमेश लग्न में हो, तो राज-योग होता है । इस योग में उत्पन्न व्यक्ति लोक प्रसिद्ध, धनवान्‌ और सर्वत्र विजय 
(सफलता) प्राप्त करने वाला होता है। है 

(ख) इसी भान्ति नवमेश और दशमेश ग्रह दोनों परस्पर एक दूसरे के स्थानों में हों, तो भी राजयोग होता है । 

(5) जो-जो भाव या ग्रह पंचमेश एवं नवमेश से युक्त या दृष्ट हों, वह सुख फलदायक होते हैं और जो-जो ग्रह 
षष्ठेश, अष्टमेश, द्वादशेश या मारकेश (2, 7) ग्रहों से युक्त या दृष्ट हों, वह रोग, शोक, कलह-क्लेश, अर्थ संकट एवं 
दुख प्रदायक होते हैं- 

ये ये ग्रहा (भावाश्च) धर्मण-बुद्धिपाभ्यां युक्‍ताश्च दृष्टाश्चसुख प्रदास्ते। 
रन्ध्रेश्वरारि व्यय ताः स्‍्युः शोकप्रदा मारकनायकै श्च ॥ 0 

(6) भाव कारकत्व-यदि कोई ग्रह अपने कारक भाव में अकेला बैठा हो, तो उस भाव/राशि के पूर्ण फल का नहं| 
प्रकट कर पाता, तथापि किसी अन्य ग्रह के योग, दृष्टि आदि के सम्बन्ध से शुभाशुभ फल देता है। जैसे कहा भी है 
''कारको भाव नाशाय '' अर्थात्‌ किसी भाव का कारक होकर कोई ग्रह स्थित हो, तो वह उस भाव के फल का नाश 
करता है। जैसे मान लो बृश्चिक लग्न में, चन्द्रमा भाग्येश होकर चतुर्थ भाव में अकेला पड़ा हो, तो वह चतुथ भाव 
सम्बन्धी फल जैसे माता, भूमि, मकान, सवारी आदि के सुखों में विघध्न कारक होगा ना कि जाल द्धिकर | यदि चन्द्र के 
साथ कोई अन्य शुभ ग्रह (गुरु, शुक्र आदि) होगा, तो चतुर्थ भाव सम्बन्धी अवश्य सुख प्रदान | 

(7) किसी कुण्डली में किसी उच्च-नीचादि ग्रह देखकर फल कथन में शीघ्रता नहीं करनी चाहिए, बल्कि उस ग्रह 
की स्थिति का अवलोकन भाव चलित कुण्डली तथा नवांश आदि वर्ग कुण्डली में भी अवश्य करना चाहिए,। किसी 
जातक की कुण्डली में यदि कोई ग्रह उच्च राशि अंशों में हो, परन्तु यदि नवांश में नीच राशिस्थ हो, तो उस स्थिति में 
जातक को मिश्रित अर्थात्‌ शुभाशुभ दोनों फल मिलते हैं, बल्कि नीच का फल शीघ्र मिलता है। इसी भान्ति जन्म कु. में 
यदि कोई ग्रह नीच का पड़ा हो, परन्तु नवांश में उच्च का हो, तो जन्म कुण्डली वाले ग्रह का नीच फल क्षीण होकर ग्रह 
जातक को शुभ फल देने लगता है। 

नीचां शगस्तुंग जृहोपयाता जातस्य नीच फलमाशु ्छ :। 

नीचगतास्तुंग नवांशकस्था: सौम्यं फलं व्योमचराः प्रकुयु:॥ (जातक पारिजात) 

यदि जन्म लग्न और नवांश कुण्डली का लग्न समान हो, तो बह वर्गोत्तम नवांश होता है । वर्गो. नवांश में उत्पन्न जातक 

अपने कुल, परिवार एवं विभाग का मुखिया एवं प्रभावशाली व्यक्तित्त्त तथा साधन सम्पन्न व्यक्ति होता है। इसी भान्ति, 

यदि जन्म कुण्डली में कोई ग्रह स्वोच्च, स्वगृही या मित्र भावी हो तथा नवांश कुण्डली में भी वह स्वगृही, उच्च या ित 

भावी स्थिति में हो, तो वह ग्रह भी वर्गोत्तमी कहलाता है, तथा वर्गोत्तम स्थिति में गया ग्रह अपने भाव एवं कारकत्य 
अनुसार विशेष शुभ एवं उत्तम फल प्राप्त होते हैं। 





8 ज्योतिष तत्त्व ( फलित ) 


(8) कुण्डली में दो, तीन या अधिक ग्रहों के फल का निर्णय करते समय ध्यान दें कि जो ग्रह सर्वाधिक बली होगा, . 
वह अन्य ग्रहों के फल को भी प्रभावित करता है। इस सम्बन्ध में विस्तृत विवरण दो-तीन आदि ग्रहों के फलकथन के 
अध्याय में अवलोकन करें | कदर 

(9) लग्न भाव पर जितने अधिक शुभ ग्रहों की दृष्टि होगी, उस जातक का व्यक्तित्व उतना अधिक बलान्वित, समृद्ध 
एवं भाग्यशाली होगा । ऐसा व्यक्ति जीवन में विशेष उन्नति करता है । 

(१0) क्रूर एवं पापी ग्रह तथा 6, 8 एवं 2वें भाव का स्वामी गोचरवश जिस भाव में भी जाता है, जातक को उस 
भाव सम्बन्धी हानि, कष्ट, रोग, शोक एवं परेशानियां देता है। | 

(१) सभी ग्रह अपनी महादशा में जब अपनी ही अन्तर्दशा आती है, तब शुभ फल नहीं करते, अपितु अपने मित्र 
ग्रह एवं अपनी उच्चराशि के स्वामी ग्रह की अन्तर्दशा आने पर ही शुभ फल प्रदान करते हैं । इस सम्बन्ध में और अधिक 
जानकारी हेतु ““विंशोतरी महादशा /अन्तर्दशा '' सम्बन्धी अध्याय का स्वाध्याय कीजिए । 

(१2) शनि की महादशा में शुक्र का अन्तर हो, तो शुक्र अपने गुण छोड़कर शनि के प्रभाव ग्रहण कर लेता है। 

8 में शनि अशुभस्थ हो, तो शुक्र भी अशुभ फल देने वाला हो जाता है | शुक्र एवं शनि यद्यपि परस्पर नैसर्गिक मित्र 
। अतएव मा शनि की अर्न्तदशा 028 शनि शुभ फल अर्थात्‌ शुक्र के समान फल प्रदान करेगा। 

(3) हम शीर्षोदय राशियों (मिथुन, सिंह, कन्या,तुला, बृश्चिक और कुम्भ राशियां) में स्थित शुभाशुभ 
ग्रह अपनी दशा एवं आदि वश शीघ्र फल प्रदान करते हैं तथा पृष्ठोदय राशियों (, 2, 4, 9, 0) में पड़ें ग्रह 
विलम्ब से अपना शुभाशुभ फल देते हैं। जबकि मीन (उभयोदय) राशि में पड़े ग्रह राशि के मध्य में अपना शुभाशुभ फल 
प्रकट कते हैं । एक अन्य मतानुसार शीर्षोदिय राशियों में पड़े शुभ ग्रह अत्यन्त शुभ फल करते हैं जबकि पृष्ठोदयी राशियों 
में क्रूर एवं पापग्रह और भी अधिक अशुभ एवं हानिकारक होते हैं। 

(१4) तीसरे, पे ग्यारहवें भावों में राहु, शनि एवं मंगल हों, तो अनेक अरिष्टों का नाश करके धन, सुख एवं 
आता के - सक | 

_भिषड्‌ एकादश राहु, कि एकादशे शनिः, त्रिषड एकादशे भौम सर्वारिष्ट निवारका:॥” 

(5) किसी जन्म कुण्डली में पड़े उच्चादि ग्रह को देखकर एकदम यह निर्णय नहीं लेना चाहिए कि वह सदा अच्छा 
(उत्तम) फल ही करेगा। बल्कि ग्रह सम्बन्धी शुभाशुभ निर्णय करने से पूर्व यह भी देखें कि ____ 
जिस राशि में वह ग्रह उच्चादि अवस्था में पड़ा है, उस राशि का स्वामी यदि दुःस्थान में नीच 
आदि अवस्था में होगा, तो वांछित शुभ फल नहीं करेगा। जैसे उदाहरण में भाग्येश सूर्य पंचम दे 
भाव में उच्च राशिस्थ होने पर भी, पंचमेश मंगल यदि अष्टम में नीच राशिस्थ है, तो जातक 
को उच्च विद्या, धन एवं सन्तानादि के सम्बन्ध में विघ्न एवं परेशानी कारक होगा। यही 


नियम नीच राशि पर भी होगा, अर्थात्‌ यदि कुण्डली में कोई ग्रह नीच राशिगत पड़ा है ५26 ५; 
उस नीच राशि का स्वामी केन्द्र या त्रिकोण में उच्च या मित्र राशिगत हों तो नीच राशि को ग्रह 
विशेष अशुभ फल नहीं देगा। हम 90 
फलादेश सम्बन्धी और अधिक विस्तृत नियमों कीं जानकारी के लिए हमारी पूर्व &6----६््त्न्े 
विनीत : पण्डित पन्ना लाल ज्योतिषी, पंचांग दिवाकर कार्यालय, अड्‌डां होशियारपुर जालन्धर शहर। 


प्रकाशित ज्योतिष तत्त्व फलित (प्रथम खण्ड) का अवलोकन करें| 
भाग्योदय काल एवं दिशा जानना 







भाग्योदय होता है । उदाहरण के लिए यदि किसी कुण्डली में लग्नेश : मे 
हों मे , दशमेश एवं नवमेश ग्रह वृष राशि में 

बैठे हों, तो जातक का भाग्योदय दक्षिण दिशा में होगा- ऐसा कहना क्योंकि 

दिशा की स्वामिनी है। हना चाहिए। क्योंकि वृष राशि दक्षिण 














ज्योतिष तत्त्व ( फलित ) 









ब्व. 


तुला लग्नोद्ये- जात: सुधी : सत्कर्मजीविक: / 
विद्वान. सर्वक्लाभिज्ञो धनाढयो जनपूणित:  // 
जुणाधिकत्वाद्‌ द्रविणोपलब्धि वाणिज्य कर्म व्याति नै प्रुणत्वम्‌ 
पदृमालया तन्निलये न लोला लग्न चेत्सकुलावतंं सः ॥/ 


अर्थात्‌ तुला लग्न (राशि) में उत्पन्न जातक बुद्धिमान, अच्छे कर्मों से आजीविका 
उपार्जन करने वाला विद्वान, अनेक कलाओं में निपुण अनी, व्यवहार कुशल तथा कुल में श्रेष्ठ होता है 

राशिचक्र में तुला राशि सातवीं राशि है। भचक्र में इस राशि का विस्तार 80* अंश से 20* अंश तक है । इस राशि 
._|का अधिपति (स्वामी) ग्रह शुक्र (४०४७) है, जो सौर मण्डल में सर्वाधिक चमकने वाला आकांशीय पिण्ड है। 
आकाश मण्डल में तुला राशि कन्या राशि से दक्षिणपूर्व भाग में है तथा राशि का निवास (सम्बन्ध) वस्ति भाग नाभि के 
नीचे आस-पास गुर्दों एवं मूत्राशय है। इस राशि के अन्तर्गत चित्रा नक्षत्र के अन्तिम दो पाद, स्वाती के चारों पाद तथा 
विशाखा के प्रथम तीन पाद आते हैं । चित्रा का स्वामी मंगल, स्वाती का राहु तथा विशाखा का स्वामी गुरु माना जाता है। 

इन नक्षत्र चरणों के नामाक्षर इस प्रकार हैं- रा, री, रू, रे, रो, ता,.ती; तू, ते।... 

लग्न एवं लग्नेश के अतिरिक्त जन्म एवं नाम राशि व उसके नक्षत्र स्वामी का भी जातक के जीवन पर विशेष प्रभाव 
रहता है। 

इसके अतिरिक्त किसी जातक के जन्म समय का लग्न स्पष्ट जिस नक्षत्र के अंश या पाद (चरण) पर होता है, उस 
नक्षत्र भाग के स्वामी के अनुरुप भी जातक के व्यक्तित्व पर प्रभाव पड़ता है। यद्यपि राशि स्वामी या लग्नेश शुक्र का 
प्रभाव (गृह की स्थिति के अनुसार) रहता ही है। इसके अतिरक्ति जातक के लग्न सम्बन्धी होरा, द्रेष्काण, नवांश, 
त्रिशांश आदि षड्वर्ग कुण्डलियों का विश्लेषण कर लेने से जातक के व्यक्तित्व, मांता-पिता, भाई-बहन, स्त्री, संतान 
आदि सुखों के सम्बन्ध में और अधिक सूक्षमता एवं स्पष्टता आ जाती है। उदाहरणत: यदि किसी जातक का तुला 
लग्न 3 अंश पर हो उसका प्रथम द्रेष्काण तुला का ही होगा तथा द्रे. कु. में यदि शुक्र चन्द्र-शनि आदि स्त्रीकारक ग्रहों 
में परस्पर सम्बन्ध हो तो जातक को प्रथम बहिन का सुख अवश्य होगा। इसी भान्ति नवांश में भी प्रथम तुला का ही 
नवांश होने से नवांश लग्न वर्गोत्तम राशि का माना जाएगा जो कि विवाहोपरान्त सुन्दर स्त्री, धन लाभ व भागयोत्रति 
आदि सुखों में वृद्धि कारक होगा। अस्तु इसी भान्ति अन्य वर्ग कुण्डलियों का विश्लेषण करना चाहिए | 

तुला राशि के अन्यपर्यायवाची नाम-तौली, वणिक, तुलाधर, पण्याजीव यूक इत्यादि। उर्दू में मेजान तथा 
अंग्रेज़ी में लिब्रा ( 078) कहते हैं। 

तुला राशि सौन्दर्य एवं सन्तुलन की राशि है। आकाश मण्डल में इसका स्वरूप श्वेत वस्त्रधारी पुरुष के हाथ में 
तराजू धारण किए हुए एक श्वेत वस्त्रधारी पुरुष की भान्ति है। इसकी स्थिति कन्या राशि के दक्षिण-पूर्व भाग में है।| 
तुला न्याय प्रिय राशि मांनी जाती है, क्योंकि इसका चिन्ह (निशान) तराजू है जो कि न्याय का प्रतीक है। यह बुंहत्काय 
राशि पुलिंग (पुरुष जाति), चरसंज्ञक, वायुतत्त्व प्रधान, युवावस्था वाली, नील वर्ण क्रूर किन्तु विचारशील-स्वभाव, 
दिवा-बली, रजीगुंणी, त्रिधातु प्रकृति, विषम संख्यक, शूद्र जाति (मतान्तरे वैश्य-जातिं) अल्प सीमित सन्तान 
शीर्षोदेयी एवं पश्चिम दिशा की स्वामिनी है। शनि तुला राशि में 20 अंश पर परमोच्च तथा सूर्य इस राशि पर परमनीच 
अवस्था में माना जाता है | शुक्र इस राशि पर । से 0 अंश तक मूलत्रिकोण तथा 0 अंश से 30 तक स्वराशिगत माना 


जाता है। 









































। 


न मम तय 0 का मी ५०० 8 5 2. तुला लंग्त स्वभालगताविशेषताएं स्वभावगत विशेषताएं 

निरयण सूर्य गोचरवश प्रतिवर्ष प्राय: 77 अक्तूबर से 5 नवंबर के मध्य इस राशि में संचार करता है । फलित ज्योतिष 
अनुसार तुला राशि सूर्य की नीच राशि मानी जाती है अर्थात्‌ इस समयावधि में तुला राशि पर शुभ विकिरणीय प्रभाव नहीं 
पड़ते । 

गुण एवं सामान्‍य विशेषताएं- तुला न्याय एवं अनुशासन प्रिय राशि है, क्योंकि इसका चिन्ह सम भाग में रखा 
हुआ तराजू है, जो कि न्याय का प्रतीक है। यह सौन्दर्य, न्याय एवं संतुलन की राशि मानी जाती है। जातक सौम्य एवं 
हंसमुख, मिलनसार, शान्तिप्रिय, वैश्य जाति होने से व्यवहार कुशल, लेन-देन में स्पष्ट एवं ईमानदार, सतर्क (सावधान) 
एवं मध्यस्थता के कार्यों में निपुण होगा । चर एवं वायुतत्त्व राशि होने से संवेदनशील, भावुक परन्तु दयालु, परिस्थिति 
अनुसार स्वयं को ढाल लेने वाला, स्त्री वर्ग, सिनेमा संगीत, अभिनय आदि कलाओं में विशेष रुचि होगी | यह राशि न्याय, 
नीति, धर्म एवं स्मृति आदि शास्त्रों का भी प्रतिनिधित्व करती है। 

[ तुला लग्न में शुभाशुभ एवं योगकारक ग्रह ) 

तुला लग्न में लग्नेश शुक्र, केन्द्र-त्रिकोणेश शनि तथा चन्द्र शुभ एवं योग ट््ट 
कारक ग्रह माने जाते हैं। जबकि भाग्येश एवं व्ययेश बुध मिश्रित फलप्रदायक होता है। 
मंगल सप्तमेश एवं द्वितीयेश होने से मिश्रित फल प्रदान करेगा अर्थात्‌ कुण्डली में स्थिति के 
अनुसार फल करेगा। कुण्डली में अशुभ भावस्थ अथवा नीच या शत्रु राशिगत होने से 
अशुभफल तथा मित्र, उच्चादि शुभ राशिस्थ या शुभ भावस्थ होने से अकस्मात्‌ धन प्रदायक 
भी हो सकता है। सूर्य भी कुं. में स्थिति के अनुसार शुभाशुभ मिश्रित फल प्रदान करेगा। 

गुरु तुला लग्न में त्रिषडायपति होने से अपनी दशानन्‍्तरदशा में प्राय: अशुभ फल ही 


देता है| परन्तु अन्य ग्रह के सहचर्य से शुभ फल भी देता है। 
तुला लग्न- प्रमुख विशेषताएं (॥9749 45८९॥0श्रा) 


शारीरिक संरचना एवं व्यक्तित्व (?॥980८व] 4 0]0९477906) 

तुला लग्न में जन्म लेने वाला जातक सुन्दर एवं श्वेत वर्ण, मध्यम या ऊंचा कद (शुक्र की स्थित्यनुसार ), कुछ लम्बा 
एवं कुछ लम्बाई लिए सुन्दर आयताकारं (0५8। $॥87००) चेहरा, संतुलित शरीर रचना, भूरी या नीली आंखे, तीखे 
नयन-नक्श तथा आकर्षक व्यक्तित्व का स्वामी होगा। अधिक आयु में भी युवा दिखलाई देने वाला चेहरा होगा। 
बाल्यकाल में प्राय: दुबला किन्तु दृढ़ अस्थि एवं पुष्ट होगा तथा आयु वृद्धि के साथ-साथ संतुलित एवं स्वस्थ शरीर तथा 
प्रभावशाली व्यक्तित्व वाला होगा | तुला जातक प्राय: हंसमुख तथा दूसरों के मनोभावों को समझने तथा अपने विचार भी 
समझाने में कुशल होते हैं। | 

स्वभावगत चारित्रिक विशेषताएं- तुला लग्न में उत्पन्न जातक सौन्दर्यप्रिय, न्‍्यायशील, शान्तिप्रिय, ईमानदार, 
विचारशील, तीव्र बुद्धिमान, धर्म-परायण, विनग्र-प्रियभाषी, स्पष्टवादी एवं बातचीत करने में कुशल होगा | कुण्डली में 
शुक्र के साथ चन्द्र, बुध एवं शनि ग्रह भी शुभस्थ हों, तो जातक कल्पनाशील, आदर्श एवं आशावादी दृष्टिकोण, उच्च 
अभिलाषी, अपने पहरावे एवं रहन सहन के प्रति विशेष सावधान, दयालु, उदारहदय, परिस्थिति के अनुसार स्वयं को 
ढाल लेने वाला, कुछ खर्चीले स्वभाव का, भ्रमणप्रिय, संगीत, कला, काव्य एवं साहित्यिक रूचियों के बावजूद क्रय- 
विक्रय एवं तर्क-वितर्क करने में कुशल होते हैं । इसके अतिरिक्त दूसरे मनुष्य के मनोभावों को जान लेने में भी कुशल होते 
हैं। किसी अन्य व्यक्ति (विशेषकर महिला वर्ग) के साथ व्यवहार करते समय शिष्टता एवं शालीनता को नहीं भूलते। 
नए-नए सम्पर्क एवं मित्र बनाने में भी कुशल होते हैं। मानसिक एवं काल्पनिक शक्ति प्रबल होती है। परन्तु मन की 





स्भावगत विशेषताएं (तुलालउन )........ ५ . - <०० ७०८ ०० ६००५ जा “४ शी 4 > कटसजीए 0 0 पक] 


केन्द्रिय शक्ति अधिक देर तक नहीं रहती। जब तक किसी कार्य में लगा रहे, पूरे मनोयोग के साथ लगा रहेगा, परन्तु 
अपने विचार या कार्य-योजना में परिवर्तन करने में भी शीघ्र तैयार हो जाएगा। तुला प्रधान व्यक्ति किसी प्रकार का 
अनुचित दबाव को सहन नहीं कर सकता है। स्वच्छन्द प्रकृति होती है। कुछ विषयों में लापरवाह होने पर भी अपने 
उद्देश्य एवं स्वार्थ के प्रति सतर्क एवं सावधान रहेगा। चंद्र, गुरु व शुक्र यदि चर राशि में हों तो जातक को देश-विदेशों 
अनेक स्थानों में भ्रमण करने के अवसर प्राप्त होते हैं। 

सामान्यतः तुला राशिस्थ लग्न के जातक न्याय एवं मध्यस्थता के कार्य करने में निपुण, सच्चाई पसन्द, लोकप्रिय, उदार 
हृदय, परोपकारी व दान देने की प्रवृत्ति, पराक्रमी, वाहन व अन्य सुख साधनों के शौकीन, देवी-देवताओं और ब्राह्मणों में 
श्रद्धा रखने वाले, स्त्रियों से सम्बन्ध बनाने में कुशल तथा निजी पराक्रम व कुशल युक्तियों द्वारा धन-सम्पदा का अर्जन 
करने वाले होते हैं- 
' वृषतुरंग विक्रम: विक्रम द्विज सुरार्चनदान मंना: पुमान्‌। 
शशिनि तौलि गते बहुदार भाग्विभव सम्भव संचित विक्रम :। 

इनमें भौतिक एवं आध्यात्मिक गुणों का विशेष सन्तुलन रहता है। चन्द्र, बुध, शुक्र एवं गुरु के प्रभाव से जातक 
उच्चाभिलाषी, मिलनसार, भ्रमणप्रिय एवं नए-नए मैत्री सम्बन्ध बनाने में कुशल होता है । उसमें नेतृत्व करने की योग्यता 
तथा उच्च प्रतिष्ठित लोगों के साथ सम्बन्ध हों तथा प्रत्येक विषय पर गुणदोष के आधार पर शीघ्र निर्णय लेने में सक्षम, 
दूरदर्शी, विवेकशील, उच्चादर्श, दृढ़संकल्प तथा प्रत्येक स्थिति का पूर्वानुमान लगाने में कुशल होते हैं । 

उदाहरणार्थ : देखें जन्म कुण्डली महात्मा गांधी । मंगल-शुक्र तुला-शुक्र अथवा चन्द्र-शुक्र का प्रभाव हो तो 
जातक को विशेष सौन्दर्यनुभूति रहती है। जातक को अभिनय, सिनेमा, संगीत, प्रकृति, साहित्य आदि कलाओं में विशेष 
अभिरुचि रहती है । शनि एवं शुक्र भी शुभस्थ हों तो जातक प्रसिद्ध अभिनेता, कलाकार, गायक या संगीतकार हो सकता 
है। इसके अतिरिक्त तुला जातक अवसर के अनुरूप नीति आयोजित करने में कुशल होते हैं | मंगल-शुक्र के प्रभाव से 
जातक को उत्तम कोटि के ब्त्रों ([0755०७),फूलों, कॉस्मैटिक्स (सैंट, खुशबू आदि) अर्थात्‌ सौन्दर्य प्रसाधनों, बढ़िया 
आवास एवं शानदार गाड़ियों (कारों आदि) का भी शौक रहता है । ऐसे योग वाले जातक को विपरीत योनि (099०९ 
56: के प्रति विशेष आकर्षण होता है । यदि मंगल-शुक्र ग्रहों का योग अशुभ भावों में बना हो, तो अत्यधिक कामुकता 
एवं विलासिता के कारण जातक शराब, अफीम आदि कई प्रकार के व्यसनों का शिकार हो जाता है जिसके फलस्वरूप 
स्वास्थ्य हानि एवं आर्थिक संकटों का सामना करना पड़ता है। चन्द्र भी अशुभ हो तो, व्यवसाय में अस्थिरता, अनैतिक 
सम्बन्ध तथा घरेलू उलझनें होती हैं | यदि मंगल, शुक्र एवं बुध का शुभ सम्बन्ध हो तथा गुरु की उन पर शुभ दृष्टि पड़ती 
हो, तो वहीं कामुक ऊर्जा उच्चतम आध्यात्मिकता की ओर प्रवृत्ति हो जाती है । ऐसा जातक व्यक्तिगत स्वार्थों का परित्याग 
कर लोक कल्याण की भावना से सत्यपथ का आश्रय ग्रहण करते हुए जीवन के उच्चतम मूल्यों को प्राप्त कर लेता है। 
उदाहरण स्वरूप देखें महात्मा गांधी की जन्म कुण्डली नं. 64, इनकी जन्म कुण्डली में लग्न भाव में म॑., शु., बु. ग्रहों 
की गुरु की विशेष दृष्टि पड़ रही है। 

स्वास्थ्य और रोग- लग्नेश शुक्र यदि बली होकर शुभस्थ हो तो तुला लग्न जातकों का स्वास्थ्य प्रायः अच्छा 
रहता है। जीवन में क्रियाशील, चुस्त, व्यस्त, सक्रिय एवं युवा बने रहने की चेष्टा करते रहते हैं। तुला जातक संयमित 
(899086) भोजन एवं नियमित व्यायाम करते रहें तो बहुत कम रूग्ण होते हैं तथा दीर्घायु होते हैं । परन्तु यदि कुण्डली 
में शुक्र, गुरु, शनि, मंगल ग्रह पापाक्रान्त या अशुभस्थ हों, तो इनके शरीर में असंतुलन तथा स्वास्थ्य बिगड़ जाने की 
सम्भावना होती है। इस स्थिति में तुला लग्न जातक को पेट विकार, स्नायु रोग, प्रमेह, अपैंडिक्स, मानसिक थकान, 
मधुमेह, गुर्दे के रोग, पथरी आदि पेट गैस, वीर्य विकार एवं पेशाब जन्य गुप्त रोगों का भय रहता है। 

तुला लग्न में सूर्य एवं मंगल अशुभ हों, तो शिर बेदना, मस्तिष्क एवं नेत्र रोग, नाक, कान व गले के रोग या उच्च 


42 _  ____॒__ _॒[_॒ .॒_ तुला लग स्वाभावगत खशहताए विशेषताएँ 
निम्नादि अव्यवस्थित रक्तचाप सम्बन्धी रोगों की आशंका होती है। । 

सावधानी- तुला लग्न के जातकों को अत्यधिक भोग और विलासिता से बचना चाहिए इन्हें अत्यधिक कामुकता, 
शराब, मांस आदि तामसिक वस्तुओं के प्रयोग से भी परहेज करना चाहिए । सुखी जीवन के लिए प्रत्येक क्षेत्र में संयम एवं 
सन्तुलन अत्यन्त लाभदायक होंगे। ध्यान (१(८००४४४४०॥) और ईश्वर भक्ति विशेष सहायक होगी। 

शिक्षा और कैरियर (707८श्रांणा & 0५7९९) - तुला लग्न जातक की कुण्डली में पंचम भाव 
बली हो तथा पंचमेश शनि, भाग्येश बुध एवं लग्रेश शुक्र आदि ग्रहों का (स्थान, दृष्टि आदि से) शुभ सम्बन्ध बना हो तो 
जातक उच्च व्यवसायिक शिक्षा प्राप्त करने में सफल हो जाता है। पंचम भाव में शनि को छोड़कर कोई अन्य पाप ग्रह 
( जैसे राहु, केतु, भौमादि) हो, तो उच्च विद्या प्राप्ति में विघ्न-बाधाएं होती हैं | परन्तु यदि जातक को ग्रहदशा एवं अन्‍्तर्दशा 
किसी शुभ एवं योगकारक ग्रह की लगी हो, तो वह अड़चनों के बावजूद जातक उच्च व्यवसायिक (70/28&0772) 
विद्या प्राप्त करने में सफल होता है। 

व्यवसाय और आर्थिक स्थिति- स्वतन्त्रता प्रिय, सृजनात्मक एवं कलात्मक अभिरुचि होने के कारण तुला 
लग्न जातक चिरकाल तक किसी की अधीनता स्वीकार नहीं कर पाते। नौकरी (सर्विस) की अपेक्षा अपने निजी 
व्यवसाय में अधिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं | जन्म कुण्डली में शुक्र, शनि, बुध एवं चन्द्रादि ग्रह शुभ भाव है अमल 
शुभ या योग कारक ग्रहों द्वारा वीक्षित हों, तो जातक निम्नलिखित व्यवसायों में विशेष कामयात एवं लाभान्वित होते हैं। 
यथा प्राध्यापक, वकील, न्यायाधीश, क्रय-विक्रय ([790॥8) व्यापार, कवि, संगीतकार, गायक, अभिनय, कलाका:, 
डाक्टर, राज-नीतिज्ञ, बैंकिंग, भवन-निर्माण, लौह कल पुर्जे, टैलीविज्ञन, लेडीज़ गारमैण्ट, फैशन-डिज़ाइनिंग, वस्त्र- 
विक्रेता, बेंकरी मिठाई, होटल, फर्नीचर डीलर, आर्किटेक (#॥णर०००), आन्तरिक साज-सज्जा, औषधि विक्रेता 
((ऋक्षामं), नौसेना कर्मचारी, आईसक्रीम आदि फास्ट फूट, स्टेशनरी औषधि विक्रेता (20778, मोटरादि के स्पेअर 
पार्टस, कम्पयूटर या कम्पयूटर से सम्बन्धित काम, फोटोग्राफी, प्लास्टिक उद्योग, खिलौने इत्यादि से सम्बन्धित व्यवसाय 
से विशेष धन लाभ एवं उन्नति प्राप्त कर सकते हैं। किसी जातक की कुण्डली में दशम या दशमेश ग्रह अथवा उनसे 
सम्बन्धित जो ग्रह बलान्वित, उसके अनुसार ही जातक को व्यवसाय में लाभ होता है। जैसे सूर्य बली हो, तो जातक को 
सरकारी क्षेत्रों से विशेष लाभ होता है। रा 

आर्थिक स्थिति (7009] 708007)- तुला लग्न के जातक की आर्थिक स्थिति मुख्यतः चन्द्र, मंगल, 
शुक्र, शनि व बुधादि ग्रहों की शुभाशुभ स्थिति पर निर्भर करती है। यदि तुला जातक की कुण्डली में शनि, सूर्य, चन्द्र, 
मंगल, बुध एवं शुक्र शुभस्थ या योगकारक स्थिति में हों, तो व्यवसाय द्वारा अच्छा धन अर्जन करते हैं ।दो या अधिक . 


ढ़ 


ग्रहों में दृष्टि, योग आदि का सम्बन्ध बना हो, तो जातक निजी पुरुषार्थ के अतिरिक्त भाग्यवश एक से अधिक चने प्रांति 
के साधन प्राप्त करता है। विशेषकर सूर्य, मंगल एवं बुध ग्रहों से सम्बन्ध हो तो धनागमन॑ में पारम्परिक पैतुंक योगदान 
विशेषकर प्रमुख होता है। उदाहरण देखें कुण्डली नं. 60। बुध-शुक्र के योग में जातक क्रय-विक्रय (व्यापार) ह्वारा 


विशेष तौर पर लाभान्वित होते देखे गए हैं। 


शनि शुभस्थ (स्वक्षेत्री, उच्चस्थ) हो तो जातक अपने बुद्धि कौशल एवं गुप्त युक्तियों से धनार्जन करने में कुशल होता 
है। भूमि, मकान, बाहन आदि के सुख भी प्राप्त होता है। देखें कुण्डली संख्या 6। द | 

तुला लग्न में मंगल भी स्वक्षेत्री या उच्चस्थ हो तो विवाह उपरान्त धन एवं सम्पदा में विशेष लाभ व उन्नति होती है। 

सामान्यतः अनुभव में यही आया है कि तुला लग्न में जातक कठिन परिस्थितियों में भी अपने परिश्रम, निष्ठा एंव 
संमोयौजिंत योजना से निर्वाह योग्य आय के साधन प्राप्त कर ही लेते हैं तथा जल्द ही अपने परिवार के लिए सुन्दर एवं 
अन्य वस्तुएं खरीदने के लिए उदारतापूर्वक खर्च भी कर देते हैं । तुला जातक सीमित साधनों में भी रईसी ढंग से खर्च करने 
में नहीं हिचकिचाते। ला ््ि । 





तुलालंग की स्त्रियाँ/ १४५ ४- «८ ८35 है ५ ४५ मल बह 355 50 अमिशिज मिल मल 3] 

प्रेम सम्बन्ध एवं परिवारिक जीवन :- 

तुला लग्न के जातक के जीवन में प्रेम और सैन्दर्य का विशेष महत्त्व होता है । अपने स्वच्छन्द व्यवहार, सहज मुस्कान 
एवं वाक्‌ पटुता के कारण पुरुष मित्रों के साथ-साथ महिला मित्रों में भी आकर्षण का केन्द्र बने रहते हैं । चाहे किसी आयु 
में हों, अपने मित्रों से सम्बन्ध बनाए रखते हैं | यदि शुक्र, मंगल की राशि में हो अथवा मंगल के साथ हो तो उस स्थिति 
में समाजिक मर्यादाओं को तोड़ कर भी, अपनी इच्छा के अनुसार जीवन साथी का चयन करते हैं । कहीं अनैतिक सम्बन्ध 
भी हो सकते हैं। परन्तु प्रेम सम्बन्ध चिरस्थायी नहीं रह पाते। अशुभ योगों के कारण कई बार तम्बाकू, शराब आदि 
व्यसनों के भी शिकार हो जाते हैं । 

शुभ बाशि जातक एवं उपयुक्त जीवन आथी 

इसके लिए मैत्री चक्र के अतिरिक्त तत्त्व दृष्टि से भी विचार करना चाहिए। तुला राशि या लग्न को मेष, मिथुन, तुला 
एवं कुम्भ राशि वालों के साथ वैवाहिक या व्यवसायिक सम्बन्ध शुभ एवं लाभदायक रहते हैं | वृष, कर्क, कन्या, बृश्चिक, 
धनु एवं मकर राशि के साथ मिश्रित अर्थात्‌ मध्यमफली जबकि सिंह व मीन राशि वालों के साथ षडाष्टक दोष होने से 
लाभदायक एवं शुभ नहीं-होता। 

इसके अतिरिक्त मेलापक सम्बन्धी गुण आदि अन्य नियमों पर भी विचार कर लेना चाहिए। 

गृहस्थ जीवन-तुला जातक प्रेम सम्बन्धों में प्राय: चंचल, स्वच्छन्द प्रकृति एवं उन्मुक्त व्यवहार में विश्वास करते 
हैं, परन्तु विवाहोपरान्त (यदि उपयुक्त जीवन साथी हो ) उनके जीवन में विशेष परिवर्तन देखे गए हैं, विशेषकर बच्चों की 
पैदायश के पश्चात्‌ उनकी प्रकृति में विशेष सुधारात्मक परिवर्तन होते हैं। अपने परिवार एवं गृहस्थ जीवन के प्रति पूरे 
ईमानदार एवं समर्पित होते हैं । अपने परिवार को जीवनोपयोगी सभी प्रकार की सुख/सुविधाएं देने के लिए जीवन पर्यन्त 
कठोर परिश्रम करते हैं | पंचमेश शनि के कारण सन्‍्तान अल्प अथवा सीमित संख्या में होती है। 





तुला लग्न राशि में उत्पन्न होने वाली लड़की का ऊंचा कद, सुन्दर मुख और आयताकार आकृति, कुछ लम्बाई लिए 
हुए, सन्तुलित (39]97०6०), खूबसूरत एवं आकर्षक शरीर रचना वाली होती है। 
नयन-नक्श तीखे तथा अधिक आयु में भी प्राय: युवा दिखाई देने वाली होगी । बाल्यकाल 
में कुछ दुबली, किंतु आयु वृद्धि के साथ-साथ स्वास्थ्य में सुधार होगा। राशि स्वामी शुक्र 
शुभस्थ हो तो तुला राशि जातिका विनम्र स्वभाव, सहज मुस्कान लिए हुए-हंसमुख, 
मिलनसार, नए-नए मित्र बनाने में कुशल, बुद्धिमान,न्यायप्रिय, व्यवहार-कुशल, स्पष्टवादी हि 
(80]0), स्वाभिमानी (5०[6.055४९॥५७) एवं उत्साहशील (]गरए0४४6) प्रकृति की। : 
होगी। इसके अतिरिक्त वह सौन्दर्य एवं कलात्मक अभिरुचियों से युक्त अपने रहन-[* 
सहन के तरीके, उचित पहरावे एवं खान-पान के प्रति विशेष सतर्क होगी। सौन्दर्य एवं-+- 
सजावट के प्रसाधनों, श्रृंगारिक एवं कलात्मक वस्तुओं के संग्रह करने का शौक रखती हैं | तुला जातिका स्वभावत: 
प्रियभाषिणी, दयालु, उदार, परोपकारी, सामाजिक कार्य-कलापों में सक्रिय होती है, किसी भी विषय पर गम्भीर सोच 
विचार के उपरान्त ही अन्तिम निर्णय लेती है । कुण्डली में यदि चन्द्र -शुक्र अथवा मंगल/शुक्र का योग हो तथा उन पर गुरु 
की भी दृष्टि हो, तो जातिका उच्चशिक्षित होती है, उसे साहित्य, लेखन, संगीत, नृत्य, नाट्य आदि ललित कलाओं को 
ओर भी विशेष अभिरुचि होती है। व्यवसायिक तौर पर इनके द्वारा लाभ भी प्राप्त होता है । देखें कुण्डली नं. 67। 

शुक्र के कारण तुला जातिका को कल्पना शक्ति प्रबल होती है, परन्तु मन की केन्द्रिय शक्ति अधिक देर तक नहीं 
रहती | जब तक किसी कार्य विशेष में लगी रहे, तब तक पूरे मनोयोग से और मजबूत दिल से करेगी, परन्तु अपने विचार 
और योजना में भी परिस्थिति भ्नुसार परिवर्तन करने को तैयार हो जाएगी। वैसे स्वभाववश प्रत्येक प्रकार की 





िनशशिमी 2 प  आ क 8  ृैृ | शा लकिमादशाए नर देश, में दशा5न्तर दशा 
परिस्थितियों में स्वयं को ढाल लेने की क्षमता रखेगी। तुला जातिका सामान्यतः वर्तमान में जीने को विश्वास रखती हैं । 
बाधाओं के बावजूद उच्च शिक्षा प्राप्त करने में सफल हो जाती हैं। मंगल यदि शुभस्थ हो अथवा चन्द्र-शुक्र का योग हो 
तथा उस पर गुरु की दृष्टि हो तो उच्च शिक्षा के पश्चात्‌ प्राध्यापन या अर्धसरकारी क्षेत्र में उच्च पद प्राप्त कर लेती है। 
गृहस्थ जीवन- तुला जातिका प्रेम सम्बन्धों एवं विवाह आदि के सम्बन्ध में स्वतन्त्र विचार रखती हैं । यद्यपि 
माता-पिता की आशा के विरुद्ध आचरण भी कम ही करती देखी गई हैं | विवाह के पश्चात्‌ अपने पति को गृहस्थ एवं 
व्यवसाय में अच्छा सहयोग प्रदान करती हैं | गृह की सजावट, सुन्दर वस्त्र, उच्चस्तरीय सवारी, बड़ा सुन्दर मकान आदि 
की विशेष अभिलाषी होती है, परन्तु अपने पति के प्रति वफादार एवं निष्ठावान रहती हैं । तुला जातिका के बच्चे सीमित 
संख्या में होते हैं । सप्तम भाव में यदि राहु केतु, शनि, सूर्यादि आदि अशुभ ग्रह हों या उनकी अशुभ दृष्टि हो तो वैवाहिक 
जीवन के सुख में कमी रहती है| देखें उदाहरण कुण्डली नं: 68 | 
उपयुक्त जीवन साथी ($7र/996 १४4८) । 
तुला जातिका (राशि या लग्न) को मेष, मिथुन, तुला तथा कुम्भ राशि वालों के साथ वैवाहिक सम्बन्ध शुभ एवं 
उत्तम, वृष, कर्क, कन्या, बृश्चिक, धनु व मकर राशि/लग्न वालों के साथ मध्यमफली तथा सिंह व मीन राशि वालों के 
साथ शुभफली नहीं होंगे। यद्यपि इस सम्बन्ध में मिलान सम्बन्धी अन्य नियमों का भी अनुसरण करना चाहिए। 
उपयुक्त व्यवम्नाटा- तुला जातिका अपनी रुचि के अनुसार ही व्यवसाय में भी कलात्मक (/ (860) परिवर्तन 
लाने के प्रयास करती रहती है । तुला जातिका को फैशन डिज़ाईनिंग, कम्प्यूटरर्ज, ब्यूटी-पार्लर, सिलाई-कटाई ($00०॥- 
॥78), शिल्पकारी, माडलिंग (].॥००१७॥॥8), गृहसाज सज्जा (श0 [)८००-४॥४०॥), रैडीमेड जि विक्रय ( ३९४0) 
४0७ (9477९॥5), नृत्य, गायन, अभिनय (७ ०॥॥8), प्राध्यापन ([6४०॥॥8), वकालत, न्यायाधरश, बैकिंग, सिनेमा, 
टैलीविज्ञन, होटल-रैस्टोरैण्ट, फोटोग्राफी, खिलौनों (॥0५8) आदि से सम्बन्धित कार्यों में विशेष सफलता प्राप्ति के 
अवसर होंगे। 








तुला लग्न में गराठीं की दशान्तवदा का अंश्लिंत विवगण कप 

तुला लग्न में उत्पन्न जातक/जातिका को शुक्र, शनि, चन्द्र से (यदि कुण्डली में शुभ पड़े हों), तो अपर्नी 
दशा5न्‍्तरशाओं में शुभ फल प्रदान करेंगे । शनि अपनी दशा या भुकक्‍्ति में भूमि, सवारी का सुख, विद्या या कम्पीटीशन म॑ 
सफलता, सन्‍्तान सुख, तकनीकि विद्या में कामयाबी दिलाएगा। चन्द्रमा व शुक्र अपनी दशाओं में कार्य-व्यवसाय या 
सर्विस में लाभ व उन्नति, माता एवं स्त्री का सुख, सौन्दर्य प्रसाधन या सवारी आदि अन्य सुख साधनों की प्राप्ति के साथ- 
साथ उन पर खर्च भी कराएंगे। कुण्डली में यदि शनि, चन्द्र या शुक्र अशुभ हों, तो उपरोक्त सुखों में विध्न उत्पन्न होंगे। 

मंगल की दशा में कुछ परेशानियों व विप्नों के पश्चात्‌ धन लाभ तथा परिवारिक सुख प्राप्त होगा | तुला लग्न में मंगल 
धनेश एवं मारकेश भी होने से इस दशा में दुर्घटना से चोट अथवा रक्‍्तविकार आदि से शरीर कष्ट का भय होता है । बुध 
की दशा में भाग्य में कुछ सुखद परिवर्तन होने की सम्भावना होती है परन्तु इस दशा में विभिन्न स्थानों पर यात्राएं एवं 
फिजूल खर्चा भी अधिक होती हैं। 

गुरु की दशा- चतुर्थ, अष्टम एवं द्वादश भावों में स्थित गुरुअशुभ फल तथा अन्य भावों में प्रायः शुभ फल प्रदान 
करता है। 

राहु केतु- तुला लग्न कुण्डली में अपनी स्थिति एवं ग्रहयोग अनुसार फल प्रदान करेंगे। 


तुला लग्न सम्बन्धी कुछ उपयोगी उपाय 


शुभ रंग (779४०प/७0]९ (:0]007$)- श्वेत, हल्का नीला, काला, गुलाबी रंग अनुकूल रहेंगे। 

हरे और पीले रंग के प्रयोग से बचें। 

शुभ नग (.प८८४ $860॥6) - सवा रत्ति का हीरा (98707) प्लाटिनम या सोने की अंगूठी में शुक्रवार 
को अथवा किसी सुयोग्य पण्डित जी के परामर्श अनुसार शुभ मुहूर्त्त पर निम्नलिखित मंत्र का कम से कम 6 बार पाठ 








तल लतासपबेथी उपयोगी उपाय ५ ४६ 0 0 777 3 05 मद 2 पल 2780 0 8.5! 
करके धारण करना। मंत्र- ओं. द्वां द्रीं दरों सः शुक्राय नम: 

उस दिन श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ करके ब्राह्मण दम्पत्ति का तथा पांच कन्‍्याओं का पूजन करके उन्हें चान्दी, श्वेत 
वस्त्र, फल, बरफी, दूध, दही, चावल आदि का दान करना शुभ एवं कल्याणकारी होगा। 

यदि तुला लग्न में किसी जातिका की जन्म राशि या नाम राशि धनु हो या वैवाहिक सुख में वृद्धि के लिए श्वेत पुखराज 
भी धारण करवाया जा सकता है। ै 

धन लाभ एवं सुखी वैवाहिक सुख के लिए मंगलवार का ब्रत रखना तथा उस दिन गौओं को मीठी चपातियां डालना 
शुभ होगा। 

कुण्डली में सूर्य अशुभ हो तो रविवार का ब्रत रखना तथा सूर्य भगवान्‌ को प्रतिदिन (विशेषकर रविवार ) “' ओं घृणि: 
सूर्याय नम: '” मन्त्र द्वारा ताम्र बर्तन में तीन बार अर्घ्य देना शुभ होगा। 

शुभ दिन (78५० एा-80]९ 099५$)- रविवार, सोमवार, मंगलवार, शुक्रवार तथा शनिवार शुभ होंगे। बुधवार 
मिश्रा प्रभाव करेगा। जबकि गुरुवार अशुभफलप्रद होगा। 

शुभ अंक- 3३, 4, 5, 7, मध्यमफली 8, अशुभ अंक-2, 6, 9 मध्यमफली- 8 अशुभ अंक- 2, 6, 9 
भाग्यशाली वर्ष- 6, 27, 28, 32 34, 35, 39, 40, 4॥, 42वें वर्ष 

सावधानी- तुला लग्न/राशि के जातक/जातिकाओं को अत्यधिक भावुकता, भोग-विलासिता और उतावलेपन की 
प्रवृत्ति का यथासम्भव त्याग करना चाहिए 

बाह्ममुखी प्रवृत्तियों के कारण आप विशेष परेशान एवं अशान्त रह सकते हैं | बनावट, श्रृंगार, कीमती वस्त्र, सवारी 


आदि सुख-साधनों तथा मादक व्यसनों पर वृथा खर्चो से बचें | सात्विक एवं संतुलित भोजन करना आपके मानसिक व 
शारीरिक स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होगा। 


[ तुला लग्न-द्वादशभावों में सूर्यादि ग्रहों का फल ] 

सूर्य, पराक्रम, नेतृत्व, पिता, अग्नि, तेज, आत्मबल, प्रभुत्व, प्रशासन एवं आरोग्यता का कारक माना जाता है| इसके 
अतिरिक्त १, 9, 0वें भावों का भी कारक है। तुला लग्न में यह लाभेश होने से और भी. तुला लग्ने सूर्य फल 
महत्व हो जाता है। 

नोट- सूर्यादि ग्रहों का प्रत्येक भाव पर किसी ग्रह के फल का निर्णय करते समय, 
कुण्डली में अन्य सभी ग्रहों की स्थिति, योग एवं उनकी पारस्परिक दृष्टियों का भी 
विश्लेषण कर लेंगे तो ग्रहों के फल अधिक सटीक घटित होंगे। 

प्रथम भांव॑-में शत्रु एवं नीच राशि (तुला) का सूर्य होने से जातक न्यायशील, 
साहसी परन्तु शीघ्र क्रुद्ध हो जाने वाला, प्रारम्भिक अवस्था में दुर्बल शरीर, नेत्र विकार 
भ्रमणशील, ईर्ष्यालु, झगड़ालू, कभी अनैतिक कार्यो से धनार्जन करने वाला तथा कभी-कभी मद्य (मदिरा) पीने वाला, 
कॉमन प्रवृत्ति, अस्थिर विचार, अशान्त मन, सिर पर चोट आदि का भय हो, कला एवं संगीत प्रेमी और शास्त्रीय विषयों 
में रुचि रखने वाला, कभी स्त्री के कारण परेशान एवं संतान की ओर से चिन्तित हो । ज्ञातव्य रहे, कि तुला राशि में सूर्य 
हो, तो जातक की कार्तिक-शान्ति भी करवा लेनी चाहिए, अन्यथा परिवार एवं विवाह सम्बन्धी परेशानियां या विलम्ब 
होता है | देखें उदा. कुं. नं. 67 

यहां सूर्य की सप्तम भाव पर उच्च दृष्टि होने से स्त्री पक्ष से लाभ की भी सम्भावना होती है। 

यदि लग्न पर गुरु आदि शुभ ग्रह का योग या दृष्टि हो तो उपरोक्त अशुभ फल में कमी होगी तथा जातक भूमि, 
जायदाद, वाहन, संतान आदि सुखों र: युक्त होगा ! देखें उदाहरण कुं. नं. (74) 








46 


| ___[_॒_॒_॒___[_ तुला लग्नमें सूर्य फल 

द्वितीय भांव-बुश्चिक राशि में सूर्य होने से जातक भाग्यशाली, निर्वाह योग्य धनादि साधनों से युक्त, भ्रातृ-सुख में 
कमी, प्रशासनिक कार्यों, सरकारी क्षेत्र अथवा विभिन्न स्रोतों से आजीविका प्राप्त करने वाला, कलहयुक्त, असुखद घरेलू 
परिस्थितियों वाला, कुछ कट वाणी एवं विकार युक्त, सूर्य बुध युक्त हो तो जातक अटक-अटक कर बोलता है। 

सूर्य गुरु युक्त हो तो ऐश्वर्यशाली, धनवान तथा जातक मैडिकल, चिकित्सा, वकालत आदि के क्षेत्र में सफलता के 
योग होते हैं । 
ते धने यस्य भानु: स भाग्याधिक : स्यात्‌ चतुष्पाद सुखं सद्व्यये एवं च याति। 
कुटुम्बे कलि: जायया जायतेडपि, क्रिया निष्फला यातिला भस्य हेतो:॥ 

तुतीय भाव-मित्र ग्रह की धनु राशि में सूर्य होने से जातक कुशाग्र बुद्धि, पराक्रमी, धनवान, अपने पुरुषार्थ के बल 
पर धन लाभ एवं वाहन आदि सुख के साधनों से युक्त, भाई-बन्धुओं के सुख में कमी परन्तु जातक अपने प्रियजनों व 
अन्यों को सुख देने का प्रयत्न करता है। जातक लेखन, चिकित्सा, प्रकाशन, अध्यापन, ज्योतिष एवं वकालत आदि 
व्यवसायों में सफल होता है। जातक परोपराकरी, धार्मिक एवं तीर्थ यात्राएं करने वाला होता है| तृतीय भाव में सू, बु. व 
शनि ग्रहों का सम्बन्ध हो तो जातक अपने कार्यक्षेत्र में उच्चप्रतिष्ठित, विख्यात होता है तथा उसे देश-विदेशों में भ्रमण के 
अवसर प्राप्त होते हैं | देखें कुण्डली नं. 63 तथा 65, (प्रसिद्ध नेता अटल बिहारी व खिलाड़ी कपिल देव) 

चतुर्थ भाव-में शत्रु राशि मकर पर सूर्य के प्रभाव से जातक को माता एवं भूमि आदि के सुखों में कमी होती है। 
उच्च विद्या, मकान एवं वाहन आदि के सुखों की प्राप्ति भी विंष्न/बाधाओं के पश्चात्‌ होती है। परिवारिक सुख में भी कु 
अल्पता रहती है। वृथा विवाद में पड़ने की प्रकृति, अशान्त मन, ऐसा व्यक्ति जीवन में धन लाभ व उन्नति धीरे- धीरे करता 
है। यहां सूर्य यदि गुरु, मंगल, बुध, शुक्र आदि ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो_.तो जातक को भूमि, मकान, अच्छी शिक्षा, वाहन 
आदि सुखों की प्राप्ति होती है। यदि राहु आदि अशुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो तो जातक को निकट बन्धुओं से वैमनस्प 
और सुख में कमी होती है। . ' ह 

पंचम भांव-शत्रु ग्रह की राशि कुम्भ पर सूर्य के प्रभाव से जातक कुशाग्र बुद्धिमान, किन्तु अस्थिर ए+ शीघ्र 
उत्तेजित होने वाला, अत्यधिक संघर्ष के बाद भी निर्वाह योग्य आय के साधन बनें, अनायास धन लाभ की भी संभावना, 
उच्च प्रतिष्ठित मित्रों से युक्त, मंत्र, ज्योतिष एवं धर्मादि गूढ़ विषयों में रुचि हो | उच्च विद्या में भी संघर्ष के पश्चात्‌ सफलता 
हो, सनन्‍्तान सम्बन्धी परेशानी, अल्प सनन्‍्तति सुख अथवा पुत्र कम व कन्याएं अधिक होने के योग, पंचमस्थ सूर्य पर 
किसी अन्य (शनि, राहु आदि) ग्रहों का योग या दृष्टि हो तो गर्भपात की सम्भावना करता है। इसके अतिरिक्त उच्च विद्या 
प्राप्ति में अड़चनें, प्रेम में असफलता अथवा पिता को कष्टकारी या हृदय सम्बन्धी रोग एवं परिवारिक चिन्ताएं होने की भी 
सम्भावनाएं होती हैं। 

बहष्ठ भाव-में मित्र ग्रह की राशि (मीन) पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक परिश्रमी, उच्च शिक्षित, प्रतिष्ठित, अपने 
कार्य-व्यवसाय में कुशल, स्वाभिमानी, अपने उद्यम द्वारा एवं गुप्त युक्तियों द्वारा धन लाभ प्राप्त करने वाला, भाई-बन्धुओं 
का हितैषी, शत्रुओं पर विजय पाने वाला, बाहरी सम्बन्धों से आय के साधनों में वृद्धि पाने वाला होगा। परन्तु सूर्य की 
द्वादश भाव पर दृष्टि होने से व्यय भी अधिक रहेंगे। देखें उदा. कुं. नं. 68।॥ 

. छठे भावस्थं सूर्य पर यदि गुरु की दृष्टि हो, तो जातक चिकित्सा क्षेत्र में अच्छी सफलता प्राप्त कर सकता है, यदि राहु, । 

शनि, केतु आदि द्वारा दृष्ट हो तो धन हानि, उदर विकार आदि रोगों का भय हो। 

अप्तम भाव-मित्र ग्रह मंगल की उच्च राशि मेष पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक उच्चाभिलाषी, स्वाभिमानी, 
उच्चविद्या प्राप्त, बुद्धिमान, धनी, ईमानदार, किसी प्रतिष्ठित संस्थान या सरकारी क्षेत्र से लाभ प्राप्त करने वाला होता है। सप्तम 
भावस्थ सूर्य प्राय: विवाह. में विलम्बकारी होता है। मतान्तर से ऐसा जातक पर स्त्री में भी आसक्त होता है। यदि सप्तमेश 
भौम उच्चस्थ या स्वगृही हो या उस पर गुरु, भौमादि की दृष्टि हो तो जातक की विवाहोपरान्त विशेष भाग्योन्नति होती है 
अथवा सर्विस में कार्यरत लड़की से विवाह होता है। उदाहरण स्वरूप देखें कु. नं. 60 तथा कुं. नं. 73 





तुलालग्नमेंसूयंफल _ अअ..ल्‍.ै._अ|अ|ऋ|ऋ|ऋ|ऋ[ऋ॒औऋैऋ[|ऋ[ ऋऑ“्“:. . . _£ ॥7 

अंष्टम भाँव-में शत्रु शुक्र की वृष राशि पर सूर्य के प्रभाव से जातक परिश्रमी तथा व्यवसाय में अत्यन्त संघर्षशील 
नेत्र रोगी, माता-पिता व भाई बन्धुओं के सम्बन्ध में चिन्तित व असंतुष्ट व परेशान होता है। कठिन परिश्रम द्वारा ही निर्वाह 
योग्य धन प्राप्ति के साधन बन पाते हैं । यदि सूर्य पर किसी अशुभ ग्रह की दृष्टि या युति हो तो पैतृक सुख में कमी होती 
है। यदि चन्द्र, बुध या मंगल आदि ग्रहों का योग या दृष्टि हो, तो जातक व्यवसाय में 32 वर्ष के पश्चात्‌ लाभ व उन्नति 
करता है। विदेशी सम्बन्धों द्वारा भी धनार्जन करता है, परन्तु ऐसा जातक विशेष संघर्ष व कठिनाइयों के पश्चात्‌ ही 
सफलता प्राप्त करता है। देखें कु. नं. 59, 66 | 

निधनगत दिनेशे चंचल: त्यागशील: किल बुधगण सेवी सर्वदा रोगयुक्त:॥... 

नंवम भांव-में मित्र ग्रह की मिथुन राशि पर सूर्य होने से जातक बुद्धिमान, उच्चशिक्षित, परोपकारी, परिश्रमी व 
धार्मिक विचारों वाला एवं भाग्यवान होता है। यदि अशुभ ग्रह से युक्त या दृष्ट हो तो पितृ सुख में कमी होती है। भाई 
बन्धुओं के सुख से युक्त तथा अपने पुरुषार्थ के बल पर धन, सम्पदा, सवारी, कुटुम्ब एवं पुत्र आंदि सुखों को प्राप्त कर 
लेता है। धर्म, मन्त्र, नीति एवं ज्योतिष आदि गूढ़ शास्त्रों का भी जानकार होता है। इस भाव पर बुध, शनि, चन्द्र, मंगल 
आदि ग्रहों में से किसी ग्रह का योग अथवा दृष्टि सम्बन्ध हो, तो जातक ज्योतिष, आध्यापन, लेखन, प्रकाशन, क्रय-: 
विक्रय, विदेशी सम्बन्धों एवं सरकारी क्षेत्रों से लाभान्वित होता है। उदाहरणार्थ देखें कुं. नं. (72) 

दक्घाम भाव-में चन्द्रमा की कर्क राशि पर सूर्य होने से जातक बुद्धिमान, भाग्यवान, सुशिक्षित, पराक्रमी, विद्वान, 
उदारहदय, लोकमान्य एवं अपने व्यवसाय में कुशल होता है। यदि सूर्य के साथ मं., बु., शुक्रादि ग्रहों का सम्बन्ध हो, तो 
जातक उच्चस्तरीय व्यवसाय से सम्बन्ध, भूमि, ट्रेडिंग आदि द्वारा समुचित धनार्जन करने वाला, कला-संगीत प्रिय भूमि 
जायटाद, सवारी, संतान आदि सुख साधनों से युक्त होगा। ऐसे जातक के उच्च प्रतिष्ठित लोगों के साध सम्बन्ध भी रहते 
हैं। देखें कुं. संख्या नं. (6) 

यदि दशम में सूर्य के साथ चन्द्र, बुधादि का योग या मंगल की दृष्टि हो तो जातक/जातिका डाक्टर, उच्च 
राज्याधिकारी, अफसर, चार्टड, अकाउंटेंट (2.86.) होगा। देखें उदा. कुं. नं. 70 

क्‍ अतिमति रति विभवबल: धन वाहन बन्धु पुत्रवान्‌ सूर्य 

एकादथ्या भाव-में स्वगृही सिंह राशि पर सूर्य होने से जातक, सूझवान, भूमि, मकान, वाहन, सन्तान-आदि सुखों 
से युक्त, आकर्षक व्यक्तित्व, विचारशील, माता-पिता की सहायता से लाभ व उन्नति प्राप्त करने वाला, उच्च स्तरीय जीवन 
बिताने वाला, उच्चाकांक्षी, धनादय व्यक्ति होगा। देखें कुं. नं. 69 सूर्य के साथ शुक्र, बुध का भी योग हो तो विशेष धनी 
एवं साधन सम्पन्न होता है। यदि सूर्य शनि द्वारा दृष्ट हो तों हृदय रोग या आघात का भी भय होता है। 

लाभे सूर्य समुत्पन्नों नाना लाभ समन्वित:। के 
सात्विको धार्मिको ज्ञानी रूपवानपि जायते॥ के 5 


द्वादघ्ा भाव-में मित्र ग्रह बुध की कन्या राशि पर सूर्य होने से जातक बुद्धिमान, स्वार्भिमानी, अंन्‍्वेषणंशौल' 


प्रकृति, भ्रमणशील, नेत्र कष्टी, एकान्त प्रिय, कृश (पतला) शरीर, अपने जन्म स्थल से दूर (विदेशादि में) रहने चाला, .. | 


वृथा अधिक व्यय करने वाला, व्यवसाय के क्षेत्र में विदेश आदि में संघर्षशील होता है। यदि चन्द्र शुक्र, चुधादि का भी 
सम्बन्ध बना हो तो जातक महानात्मा, विख्यात, तीत्र बुद्धिमान, उच्चादर्श, सब संकट शान्ति से सहने वाला, संत्‌ कर्म 
परायण, आध्यात्मिक प्रवृत्ति एवं सूक्ष्म विचारपूर्वक काम करने वाला होता है। उदाहरण स्वरूप देखें कुण्डली नं. 64 
(महात्मा गांधी) ऐसा जातक धर्म शास्त्रादि गूढ़ विषयों को जानने वाला होता है। 





38_ _ __ _____॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_____ तुला लग में चद्धफल 8 लग्न में चनद्रफल 
32 अं 4 ँकट्स्मनक््क मेनन 


[तुला लग्न: चन्द्रमा का द्वादउश भावों में फल). 


चन्द्रमा मन, माता, कल्पनाशक्ति, स्त्री, धन, सम्पत्ति आदि का कारक माना जाता है। तुला लग्ने चन्द्र फल 
तुला लग्न में चन्द्र कार्येश होने से इसका महत्त्व और भी बढ़ जाता है। इसके अतिरिक्त  8चं. ५ &चं. 
चन्द्र चतुर्थ भाव का कारक भी माना जाता है। ; 

आगे चन्द्रमा का प्रत्येक भाव पर फल का विचार करते समय उस के साथ अन्य ग्रहों 














फलादेश होगा। कृष्ण पक्ष की अष्टमी से शुक्ल पक्ष की सप्तमी तक क्षीण चन्द्र कहलाता 
है। 
प्रथम भाँव-में तुला राशि पर चन्द्रमा होने से जातक सुन्दर वर्ण, आकर्षक व्यक्तित्व वाला, रूपवान, उद्यमी, 
चंचल एवं अस्थिर बुद्धि परन्तु ऐसे जातक को विभिन्न स्थलों (देश-विदेश) में भ्रमण के अवसर प्राप्त होते रहते हैं। 





भावुक, अशान्त एवं कल्पनाशील प्रकृति, व्यवसाय में भी कुछ न कुछ परिवर्तन करता रहता है। शुक्र या मंगल से युक्त .. 


हो तो स्त्रियों से लाभ प्राप्त करने वाला, संगीत, गायन आदि का भी प्रेमी। कम्पयूटर, स्टेशनरी, दुग्ध पदार्थ, फैशन 
डिज़ाइनिंग, सिनेमा, संगीत, टैलीविज्ञन, दूरसंचार, फास्ट फूड, ज्योतिष आदि कार्यों में विशेष सफलता प्राप्ति के योग 
होंगे। स्त्री सुन्दर एवं कार्य क्षेत्र में विशेष सहायिका होगी। देखें कुं. 72 
लग्ने चन्द्रे जड: शुद्ध: प्रसन्न: धनपूरित:। 
स्त्री वह्लनभ: धार्मिकश्च कृतघ्नश्च नरो भवेत्‌॥ 
द्वितीय भाव-में बृश्चिक राशि का चन्द्रमा होने से जातक अशान्त मन किन्तु मधुरभाषी, अधिक मित्रों से युक्त 
आर्थिक परेशिनियां, धनार्जन के लिए विशेष संघर्ष रहे, आर्थिक एवं परिवारिक सुख में भी कमी रहती है। क्षीण चन्द्र 
हो, तो अपनी ही भूलों के कारण कई बार धन का नुकसान होता है | चन्द्र यदि शुक्र, मंगल या गुरु आदि से युक्त या दृष्ट 
हो तो जातक विभिन्न साधनों एवं गुप्त युक्तियों से निर्वाह योग्य आय के साधन प्राप्त कर लेता है । ऐसा जातक व्यवहार 
कुशल तथा सम्पत्ति, वाहन आदि सुखों से युक्त होता है। देखें कुं. नं. 6, 62, 63, 65, 70 
परन्तु गृहस्थ सुखों में कमी रहती है, देखें कुं. नं 63 (श्री अटल बिहारी वाजपेयी) 
तृतीय भाव-में धनु राशिगत चन्द्र हो तो जातक/जातिका पुरुषार्थी, धार्मिक विचारों वाला, अपने कर्त्तव्य के प्रति 
गम्भीर एवं ईमानदार, भाई-बहिनों के प्रति निष्ठावान, बहिनें भी भाई को चाहती हैं। ऐसे जातक की स्मरणशक्ति, . 
कलात्मक एवं कल्पना शक्ति अच्छी होती है। व्यवसाय के क्षेत्र में अत्यन्त संघर्ष के साथ एक से अधिक खातों द्वारा धन 
एवं आय के साधन बनते हैं । यदि बुध, शुक्र का योग हो अथवा गुरु की शुभ दृष्टि भी हो, तो जातक/जातिका को कार्य 
क्षेत्र में विशेष धन लाभ व प्रसिद्धि भी प्राप्त होती है। चन्द्र-शुक्र का योग हो तो अभिनय एवं कला के क्षेत्र में उल्लेखनीय 
सफलता प्राप्त होती है। उदा. देखें कुं. नं. 67 (ऐश्वर्य राय), 7, 73 (सचिन तेंदुलकर) 
चतुर्थ भाव-में मकर राशि पर चन्द्र हो तो जातक उच्च विद्या प्राप्त, बुद्धिमान, भक्ति भावना से युक्त, माता-पिता 
के प्रति निष्ठावान, परन्तु माता के स्वास्थ्य के प्रति चिन्तित रहे। भूमि, मकान, वाहन आदि सुखों से युक्त हो । यदि चतुर्थ 
भाव पर किसी अन्य शुभ ग्रह की दृष्टि या योग न हो, तो जातक/जातिका का प्रारम्भिक जीवन परेशानियों व उलझनों से 
युक्त होगा। व्यय अधिक तथा आर्थिक एवं परिवारिक परेशानियां अधिक रहें। 
पंचम भांव॑-में कुम्भ राशि पर चन्द्र हो, तो जातक तीब्र बुद्धिमान, मधुरभाषी, कल्पनाशील, विचारशील, उच्च 
विद्या, धर्म के प्रति आस्थावान, ऐसे जातक को श्री दुर्गा माता की भक्ति से मनोबांछित फल प्राप्ति, मिलनसार, व्यवहार- 








तुलालग्नमेंचद्गफल _ _ _[_|ऋ[औ ऋ॒_॒|<ः॒ 79 
कुशल, संगीत कला एवं साहित्य आदि में रुचि, गुप्त युक्तियों से संघर्ष के बाद धन लाभ प्राप्त करने वाला, आर्थिक 
उलझनों के कारण चिन्तित रहे, शेयर, सट्ठ॑, लाटरी आदि से अनायास धन लाभ की सम्भावना हो, भौमादि की दृष्टि या 
योग हो, तो विवाहोपरान्त भाग्योन्नति हो, सन्‍्तान उत्तम हो, परन्तु कन्या सन्‍्तति अधिक होने की सम्भावना हो | यंत्र, मन्त्र 
ज्योतिष, कम्पयूटर आदि विद्या के प्रति भी रुचि होगी। विदेशी सम्बन्धों से लाभान्वित हो। 

बष्ठ भाँव-में गुरु की राशि मीन पर चन्द्र होनें से जातक व्ययशील अर्थात्‌ खर्चीले स्वभाव का, शरीर कष्टी 
अपव्यय तथापि जातक परोपकारी एवं उदार प्रवृत्ति वाला, अत्यन्त संघर्ष के बाद जीवन में धन-लाभ व उन्नति प्राप्त करने 
वाला, गुप्त शत्रु, रोगादि से चिन्तित, स्त्री की कुण्डली में मानसिक एवं गुप्त रोग का संकेत, यहां मंगल या भाग्येश बुध 
का भी सम्बन्ध हो तो विदेश में लाभ प्राप्ति के योग भी बनते हैं । भौम की दृष्टि हो तो प्रेम विवाह के योग तथा अभिनय 
कला में विशेष उन्नति प्राप्त हो । यदि राहु व शुक्रादि का योग हो तो शरीर के लिए अनिष्टकर,-शराब आदि के व्यसन भी 
होते हैं । 

अप्तम भाव-में मेष राशि पर चन्द्रमा के प्रभाव से जातक/जातिका सुन्दराकृति एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व वाला 
स्फूर्तिवान, तेज बुद्धि परन्तु अस्थिर मन वाला, कामुक, भ्रमणशील, स्वाभिमानी, उच्चशिक्षित, क्रय विक्रय में कुशल एवं 
परिश्रमी होता है । यदि यहां शुक्र का योग एवं शनि की दृष्टि हों तो ऐसा जातक अपने परिश्रम व लग्न से उच्च प्रतिष्ठित 
प्राध्यापक या प्रिंसीपल होता हैं। ऐसा जातक क्रय-विक्रय एवं सांझेदारी के व्यवसाय में अच्छा मुनाफा प्राप्त करता है। 
चन्द्र के साथ राहु का योग हों तो जातक/जातिका को वैवाहिक सुख में कमी रहती है। परन्तु उच्च पद, आवास एवं 
वाहनादि सुखों की प्राप्ति होती है। देखें कुण्डली संख्या 68 

अष्टम भाँव॑-में शुक्र की राशि पर वृष चन्द्र उच्च स्थिति में होने से जातक बुद्धिमान, उच्चाभिलाषी, उच्च शिक्षा 
प्राप्त, परिश्रमी, परिवार के सुख सुविधाओं के लिए विशेष संघर्षरत, भावुक हृदय, उच्च कल्पनाशक्ति, परोपकारी 
संगीत, कला, साहित्य के प्रति रुचि, कामुक प्रवृत्ति, किंतु स्वाभिमानी होगा। प्रारम्भिक अवस्था में अत्यन्त कठिनाईयों . 
के पश्चात्‌ सर्विस आदि कार्य क्षेत्र में सफलता प्राप्त करता है। यदि राहु आदि क्रूर ग्रह युक्त हो तो माता के लिए . 
अरिष्टकर.एवं खर्च अधिक रहता है। देखें उदा. कुण्डली नं. 60। विदेशी सम्बन्धों से भी भाग्योन्नति की सम्भावना। 

जनंवम भांव-में मिथुन राशि पर चन्द्र हो तो जातक को विघ्नों के बाद उच्च विद्या प्राप्त, आकर्षक व्यक्तित्व, 
धार्मिक प्रवृत्ति, परिश्रमी, उदार हृदय, तर्क-वितर्क करने में कुशल, उच्चाकांक्षी, भूमि, वाहन, स्त्री, धन आदि सुखों से 
युक्त होता है। शुक्र-बुध का भी योग हो तो ऐसा जातक धन, ज्योतिष, नीति, कम्पयूटर, कामर्स, कानून आदि विषयों का 
भी जानकार होता है। भ्रात्‌ सुख अल्प तथा बहिनों के सुख की सम्भावना। बुध-शुक्र के कारण जातक निजी व्यवसाय, 
इंटीरियर-फर्नीचर, क्रय-विक्रय, लेखन, प्रकाशन तथा विदेशी सम्बन्धों में भी सफल होता है| 

उदा. हेतु देखें कुं. नं. 59, ऐसे जातक को दीर्घ यात्राएं भी अधिक रहती हैं। 

ह कलत्पुत्र द्रविणोपपन्न: पुराणवार्ता श्रवणानुरक्त :॥ 

दम भाँव- भाव में स्वराशि कर्क में चन्द्रमा होने से जातक तीव्र बुद्धिमान, कठिन संघर्ष के बाद उच्च विद्या एवं 
व्यवसाय में लाभ व उन्नति प्राप्त करने वाला, पिता का भी यथेष्ठ सहयोग प्राप्त होता है। स्त्री, भूमि, वाहन आदि सुखों 
की प्राप्ति होगी । दशम भाव पर शनि, बुध, शुक्रादि ग्रहों का सम्बन्ध हो तो जातक उच्च प्रतिष्ठित, कम्पीटीशन ((..... 
या |॥8.4 आदि) में सफल होता है। मंगल सूर्य का भी योग हो तो विवाह उपरान्त विशेष उन्नति होती है। निजी कार्य 
व्यवसाय तथा सरकारी क्षेत्रों से भी लाभान्वित होता है। ऐसा जातक समाज में उच्चप्रतिष्ठित तथा स्वाभिमानी होता है। 
ऐसा जातक भूमि के क्रय-विक्रय से भी लाभ प्राप्त करता है। साधन होतें हुए भी निजी आवास के बारे में परेशानियां 


रहती हैं। 


20 _ _ _ ______॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒॒_ तुला लग्नमेंमंगलफल ! 


कर्मस्थाने सुधारश्मी महाधनी। मनस्वी च मनोज्ञश्च राजमान्यश्च जायते॥ 


 - एकादघा भाव-में सूर्य की राशि सिंह पर चन्द्रमा स्थित हो तो जातक/जातिका को, विध्न-बाधाओं के बावजूद । 


उच्च व्यवसायिक विद्या प्राप्त, उच्च प्रतिष्ठित मित्रों के साथ सम्पर्क, विभिन्न संसाधनों के द्वारा धन लाभ, पितृ पक्ष एवं 


सरकारी क्षेत्रों से भी लाभ, कुण्डली में गुरु शुभस्थ हो, तो विदेश में भाग्योत्नति के योग होंगे। शेयरों या ्ताटरी आदि से . : 


भी लाभ की सम्भावना, शनि अशुभ हो तो उच्च विद्या प्राप्ति में विध्न बाधाएं एवं विशेष परिवर्तन हो | द््ें उदा. कुं. 66 
(इस जातिका का विंवाहोपरान्त विदेश में भाग्यलाभ हुआ) परन्तु सप्तमेश मंगल यदि अशुभ हो तो वैवाहिक जीवन में 
असंतोष व विशेष उलझनें होती हैं । 

द्वादघां भांव-में बुध की कन्या राशि पर चन्द्र हो तो जातक/जातिका चिन्तनशील प्रकृति वाला, सेवाभावी, उच्च- 
विद्या एवं व्यवसाय में विध्न/बाधाओं के पश्चात्‌ सफलता हो, प्रेम सम्बन्धों अथवा वैवाहिक सम्बन्धों में भी कठिनाईयों 
के पश्चात्‌ सफलता हो | व्यवसाय के सम्बन्ध में दौड़-धूप, यात्राएं एवं धन खर्च अधिक रहेंगे। परिवारिक सम्बन्धों एवं 
व्यवसायिक क्षेत्रों में अस्थिरता रहे | वायु विकार, सर्दी जुकाम, नेत्र कष्ट का भय व मन अशान्त व चिन्तनशील रहे | यदि 
यहां चन्द्र, मंगल, बुध, शुक्र ग्रहों का सम्बन्ध बना हो तो जातक/जातिका मैडीकल क्षेत्र में उल्लेखनीय उन्नति करता है तथा 
'विदेश-में भाग्योन्नति होती है। देखें कुण्डली नं. (69) चन्द्रेउन्ये जाते विदेशवासी 


तुला लग्न : द्वादश भावों में मंगल का फल 


मंगल यद्यपि पराक्रम, धैर्य, उत्साह, भूमि, पुत्र आदि का कारक है। परन्तु तुला लग्न. तुला लग्ने मंगल फल 
में मारकेश-होने पर तथा क्रूर ग्रह योग होने से अशुभ फली हो जाता है। यदि स्वगृही व -+- 















चाहिए। 
दध्रथम भाँव-में तुला राशि"पर मंगल होने से जातक/जातिका परिश्रमी सुन्दर, मं 
खूबसूरत एवं आकर्षक व्यक्तित्व वाला, उत्साहशील, स्वाभिमानी, विनम्र-शिष्टाचार युक्त, 
रक्त विकार, नेत्र कष्ट एवं शीघ्र उत्तेजित हो जाने की प्रकृति होगी। उच्च-शिक्षा एवं व्यवसाय में विध्नों के पश्चात 
. सफलता प्राप्त हो। ऐसा जातक/जातिका अपनी वास्तविक आयु से युवा दिखाई देता है। चतुर्थ भाव पर मंगल की उच्च 
दृष्टि तथा सप्तम स्वगृही दृष्टि होने से विवाह के बाद भूमि, मकान, वाहन आदि सुखों की प्राप्ति होती है । ऐसा जातक 
अपनी प्रतिष्ठा के प्रति विशेष सजग होता है। लग्न भाव में मंगल, मंगलीक दोषकारक होता है, जिससे जातक/जातिका 
को स्त्री या पति द्वारा वैवाहिक सुख भी अड्चनों के पश्चात्‌ मिलता है। अष्टम दृष्टि होने से उदर विकार होने की 
सम्भावना। गुरु द्वारा दृष्ट हो तो जातक आध्यात्मिक क्षेत्र में उच्च प्रतिष्ठित होता है। देखें उदा कु. न. 64 
द्वितीय भांव-में स्वगृही ब॒श्चिक राशि पर मंगल की स्थिति होने से जातक/जातिका उद्यमी, परिश्रमी, स्पष्टवादी 
(कभी-कभी कटु एवं कठोर वांणी का प्रयोग करने वाला), उच्च शिक्षित, दृढ़ निश्चयी, धर्म परायण, उदार हृदय, तर्क- 
वितर्क करने में कुशल, पैतृक सम्पदा, भ्रातृ एवं स्त्री, सन्‍्तान आदि सुखों से युक्त, यदि राहु या केतु ग्रह साथ में हो, तो 
कार्य/व्यवसाय में अत्यन्त कठिनाईयों के बाद ही'निर्वाह योग्य आय के साधन बन पाते हैं । नेत्रों को कष्ट, कटु-तिक्त 
भोजनप्रिय, विवाह उपरान्त विशेष धन लाभ रहे। 
मंगल दूसरे भाव निष्फली माना जाता है, अंतएव दूसरें भाव सम्बन्धी फल में कई बार वांछित फल प्राप्त नहीं होते। 
तूंतीय भांव॑-में धनु राशि पर मंगल होने से जातक पराक्रमी, तीब्र बुद्धि, उद्यमी, भ्रमणशील, अपने पुरुषार्थ द्वारा 
धनार्जन करने वाला, भाई-बहिनों का सुख यथेष्ट होगा। थोड़ी सी विरुद्ध बात हो जाने पर शीघ्र क्रोधित हो जाए। विदेशी 











तुलालग्नमेंमगलफल _____|+|+|[|[ैऔ औ ै ै/_/ऋ॒_खझख_ऊ_+३जञ[३ऑ्ऑ॥ऑ॥ऑ्7"्ऋ/स्‍यखञखञखञखञखञखञखञ३ञ्ऑ्"4्८्८्7ञ्ञ्2 
सम्बन्धों द्वारा भी धनार्जन के अवसर मिलें। विवाह उपरान्त व्यवसाय में विशेष लाभ व उन्नति प्राप्त हो । ऐसा जातक मन्त्र 
ज्योतिष एवं धर्म शास्त्रों के प्रति भी आस्थावान होता है। यदि तीसरे भाव में चन्द्र-मंगल का योग हो, तो भाई के साथ 
मिलकर लोहे या तेल के कार्य व्यवसाय में उच्चस्तरीय लाभ व उन्नति के योग प्राप्त होते हैं । उदाहरणार्थ देखें कुण्डली न॑ 
(7१) वैसे ३, ६ या ११वें भावों में मंगल, शनि व राहु सर्व अरिष्ट नाशक माने जाते हैं। 
तिषड्रएकांदशे राहु:, शनि-भौमश्च सर्वारिष्ट नाशका:। 
चतुर्थ भाँव-में मकर राशि पर उच्च स्थिति में मंगल होने से जातक भूमि, मकान, वाहन आदि सुख साधनों से 
सम्पन्न, पिता को शरीर कष्ट, व्यवसाय में अस्थिरता एवं असंतोष रहता है। 40 वर्ष की आयु के पश्चात्‌ कुछ स्थिरता 
आती है। मंगल की दशम नीच दृष्टि होने से प्रिता के लिए अरिष्टकर। मंगल के साथ गुरु का योग अथवा शुभ दृष्टि हो, 
तो विवाह के पश्चात जातक धन लाभ, उन्नति एवं खेल आदि विशिष्र क्षेत्र में विशेष ख्याति प्राप्त करता है। देखें उदा. 
कुण्डली नं. 73 ह 
नोट:- चतुर्थ भाव में मंगल यद्यपि मंगलीक दोष कारक भी होता है, परन्तु तुला लग्न में यहां उच्चस्थ होकर सप्तम 
भाव पर स्वगृही दृष्टि होने से इतना अशुभ नहीं।... 
पंचम भाव-में कुम्भ राशि पर मंगल होने से जातक सुन्दर, आकर्षक व्यक्तित्व वाला, परिश्रमी, तीब्र बुद्धि परन्तु 
तनिक विरुद्ध बात हो जाने पर शीघ्र क्रोधित हो जाने वाला, अपने उद्देश्य के प्रति दृढ़ संकल्पी, संघर्ष एवं विध्नों के 
पश्चात्‌ उच्च विद्या एवं धन लाभ प्राप्त करता है। पाचन शक्ति अच्छी होती है, सांसारिक, कुछ हार्दिक प्रबल इच्छाएं 
अतृप्त रहती हैं। परिवारिक कलह अथवा स्त्री से कुछ वैमनस्य रहे । अल्प सन्तति एवं सन्‍्तान सम्बन्धी चिन्ता, स्त्री की 
कुण्डली में पंचम भौम गर्भपात होने की सम्भावना करता है। शनि चन्द्रादि ग्रह से युक्त या दृष्ट हो, तो देश विदेश से 
सम्बन्धित लाभ तथा व्यय भी विशेष अधिक होते हैं । ऐसा जातक सफल सर्जन, वकील, डैंटिस्ट, कम्पयूटर इंजीनियर या 
वैज्ञानिक भी हो सकता है। 
षष्ठ भाँव-में मीन राशि पर मंगल होने से जातक व्यवहार कुशल, चतुर बुद्धि, परिश्रमी, शत्रुओं पर प्रभावी, 
इसकी जठराग्नि व कामाग्नि दोनों तेज्ञ होती हैं। परन्तु यदि मंगल अस्त या सन्धिगत हो तो मन्दाग्नि, उदर विकार व 
दुर्घटना का भय होता है तथा स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता। परिवारिक उलझनें अधिक। अत्यन्त परेशानियों व संघर्ष के 
बाद गुप्त युक्तियों द्वारा जातक निर्वाह योग्य आय के साधन प्राप्त करने में सफल होता है। लेन-देन के बारे में विवाद आदि 
की भी सम्भावना। यदि षष्ठ मंगल पर शनि की दृष्टि पड़ती हो, जातक/जातिका उच्च व्यवसायिक विद्या प्राप्त करने में 
सफल होता है। षष्ठ मंगल सप्तमेश होकर सप्तम भाव से द्वादशस्थ होने से वैवाहिक सुख में विलम्ब एवं विध्नकारक _ 
अथवा विवाह सुख की हानि करता है। उदाहरणार्थ देखें कुण्डली संख्या नं. 63 (श्री वाजपेयी जी), वैसे भी षष्ठ भाव 
में मंगल, शनि.व राहु सर्व अरिष्ट नाशक माने जाते हैं।.._ 
कप्तम भाव-में मेष राशि पर मंगल स्बैगृही स्थिति में होने से जातक/जातिका कर्मठ, स्फूर्तिवान, परिश्रमी 
साहसी एवं कुछ तेज प्रकृत्ति का होता है। व्यवसाय के सम्बन्ध में दौड़-धूप एवं कठिन संघर्ष के बाद आय के साधन 
बनते हैं | वैवाहिक सुख में कमी या विलम्ब होता है । यदि सू.-बु. का योग हो तो शिक्षा क्षेत्र में सफलता मिलती है। देखें 
उदा, कुं. 60 
यदि मंगल के साथ शनि, राहु या केतु आदि क्रूर ग्रह का योग हो, तो पत्नी या पति के मध्य कलह-क्लेश रहे, यदि 
गुरु युक्त हो तो मैडीकल क्षेत्र में सफलता (देखें उदा. कुं. 70), यदि चंद्र-मंगल का योग हो, तो विदेश गमन में लाभ, 
यदि कुं. में, चंद्र-शुक्र का योग हो अथवा चंद्र-गुरु के योग पर मंगल की दृष्टि हो, तो फिल्म जगत में या खेल के क्षेत्र 
में विशेष उल्लेखनीय सफलता एवं प्रसिद्धि होती है। उदा. हेतु देखें कुं. नं. 67 (ऐश्वर्य राय), नं. 65 (कपिल देव) 
नोट:- सप्तमस्थ मंगल होने से कुण्डली में मंगलीक दोष का भी विचार किया जाता है। 

















22 _ _ __________ _[__ __ _[_[_<॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒.॒.॒.॒_॒ .॒.॒.॒.॒. लतुलालनगमेंमंगलफल 

अष्टम भांव-में वृष राशि पर मंगल होने से जातक/जातिका परिश्रमी, उद्यमी एवं पुरुषार्थी होगा। ऐसा जातक 
देश-विदेश में गुप्त युक्तियों द्वारा धनार्जन करता है| अत्यन्त संघर्ष द्वारा परिवार के लिए निर्वाह योग्य आय के साधन बना 
ही लेता है। भाई-बन्धुओं का सुख मिलता है परन्तु उनसे अल्प लाभ प्राप्त होता है। 32 वर्ष की आयु के बाद ही व्यवसाय 
में स्थिरता हो । मंगल के साथ शनि, केतु, राहु आदि ग्रहों का सम्बन्ध हो तो जातक को रक्त विकार, पाचन प्रक्रिया, उच्च . 
रक्तचाप आदि गुप्त रोग अथवा दुर्घटना से चोटादि का भय हो | अष्टम भाव में मंगल मंगलीक दोषकारक भी होता है, 
. जोकि स्त्री/पति सुख में कमी करता है। उचित उपाय करने से लाभ हो। 

मंवम भाँव॑-में मिथुन राशि पर मंगल स्थित होने पर जातक धर्म के प्रति आस्थावान होता है तथा पराक्रमी 
बुद्धिमान, उच्च व्यवसायिक विद्या प्राप्त, माता, भूमि, मकान, वाहनादि सुखों से युक्त, विवाह उपरान्त विशेष धन लाभ एवं 
भाग्योन्नति होती है। जातक स्वाभिमानी एवं स्वावलम्बी होता है, अर्थात्‌ भाई बन्धु होने पर भी उनके सुख में कमी होती 
है। देखें कुं. नं. 62 | यदि मंगल के साथ शनि, राहु आदि ग्रहों का सम्बन्ध हो तो जीवन के पूर्वार्द्ध भाग में व्यवसाय के 
सम्बन्ध में विशेष संघर्ष होगा। कुं. में चन्द्र-गुरु का योग हो, तो देश-विदेशों में यात्राओं के अवसर प्राप्त होते हैं । इस भाव 
में मंगल मिश्रित (शुभाशुभ) प्रभाव देता है। | 

दघ्यांम भाव-में कर्क राशि पर नीच स्थिति में मंगल के प्रभाव से जातक/जातिका तीव्र बुद्धिमान, पराक्रमी, उद्यमी, 
स्वाभिमानी, आकर्षक एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व वाला, उच्चशिक्षित, उच्चस्तरीय, व्यवसाय को अपने कठिन परिश्रम व 
पुरुषार्थ द्वारा आगे बढ़ाने वाला होगा तथा जातक को भूमि, जायदाद, वाहन आदि सुखों की प्राप्ति होगी। परन्तु 
मध्यावस्था तक कार्य/व्यवस्था में अस्थिरता एवं असंतुष्टि रहती है। यदि कुं. में दशम भाव में मंगल के साथ शुक्र का योग 
हो तो जातक आन्तरिक साज-सजाबट (7८४० 0०6०:४४०/) आदि के कामों में कामयाब होता है । देखें कुण्डली नं. 
(59) एवं (6) । यदि मंगल के साथ किसी क्रूर ग्रह राहु या शनि आदि का योग हो तो जातक को वैवाहिक सुख की 
हानि होती है। देखें कुं. नं. 68 (यहां शनि-मंगल के योग पर किसी शुभ ग्रह की दृष्टि नहीं पड़ रही ) । यदि दशम मंगल 
के साथ सू. बु. शु. गु. आदि ग्रहों का सम्बन्ध हो तो जातक व्यवसाय में अपने उद्यम द्वारा लोहादि धातुओं के क्षेत्र में 
विशिष्ट लाभ व उन्नति प्राप्त कर लेता है। | 

एकादद्ा भाव-में मित्र सूर्य की राशि सिंह पर मंगल स्थित होने से जातक स्पष्टवादी, प्रभावशाली व्यक्तित्व, 
साहसी, पराक्रमी, कार्य-व्यवसाय में विघ्न एवं अड़चनों के बाद लाभ व उन्नति प्राप्त करने वाला, धनी, भूमि, जायदाद, 
वाहनादि सुख सम्पदाओं से युक्त अपने परिवार की बेहतरी के. लिए विशेष परश्रिम करने वाला, उच्च-शिक्षा एवं सन्तान 
सम्बन्धी चिन्ता अथवा सन्‍्तान.सुख प्राप्ति में विध्न/बाधाएं एवं अड़चनों के बाद हो। एकादश भावस्थ मंगल 
'इंजीनीयरों, डाक्टरों, वकीलों, ज्योतिषी, लोहार एवं सोनारों, कम्पयूटर्ज़ आदि के लिए अच्छा माना जाता है। ऐसा जातक 
जीवन में विघ्न/बाधाओं के बाद परिश्रम से लाभ व उन्नति प्राप्त कर ही लेता है। देखें उंदा. कुण्डली नं. (72) | 

द्वादघा भांव-में बुध की राशि कन्या पर मंगल होने से जातक/जातिका चंचल एवं अशांत मन बाला, आय अल्प 
व खर्च अधिक हो, भाई-बहिन होने पर भी उनके सुख में कमी, उच्चशिक्षा प्राप्ति में भी अड़चनें रहें । परिवारिक सुख में 
भी विध्न एवं असन्तोष रहे | विवाहोपरान्त जन्मस्थान से दूरगामी अथवा विदेश में सर्विस आदि के योग। आर्थिक उलझनें 
भी रहें। आये सीमित तथा वृथा खर्च अधिक रहें। जीवन का पूर्वार्द्ध भाग विशेष संघर्षपूर्ण रहे । पति/पत्नी की ओर से 
परेशानी एवं असंतोष रहे। उदाहरणार्थ देखें कुण्डली नं. (66), द्वादश भाव में मंगल होने से.मंगलीक: दोष भी 
विचारणीय होता है। मंगल के साथ चन्द्र, शुक्र, बुधादि ग्रहों का योग हो, तो वैवाहिक एवं व्यवसायिक (श०ढ5- 
80॥9)) क्षेत्र में सफलता होती है देखें उदा. कुं. 69. ह 


तुलालग्नमेंबुधका फल -__ __॒_॒[ईै[]_][]॒___॒__॒_॒_ _॒_॒__ _  ___ _ __ै 23 में बध का फल हा 23 








[तुला लग्न द्वादश भावों में बुध का फल लो 


बुध तर्क-वितर्क, बुद्धि (बौद्धिक), कानून, ज्योतिष, सम्पादन आदि का तथा चतुर्थ... तुला लग्ने,बुध फल 
एवं दशम भावों का कारक माना जाता है। बुध का प्रत्येक भाव पर फल का विवेचन करते कक ह 


लग्न में बुध भाग्येश एवं व्ययेश होकर प्राय: शुभ प्रदायक हो जाता है । 
प्रथम भाँव-में तुला राशि पर बुध की स्थिति होने से जातक/जातिका दुर्बल 
(इकहरा) शरीर परन्तु प्रभावशाली व्यक्तित्व, विद्वान, तीब्र बुद्धि, अच्छी स्मरण शक्ति, |बु. 
मधुरभाषी एवं तर्क-वितर्क करने में कुशल होता है । शुक्र का भी योग हो तो ऐसा जातक के 
प्रसिद्ध, मिलनसार, विनोदी, किन्तु अनुशासनप्रिय, अधिकांश समय भ्रमण में व्यतीत करने वाला, नीति, गणित, कानून 
साहित्य व अन्य शास्त्रों को जानने वाला, लेखन-भाषण आदि कला में कुशल, धर्मात्मा एवं भाग्यशाली होता है । जातक 
फुटकर अर्थात्‌ विभिन्न साधनों के द्वारा धनार्जन करने वाला होता है। उदाहरणार्थ देखें कुण्डली नं. 64 (म. गांधी) 
लग्ने बुधेच नीतिज्ञो, निष्पापो नृपपूजित:। रूपा ज्ञान यशोयुक्त : प्रगल्भो सर्वशास्त्रबोध :॥ (मंत्रेश्वर) 
द्वितीय भाव-में मंगल की राशि-बृश्चिक पर बुध होने से जातक/जातिका सुन्दर मुख, भाग्यशाली, तीत्र 
बुद्धिमान, गुणवान, विनम्र, उदारहदय, काव्य-कला एवं संगीत प्रेमी, अध्ययनशील, पुरुषार्थी, धनी एवं अपने बुद्धि 
कौशल व पुरुषार्थ द्वारा धनार्जन करने वाला होता है- 
बुध्योपार्जित वित्तशील गुणवान्‌ साधु: कुट॒म्बे बुधे॥'' 
बुध-शुक्र का योग हो तो जातक को क्रय-विक्रय, पुस्तक व्यापार, स्टेशनरी, ज्योतिष आदि निजी व्यवसाय द्वारा 
समुचित धन प्राप्त होता है। परन्तु परिवारिक (गृहस्थ) सुख विलम्ब से प्राप्त होता है। खर्च भी बहुत अधिक होते हैं। 
देखें कुं. नं. (7) | यदि चन्द्र-बुध का योग हो तो कम्पयूटर, बैंकिंग, लेखाकार, काव्य रचना, ज्योतिष आदि द्वारा धन 
लाभ होता है। देखें कुं. संख्या नं. 62, 67 । ऐसा जातक उच्च पदाधिकारी भी हो सकता है। 29 वें वर्ष की आयु में विशेष 
धन खर्च होता है। 
अकेला बुध भी यहां विशिष्ट अभिनय कला के क्षेत्र में जातक को अच्छी प्रसिद्धि और धन-धान्य॑ की संम्पन्नंता प्रदान 
कराता है। उदाहरणार्थ देखें कुण्डली. नं. 67 (ऐक्ट्रैस ऐश्वर्य राय) स्त्री जातक यही प्रमाण करता है- : 
। धने धनवती सोम्ये.सुन्दरी गुरु वत्सला। ' 
सदोद्यमरता दक्षा सुंख-सम्पत्ति संयुता॥ | 
तृतीय भांव-में गुरु की राशि धनु पर बुध के प्रभाव से जातक/जातिका धार्मिक आस्थाओं से युक्त, परोषकारी 
भाग्यवान, कार्य व्यवसाय के उपलक्ष्य में देश-विदेश भिन्न-भिन्न स्थज्षों पर घूम॑ने वाला, प्रारम्भिक जीवन अत्यन्त संघर्ष के 
साथ व्यतीत होता है। आय अल्प व खर्च की मात्रा अधिक झेती-है । यहां बुध के साथ चन्द्र-शुक्र का भी संयोग हो तो 
जातक उच्च विद्या प्राप्त, अध्यापन तथा लेखन, कला, संगीत एवं साहित्य द्वारा भी विशेष धन लाभ एवं प्रतिष्ठा प्राप्त 
करता है। यदि सूर्य-बुध का योग हो, तो खेल आदि के विशेष क्षेत्र में विशिष्ट ख्याति मिलती है। देखें कुं. नं. (65) 
इसी भाव में यदि सूर्य-बुध के साथ स्वगृही गुरु का भी सम्बन्ध हो जाए तो जातक उच्च प्रतिष्ठित एवं विश्व प्रसिद्ध 
राजनेता होता है। देखें कुं. नं. 63 (प्रधानमंत्री श्री वाजपेयी ) 
चतुर्थ भाव॑-में मकर राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक बुद्धिमान, सुन्दर, भूमि, मकान, वाहन, धन-धान्य 
से युक्त, संगीत-कला का प्रेमी, ज्योतिष आदि विषयों में रुचि एवं सुख साधनों से युक्त होता है। ऐसा जातक उच्च 
प्रतिष्ठित विभिन्न मित्रों से युक्त होता है, परन्तु माता को कष्ट एवं गृहस्थ सम्बन्धी चिन्ताएं भी रहती हैं। शुभ फल तभी 





5 








24 _ _ _ ______________॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_ तुलालननमें बुधफल 
प्राप्त होते हैं, यंदि बुध पाप ग्रहों से युक्त या दृष्ट न हो। पाप ग्रह से सम्बन्ध हो तो विपरीत फल होता है। 
बहुमित्रो बहुधनो बन्धौ पापं विना बुध:। 
नानारस विलासी च सपापे तु अन्यथा फलम्‌॥ 
धन का वृथा खर्च भी बहुत होता है। ध्यान रहे, चतुर्थ भाव में अकेला बुध निष्फली भी माना जाता है | तदनुसार चतुर्थ 
भावस्थ बुध का फल मिश्रित कहा जा सकता है। 
पंचम भाँव-में कुम्भ राशि पर बुध के प्रभाव से जातक/जातिका तीव्र बुद्धिमान, वाक्पटु, विनम्र, व्यवहारशील एवं 
कार्यकुशल, उच्च विद्या, तर्क-वितर्क एवं विश्लेषण करने में कुशल बुद्धि, मन्त्र, ज्योतिष, वैद्यक, चिकित्सा, धर्म आदि 
गूढ़ विषयों में रुचि, जातक विद्या, पुत्र सन्‍्तति आदि से युक्त होता है- 
मन्त्राभिचार कुशलो बहुतनय: पंचमे सौम्ये। 
विद्या सुख प्रभावै: समन्वितो हर्षसंयुक्त :॥ कल्याणवर्मा 
यदि बुध अथवा पंचमेश निर्बल हो या पाप ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो तो उपरोक्त सुखों में कमी होती है तथा उच्च विद्या 
एवं भाग्योन्नति में रुकावटें, पति/पत्नी' सुख में कमी, सन्तान सम्बन्धी चिन्ता, धन का अपव्यय आदि अशुभ फल होते हैं। 
उदाहरणार्थ देखें कुं. संख्या नं. 68 
बृष्ठ भाँव॑-में मीन राशि पर नीच स्थिति में बुध होने से जातक के भाग्य पक्ष में... जन्म 49-4-4947, 
कमी, कलहपूर्ण परिवारिक जीवन, शत्रु एवं गुप्त रोगों के कारण मन सन्तप्त एवं अधीर 242७4 /800400/86 / 
रहे, अड़चनों के साथ उच्च विद्या प्राप्ति हो। अनावश्यक खर्च अधिक रहे | मानसिक व 
शरीरिक विकार अधिक रहें, प्रस्तुत जन्म कुण्डली एक क्वालीफाईड इंजीनियर की है। 
इस जातक ने बुध की महादशा में तथा केतु 'की अन्तर्दशा में मानसिक दबाव के कारण 
अच्छी भली सरकारी सर्विस छोड़ दी। मानसिक विकार से युक्त होकर अपने पिता के 
पास विक्षिप्तता की स्थिति में बेकार बैठा है। अपने माता-पिता की एकाकी संतान है। 
.. यदि बुध के साथ सूर्य, शुक्रादि का शुभ योग हो तो जातक प्रसिद्ध व्यापारी, ज्योतिषी कक 
वैद्य एवं मंत्रादि शास्त्रों को जानने वाला तथा भूमि, स्त्री, मकान, संतान, वाहनादि सुखों से युक्त होता है । देखें उदा. कुं. नं. 73 
अप्तम भाँव॑-में मेष राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक भाग्यशाली, स्वाभिमानी, प्रभावशाली व्यक्तित्व 
वाला, बुद्धिमान, व्यवहार कुशल तथा अपने बुद्धि चातुर्य से लाभ व प्रतिष्ठा प्राप्त करने वाला होता है । जातक भ्रमणशील 
एवं खर्चीले स्वभाव का होता है। यदि बुध के साथ सूर्य, मंगल का भी सम्बन्ध हो तो जातक को ज्योतिषादि विषयों में 
रुचि, सुन्दर स्त्री, सन्‍्तान, जायदाद एवं वाहन आदि सुखों की प्राप्ति होती है । विवाहोपरान्त विशेष भाग्योन्नति व आय के 
साधनों में वृद्धि होती है । उदाहरण हेतु देखें कुण्डली नं. 60 
अष्टम भाँव॑-में मित्र वृष राशि पर स्थित बुध के प्रभाव से जातक के प्रारम्भिक जीवन में अत्यन्त संघर्ष व विध्नों 
'के पश्चात्‌ विद्या प्राप्ति एवं अल्प घरेलू सुख होता है। भाग्य में अड़चनों के बाद सफलता प्राप्त होती है गुप्त युक्तियों से 
धन की प्राप्ति होती है। धन का व्यय भी आशा के विपरीत अधिक होता है । ज्योतिष, -मंत्रादि गुप्त विद्याओं की ओर भी 
अभिरुचि होती है । आजीविका के लिए अत्यधिक संघर्ष करना पड़ता है। यदि बुध अशुभ ग्रह युक्त या दृष्ट हो तो गृहस्थ 
ज़ीवन भी कलहपूर्ण एवं असुखद रहता है। भाग्योन्नति में बार-बार अड़चनें पड़ती हैं। देखें उदा. कुं. नं. 59 | स्नायु एवं 
गुप्त रोग के कारण शरीर कष्ट होता है। उदाहरण स्वरूप देखें कुं. नं. (66), इस जातिका की कुं. में अष्टम बुध होने से 
- परिवारिक जीवन दो सनन्‍्तान हो जाने के बाद भी अत्यन्त क्लिष्ट एवं कलहपूर्ण है। 
नंबम भाँव-में स्वगृही मिथुन राशि पर बुध होने से जातक/जातिका विद्वान, धार्मिक भावना से युक्त, भाग्यवान 
व्यवहार. कुशल, ज्योतिष, मन्त्रशास्त्र, धर्मादि शास्त्रों में रुचि रखने वाला, भाई बन्धु के सुख से युक्त, अपने जन्मस्थल से 











तुलालग्यममेंगुर्फल __ __|ऋ|ऋ।ऋ|ऋ_|_ऋ_ऋ_[ऋ_[_-]-7_ऋ<[0 0ऋ0ऋ0ऋ0ऑ[आ्यआयआऑआऑआऑारर्रआ7 25 
दूर विभिन्न साधनों के द्वारा धनोपार्जन करने वाला, परन्तु खर्च भी अधिक करने वाला होता है। यदि सूर्य-बुध का योग 
हो तो बुधादित्य योग होता है। फलस्वरूप जातक आस्तिक, देश-विदेश में यात्राएं करने वाला एवं माता-पिता में पूरी 
आस्था रखने वाला, धन-सम्पदा आदि सुखों से युक्त होता है । देखें जन्म कुण्डली नं. 72, यदि यहां शनि-बुध का योग हो 
तो जातिक/जातिका उच्च विद्या प्राप्त, परन्तु भ्रातृ सुख में कमी रहती है।। देखें कुं. नं. 70 

दाम भांव-में कर्क राशि पर बुध होने से जातक गुणी, सृजनात्मक एवं तीब्र बुद्धि, स्वयं के बौद्धिक एवं 
व्यवसायिक पुरुषार्थ से अथवा पैतृक धन से धनी, विनोदप्रिय, विनम्र एवं साधन सम्पन्न होता है। अत्यधिक व्यय करके 
गुज़ारे योग्य धन लाभ प्राप्त करता है। यदि बुध के साथ सूर्य, मंगल, गुरु व शुक्रादि ग्रहों का भी सम्बन्ध हो तो जातक 
को व्यवसाय में संघर्ष एवं कठिनाईयों के बाद समुचित आय के साधन बनते हैं। जातक को मातृ सुख, भूमि, मकान 
वाहन, धन आदि सुख सुविधाएं प्राप्त होती हैं। देखें उदाहरण कुं. नं. (6) बुध-शुक्र का योग हो तो जातक मशीनरी 
वस्त्र उद्योग, कम्पयूटर क्षेत्र, प्रकाशनादि क्षेत्र में विशेष उन्नति करता है। 

एकांदझा भाँव-में सिंह राशि पर बुध के प्रभाव से जातक प्रभावशाली, उदार हृदय, स्वाभिमानी, वाणिज्य-व्यापार 
में निपुण, अपना कार्य निकलवाने में कुशल, कुछ तेज स्वभाव, विभिन्न संसाधनों द्वारा धनार्जन करने वाला होगा। सूर्य, 
शुक्र का भी योग हो तो कुशल व्यापारी और उच्चस्तरीय व्यापार करने वाला होगा। ज्योतिष, मंत्रादि विषयों में भी रुचि 
होगी। बुध यदि शनि या मंगल द्वारा दृष्ट हो तो व्यवसायिक सहयोगियों के साथ विवाद की सम्भावनाओं का संकेत है। 

द्वादप्रं भाँवं-में कन्या राशि पर बुध की स्थिति होने से जातक विद्वान, अनेक भाषाओं का जानकार, नई-नई 
योजनाएं बनाने में कुशल, धर्म-शास्त्र, ज्योतिष, मन्त्र, नीति आदि शास्त्रों को जानने वाला अथवा रुचि रखने वाला, 
अध्ययनशील तथा विदेशों में भाग्योदय होता है। यदि यहां बुध पाप दृष्ट या पाप ग्रह युक्त हो तो जातक कठोरभाषी 
दुर्व्यसनी, गुप्त शत्रुओं से पीड़ित, अतिव्ययी तथा आर्थिक परेशानियों के कारण दुखी होगा। मानसिक रूप से विक्षिप्त एवं 
अशान्त होगा। 





लग्न का द्वादश भावों में फल 


गुरु विवेक, बुद्धि, विद्या, आध्यात्मिक ज्ञान, पति सुख, भाई, पितामह, पुत्र सन्‍्तति एवं पारलौकिक ज्ञान का तथा २, 
५, १० व ११वें भावों का भी कारक माना जाता है ॥ तुला लग्न में त्रिपडायपति होने से शुभ तुला लग्ने गुरु फल 
नहीं माना जाता परन्तु इस कुण्डली में गुरु यदि चन्द्र, मंगल, सूर्य एवं शनि आदि ग्रहों के इग >ए हनज़ 
साथ शुभ भावस्थ हो तो यह योगकारक होकर चमत्कारिक प्रभाव करता है। 

प्रथम भाँव-में तुला राशि पर गुरु के प्रभाव से जातक/जातिका सुन्दर, प्रभावशाली 
एवं आकर्षक व्यक्तित्व वाला, तीव्र बुद्धिमान, उदार हृदय, चिरायु, मिलनसार, प्रसन्नवदन, 

विद्वान, यशस्वी और कलादि क्षेत्र में विख्यात होता है । गम्भीर एवं अधिकारपूर्ण वाणी का गु 

प्रयोग करने वाला, पत्नी सुन्दर एवं पतित्रता होती है। यदि मंगल भी शुभस्थ हो तो जातक 
धनाढ़य होता है। यदि लग्न में गुरु के साथ चन्द्र का योग हो तो भी जातक सुन्दर व्यक्तित्व वाला, ज्योतिष, वैद्यक आदि 
कार्यों में सफल होता है । गुरु से बुध, शुक्र के योग से जातक तर्क-वितर्क करने में कुशल एवं सन्‍्तान सुख आदि की दृष्टि 
से भाग्यशाली होता है। 

द्वितीय भाव-में बृश्चिक राशि पर गुरु की स्थिति से जातक प्रभावशाली व्यक्तित्व वाला, परिश्रमी, बुद्धिमान 
अत्यन्त संघर्ष एवं परिश्रम से कार्य क्षेत्र में लाभ व उन्नति प्राप्त करने वाला, उत्साहशील, स्पष्टवक्ता, भूमि, धन, आवास 
सुन्दर स्त्री एवं वाहन आदि सुखों से युक्त होता है। यहां गुरु पर सूर्य, बुधादि की शुभ दृष्टि हो तो जातक को पैतृक व भ्रातृ 
सहायता की प्राप्ति भी होती हैं। देखें उदा. कुं. नं. 59 यहां गुरु के साथ चन्द्र कायोग हो और उस पर मंगल कौ स्वगृही 

















26. [7 _[_[॒[॒[॒_॒_॒_॒_॒_॒___तुलालग्नमें गुरु फल ह लग्न में गुरु फल . 
दृष्टि भी हो तो जातक को खेल जगत अथवा अन्य कलात्मक क्षेत्र में विशेष उल्लेखनीय प्रसिद्धि प्राप्त होती है । देखें उदा. 
कुं. नं. 65 (प्रसिद्ध खिलाड़ी कपिल देव) 
तृतीय भाँव-में स्वगृही धनु राशि पर गुरु के प्रभाव से जातक/जातिका आकर्षक व्यक्तित्व, बुद्धिमान, उच्च 
शिक्षित, साहित्य, ज्योतिष, चिकित्सा, धर्मादि विषयों में रुचि, परोपकारी एवं धार्मिक आस्थाओं से युक्त होगा। जातक 
साहित्य प्रेमी और बौद्धिक कार्यों में सफल होता है। भ्रात्‌ सुख सामान्य, ऐसा जातक निज पुरुषार्थ एवं पराक्रम से धन, 
प्रतिष्ठा एवं सुख के साधन प्राप्त करने वाला, स्त्री सुख यथेष्ठ होता है ! देखें उदा. कुं. नं. (60); यदि गुरु के साथ सूर्य, 
शनि, राहु आदि का सम्बन्ध हो तो भ्रातृ सुख से वंचित होता है। (देखें कुं. नं. 62), यदि मंगल अशुभस्थ हो तो जातक 
स्त्री एवं गृहस्थ से वंचित रहता है । देखें उदा. कुं. 63 (श्री वाजपेयी) तथा कुं. नं. 68 ह 
चतुर्थ भाव॑-में मकर राशि पर गुरु के प्रभाव से जातक सुन्दराकृति, विघ्न-बाधाओं के बावजूद उच्चशिक्षा प्राप्ति, द 
परन्तु यहां गुरु नीच राशिस्थ होने से जातक को आरंभिक अवस्था में कार्य-व्यवसाय व घरेलू परिस्थितियों में विशेष 
संघर्ष करना पड़ता है। ऐसा जातक अपने परिश्रम व लगन द्वारा रुकावटों के बावजूद उच्च स्थिति प्राप्त कर लेता है | देखें 
कुं. नं. 72, 73 तथा कार्य क्षेत्र में क्षण: क्षण: समुचित लाभ व उन्नति प्राप्त कर लेता है । यदि दशम भाव में बुध, शुक्र हीं 
तो जातक उच्चपद अथवा कम्प्यूटर क्षेत्र में सफल होता है। यदि दशमेश चन्द्र का तृतीय भाव में शुक्र के साथ योग हो तो 
अभिनय क्षेत्र में विशेष सफलता होगी | देखें कु. नं. 67 (ऐश्वर्या) 
पंचम भांव-में कुम्भ राशि पर गुरु के प्रभाव से जातक आकर्षक व्यक्तित्व, उच्चाभिलाषी, बुद्धिमान, विघ्नों के 
बावजूद उच्च विद्या एवं उच्चपद प्रतिष्ठित होता है। पुत्र सन्‍्तान के सम्बन्ध में चिन्तित परन्तु अच्छे मित्रों से युक्त, धर्म कर 
प्रति आस्थावान, कन्या सन्‍्तति अधिक व पुत्र सन्‍्तान कम होती है। ऐसा जातक व्यवसाय एवं आमदन के क्षेत्र में गुजारे 
* योग्य आय के साधन बना ही लेता है। ऐसा जातक राजकीय पक्ष से भी लाभ प्रास करने वाला होता है। 
पंचम भाव में गुरु अकेला स्थित होने से पुत्र संतति के सुख में कमी करता है। यदि यहां शनि की स्वगृही दृष्टि हो 
यह पुत्र कारक होती है। देखें कुं. नं. 59, 62 
बछ्ठ भाव-में स्वगृही मीन राशि पर गुरु होने से जातक उच्च स्तरीय शिक्षित, व्यवसायिक ([27065&079/) शिक्षा 
में सफलता, परन्तु व्यवसाय अथवा उच्चपद में विष्न-बाधाओं के बाद सफलता प्राप्ति हो, विभिन्न क्षेत्रों में व्यय अधिक 
हद हे हानि पहुंचाने की चेष्टा में रहेंगे। षष्ठ भाव का गुरु डाकटरों, वकीलों एवं चार्टिड अकाउटैण्टों के लिए शुभ 
ताहै। ' ह * । 
अत्म भाव-में मेष (मित्र) राशि पर गुरु होने से जातक बुद्धिमान, परोपकारी, धार्मिक प्रवृत्ति वाला, उच्च- 
ह प्रतिष्ठित लोगों के साथ सम्पर्क रखने बाला तथा जातक विभिन्न युक्तियों के द्वारा कार्य क्षेत्र एवं व्यवसाय से लाभ उठाने 
वाला होता है। मंगल की दृष्टि हो तो उच्च प्रतिष्ठित, आध्यात्मिक बल युक्त होता है। जातक भाई के साथ मिलकर धातु 
व कैमिकल सम्बन्धी व्यवसाय से अच्छां धन लाभ व उन्नति प्राप्त करता है। यदि लग्नेश शुक्र के साथ षडाष्टक योग हो 
तो जातक को स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानियां रहती हैं । देखें उदाहरण कुं. नं. (74) यदि सप्तम में गुरु-मंगल का योग हो, 
तो जातक/जातिका मैडीकल लाईन में सफल होते हैं-। देखें उदाहरण कुं. नं. (70) 
अष्टेम भांव-में वृष राशि पर गुरु स्थित हो तो जातक/जातिका सुशील, विचारशील, अपने कर्त्तव्य के प्रति 
निष्ठावान, धर्म मंत्र, ज्योतिष आदि गूढ़ विषयों में विशेष रुचि, अत्यन्त संघर्ष एवं अड़चनों के बाद उच्च विद्या 
प्राप्ति, धन का व्यय भी विशेष अधिक होता है। गृंह सुख कठिनाईयों के बाद प्राप्त होता है । यदि द्वादश भाव में 
चन्द्र, मंगल, शुक्र व बुध ग्रहों का सम्बन्ध हो और उस पर गुरु की विशेष दृष्टि पड़ती हो तो जातक/जातिका को _ 
मैडीकल लाईन में विशेष उल्लेखनीय सफलता प्राप्त होती है | देखें कुण्डली नं. 69 (यह लड़की ४.7) करने के 








तुलालनमेंगुरुफल_______ ____________ _ ___ “ “ “यय्खय्ग 
बाद अमेरिका में सफल डाक्टर है) ह 

नंवम भाँव-में मिथुन राशि पर गुरु स्थित होने से जातक धार्मिक प्रवृत्ति वाला, पराक्रमी, उद्यमी, भाग्यवान, 
परोपकारी, विचारशील, ज्योतिष, मन्त्र, धर्मादि गूढ़ शास्त्रों में रुचि रखने वाला, उच्च विद्या प्राप्त एवं भाई-बन्धुओं और 
स्‍त्री एवं सनन्‍्तानादि के सुखों से युक्त, बहु प्रतिष्ठित मित्रों से युक्त, यहां गुरु सूर्य व बुध से युक्त हो तो जातक पैतृक एवं 
सरकारी क्षेत्रों से लाभान्वित होता है । ऐसे जातक को अध्यापन, प्रकाशन, वकालत, नेता, धर्म-प्रचार आदि क्षेत्रों में विशेष 
लाभ होता है। 

दष्घाम भांव-में कर्क राशि पर गुरु उच्चस्थिति में हो तो जातक महत्त्वाकांक्षी, उद्यमी, उच्चाभिलाषी, बुद्धिमान, 
मातृभक्त, उच्च विद्या ग्राप्त भाई-बहनों के सुखों से युक्त, माता-पिता से सहायता एवं संरक्षण प्राप्त करने के बावजूद स्वतन्त्र 
रूप से कार्य/व्यवसाय करने में सक्षम, परन्तु प्रत्येक कार्य अड़चनों के बाद पूरा होने के संकेत मिलते हैं । यदि दशम में गुरु 
के साथ मंगल, सूर्य, बुध, चंद्र, शुक्रादि ग्रहों का भी योग या दृष्टि का सम्बन्ध हो तो जातक भूमि, लौहादि विभिन्न प्रकार 

के कार्य-व्यवसायों से सम्बन्धित क्षेत्रों में अच्छा लाभ व उन्नति प्राप्त करता है । देखें उदाहरण कुण्डली नं. (6) विदेश में 
' भी कार्योत्रति के योग देखें कुं. नं. (66) 

एकादग्ा भांव-में सिंह राशि पर गुरु के प्रभाव से जातक/जातिका उद्यमी, उत्साहशील उच्चशिक्षित, गुणी, संगीत 
साहित्य प्रेमी, विद्वान, मिलनसार एवं व्यवहार कुशल होता.है । ऐसा जातक/जातिका अपने कर्त्तव्य के प्रति निष्ठावान तथा 
सीमित साधन होने पर भी निर्वाह योग्य आय के साधन जुटा ही लेता है। भाइयों के सुख से प्रतिष्ठित, स्त्री/पति एवं सन्‍्तान, 
आवास, सवारी आदि सुखों से युक्त होता है। आये के साधनों में पत्नी का भी सहयोग रहता है । ऐसा जातक मंत्र, ज्योतिष, 
धर्मादि शास्त्रों में भी रूचि रखता है। 

द्वादघ्यां भांव-में कन्या राशि पर गुरु होने से जातक के पराक्रम एवं उद्यम तथा स्वास्थ्य में कमी, उच्च विद्या एवं 
कार्य व्यवसाय के क्षेत्र में भी अड़चनें पैदा हों। भाई बहिनों, आवास एवं आत्मीयजनों के सुख में भी कमी हो, माता को 
भी शरीर कष्ट, आय सीमित परन्तु विभिन्न खर्चों में अधिकता रहे | घरेलू व व्यवसायिक उलझनों के कारण मानसिक तनाव 
एवं अशान्ति रहे | मनोरंजन एवं स्त्रियों पर व्यय अधिक रहे। 

ह#नणणणणणणाणणणाणणता् बा सुनाया 


का द्वादश भावों में फल 
शुक्र को प्रेम, सौन्दर्य, काम, वीर्य, आकर्षण, स्त्री, धन सम्पत्ति व सांसारिक सुखों का 
कारक माना जाता है| कुण्डली में सप्तम भाव का भी यह कारक ग्रह है। तुला लग्न में शुक्र 





तुला लग्ने, शुक्र फल 


, योग में एवं शुभ भावस्थ होने से विपुल धन/धान्य एवं सांसारिक सुख प्रदान करता है। 

प्रथम भाव॑-में स्वगृही राशि तुला में शुक्र के प्रभाव से जातक आकर्षक व्यक्तित्व 
वाला, गौर वर्ण एवं सुन्दर मुख, चुस्त, बुद्धिमान, उदारहदय, संगीत, कला एवं काव्यादि में 
रुचि, अधिक आयु होने पर भी युवा जैसा दिखने वाला, शिल्प कला में निपुण, वाक्पटु <% " न्‍ह 
शालीन, व्यवहार कुशल तथा अपनी एवं परिवार की भौतिक उन्नति के लिए सतत कठिन परिश्रम करने वाला, उच्च 
प्रतिष्ठित संर्बिस या व्यवसाय में अत्यन्त संघर्ष के बाद सफलता मिलती है । कुं. में गुरु एवं पंचम भाव भी शुभस्थ हों, तो 
जातक उच्चशिक्षित, सुन्दर एवं सभ्य स्त्री युक्त तथा भूमि, वाहन, आवास आदि सुखों से युक्त होता है। गुरु द्वारा दृष्ट हो 
तो विख्यात्‌ महापुरुष होता है, देखें कु. नं. (64) (म. गांधी) यदि लग्न में शुक्र अस्त, या सूर्य, गुरु आदि ग्रहों से 
प्रभावित हो तो जातक के स्वास्थ्य एवं सौन्दर्य में कमी होती है। 


द्वितीय भाँव॑-में बृश्चिक राशि पर शुक्र के प्रभाव से जातक प्रभावशाली, सुन्दर व्यक्तित्व, तीब्र बुद्धिमान, कर्त्तव्य 











28 _____ _______॒_॒ईऔई०“॒“॒[३+औ<+॒[॒[॒][॒][]ई]ई०]०].॒०॒.०]०][]०.]_]_ __ुला लगनमेंशुक्र फल 
परायण, वाक्पटु एवं मधुरभाषी, ओजस्वी वाणी, परिवारिक सुख युक्त एवं दीर्घायु होता है। ऐसा जातक कवि, बहु- 
विद्याओं का जानकार, गुणी, साधन-सम्पन्न, लेखक, विद्वान एवं चतुरवक्ता होता है । जीवन में विशेष परिश्रम व संघर्ष के 
बाद उच्च प्रतिष्ठित स्थिति प्राप्त करता है | गृहस्थ एवं वैवाहिक सुख मंगल की स्थिति पर निर्भर करेगा। यदि दूसरे भाव 
बुध, शुक्र का योग हो तो जातक उच्चस्तरीय व्यापारी होता है| देखें उदा. कुं. नं. (7) 
यदि दूसरे भाव में चन्द्र-शुक्र का योग हो तो जातक विद्वान, कवि एवं साहित्यिक अभिरुचियों से युक्त, योग्य, प्रसिद्ध 
एवं सफल राजनेता होता है। देखें उदा. कुण्डली नं. 63 (श्री अटल बिहारी वाजपेयी ) 
तृतीय भाँव-में धनु राशि पर शुक्र के 'प्रभाव से जातक/जातिका का दुबला शरीर परंतु पराक्रमी, उद्यमशील, 
भ्रमणप्रिय, धर्म परायण होता है। भाई-बहिनों से युक्त होता है। अकेला शुक्र यहां विशेष फलीभूत नहीं होता | शुक्र के 
साथ चन्द्र, बुधादि का योग हो, तो जातक/जातिका को नृत्य, संगीत, कला-अभिनय एवं साहित्य के प्रति विशेष रुचि 
होती है। चिकित्सा और अभिनय, नृत्य आदि द्वारा भी विशेष लाभान्वित होता है । उदाहरण हेतु देखें कुण्डली नं. (67) 
चतुर्थ भाव-में मकर राशि पर शुक्र की स्थिति होने से जातक धार्मिक विचारों से युक्त, परोपकारी, व्यवहार- 
कुशल, भूमि, मकान, वाहन आदि के सुखों से युक्त होता है। माता का स्वास्थ्य ठीक नहीं होता है। यहां से दशम भाव पर 
शुक्र की दृष्टि होने से जातक को व्यवसाय एवं सर्विस में मान/प्रतिष्ठा एवं लाभोन्नति प्राप्त होती है। कम्पयूटर क्षेत्र व गृह 
की सजावट आदि में विशेष अभिरूचि होती है। स्त्री सुख एवं परिवारिक सुख में वृद्धि होती है। जातक अपने क्षेत्र में 
कुशल एवं प्रसिद्ध होता है। उदा. कुं. नं. 62, 65। 
पंचम भांव-में कुम्भ राशि पर शुक्र के प्रभाव से जातक विद्वान, परोपकारी स्वभाव, तीव्र बुद्धिमान, संगीत, कला 
एवं साहित्यिक रुचियों से युक्त, दयालु, उच्चशिक्षित, कम्पयूटर, शिल्प-कला, कलपुर्जों, डिज़ाईनिंग, अभिनय, ज्योतिष, 
वकालत, चिकित्सा आदि क्षेत्रों में विशेष सफलता की सम्भावनाएं होंगी। जातक को एक से अधिक स्रोतों से आय के 
साधन होते हैं । ऐसा जातक अपनी बुद्धि के चातुर्य से धन लाभ एवं उन्नति के साधन बना लेता है। शेयर, लाट्री आदि में 
रुचि होती है। शुक्र के साथ सूर्य या शनि आदि क्रूर ग्रह का सम्बन्ध हो, तो स्वास्थ्य एवं संतान सम्बन्धी सुखों में कमी 
रहती है। ह 
बष्ठ भाव-में मीन राशि पर शुक्र के प्रभाव से जातक श्वेत वर्ण, आकर्षक व्यक्तित्व, कलात्मक अभिरुचियों से 
युक्त, संवेदनशील, भावुक एवं विशिष्ट गुणों से युक्त होता है । द्वादश भाव पर शुक्र की दृष्टि होने से अनेक कठिनाईयों के 
बाद कैमिकल, ज्योतिष आदि कार्यों में सफलता प्राप्त करने वाला, देश-विदेश में भ्रमण एवं धनार्जन के अवुसर प्राप्त 
करने वाला तथा रईसी ढंग से जीवन व्यतीत करने वाला होता है। उदाहरणार्थ देखें कुं. नं. 60 | यदि शुक्र भौमादि पाप ग्रह 
युक्त या दृष्ट हो तो जातक को कामुक, व्यसनी, विषयासक्त, प्रमेह, शूगर आदि रोगों से ग्रस्त होने की संभावना होती है। 
 अप्तंम भाँव॑-में मेष राशि पर शुक्र की स्थिति से जातक आकर्षक व्यक्तित्व, चंचल, किन्तु सरल एवं 
उत्साहशील स्वभाव, उच्च प्रतिष्ठित, साहित्य एवं सौन्दर्य प्रेमी, खेलकूद में प्रवीण, पत्नी सुन्दर किन्तु कुछ तीखे स्वभाव 
की, परन्तु जातक के गृह एवं व्यवसाय में सहायिका होती है । जातक को सर्विस या अपने व्यवसाय में कठिन परिश्रम एवं 
संघर्ष के बाद सफलता मिलती है। विवाह के उपरान्त विशेष भाग्योन्नति अथवा प्रणय सम्बन्ध हों। देखें उदा. कुं. नं. 72 
तथा (73) | यदि सप्तमभावस्थ शुक्र के साथ राहु, शनि का योग या दृष्टि सम्बन्ध हो तो वैवाहिक सुख में कमी अथवा 
विवाह-विच्छेद होता है । देखें उदा. कुण्डली नं. (68) ऐसे जातक/जातिका का असफल प्रेम सम्बन्ध भी हो सकता है । 
शुक्र सप्तम भाव का कारक ग्रह है। इस भाव में अकेला होने से विशेष फली नहीं होता। अष्टमेश होने से मारकत्व दोष 


भी रहता है। | 
अष्टम भाव--में स्वगृही वृष राशि पर शुक्र होने से सुन्दर एवं आकर्षक व्यक्ति का स्वामी, उच्चाकांक्षी, सुन्दर एवं 











तुलालग्नमेंशुक्रफल ___[_[३[औ “ऋ“औ “ऋऔऑ“३यञय_ञ्््_्__़_़_॥|_"॒_]!#्ह£&_््29 में फल 29 


न व 
सुशील पत्नी, धन, वस्त्राभूषण, वाहन आदि सुखों से युक्त, गुप्त युक्ति द्वारा धनार्जन करने वाला, विवाहोपरान्त विशेष धन 


लाभ व उन्नति प्राप्त करने की सम्भावना, परन्तु व्यवसाय में उलझनों व विप्नों के बाद सफलता प्राप्त हो। यदि शुक्र मंगल. 
राहु, शनि, सूर्यादि ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो तो स्त्री को कष्ट या वैवाहिक सुख में कमी को लक्षित करता है। 
नंवंम भाव-में मिथुन राशि पर शुक्र के प्रभावस्वरूप जातक/जातिका उच्चशिक्षित, धार्मिक, परोपकारी एवं 


उदारहदय, भाई, बहिनों से कुछ मतान्तर हो, भाग्यपक्ष में कुछ उलझनों/विध्लों के बाद सफलता प्राप्त हो। जातक को धर्म, * 


ज्योतिष, मंत्र आदि विद्याओं में रुचि भी हो । यहां शुक्र दीर्घ यात्राओं, विदेश में भाग्योन्नति का भी द्योतक है। उंदाहरणार्थ 
देखें कुं. नं. 66 । पंजाब में उत्पन्न इस जातिका को विवाहोपरान्त विदेश में सर्विस एवं भाग्य में उन्नति के अवसर प्राप्त हुए। 
दघ्रांम॑ भांव-में कर्क राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक का प्रभावशाली व्यक्तित्व, मिलनसार, स्वाभिमानी 
प्रसन्नचित्त, बुद्धिमान, उदार एवं परिश्रमी होता है । जातक को संगीत, कला, साहित्य, गणित व ज्योतिष आदि विद्याओं में 
भी रुचि होती है। जातक अपने परिश्रम-से कम्पयूटरर्ज़ व लौह पुजों से सम्बन्धित व्यवसाय से अच्छा लाभ उठा पाता है। 
यदि कुण्डली में बुध-शुक्र का योग हो तो एक से अधिक ख्रोतों से धन लाभ प्राप्त करता है। यदि शुक्र के साथ बु.- 
गु.-मं. सूर्यादि ग्रहों का सम्बन्ध हो तो विशेष राजयोग होता है । जातक भूमि, आवास, वाहन एवं बृहदस्तरीय व्यापार को 
चलाने में समर्थ होता है। देखें उदा. कुं. नं. (59) (6) 
यदि दशमस्थ शुक्र राहु सूर्यादि ग्रहों से युक्त या दृष्टं हो तो व्यवसाय में हानि एवं वृथा धन का अपव्यय एवं स्त्री व 
माता को कष्ट आदि अशुभ फल होते हैं। हि 
एकादग्यां. भांव-में सिंह राशि पर शुक्र होने से जातक सुन्दर एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व वाला, उदारहदय 
बुद्धिमान, अड़चनों के बावजूद उच्च विद्या प्राप्ति, संगीत, गायन, अभिनय, फैशन एवं सुन्दर वस्तुओं के संग्रह की ओर 
प्रवृत्ति, वस्त्र, वाहन, दूध पनीर, मोती, कागज़, स्टेशनरी आदि श्वेत वस्तुओं के व्यापार एवं अकाऊंटस द्वारा समुचित धन 
“लाभ की सम्भावना, पुत्र की अपेक्षा कन्या सन्‍्तति की अधिक सम्भावना। देखें उदा. कुं. नं. (70) 
एकादशस्थ शुक्र के साथ बुध, मंगल, चंद्रादि ग्रहों का योग हो, तो विदेश में भाग्योदय होता है। 
द्वांदत्आ भांव-में कन्या राशि (नीचस्थ) पर शुक्र के प्रभाव से जातक/जातिका स्वाभिमानी, स्वतन्त्र विचारों वाला, 
स्वास्थ्य में कमी, प्रारम्भिक आयु में विशेष शरीर कष्ट, अत्यन्त कठिन परिश्रम के बाद जातक को गुज़ारे योग्य आय के 
साधन बनते हैं परन्तु जातक मनोरंजन एवं विलास आदि कार्यों पर खर्च भी अधिक करतो है। जिसके कारण जीवन में 
आर्थिक उलझनें भी उठानी पड़ती हैं | यदि इसी भाव में बुध के साथ चन्द्र, मंगल, बुधादि ग्रहों का भी सम्बन्ध हो जाए 
तो जातक/जातिका मैडीकल लाईन में विशेष उल्लेखनीय सफलता प्राप्त करती है तथा विवाहोपरान्त विदेश यात्रा के योग 
बनते हैं | उदाहरणार्थ देखें कुण्डली नं. (69) 


लग्न: द्वादश भावों में शनि का फल 


तुला लग्न में शनि का प्रत्येक भाव पर फल का निर्णय करते समय उसका अन्य ग्रहों. तुला लग्ने, शनि फल 
के साथ योग, दृष्टि आदि का भी विचार करें तथा चन्द्र या सूर्य से शनि केन्द्रस्थ हो तो भी रण 
सांसारिक कष्ट बहुत होते हैं। शनि आयु, रोगों, दुखों, व्यापार एवं कर्मचारी वर्ग तथा ६, | 
८, व १२ भावों का भी कारक है। 

प्रथम भाँव-में तुला (उच्च) राशि पर शनि के प्रभाव से जातक प्रभावशाली एवं 
आकर्षक व्यक्तित्व वाला, परिश्रमी, व्यवहार कुशल, दूरदर्शी, स्वतन्त्र विचारक, धनवान 
उच्च प्रतिष्ठित, उच्च शिक्षित, गम्भीर एवं अधिकार पूर्ण वाणी युक्त होता है। तकनीकि एवं 
व्यवसायिक विद्या में विशेष सफलता, भाईयों के साथ मतान्तर रहे तथा स्त्री के साथ मंन-मुटाव एवं बैमनस्य' रहने के 
संकेत । यहां शनि चतुर्थेश होने के वारण मातृ पक्ष, सन्तान, मकान एवं वांहन आदि सुंखों से युक्त परन्तु पिता के सुख में 








30 _ _ _______[_[_॒_॒_॒[॒[॒[॒[॒_॒[॒_॒_॒_॒_॒_॒_________तुला लगन में शनिफल 
कमी रहे तथा विप्लों के बाद व्यवसाय में सफलता हो, देखें उदा. कुं. नं. 6, परन्तु यदि सप्तमेश मंगल छटे भाव में पड़े 
तो जातक पत्नी के सुख से वंचित होता है। देखें कुं. नं. 63 (श्री वाजपेयी) 

द्वितीय॑ भाँव-में बृश्चिक राशि पर शनि के प्रभाव से जातक को परिवारिक एवं व्यवसाय के क्षेत्र में अत्यन्त 
संघर्षपूर्ण व कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। जातक स्वाभिमानी, शिक्षित, बुद्धिमान, कभी कट्ु एवं 
कर्कश वाणी का प्रयोग करने वाला, मुख एवं आंखों को कष्ट, अशान्त मन, उच्च शिक्षा होने पर भी विशेष लाभ न हो, 
व्यवसाय एवं आजीविका के लिए कठिन परिश्रम करने पर भी अधिक धन लाभ न हो पाए। कई बार अवसरों का 
उचित लाभ उठाने से चूक जाए। कुटुम्ब के सम्बन्ध में चिन्तित एवं असंतोष रहे । 

यदि शनि चन्द्र से केन्द्रगत हो तो जातक श्रेष्ठ रूप से आध्यात्मिक होता है देखें उदा. कुं. 64 


तृतीय भाव-में धनु राशि पर शनि के प्रभाव से जातक पराक्रमी, बुद्धिमान, साहसी, परोपकारी, सुशिक्षित, अपने | 


कर्त्तव्य के प्रति निष्ठावान, कर्मठ, भाई-बन्धुओं के सुख से युक्त, भाग्यशाली, भ्रमणशील, अपने जन्म स्थल से अन्य 
प्रदेश में भाग्योदय, पुत्र, धन, सन्तानादि से युक्त, सुन्दर एवं सुशील पत्नी का सुख प्राप्त होता है। परन्तु संतान सम्बन्धी 
चिन्ता भी रहती है । यदि द्वितीय भाव शुभ ग्रह से युक्त या दृष्ट हो तो जातक वाहन, मकान आदि सुखों से युक्त एवं अपने 
व्यवसाय एवं कार्य क्षेत्र में विख्यात होता है। देखें उदा. कु. नं. 59, 62 एवं 65 (कपिल देव) 

यदि शनि भौमादि से दृष्ट या सूर्य युक्त होकर अस्तं गत हो तो जातक को भ्रातृ सुख नहीं होता देखें कुण्डली नं. 62 
सामान्यतः: ३, ६, ११ वे भावों में शनि, मंगल व राहु अरिष्ट नाशक माने जाते हैं । 

चतुर्थ भाँव-में मकर स्वगृही राशि पर शनि के प्रभाव से जातक गुणी, यशस्वी, प्रतिभाशाली, धर्मपरायण, 
स्वावलम्बी, कर्त्तव्यनिष्ठ, उदासीन, शिक्षित तथा अपने परिश्रम से गुजारे योग्य धन प्राप्त कर लेता है। चन्द्र भी शुभस्थ 
हो, तो माता का सुख अच्छा प्राप्त होता है। जातक को माता, भूमि, मकान, वाहन आदि सुखों की प्राप्ति होती है। कार्य- 
व्यवसाय में अत्यन्त कठिनाईयों के पश्चात्‌ निर्वाह योग्य आय के साधन बना लेता है देखें उदाहरण कुं. 72 

पंचम भाव-में स्वगृही कुम्भ राशि पर स्थित शनि के प्रभाव से जातक तीकत्र बुद्धिमान, उच्च विद्या प्राप्त, पुत्रादि 
सन्‍्तान पक्ष से सुखी परन्तु पत्नी के सुख में कमी अथवा पत्नी के साथ विचार वैमनस्य रहे, प्रारम्भिक जीवन में परिवारिक 
व आर्थिक उलझनें रहें, आजीविका एवं व्यवसाय के क्षेत्र में भी अत्यन्त संघर्ष एवं कठिनाईयों के पश्चात्‌ सफलता प्राप्त 
होगी | ज्यों-ज्यों सन्‍्तान की आयु में वृद्धि होगी, त्यों-त्यों सर्विस या व्यवसाय में विशेषकर अध्यापन, वकालत आदि में 

विशेष धन लाभ व उन्नति प्राप्त होगी। उदाहरणार्थ देखें कुं. नं. (60) 

पषंष्ठ भाव-में मीन राशि पर शनि के प्रभाव से जातक साहसी, पराक्रमी, शत्रुओं को जीतने वाला, यशस्वी, 
भेंसादि चौपायों, लोहादि के कार्यों से लाभान्वित, अत्यन्त कठिनाईयों के बाद उच्च विद्या एवं कार्य व्यवसाय में सफलता 
तथा संघर्ष के बाद मकान एवं वाहन आदि का सुख होता है। परन्तु धन का व्यय बहुत अधिक होता है। यदि शनि पर 
मंगल, राहु, सूर्य आदि ग्रहों का योग या दृष्टि हो, तो जातक या जातिका का गृहस्थ जीवन ठीक नहीं होता। चोट, 
दुर्घटनादि का भय, मातुल पक्ष में विशेषकर मामा/मौसियों के लिए अशुभ होता है। भ्रातृ सुख में भी कमी होती है । वायु 
विकार, पेट, छाती एवं पैरों में विकार तथा अधीनस्थ कर्मचारियों एवं सहयोगियों द्वारा हानि की संभावना होती है। शनि 
पर भौमादि की शुभ दृष्टि हो तो विवाह सुख में कमी होती है। देखें उदा. कुं. (66) 

. अप्तम भांव-में मेष (नीच) राशिस्थ शनि होने से जातक उदासीन, चंचल एवं कामुक प्रवृत्ति वाला, अच्छे 
व्यक्तित्व वाला, विद्या एवं व्यवसाय के सम्बन्ध में अत्यन्त परेशानियों व कठिनाईयों के बाद सफलता प्राप्त करने वाला, 
व्यवसाय में धन के अर्जन में भी स्थिरता न रहने की स्थिति रहे । मन अशान्त व बुद्धि में अस्थिरता रहे, यदि शनि पाप 
ग्रह युक्त या दृष्ट हो तो जातक को वैवाहिक सुख में कमी अथवा स्त्री व सन्तान के स्वास्थ्य सम्बन्धी चिन्ता हो। भूमि, 





५११ 
(४२% 
| 


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॥ः 








तुलालग्नमेंशनिफल ___._._.___खखखख  3॥ 
मकान, वाहन आदि के सुखों की प्राप्ति भी अत्यन्त संघर्ष व अड़चनों के बाद हो | वाद-विवाद या सांझेदारी में हानि उठाने 
वाला, उदर व्याधि का भय, लग्नेश शुक्र एवं भाग्येश बुध का सम्बन्ध हो, तो विदेश में सफलंता के चांस होंगे। 

अष्टम भांव-में वृंष राशि पर शनि होने से अत्यन्त कठिनाईयों एवं विघ्नों के बाद उच्च विद्या की प्राप्ति होती है। 
ऐसे जातक को परिवार में भाई बन्धुओं के साथ असामान्य एवं कटु सम्बन्ध होते हैं | व्यवसाय एवं आजीविका के क्षेत्र में . 
भी अत्यन्त कठिन परिस्थितियों का सामना होता है। पिता के सुख में कमी रहे । शनि के साथ अशुभ योग हो तो जातक 
को कुसंगति के कारण धन सम्बन्धी परेशानी उठानी पड़े। सन्‍्तान सुख भी विघ्नों के बाद हो। स्वास्थ्य भी कुछ ठीक न 
रहे। उदर विकार, वायु एवं श्वास आदि गुप्त रोगों का भय रहे। यदि शनि पर गुरु की शुभ दृष्टि हो, तो जातक किसी 
विशिष्ट क्षेत्र (खेलादि) में विशेष ख्याति प्राप्त करता है । देखें उदा. कुं. नं. 73 । यदि गुरु, सूर्य एवं भौम आदि की भी दृष्टि 
हो तो जातक प्रसिद्ध डाक्टर होता है। अष्टमस्थ शनि ज्योतिष, तन्‍्त्रादि गूढ़ विषयों में भी रुचि देता है। परन्तु जीवन में 
संघर्षों के बाद सफलता प्राप्त करता है। 

नंवम भाँव-में मिथुन (मित्र) राशि पर शनि होने के प्रभाव से जातक सुन्दर व्यक्तित्व वाला, मृदुभाषी, धनी, 
बुद्धिमान, स्वाभिमानी, धर्म, नीति, ज्योतिष, चिकित्सादि गूढ़ विद्याओं में अभिरुचि, भ्रमणशील, तर्क वितर्क करने में 
कुशल, उच्चभिलाषी, उच्चविद्या प्राप्त, भूमि, मकान, स्त्री, सन्‍्तान, वाहन आदि सुखों से सम्पन्न होता है। भाई-बहन के 
सुख में कुछ कमी रहती है। देखें उदा. कु. नं. 72 (एक प्रसिद्ध ज्योतिर्विद) तथा उदा. कुं. 70 (एक डाक्टर कन्या, 
जिसका विवाह भी एक डाक्टर से ही हुआ) नवम शनि विदेश भ्रमण से भी सफलता प्रदान करता है। सामान्यत: नवम 
शनि मिश्रित प्रभाव करता है, परन्तु तुला लग्न में मित्र राशि होने से शनि की शुक्र पर दृष्टि हो तो डाक्टरी के क्षेत्र में सफल 
देखें उदा. कुं. 70 

यदि शनि राहु, मंगल, सूर्यादि ग्रहों से आक्रान्त हो,तो जातक को वैवाहिक सुख में कमी अथवा विलम्ब करवाता है। 
मानसिक तनाव एवं अशान्ति आदि अशुभ फल होते हैं | शुक्र व चन्द्र दृष्ट होने से अभिनय व कला के क्षेत्र में उच्च स्थिति 
प्राप्त होती है, देखें कुं. नं. 67। 

दाम भाँव॑-में कर्क राशि पर शनि हो तो जातक परिश्रमी, बुद्धिमान, कल्पनाशील, उच्चशिक्षित, भूमि, धन 
मकान, वाहन आदि सुखों से युक्त होता है। स्त्री/पति सुख एवं सनन्‍्तान, परिवारिक सुख में भी कमी रहती है। 

व्यवसाय के सम्बन्ध में अत्यन्त संघर्ष एवं कठिनता से स्थिरता आ पाती है। जातक जीवन में धीरे-धीरे विलम्ब से 
: सफलता प्राप्त कर पाता है। ऐसा व्यक्ति धनी नेता या उच्च अधिकारी भी हो सकता है। उसे कृषि (खेती-बागबानी) में 
भी रुचि होती है- 

मन्त्री व नृपति: धनी कृषिपर: शूर: प्रसिद्धो5म्बरे | 

यदि दशमस्थ शनि के साथ भौम अशुभस्थ हो, तो वैवाहिक सुख में कमी रहती है। देखें उदा. कुं. नं. (68) परन्तु 
दशस्थ शनि उच्च-शिक्षा, प्राध्यापन, उच्चाधिकारी एवं ज्योतिष आदि गूढ़ शास्त्रों में सफलता प्रदान कराता है। विदेश में 
भाग्योन्नति भी देता है। । 

यद्यपि दशमस्थ शनि हो तो पिता, पुत्र दोनों को एक साथ एक स्थान पर कार्य करने से प्रगति नहीं कर पाते। ऐसी 
मान्यता है। यदि शनि की चन्द्र, मंगल पर दृष्टि सम्बन्ध हो, विदेश में भाग्योदय हो। देखें कुं. 69 

एकांदब्ना भांव-पर शत्रु राशि (सिंह) पर शनि के प्रभाव से जातक दीर्घायु, दयालु, मधुरभाषी, आकर्षक 
व्यक्तित्व, धनवान, नीरोग एवं अच्छे परिवार वाला (संस्कारित) होता है। तकनीकी कार्यों में दक्ष तथा कुशंल बुद्धि वाला, 

धन-सम्पत्ति, वाहन आदि सुखाों से युक्त होता है। 

अल्प सन्तति (दो या तीन सन्तान) सुख होता है, परन्तु सन्तान (पुत्र एंवं पुत्री) श्रेष्ठ व सुयोग्य होती है। आय के क्षेत्र 

में कठिन परिस्थितियां एवं परेशानिय उत्पन्न होदी हैं । व्यवसाय का विस्तार तो अच्छा होता है किन्तु धन लाभ उतना नहीं 













32 | ॒[॒[॒ ॒ .॒॒.॒[॒_॒_॒_॒__ तुला लगमेंराहुफला[ 
हो पाता। ऐसा जातक लापरवाह तथा कुछ स्वार्थी प्रकृति का भी होता है। यदि शनि अशुभ ग्रह युक्त हो तो किसी' 
निकटस्थ द्वारा विश्वासघात की संभावना होती है। 
द्वादघा भाव-में कन्या राशि (मित्र राशि) पर स्थित शनि के प्रभाव से जातक हर प्रकार के निम्न/उच्च स्तर के . 
लोगों की संगति करने वाला, कई बार दुर्व्यसनों का शिकार, अतिव्ययी, चंचल एवं भ्रमित बुद्धि, शीघ्र क्रोधित होने वाला, 
नेत्र कष्टी विदेशादि बाहरी सम्बन्धों से लाभ उठाने वाला, उच्च विद्या-प्राप्ति में विध्न/बाधाएं होती हैं । यदि धन भाव या 
धनेश शुभस्थ हो तो जातक एक से अधिक स्रोतों एवं गुप्त युक्तियों द्वारा धनार्जन करने वाला होता है। धन के खर्च बहुत 
अधिक रहते हैं । यद्यपि माता, भूमि, मकान, स्त्री, सन्‍्तान, वाहन आदि सुखों की प्राप्ति होती है, परन्तु परिवारिक क्षेत्र में 
कुछ अशान्ति रहती है। भाग्य में उन्नति भी 42 वें वर्ष के बाद होती है। द 
'ऐसे जातकों को ज्योतिष, धर्म, मंत्रादि गूढ़ विद्याओं में भी रुचि होती है तथा जातक तैलादि कैमिकलज़ के कार्य में. 
विशेष सफल होता है। देखें उदा. कुं. 7 


[तुला लग्न : द्वादश भावों में राहु का फल] 

राहु प्रधान व्यक्ति स्तेहशील, विचारपूर्वक परीक्षा करने के बाद काम करने वाला, 

स्वतंत्र चिन्तक, स्वाभिमानी, प्राचीन संस्कृति का अभिमानी, स्वयं के काम में किसी अन्य 

का दखल पसन्द नहीं करता, व्यवहार कुशल, पहिले स्वार्थ तदनन्तर परोपकार की प्रवृत्ति 
होती है। बाह्य स्वरूप देख उसका चरित्र चित्रण करना कठिन होता है। 

प्रथम भाव-में तुला राशि पर राहु के प्रभाव से जातक बाल्यकाल में दुर्बल परन्तु 

तीव्र बुद्धिमान, चुस्त, परिश्रमी व्यवसाय में अत्यन्त कठिनता एवं परिश्रम व संघर्ष के 








तुला लग्ने राहु फल 








होता है । कठिनाईयों के बाद उच्च विद्या प्राप्त करने में सफल तथा जिस कार्य को करना 
चाहे उसे पूरी लगन, योग्यता एवं दृढ़ता से पूरा करके सफलता प्राप्त कर लेता है । देखें उदाहरण कुण्डली नं. 69 (विदेश 
में 35७700 एक कुशल डाक्टर), लग्न का राहु स्वतन्त्र विचारक, छिद्रान्वेषक, अनुसंधानात्मक, स्वाभिमानी प्रवृत्ति देतां 
है। यदि राहु के साथ मंगल, सूर्य आदि ग्रह हो तो जातक को 'सिर पीड़ा, नेत्र रोग, ब्लड प्रेशर आदि रोगों की संभावना 
होती है। ८ 
द्वितीय भाव-में बृश्चिक राशि पर राहु के प्रभाव से जातक/जातिका परिश्रमी, स्पष्टवादी, कई बार कटुवाणी का 
प्रयोग करने वाला, परिवार में अत्यन्त संघर्षपूर्ण परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। अत्यधिक परिश्रम करने पर भी 
अधिक धन संचित नहीं हो पाता। परन्तु निर्वाह योग्य आय के साधन बनते रहते हैं । शनि यदि शुभस्थ हो तो उच्च विद्या 
प्राप्ति के योग बनते हैं । देखें उदा. कुं. नं. (70) ््ि | क्‍ । 
तृतीय भाँव-में धनु राशि पर राहु के प्रभाव से जातक साहसी, परिश्रमी तो होता है, परन्तु समय पर कार्य न करने 
से कई बार हानि भी उठानी पड़ती है। यदि यहाँ राहु पर पंचमेश शनि की दृष्टि या योग भी हो, तो जातक अड्चनों के 
बावजूद उच्च विद्या प्राप्त कर लेता है। ऐसा जातक परिश्रम द्वारा गुजारे योग्य आय के साधन भी बना लेता है, परन्तु खर्च 
भी बहुत होते हैं। निकट भाई बन्धुओं से मतभेद भी होते हैं। प्रत्येक कार्य विध्न/बाधाओं के पश्चात्‌ होता है। भूमि, 
धनादि के सुख भी अड़चनों के बाद (लगभग 27 वर्ष के बाद) होते हैं। देखें उदा. कुं. 6, 67, 60। यदि चंद्र पर गुरु 
की शुभ दृष्टि हो तो जातक धनादि से सम्पन्न तथा विवाह उर्पयुक्त समय पर होता है। देखें कुं. 60 यदि यहां चंद्र-राह्‌ 
का योग हो तो जातक को व्यवसाय सम्बन्धी बहुत ग्रात्राएं रहती हैं। पिता के सुख में कमी हो । देखें कुं. नं. 73 


तुलालग्यममेंरहुफल __ ________[]॒॒_॒_॒_॒_॒॒ ॒ _॒_॒_॒_॒___॒॒_॒_॒॒॒॒॒॒॒॒॒॒॒॒_[__ 33 33 

चतुर्थ भाँव-में मकर राशि पर राहु के प्रभाव से जातक का प्रारम्भिक जीवन अत्यन्त संघर्षपूर्ण एवं अस्थिर 
परिस्थितियों में गुज़्रता है। मातृ कष्ट, भूमि, धन, मकान, वाहन आदि सुखों की प्राप्ति भी परेशानियों के बाद हो। परन्तु 
जन्म स्थान से अतिरिक्त (विदेश आदि) में ऐसा जातक विशेष लाभ व उन्नति प्राप्त कर लेता है । चाहे कहीं भी चला जाए, 
ऐसे जातक को उलझनें अधिक व शान्ति कम प्राप्त होती है। उचित उपाय करने से लाभ रहता है। 

पंचम भाँंव-में कुम्भ राशि पर राहु होने से जातक बुद्धिमान, चालाक एवं स्वार्थ सिद्धि के लिए उचित/अनुचित 
का भी विचार नहीं करता। अड्चनों के बावजूद उच्च विद्या प्राप्त कर लेता है। धन अर्जन में भी अनेक गुप्त युक्तियों का 
आश्रय लेता है। जातक परिवार, सन्‍्तान सम्बन्धी चिन्ताओं से भी चिन्तित रहता है। ऐसा जातक सट्टा, लाटरी, शेयरों 
आदि में तथा ज्योतिष, धर्मादि विषयों में भी रुचि रखता है। यदि पंचम राहु के कारण पुत्र सुख की कमी हो, तो भृगु जी 
के अनुसार नाग देव की पूजा करने से पुत्र प्राप्ति होती है। 

सुतेसिंही पुत्रे, पुत्राभाव:, सर्पशापात्‌ सुतक्षय:। 
नागप्रतिष्ठया पुत्रप्राप्ति: पवनव्याधि:॥ भृगुसूत्र 

बष्ठ भांव-में मीन राशि पर राहु के प्रभाव से जातक बुद्धिमान, पराक्रमी, साहसी, उद्यमी, उदार एवं उच्च विद्या 
प्राप्ति में सफल होता है । ऐसा जातक दीर्घायु, भूमि, सम्पत्ति, धन, वाहन आदि सुखों से युक्त होता है। परन्तु मामा या मासी 
के सुख में कमी हो। कार्य/व्यवसाय में परिश्रम एवं संघर्ष अधिक, परन्तु लाभ कम होता है। अनावश्यक खर्च भी बहुत 
होते हैं। स्त्री एवं सनन्‍तान के सम्बन्ध में सुखी होता है। ऐसा जातक जीवन में उत्तरोत्तर भाग में भौतिक जीवन से 
आध्यात्मिक जीवन की ओर प्रवृत्त हो जाता है। ह 

काप्तम भांव-में मेष राशि पर राहु के प्रभाव से जातक/जातिका स्वतन्त्र प्रकृति का, बुद्धिमान, कठिन परिश्रमी 
पराक्रमी तथा अत्यन्त साहस द्वारा विध्न बाधाओं का सामना करने वाला होता है । व्यवसाय एवं आर्थिक क्षेत्र में अस्थिरता 
एवं उतार-चढ़ाव अधिक होंगे। वैवाहिक सुख (स्त्री या पति सुख) में कमी होती है। यदि सप्तम भाव पर मंगल की 
स्वगृही दृष्टि पड़ती हो, तो अड़चनों एवं बाधाओं के बाद गृहस्थ की प्राप्ति होती है। उदाहरणार्थ देखें कुण्डली नं. 66। 
यदि सप्तमेश मंगल नीच राशिस्थ हो एवं सप्तम भाव पर शनि की भी नीच दृष्टि पड़ रही हो तो जातक/जातिका का 
वैवाहिक सम्बन्ध तलाक में समाप्त हो जाता है । यद्यपि ऐसे जातक/जातिका को व्यवसाय के क्षेत्र में अत्यन्त अच्छी स्थिति 
प्राप्त होती है। उदाहरणार्थ देखें कुं. नं. 66, 68 सामान्यतः: संप्तमस्थ राहु वाले जातक का गृहस्थी जीवन असंतोषपूर्ण 
रहता है। जातक को पत्थरी, प्रमेह, मधुमेह एवं उदर सम्बन्धी गुप्त रोगों का भय होता है। -- 

अष्टम भांव-में वृष राशि पर राहु के प्रभाव से जातक/जातिंका दृढ़निश्चयी,.._ उदाहरण कुंडली 
परिश्रमी, उत्साहशील, व्यवहारंकुशल, अपनी धुन काँ पक्का, अपने कर्त्तव्य के प्राते निष्ठावान, (८ ०248 2220 
जिस काम को करने का संकल्प कर ले, उसे पूरे मनोयोग एवं ईमानदारी से पूरा करता है। 
परिवारिक जीवन अत्यन्त संघर्षपूर्ण होता है तथा आर्थिक क्षेत्र में भी अनेक कठिनाईयों का 
सामना करना पड़ता है। जीवन के उत्तरार्ध भाग में परिवारिक जीवन कुछ सुखी होता है। श्रेष्ठ 





कुछ न कुछ असंतोष बना रहता है। देखें प्रस्तुत संलग्न उदाहरण कुण्डली 

नवम भांव-में मिथुन राशि पर राहु के प्रभाव से जातक बुद्धिमान, धार्मिक प्रवृत्ति वाला, आकर्षक व्यक्तित्व 
वाला, उद्यमी एवं परिश्रमी व्यक्ति होता है। इसके भाग्य में अनेक उतार-चढ़ाव, परिवर्तन एवं संघर्षपूर्ण हालात आते हैं 
परन्तु जातक अपने पुरुषार्थ एवं युक्तियों से सफलता प्राप्त कर लेता है। ऐसा जातक उच्चशिक्षित, भ्रातृं सुख में कमी, देश- 
विदेश में भ्रमण करने वाला, प्रसिद्ध व्यक्ति होता है। जातक अपने बुद्धि कौशल से विभिन्न साधनों से धंनार्जन करता है। 
रहन-सहन उच्च-स्तरीय एवं अच्छा होता है। ज्योतिष, बैद्यक, किसी बड़ी संस्था के प्रतिनिधित्व एवं लेखन आदि क्षेत्रों 
में विशेष प्रसिद्ध होता है। विघ्न/बाधाओं के बावजूद व्यवसाय में लाभ व उन्नति प्राप्त कर लेता है। 








34 _ _ _  __॒_॒_॒_॒[॒[॒[॒[॒_॒_॒______ तुला लग्नमें केतु फल 
दष्रांम भांव-में कर्क राशि पर राहु के प्रभाव से जातक विद्वान, प्रतिष्ठित, साहित्यिक प्रवृत्ति वाला, महत्त्वाकांक्षी, * 
परिश्रमी, आध्यात्मिक दृष्टिकोण, विघ्नों के बावजूद उच्चशिक्षित, किन्तु कार्य-व्यवसाय के सम्बन्ध में अस्थिरता एंब॑ - 
अत्यन्त संघर्षपूर्ण परिस्थितियों का सामना रहे । पिता के सुख में कमी रहती है । परन्तु ऐसा जातक अपने धैर्य, हिम्मत एवं - 
गुप्त युक्तियों के बल पर विघ्नों को पार कर उच्च सफलता एवं ख्याति प्राप्त करता है। ऐसा जातक जीवन के उत्तरार्ध में 
राजनीति क्षेत्र में विशेष उच्च पद, प्रतिष्ठा एवं ख्याति प्राप्त करता है । विशेषकर 42वें वर्ष विशेष उन्नति होती है। परन्तु 
गृहस्थ (घरेलू) सुख में कमी रहती है । उदाहरणार्थ देखें कुण्डली नं. (63) (श्री अटल बिहारी वाज. ) तथा कुं. नं (64) 

. एकादपघ्रां भांव-में सिंह राशि पर राहु के प्रभाव से जातक शालीन, परिश्रमी, बुद्धि चातुर्य एवं गुप्त युक्तियों द्वारा 
घनलाभ-एवं उन्नति प्राप्त करने वाला होता है। यदि राहु पर गुरु-मंगल आदि शुभ ग्रहों का योग या दृष्टि हो तो जातक 
व्यवसाय या सर्विस आदि में नियमित आय प्राप्त करने वाला, कर्णरोग से पीड़ित, सामान्य धन, सम्पत्ति, स्त्री, वाहन एवं 
सन्‍्तान आदि सुखों से युक्त, प्रत्येक कार्य को बड़ी बारीकी, ईमानदारी एवं कुशलता से करने में निपुण होता है। कई बार 

>लाटरी, सट्टा, शेयर आदि से अचानक धन लाभ भी प्राप्त करता है। सामान्यत: ऐसा जातक धीरे-धीरे विघ्नों के बाद 
उन्नति करता है। ऐसे जातक को ज्योतिष, कर्मकाण्ड, धार्मिक अनुष्ठान आदि कृत्यों में विशेष रुचि होती है तथा वह 
उनके द्वारा लाभान्वित भी होता है। उदाहरण हेतु देखें कुण्डली नं. (62) तथा नं. (72) 
३, ६, ११वें भावों में राहु अरिष्टनाशक भी माना जाता है-त्रिषड्‌ एकादशे राहु शनि, भौमए्च सर्वारिष्ट निवारकाः ॥ 
द्वाद्घ्ा भाँव॑-में कन्या राशि पर राहु होने से जातक बुद्धिमान, विवेकशील, परिश्रमी, धेर्यवान एवं देश-देशान्तर में 

भ्रमणशील होता है। यदि द्वादश राहु पर शनि की भी दृष्टि हो तो जातक को गूढ़ विद्याओं जैसे ज्योतिष, आध्यात्म, . 
यौगिक एवं खेल आदि क्षेत्रों में भी विशेष रुचि होती है। मध्यम शिक्षा होने पर भी योग, खेलादि किसी विशिष्र क्षेत्र में . 
उल्लेखनीय प्रसिद्धि प्राप्त करता है। जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव एवं,.संकट आने पर भी ऐसा जातक धैर्य और हिम्मत से 
उनका सामना करता है। देखें उदाहरण कुण्डली नं. 59 तथा (65) द्वादश राहु के कारण आकस्मिक खर्च भी बहुत 

अधिक होता है। जातक को विदेशी सम्बन्धों से भी विशेष लाभ प्राप्ति की सम्भावनाएं होती हैं । 


तिला लग्न: द्वादश भावों में केतु का फल] 
प्रथम भाव-में तुला राशि पर केतु होने से जातक उद्विग्न, चिन्तित एवं प्रायः __ पुला लग्ने, केतु फल 
अशान्त मन रहता है। शारीरिक सौन्दर्य में भी कुछ कमी रहती है।। दुष्टजनों से भय होता / 


है। भाई बन्धुओं के सहयोग में कमी तथा स्त्री (पति) से मतान्तर एवं वैवाहिक सुख में 
कमी रहती है। कठिन परिस्थितियों के बावजूद जातक अपने पराक्रम एवं हिम्मत से 


तो जातक को शरीर कष्ट, मानसिक तनाव एवं उदर आदि विकार रहते हैं। उदाहरणार्थ [वि 
देखें कुण्डली नं. 66 तथा (68) 

द्वितीय भांव-में बृश्चिक राशि पर केतु होने पर जातक अत्यन्त कठिनता से धनोपार्जन करने वाला, स्पष्टवादी, 
निडर, मुख रोग का भय, निष्ठुर किन्तु सत्यवादी, कई बार कठोर वाणी के कारण निकट बन्धुओं से वैमनस्य पैदा हो 
उच्च विद्या प्राप्ति में विध्न-बाधाएं तथा परिवारिक सुख में कमी होती है । यदि केतु के साथ स्वगृही मंगल सूर्य या गुरु 
हो, तो धन सम्पदा एवं कौटुम्बीय सुख में वृद्धि होती है। 

तृतीय भाव॑-में धनु राशि पर केतु की स्थिति होने से जातक बुद्धिमान, शिक्षित, परिश्रमी, भ्रमणप्रिय एवं उसे देश- 
विदेश में यात्रा-के अवसर प्राप्त होते हैं। जातक को भाइयों का सुख एवं थोड़ा सहयोग प्राप्त होता रहता है। परन्तु यदि 








तुलालग्नमेंकेतुफल __ _ __ हे ४ ७ 3 बज शिम शशि] 
राहु के साथ सूर्य या शनि आदि ग्रहों का अशुभ योग हो तो भ्रातृ सुख में कमी होती है । ऐसा जातक अपने पराक्रम एवं 
परिश्रम से धन एवं आय के साधन प्राप्त करता है । जातक को संगीत, कला, ज्योतिष, वैद्यक, मंत्र/तंत्रादि विद्याओं में भी 
रुचि रहती है। इनके द्वारा वह लाभान्वित भी होता रहता है। 
चतुर्थ भांव-में मकर राशि पर केतु होने से जातक उच्चभिलाषी, उच्चशिक्षा में विघ्न/बाधाएं, कार्य/व्यवसाय में भी 
अत्यन्त संघर्षपूर्ण परिस्थितियां एवं विशेष उतार-चढ़ाव रहें। अपने जन्मस्थान से अतिरिक्त-विदेशादि में भाग्योन्नति की 
सम्भावनाएं होंगी । पैतृक सम्पत्ति का विशेष लाभ नहीं होता। माता, भूमि आदि से भी विशेष सुख नहीं होता है | व्यवसाय 
में धैर्य एवं कठिन परिश्रम के बाद सफलता प्राप्त करता है । जातक आध्यात्मिक एवं राजनीति के क्षेत्र में भी विशेष उन्नति 
प्राप्त करता है। देखें उदा. कुं. नं. 63 तथा 64 (महात्मा गांधी ) 
पंचम भाव-में कुम्भ राशि पर केतु की स्थिति होने से जातक सूक्ष्म किन्तु अस्थिर बुद्धि वाला, परिश्रमी, उच्च 
विद्या प्राप्ति में विघ्न/बाधाएं रहें | जातक की ज्योतिष, कर्मकाण्ड, धर्म, आध्यात्म, योग, मन्त्र आदि गूढ़ विद्याओं की ओर 
विशेष रुचि तथा जातक इन्हीं विद्याओं के द्वारा धनार्जन करने वाला होता है | सन्‍्तान एवं परिवार के पोषण के लिए विशेष 
संघर्षशील रहता है | केतु शुभ दृष्ट हो, तो दो पुत्रों का सुख होता है । देखें उदा. कुं. नं. 62, ऐसे जातक को सट्टा, लाटरी 
आदि में भी रुचि होती है । जातक का जीवन कठिन संघर्षो से घिरा रहता है । यदि पंचम भाव पर भौमादि अशुभ ग्रह की 
दृष्टि हो तो उच्च विद्या में विघ्न एवं उदर विकार होते हैं । यदि भौम के साथ गुरु (शुभ) ग्रह की भी दृष्टि हो तो जातक 
विख्यात, ज्योतिषी, कलाकार एवं अभिनेता होता है। देखें उदा. कुं. नं. 72 
बष्ठ भाँव-में मीन राशि का केतु होने से जातक साहसी, स्वस्थ चित्त, पराक्रमी, धैर्यवान, बुद्धिमान, विशेष गुणी, 
उदार, यशस्वी एवं अपने गुणों के कारण प्रसिद्ध होता है- 
बन्धुप्रियोदार गुण प्रसिद्धो विद्या यशस्वी रिपुगे च केतौ॥ 
ऐसा जातक धन-धान्य, भूमि, वाहन आदि साधनों से सम्पन्न तथा स्त्री, सन्‍्तान आदि सुखों से युक्त होता है। जातक 
को खेल, योग, ज्योतिष, अध्यात्म आदि गूढ़ विषयों की ओर भी विशेष अभिरुचि होती है। अपने विशिष्ट गुणों के 
कारण देश-विदेश में विपुल धन एवं प्रसिद्धि प्राप्त करता है । दमन करने में सफल, परन्तु मामा का सुख कम मिलता है। 
३२ वर्ष के बाद खेलादि विशिष्ट क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धि प्राप्त करता है। देखें उदा. कुण्डली 65 (कपिल देव- 
खिलाड़ी ) ऐसे जातक को निजी व्यवसाय में भी दौड़ धूप अधिक रहती है। देखें कं. नं. 59. 
ब्रप्तम भाँव-में मेष राशि का केतु होने से जातक/जातिका अत्यधिक परिश्रमी, बुद्धिमान, अनुसन्धानात्मक रुचि, 
स्वतंत्र विचारक, कठिनाईयों के बाद उच्चविद्या प्राप्त करने वाला तथा व्यवसाय में भी संघर्षों एवं गुप्त युक्ति से सफलता 
प्राप्त करने वाला होता है। सांझेदारी के कामों में हानि उठाने वाला, कई बार व्यवसाय के सम्बन्ध में वृथा चिन्ता करने 
वाला होता है| स्त्री या परिवार के सम्बन्ध में असंतोष रहता है । उदर विकार एवं गुप्त रोग होने की सम्भावना होती है। 
वस्ति अर्थात्‌ नाभि के नीचे तिल आदि का निशान हों तो विवाह के बाद विदेश में स्थानान्तरण होने की सम्भावनाएं होती 
हैं | देखें उदा. कुं. नं. 69 । ै । 
अष्टम भाव-में वृष राशि पर केतु के प्रभाव से जातक/जातिका गुप्त रूप से परिश्रम करने वाला, कट एवं 
स्पष्टवादी, शीघ्र उत्तेजित होने वाला, व्यवसाय में धनार्जन के लिए अत्यधिक संघर्ष एवं कठिन परिश्रम करने वाला होता 
है, परन्तु ऐसे जातक के पास अधिक धन संचित नहीं हो पाता। यद्यपि निर्वाह योग्य आय के साधन बनते रहते हैं । तथापि 
परिवारिक परेशानियों के कारण मानसिक तनाव एवं अशान्ति बनी रहती है। यदि केतु पर चन्द्र की शुभ दृष्टि हो तथा 
भाग्य स्थान पर शनि-बुध का शुभ योग हो तो जातक/जातिका सफल डाक्टर बनती है। देखें उदा. कुं. नं. 70 


की 





30 3 कं कम 000 ० ७४४  -:- / तला लग, मकर 

नंवम भाव-में मिथुन राशि पर केतु स्थित हो, तो जातक पराक्रमी, परिश्रमी, साहसी, स्वावलम्बी, भ्रमणप्रिय, 
उदार हृदय, स्वतंत्र विचार एवं स्वच्छन्‍्द आचरण वाला, कार्य-व्यवसाय में अत्यन्त संघर्ष व कठिनाईयों के बाद सफलता, 
परन्तु भाग्योन्नति में नए-नए विध्न/बाधाएं पड़ें, जातक को ज्योतिष, धर्म, तन्त्र आदि गूढ़ विषयों में भी रुचि रहे | जांघ पर 
तिल या चोटादि का चिन्ह हो | व्यवसाय में शत्रुओं के कारण कई बार परेशानी उठानी पड़े | जातक स्त्री एवं बच्चों के 
लिए विशेष चिन्तनशील रहता है । देखें उदा. कुण्डली नं. 60, 6], 67 तथा 73 

दाम भाँव-में कर्क राशि पर केतु होने से जातक परिश्रमी, स्वाभिमानी, विघ्नों के पश्चात्‌ उच्च विद्या की प्राप्ति 
हो | व्यवसाय में भी अत्यन्त संघर्ष एवं कठिनाईयों के बाद सफलता प्राप्त हो अथवा निर्वाह योग्य आय के साधन बनें। 
पिता के सुख में कमी रहे तथा भूमि, मकान, जायदाद आदि के सम्बन्ध में भी उलझनें एवं परेशानियां अधिक रहें । केतु, 
राहु एवं चन्द्र की दशा अथवा अन्तर्दशाओं में कारोबार की स्थिति अस्थिर तथा आर्थिक परेशानियों का सामना अधिक 
रहे | जातक के घुटनों पर तिल या चोट का भी निशान हो तैलादि कार्यो द्वारा लाभ हो, देखें उदा. कुं. नं. 7॥ 


एकादण्ा भांव-में सिंह राशि पर केतु होने पर जातक बुद्धिमान, पराक्रमी एवं परिश्रमी स्वभाव का होता है | उच्च - 


शिक्षा विघ्न/बाधाएं तथा लाभ व उन्नति के मार्ग में भी अड़चनें होती हैं । सन्‍्तान सम्बन्धी विशेष चिन्ता होती है । परन्तु ऐसा 
जातक अपने बुद्धि कौशल द्वारा कठिनाईयों पर सफलता प्राप्त कर लेता है । ज्योतिष, आध्यात्म, योग, तन्त्र आदि विद्याओं 
में भी रुचि हो | शेयर, लाटरी या सट्टे आदि द्वारा आकस्मिक लाभ होने की भी सम्भावना होती है । विदेशी सम्बन्धों द्वारा 
भी लाभान्वित होने के चांस बनते हैं। 

द्वादघा भाव-पर कन्या राशि पर केतु होने से जातक अथक परिश्रमी तथा अनेक संसाधनों द्वारा अत्यन्त संघर्ष एवं 
कठिनाईयों से धनार्जन करने वाला होता है । ऐसा जातक चंचल स्वभाव, अत्यधिक खर्च करने वाला, गुप्त रोग या शत्रु 
भय एवं आंखों व पावों में रोग के कारण कष्ट हो । मामा से सुख में कमी हो | जातक आर्थिक क्षेत्र में गुप्त युक्तियों से काम 
लेने वाला एवं.विदेशी सम्बन्धों से लाभान्वित होने वाला होता है । यदि द्वादशस्थ केतु भाग्येश बुध से युक्त हो, तो जातक 
धन, सम्पत्ति, वाहन एवं अच्छी पत्नी व सुयोग्य सन्तान से युक्त होता है तथा उच्चस्तरीय व्यापार में भी सफल होता है। 

विशेष नोट :- ऊपर लिखित तुला लग्न में सूर्यादि ग्रहों की स्थितियों के सम्बन्ध में उल्लेखनीय उदाहरण 
कुण्डलियां आगामी पृष्ठों पर देखें 





तुला लग्न में आगे लिखे योगों के फल का निर्णय करते समय सम्बन्ध दशा&न्तर्दशा एवं गोचर स्थिति के अनुसार प्राप्त 
होता है। 

#सूर्य-बुध-लाभेश एवं भाग्येश का योग होने से शुभ ग्रहों में यह योग हो तो विशेष शुभ फल प्रदान करता है। 

एथ्चानि-घाक्र- शुक्र लग्नेश होकर अष्टमेश भी है तथा शनि केन्द्रेश व त्रिकोणेश होने से दोनों का योग अत्यन्त शुभ 
होता है। यह योग २, ४, ५, ८, ९, १०, १२वें भावों में शुभ तथा शेष अन्य स्थानों में मध्यम होता है। इस योग के 
प्रभावस्वरूप जातक को भूमि, जायदाद, स्त्री, सन्‍्तान सम्बन्धी यथेष्ठ सुख, विवाह तथा सन्तानोत्पत्ति के बाद विशेष 
भाग्योदय होता है। । 

फ्घ्ानिं- बुंध- शनि सुखेश व पंचमेश तथा बुध भाग्येश और द्वादशेश भी है। इसलिए बुध में किंचित दोष आ 


सकता है। इस योग के प्रभावस्वरूप जातक कुछ परिवर्तनों के बाद अपने कार्य व्यवसाय में सफल होगा, विदेश में भी . 


सफलता की सम्भावनाए होंगी विशेषकर जब यह योग बारहवें भाव में बनें। 
एबुध-घुक्र- बुध-शुक्र का योग भी विशेष शुभ एवं सफल होता है । यह योग सफल राजयोग बनाता है । जातक 


| 


तुलालग्नमेंशुभाशुभयोग _"  _____________________ _ 37 
भूमि, वाहन आदि सुखों से सम्पन्न तथा देश-विदेश की यात्राएं कराने वाला होगा। क्रय-विक्रय अथवा बौद्धिक 
(77/202009४)) कार्यों से धन की प्राप्ति होती है। 
एचानि चन्द्र- तुला लग्न में चंद्रमा दशमेश है। शनि-चंद्र योग के ग्रभावस्वरूप जातक तर्क-वितर्क करने में 
कुशल, बुद्धिमान, मैडीकल, इंजीनियरिंग के क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर लेता है परंतु यहाँ यदि चंद्रमा क्षीण, अल्पबली हो 
तो शुभफल में कमी आ जाती. है। लग्न में शनि हो तथा दशम भाव में चंद्र हो, तो चंद्र की दशा अत्यन्त श्रेष्ठ रहती है एवं 
व्यक्ति राज्य में उच्च पदासीन होता है। लग्न में शनि, दशम में चंद्र हो तो राजयोग होता है। 
एबुध-चंद्र- का योग भी शुभ है। इस योग के प्रभावस्वरूप जातक पठन-पाठन में रुचि श्खने वाला, गणित 
कम्पयूटर, कामर्स, ज्योतिष आदि तकनीकी क्षेत्रों में सफलता प्राप्त करेगा। 
छबुध-णजुक- का योग भी तुला लग्न में विशेष प्रशस्त होगा। जातक विद्वान, विद्या के क्षेत्र में विशेष सफलता तथा 
धार्मिक विचारों से युक्त होगा । यह योग यदि केन्द्र भावों में हो तो विशेष शुभ फल प्राप्त होते हैं तथा जातक अपने कार्यक्षेत्र 
में उच्च पद पर आसीन होता है। 
छ्युक्र मिर्बल- अस्त या पापाक्रांत हो तो अल्पायु योग होता है। इस सम्बन्ध में अष्टम भांव पर शुभाशुभ ग्रह की 
दृष्टि का भी विच्चार करना चाहिए। | 
फर्ध॑नांद्य योणा- लग्नेश त्रिकोण में हो एवं द्वितीयेश लाभ भाव में, द्वितीय भाव पर द्वितीयेश की दृष्टि हो या शुभ 
ग्रहों की दृष्टि हो तो जातक को अच्छी एवं विपुल सम्पत्ति प्राप्त होती है। 
ऊगाजभंण योण- लग्न भाव में चन्द्र हो तथा केन्द्रस्थ मंगल की चन्द्रमा पर दृष्टि हो तथा बारहवें भाव में शनि 
. हो तो जातक को सदैव आर्थिक एवं मानसिक परेशानियां रहती हैं। 


तल बाहों का फल 


एमंणल-पघ्ानि- (निकृष्ट और सदोष) कारण मंगल मारकेश होता है और दो मारक स्थानों का स्वामी है। 

छम्ूर्य-बुध-शुक्र- लग्न में हों तो जातक धनवान, भाग्यवान तथा प्रभावशाली व्यक्ति होगा। अपने पुरुषार्थ के 
बल पर जीवन में उच्च पंद, धन, सम्पत्ति आदि प्राप्त करने में सफल होगा। तीन ग्रहों के फल में प्राय: सर्वाधिक बलीं ग्रह 
की दशा-अन्तर्दशा में शुभाशुभ फल प्रकट होता है। 

एथ्ञानि-घुक्र-बुध-तुला लग्न में इन तीन ग्रहों का योग भी अत्यन्त शुभ एवं राज-तुल्य सुखों को प्रदान करता है। 
जातक को सब प्रकार के भौतिक सुखों की प्राप्ति होती है। केन्द्र-त्रिकोण में यह योग विशेष शुभ-फलप्रंद होता है। 
जातक कामर्स, लेखाकार तथा उच्च-शिक्षित भी होता है। 

'शशानि-बुध-चंद्र- योग हो तो.जातक मैडीकल, कम्प्यूटर, ईंजीनियरिंग आदि तकनीकी क्षेत्र में विशेष सफलता. 
प्राप्त करता है।.... 

छग्पूर्य-बुध-घानि-योग कुछ अशुभ होता है । जातक अपने गुणों एवं भावों को ठीक ढंग से एवं उचित प्रकार से 
अभिव्यक्त नहीं कर पाता। यद्यपि तार्किक तथा तकनीकी कार्यों में विशेष दक्ष होगा। गणित, साहित्य, कम्प्यूटर में विशेष 
रुचि होगी। यही योग यदि द्वादश भाव में हो या सूर्य-बुध हों और उन पर शनि-की दृष्टि हो तो जातक का पिता प्रबल 
भाग्यशाली होता है। जातक को नेत्र कष्ट भी रहे। . 

#सूर्य-बुध-घानि-चंद्र: की युति भी जातक को भाग्यशाली बनाती है।.... 



















38 _ __ _ ___ _  __[_॒___तुला लग्न-उदाहरण कुण्डलियां 


हि बा मा बाबा) मा वाया शा वध आधा आम शाम) आधा बराक मा आधा बा शाम मा बाबा; बाधा आधा आधा बा शाम अमा बम बा बा 


॥तुला लग्न सम्बन्धी कुछ उल्लेखनीय उदाहरण कुण्डलियां ॥ 


आक लक बा शाम बा आधा मा काम आम बाबा ब्रा बा प्र वाया बाबा बाबा शा बाधा) बा आधा बाबा प्रा बम का बाबा बम बम नमी 





उच्च-शिल्षा एवं फर्नीचब क्षेत्र में म्रफल उद्योगपति 
प्रस्तुत जन्म कुण्डली एक उच्च-शिक्षित ((!०77००९), तीब्र बुद्धिमान, परिश्रमी एवं उदा. कुण्डली नं. 59 


धनु लग्न उदित है तथा जन्म कालीन मंगल की दशा १ वर्ष, 0 मास एवं 4 दिन भोग्य 
थी। जातक का जन्म एक उच्च प्रतिष्ठित एवं सम्पन्न घराने में पठानकोट (पंजाब) में 


वर्तमान दिल्ली में बड़े भाई के साथ मिलकर फर्नीचर उद्योग एवं इंटीरियर डैकोरेट के उद्योग में लगा है। 

ज्योतिष-समीक्षा- (१ ) तुला लग्न में शनि सर्वाधिक योगकारक ग्रह होता है कुण्डली (59) में पंचम भाव 
पर शनि की तृतीय स्वगृही दृष्टि पड़ने से जातक उच्चशिक्षित, उद्यमी, कुशल शिल्प बुद्धि, मिलनसार एवं व्यवहार कुशल 
है। 

(2) 5 सितं. 4983 तक जातक को गुरु मध्ये बुधान्तर उच्च विद्या प्राप्त करके दो/तीन प्राईवेट कम्पनियों में 
: प्रतिनिधि के तौर पर सर्विस करते रहे । गुरु मध्य शुक्र की अन्तर दशा (मार्च, 4985) में विवाह हुआ तथा शुक्रान्तर में ही 
दिसंबर 85 में प्रथम पुत्र रल प्राप्त हुआ। 

सन्‌ 987 ई. के पूर्वार्द्ध भाग में गुरु मध्य सूर्य की अन्तर दशा में जातक के द्वारा सर्विस छोड़कर दिल्ली में कार्यरत बड़े 

भाई के साथ फर्नीचर उद्योग में शामिल हो गया, जो सन्‌ 2003 ई. तक उतार चढ़ाव के बावजूद सफलतापूर्वक चलाया 
जा रहा है। 

कारण-9कुण्डली में बुध भाग्येश एवं राशि स्वामी होने पर भी अष्टम भाव में अस्तंगत होकर गुरु की शत्रु दृष्टि 
से प्रभावित है। जिससे बुध में अधिग्रहण सर्विस अधिक देर तक नहीं रही। सूर्य (जो कि आत्मीय सम्बन्धों का भी _ 
कारक है, गुरु की दृष्टि प्राप्त किए है, और लाभेश भी है) की अन्तरदशा में बड़े भाई के साथ सांझेदारी में कार्यारम्भ 
किया। 

क#दशम भाव में मंगल-शुक्र के योग के कारण भी इण्टीरियर डैकोरेशन के कार्य में संलिप्त हुआ। शुक्र सौन्दर्य एवं. 
. आकर्षण का ग्रह है, और लग्नेश भी है। तथा मंगल धनेश एवं सप्तमेश होकर नीच राशिस्थ होने पर भी गुरु की उच्च 
दृष्टि को प्राप्त कर रहा है। 

$नीच भंग योग- इसके अतिरिक्त मंगल को नीच भंग योग भी है। क्योंकि मंगल की उच्चराशि, मकर का 
स्वामी-चन्द्र से केन्द्र में होने से नीचभंग हो गया है। 

#अधिकांश ग्रह (लग्न एवं लग्नेश सहित) चर एवं द्विस्वभाव राशियों में होने से जातक को व्यवसाय में अत्यधिक 

संघर्ष एवं दौड़ धूप का सामना भी करना पड़ रहा है। 


ज्योतिष तत्त्व ( फलित ) द ु | 39 
“८ उच्च प्रतिष्ठित भूतपूर्व प्रिंजीपल एवं कालमर्पयोग सच_ि्टिःे 
प्रस्तुत जन्म कुण्डली एक उच्च-प्रतिष्ठित एवं उच्चशिक्षित प्रभावशाली रिटायर्ड प्रिंसीपील.._ कुण्डली संख्या नं. 60 


- इन्होंने में 24 अप्रैल, 936, जालंधर 
साहिब की है, यह कुल चार भाई हैं । एक बड़े और दो छोटे । इन्होंने 963 ई. में एम. ए. __ रोहिणी ४, इष्ट ३४/०३ 





ई. में दो लड़कों का जन्म गुरु मध्ये क्रमशः गुर्वन्तर एवं बुध की अन्तर दशाओं में हुआ। 
मार्च (997 ई.) को शनि मध्य गुर्वन्तर में जातक बतौर प्रिंसीपल रिटायर्ड हुए। आपने ज्योग्रफी ( भूगोल) के विषय में 
कुछ उल्लेखनीय पुस्तकों का भी लेखन किया, जिनसे विशेष लोकप्रियता तो मिली परन्तु आर्थिक एवं सरकारी क्षेत्रों से 
बार-बार प्रयास करने पर भी अशानुरूप सरकारी स्वीकृति प्राप्त नहीं हुई। इसका मुख्य कारण जातक की कुण्डली में 
कालसर्पयोग का प्रभाव कहा जा सकता है। इसके अतिरिक्त कुण्डली में अन्य ज्योतिषीय योग इस प्रकार से होंगे- 

ज्योतिषीय अमीक्षा - #प्रस्तुत जन्म कुण्डली में तीन ग्रह (सू., चं. एवं शुक्र) उच्चराशिगत हैं तथा तीन ग्रह 
(गुरु, शनि व मंगल) स्वराशिगत होने से राजयोग बना है। इसके अतिरिक्त केन्द्रेश (मंगल) व त्रिकोणेश (बुध) का 
सम्बन्ध केन्द्र में होने से भी राजयोग बना है। हैः. यप 

क#इतने अधिक ग्रह उच्च एवं स्वराशिस्थ होने पर जातक को सरकारी क्षेत्र में बहुत अधिक ( आशानुकूल) 

उपलब्धियां नहीं प्राप्त हो सकीं। इसका मुख्य कारण यही है कि नवांश कुण्डली में कोई भी ग्रह वर्गोत्तम स्थिति में नहीं 
है। केवल कर्मेंश चंद्र नवांस में कर्कस्थ स्वराशिगत है। अतः सर्विस में नियमानुसार लाभ अवश्य प्राप्त होते रहे हैं । पत्नी 
एवं बच्चों का भी अनुकूल एवं सुखद सहयोग प्राप्त होता रहा है। #अधिकांश लाभ गुरू एवं शनि की दशाओं में ही 
प्राप्त हुए हैं। . या ह दर ि 

(१) गुरु राहु युक्त होते हुए भी स्वराशिगत होकर सूर्य, मंगल आदि ग्रहों को शुभ पंचम दृष्टि से तथा नवम दृष्टि से. 
लाभ भाव (जो कि अग्रज भाई का भी भाव है) को देख रहा है। फलस्वरूप जातक को उच्च विद्या एवं भाईयों का यथेष्ठ 
सुख प्राप्तहुआ। .. । 

$ शनि योगकारक होकर स्वराशि में होने से उच्चविद्या, भूमि, मकान एवं वाहन, संतान आदि सुख भी प्रदान किए हैं। . 

$ सप्तम भाव पर शनि की दृष्टि होनें से स्त्री को शरीर कष्ट एवं धन सम्बन्धी अनावश्यक खर्च भी रहे । 

$ इसके अतिरिक्त लग्नेश शुक्र उच्चस्थ होने पर भी षष्ठभाव में निष्फली माना जाता है तथा वह पापाक्रन्त है । 

कार्येश चन्द्रमा उच्चस्थ होते हुए भी कर्तुरी योग में है। इसके अतिरिक्त कालसर्पयोग का भी प्रभाव है। इन सभी से 
अभीष्ट प्राप्ति में विध्न/बाधाओं एवं परेशानियों का भी सामना रहा। 


$ वर्तमान कालिक भाग्येश बुध की दशा व्ययशील होते हुए भी सामान्यत: शुभ फल प्रदा ही होगी। 








40 ज्योतिष तत्त्व ( फलित ) 
------ उच्च प्रतिष्ठित उद्चीोगापति एवं काल॑अआर्पयीण का उद्धंदबर्ण +्स्‍चषा 
प्रस्तुत जन्म कुण्डली लौह मशीनरी एवं कलपुर्जो से सम्बन्धित एक प्रसिद्ध उद्योगपति. कुण्डली संख्या नं. 67 

की है। कुल चार भाई और तीन बहिनें हैं। ऊंचा कद; उच्च शिक्षित एवं आकर्षक विवि जय + ३-30] 

व्यक्तित्व के स्वामी हैं। इनका विवाह 98॥ ई. में शुक्र की महादशा एवं चन्द्र की ५३ च ८ ५७२१ ४२६ 
अन्तर्दशा में एक सुन्दर सुशील एवं परिश्रमी कन्या से हुआ। चन्द्र की किन में ही 982 
ई. में एक सुन्दर कन्या का जन्म हुआ। (985 ई.) में शुक्र मध्ये राहु की अन्तर्दशा में 
पिता जी का आकस्मिक निधन हुआ तथा आगे १986 ई. में गुरु की भुक्ति में द्वितीय 
सनन्‍्तान (लड़का) और फिर केतु के अन्तर में 995 ई. में दूसरे लड़के का जन्म हुआ। 
वर्तमान काल में चन्द्रमा की महादशा के अन्तर में मंगल की अन्तरदशा चल रही है जोकि 5 नवं. 2003 ई. तक रहेगी। 





जातक स्वावलम्बी होने के साथ-साथ पैतृक सम्पत्ति से भी लाभन्वित हुआ है। 
ज्योतिषीय समीक्षा- # जातक की कुण्डली में त्रिकोणपति एवं चतुर्थेश शनि लग्न, केन्द्र भाव में होने से 
शशक योग बना है, जिसके प्रभाव स्वरूप जातक धातु एवं शिल्पादि क्रियाओं में कुशल, परम बुद्धिमान, धनवान, भूमि, 
जायदाद, शिक्षा सन्‍्तान एवं सवारी आदि सुख साधनों से युक्त, व्यवहार-कुशल, माता का भक्त, छिद्रान्वेशी तथा दूरगामी 
| योजनाएं बनाने में कुशल होता है। शनि पंचमेश होकर उच्चस्थ होने से उच्च विद्या का लाभ भी देता है। 

छः दशम भाव पर सूर्य, मंगल, बुध, गुरु एवं शुक्र-पांच ग्रहों का योग होने से जातक अच्छी स्त्री, अच्छी. सन्तान, 

गुणवान, धनवान, यशस्वी, कामुक, वाहनादि सुखों से युक्त एवं पैतृक सम्पत्ति का भी लाभ होता है । 
थरुक्रारभानु गुरु चन्द्ररसुतै विशोकः | 
दारार्थवान-गुणयशथो: बलवानुदारः ॥” 

४ धनेश मंगल दशम भाव में नीच राशिस्थ होने पर भी उच्च गुरु के योग से तथा चन्द्र-मंगल में स्थान परिवर्तन योग 
बनाने से आर्थिक परेशानियों के बावजूद जातक को चन्द्रमा की दशा में 2002-2003 में धातु सम्बन्धी व्यवसाय में अच्छे 
लाभ ([00॥5) भी प्राप्त हुए हैं। 

चन्द्रमा यद्यपि द्वितीय भाव में नीच राशिस्थ पड़ा हुआ है, परन्तु उस पर गुरु की शुभ एवं लाभकारी दृष्टि भी पड़ रही 
है, जिससे जातक को व्यवसाय में अत्यन्त कठिनाईयों एवं विघ्न/बाधाओं के बाद धन लाभ हो पाते हैं। . 

मंगल को चतुर्थ भाव पर उच्च दृष्टि पड़ने से भूमि जायदाद सम्बन्धी कार्यो द्वारा विशेष लाभान्वित होने के संकेत हैं । 
वर्तमान काल में जातक एक मैरिज पैलिस का भी निर्माण कर रहा है । जोकि मंगल की उच्च दृष्टि के प्रभाव का द्योतक 
है। " 

कालसर्प योग- सभी ग्रह राहु केतु मध्य संचरित होने जातक को आशानुकूल लाभप्राप्त नहीं हो पाते तथा 
व्यवसाय में अत्यन्त संघर्षपूर्ण परिस्थितियों का सामना रहता है। 


ज्योतिष तत्त्व ( फलित ) ह कक 4] 
जन्‍म मरे कर्ण बोग मरे पीड़ित एक जातंक 
प्रस्तुत जन्म कुण्डली एक ऐसे जातक की है, जो अपने माता-पिता का अकेला लड़का. कुण्डलीसंख्यानं, 62. . 
है। यह स्वयं ऊंचे कद वाला, गौर वर्ण, आकर्षक एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व वाला, अनु ३, क्मेड पर 
सरकारी बैंक में ऊंचे पद पर कार्यरत है। इसकी एक बड़ी बहिन भी है जो कि विवाहिता।त्त्तह 
है । जातक जयपुर में निजी/पैतृक आवास में अपने माता-पिता के साथ रह रहा है। जातक? 2 


सुन्दर स्त्री, दो लड़के एवं भूमि वाहन आदि सुखों से सम्पन्न है । यह जातक बाल्यकाल से 
हक, 










ही कर्णरोग से पीड़ित होने से बहुत ऊंचा सुनता है। 
ज्यीतिषीय-अमीक्षा 
(१) कुण्डली में दूसरे भाव में चन्द्र-बुध का योग होने से जातक देखने में सुन्दर 
कार्यकुशल, अत्यन्त बुद्धिमान, हंसमुख, धार्मिक विचारों वाला, मधुरभाषी एवं सत्यप्रिय 
होता है तथा बैंकिंग, एकाऊंटस आदि कार्यों में दक्ष होता है। | 
(2) द्वितीय एवं सप्तमेश मंगल भाग्य स्थान में होने से विवाह के बाद जातक की पदोन्नति एवं पुत्रादि सुखों की प्राप्ति 
हुई। 
कर चतुर्थ भाव पर मंगल की उच्च दृष्टि होने से जातक भूमि, मकान, वाहन आदि सुखों से सम्पन्न हुआ है।.. _*: 
(3) तृतीय भाव में सूर्य-शनि परस्पर विरोधी ग्रह पड़े हैं, उनपर मंगल कौ शत्रु दृष्टि पड़ने से जातक कर्ण सम्बन्धी 
रोग से ग्रस्त हुआ है तंथा भ्रात्‌ सुख से भी वंचित हुआ है। 


प्रधान-मंत्री श्री अटल बिठाबी वांजपैयी 


वर्तमान विषम राजनीतिक एवं सामाजिक परिस्थितियों में सफल प्रधानमन्त्री श्री. कुण्डली संख्या नं. 63 
अटल बिहारी वाजपेयी जी की यथोपलब्ध जन्म तारीख एवं वर्ष और समय के अनुसार. बाय 
तुला लग्न उदित है। श्री वाजपेयी ने भारत के प्रधानमंत्री के तौर पर अपनी सहयोगी ह 
पार्टियों सहित 3 अक्तू. 999 ई० को दुबारा शपथ ग्रहण की, उस समय भारत वर्ष की 
राजनीतिक परिस्थितियां अत्यन्त असमंजसपूर्ण एवं विश्वुब्ध थीं। 

ज्योतिषीय समीक्षा-( ) श्री वाजपेयी जी की लग्न कुण्डली तुला. में शनि 
सर्वाधिक योग कारंक ग्रह होकरं लग्न भाव में उच्चस्थ होने से अत्यन्त-शुभ फलप्रद हुआ 
है । इसके फलस्वरूप जातक उच्च प्रतिष्ठित, न्यायप्रिय, नेतृत्व, भौतिक एवं आध्यात्मिक 
: गुणों से युक्त तथा राजा तुल्य सुख साधनों से सम्पन्न होता है। 

स्वोच्चे स्वकीय भवने क्षितिपाल तुल्यो 
लग्ने$र्कजे भवति देशपुरंधिनाथ :॥ फलदीपिका 

(2) इसके अतिरिक्त केन्द्र-त्रिकोणेश शनि उच्च राशिस्थ होकर केन्द्र में स्थित होने से शशक योग भी बनता हैं। 
जिसके प्रभावस्वरूप जातक उच्चप्रतिष्ठित, प्रभावशाली व्यक्तित्व, उच्च पदाधिकारी (अधनीस्थ अनेक कर्मचारियों से 
युक्त), अन्य लोगों द्वारा प्रशंसित होता है- 

| शस्त:सर्वजनै: सुभृत्य बलवान-ग्रामाधिपो वा नृपो ॥ 

ऐसा जातक तीव्र बुद्धिमान, भ्रमणशील, वाद-विवाद करने में कुशल और विनोद प्रिय, अनेक गुणों से समन्वित, उदार 


श्रेष्ठ एवं दीर्घायु होता है- 














भूपो व सचिवों वनाचलरत: सेनापति क्रू रधी- 
धातो वादविनोद वंचनपरो दाता सरोषेक्षण:॥ (जातक पारि.) 





42 । ज्योतिष तत्त्व ( फलित ) 
..._ (3) चब्द्र-शुक्र योग- श्री वाजपेयी जी की. कुण्डली में द्वितीय भाव में लग्नेश एवं कर्मेश (राजनीतिक क्षेत्र) का 
योग होने से राजनैतिक सफलता के साथ-साथ जातक को ईमानदार, विद्वान, हंसमुख, विनोदप्रिय, सरल एवं संवेदनशील, 

वाक्पटु, कविहदय, लोकप्रिय, कुशल भाषणशैली, लेखन एवं ललित-कलाओं के प्रति विशेष लगाव आदि गुण प्रदान 
करता है। 

(4) तृतीय भाव पर सूर्य, गुरु एवं बुध ग्रहों का योग हो तो जातक स्वावलम्बी, विद्वान, पराक्रमी, अनेक विद्या को 
जानने वाला, भाषण एवं वाक कला में पटु, सम्पन्न, सुशील एवं तेजस्वी होता है। परन्तु आंखों में कष्ट रहता है। 

(5) दशम भाव पर गुरु की उच्च दृष्टि पड़ने से जातक राजनीति के क्षेत्र में शीर्षस्थ स्थान प्राप्त हुआ है। 

(6) मंगल सप्तमेश होकर अपनी राशि से द्वादशस्थ अर्थात्‌ घटे भाव में होने से जातक को वैवाहिक एवं गृहस्थ सुखों 
से वंचित होना पड़ा। इसके अतिरिक्त सप्तम भाव पर शनि की नीच दृष्टि भी विवाह सुख में हानिकारक हुई है। 

(7) दशमस्थ राहु- गर्गाचार्य अनुसार दशमस्थ राहु जातक को उच्चाधिकारी, लोक समूहों में अग्रणी, बुद्धिमान, 
महा-मन्त्री, राजनीति में सफल एवं धन-सम्पदा आदि सुखों से समन्वित करता है। 

(8) वर्तमान काल में 20 फर. 2003 से 8-4-2005 तक गुरु मध्ये गुरु की अन्तर्दशा में मान/प्रतिष्ठा में और वृद्धि 
' होने के संकेत हैं । परन्तु राजनैतिक तथा स्वास्थ्य की दृष्टि से अशुभ होगा। 

(9) इसके अतिरिक्त श्री वाजपेयी का जन्म पंचम नवांश (कुम्भ) में जन्म होने से जातक प्रभावशाली व्यक्तित्व 
वाला, गम्भीर, चिन्तनशील, परोपकारी एवं प्रतिष्ठित होता है। 


बाष्ट्र पिता मठात्मां गांधी ----- 








सत्य और अहिंसा के परम-पुजारी तथा भारतवर्ष के स्वतन्त्रता आंदोलन के अग्रणी. कुण्डली संख्या नं. 64. 


राष्ट्र-पिता महात्मा गांधी के तेजस्वी एवं ओजस्वी , 2 अक्तू. 7869 ई० 
खूत वा कि जस्वी व्यक्तित्व से संसार के प्राय: पोरनंदर, प्रातः 7.45 &.!. 


सभी प्रबुद्ध लोग परिचित हैं । उन्होंने तात्कालीन शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य से लोहा लेने 
के लिए भारतीय जनमानस को एकता की रस्सी में पिरोकर सत्य और अहिंसा का दिव्य 
सन्देश प्रदान किया । उनकी यथोपलब्ध जन्म कुण्डली में कुछ विशेष महत्त्वपूर्ण ज्योतिषीय 
योग इस प्रकार से पाए जाते हैं- 

' ज्योतिषीय योग- 

(१) लग्न भाव में मंगल, बुध एवं शुक्र तीन ग्रहों का योग होने से जातक उत्साहशील, 
तेजस्वी, कुशलवक्ता, कृश शरीर एवं धनी होता है परन्तु इस योग पर गुरु की विशेष दृष्टि 
होने से यह योग और भी प्रशस्त हो गया है। इस योग का फल शास्त्रकारों ने इस प्रकार कहा है- 

वित्तान्वित: क्षीण कलेवरश्च वाचालता चंचलतासमेत :। 
धृष्ट: सदोत्साहपरो नर: स्यादेकत्र यातै: कविभौम सौम्यै:॥ 

(2) इस योग पर गुरु की दृष्टि के प्रभावस्वरूप गांधी जी सांसारिक सुखों से धनी न होकर बौद्धिक एवं . 
आध्यात्मिक दृष्टि से धनी एवं समृद्ध हुए। 

(3) चन्द्रमा पर गुरु को शुभ/पांचवी. दृष्टि पड़ने से भी जातक अनेक विषयों का ज्ञाता, सज्जनता एवं साधुता के 

_ कारण विख्यात्‌ राजा (या प्रशासनिक क्षेत्रों में) प्रधान पुरुष होता है- ' ' 
बहु श्रुत विस्तृत साधुवृत्तं कुर्यात्ञरं भूमिपते :प्रधानम्‌ | 
चन्द्रो मृगेन्द्रोपगतो$मरेन्द्रोपाध्याय दृष्टि: परिसूतिकाले॥ जा पा. 
(4) राशि स्वामी सूर्य द्वादशभाव में होने से जातक तीत्र बुद्धिमान, अन्वेषणशील, विख्यात, उच्चादर्श, आत्मबली 
तेजस्वी किन्तु आंखों में कष्ट रहने के संकेत हैं। .. ु क्‍ 
(5) दशम राहु-गर्गाचार्य के अनुसार ऐसा जातक लोक-समुदाय में अग्रणी, तीब्र बुद्धिमान, राजनीति क्षेत्र में सफल 
-एवं अपने उद्देश्य में तथा शत्रुओं का दमन करने में सफल होता है। - 








ज्योतिष तत्त्व ( फलित ) 43 


भागतीय क्रिकेट जगत के श्रेष्ठ म्ितागे-कपिलदेव >च्चऑचःा 
संलग्न जन्म कुण्डली भारतीय क्रिकेट (खेल) जगत के सर्वश्रेष्ठ ऑल राउण्डरों ._ कुण्डली संख्या नं. 65 


(४॥॥ [२०५१७७) में गिने जाते हैं। वह तेज आक्रामक बॉलिंग (30एक्‍8 ) के. उप्डीगढ़, इष्ट उ०> ४३ 


अतिरिक्त आक्रामक तेज बल्लेबाज के रूप में भी जाने जाते हैं। 
व्यक्तिगत तौर पर भी वह पराक्रमी, अदम्य साहसी एवं दिलेर व्यक्ति माने जाते हैं। | 
उनकी कुण्डली में निम्नलिखित ज्योतिषीय योग पाए जाते हैं- पे श 
ज्योतिष योग समीक्षा । 
() रुचक योग- श्री कफ्लि जी की कुण्डली में मंगल सर्वाधिक बली एवं 
योगकारक दिखता है। मंगल राशि-स्वामी होकर लग्न से केन्द्र स्थान में स्व॒राशिगत होने 
से रुचक योग बनता है। जिसके प्रभावस्वरूप जातक अत्यन्त साहसी, तेजस्वी, कुछ 
तेज स्वभाव, शत्रुओं पर विजय पाने वाला, कीर्तिमान और धनादि से सम्पन्न होता है। 
(2) जजकेसरी योग- दूसरे भाव में मंगल की राशि पर ही चन्द्र-गुरु का योग होने से गजकेसरी योग बनता है। 
नवांश कुण्डली में गुरु उच्च राशिस्थ एवं मंगल स्वराशि होने से इस योग के प्रभावस्वरूप जातक को वर्ल्ड-कप 
(५००१० 2०७) के सफल कप्तान तथा अन्य विभिन्न उपाधियों से अलंकृत हो चुके हैं। 
(3) मालव्य योग- कपिल जी की कुं. में शुक्र चतुर्थ भाव में स्वक्षेत्री होने से मालव्य योग भी बनता है। जिससे 
जातक अपने खेल के क्षेत्र में कुशल, गुणवान, तेजस्वी, धनी, स्त्री, परिवार एवं वाहन आदि सुखों से सम्पन्न हुआ है।, 
(4 ) तृतीय भाव में सूर्य, बुध एवं पंचमेश शनि सहित तीन ग्रही योग होने से जातक पराक्रमी, हिम्मती, स्वावलम्बी एवं ._ 
भाग्यशाली बनाता है। इसके अतिरिक्त भाग्य स्थान पर बुध की स्वगृही दृष्टि जातक को अपनी कलात्मक शैली में विशिष्टता . 
देती है। ध्यान रहे, सन्‌ 983 ई० में बुध की दशा में ही जातक ने अत्यन्त तीब्र प्रतिस्पर्धा में विजयी होकर भारत के लिए 
अद्वितीय गौरव एवं प्रतिष्ठा अर्जित की थी तथा इसी दशा में सर्वाधिक विकट (434) लेने का कीर्तिमान स्थापित किया। 
तदनन्तर भी विशेषकर 997 ई० के बाद शुक्र की दशा में भी अनेक उल्लेखनीय उपाधियों से अलंकृत हुए। 


विदेश गमन एवं कलठपूर्ण एवं दुब्वी वैवाठिक जीवन -: 














. संलग्न कुण्डली सांवले वर्ण की ऐसी जातिका की है, जिसका जन्म मई 967 ई० को. कुण्डली संख्यान. 66... 


जालन्धर में हुआ। कालेज शिक्षा के _ १8 मई, 4967 ई० 
ड दौरान ही वह अपने माता-पिता के साथ (4986 ई० जालन्धर इृष्ट २७४५० 


के प्रारंभ में) चन्द्र मध्ये राहु के अन्तर में विदेश (कैनेडा) गई तथा नव॑. 986 में पुनः 
भारत लौटकर एक इंजीनियर लड़के से विवाह हुआ। परन्तु विवाह से एक सप्ताह के 
भीतर दोनों में गंभीर रूप से झगड़े प्रारंभ हो गए, लड़की तो 987 के प्रारंभ (चन्द्र मध्ये 
गुर्वन्तर में ) पुनः विदेश चली गई, परन्तु झगड़ों के कारण लगभग दो वर्ष तक लड़का नहीं 
जा सका। अन्तत: नवं. 988 ई. को विदेश जा सका। 6.2.989 ई. को (चन्द्र मध्ये 
बुधांतर में) कन्या का जन्म हुआ। जि 

यद्यपि जातिका व उसका पति दोनों (00) करते हैं। इकट्ठे रहने के बावजूद न्स्न्न्न 
वैवाहिक सम्बन्ध में क्लेश एवं तनाव जारी है। प्रस्तुत कुण्डली में असुख बैवाहिक सम्बन्धों के निम्नलिखित ज्योतिषीय 
कारण होंगे- 

ज्योतिषीय समीक्षा: ह 

() लग्न भाव में केतु होने से जातिका का दुबला शरीर एवं सांवला वर्ण हुआ है। सप्तम भाव में राहु कीं स्थिति होना 
तथा सप्तमेश मंगल द्वादश भाव में होकर शनि द्वारा दृष्ट है, जिससे विवाह सुख में विघ्न/बाधाएँ पड़ना सांकेतिक है। 

(2) सप्तम भाव पाप ग्रहों (शनि एवं सूर्य) से आक्रान्त होने से भी विवाह सुख में कमी रही। क्‍ 

(3) पतिकारक गुरु उच्चस्थ होकर केन्द्र में स्थित होने से हंस योग बन रहा-है। जिसके फलस्वरूप जातिका 











44 ह ज्योतिष तत्त्त ( फलित) ४ 
परिश्रमी,हुगुणी, धार्मिक विचारों वाली, धैर्यशालिनी तथा कठिन परिस्थितियों में भी स्वयं को ढाल लेने वाली हुई है। ' 
इसके अतिरिक्त सप्तम भाव पर मंगल की स्वगृही दृष्टि होने से विवाह सम्बन्ध टूटते-टूटते बच गया है। ' 
उ--"("/”"/'"5 विश्ववस्लुन्दबी ऐच्वर्यगाय: एक टइफल ऐक्ट्रैल >्व््््य्, 

संलग्न कुण्डली विश्व सुन्दरी ऐश्वर्य राय की है, जो अब सफलतम ऐक्ट्रेस (म&0०॥75) कुण्डली संख्या नं. 67 
में गिनी जाती हैं । इसका जन्म तुला लग्न एवं तुला के ही नवांश में हुआ है। जिससे इसको... शा कब का 
ईश्वर कृपावश अत्यन्त सुन्दर रूप एवं लावण्य प्राप्त हुआ है। 

(१) तुला का वर्गोत्तम लग्न होने से इनमें तुला लग्नोचित विशिष्ट गुणों का समावेश 
हुआ है। इस योग के प्रभावस्वरूप जातिका का सुन्दर गौर वर्ण, सुन्दर एवं आकर्षक 
नयन-नक्श, हंसमुख, सहज-मुस्कान लिए, कुशाग्र बुद्धि, व्यवहार कुशल, विशाल नेत्र, 
अधिकांश लोगों द्वारा प्रशंसित, लम्बा मुख, भूमि जायदाद, धनांदि सम्पदा से सम्पन्न, नए- 
नए कार्य/व्यवसाय (अर्थात्‌ अभिनय के क्षेत्र) में नए-नए रोल करने में कुशल और 
प्रसिद्ध होती हैं- 





गौरो विशाल नेत्र: श्लाघी दीर्घाननोडर्थगोप्ता स्यात-। 
नवपण्यकर्म कुशलस्तुला धराचद्यैशज: सुविख्यात :॥ | ै 
(2) चन्द्र-शुक्र योग- तृतीय भांव में लग्नेश शुक्र एवं कार्येश चन्द्र का योग होने से जातिका को अभिनय, नृत्य, 
संगीत, मनोरँजन॑ आदि कलाओं के क्षेत्र में विशेष निपुणता प्रदान करता है। 
(3) तृतीय भाव पर योगकारक शनि की दृष्टि होने से जातिका उच्चशिक्षित, व्यवहार कुशल, भूमि, जायदाद वाहन: 
तथा भाई/बन्धुओं के सुख से सम्पन्न होगी। .- | द 
(4) सप्तम भाव (केन्द्र) में स्वगृही मंगल होने से रुचक योग भी बना है, जिसके फलस्वरूप जातिका अत्यन्त 
साहसी, तेजस्वी, शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाली, धन-धान्य एवं सुख साधनों से सम्पन्न हुई है। तथा अनेक 
प्रतियोगिताएं जीतकर अपने क्षेत्र में उच्चतम शिखर पर पहुंची है। ध्यान रहे, गत पृष्ठों पर दी गई श्री कपिलदेव की 
कुण्डली में भी यह योग प्रमुख है। | ॒ 
(5) ज्ञातव्य रहे, कि चन्द्र मध्ये बुध ( भाग्येश) की अन्तरदशा (नवंबर 994 ई.) में इन्होंने विश्व सुन्दरी का ताज 
ग्रहण किया तथा चन्द्र मध्ये शुक्र की अन्तर्दशा (अप्रैल 996 ई.) से इन्होंने फिल्मों में प्रवेश किया। 
(6) वर्तमान काल मंगल की दशा (१5 मार्च 998 ई.) से चल रही है, जो कि मार्च 2005 ई. तक चलेगी। ग्रह 
योगानुसार यह ग्रहदशा सामान्यत: विशेष सफल एवं अभिनय के अतिरिक्त निर्देशन आदि क्षेत्रों में भी सफल होगी। 
>->-- एक उच्च प्रतिष्ठित एवं अफल प्रिंसीपल 
| | (उद्घाठवण-वर्गोत्तम नवांधा) द 
- संलग्न जन्म कुण्डली एक उच्च-शिक्षित एवं उच्चप्रतिष्ठित प्रिंसीपल की है। इनका. कुण्डलीसंख्यानं, 68... 
जन्म तुला लंग्न कालीन, तुला के प्रथम नवांश में होने से वर्गोत्तम लग्न हुआ है। जिसके ५ ५, पे 
फलस्वरूप जातिका का प्रभावशाली व्यक्तित्व, गौर वर्ण, बड़ा चेहरा, गुप्त सुरक्षित धन, [सर ्त्तत5 5 
नए-नए प्रयोगात्मक कृत्य करने में कुशल एवं लोक प्रसिद्धि होती है- 
नवपण्यकर्म कुशल स्तुला श्वराच्यैशज: सुविख्यात :॥ 
इसके अतिरिक्त ऐसी जातिका विनम्र स्वभाव, .सत्यनिष्ठ, गुणी, धर्म व मर्यादा का 
पालन करने वाली, विद्याध्यन एवं गूढ़ विद्याओं में रुचि रखने वाली होती है- 


विनीत धर्मशीलश्च सत्यवादी दृढ़ व्रत:। विद्या व्यसनीशीलश्च जायते प्रथमांशके ॥ 











ज्योतिष तत्त्व ( फलित ) ु । | | 45 
कुछ अन्य ज्योतिषीय कारण : | | कप 
ज्योतिषीय योग- इसके अतिरिक्त पंचम भाव में बुध की स्थिति तथा तृतीय भाव में स्वगृही गुरु एवं उसकी सप्तम 

भावस्थ चन्द्र पर शुभ दृष्टि होने से जातिका तीव्र बुद्धिमान, विश्लेषणात्मक प्रकृति, परिश्रमी, भ्रातृ्‌ सुख युक्त होगी | चतुर्थ 

भाव पर मंगल/शनि की दृष्टि जातिका को भूमि, जायदाद, वाहन आदि सुखों से सम्पन्न करती है। सप्तम भाव में राहु- 
चन्द्र का अशुभ योग होना एवं सप्तमेश मंगल का नीच राशि में होकर शनि के प्रभाव में आना तथा शनि द्वारा सप्तम भाव 
पर नीच राशिस्थ दृष्टि पड़ने से जातिकां का वैवाहिक जीवन सफल नहीं हो सका। 973 ई० में सूर्य मध्ये शुक्र की 
उपदशा में जातिका प्राध्यापिका तौर पर नियुक्त हुई। जातिका का विवाह चन्द्र मध्ये मंगल की भुक्ति में सितं. 974 में 

हुआ तथा चन्द्र मध्ये राहु की अन्तर्दशा में जुलाई 975 में विवाह सम्बन्ध विच्छेद हो गया। राहु की अंतरदशा (4/6/ 

975 से 3/2/76 तक) अत्यन्त अशुभ रही। 977 ई० में चन्द्र मध्ये गुरु की अन्तर्दशा में इन्होंने डाक्टरेट (पी. एच. 

डी.) की उपाधि प्राप्त की तथा उसी वर्ष एक प्रतिष्ठित महाविद्यालय में प्रिंसीपल नियुक्त हुईं। वर्तमान काल में इसी पद 

पर सफलतापूर्वक कार्यरत हैं। द | 


तु 





एक मेधावी उच्च प्रतिष्ठित डाक्टब >स्‍य 
प्रस्तुत जन्म कुण्डली एक कुशाग्र बुद्धि, परिश्रमी एवं मेधावी डाक्टर लड़की की है।. कुण्डली संख्या नं. 69 
इनके पिता कैमीकल'से सम्बन्धित व्यवसाय में संलग्न हैं | माता घरेलू एवं धार्मिक स्त्री है जता अप 


में | हस्त ( ३), 0.30 प्रात: जालन्धर 
है । यह कन्या मैडीकल क्षेत्र में उच्चत्तम विद्या (/.70.) प्राप्त करके विशेषज्ञ डाक्टर से ्चचचचच्न्त्चज्ज्नज्न्ञो 


विवाहित होकर विदेश (७0709) में $०0०० है। अपने शैक्षणिक काल में यह स्कूल 
काल से लेकर |(.3.3.5$. तक सारे राज्य में सर्वप्रथम (श्रेष्ठ) स्थान प्राप्त करती रही 
हैं । हालांकि इस लड़की के माता-पिता दोनों चिकित्तसा के क्षेत्र में नहीं हैं। 

प्रमुख ज्योतिषीय योग- () इनकी जन्म कुण्डली में चंद्र, मंगल, बुध एवं शुक्र 
ग्रहों का चारग्रही योग बना हुआ है तथा उन पर गुरु की विशेष पंचम दृष्टि पड़ रही है, 
जो जातिका को विद्या के क्षेत्र में विशिष्ट स्थान प्रदान करती है। यद्यपि चन्द्र लग्न से 
यह कुं. विशेष सशक्त बनती है। जी | हे ली आय 
(2) अनुभव में यही आया है कि जब भी कुण्डली में गुरु-मंगल, मंगल-चन्द्र, सूर्य-गुरु , गुरु-शुक्र आदि ग्रहों का 

योग या दृष्टि सम्बन्ध बनता हो तो जातक को चिकित्स के क्षेत्र में अच्छी सफलता प्राप्त होती है| प्रस्तुत कुण्डली में 

मंगल व चन्द्र दोनों पर गुरु की विशेष शुभ दृष्टि पड़ रही है। . * ह 

(3) कुण्डली में सप्तमेश मंगल कर्मेश चन्द्र एवं भागयेश बुध व लग्नेश शुक्र द्वादश भाव में सम्बन्ध होने से जातिका 
शादी के बाद विदेश (अमेरिका) में (5७४००) एवं वहीं विशेष भाग्योदय हुआ | इसका विवाह बहुत विप्तों के बाद राहु 
मध्ये शुक्र की अन्तर्दशा (मार्च, 200। ई०) को हुआ था। 
ं---यक:इकसि:यझ:------ एक अन्य उच्च शिक्षित डाक्टन 

संलग्न कुण्डली एक उच्च प्रशिक्षित ]४.70. करती हुई डाक्टर की है। शुक्र मध्ये बुध ऊुं. संख्या नं. 70 
की भुक्ति में इसका विवाह डाक्टर फैमिली में ही दिल्ली में हुआ है। इनकी कुण्डली में. पुआशहई ८८३५ 
गुरु-मंगल का सम्बन्ध सप्तम भाव में होने से विवाह के पश्चात्‌ डाक्टर फैमिली से हु 
सम्बन्ध होने के स्पष्ट संकेत हैं । इसके अतिरिक्त भाग्य स्थान में शनि-बुध का योग, चन्द्र। ५ 
पर मंगल कौ दृष्टि तथा तृतीय भाव पर गुरु की स्वगृही दृष्टि तथा नवांश में शनि व गुरु 
दोनों की वर्गोत्तम स्थिति होने से जातिका को मैडीकल क्षेत्र में सफल करता है। 













46 ज्योतिष तत्त्व ( फलित ) 


उच्च प्रतिष्ठित तेल उद्योगपति 


संलग्न कुण्डली तैल एवं पैट्रोलियम के उच्च स्तरीय क्रय-विक्रय से जुड़े उद्योगपति. कुण्डली संख्या नं. 77 
25 अक्तू. 4952, पूषा 


की है | दशम भाव पर मारकेश मंगल की नीच दृष्टि एवं केतु की स्थिति होना तथा लग्न 
में नीच राशिगत सूर्य होने से पिता के सुख में कमी रही तथा आंखों में कष्ट एवं नेत्रों को [रक्त 
चश्में लगे हैं | तृतीय भाव में मंगल व चन्द्र होने से एक छोटा भाई व एक बहिन का सुख 
हुआ। इनकी प्रथम दो सनन्‍्तान कनन्‍्याएँ तथा तृतीय संतान पुत्र है। इस कुण्डली में द्वितीय 
भाव में बुध-शुक्र का योग तथा उस पर शनि की दृष्टि होने से जातक तथा उसके छोटे 
भाई, दोनों ने मिलकर पैंट्रोलियम पदार्थ तथा तैलादि से सम्बन्धित वस्तुओं से अच्छा लाभ 
उठाया तथा एक से अधिक साधनों द्वारा धन लाभ होते हैं। 

तृतीयस्थ चन्द्र-मंगल के योग पर गुरु की शुभ दृष्टि होने से जातक कर्म, उद्योगी 
एवं पराक्रमशील है । शनि द्वादशस्थ होने से वस्त्रादि का निर्यात 2४90 भी करते हैं । 


एक कर्मकाण्डी ऊफल ज्योतिषी 


संलग्न कुण्डली एक कर्मकाण्ड कुशल एवं सफल ज्योतिषी जी की है। जन्म लग्न कुण्डली संख्या नं. 72 
एवं चन्द्र लग्न समान होने से तुला लग्न राशि बलान्वित हुआ है । इन्होंने 24वें वर्ष गुरु की 222 जी 0 
महादशा एवं गुरु भुक्ति में जि. ऊना (हिमाचल) से शास्त्री की तथा गुरु मध्ये शन्यन्तर "7-7 -++ 
कालीन 26वें वर्ष विवाह हुआ | कुछ वर्ष प्राईवेट सर्विस की, परन्तु 27 अप्रै. 997 से प्रा. 
(शनि की दशा में ) स्वतन्त्र रूप व्यवसाय से अच्छा नाम व धन अर्जित किया। मई, 2000 
ई. से निजी मकान, जायदाद तथा शनि की दशा में ही पुत्र/पुत्री आदि सन्‍्तान सुख प्राप्त 
हुए। इनकी कुण्डली में निम्न ग्रह योग विशेष उल्लेखनीय हैं- 

(१) सूर्य-बुध- भाग्य स्थान में होने से बुधादित्य योग एवं भाग्यशाली योग विशेष 
प्रशस्त हुआ है | बुध के अन्तर में इन्हें विशेष धन लाभ प्राप्त हुए हैं। 

(2) शनि- गुरु- चतुर्थ (केन्द्र) भाव में होने से शशक योग भी बनता है जिसके फलस्वरूप जातक बुद्धिमान 
पहाड़ों में रहने वाला, मंत्र-तंत्र, ज्योतिष आदि में रुचि, क्रुद्ध होने वाला स्वभाव, भूमि, वाहन, सन्‍्तान आदि सुखों से युक्त, 
मध्यम शरीर, दूसरों की सम्पत्ति का उपयोग करने वाला, मात्‌ का आदर करने वाला एवं स्त्रियों की संगति में प्रसन्न रहने 
वाला होता है। 

(3) लग्न भाव पर शनि की उच्च दृष्टि होने से जातक दूरंदेशी, उच्चभिलाषी, परिश्रमी तथा दूसरे को मनोभावों को 
शांष्र जान लेने में कुशल ज्योतिषी होता है। 

(4) धन भाव पर मंगल की स्वगृही दृष्टि होनें से जातक धन/धान्य एवं कौटुम्बिक सुखों से युक्त हुआ है। 
उप पपत5८८्+ क्रिकेट मम्राट-अचिन तेंदुलकक 


; क्रिकेट जगत में उभवता म्िताबा 
लोकप्रिय क्रिकेट खेल के जगत में अल्पायु में ही नए-नए कीर्तिमान स्थापित करने उदा. कुण्डली नं. 73 
वाले क्रिकेट खिलाड़ी सचिन तेन्दुलकर का जन्म 24 अप्रैल 973 ईं० को साय॑ लगभग 7 2 उप ल, 973 ई० 











द्वारा क्रिकेट के खेल जगत में अनेक राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय कीर्तिमान स्थापित किए जा 
चुके हैं | जिससे विश्व-क्रिकेट मंच पर उनका नाम भारत में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनियां में 
बड़े आदर के साथ लिया जाता है। उन्होंने खेल जगत में अपने अद्वितीय कीर्तिमानों से 
केवल अपना नाम ही नहीं, बल्कि समस्त भारत का नाम उज्जवल किया है। उनकी जन्म 








| 


ज्योतिष तत्त्व ( फलित ) 7 
कुण्डली में कुछ प्रमुख ज्योतिषीय योग इस प्रकार से उपलब्ध होते हैं- 

(१) तुला लग्न में लग्नेश शुक्र सप्तम भाव में उच्चस्थ लाभेश सूर्य के साथ होकर लग्न को स्वराशि दृष्टि से देख रहा है। 
जिससे जातक आकर्षक व्यक्तित्व एवं सुन्दर वर्ण वाला परन्तु सूर्य की नीच दृष्टि होने से कुछ छोटे कद वाला हुआ है। 

(2) तेन्दुलकर की कुण्डली में मंगल चतुर्थ स्थान उच्च राशि (मकर) का होने से रूचक योग बना है। जोकि पंच 
महापुरुष योगों में से एक है। ऐसा जातक अत्यन्त साहसी, शूरवीर, धनवान, कीर्तिमान एवं शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने. 
वाला अर्थात्‌ परास्त करने वाला होता है। ऐसा जातक खेलादि कला के क्षेत्र में अत्यन्त कुशल एवं प्रसिद्ध होता है। 

(3) चन्द्रमा से द्वितीय स्थान से मंगल-गुरु होने .से सुनफा योग बनता है जिसके फलस्वरूप जातक अत्यन्त : 
पराक्रमी तथा अपने पराक्रम से चमत्कृत काम करने वाला, उच्चप्रतिष्ठित, धन, धान्य, भूमि, वाहन आदि सुखों से सम्पन्न 
होता है। 

(4) पारिजात योण- जन्म कुण्डली में लग्नेश शुक्र की राशि (मेष) का स्वामी उच्च राशि में होकर केन्द्र/त्रिकोण. 
में हो, तो पारिजात योग बनता है| जिसके प्रभावस्वरूप जातक अपने कार्य क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ, अग्रणी एवं विश्व विख्यात 
होता है| तेन्दुलकर की कुं. में मंगल उच्चस्थ होकर केन्द्रगत है। 

(5) नवांश कुण्डली में कार्येश चन्द्र धनु राशिस्थ होने से वर्गोत्तम स्थिति में हुआ है, जिससे चन्द्र-मंगल की दशा 
अन्तर्दशाओं में ही जातक को खेल जगत में तथा भारत सरकार की श्रेष्ठ (अर्जुन पुरस्कारादि) उपाधियों से सम्मानित 
किया ज़ा चुका है। 

(6) कुण्डली में लाभेश सूर्य उच्चस्थ एवं भाव कुंडली में चन्द्र का चतुर्थ स्थान में मंगल-गुरु के साथ योग होने से 
जातक उल्लेखनीय उपाधियों विशेष प्रतिष्ठा एवं धन संम्प्दा से समान्वित हुआ है। 


सर का बा 4 4 
अर्द्धशवाब्दि पंचांग '' 
(गत्‌ 50 वर्षों में उत्पन्न किसी भी जातक की जन्मपत्री मिनटों में बनाएँ) 


० पं.देवी दयालु ज्योतिष संस्थान, जालन्धर द्वारा गत वर्षों के पंचांगों को (सन्‌ / 944 से सन्‌ «» 

» [/993-94 ई. तक अथात्‌ संकवत्‌ 200/ से 2050 व्रकं) एक ही वृहद्‌ पुस्तक में « 

» संकलित कर दिया गया है | दैनिक ग्रह स्पष्ट सहितं इस वृहदाकार पुस्तक में ग्रहों के राशि प्रवेश « 

० घंटा मिंटों में, दैनिक सूर्योदयास्त, नक्षत्र, तिथि, योग, कंरणादि दे दिए गए हैं। भारत के प्रसिद्ध ९ 

* नगरों के अक्षांश-रेखांश के अतिरिक्त प्रमुख विदेशी नगरों के अक्षांश-रेखांश भी दिए गए हैं।*९ 
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मूल्य 600 रुपये + 40 रुपये - 640 रुपये का मनीआर्डर भेजकर रजिस्टर्ड पैकेट द्वारा पुस्तक मंगवाएँ। 
दशवर्षीय पंचांग- (दैनिक ग्रह स्पष्ट सहित)-सन्‌ 994 ई. से 2004 ई. तक का 

दशवर्षीय पंचांग भी छपकर तैयार है | मूल्य- 60 रू 


डाक द्वारा पुस्तक मंगवाने का पता- <छु2457959 
जनरल बुक डिपो, अड्डा होशियारपुर, जालन्धर-44008 








48 क्‍ | ज्योतिष तत्त्व ( फलित) 


( ता, ना, नी, नू, ने, नो, या, यी, यू, ) 
(जिस व्यक्ति के पास अपने जन्म की तारीख, वार, समयादि का विवरण नही हैं - 
वह अपने नाम के प्रथमाक्षर के अनुसार अपनी राशि का निर्धारण कर सकते हैं।) 
ब्रश्चिकोदय संज़ातः थौर्यवान्‌ धनवान युधी: 
कुलमध्ये प्रधानश्च विवेकी सर्वपोषक: ॥ 
असन्तुष्टो नृपेः पूज्यों विध्नकतन्य कर्माणि। 
शुभकक्षणसंयुक्तो गुप्तपापश्च विक्रमी॥ 
अर्थात्‌ बृश्चिक लग्न में जन्म लेने वाला जातक शूरवीर, बुद्धिमान, धनवान, विवेकशील, कुल में श्रेष्ठ एवं 
परिवार का पालन करने वाला होता है। ऐसे जातक उच्च प्रतिष्ठित लोगों से सम्मानित होते हुए भी अपने तथा 
अन्य लोगों के कामों में विघ्न उठाने वाले, प्रत्यक्षत: शुभ लक्षणों से युक्त और पराक्रमी होने पर भी गुप्त रूप में 
पाप आचरण वाले होते हैं । 
बुश्चिक राशिचक्र की आठवीं राशि है। भचक्र में इसका विस्तार 20" से 240" अंश तक है। इसके बीच पड़ने 
वाले नक्षत्र/ताराओं का आकार बिच्छु जैसा दिखता है। इस राशि का स्वामी मंगल ग्रह है। कालपुरुष में इस राशि का 
सम्बन्ध मूत्रेन्द्रिय, गुदा, गुप्तांग, जननेन्द्रिय एवं पेट से नीचे का भाग है । इस राशि के अन्तर्गत विशाखा नक्षत्र का प्रथम 
चरण (तो), अनुराधा के चारों चरण (ना, नी, नू, ने) तथा ज्येष्ठा के चार चरण (नो, या, यी, यू, ) पड़ते हैं । किसी 
जातक के जन्म कालीन चन्द्रमा जिस नक्षत्र/चरण पर होता है, भारतीय परम्परानुसार तदनुसार ही उसका नामकरण 
किया जाता है क्योंकि लग्न के अतिरिक्त नाम राशि, नक्षत्र एवं उसके स्वामी ग्रह का भी जातक के व्यक्तित्व एवं जीवन 
पर विशेष प्रभाव पड़ता है | जैसे विशाखा नक्षत्र का स्वामी गुरु, अनुराधा का शनि तथा ज्येष्टा नक्षत्र का स्वामी बुध होता 
है, तो किसी जातक का जन्म जिस नक्षत्र में होगा, तो उस जातक के जन्म लग्न एवं लग्नेश के अतिरिक्त नक्षत्र स्वामी 
अह का प्रभाव भी लक्षित होगा। आगामी पृष्ठों पर यद्यपि जातक के जन्म लग्न में स्थित ग्रहों के अनुसार फलादेश का 
विवेचन किया गया है तथापि जातक के लग्न स्फुट (स्पष्ट) के आधार पर निर्मित द्रेष्काण, त्रिशांश, नवांश आदि 
कुण्डलियों का भी अध्ययन करने के बाद ही जातक के भविष्य के सम्बन्ध में अन्तिम निर्णय करना चाहिए। जैसे 
किसी जातक के व्यक्तित्व बारे में जानकारी प्राप्त करनी हो तो जन्म कुण्डली में लग्न, राशि, लग्नेश एवं केन्द्रादि में 
बलवान ग्रह के अनुसार शरीर संरचना होती है। इसके अतिरिक्त नवांश कुण्डली के स्वामी के सदृश शरीर रचना होती 
है। चन्द्र जिस नवांश में हों, उस नवांशपति के सदृश शरीर का गौर आदि वर्ण होता है। भट्टोत्पल अनुसार चन्द्र जिस 
राशि में हो, उस राशि के समान वर्ण (रंग) होता है। ः 
' चन्द्रमा बुश्चिक राशि में नीचस्थ माना जाता है । विशेषकर इस राशि के 3" अंश पर परमनीच तथा वृष के 3* अंश 
पर परमोच्च माना जाता है। यद्यपि केतु इस राशि में उच्चस्थ माना जाता है। ग्रह-मैत्री चक्रानुसार सूर्य, चन्द्र व.गुरु के 
लिए यह मित्र राशि है। शुक्र और शनि के लिए यह सम राशि, तथा बुध व राहु के लिए शत्रुराशि मानी जाती है। 
बृश्चिक राशि के अन्य पर्टायवाची नाम- द्विरिफ, मधुकर, अख्नर, सरिसृत, कीट, अलि, सविष 
आदि। अंग्रेजी में इसे 'सकोर्पियो' (52070) कहते हैं। 
बृश्चिक राशि जल तत्त्व प्रधान, दीर्घ एवं शीर्षोदयी संज्ञक, स्थिर स्वभाव, दिवाबली, सम एवं स्त्री राशि, मूल संज्ञा 
ब्राह्मण जाति किन्तु तमोगुणी प्रकृति, वश्य कौट संज्ञक, बिच्छु के रामान आकृति वाली, सौम्य परन्तु कफ प्रकृति वाली 





बश्चिक लग्नमेंयोगकारक ग्रह _ _ _३_॒_[_[_॒_॒_॒_॒_॒___ ॒ ॒_ “॒ ॒“ 9७ख।॥#झ 49 
राशि है। जलीय राशि होने से बृश्चिक राशि वाले जातकों का वृष, कर्क, कन्या, मकर एवं मीन राशि के जातकों के 
साथ मैत्री सम्बन्ध अच्छे निभ जाते हैं। | |. “ “*“॥ ह 

स्वाभाविक गुण- निर्भीक, परिश्रमी, साहसी, मितव्ययी एवं दृढ़निश्चयी किन्तु स्वेच्छाचारी प्रकृति के होते हैं। 
ऐसा जातक स्पष्टवादी, स्वाभिमानी, व्यवहार कुशल, दृढ़ संकल्पशक्ति वाला और अपने पुरुषार्थ द्वारा जीवन में उन्नति 
करने वाला होता है। 


सूर्य बुश्चिक राशि पर मार्गशीर्ष मास (नवंबर-दिसम्बर) में लमभग 5 नवंबर से 5 दिसम्बर के मध्य प्रति वर्ष 
. संचार करता है। 


बृश्चिक लग्न में शुभाशुभ एवं योगकारक ग्रह 


बृश्चिक लग्न कुण्डली में सूर्य व चन्द्र दोनों ग्रह राजयोग कारक होते हैं। इसके 
अतिरिक्त गुरु भी द्वितीयेश व पंचमेश होने से विशेष शुभ एवं योगकारक होता है। 

मंगल लग्नेश व षष्ठेश होने से मिश्रित प्रभाव करेगा, जबकि शनि ब बुध दोनों 
इस कुण्डली में प्रायः अशुभ फलप्रदायक माने जाते हैं। परन्तु हमारे अनुभवानुसार 
यह दोनों ग्रह स्थान व स्थिति के अनुसार शुभाशुभ फल करेंगे। राहु व केतु भी स्थान 
व अन्य ग्रहों के योग व दृष्टि अनुसार शुभाशुभ फल प्रदान करते हैं। 











शारीरिक गठन- बृश्चिक लग्न/राशि का स्वामी मंगल है। कुण्डली में यदि मंगल शुभ भावस्थ या शुभ ग्रह से 

दृष्ट हो तो जातक देखने में सुन्दर आकृति, गेहुंआं रंग, पुष्ट एवं सुगठित शरीर तथा आकर्षक व्यक्तित्व का स्वामी होगा। 
आंखें चमकीली, बड़ी एवं कुछ लालिमा लिए हुए तथा कद सामान्य एवं लम्बा और जांघें व पिंडलियां गोल होती हैं। 
बृश्चिक जातक का चेहरा कुछ बड़ा एवं तेजस्वी, हाथ प्राय: सामान्य से अधिक लम्बे होंगे। जातक चलने में तेज गति,. 
चुस्त एवं सतर्क होगा। , ह ्ि | 
चारित्रिक विशेषताएं एवं स्वभाव- बृश्चिक लग्न में उत्पन्न जातक पराक्रमी, कुशाग्र बुद्धि, साहसी, 
परिश्रमी, स्पष्टवक्ता, उदारहदय, उद्यमी एवं पुरुषार्थी होता है। ऐसा जातक सत्यप्रिय, ईमानदार परन्तु अपने उद्देश्य के 
प्रति सतर्क, संवेदनशील व आक्रामक प्रवृत्ति तथा अपने उद्यम एवं सामर्थ्य के बल पर ही जीवन में लाभ व उन्नति प्राप्त" 
करने वाला होता है। जातक कर्त्तव्यनिष्ठ, माता-पिता, भाई-बन्धुओं एवं अपने परिवार से विशेष प्रेम करने वाला होता है । 
बृश्चिक लग्न/राशि का स्वामी मंगल अग्नि राशि एवं स्थिर संज्ञक होने से जातक स्वाभिमानी, उच्चाभिलाषी, थैर्यवान, 
स्वेच्छाचारी, उच्च प्रतिष्ठित एवं निश्चयी प्रकृति का होता है। यदि कुण्डली में मंगल, गुरु एवं सूर्य शुभस्थ हों तो जातक 
की संकल्पशक्ति एवं आत्मिक शक्ति विशेष प्रबल होती है। जातक श्रेष्ठ एवं चतुर बुद्धि, न्‍्यायप्रिय, आत्मविश्वासी, मन 
में जिस किसी कार्य-विशेष का संकल्प कर ले, उसे पूरा किए बिना चैन से नहीं बैठता। ऐसा जातक धर्मपरायण, 
परोपकारी, दयालु, निडर, स्वतन्त्र चिन्तन करने वाला परन्तु कई बार अपने क्रोध या स्वाभिमान के कारण जिद्द एवं हठ 
पर अडिग रहने से हानि उठाने वाला होता है। विलक्षण प्रतिभा के कारण सरलता से किसी अन्य व्यक्ति के प्रभाव के वश 
में नहीं आता। अपनी रूचियों एवं अरूचियों (पसन्द, नापसन्द) के सम्बन्ध में भी शीघ्रता से समझौता नहीं करते । यद्यपि 
बृश्चिक जातक जल तत्त्व की राशि होने से जातक कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी स्वयं को ढाल लेने में सक्षम होते 
+ हैं। सूक्ष्म बुद्धि होने के कारण बृश्चिक जातक रहस्यात्मक एवं गूढ़ विद्याओं जैसे धर्म, आध्यात्म, ज्योतिष, साहित्यिक, 
पौराणिक एवं काम शास्त्र में भी विशेष रूचि रखते हैं। जातक विलास प्रिय, कामुक प्रवृत्ति एवं विपरीत योनि के 








50 _ _ _ ___ __ ___[_॒_॒_॒_॒_॒_॒_ वृश्चिक लग्न-सामान्य विशेषताएं! 
(097०थं० $७:) प्रति भी विशेष आकर्षण रखते हैं। है 

बृश्चिक जातक प्राय: सभी कार्य बड़े आत्म विश्वास के साथ करते हैं। इनका उत्साह एवं परिश्रम लक्ष्य प्राप्ति? 
सहायक बनते हैं। ये सब प्रकार की कठिनाइयों का सामना करने के लिए सदा तैयार बने रहते हैं तथा उन पर विजय भी/ 


हि 
















प्राप्त कर लेते हैं | कुण्डली में मंगल, सूर्य आदि ग्रहों के प्रभावस्वरूप बृश्चिक जातक में आत्म-विश्वास, आवेश से काम! 
करने की प्रवृत्ति, साहस, संकल्प, उत्तेजना, स्वच्छन्द (स्वतंत्र) प्रकृति जैसे गुण प्रदान करते हैं । ऐसे जातक जिसे पसन्द / 
करते हैं, पूरे हृदय से करते हैं तथा जिसे घृणा करते हैं, तो भी मन से करते हैं । वे अतिवादी होते हैं । बहुत शीघ्र आवेश , 
में आ जाते हैं। जीवन के संग्राम में अपनी लड़ाई स्वयं लड़ना पसंद करते हैं। दूसरों का अनावश्यक हस्ताक्षेप कदापि ' 
पसन्द नहीं करते। ह 
बृश्चिक जातकों में बिच्छू की भान्ति डंक मारने की प्रवृत्ति होती है। ब्राह्मण राशि होने के कारण किसी को 
अनावश्यक रूप से तंग नहीं करते हैं, परन्तु यदि कोई चोट या आघात पहुंचाए या विश्वासघात करे तो उसे आसानी से 
नहीं भूलते तथा पूरा प्रतिशोध लेने का प्रयास करते हैं। परन्तु शत्रु द्वारा हृदय से खेद प्रकट कर देने से क्षमाशील भी हो ; 
जाते हैं । बुश्चिक जातक विध्न/बाधाओं से भी विचलित नहीं होते बल्कि विघ्न बाधाएं आ जाने पर अन्तिम समय तक 
संघर्ष करते रहते हैं । ४ 
यदि कुं. में चन्द्र-गुरु या चंद्र-मंगल-गुरु का शुभ योग हो तो जातक की बौद्धिक एवं अन्त: संवेदनशक्ति तथा 
अन्वेषण शक्ति अच्छी होती है। उनमें धर्म, यंत्र, ज्योतिष, मंत्र आदि शास्त्रों के प्रति विशेष रूचि होती है। तर्क-वितर्क ' 
करने एवं किसी भी समस्या के जड़ तक पहुंचने की क्षमता होती है। वह प्रत्येक कार्य को पूरी निष्ठा, जिम्मेदारी और « 
कर्तव्य की भावना से करते हैं। सूर्य-गुरु का दृष्टि आदि सम्बन्ध हो, तो जातक विद्वान, अनेक भाषाओं का ज्ञाता तथा ' 
प्राध्यापन आदि के क्षेत्र में सफल होता है देखें उदा. कुं. नं. 88 ' 
यदि कुण्डली में गुरु (मंगल, शनि आदि ग्रह उच्चस्थ हों और लग्न पर गुरु की शुभ दृष्टि हो तो जातक स्वोपार्जित धन 
एवं भूमि, आवास, वाहन आदि सुख-साधनों से सम्पन्न तथा सुन्दर, सुशील स्त्री, संतान आदि सुखों से युक्त होगा। 
बृश्चिक जातक को कुछ भय या रोब दिखाकर कोई काम करवा लेना अत्यन्त कठिन होता है। परन्तु प्यार के 
रन की उनसे कठिन काम भी करवाया जा सकता है। अपने दोस्त के प्रति पूरे ईमानदार एवं निष्ठावान रहते हैं। .. 
दोस्ती में अपना निजी स्वार्थ भी न्‍्यौछावर करने को तैयार हो जाते हैं। बृश्चिक जातक या तो अति प्यार करते हैं या अति . 
घृणा करते हैं | मध्य मार्गी कम देखे जाते हैं । बुश्चिक जातक अपने कार्य क्षेत्र में वैसे जीवन पर्यन्त कर्मठ एवं सक्रिय बने 
: रहते हैं परन्तु जीवन की प्रारम्भिक अवस्था में कठिन परिश्रम एवं संघर्ष अधिक रहता है। ह 
. यदि बृश्चिक लग्न में शनि, राहु आदि अशुभ ग्रहों का योग या दृष्टि हो, तो जातक असंयमी, झगड़ालू, कुविचारी, 
क्रोधी, गुप्त रूप से दुष्कर्म करने वाला एवं कामुक एवं व्यसनी स्वभाव का होता है। ऐसे जातक को गम्भीर एवं क्लष्ट 
रोगों का भी भय होता है। ह । 
स्वास्थ्य और रोग (प्त्याता ब्रात 005९45८५)- बाल्यावस्था को छोड़कर सामान्यतः: बृश्चिक जातक बहुत 
कम बीमार हे रोगग्रस्त होते हैं। यदि किसी कारणवश बीमार हो जाएं तो शीघ्र स्वस्थ हो जाते हैं । इनकी अस्वस्थता के ' 
प्रमुख कारणों में असंयमित खान-पान एवं अत्यधिक आवेश एवं विषय वासना व श्रम की अधिकता विशेष रूप से 
उल्लेखनीय हैं । यदि बृश्चिक राशि अथवा लग्नेश मंगल राहु. शनि, शुक्र आदि शत्रु एवं पाप ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो तो 
जातक को मूत्राशय एवं जन॑नेन्द्रिय सम्बन्धी यौन रोगं, पाचन प्रक्रिया में विकार, अण्डकोश की सूजन, मधुमेह, गुर्दे या 
पित्ताशय में पत्थरी, रक्त विकार, इसके अतिरिक्त बृश्चिक लग्न में छठी मेष राशि होने से बृश्चिक जातक को अनिद्रा, 
उत्तेजना, तनाव, मानसिक ([)9768»ं07) दबाव, नेत्र कष्ट, उच्च रक्तचाप व अन्य मस्तिष्क,पीठ एवं चर्मादि सम्बन्धी 
रोगों की भी सम्भावना होती है। उदाहरण हेतु देखें कुण्डली नं. 75- इस कुण्डली में लग्नेश एवं बष्ठेश मंगल पापाक्रान्त 


बश्चिक लग्न में सामान्य विशेषषएं __ _ ___ _॒_ _“__________ 5 
होकर अष्टम भाव में शत्रु राशिगत होकर राहु द्वारा दृष्ट है। जिसका जातक को उच्च रक्तचाप (पां20-8]000 
?7655४7४) हुआ। राहु की दशा में ही जातक की मस्तिष्क आघात से आकाल मृत्यु हुई। चतुर्थ भाव अशुभ ग्रहों (बुध, 
राहु योग) एवं चतुर्थ राशि कर्क शनि द्वारा दृष्ट होने से जातक हृदय रोग तथा मधुमेह रोग से भी ग्रस्त रहा। 

सावधान- बृश्चिक जातक को अत्यधिक मानसिक एवं शारीरिक श्रम, उद्धिग्नता, उत्तेजना, अनियमितता एवं 
तामसिक भोजन आदि से परहेज करना चाहिए। 

शिक्षा एवं कैरियर- जन्म कुण्डली में गुरु, मंगल, सूर्य, चन्द्रादि ग्रह शुभस्थ हों अथवा गुरु-सूर्य का या चन्द्र 
गुरु-मंगल का दृष्टि सम्बन्ध हों एवं च जातक को इन्हीं योग कारक ग्रहों में से किसी ग्रह की दशा<न्तर्दशा भी चल रही 
हो, तो बृश्चिक लग्न का जातक/जातिका उच्च विद्या के क्षेत्र में अच्छी सफलता प्राप्त कर लेता है। यदि ग्रहों की स्थिति 
एवं परिस्थितिवश जातक को उच्च विद्या न भी प्राप्त हो सके तो भी बृश्चिक जातक को गुरु के कारण धार्मिक, 
पौराणिक, ज्योतिष आदि गुप्त विद्याओं तथा अन्य तकनीकी विद्याओं को जानने एवं सीखने की विशेष रूचि रहती है। 
पारम्परिक उच्च विद्या में किसी कारणवश विघ्न हों, तो भी सामान्य ज्ञान अच्छा होता है और भाषा पर अच्छा अधिकार 
होता है तथा जातक अपने कैरियर के प्रति विशेष सतर्क होते हैं। 

यदि किसी कुं. में लग्न एवं कर्मेश सूर्य पर गुरु की शुभ दृष्टि हो तो जातक भाषा शास्त्री, अनेक भाषाओं का ज्ञान एवं - 
उच्च प्रतिष्ठित प्राध्यापक (70/25507) होता है देखें उदा. कुं: नं. 88 । यदि कुं. में सू -बु,-गु. का योग हो तथा शनि भी 
शुभस्थ हो, तो जातक चार्टिड अकाऊंटैण्ट (0...) होता है तथा सरकारी क्षेत्रों में भी अच्छा लाभ उठाता है, देखें उदा. कुं. 
नं. 77 | यदि बृश्चिक कुं. में लग्नेश मंगल उच्चस्थ होकर तृतीय भाव में भाग्यस्थ गरु द्वारा दृष्ट हों, शनि भी. स्वक्षेत्री या 
उच्चस्थ हो, तो जातक प्रिटिंग उद्योग अथवा क्रय-विक्रय, निजी व्यवसाय द्वारा अच्छा धनार्जन करता है । देखें कुं, नं. 73. 

उच्चस्थ सूर्य पर गुरु की शुभ दृष्टि हो तो जातक/जातिका मैडीकल क्षेत्र (डाक्टर) में सफल होता है। देखें 


 डदा. कुं. 8 


*यदि कुं. में भाग्येश (चन्द्र) व लग्नेश (मंगल) का स्थान विपयर्य योग हो तथा तृतीयेश शनि द्वादशस्थ हो तो जातक 
का भाग्योदय विदेश में होता है, देखें उदाहरण कुं. नं. 76... 

*यदि लग्रेश मंगल दशम भाव में सूर्य से योग करता हो, तो जातक स्पोर्टस, सेना, पुलिस, योगादि में सफल होता है। 
देखें उदा. कं. नं. 86 

व्यवश्नाय और आर्थिक स्थिति- बृश्चिक लग्न/राशि के जातक अत्यन्त पराक्रमी, परिश्रमी, .बहुमुखी 
प्रतिभा के स्वामी तथा अपने लक्ष्य के प्रति सतर्क रहने के कारण व्यवसाय के किसी भी क्षेत्र में जहां परिश्रम, उत्साह एवं 
जोखिम के कार्य हों, वहां लाभ व उन्नति प्राप्त कर लेते हैं। 

जन्म कुण्डली में मंगल, सूर्य, गुरु, चन्द्र, शनि आदि ग्रह शुभस्थ हों अथवा उनमें परस्पर शुभ सम्बन्ध हों एवं इन्हीं 
ग्रहों में से किसी ग्रह की दशा-अन्तर्दशा चल रही हो तथा गोचर में भी इन्हीं में से शुभ ग्रहों का संचार चलता हो तो 
ब॒श्चिक जातक निम्नलिखित व्यवसायों में से (किसी एक में) अंच्छी,.सफलता प्राप्त कर सकते हैं | जैसे- चिकित्सा क्षेत्र 
में जैसे मैडीकल स्टोर (20७7), डाक्टर, सर्जन, इंजीनियर, राजनीतिज्ञ, सेना, पुलिस अधिकारी, स्पोर्ट्स, प्रोफेसर 
(प्राध्यापक), ज्योतिषी, अनुसंधानकर्ता, प्रिंटिंग उद्योग( मुद्रक), राजनेता, कूटनीतिज्ञ, बाक्सिंग, जासूस, नेवी, लोहे 
चमड़े या रबड़ उद्योग से सम्बन्धित व्यवसाय, वकालत, होटल एवं रैस्टोरैण्ट एवं खानपान सम्बन्धी (7000, स्कूल 
आदि शिक्षा संस्थान, उच्चप्रतिष्ठित सरकारी अफसर, धार्मिक संस्था के अग्रणी, ऊनी वस्त्र, ठेकेदार, प्रबन्ध एवं 
सुरक्षात्मक प्रबन्धन से सम्बन्धित व्यवसाय, ईंट, पत्थर, रबड़, पेंट व रंग, पाईप फिटिंग: बिल्डिंग-निर्माण सम्बन्धी 
सामग्री, क्रय-विक्रय ([780॥72), विदेश गमन, बिजली, अकाऊंट्स, योग, कम्प्यूटर विशेषज्ञ एवं बौद्धिक कार्य सम्बन्धी 
व्यवसायों में विशेष सफल हो सकते हैं। 





52 आल को पा मे 80 209 अधि्लिक लता फल 


आध्यात्मिक पक्ष- बृश्चिक लग्न/राशि से काल-पुरुष के गुप्त अंगों की विवेचना की जाती है। यहीं पर 
मूलाधार चक्र भी है । इसी चक्र में अवस्थित कुण्डलिनी शक्ति का जागरण कर योग विद्या से मस्तिष्क में स्थित ब्रह्म चक्र 
से संयोजित किया जाता है, जिसे अध्यात्म की भाषा में आत्म साक्षात्कार कहा जाता है | मूलाधार चक्र में अमृत तत्त्व का 
निवास भी माना जाता है | इसी कारण बृश्चिक लग्न/राशि के जातकों में कामुक एवं वासनात्मक प्रवृत्तियों के साथ-साथ 
आध्यात्मिक एवं दैविक प्रवृत्तियों की प्रबलता भी पाई जाती है। 

आर्थिक स्थिति- बृुश्चिक जातक की जन्म कुण्डली में यदि गुरु, चन्द्र, सूर्य, शनि आदि ग्रहों की स्थिति अच्छी 
हो तथा इन्हीं शुभ एवं योगकारक ग्रहों में से किसी ग्रह की दशा या अन्तर्दशा चल रही हो, तो जातक की आर्थिक स्थिति 
अच्छी होती है । बुश्चिक जातक अपनी अदम्य ऊर्जा, परिश्रम और दृढ़ इच्छा शक्ति से निर्वाह योग्य आय के साधन बना 
ही लेता है । यदि शुक्र भी शुभस्थ हो, तो व्यवसाय एवं धनार्जन व संचय में पत्नी का भी सक्रिय सहयोग होता है । जातक 
भूमि, आवास, व्यवसाय, वाहन एवं सन्‍्तान आदि सुखों से सम्पन्न होता है। बृश्चिक जातक बाधाओं का साहस पूर्वक 
सामना करते हैं तथा ऐसे जातक प्राय: किफायतसार एवं सोच समझ कर खर्च करने वाले होते हैं । जातक आउडम्बर, 
दिखावा एवं प्रदर्शन व फिजूल खर्ची से यथासंभव परहेज करते हैं | परन्तु अपने परिवार के हित की दृष्टि से उदारता से 
व्यय करते हैं | यंदि शुक्र छटे, अष्टम या एकादश भाव में भौम, राहु, सूर्यादि ग्रहों से युक्त व दृष्ट हो तो जातक असंयमी, 
वस्त्रों, सौन्दर्य प्रसाधनों एवं मदिरा आदि व्यसनों पर वृथा खर्च करने वाला होगा । 

प्रेम एवं वैवाहिक सुर्व- बृश्चिक जातक/-जातिका प्रेम और रोमांस के सम्बन्ध में गम्भीर, स्पष्टवादी एवं 
ईमानदार होते हैं | प्रेमाकर्षण के बारे में भी जल्दबाजी नहीं करते, अपितु भावात्मक एवं बौद्धिक साम्यता को देखकर ही 
प्रेम प्रकट कर पाते हैं | परन्तु जब एक बार किसी से प्रेम हो जाए तो पूरी गहराई एवं निष्ठा से निभाते हैं | शुक्र शुभ होने 
की स्थिति में विवाह के उपरान्त अपनी पत्नी को जीवन की सब सुख-सुविधाएं प्रदान करते हैं । बुश्चिक जातक की 
कुंडली में मंगल एवं शुक्र आदि शुभस्थ हों तो जातक की पत्नी सुशील, ईमानदार, सन्‍्तान आदि सुखों से युक्त तथा पति 
को प्रिय होगी । यदि भौम, शुक्र, द्वितीय, सप्तम, अष्टम या द्वादशस्थ हों तो दाम्पत्य जीवन में वैमनस्य होगा। 

अनुकूल राशि मित्रता- बृश्चिक जातक को सामान्य जीवन में, व्यवसाय के क्षेत्र में एवं वैवाहिक क्षेत्र में निम्न 
राशि वालों के साथ सम्बन्ध बनाने शुभ एवं लाभप्रद रहेंगे। परन्तु विवाह सम्बन्धों में अपने भावी जीवन साथी की राशि 
मैत्री के अतिरिक्त नक्षत्रों के गुण मिलान तथा कुण्डली में मंगलीक दोष आदि का विचार भी कर लेना चाहिए। 

बृुश्चिक जातक को मेष, वृष, कर्क, सिंह, कन्या, धनु व मीन राशि वाले जातकों के साथ विवाह, व्यवसाय आदि 
सम्बन्ध लाभप्रद होगा। बुश्चिक व मकर राशि वालों के साथ मध्यम तथा मिथुन, तुला व कुम्भ राशि वालों के साथ 
सम्बन्ध विशेष लाभप्रद नहीं रहेंगे। 


। बृश्चिक लग्न की कन्या|“जातिका (5०07/.90 90707 67)। 


बृश्चिक लग्न (राशि) की कन्या सुन्दर एवं लम्बे मुखाकृति वाली, पुष्ट एवं संतुलित शरीर, 
लम्बे हाथ, बड़ी एवं चमकीली आंखें, आकर्षक एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व वाली होगी | चलने में 
तेज़, चुस्त एवं शीघ्रता लिए होगी। 
स्वभावगत विशेषताएं- 
नारी भवेद्‌ बृश्चिक लग्न जाता सुरुप गात्रा नयनाभिरामा। 
सुपुण्यशीला च पतिव्रता च गुणाधिकासत्यपरा सदैव॥ 
अर्थात्‌ बुश्चिक लग्न में उत्पन्न कन्या श्रेष्ठ स्वरूप वाली, सुन्दर व आकर्षक नेत्रों वाली, 
सत्यपरायणा, शुभ कर्म करने वाली, अत्यधिक गुणों से समन्वित एवं अपने पतित्रत धर्म का पालन 





बश्चिक लग्नसत्री फल _._ _ ___________[_______॒_॒_॒[॒ “ ““ “ " 53 
करने वाली होती है। | ह ः 
इस लग्न/राशि का स्वामी मंगल होने से बृश्चिक जातिका परिश्रमी, साहसी, कुशाग्र बुद्धि, उद्यमी, स्पष्टवादी, 
कर्त्तव्य-परायणा, ईमानदार, उदारह्ददया, परोपकारी, आत्मविश्वासी, निडर, गुणी एवं परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को 
ढाल लेने में कुशला होती है। यदि जन्मकुण्डली में भाग्येश चन्द्र व पंचमेश गुरु व सूर्य भी शुभस्थ हों तो जातिका 
उच्चशिक्षित, स्वाभिमानिनी, दृढ़निश्चियी अर्थात्‌ मन में जो एक बार संकल्प कर लेती है उसे हर स्थिति में पूरा करने का 
प्रयास करती हैं। जातिका माता-पिता के लिए भाग्यवान्‌ू, मिलनसार, परोपकारी, अधिकारपूर्ण वाणी, आतिथ्य सत्कार 
करने में कुशल, व्यवहार कुशला तथा अपने उद्यम पर भरोसा करने वाली होगी । अपनी प्रतिष्ठा (75026) का विशेष 
ध्यान रखेगी। स्वाभिमानी होते हुए भी अनुकूल आचरण करने वाली, चरित्रवान, नैतिक मूल्यों का पालन करने वाली, 
उच्च संस्कारों से युक्त, कुछ हठी प्रकृति तथा विशेष गुणी होगी। अपने गुणों के कारण परिवार एवं समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त 
करने वाली होगी । चंद्र-शुक्र के प्रभाव से जातिका भ्रमणप्रिया होगी। परन्तु इसमें अवगुण भी संभव हैं। अशुभ मंगल व 
शनि के प्रभावस्वरूप जातिका शीघ्र उत्तेजित हो जाने वाली, क्रोधी, जिदूदी (हठी), स्वार्थी एवं कुछ आक्रामक एवं मूडी 
प्रकृति की होगी। अपने विरुद्ध किसी प्रकार कौ आलोचना एवं नुक्ताचीनी सहन न करने वाली तथा स्वार्थी प्रकृति की 
होगी | इसके अतिरिक्त अशुभ ग्रहों के प्रभाव से चिड़चिड़ापन, ईर्ष्या, शंका, दोष दर्शन आदि अवगुण भी आ सकते हैं। 
शिक्षा एवं कैरियर (((9/.९९)- बृश्चिक जातिका कुशाग्र बुद्धि, परिश्रमी एवं क्रियात्मक प्रकृति की होने से 
अपनी शिक्षा एवं कैरियर के प्रति विशेष गम्भीर एवं सतर्क होगी । कुण्डली में सूर्य, चन्द्र, गुरु आदि ग्रह शुभस्थ ( केन्द्र- 
त्रिकोण) में हों तो जातिका चिकित्तसा क्षेत्र, विज्ञान, अध्यापन (शिक्षा), वकालत, कानून, सरकारी विभाग, अकाऊंट्स, 
इंजीनियरिंग, रसायन, ड्रैस डिज़ाइनिंग, (07855 706&९7778), ब्यूटी पार्लर, पुलिस, कम्पयूटर डिज़ाईनिंग, घरेलू साज 
सज्जा (7७7० 06०.), आफिस कलर्क एवं कम्पनी प्रबन्धकं, टूरिज्मम आदि कार्य जिसमें शारीरिक श्रम के साथ 
बौद्धिक योग्यता का भी उपयोग हो। ह के 
आर्थिक स्थिति- के लिए बृश्चिक पुरुष जातक के फल का अध्ययन करें।.._ 
स्वास्थ्य एवं रोग- बृश्चिक कन्या/जातिका का स्वास्थ्य बाह्य तौर पर प्रायः अच्छा ही रहता है। छोटी मोटी 
बिमारी को यह स्वीकार ही नहीं करतीं। परन्तु कुण्डली में मंगल, चन्द्र, गुरु, शनि आदि ग्रहों का अशुभ प्रभाव हो तो 
जातिका को रक्त विकार, जननेन्द्रिय सम्बन्धी गुप्त एवं यौन रोग, अनियमित मासिक धर्म, फ़ोड़े-फुंसी, पत्थरी, नज़ला- 
जुकाम, उदर विकार, शिर पीड़ा, नेत्र आदि रोगों की सम्भावना होती है। ्ि ह मा 
सावधानी- बृश्चिक जातिका को अत्याधिक प्रतिक्रियावादी नहीं होना चाहिए। क्रोध और उतावलेपन से भी 
परहेज करना चाहिए तथा अत्याधिक हठ, जिंदूद और कटु आलोचना के स्वभाव को त्याग कर जीवन के प्रति आशावादी 
दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। इसके अतिरिक्त अच्छे स्वास्थ्य के लिए संतुलित भोजन, व्यायाम तथा ईश्वर भक्ति की ओर 
ध्यान देना चाहिए। न " क्‍ 
प्रेम और वैवाहिक सुर्व- बृश्चिक पुरुष जातक की भान्ति बृश्चिक जातिका भी प्रेम और रोमांस के सम्बन्ध 
में अपने पार्टनर के प्रति अत्यन्त गम्भीर, निष्ठावान एवं ईमानदार होती हैं। अन्य कामों की भान्ति प्रेम में जल्दबाजी नहीं 
करतीं, बल्कि पार्टनर का शारीरिक, मानसिक, सामाजिक एवं बौद्धिक स्तर देख कर ही प्रेमाकर्षण में समर्पित होती हैं। 
इनकी कुण्डली में मंगल, गुरु, शुक्र एवं चन्द्र की स्थिति अच्छी हो तो जातिका को उच्चशिक्षित, सुन्दर व्यक्तित्व, सम्पन्न, 
श्रेष्ठ गुणों से युक्त पति की प्राप्ति होती है । विवाह के उपरान्त दाम्पत्य जीवन सन्तान आदि सुखों एवं सुख साधनों से सम्पन्न 
होगा। तथा जातिका स्वयं भी पति के परिवारिक जीवन में सब प्रकार से सहायिका होती है। यदि कुण्डली में सप्तम भाव 
एवं सप्तमेश ग्रह शनि, सूर्य, केतु आदि क्रूर एवं अशुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो तो जातिका वैवाहिक जीवन. में दुखी, 
असंतुष्ट एवं परेशान रहती है। ि | ही मी अंग, > 
बृश्चिक जातिका को अनुकूल म्ञाधी का चुनाव- बृश्चिक कन्या/जातिका को मेष, वृष, सिंह, 
कन्या, बृश्चिक, मकर व मीन लग्न/राशि वालों के साथ मैत्री एवं दाम्पत्य सम्बन्ध शुभ एबं लाभप्रद होंगे। तथापि सुखद 





54% 2८ थे 23 0 00 0, की 22 ५ ०. अश्निक लग्न-दशाफल बाप या 
वैवाहिक सम्बन्ध करने से पूर्व जन्म पत्रियों में पारस्परिक गुण-मिलान अवश्य करवा लेना चाहिए। 





सभी ग्रह अपनी दशा, अन्तर्दशा एवं प्रत्यन्तर दशा आदि काल में शुभाशुभ फल देते हैं। जो ग्रह कुण्डली में उच्च 
राशिस्थ या मित्र राशिस्थ हों तथा महादशा व अन्तरदशा स्वामी ग्रह परस्पर छटे, सातवें, अष्टम या द्वादश स्थिति में न 
होकर परस्पर पंचम, नवम, दशम, तृतीय या एकादश स्थिति में हों,.वह ग्रह अपनी अन्तर्दशा में धन लाभ, सोची हुईं 
योजनाओं में सिद्धि एवं सौभाग्य में वृद्धि करते हैं । तथा जो ग्रह नीच, शत्रु राशि या अस्त आदि अवस्था में हों वह अपनी 
दशा में धन हानि, रोग एवं कार्यों में अड़चनें या असफलता प्रदान करते हैं । 

बृश्चिक जातक की कुण्डली में (केन्द्र त्रिकोणस्थ शुभ हों तो ) सूर्य, चन्द्र, गुरुअपनी दशाअच्तर्दशा में प्राय: शुभ फल 
प्रदान करते हैं। सूर्य, चन्द्र की दशा<न्तर्दशा में व्यवसाय में धन लाभ व उन्नति, भाग्य में वृद्धि तथा उच्च प्रतिष्ठित लोगों के 
साथ सम्पर्क बढ़ते हैं| शुभस्थ गुरु की दशाउन्तर्दशा चले तो जातक को परिवारिक सुख की प्राप्ति, उच्च विद्या में 
सफलता, धन लाभ, सन्‍्तान सुख एवं धर्म-कर्म में अभिरुचि होती है । मंगल की दशा में अड़चनों एवं बाधाओं के बाद 
कार्यों में सिद्धि प्राप्त होती हैं | कुण्डली में शनि शुभस्थ या स्वक्षेत्री हो तो जातक को भूमि, वाहन आदि सुखाों की प्राप्ति 
हो, चन्द्र-शुक्र की दशाओं में स्त्री सुख, धन लाभ अल्प, परन्तु मनोरंजन एवं विलास आदि कार्यों पर खर्च अधिक होता 
है | राहु या बुध की दशा में बनते कार्यों में अड़चनें, मन में चंचलता, विद्या में रुकावटें, अपव्यय एवं रोग आदि का भय 
होता है। राहु ३, ४, ६, ८, ११ भावों में तथा केतु २, ५, ९, १०, १२वें भावों में हो जातक को अपनी दशअच्तर्दशा में 
अचानक धन लाभ के अवसर तथा कार्यों में विघ्नों के बाद सफलता प्रदान करते हैं । जबकि राहु, केतु (बृश्चिक लग्त 
के) अन्य भावों में वृथा-दौड़धूप, निकट बन्धुओं से तकरार, व्यवसाय में विघ्तन व अपव्यय (वृथा खर्च) आदि अशुभ 


फल देते हैं । 
| बृश्चिक लग्न सम्बन्धी कुछ उपयोगी उपाय | 


शुभ रंग (7४४०७:०४७।९ (१०0०775)- लाल, गुलाबी, पीला, श्वेत, हल्का नीला, संगतरी, भूरा। 

अशुभ ३ग - गहरा नीला, हरा, काला 

भाग्यशाली नग (उत्न)- सोने अथवा ताम्बे की अंगूठी में मूंगा सव आठ रति (या ग्राम) का मंगलवार को 
गंगाजल में शक्कर एवं शुद्ध जल मिश्रित डालकर निम्न मंत्र पढ़ते हुए कम से कम आठ बार डूबोएं (9|9) करें- 

मंत्र-३% क्रां, क्रीं, क्रो, सः भौमाय नमः॥ 

मूंगा नग स्वास्थ्य और मान-प्रतिष्ठा की दृष्टि से भी शुभ रहेगा। 

#०उच्च्य विद्या में सफलता के लिए सोने की अंगूठी में पुखराज पीले वर्ण का तर्जनी अंगुली में वीरवार को धारण 
करें। धारण करने से पूर्व मूंगे की भान्ति ही गंगा जल मिश्रित जल में शुद्ध कर लें। 

पुखराज धारण के लिए मंत्र-3» ग्रां ग्रीं ग्रां सः गुरवे नमः ॥ पुखराज को वीरवार वाले दिन प्रात: गुरु के नक्षत्रों 
(विशाखा, पुनर्वसु, पू. भा.) तथा पुष्य नक्षत्र एवं (रिक्ता तिथि रहित) शुभ तिथियों में धारण करना शुभ होता है । अधिक 
जानकारी के लिए पंचांग दिवाकर का अध्ययन करें। 

<व्यवम्नाय- में तरक्की और लाभ के लिए माणक (२४७७) सुवर्ण की अंगूठी में रविवार को धारण कर सकते हैं। 

&अनुकूल दिन (778४०४7-४४७॥९ 09495) - रविवार, सोमवार, मंगल, गुरुवार एवं शुक्रवार शुभ एवं लाभप्रद 
रहेंगे जबकि बुधवार एवं शनिवार इस राशि के लिए शुभ नहीं रहेंगे। 

मंगलवार का व्रत ([785॥) रखना तथा गौओं को मीठी-चपातियां डालना शुभ एवं कल्याणकारी होगा। 

शुभ अंक- 3, 9, 4, ॥, 2, एवं 7 क्रमानुसार भाग्यशाली अंक माने जाते हैं । जबकि 5, 6 और 8 अंक क्रमशः 


कष्टकारी माने जाते हैं । 
भाग्योन्नतिकारक वर्ष- बुश्चिक जातक की आयु के 25, 33, 35, 37 एवं 42वां वर्ष विशेष भाग्योन्नतिकारक होंगे। 


बृश्चिक लग मेंसूयफल_____ ________ __ _ _ _ __  |||[_[_[___#ह55 में 


(बृश्चिक लग्न: द्वादश भावों में सूर्य का फल] 

नोट:- प्रत्येक भाव पर सूर्यादि ग्रहों का फल निर्णय करते समय कुण्डली में अन्य... बृश्चिक लगने सूर्य फल 
ग्रहो की स्थिति, योग, दृष्टि आदि की भी समीक्षा कर लें, तो ग्रह फल अधिक स्पष्ट 
प्रकट होंगे। बुश्चिक कुंडली में सूर्य व्यवसाय एवं पिता का कारक होता है। 

प्रथम भांव॑-में मित्र बृश्चिक राशि पर सूर्य के प्रभाव से जातक बुद्धिमान, सुन्दर 
रूप किन्तु कछ लालिमा लिए गेहुंआ वर्ण होगा। ऐसा जातक पुष्ट शरीर, प्रेभावशाली 
व्यक्तित्व, अधिकार की भावना, साहसी, उच्चाभिलाषी, स्वतंत्र प्रकृति, स्वावलम्बी, 9 
स्वाभिमानी एवं अच्छे कुल में उत्पन्न होने वाला होगा। राहु आदि शुभ ग्रह से युक्त या सी | पर 
दृष्ट हो तो प्रथमावस्था में ज्वरादि से शरीर कष्ट, आंखों में रोग, अग्नि, हथियार आदि " 
से भय, शिर दर्द, कम केश, शीघ्र क्रोधित होने वाला स्वभाव होगा। यहां सूर्य सप्तम भावस्थ वृष राशि को शत्रु दृष्टि से 
देखने से स्त्री सुख में कुछ कमी या परिवारिक परेशानियों का सामना रहता है। सूर्य गुरु आदि शुभ ग्रह से दृष्ट या युक्त हो 
तो जातक बुद्धिमान, विद्वान, कार्य/व्यवसाय में पितृपक्ष या उच्च प्रतिष्ठित लोगों अथवा सरकार द्वारा विशेष लाभान्वित 
रहता है। गुरु शुभस्थ हो तो जातक चिकित्सा एवं कला के क्षेत्र से सम्बन्धित रहता है। देखें उदा. कुण्डली नं. 85। सूर्य 
प्रथम भाव का कारक होने से अन्य शुभ ग्रहों (गुरु, मंगल आदि) के योग से ही विशेष शुभ फल देने में समर्थ होता है। 

द्वितीय भाँव-में मित्र धनु राशि-पर सूर्य होने से जातक भाग्यशाली, उच्चप्रतिष्ठित, तर्क-वितर्क करने में कुशल, 
क्रेय-विक्रय आदि अनेक साधनों द्वारा. धनार्जन करने वाला, धन सम्पत्ति, भूमि, वाहन आदि सुखों से युक्त, पिता एवं 
सरकारी क्षेत्रों से लाभ प्राप्त करने वाला, दानी, परोपकारी, माता-पिता एवं बड़ों का आदर करने वाला, अध्ययनशील एवं 
धार्मिक प्रवृत्ति, स्पष्टवादी एवं कभी-कभी कट वाणी का प्रयोग करने वाला होता है। यदि राहु, शनि आदि अशुभ ग्रह 
युक्त या दृष्ट हो तो जातक नेत्र एवं मुख रोगी, धन का अपव्यय एवं परिवारिक परेशानियां अधिक होंगी | सूर्य गुरु से युक्त 
या दृष्ट होने से जातक उच्चशिक्षित, वाहन, स्त्री, संन्‍्तान आदि सखुखों से युक्त एवं धर्म परायण होगा। ऐसा जातक 
उच्चप्रतिष्ठित अधिकारी, धर्म गुरु, प्राध्यापक या जज आदि भी हो सकता है। कक ः 


तृतीय भाव-में मकर राशि पर सूर्य के प्रभाव से जातक बुद्धिमान, पराक्रमी, पुरुषार्थी, भ्रमणशील, भाई-बहनों के 
कारण कभी परेशानी उठाने वाला, किन्तु जातक धैर्यवान एवं धार्मिक प्रवृत्ति वाला होता है। कार्य-व्यवसाय के क्षेत्र में 
पिता से अल्प लाभ परन्तु बहुत कठिन परिस्थितियों एवं संघर्ष के बाद सफलता प्राप्त हो। ऐसा जातक अध्ययनशील, - 
मन्त्र, ज्योतिष आदि गूढ़ विषयों की ओर रूचि रखने वाला होगा तथा निजी पुरुषार्थ एवं पराक्रम से भाग्य में उन्नति व 
प्रतिष्ठा प्रात्त करता है। देखें उदा. कुं. नं. 78 तथा 84 | 

चतुर्थ भाँव-में कुम्भ राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक को विघ्न/बाधाओं के बावजूद व्यवसाय में निर्वाह 
योग्य आय के साधन बनते रहेंगे। पितृ पक्ष से भी कुछ सहायता की सम्भावना होती है। स्वयं पिता के लिए सहायक, मात 
कष्ट या माता के सुंख में कमी रहती है। भाग्य में अनेक परिवर्तन व उतार चढ़ाव आते रहते हैं । निजी मकान, संतान, भूमि, 
वाहन आदि सुख भी अड्चनों के बाद प्राप्त होते हैं। गुरु शुभस्थं हो तो जातक को उच्च विद्या, स्त्री, सन्‍्तान आदि सुखों 
की प्रासि होती है। धर्म, ज्योतिष आंदि विषयों में भी रूचि होती है। विदेश गमन की भी सम्भावनाएं होंगी। यदि गुरु 
अशुभ हो तो जातक को उपरोक्त सुखों में कमी होंगी। देखें उदा, कुण्डली नं. 82। की अल डर 

पंचम भाव-में मान राशि पर सूर्य होने से जातक तीज्र बुद्धिमान, नेक दिल, उच्चार्थिकारी या उच्च प्रेतिष्ठित, धनी 
मित्रों से युक्त परन्तु शीघ्र उत्तेजित हो जाने का स्वभाव हो, स्पष्टवादी, उदार, विघ्न/बाधाओं के बाद उच्च विद्या प्राप्ति, 
अल्प संतान या सन्तान के सम्बन्ध में चिन्तनशील, जीवन के प्रारम्भिक अवस्था में कार्य/व्यवसाय में विशेष अड्चनें परन्तु 


55 








300 90 दो 0 28 ४ ० 0 की 8 कक 3 ०  -[फ अरिनिका लगा 
ऐसा जातक अपनी योग्यता से निर्वाह योग्य आय के साधन बना ही लेता है | ज्योतिष आदि गूढ़ विषयों में भी विशेष रूचि 


होती है । पिता एवं सरकारी क्षेत्रों से लाभान्वित, लाटरी आदि से अकस्मातू्‌ धन लाभ की भी संभावना | यदि सूर्य राहु, शनि 
आदि अशुभ ग्रह से युक्त या दृष्ट हो तो जातक को हृदय पीड़ा की सम्भावना रहे | देखें कुं. नं. 75' 
बट्ठ भांव-में मेष (उच्च) राशि पर सूर्य के प्रभाव से जातक उद्यमी, पराक्रमी, परिश्रमी, बुद्धिमान, उच्चाकांक्षी होता 
है। अड़चनों के बावजूद उच्च विद्या प्राप्त, परन्तु कार्य/व्यवसाय में बार-बार विघ्नों के साथ धनार्जन (आय) के साधन 
बनते हैं | व्यवसाय में उच्च एवं पर्याप्त सम्भावनाओं के बावजूद जातक उनका विशेष लाभ नहीं उठा पाता प्रबल शत्रु होने 
पर भी जातक उन पर विजय प्राप्त कर लेता है । ऐसा जातक विदेश में विशेष तौर पर सफल हो पाता है। सूर्य के साथ गुरु 
हो तो जातक चिकित्सा क्षेत्र में सफल होता है यदि बुध भी हो तो जातक वकालत, कामर्स, ज्योतिष, चार्टेड अकाऊंट्स 
आदि के क्षेत्र में विशेष सफल होता है। देखें उदा. कुं. नं. 77 
ब्लप्तम भाव-में वृष राशि पर सूर्य होने से जातक का प्रभावशाली व्यक्तित्व, शिक्षित, अध्ययनशील, किन्तु कुछ 
उत्तेजित स्वभाव का होता है| घरेलू परिस्थितियों में भी परेशानियों का सामना अधिक रहता है । जातक उच्चाधिकारी एवं 
स्वाभिमानी प्रकृति का होता है | व्यवसाय में संघर्ष अधिक तथा आशानूकूल लाभ नहीं हो पाता | विवाह में अड़चनें होती 
हैं अथवा वैवाहिक जीवन में वैमनस्य एवं तनाव के हालात होते हैं । स्त्री की कुण्डली में सप्तम सूर्य होना विशेषकर शुभ 
नहीं माना जाता (जातक चंद्रिका) 
अष्टम भाँव॑-में मिथुन राशि पर सूर्य होने से जातक बुद्धिमान, उच्चाभिलाषी एवं परिश्रमी परन्तु अस्थिर स्वभाव 
का होता है| कार्य-व्यवसाय के सम्बन्ध में अत्यधिक कठिनाइयों का सामना रहता है| जीवन का प्रारम्भिक भाग विशेष 
संघर्षपूर्ण .होता है । घरेलू परिस्थितियां भी कुछ तनावपूर्ण रहती हैं| यद्यपि जातक गुप्त युक्तियों से प्रयास करके निर्वाह 
योग्य आय के साधन बना ही लेता है| गुरु, शुक्र, बुधादि का योग या दृष्टि आदि का सम्बन्ध हो, तो जातक का विदेश 
में भाग्योदय होता है । देखें उदा. कुं. नं. 76 | यदि सूर्य शनि, राहु आदि ग्रहों से युक्त हो तो काम-काज में विघ्न-बाधाएं 
धन का अपव्यय तथा पैतृक सुखों में कमी आती है तथा शरीर कष्ट होता है। 
जंवंग भाँव॑-में मित्र राशि कर्क पर सूर्य के प्रभाव से जातक उच्च विद्या प्राप्त, विद्वान, धार्मिक प्रवृत्ति वाला, पिता 
एवं सरकारी क्षेत्रों से लाभान्वित होने वाला, परन्तु सांसारिक कार्यों पर अत्यधिक खर्च करने वाला होता है। व्यवसाय 
आदि में विध्त/बाधाओं के बाद ही सफलता प्राप्त होती है। भ्रातृ सुख में कमी | भाई-बहन होने पर भी उनसे विशेष सुख 
नहीं हो पाता। यहां सूर्य भाग्य स्थान पर जलराशि ( कर्क) में होने से विदेश में भी भाग्योन्नति होने की विशेष सम्भावनाएं 
होती हैं। ध्यान रहे, सूर्य इस भाव का कारक होने से भौम, गुरु आदि शुभ ग्रहों के संयोग से ही शुभ फलप्रद होता है। 
<ड्ाम भाव॑-में स्वगृही सिंह राशि में सूर्य होने से जातक उच्च प्रतिष्ठित, शिक्षित, विद्वान, पराक्रमी, उद्यमी, कुशल 
व्यवसायी एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व होगा। अत्यन्त संघर्ष के बाद व्यवसाय में लाभ व सफलता मिलती है। पैतृक सम्पदा 
तथा धन, वाहन एवं सनन्‍्तान आदि सुख भी प्राप्त होते हैं । यदि मंगल, गुरु, चंद्र आदि ग्रह भी शुभस्थ हों, तो जातक को 
सेना, पुलिस, मैडीकल, आबकारी, वकालत, न्यायाधीश, राजनीति एवं प्रशासनिक आदि क्षेत्रों में विशोष सफल होने के 
योग होंगे। यद्यपि सिंह का सूर्य जातक को राजसी प्रवृत्ति प्रदान करता है परन्तु अपने कार्य क्षेत्र में अप्रत्याशित उन्नति के 
अवसर के करने वाला एवं उच्चस्तरीय जीवन जीने वाला होता है । जातक भूमि, सन्‍्तान, वाहन आदि सुखों से युक्त परन्तु 
मातृ सुख में कुछ कमी होती है। ऐसे जातक को पर्वतीय स्थलों पर जांने का विशेष शौक होता है। 
नोट: सूर्य इस भाव का कारक होने से अकेला विशेष फल नहीं दे पाता, यदि यहां पर गुरु, मंगल आदि ग्रहों का योग 
या दृष्टि हो तो ही विशेष धनलाभप्रद होता है। देखें उदा. कुं, नं. 83 
एकांदथां भाँव॑-में मित्र ग्रह की कन्या राशि पर सूर्य की स्थिति होने से जातक बुद्धिमान, उच्चशिक्षित, 


बश्चिक लग्नमेंसूयफल__[औ[औ[औ[औ[औ[औ]_औ[औ]_॥_॥_____््ऊ7>ज्5़ू 
विचारशील, महत्त्वाकांशी, निजी पुरुषार्थ एवं स्वप्रयासों से लाभ व उन्नति प्राप्त करने वाला, यद्यपि पैतृक पक्ष एवं उच्च 
प्रतिष्ठित मित्रों से भी लाभान्वित होता है। गुरु व शुक्र शुभस्थ हों तो जातक विवाह विशेषकर सनन्‍्तान उत्पत्ति के बाद 
विशेष तरक्की करता है, परन्तु भाई का सुख कम मिलता है । जातक स्वयं गुणवान्‌ तथा उसे गायन, संगीत, मंत्र, ज्योतिष 
नीति-धर्मादि गूढ़ विषयों का शौक होता है। सामान्यत: जातक सुखी साधन सम्पन्न एवं दीर्घायु होता है। आय के साथ- 
साथ खर्च भी बहुत अधिक होते हैं। 
द्वादघा भाव-में नीच राशि तुला में सूर्य होने से जातक को व्यवसाय के सम्बन्ध में आरम्भिक जीवन में संघर्ष 
अधिक रहता है। सामान्य जीवन में भी उतार-चढ़ाव अधिक रहता है। पिता को कष्ट अथवा पितृ सुख में कमी रहे। 
व्यवसाय के सम्बन्ध में भी अस्थिरता एवं परेशानियों का सामना रहता है, जातक जीवनयापन योग्य आय के साधन बना 
ही लेता है, तथापि आय की अपेक्षा धन के खर्च अधिक होते हैं । वृथा भ्रमण एवं आकस्मिक धन हानि की संभावना रहे । 
व्यवसाय में अनेक परिवर्तनों के पश्चात्‌ ही ठहराव आ पाता है। ऐसे जातक को नेत्र कष्ट, शिरपीड़ा व भागदौड़ अधिक 
रहती है। कुण्डली में गुरु, मंगल एवं शनि, शुक्र आदि ग्रह शुभस्थ हों, तो जातक पराक्रमी हो तथा उसको भूमि, आवास 
अच्छी स्त्री, संतान एवं वाहन आदि सुखों की प्राप्ति भी होती है। देखें उदा० कुण्डली नं. 74 एवं 80 


3चक लग्न-द्वादश भावों में चन्द्रमा का फल 


नोट- इस लग्न में चन्द्र भाग्येश होने से विशेष महत्त्वपूर्ण माना जाता है। बारह 
भावों में चन्द्र के फल का निर्णय करते समय उस पर अन्य ग्रहों के योग, दृष्टि आदि का __ इश्चिक लग्नेचचद्गर फल _ 
भी विवेचन करने से फलित में और अधिक स्पष्टता एवं सूक्ष्मता आ जाएगी। इसके 2 
अतिरिक्त क्षीण चन्द्रमा (कृष्णपक्ष की एका. से शुक्ल पक्ष की पंचमी तक) भी पूर्णत 
शुभ फल नहीं प्रदान करता। 

प्रथम भाँव॑- में बृश्चिक राशि (नीच) पर भाग्येश होकर चन्द्र का होना 
प्रारम्भिक अवस्था में जातक का स्वास्थ्य कुछ नर्म रहता है। परन्तु यदि चन्द्र शुभ ग्रह 92८ 
से दृष्ट हो तो जातक की आयु वृद्धि के साथ-साथ, स्वास्थ्य में सुधार होता है। जातक 
गुणी, बुद्धिमान परन्तु कठिनाइयों के साथ उच्च विद्या प्राप्त कर लेता है। व्यवसाय में विघ्न-बाधाओं के पश्चात्‌ सफलता 
मिलती है। मानसिकता तनाव व आर्थिक उलझनें बनी रहती हैं। पत्नी सुन्दर, सुशील एवं गृह कार्यों में सर्व प्रकार से 

सहायिका होगी। 

द्वितीय भाव- में धनु राशि में चन्द्र होने से जातक मधुरभाषी, सुन्दर मुख एवं आकर्षक व्यक्तित्व वाला 
संवेदनशील, भाग्यशाली, परिवारिक एवं भौतिक सुख-सुविधाओं से युक्त होगा। जातक शिक्षित विद्वान, धनी, एवं पिता 
से धन प्राप्त करने के अतिरिक्त स्वयं भी अनेक युक्तियों से धनार्जन करने वाला होता है। चन्द्र की अष्टम भाव पर दृष्टि होने 
से विदेश यात्रा की भी सम्भावना होगी। जातक को संगीत, कला, ज्योतिष, धर्म आदि विषयों में भी रूचि होगी। 32वें 
वर्ष भाग्य में लाभ व उन्नति के विशेष चांस बनते हैं। 

तृतीय भाव॑- में मकर राशि पर चन्द्रमा के प्रभाव से जातक मृदुभाषी, मिलनसार, बुद्धिमान, धर्म के प्रति आस्था 
रखने वाला, भ्रमणशील होगा। जातक भाग्यशाली, स्वावलम्बी, संगीत, कला एवं साहित्य के प्रति रूचि रखने वाला होता 
है। अध्ययनशील प्रकृति, ऐसे जातक की मानसिक शक्ति एवं कल्पनाशक्ति अच्छी होती है। भाई बहिनों का सुंख अच्छा 
होता है, विशेषकर बहिनों का। आरम्भिक जीवन में व्यवसाय के सम्बन्ध में भागदौड़ एवं यात्राएं अधिक होती हैं। 33 
वर्ष की आयु के बाद भाग्य में विशेष उन्नति होती है। देखें उदा कुं. नं. 83। जातक को पत्रकारिता, लेखन, सम्पादन 




















58 ब॒श्चिक लग्न में चंद्रफल 
प्रतिनिधित्व, वकालत, सेल्ज़मैन, क्रय-विक्रय आदि कार्यों में सफलता मिलने के विशेष योग हों । 
चतुर्थ भाँव॑-में कुम्भ राशि पर चन्द्रमा के प्रभाव से जातक का प्रारम्भिक जीवन कठिन एवं संघर्षपूर्ण रहता है। 
माता को कष्ट, परन्तु जातक माता-पिता के प्रति विशेष श्रद्धा भाव रखने वाला एवं लाभान्वित, भूमि, मकान, वाहन आदि 
सुखों की प्राप्ति हो परन्तु जातक को व्यवसाय में अति कठिनाइयों के बाद सफलता प्राप्त होती है । सरकारी क्षेत्रों से लाभ, 
यदि चन्द्र अशुभ ग्रह युक्त या दृष्ट हो तो जीवन 32 वर्ष की आयु तक असंतुष्ट एवं तनावपूर्ण रहता है । यदि गुरु आदि शुभ 
ग्रह से युक्त या दृष्ट हो तो माता-पिता की विशेष सहायता प्राप्त रहती है। पत्नी या पति भी नेक, ज्योतिष आदि विद्या में 
कुशल एवं सर्व प्रकार से सहायक होता है। देखें उदा. कुं. नं. 79। चन्द्र इस भाव का कारक होने से अन्य शुभ ग्रह 
गुरु ,भौम के संयोग से ही अच्छा फल प्रदान करता है। 
पंचम भांव-में मीन राशि पर चन्द्रमा के प्रभाव से जातक बुद्धिमान, उच्चशिक्षित, विद्वान, भाग्यशाली, प्रियभाषी, 
ईश्वर व धर्म के प्रति श्रद्धा भाव रखने वाला, ज्योतिष, संगीत, कला, मंत्र आदि गूढ़ विषयों में रूचि रखने वाला, जातक 
कल्पनाशील एवं नई-नई योजनाएं बनाने में कुशल तथा जातक अपने बुद्धिचातुर्य से धनोपार्जन करने वाला, धर्म, नीति, 
मन्त्र एवं ज्योतिष आदि विषयों में रूचि रखने वाला होगा। देखें उदा. कुं. नं. 84 
बह भांव॑-में मेष राशि पर चन्द्रमा के प्रभाव से जातक तीक्ष्ण बुद्धि वाला एवं चंचल स्वभाव परन्तु गुप्त युक्तियों द्वारा 
धनार्जन करने वाला होता है । परन्तु जीवन के पूर्वार्द्ध भाग में व्यवसाय के सम्बन्ध में विशेष उतार-चढ़ाव एवं संघर्ष रहते 
हूँ | शत्रुओं से विग्रह एवं स्पर्धा के कारण मानसिक तनाव एवं परेशानियों का भी सामना होता है । आकस्मिक धन के खर्च 
भी अधिक होते हैं । मातृ या स्त्री कष्ट, स्नायु दुर्बलता एवं उदर विकार एवं व्यवसायिक परेशानियां अधिक रहती हैं | यदि 
कुण्डली में चन्द्र-मंगल का स्थान विपर्यय योग हो एवं शनि उच्चस्थ हो तो जातक का भाग्योदय विदेश में होता है । देखें 
उदा. कु. ने. 76 एवं 74 ह 
ब॒त्प्तमग भीाव॑-में वृष राशि पर चन््रमा होने से जातक आकर्षक व्यक्तित्व वाला सुन्दर मुख, भाग्यशाली, 
उच्चाभिलाषी, उच्च तकनीकि विद्या प्राप्त बाल्यकाल में अस्वस्थ शरीर, परन्तु विवाह के पश्चात्‌ भाग्य एवं व्यवसाय में 
अच्छा लाभ व उन्नति प्राप्त होगी। पत्नी सुन्दर, योग्य एवं पति के लिए हर प्रकार से सहायिका होगी। यदि शुक्र भी 
शुभस्थ हो तथा बुध के साथ योग करता हो तो जातक अनेक शिल्प कलाओं में कुशल तथा वह अनेक संसाधनों एवं 
युक्तियों से धन का अर्जन करने वाला होता है | देखें उदा. कुण्डली नं. (75) यदि सप्तम में चन्द्र, शनि, मंगल आदि का 
सम्बन्ध हो तो जातक को विवाह या संतान सुख में बाधक एवं कमी करता है । देखें कुं. नं. 82 
अष्टम भाँव॑-में मिथुन राशि पर भाग्येश चन्द्रमा के प्रभाव से जातक चंचल एवं अस्थिर स्वभाव वाला, गुप्त 
परेशानियों से चिन्तित, धन प्राप्ति एवं लाभ के अनेक अवसर आने पर भी उनका विशेष लाभ नहीं उठा पाता, व्यवसायिक 
एवं घरेलू उलझनों के कारण मानसिक तनाव व शारीरिक कष्टों का भी सामना रहता है। आकस्मिक धन के खर्च भी 
अधिक होंगे। माता को अरिष्ट कारक | यद्यपि ऐसा जातक गुप्त युक्तियों द्वारा निर्वाह योग्य आय के साधन बना ही लेता है । 
यदि चन्द्र के साथ राहु, शुक्र, शनि आदि अशुभ ग्रहों का योग या दृष्टि हो तो जातक को नेत्र रोग, पत्थरी, मधुमेह, प्रमेह 
आदि गुप्त रोगों का भय एवं आर्थिक परेशानियां तथा कार्यों में बार-बार विघ्न उत्पन्न होते हैं । 
नंव॑म॑ भाँव-में स्वगृही कर्क राशि पर चन्द्रमा के प्रभाव से जातक भाग्यशाली, सुन्दर मुख, चंचल किस्तु श्रेष्ठ 
बुद्धि, उच्च-शिक्षित, धार्मिक एवं लोक सेवा कार्यों मे रूचि लेने वाला व परोपकारी स्वभाव, संगीत, कला, साहित्य एवं 
ज्योतिष आदि में रूचि लेने वाला होगा। चन्द्र यदि गुरु, भौमादि ग्रह से युक्त या दृष्ट हो तो जातक दीर्घायु, माता, पिता, 
भूमि, धन सम्पदा, वाहन आदि सुखों से सम्पन्न होता है । विदेश आदि में भी भाग्योन्नति के योग बनते हैं | विवाह के बाद 
विशेष भांग्य वृद्धि होती है। स्त्री सुन्दर एवं गुणी एवं सहायक होती है। देखें उदाहरण कुं. नं. 78 





बश्चिक ल्नमेंचदचषफल ____ _______|॒॒|| | ॒ “॒_३औ ऋ३औ३|[आ_औ[औऋ ऋ[ऋ[औ[॒[॒[॒[॒[॒._.__ू.  ___ 59 

यदि चन्द्र क्षण अथवा शनि, राहु आदि युक्त या दृष्ट हो तो उपरोक्त सुखों में कमी तथा भाग्योन्नति में बार-बार विध्न 
तथा कौटुम्बिक सुख में बाधाएं होती हैं। 

दघ्घाम भाँव- में सिंह राशि पर भाग्येश चन्द्रमा के प्रभाव से जातक कार्यकुशल, बुद्धिमान, दयालु एवं यशस्वी 
होता है। ऐसा जातक मिलनंसार, उच्चाकांक्षी, प्रभावशाली मित्रों से सम्बन्ध रखनें वाला तथा अत्यन्त संघर्ष के पश्चात्‌ 
व्यवसाय में धनार्जन करने वाला, विवाह के बाद माता-पिता एवं स्त्री का विशेष योगदान प्राप्त करने वाला होता है। सूर्य 
शुभस्थ हो, या चन्द्र पर गुरु का योग या दृष्टि हो तो जातक को भूमि, मकान, वाहन आदि के सुख भी यशथेष्ठ होते हैं । यदि 
चन्द्रमा क्षीण हो अथवा शनि, राहु आदि पापग्रह से युक्त या दृष्ट हो तो व्यवसाय एवं धन लाभ में विघ्न बाधाएं रहती हैं 
तथा व्यवसाय के प्रति जातक असंतुष्ट होता है। दन्त रोग, शिर पीड़ा, उदर रोगादि का भय होता है। देखे उदा. कुं. नं. 85 

एकादद्नां भांव- में कन्या राशि पर चन्द्रमा के प्रभाव से जातक बुद्धिमान किन्तु चंचल बुद्धि, गौरवर्ण, लोकप्रिय 
पराक्रमी, सामान्य एवं उच्च प्रतिष्ठित लोगों से सम्बन्ध रखने वाला, गुणी, कार्य-कुशल, ज्योतिष, मन्त्र, शास्त्र-पुराण आदि 
में रूचि रखने वाला, भ्रमणप्रिय, सरकारी क्षेत्रों से सम्पर्क, विभिन्न स्रोतों एवं उपायों से धनार्जन करने वाला एवं योजनाएं 
बनाने में कुशल होता है। प्रारंभिक जीवन संघर्षपूर्ण होता है। जातक सुशील एवं कार्यकुशल स्त्री से विशेष सहयोग एवं 
* सुखी तथा भूमि, धन, आवास, सवारी, सनन्‍्तान आदिं सुखों से सम्पन्न होता है। गुरु मंगल एवं शनि आदि ग्रह शुभस्थ हों 
तो जातक बहु-विद्याओं का जानकार, विस्तृत व्यवसाय, सन्तान एवं भ्रातृ आदि सुखों से युक्त होता है। देखें उदा. कुं. न॑ 
80 एवं 8॥ 

यहां चन्द्र पर शनि, राहु आदि ग्रहों का योग या दृष्टि हो तो जातक को व्यवसाय में बहुत कठिनाइयों एवं अड़चनों के 
बाद सफलता मिलती है। 

द्वादद्ा भांव॑- में तुला राशि पर चन्द्रमा के प्रभाव से जातक के भाग्य में कमी अथवा जीवन का पूर्वार्द्ध भाग विशेष 
: संघर्षपूर्ण होता है। धन लाभ अल्प व खर्च अधिक रहते हैं, यद्यपि शुभ कार्यों पर खर्च अधिक होते हैं। नेत्रों में कष्ट व 
सर्दी, जुकाम आदि कफ विकार से पीड़ित, भ्रमणशील एवं व्यवसाय में दौड़-धूप अधिक -एवं संघर्ष व कठिनाइयों के 
बाद सफलता प्राप्त करता है। स्त्री के साथ सम्बन्ध तनावपूर्ण रहते हैं। जातक कल्पनाशील तथा विदेश में अधिक सफल 
होता है। यदि द्वादशस्थ चन्द्रमा पर मंगल, गुरु, बुधादि ग्रहों की दृष्टि हो तो जातक चार्टिड अकाऊंटैंट (0.0), .4.5 
६.8./..) इत्यादि उच्च प्रतिष्ठित व्यवसाय द्वारा अच्छा धनार्जन करता है| देखें उदा, कुण्डली नं. (77) 


रैचक लग्न : द्वादश भावों में मंगल का फल 


..._ नोट : बृश्चिक लगन में मंगल लग्नेश एवं षष्ठेश होने से विशेष महत्वपूर्ण स्थान. 
रखता है। बारह भावों में उसके फल का निर्णय करते समय उसके साथ गुरु, सूर्य, चन्द्र . बृश्चिक लग्ने मंगल फल 
आदि ग्रहों का योग व दृष्टि आदि का भी ध्यान रख लेना चाहिए। रा ं 

प्रथम भांव-में स्वगृही राशि बृश्चिक में मंगल के प्रभाव से जातक साहसी 

चुस्त, परिश्रमी एवं आकर्षक व प्रभावशाली व्यक्तित्व का स्वामी होता है। मानसिक व 

शारीरिक शक्ति अच्छी होती है। ऐसा जातक उच्च-अभिलाषी, निर्भीक एबं अपने 

पराक्रम से जीवन में लाभ व उन्नति करने वाला, स्वाभिमानी प्रकृति का होगा। माता 
भूमि एवं मकान आदि के सुख में कमी रहती है। व्यवसाय में विघ्न बाधाओं के पश्चात्‌ 
सफलता हो | पत्नी/पति में वैचारिक भिन्नता अथवा सुख में कमी हो । यहां पर मंगल 

होना मंगलीक दोष कारक भी माना जाता है। जोकि वैवाहिक सुख में बाधक होता है । यदि लग्न में मंगल व गुरु का योग 












60 _ _ __ __ ____  ॒॒ _॒_[_[॒_[_[_[॒॒॒_]_[_[॒_]_ वृश्चिक लग में मंगल फल 
हो तो जातक मेधावी, धार्मिक प्रवृत्ति वाला, गुणी एवं विद्वान होता है । यदि मं.-शुक्र का योग हो तो जातक कामुक, क्रय- 
विक्रय में कुशल, ऐश-परस्त तथा मनोरंजन आदि कार्यों पर खर्च करने वाला होता है। मंगल-शनि, मंगल-राहु आदि 
योग होने से जातक को व्यवसाय के क्षेत्र में अधिक संघर्ष होते हैं । देखें उदा. कुं. 84 
द्वितीय भांव-में मित्र धनु-राशि पर मंगल के प्रभाव से जातक दृढ़-निश्चयी, बुद्धिमान, शिक्षित एवं अपने परिश्रम 
व-बुद्धि-चातुर्य से धन अर्जन करने वाला होता है। परन्तु मंगल यहां से भाग्य स्थान को नीच दृष्टि से देखने से भाग्योन्नति 
में अनेक कठिनाइयां पड़ती हैं । परन्तु विघ्न/बाधाओं के बावजूद जातक निर्वाह योग्य आय के साधन बना लेता है | द्वितीय 
भाव का मंगल जातक को स्पष्टवादी, सत्यप्रिय, दृढ़ निश्वयी, सोच समझ कर खर्च करने वाला, सद्‌ व्यवहार करने वाला, 
उच्च विद्या, भूमि, सन्‍्तान आदि सुखों से युक्त होता है। व्यवसाय में भी अड़चनों के बाद सफलता मिलती है । यदि यहां 
मंगल पर गुरु, चन्द्र आदि शुभ ग्रहों का योग या दृष्टि हो तो शुभ फलों में वृद्धि होती है। 
तृतीय भांव॑-में मकर (उच्च) राशि पर मंगल होने से जातक पराक्रमी, परिश्रमी, अग्रज, साहसी, भ्रमणशील एवं 
भूमि, वाहन आदि सुखों से युक्त होता है। यहां से मंगल चतुर्थ दृष्टि से छटे स्वराशि को तथा सातवीं दृष्टि से भाग्य स्थान 
की नीच राशि को देखने से जीवन में अनेक कठिनाइयों एवं भाग्य सम्बन्धी संघर्षों के बावजूद जातक अपने पराक्रम एवं 
पुरुषार्थ द्वारा अपने कार्य-क्षेत्र में लाभ व उन्नति प्राप्त कर लेता है। जातक को चाचा आदि सम्बन्धियों की ओर से 
परेशानी परन्तु पिता की सहायता एवं सुख भी प्राप्त करता है। यदि मंगल के साथ गुरु का योग या दृष्टि आदि का सम्बन्ध 
हो तो जातक तीकब्र बुद्धि, सुशिक्षित, व्यवसाय में उन्नतशील, धार्मिक एवं ज्योतिष आदि विषयों में रूचि, परोपकारी, 
परिवार का सहायक, गुणी, सुशील स्त्री, सन्‍्तान व वाहन आदि सुखों से सम्पन्न होता है । देखें उदा. कुण्डली नं. (80) 
तथा 85 
चतुर्थ भाँव-में शनि ग्रह की कुम्भ राशि पर मंगल होने से जातक स्वाभिमानी, भ्रमणशील, उच्चाभिलाषी, अशान्त 
मन, माता, भूमि, मकान, जायदाद आदि से परेशानी के बाद लाभ प्राप्त करने वाला, व्यवसाय में भी अत्यन्त संघर्ष एवं 
कठिनाइयों के पश्चात्‌ आय के साधन बन पाते हैं। सप्तम भाव पर दृष्टि होने से स्त्री सुख में कमी एवं वैमनस्थ की 
सम्भावना होती है। चतुर्थ भावस्थ मंगल मंगलीक दोष कारक भी होता है । विवाह सुख में यह योग विचारणीय होता है। _ 
पंचम भांव-में गुरु की मीन राशि पर मंगल के प्रभाव से जातक तीक्ष्ण बुद्धि, परिश्रमी परन्तु क्रोध अधिक आता 
है। विघ्नों के बाद उच्च शिक्षा प्राप्त होती है। शत्रुओं एवं बाधाओं पर गुप्त युक्तियों द्वारा व्यवसाय में सफलता प्राप्त करता 
है। यदि सूर्य, गुरु, चन्द्र आदि का पारस्परिक योग व दृष्टि आदि का सम्बन्ध हो तो जातक चार्टिड अकाऊंटस अथवा 
उच्च स्तरीय क्षेत्र में विशेष लाभ व उन्नति प्राप्त करता है। पिता द्वारा विशेष लाभान्वित होता है। 
चन्द्र पर मंगल, गुरु आदि की दृष्टि होने से विघ्नों के बावजूद उच्च प्रतिष्ठित लाभ, स्त्री एवं पुत्र, सन्‍्तान का सुख प्राप्त 
होता है ।.देखें उदा. कुं. नं. 77 ऐसा जातक चिकित्सा आदि क्षेत्र में विशेष सफल हो सकता है। 
षष्ठ भांव-में स्वगृही मेष राशि पर मंगल होने से जातक कठिन परिश्रमी, स्वाभिमानी, उद्यमी, धैर्यशाली, अच्छी 
पाचनशक्ति; भूमि, मकान, वाहन आदि सुखों सें युक्त, शत्रुओं एवं संकटों पर विजय प्राप्त करने वाला तथा कार्य-व्यवसाय 
में विध्न-बाधाओं के बावजूद निर्वाह योग्य आय के साधन जुटा लेने वाला, परन्तु वृथा खर्च भी बहुत अधिक रहता है। 
लेखन, कला, संगीत आदि का विशेष शौक रहे । यदि यहां मंगल, राहु आदि अशुभ ग्रह से युक्त या दृष्ट हो तो जातक को 
उदर, रक्त विकार व मानसिक उदवेग रहता है।._ 
बैसे ३,.६ या ११वें मंगल, शनि, राहु अरिष्टों का नाश करके सुखों में वृद्धि करते हैं । 
ज्ंप्तम भाँव॑-में वृष राशि पर मंगल होने से जातक पराक्रमी, परिश्रमी एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व का स्वामी होता 
है। परन्तु व्यवसाय के सम्बन्ध में विघ्नों एवं परेशानियों के बाद सफलता प्राप्त करने वाला, लेन-देन अथवा सांझेदारी के 








बृश्चिक लग्नमेंमंगलफल ___..अअअ##|ऋ|ऋ|ऋ।ऋ|ऋ_|ऋ|ऋ|ऋ|ऋ|ऋऑ खञखक  हटछ 
कामों में नुकसान, धनार्जन एवं आजीविका के विषय में दूर स्थानों में भ्रमण करने वाला तथा धन का. अपव्यय (वृथा 
खर्च) भी बहुत होता है! वैवाहिक सुख में विलम्ब एवं अड़चनें होने के संकेत। यहां पर मंगल की स्थिति मंगलीक 
दोषकारक होती है जो कि बाधाकारक होता है। मंगल यदि शनि, राहु आदि से युक्त या दृष्ट हो तो जातक गुप्त रोगी, निन्द्य 
कर्म करने वाला तथा स्त्री सुख अथवा स्त्री की कुण्डली में पति के सुख में कमी करता है।.... ह 
अष्टम भाव-में मिथुन राशि पर मंगल के प्रभाव से जातक शारीरिक कष्टों से युक्त, परिश्रमी एवं पराक्रमी होता 
है। कठिन परिस्थितियों एवं संघर्ष के बावजूद व्यवसाय में निर्वाह योग्य विभिन्न स्रोतों से आय के सांधन बना लेता है। 
ज्योतिष, तंत्र-मंत्र आदि विद्याओं में रूचि, धनार्जन में विभिन्न साधनों एवं गुप्त युक्तियों का आश्रय लेता है। यद्यपि भाई- 
बहिन का सुख होता है परन्तु जातक स्वावलम्बी अर्थात्‌ जातक निज उद्यम एवं पराक्रम से लाभ व उन्नति प्रात्त करने वाला 
होता है। अष्टम भावस्थ मंगल, मंगलीक दोषकारक भी होता है, जो वैवाहिक सुख में कमी करता है । यदि मंगल शनि, 
राहु आदि ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो तो जातक को नेत्र कष्ट, वात रोग, मधुमेह, बवासीर या पत्थरी आदि के कारण आप्रेशन 
की संभावना रहे पुत्र सुख में कमी होती है। स्त्री की कुण्डली में भी सन्तानोत्पत्ति के समय आप्रेशन एवं गुप्त रोग की 
आशंका रहे। देखें उदा. कुण्डली नं. 75 । इस भौम को कोई शुभ ग्रह न देखे तो पुत्र सुख में कमी तथा ब्लड प्रैशर 
मधुमेह आदि गुप्त रोग की सम्भावना होती है। देखें उदा. कु. 82 
गनंवमग भाँव-में कर्क (नीच) राशि पर मंगल के प्रभाव से जातक चंचल मन एवं स्वच्छन्द प्रकृति का, पराक्रमी 
तीव्र-बुद्धिमान, परिश्रमी, स्वाभिमानी, अनेक प्रकार के उच्च-नीच लोगों से सम्बन्ध रखने वाला, कामुक प्रवृत्ति 
भ्रमणप्रिय, ऐशो-आराम एवं मनोरंजन आदि कृत्यों पर अधिक खर्च करने पर भी वांछित धन-लाभ नहीं हो पाता, 
भाग्योन्नति में विशेष उतार चढ़ाव एवं विघ्नों के पश्चात्‌ सफलता प्राप्त होती है। भाई-बहिनों के सुख की प्राप्ति भी 
परेशानियों के बाद होती है। विदेश में भाग्योदय के अधिक अवसर होंगे। देखें उदा. कुण्डली ने. 76। 
दषन्‍्नाम भाँव-में मित्र, सिंह राशि पर मंगल के प्रभाव से जातक पराक्रमी, तीब्रे बुद्धिमान, स्वाभिमानी, साहसी 
स्वस्थ एवं संतुलित शरीर तथा प्रभावशाली व्यक्तित्व का स्वामी होगा। ऐसा जातक उच्च विद्या प्राप्त, स्वावलम्बी 
भाग्यशाली, सेना, पुलिस अथना प्रशासनिक सर्विस में संलग्न होता है। देखें कुं. नं. 83 
.._ यहां मंगल यदि सूर्य, बुध आदि ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो तो जातक ज्योतिष, धर्म या योग आदि गूढ़ शास्त्र का 
जानकार होता है। ऐसा जातक स्वभुजबल से जीवन में लाभ व उन्नति प्राप्त करने वाला अर्थात्‌ 50[/]ध७०७ होता है। 
माता-पिता का विशेष सत्कार करने वाला होता है। देखें उदा. कुं. नं... 8॥ 
एकांदद्ां भाँव॑-में कन्या राशि पर मंगल के प्रभाव से जातक परिश्रमी, बुद्धिमान, उच्चाभिलाषी एवं परिवारिक 
सुखों से युक्त होता है। अत्यन्त संघर्ष एवं बाधाओं के साथ उच्च विद्या की प्राप्ति होती है। ज्योतिष दर्शन एवं योग आदि 
बौद्धिक विषयों में भी विशेष रूचि होती है। जातक भूमि, मकान, वाहन, स्त्री एवं सन्‍्तान आदि सुखों से युक्त, यदि मंगल 
सूर्य, बुध आदि ग्रहों से युक्त हो तो जातक अध्ययनशील, बौद्धिक कार्यों में कुशल एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में सफलता 
प्राप्त करता है। गुरु का भी योग या दृष्टि आदि का सम्बन्ध हो तो जातक अध्यापन, चिकित्सा, वकालत एवं इंजीनीयरिंग 
आदि के क्षेत्र में भी अच्छी सफलता प्राप्त कर सकता है। 
द्वांदपा भाव-में शुक्र की तुला राशि पर मंगल होने से पराक्रमी, उद्यमी एवं भ्रमण करने वाला होता है। विदेश 
आदि बाहरी सम्बन्धों से विशेष लाभ॑ प्राप्त करने वाला तथा जातक कामुक एवं मनोरंजन व ऐश-परंस्तीं के कामों में 
अधिक व्यय करने वाला होता है। भाइयों का सुख विशेष रुपेण प्राप्त करने वाला, तथा स्वयं भी भाइयों के लिए 
लाभकारक होता है। स्त्री के सुख में कमी होती है। व्यवसाय में भी अत्यन्त संघर्ष के बाद आय के साधने बन पाते हैं। 
द्वादश भावस्थ मंगल मंगलीक दोष्कारक भी होता है जो कि गृहस्थ सुख में बाधाकारक होता है। यहां मंगल यदि शनि 
या बुध के साथ हो तो जातक को विचित्र बीमारियों के कारण कष्ट होता हैं। देखें उदा. कुंण्डली नं. 79 








62 _____॒_[_[_॒_॒_[_॒०औ०ऑ०[॒०॒_[_[_[_[_[॒_॒[॥ई[]॒]॒]॒]॒]॒]औ०]०" __लृश्चिक लग्न में बुधफल लग्न में 


| बृश्चिक लग्नगत द्वादश भावों में बुध का फल) 

बुश्चिक कुण्डली में बुध आठवें (आयु) और 4१वें (लाभ) किन्तु त्रिषडाय स्वामी. बृश्चिक लग्ने बुध फल... 
होने से अकेला शुभफली नहीं हो जाता। अन्य ग्रहों के सहचर्य से विशेष शुभाशुभ फल ्न्न्नन्जुछ ४ 
प्रदान करता है। बृश्चिक लग्न में यह ग्रह सूर्य, चन्द्र, शनि, ग्रहों के साथ शुभ एवं शुक्र 
गुरु ग्रहों के साथ मिश्रित प्रभाव करता है। 

प्रथम भांव-में बुश्चिक राशि पर बुध के प्रभाव से जातक विनोदप्रिय, निर्बल 
शरीर, चंचल बुद्धि, व्यवहार कुशल, बोलने में कुशल, शिक्षित, चिकित्सा, ज्योतिष >> ; 
गणित, संगीत, गायन, कला आदि में रूचि, अच्छी स्मरणशक्ति वाला एवं तर्क-वितर्कमें 
कुशल होगा। अत्यधिक परिश्रम के बावजूद धन लाभ मध्यम होता है। कल्पनाशील 
पठन-पाठन एवं लेखन आदि कर्मों में भी रूचि हो | यदि भौम, केतु आदि क्रूर ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो तो फोड़े, फुंसी 
रक्त विकार, चर्मरोग आदि एवं उदर विकार आदि होते हैं। मन भी अशांत हो। लग्न भावस्थ बुध का जातक चतुर बुद्धि 
होने से सुगमता से किसी-के काबू नहीं आता। यदि बुध और मंगल का योग हो तो जातक क्रोधी स्वभाव एवं दुर्घटना से 
चोटादि का भय होता है, जातक को जड़ी-बूटी, तैलादि वस्तुओं के व्यापार से लाभ होता है। ह 

द्वितीय भांव-में धनु राशि पर बुध के होने से जातक बुद्धिमान, परिश्रमी, विद्वान, लेखन-कार्य एवं पठन-पाठन 
में विशेष रूचि रखने वाला, विभिन्न भाषाओं का ज्ञान रखने वाला, दीर्घायु में संतान सुख, खुशामद पसंद परन्तु लोगों के 
हित के लिए सद्वचन कहने वाला, व्यवसाय में अत्यधिक संघर्ष और कठिनाइयों का सामना करने वाला होता है। परन्तु 
ऐसा जातक गुप्त युक्तियों एवं बुद्धि-चातुर्य से धनार्जन करने वाला होगा। ऐसे जातक द्वारा उधार दिया हुआ अत्यन्त 
कठिनाई से वापिस मिलता है। यहां बुध अगर अस्तंगत अथवा पापग्रह से युक्त या दृष्ट हो तो शुभ फल नहीं होते। 

तृतीय भाव॑-में मकर राशि पर बुध के प्रभाव से जातक स्वतन्त्र विचारों वाला, विनम्र स्वभाव किन्तु कूटनीति का 
प्रयोग करने वाला, बाहरी तौर से धार्मिक विचारों वाला, व्यवहार-कुशल, धर्म, ज्योतिष, तंत्र-मंत्र आदि गूढ़ विषयों में 
रूचि रखने वाला, भ्रमणप्रिय एवं देश-विदेश में दीर्घ यात्राओं की सम्भावना हो। भाई-बहन के होते हुए भी उनके सुख 
में कमी रहे । हस्तशिल्प और तकनीकी कार्यों में कुशल हो। अत्यन्त दौड़धूप करने के पश्चात्‌ अधिक धन संचय नहीं हो 
पाता। यदि गुरु या सूर्य युक्त हो तो भूमि, जायदाद एवं वाहनादि सुखों की प्राप्ति होगी 

चतुर्थ भाव--में कुम्भ राशि पर बुध होने से जातक हुनरमंद, युवा-अवस्था के प्रारम्भ में अपनी शिक्षा एवं कलात्मक 
विद्या से विशेष लाभ न उठा पाए। देश-विदेश में यात्राएं करने के अवसर प्राप्त होंगे। डिजाईनिंग, कम्प्यूटरादि तकनीकी 
कार्यों में भी विशेष सफल, प्राकृतिक एवं पर्वतीय स्थानों पर घूमने का शौकीन हो । धर्म एवं योग शास्त्रादि में भी विशेष 
रूचि रखे। कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपने पुरुषार्थ से धनार्जन करने वाला एवं वाहनादि सुख-साधनों से सम्पन्न 
होगा। देखें उदा.. कुं. नं. 75 | 

ध्यान रहे, चतुर्थ भाव में बुध निष्फली माना गया है। अतएव इस भाव में क्रूर ग्रहों के साथ योग होने से रक्त विकार 
-चर्मरोग आदि अशुभफल घटित होने की भी सम्भावना रहती है। 

पंचम भाव-में मीन (नीच) राशि पर बुध होने से अस्थिर एवं चंचल बुद्धि, हुनरमंद एवं तकनीकी विषयों का 
“जानकार, बुद्धिमान परन्तु उच्चविद्या प्राप्ति में विष्न-बाधाएं हों । संतान सुख कम हो अथवा अल्पसन्तति (कन्यादि) का 
सुख हो । यदि गुरुयुक्त या दृष्ट होने से उपाय स्वरूप पुत्र सन्‍्तति का सुख प्राप्त होता है। आय के क्षेत्र में भी विघ्न-बाधाओं 
एवं संघर्ष के बाद धन लाभ एवं उन्नति के मार्ग प्रशस्त होते हैं। नीच बुध के कारण ऐसे जातक की आर्थिक स्थिति प्रायः. 
अस्थिर रहती है। ऐसे जातक ज्योतिष, यंत्र-मंत्रादि गुप्त शास्त्रों में भी रूचि रहे | शुक्र से युक्त हो तो कन्या सन्तति होती 

















बश्चिक लग्नममेंबुधधल ___ __ _ __॒_[_[][][]_॒__.___॒॒॒ . _________ 6६3 | द 63 

है। देखें उदा. कुं. 82 

बुध यदि अशुभ ग्रह से युक्त हो तो जातक व्यसनी एवं जुआरी होता है। अथवा विकृत प्रकृति की संतान होती है। 

षष्ठ भांव-में मेष राशि पर बुध होने से जातक संघर्षशील, तीक्ष्ण बुद्धि तथा अपनी बुद्धि द्वारा शत्रुओं पर विजय 
प्राप्त करने वाला, व्यवसाय में गुप्त युक्तियों द्वारा निर्वाह योग्य आय के साधन प्राप्त करने वाला होता है । परन्तु द्वादश भावस्थ 
तुला राशि पर विशेष दृष्टि होने से ऐशप्रस्ती तथो मनोरंजन आदि. कार्यो पर धन का खर्च अधिक करने वाला होता है। 
देश-विदेशों में भी भ्रमण के अवसर प्राप्त होते हैं । यदि यहां बुध के साथ शनि, राहु आदि क्रूर ग्रह हों, तो, त्वचा रोग, रक्त 
विकार, उदर विकार एवं मामा को कष्ट आदि, यदि मंगल का योग अथवा दृष्टि होने से दुर्घटना में चोटादि का भय हो। 
यदि सूर्य-गुरु व बुध का योग हो, तो जातक उच्चशिक्षित एवं लेखाकार ((2..4) इत्यादि उच्चप्रतिष्ठित व्यवसाय द्वारा 
लाभान्वित होता है। देखें उदा. कुं. नं. 77 

अप्तंम॑ भाँव-में वृष राशि पर बुध के प्रभाव से जातक चंचल एवं अस्थिर मन वाला, कामुक प्रवृत्ति 
विलासप्रिय, दूसरों के कहने से शीघ्र उत्तेजित होने वाला, गणित, ज्योतिष, संगीत-कला एवं साहित्य की ओर अभिरूचि 
रखने वाला, मकान, वाहन आदि शानो-शौकत पर खर्च करने वाला होगा। शराबादि व्यसनों की तरफ भी रूचि होने के 
योग हैं । साधन सम्पन्न, दीर्घायु, सुशील एवं सुशिक्षित पत्नी मिलती है । ऐसा जातक अध्ययनशील एवं उसको पठन-पाठन 
एवं लेखनादि कार्यों का शौक रहता है। यदि यहां बुध निर्बल अथवा राहु आदि पापग्रहों से दृष्ट हो तो उपरोक्त सुखों में 
कमी होती है तथा जातक गुप्त रोगों से ग्रस्त रहता है। 

अंटम भांव-में बुध मिथुन (स्वराशि) गत होने से जातक कुशल बुद्धि वाला, अनेक विद्याओं और गुणों से युक्त, 
अध्ययनशील, आध्यात्म-ज्योतिष, मंत्र-तंत्रादि गूढ़ विषयों में रूचि रखने वाला, अतिथि सत्कार करने में तत्पर, देश 
विदेशों में व्यवसाय के सम्बन्ध में धन-लाभ एवं उन्नति प्राप्त करने वाला, उच्चाभिलाषी होता है। परन्तु जीवन के पूर्वार्द 
भाग में अत्यन्त कठिनाइयों एवं संघर्ष का सामना रहता है। ऐसा व्यक्ति गुप्त-युक्तियों द्वारा विदेश आदि में धनार्जन करके 

अपना तथा परिवार का पोषण करने वाला होता है। देखें उदा. कुं नं. 76 

यदि शनि-राहु आदि ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो तो जातक गुप्त रोग, वायु रोग एवं त्वचादि रोगों से पीड़ित होता है। उदर 
रोगी, शिर दर्द एवं मामा के सुख में कमी करता है। 

- गवम्‌ भाव-में बुध कर्क में होने से जातक बुद्धिमान, विद्वान एवं उच्चशिक्षित परन्तु उच्चशिक्षा एवं भाग्य के 
सम्बन्ध में विध्न-बाधाओं के बाद सफलता मिलती है। भाई-बहिनों का सुख एवं सहयोग प्राप्त होता है । व्यवसाय में भी 
कठिनाईयों एवं संघर्ष के पश्चात्‌ लाभ व उन्नति प्राप्त करने वाला होता है। धर्म-अध्यात्म, ज्योतिष, तन्त्रादि विषयों की 
जानकारी रखने वाला, कवि और धन-सम्पदा एवं वाहनादि सुखों से युक्त अथवा सम्पन्न होता है। ऐसा जातक धर्मपरायण 
एवं परोपकारी होता है। परन्तु यदि बुध अस्त या वक्री हो तो जातक नास्तिक एवं अनैतिक आचरण करने वाला होगा। 

. दक्षम्‌ भांव॑-में सिंह राशि पर बुध होने से जातक बुद्धिमान, उच्चाभिलाषी, उच्चशिक्षित (विशेषकर व्यवसायिक 
विद्या में), उच्चप्रतिष्ठित लोगों के साथ सम्पर्क रखने वाला, व्यवहार-कुशल, पिता से भी लाभान्वित होने वाला एवं 
उच्चस्तरीय व्यवसाय से सम्बन्धित होता है। यद्यपि व्यवसाय में कठिनाइयों के साथ सफलता ग्राप्त करता है। भूमि-आवासं एवं 
सवारी आदि सुखों से सम्पन्न होता है। यदि बुध राहु-शनि आदि क्रूर ग्रहों से युक्त हो, तो पिता के सुख में कमी तथा व्यवंसाय 
में संघर्ष अधिक एवं लाभ कम होता है। सूर्य के साथ हो, तो विघ्नों के बाद सफलता देता है। देखें कुण्डली नं. 83 
एकादब्ा भाव॑-में स्वगृही कन्या राशि पर बुधं के प्रभाव से जातक उदारहदय, उच्चप्रतिष्ठित मित्रों से युक्त 
स्वाभिमानी, ज्योतिष, चिकित्सा, गणित एवं साहित्यादि कार्यों में रूचि रखने वाला हो | यद्यपि उच्चविद्या विध्न-बाधाओं 
के पश्चात्‌ ही प्राप्त होती है। ऐसा जातक प्राध्यापक, वकालत, क्रय-विक्रय, लेखन, प्रकाशन, डाक विभाग आदि कार्यों 








0478 % 34% 3 थ लत: अमाद अंक आर 3ल 3080 पा जन 32200 टतंप)५ ४८४० #-- 7 जश्चिक लग्न मेजर पाया 
में अच्छी सफलता प्राप्त कर सकता है। विदेश आदि सम्बन्धों से अकस्मात्‌ धन लाभ की सम्भावनाएं भी होती हैं। पुत्र 
संतान की अपेक्षा कन्या सन्‍्तति अधिक होती है | ऐसा जातक संगीतप्रिय, विद्वान, सुन्दर एवं भाग्यशाली स्त्री का स्वामी, 
भूमि, मकान, वाहन आदि सुखों से युक्त होता है। 

द्वादप्मां भांव-में मित्र ग्रह शुक्र की राशि में बुध होने से जातक चंचल एवं अस्थिर बुद्धि वाला, देश-विदेश की 
यात्रा एवं विदेश यात्रा से लाभान्वित होने वाला, लेखन, प्रकाशन, नीति-युक्त वाणी का उच्चारण करने वाला तथा अनेक 
गुप्त-युक्तियों द्वारा कठिनाइयों के पश्चात्‌ धन लाभ प्राप्त करने वाला होता है | परन्तु शुक्र की राशि होने के कारण जातक 
कामुक प्रवृत्ति वाला, भावुक एवं सिनेमा, संगीत व कलात्मक विषयों में रूचि रखने वाला, भ्रमणप्रिय तथा अत्याधिक 
अपव्यय (फिजूलखर्च) के कारण चिन्तित एवं अशान्त रहने वाला होगा। स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता। देखें उदा. कुं. नं. 
79, 80, 8॥ 








(बृश्चिक लग्न गत द्वादश भावों में जुरु का फल] 
विशेष- बृश्चिक कुण्डली में गुरु धनेश एवं पंचमेश होने से विशेष महत्त्वपूर्ण होता. बृश्चिक लग्ने गुरु फल 


है | यह ग्रह श्रेष्ठ बुद्धि, शास्त्र ज्ञान, विद्या, पति, बड़ा भाई आदि सुखों का कारक है तथा 
कुं. में सू. चं. एवं मंगल आदि ग्रहों के साथ शुभ भावों में हो तो विशेष अच्छा फल देता > 


है। 
प्रथम भाँव॑-में बृश्चिक राशि पर गुरु होने से जातक पुष्ट शरीर, प्रभावशाली 22228 


व्यक्तित्व, विवकेशील, गुणी, धेर्यशील, किन्तु कुछ तेज स्वभाव, परन्तु परोपकारी, 9 
दीर्घायु, धन-धान्य से युक्त एवं परिवारिक सुखों से सम्पन्न व प्रतिष्ठित व्यक्ति होता है। 
यहां से गुरु की पंचम एवं नवम भावों पर शुभ दृष्टियां पड़ने से जातक बुद्धिमान, # तक पद. 
उच्चशिक्षित, अध्ययनशील, धर्मपरायण, ज्योतिष, धर्मशास्त्रादि विषयों में रूचि, पुत्र आदि सनन्‍्तान का सुख, भाग्यशाली, 
व्यवसाय में रुकावटों के बाद सफलता प्राप्त करने वाला होता है। निजी गुणों एवं पुरुषार्थ के बल पर जीवन में लाभ व 
उन्नति प्राप्त करता है | यदि यहां गुरु के साथ मंगल या सूर्यादि का योग या दृष्टि आदि का सम्बन्ध हो तो जातक पिता के 
लिए भाग्यकारक, डाक्टर, वैद्य, प्राध्यापक, वकील, न्यायाधीश, सम्पादक, लेखन आदि कार्यों से लाभ व उन्नति करने 
वाला होता है। लग्न में चन्द्र गुरु एवं केतु का सम्बन्ध हो,तो जातक का कद बहुत ऊंचा एवं वह धनाढय होता है। सूर्य, 
गुरु का योग होने से जातक धन, सम्पदा, सन्‍्तान (पुत्र) के सम्बन्ध में भाग्यशाली हो | देखें कुं.-85 

द्वितीय भांव-में स्वगृही धनु राशि पर गुरु होने से जातक बुद्धिमान, उच्चशिक्षित, साहसी, स्वाभिमानी, गम्भीर 
वाणी, धनी, सम्पन्न एवं परिवारिक सुखों से युक्त होता है । ऐसा जातक पिता के लिए लाभकारक, समाज में प्रतिष्ठित, श्रेष् 
मित्रों से युक्त, शत्रुओं को गुप्त युक्तियों से दबाने वाला, दीर्घायु वाला, पैतृक सम्पदा में वृद्धि करने वाला एवं गुणवान होता 
है । धार्मिक प्रवृत्ति, ज्योतिष, मंत्र, तन्त्र आदि विषयों में रूचि, उच्च स्तरीय व्यवसाय अथवा उच्चपद द्वारा लाभान्वित होने 
के योग। यदि सूर्य शुभस्थ हो तथा दूसरे गुरु पर मंगल का योग या दृष्टि आदि का सम्बन्ध हो तो जातक/जातिका 
चिकित्सा के क्षेत्र में सफल होता है। ध्यान रहे, गुरु इस भाव का कारक होने से अकेला होने की स्थिति में बहुत अच्छे 
फल प्रकट नहीं कर पाता। 

तृतीय भांव॑-में मकर (नीच) राशि पर गुरु के प्रभाव से जातक भाग्यशाली, बुद्धिमान, उदार हृदय, दीर्घकालीन 
योजनाएं बनाने में कुशल, व्यवहार कुशल, धर्म-परायण अर्थात्‌ धर्मशास्त्र एवं ज्योतिष आदि गूढ़ शास्त्रों में रूचि रखने 
वाला, भाई-बहिनों के सुख में कमी अथवा उनके व्यवहार से दुखी, उच्च-विद्या एवं आर्थिक क्षेत्र में भी अड़चनों एवं 
परेशानियों के पश्चात्‌ सफलता मिलती है। ससुराल के लिए भाग्योन्नतिकारक, भ्रमणप्रिय, लेखन, पठन-पाठन का भी 
शौक हो, व्यवसाय के सम्बन्ध में दौड़-धूप अधिक तथा खर्च भी अधिक रहे । व्यवसाय के सम्बन्ध में विदेश गमन की 


५0७2 . 





बश्चिक लग्ममेंगुरफल ______ऋ_ऋ_ऋऋ|ऋ|ऋ|ऋ|ऋ|ऋ|ऋ|ऋ|ऋ|ऋ।|ऋ_|[_ऋ_ऋ_[_ऋ_ऋ_ऋ_ऋ_|[_[_॒_॒_ऋ॒ ख््््््््र्ररर<ञ<य<>रतरक2् 5 
भी सम्भावना हो। ऐसा जातक परोपकारी और उदार हृदय भी होता है, देखें उदा. कु. नं. 75. | द 
चतुर्थ भाँव-में कुम्भ राशि पर गुरु के प्रभाव से जातक परिश्रमी, व्यवहार कुशल, उद्योगी, दीर्घायु, भूमि, मकान, 
चौपाय, वाहन आदि सुखों से सम्पन्न, माता-पिता के प्रति विशेष लगाव एवं सत्कार करने वाला होगा, यदि चन्द्र-गुरु का 
- योग हो तो जातक उच्च शिक्षित, भाग्यशाली, धार्मिक एवं परोपकारी प्रवृत्ति वाला, सन्तान सुख कुछ कठिनाइयों के बाद 
प्राप्त होता है। जातक को उच्च-विद्या प्राप्ति का लाभ की पूर्ण रूप से नहीं मिल पाता। । 
यद्यपि पिता द्वारा लाभ एवं कार्य-व्यवसाय में विघ्नों के बाद अच्छी सफलता प्राप्त करने वाला तथा वाहन एवं ऐश्वर्य 
आदि सुखों पर खर्च भी विशेष होता है । देखें उदा. कुं. नं. 79, मंगल-सूर्य भी शुभस्थ हो तो ऐसा जातक उच्च प्रतिष्ठित 
होता है। 
पंचम भांँव-में स्वगृही मीन राशि पर गुरु के प्रभाव से जातक प्रभावशाली, पराक्रमी, बुद्धिमान, तर्क-वितर्क करने_ 
में कुशल किंतु स्वाभिमानी, बड़ी आंखें, उच्चशिक्षित, सफल-वकौल, जज, उच्चप्रतिष्ठित पद या व्यापारी हो सकता है। 
यदि चन्द्र, सूर्य या भौमादि का योग या दृष्टि हो तो धार्मिक प्रवृत्ति, भाग्यशाली, किसी धार्मिक संस्था से भी सम्बन्धित, 
धर्म, ज्योतिष, मंत्र आदि शास्त्रों में रूचि, प्रसिद्ध व प्रतिष्ठित, प्रभावशाली, गम्भीर वाणी, भूमि, आवास, वाहन एवं स्त्री- 
सन्‍्तान आदि सुखों से युक्त होगा। ऐसा जातक अध्यापन, प्रबन्धन, राजनीति, चिकित्सा, वकालत, कैमिस्ट आदि क्षेत्रों में 
भी सफंल होता है । देखें उदा. कुं. 74 (8॥. [.. [(. ७०एक्षां) ः 
जातक नई-नई थोजनाएं बनाने में कुशल, दूरंदेशी, शेयर, लाटरी आदि द्वारा अचानक धन लाभ भी संभव हो सकता 
है। पुत्र सन्‍्तति के बाद विशेष भाग्योदय होता है। ध्यान दें, इस भाव में अकेला-गुरु किसी अन्य ग्रह द्वारा भी दृष्ट न हो 
तो वांछित शुभ फल देने में विफल होता है। पुत्र सन्‍्तति के सुख में भी बाधक देखा गया है । विशेषकर मीन या धनु 
राशियों में शास्त्र विहित उपायों द्वारा पुत्र सुख संभव है। 

'बछ्ठे भाव-में मेष राशि पर गुरु के प्रभाव से जातक कुशल बुद्धि वाला, विघ्न/बाधाओं के पश्चात्‌ उच्च विद्या प्राप्त 
करने वाला, उच्चपद प्रतिष्ठित अथवा उच्च स्तरीय व्यवसाय करने वाला, शत्रुओं एवं विरोधियों को परास्त करने में सक्षम, 
जातक भूमि, जायदाद एवं सवारी आदि सुखों से सम्पन्न । ऐसा जातक विभिन्न स्रोतों एवं गुप्त युक्तियों से धनार्जन करने में 
कुशल होता है, परन्तु परिवारिक उलझनों के कारण कई बार चिन्तनशील, माता-एवं मामा को कष्ट अथवा उनके सुख में 
कमी होती है। यदि यहां गुरु के साथ बुध एवं सूर्य का योग हो तो जातक उच्चपद प्राप्त एकाऊंट्स (0.2), प्रशासनिक 
आदि क्षेत्र में उच्चशिक्षित, पिता द्वारा विशेष सहायता प्राप्त एवं सुप्रतिष्ठित व्यक्ति होता है। देखें उदाहरण कु. नं. 77 

ब्वप्तम भांव-सप्तम भाव में वृष राशि पर गुरु के प्रभाव से जातक का पुष्ट शरीर, प्रभावशाली व्यक्तित्व, बुद्धिमान, 
स्वाभिमानी, उच्च-विद्या, भाइयों के सुख में कमी, कठिनाइयों के बाद व्यवसाय में गुजारे योग्य आय के साधन बनें। 
ज्योतिष, मंत्र, तंत्र एवं धार्मिक कार्यों में रूचि लेने वाला, पत्नी सुन्दर, चुस्त परन्तु पत्नी से वैचारिक विषमता रहे । जातक 
को पुत्र-सन्तान सम्बन्धी विशेष चिन्ता हो। यदि यहां गुरु के साथ चन्द्र या मंगल का योग या दृष्टि हो तो जातक उच्च 
प्रतिष्ठित तथा विदेश-यात्रा की सम्भावना होती है। 34वें वर्ष से में विशेष भाग्योदय होता है। देखें उदा. कुण्डली नं. 78 

' नोट- कुछ विद्वानों के अनुसार इस भाव में अकेला गुरु वैवाहिक सुख एवं व्यवसाय की दृष्टि से हानिकारक होता है। 
अष्टम भांव-में मिथुन राशि पर गुरु होने से जातक परिश्रमी, ईमानदार, चिन्तनशील, दीर्घायु, धन-धान्य, वाहन 
एवं परिवारिक सुखों से युक्त होने पर भी घरेलू उलझनों एवं सन्तान के सम्बन्ध में चिन्तित, उच्च-शिक्षा प्राप्ति में भी विघ्न/ 
बाधाएं हों, ज्योतिष, यन्त्र, तन्त्र आदि गूढ़ विद्याओं में रूचि रहे, माता, भूमि एवं मकान आदि सुखों की प्राप्ति में कुछ 
परेशानियां रहें । धन का अपव्यय (फिजूल खर्ची) अधिक रहे । व्यवसाय में विघ्नों एवं उलझनों के पश्चात्‌ गुजारे योग्य 
आय के साधन बनें, यदि गुरु पाप ग्रह युक्त या पाप दृष्ट हो तो जातक अधिक समय तक अपने पिता के गृह में नहीं रहता, 
जातक को पाचन क्रिया सम्बन्धी रोग जैसे प्रमेह, डायबिटीज़, लीवर एवं पेट विकार आदि गुर्दे के रोगों की सम्भावना 
होती है। गुरु शुभ दृष्ट हो, तो जातक की मृत्यु किसी तीर्थ आदि शुभ स्थान पर सुखपूर्वक होती है। 
नंवम भांव-में कर्क (उच्च) राशि पर गुरु के प्रभाव से जातक प्रभावशाली व्यक्तित्व, स्वाभिमानी, भाग्यशाली, 


65 


रे 








58 88248 0432. 0 "  ैृफै[ऑ[इौ$फ£  अश्चिक लाश हक तन फल. 
बुद्धिमान, विद्वान, ईश्वर में आस्था रखने वाला, उच्च स्तरीय व्यवसायी या उच्च पद प्राप्त प्रतिष्ठित, भूमि, वाहन, आवाम 
एवं पुत्रादि सुखों से युक्त, निज पराक्रम एवं भाग्यवश पुत्र संतति के बाद विशेष लाभ व उन्नति प्राप्त करने वाला होता है। 
जातक को धर्म, ज्योतिष, अध्यात्म, मंत्र, नीति, योगशास्त्र की ओर भी विशेष अभिरुचि रहती है। भाई-बहिनों से स्नेह 
रखने वाला, किन्तु उनसे सुख या सहायता की कमी रहती है। यदि शुक्र शुभस्थ हो तो स्त्री नेक, सुशील एवं सर्व प्रकार 
से सहायिका होगी । जीवन का 35वां वर्ष विशेष लाभप्रद एवं भाग्योन्नति कारक होगा | यदि गुरु के साथ मंगल, सूर्य, शनि 
आदि का योग, दृष्टि आदि का सम्बन्ध हो तो जातक प्रिंटिंग, प्रकाशन, लेखन, नेता, अभिनय, प्राध्यापन आदि से 
सम्बन्धित उद्योग से उच्चकोटि के लाभ व उन्नति प्राप्त करता है। ऐसा जातक सरकारी क्षेत्रों से तथा देश विदेश कौ 
यात्राओं द्वारा भी लाभ प्राप्त करने वाला होता है । देखें उदा. कुं. नं. 80 । यदि नवम गुरु के साथ मंगल का योग एवं भाग्येश 
चन्द्र व मंगल का परिवर्तन योग बन रहा हो तो जातक विदेशों में व्यवसाय द्वारा विपुल धन-सम्पदा का अर्जन करता है। 
देखें उदा. कुं. नं. 76 
दाम भांव-में सिंह राशि पर गुरु होने से जातक प्रभावशाली व्यक्तित्व, यशस्वी, उच्च विद्या प्राप्त, उच्चाधिकारी 
अथवा उच्च स्तरीय कार्य/व्यवसाय करने वाला, स्वतन्त्र विचारों वाला, स्वाभिमानी, अपनी प्रतिष्ठा के प्रति सावधान, 
माता-पिता का सत्कार करने वाला, उच्चस्तरीय रहन-सहन, माता-पिता एवं सरकारी क्षेत्रों से भी लाभ प्राप्त करने वाला 
तथा परिवारिक सुखों एवं भौतिक सुख-साधनों जैसे भूमि-जायदाद, सवारी आदि सुखों से समन्वित होता है| जातक 
अपने कर्तव्य के प्रति दृढ़ निश्चयी एवं निष्ठावान होता है । वह जो भी कार्य करता है, उसे अधूरा कभी नहीं छोड़ता, धर्म- 
कर्म, परोपकार एवं पारम्परिक मान्यताओं के प्रति आस्थावान। यदि गुरु के साथ मंगल व सूर्य का योग हो या सम्बन्ध 
हो, तो जातक उच्च सरकारी अफसर, बड़ा व्यापारी अथवा सूर्य-मंगल में स्थान विपयर्य सम्बन्ध हो तो जातक दन्त 
चिकित्सा, संगीत, पुस्तक लेखन, ज्योतिष, न्याय, कैमिकल आदि के शोध एवं अनुसन्धानात्मक कार्यों में सफल होता है। 
किन्तु यदि राहु का भी योग हो, तो अनेक अड़चनों के बाद कार्य व्यवसाय में सफल होता है । देखें उदा. कुं. नं. 8] तथा 
84 
एकादथां भीव॑-में कन्या राशि पर गुरु होने से पंचम भाव पर उसकी स्वगृही दृष्टि पड़ती है, जिसके फलस्वरूप 
जातक बुद्धिमान, परिश्रमी, उच्चशिक्षित, दीर्घायु, श्रेष्ठ मित्रों वाला, भाग्यवान, भाई-बहन, भूमि, मकान, स्त्री, सन्‍्तान आदि 
सुखों से युक्त । पिता के धन को बढ़ाने वाला, परन्तु धन का उपयोग विलासिता एवं वैभव प्रदर्शन में नहीं, अपितु परहित 
में होता है। सन्तानोत्पत्ति के बाद विशेष भाग्योदय होता है । इसके अतिरिक्त जातक का 32वां वर्ष विशेष घटनाप्रद होता 
है | कुण्डली में यहां चन्द्र-गुरु का योग हो तो भाग्यवश अकस्मात्‌ धन लाभ करवाता है । विदेश गमन से भी विशेष धन! 
सम्पदा की सम्भावना रहे | गुरु यदि केतु युक्त होकर शनि, राहु, चन्द्र आदि ग्रहों से दृष्ट हो तो जातक को भाई/बहन एवं 
परिवारिक चिन्ताएं एवं उलझनें अधिक रहें | स्त्री कुण्डली में एकादश गुरु समृद्ध एवं उन्नतशील व्यक्ति से विवाह का 
सूचक होता है । फिर भी जातक अपने पुरुषार्थ व परिश्रम से व्यवसाय में निर्वाह योग्य आय के साधन बना लेता है | किसी 
शुभ ग्रह से अदृष्ट अकेला गुरु भी यहां गृहस्थ जीवन के लिए शुभ नहीं माना जाता है | 
ढ्वांद्थां भीँव॑-में तुला राशि पर गुरु के प्रभाव से जातक उद्यमी, साहसी, स्वाभिमानी, भ्रमणप्रिय होता है, प्रायः 
अपने जन्मस्थान से बाहर-विदेश आदि में प्रवास करता है | परिवारिक सुखों में कमी, उच्च विद्या प्राप्ति में भी अड़चनें 
रहती हैं | प्रत्येक कार्य में आत्म प्रदर्शन की भावना अधिक होती है । यद्यपि भूमि, आवास एवं वाहन आदि सुखों की प्राप्त 
होती है परन्तु वृथा खर्च भी बहुत रहते हैं । सन्‍्तान सुख भी बाधाओं के साथ प्राप्त होता है । पंचम भाव में शुक्र शुभस्थ हो, 
तो स्त्री का सहयोग विशेष तौर पर अच्छा एवं लाभदायक होता है | ज्योतिषी, वकील, डाकटर, वैद्य, कैमिस्ट, ट्रांसपोर्ट 
उद्योग आदि के लिए यह योग शुभ होता है| देखें उदाहरण कुण्डली नं. 82, 83 । 
ऐसे जातक को अध्यात्म, योग, शास्त्र, तन्त्र आदि गूढ़ विद्याओं में भी रूचि रहती है । वृथा यात्राएं एवं खर्च अधिक 
होते हैं ।॥ फिर भी जातक गुप्त युक्तियों द्वारा धनार्जन करने में सफल रहता है । 





बृश्चिक लग्नमेंशुक्र फल _ __ ___ ___|[|[|[ _/“ह#हख़औप<प[२[६३६(खखजखजखझ चखबख बाबर ब ब ब बज  खड<डडडहड<डहडहछठ5ठ7 में फल । 67 


ब्श्चिक लग्नगत द्वादश भावों में शुक्र का फल) 
विशेष- शुक्र ग्रह सामान्यतः स्त्री, कामेच्छा, प्रेम, वासना, रूप-सौन्दर्य, आकर्षण, 
धन-सम्पत्ति, वाहन आदि संसारिक सुखों का कारक माना जाता है ।-बृश्चिक कुण्डली 
में यह स्त्री/पति एवं विवाह सुख, विदेश यात्रा, व्यय, शयन सुख आदि विषयों का 
विचार किया जाता है। हा 
प्रथम भाँव-में बृश्चिक राशि पर शुक्र होने से जातक मृदुभाषी, सुन्दर एवं 
आकर्षक व्यक्तित्व, शिल्प-कला में निपुण एवं गायन, संगीत, साहित्य की ओर रूचिं,' 
रसिक, राजसी स्वभाव, विलासप्रिंय एवं कामुक प्रवृत्ति होती है। खान-पान, सुन्दर 
वेष-भूषा का शौकीन, व्यवहार कुशल होते हुए भी कई बार स्वभाव में उतावलापन आ 
जाए एवं पेट में कोई बात न छिपा पाए। मध्यमशिक्षा, स्त्री सुन्दर सुशील एवं सहयोग करने वाली होगी। व्यवसाय के 
क्षेत्र में अत्यन्त विध्न/बाधाओं के बाद सफलता प्राप्त होगी। देखें उदा. कुं. नं. (79) तथा (80) . 
द्वितीय भाँव-में धनु राशि पर शुक्र होने से जातक व्यवहार कुशल, श्रृंगार प्रिय, कामुक प्रवृत्ति, सुन्दर वस्त्र, 
स्त्रियों एवं विलास आदि वस्तुओं पर अधिक खर्च करने वाला, शुक्र यदि बुध या चंद्र से युक्त या दृष्ट हो तो जातक 
चान्दी, मोती, -हीरा आदि जेवरात सम्बन्धी सौन्दर्य प्रधान वस्तुओं के क्रय-विक्रय से धन अर्जन करने वाला, प्रिय वाणी 
का प्रयोग करने वाला, स्त्रियों की संगति में रहने को उत्सुक, परन्तु निजी परिवार के सुख में कमी; अपनी पत्नी.के साथ 
भी विचारों में मतभेद एवं कटुता होने के योग । ऐसा जातक अभिनय, संगीत, नाट्य कला आदि के द्वारा फिल्मों, दूरदर्शन, 
ब्यूटी पार्लर या दनन्‍्त विशेषज्ञ आदि द्वारा भी अच्छी ख्याति एवं धनार्जन कर लेता है। देखें उदा. कुं. नं. 87 
- तृतीय भाव-में मित्र ग्रह की राशि मकर पर शुक्र के प्रभाव से जातक के भाई कम तथा बहनें अधिक होती हैं। जातक 
मधुरभाषी, विलासप्रिय, कामुक एवं हमेशा सज-धज कर रहने की प्रवृत्ति, सन्‍्तान सुख विलम्ब से होता। भाग्य में अनेक _ 
परेशानियां एवं उतार-चढ़ाव के बाद सफलता मिलती है। जातक गुप्त युक्तियों का प्रयोग करते हुए निज पुरुषार्थ द्वारा निर्वाह 
योग्य धनार्जन कर लेता है। पत्नी सुन्दर, सुशील एवं. परिवार से सहयोग करने वाली होगी। देखें. उदा. कुं. नं. 78 । 
चतुर्थ भाव-में कुम्भ राशि पर शुक्र होने से जातक दीर्घायु, पराक्रमी, यशस्वी, विद्वान, सभा में बोलने में चतुर, 
जातक को बन्धु सुख, मित्र सुख, भूमि, मकान, वाहन, चौपाय आदि सुखों की प्राप्ति, जातक में भोग विलास की प्रवृत्ति 
और कामुकता अधिक होती है। पिता को कष्ट अथवा पैतृक सुख में कमी होती है। व्यवसाय में दौड़ धूप अधिक रहती 
है। देखें उदा. कुं. नं. 84 | किसी स्त्री की कुण्डली में चतुर्थ भावस्थ शुक्र होने से उसको घर की सज्जा सजावट में विशेष 
अभिरुचि रहती है। 
पंचम भाँव॑-में मीन (उच्च) राशि में शुक्र होने से जातक किसी विशिष्ठ हस्त शिल्प-कला में कुशल, उच्च विद्या 
एवं पुत्र/संतान सम्बन्धी सुखों में कुछ कमी रहती है। ऐसा जातक व्यवहार-कुशल, पुत्र कम एवं प्रथम कन्या सन्तति की 
सम्भावना, अच्छा मित्र, प्रेम-प्रणय में सफल, अच्छा परामर्शदाता, जातक हंसमुख, मिलनसार, वाक्‌चातुर्य से. काम 
निकालने वाला, परन्तु पत्नी से सुख व सहयोग प्राप्त करने वाला, व्यसवाय में भी अड्चनों के साथ धनार्जन करने वाला 
होता है । यदि यहां बुध (नीच) का भी योगं हो, तो की जातक पुस्तक निर्माण एवं ज्योतिष, तंत्र-मंत्र आदि में भी रूचि 
रखता है, परन्तु व्यवसाय में अस्थिरता भी रहती है। देखें उदा. कुं. नं. 75 तथा 82 के 5 । 
छठे भांव-में मेष राशि पर शुक्र होने से जातक का अस्वस्थ शरीर परंतु बुद्धिमान पत्नी का सुख कम मिलता है 
अथवा पत्नी भी रोगिणी रहे। प्रत्येक कार्य में बाधाएं आती हैं । बाहरी तौर पर मित्र दिखने वाले भी परोक्ष रूप से हानि 
पहुंचाते हैं। पति-पत्नी के विचारों में मतान्तर हो, सन्‍्तान सुख में भी बाधा सम्भव है। अनावश्यक खर्च अधिक हों । यदि 
















68 _ _  ____ _॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_[_॒_॒_॒__ वृश्चिक लगमें शुक्॒फ्ल 
यहां शुक्र के साथ राहु, मंगल, शनि आदि अशुभ ग्रहों का योग या दृष्टि हो, तो नेत्र रोग अथवा अधिक विषय भोग के 
से मूत्र विकार, मधुमेह, प्रमेह, गले के रोग अथवा गुप्त रोग आदि का सम्भावना होती है | जातक सुरा-सुन्दरी (शराब 
विलासादि कार्यों पर अधिक खर्च करने वाला होता है। 
ब्त्तम भाँव-में स्व॒गृही वृष राशि पर शुक्र होने से जातक सुन्दर एवं आकर्षक व्यक्तित्व, प्रतिभाशाली, कार्य 
कुशल, उच्चस्तरीय, रहन-सहन, गायन, संगीत, कला एवं साहित्य के प्रति अभिरुचि होती है। ऐसा जातक विलास प्रिंय 
कौमुक एवं आराम पसंद होता है | विपरीत सैक्स के प्रति विशेष आकर्षण रखे | पत्नी सुन्दर एवं सुशील हो । विवाह 
बाद मकान, वस्त्र, आभूषण एवं वाहन आदि सुख साधनों में विशेष वृद्धि हों, परन्तु प्रदर्शनकार्यों, खान-पान, भोग विलास 
आदि कार्यों पर खर्च अधिक रहे | व्यवसाय के सम्बन्ध में संघर्ष के बाद सफलता हो | देखें उदा. कुं. नं. 77 
यहां चन्द्र, बुधादि ग्रहों का योग हो तो जातक का भाग्य विदेश में सफल होता है। शुक्र यदि शनि, राहु या भौमांदि 
ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो तो प्रमेह, कमर पीड़ा, मधुमेह आदि गुप्त रोग होने का भय हो। 
अंष्टम भाँव-में मित्र मिथुन राशि पर शुक्र होने से जातक के स्वास्थ्य की हानि, परिवारिक उलझनों एवं 
परेशानियों के कारण चिन्तित, व्यवसाय में गुप्त युक्तियों एवं कठिन परिश्रम द्वारा निर्वाह योग्य आय के साधन बन जाते हैं 
ज्योतिष, मंत्र आदि विषयों में रूचि, पत्नी का सुख भी विशेष नहीं हो पाता, परस्पर वाद-विवाद के कारण असंतोष एंव 
बैमनस्य हो, अनावश्यक खर्च अधिक रहें, प्रत्येक कार्य में विध्म-बाधाओं का सामना हो। 37 वर्ष की आयु के बाद सुख 
साधन प्राप्त हों । शनि, भौम, राहु आदि ग्रहों की दृष्टि, योग से गुप्त रोग भय एवं स्त्री सुख में कमी हो देखें उदा. कुं. 7 
, जंवम भाव॑-में कर्क राशि पर शुक्र के प्रभाव से जातक धार्मिक एवं लोक हितक़ारी कार्यों में भी धन का खर्च 
करता है । जातक भूमि, वाहन, वस्त्र-आभूषणों आदि सुख साधनों पर अधिक खर्च करने वाला, स्त्री एवं गृहस्थ 
सम्बन्ध में परेशानियों का सामता रहे । भाई-बहनों का सुख साधारण रहता है | ट्रांसपोर्ट, फिल्‍म, टेलीविजन, कास्मैटिकरस 
क्षेत्रों में सफल, विवाह के पश्चात्‌ भाग्य में विशेष परिवर्तन हों । ऐसा जातक निज उद्योग एवं पुरुषार्थ से धन लाभ एंव 
उन्नति करने वाला, दीर्घ यात्राएं करने के भी अवसर प्राप्त होते हैं। विदेश गमन से भाग्योन्नति के योग। 
दब्चांम भांव-में सिंह राशि पर शुक्र के प्रभाव से जातक बुद्धिमान, किन्तु चतुर बुद्धि, स्वाभिमानी, प्रियभाषी, 
प्रदर्शन प्रिय, स्त्री सुख से समन्वित, आभूषण, वस्त्र, भूमि, वाहन आदि सुखों से युक्त अत्यधिक व्यय करने वाला, पिता 
राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में कठिनाइयों के बाद सफलता मिले, विवाह के बाद व्यवसाय में लाभ व उन्नति प्राप्त हों 
ट्रांसपोर्ट, तैल, फिल्म, टैलीविजन, संगीत, कला आदि क्षेत्रों में भी संघर्ष के बाद सफलता प्राप्त हो, यदि शुक्र राहु, शनि, 
गुरु आदि ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो गृहस्थ सुख में कटुता पैदा हो। 
एकादद्ा भाँव॑-में कन्या राशि पर शुक्र के प्रभाव से जातक तीत्र बुद्धिमान, प्रभावशाली व्यक्तित्व, यशस्वी, उच्च 
विद्या, धर्म-परायण एवं परोपकारी स्वभाव परन्तु कामुक प्रवृत्ति वाला होता है। विपरीत योनि के प्रति विशेष आकर्षण 
होता है तथा जातक स्त्रियों के साथ मेल-जोल अधिक रखता है । स्त्री सुन्दर, सुशील एवं गुणवान होती है । कार्य व्यवसांयं 
में स्‍त्री का सहयोग भी रहता है। परन्तु व्यवसाय में अत्यधिक संघर्ष एवं परिश्रम के बावजूद बहुत अधिक लाभ नहीं 
पाता। ऐसा जातक अनेक मित्रों से युक्त होता है। देखें उदा. कुं. नं. 74 
द्वाददा भांव॑-में तुला राशि पर शुक्र के प्रभाव से जातक स्वेच्छाचारी, कामुक प्रवृत्ति, कल्पनाशील, चंचल एवं 
अस्थिर मन वाला-होता है। धन-धान्य एवं भौतिक सुखों की प्राप्ति के लिए विशेष प्रयत्नशील रहता है । विभिन्न प्रकार 
गुप्त युक्तियों द्वारा धनार्जन करता है परन्तु भोग-विलास एवं पर स्त्रियों पर अत्यधिक खर्च करने वाला होता है। अपनी 
पत्नी की भावनाओं के प्रति लापरवाह होता है। शराब आदि मादक वस्तुओं के सेवन की ओर प्रवृत्ति, कार्य क्षेत्र 
परेशानियों के साथ सफलता मिले। आय के साथ-साथ खर्च विशेष अधिक रहते हैं। देखें उदा. कुं. 85 । यदि यहां शुक्र' 
. के साथ सूर्य, गुरु, शनि आदि ग्रह हों तो अशुभ प्रभाव कम होते हैं । देखें उदा. कुं. नं. 83 





करू पक “७ सर पक हज अ ३ जब अरब जज रथ अल नल जम 3 अल सर स >जब उन्‍ “हर 
| बृश्चिक लग्न गत द्वादश भावों में शनि का फल | 
नोट: बृश्चिक कुण्डली में शनि पराक्रम और सुख भाव का स्वामी होने से जातक बृश्चिक लग्ने शनि फल 
को बहन- भाइयों एवं भूमि, मकान, वाहन आदि सुखों को प्रदान करता है| इस लग्न में कक 
शनि ३, ४, ८ एवं १२वें भावों में शुभ फल करता है। शनि के साथ अन्य ग्रहों का योग 
एवं दृष्टि आदि का विचार भी कर लेना उचित होगा। 
प्रथम भांव॑-में बुश्चिक राशि पर शनि के प्रभाव से जातक परेशान एवं अशान्त 
चित्त, उतावला, कठोर हृदय, साहसी, बाल्यकाल में अस्वस्थ शरीर, परन्तु आयु वृद्धि 
के साथ-साथ सुधार हो। ऐसे जातक का अधिकांश समय भ्रमण में व्यतीत होता है। 
जातक स्वावलम्बी, भाई-बहन होने पर भी उनके सुख में कमी, पिता के भी सुख में भी हनन 
कमी अथवा शरीर कष्ट हो, व्यवसाय के क्षेत्र में भी विघध्न-बाधाएं अधिक हों। जातक रबड़, तैल, लौहादि धातु आदि 
कार्यों में अधिक सफल रहे । यदि अशुभ ग्रह युक्त या दृष्ट हो तो जातक को चर्म रोग, चक्षु पीड़ा, गुप्त रोग, व्यसन भय, 
संकीर्ण विचारों वाला, द्वेषी, आजीविका के क्षेत्र में अत्यधिक संघर्ष रहें, खर्च बहुत हों, अपने भी परायों जैसा व्यवहार 
रखें । यदि शनि गुरु आदि शुभ ग्रह से युक्त या दृष्ट हो, तो जातक उच्च प्रतिष्ठत व्यक्ति, राजनेता, भूमि, वाहन, उच्च पदवी, 
स्त्री-संतान, वाहन आदि सुख-सुविधाओं से समन्वित होगा। देखें उदा. कुण्डली नं. 74 तथा 84 | 
द्वितीय भांव-में धनु राशि पर शनि होने से जातक परिश्रमी, बुद्धिमान, स्वाभिमानी, स्पष्टवक्ता, निज पुरुषार्थ के 
बल पर जीवन में लाभ वं उन्नति प्राप्त करने वाला, भ्रातृ सुख में कमी, परिवारिक सुख भी अड्चनों के बाद प्राप्त होता है। 
' व्यवसाय में अत्यन्त संघर्ष एवं कठिनाइयों का सामना होता है । कई बार उचित अवसरों का लाभ न उठाने वाला होगा । गुप्त 
युक्तियों से निर्वाह योग्य आय के साधन बनते रहते हैं । जीवन में उतार चढ़ाव एवं संघर्ष अधिक रहता-है। यद्यपि जातक 
अपने परिश्रम से भूमि, मकान एवं वाहन आदि सुखों को प्राप्त करने में सफल होता है। यदि शनि यहां अन्य क्रूर ग्रहों से 
युक्त या दृष्ट हो तो जातक कटु-भाषी, मुखरोगी, आर्थिक एवं गृहस्थ जीवन में दुखी एवं असंतुष्ट होता है। ऐसा जातक 
विदेश में अधिक सफल होता है। चमड़ा, मशीनरी, तैल आदि के व्यापार से लाभ होता है। | | 
तृतीय भांव॑-में स्वगृही मंकर राशि पर शनि होने से जातक कुशाग्र बुद्धिवाला, भाई बहनों के सुख से युक्त, परन्तु 
स्वावलम्बी, साहसी एवं अपने पुरुषार्थ से निर्वाह योग्य धनार्जन करने वाला परन्तु व्यवसाय में दौड़ धूप अधिक रहे | वृथा 
अपव्यय भी बहुत हों। यात्राएं (भ्रमण) अधिक रहें, भाग्य में कठिनाइयों के बाद सफलता मिले, सन्तान-सुख में भी 
परेशानियां रहें, विदेश आदि सम्बनधों से विशेष लाभ होने की सम्भावनाएं होंगी । ऐसे जातक को तंत्र-मंत्र, ज्योतिष आदि 
विद्याओं में भी रूचि होती है। | | 
चतुर्थ भांव-में स्वगृही कुम्भ राशि में शनि होने से जातक परिश्रमी, गम्भीर, बुद्धिमान, परन्तु शारीरिक सुख में 
कुछ कमी हो, भाई-बहन के सुख से युक्त तथा भूमि, मकान, वाहन आदि सुखों से सम्पन्न, परन्तु परिवारिक सुख में कुछ 
कमी रहे, पैतृक सम्पत्ति का सुख भी कम मिले, व्यवसाय में भी कठिन परिस्थितियों के बाद जीवन के उत्तरार्ध भाग में 
जातक को सुख के साधन के मिलते हैं, परन्तु जातक स्वयं कुछ दयालु एवं परोपकारी प्रवृत्ति का हो जाता है। जातक 
विदेश गमन करता है। देखें उदा. कुण्डली नं. 77 तथा 85 परन्तु वक्री होकर अस्तंगत हो या अन्य पाप ग्रहों से युक्त-या 
दृष्ट हो तो जातक को उदर रोग, पाचन प्रक्रिया सम्बन्धी कष्ट एवं हृदय रोग की आशंका होती है। | 
पंचम भाँव॑-में मीन राशि पर शनि होने से जातक गम्भीर प्रकृति वाला, परोपकारी एवं बुद्धिमान किंतु अस्थिर 
विचार हों, उच्च विद्या प्राप्ति में विष्न/बाधाएं रहें, परन्तु ऐसा जातक स्वाभिमानी, अनुसन्धान आदि कार्यों में कुशल, 
यात्राओं आदि से लाभ, व्यवसाय में कठिनाइयों के बाद सफलता, अल्प सन्तति सुख अथवा सन्तान सम्बन्धी चिन्ता रहे, 
सट्टा, शेयर, लाटरी, ज्योतिष, मंत्र-तंत्र आदि विषयों में भी रूचि हो, स्त्री को कष्ट अथवा स्त्री सुख में कुछ कमी रहे। 


बृश्चिक लग्नमेंशनिफल __._.|#.#[.[।ऋ[ऋ[ऋ[ऊ[ऊैऊै/-<खञखऊखञखऊझ् ऊ्<ऊझख उख खउख़्ख् ५<उ़्ख़़़््ञ़£़खज<ख<़रख्ख़ख अ उ् < <उञ 659 में शनिफल ह .. 69 
































70 ____  ____ ______ _______  ___________बृश्चिक लग्न में शनिफलं 
यदि शनि के साथ गुरु का योग या दृष्टि हो तो शुभ फल अधिक होते हैं। यदि शनि पाप ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो तो जातक 
कामुक, अस्थिर बुद्धि, गुप्त रोगी, उदर-रोगी या हृदय आदि रोग का भय होता है। - ह 
बष्ठ भाव-में मेष (नीच) राशि में शनि के प्रभाव से जातक को भाई-बन्धुओं का सुख सामान्य मिलता है। माता. 
को कष्ट अथवा मातृ पक्ष (मामा आदि) के सुख में भी कमी होती है। भूमि, मकान आदि के सम्बन्ध में झगड़े या 
मुकद्दमा आदि का भय हो, आकस्मिक चोट या दुर्घटना आदि के कारण शरीर कष्ट एवं गुप्त रोग का भय हो। जातक 
अत्यधिक संघर्ष एवं गुप्त युक्तियों से धनार्जन करता है। ऐसे जातक को निजी व्यवसाय की अपेक्षा नौकरी करना अधिक. : 
लाभप्रद रहता है। देखें उदा. कुण्डली नं. 78 तथा 83 ह कई 
व्रप्तम भाव-में वृष राशि में शनि के प्रभाव से जातक को विवाह में विलम्ब या दाम्पत्य जीवन में सुख की कमी 
हो, शनि की लग्न व भाग्य स्थान पर दृष्टि पड़ने जातक का स्वास्थ्य अस्थिर एवं खराब रहता है, तथा जातक छोटी- 
छोटी बातों के कारण चिन्तित रहता है। स्त्री सम्बन्धी कष्ट, भाग्य में अस्थिरता एवं व्यवसाय में भी संघर्ष अधिक रहता _: 
है। वृथा खर्च भी अधिक होते हैं। यदि शनि के साथ चन्द्र का योग हो और गुरु की दृष्टि हो तो प्रथम पत्नी की मृत्यु 
होकर जातक का दूसरा विवाह होता है। 36वें वर्ष विशेष भाग्योत्नति होती है। देखें उदा. कुं. नं. 75 
मतानन्‍्तर से सप्तम भावस्थ शनि निष्फल प्रभाव वाला माना गया है। ध 
अष्टम भाँव-में मिथुन राशि पर शनि होने से जातक/जातिका सूक्ष्म बुद्धि, अधूरी शिक्षा अथवा उच्च शिक्षा प्राप्त 
होने पर भी उसका विशेष लाभ नहीं मिल पाता, जातक भ्रमणप्रिय, शंकालु एवं अस्थिर बुद्धि एवं अशांत मन वाला होगा। 
भाई, बहिनों एवं पितृ पक्ष के सुख में कमी, अल्प सन्‍्तति अथवा सन्‍्तान सुख में कमी हो, व्यवसाय में विध्न-बाधाएं एवं 
अड्चनें अधिक होंगी, खर्च भी अधिक होंगे। यदि पंचमेश गुरु की स्थिति शुभ हो, तो उच्च शिक्षा एवं संतान सुख अच्छा 
होता है| ज्योतिष, मंत्र, तंत्र आदि गूढ़ विषयों की ओर रूचि हो। यदि मंगल, राहु आदि ग्रहों का योग या दृष्टि हो, तो 
जातक को विवाह उपरांत कठिनाईयां अधिक हों तथा गुप्त रोग, आप्रेशन एवं दुर्घटना आदि का भय हो। देखें उदा. कुं. 
ने. 79 एवं 82 कि ु ॒ 
नंवम भांव-में कर्क राशि पर शनि के प्रभाव से जातक उद्यमी, परिश्रमी, उदार हृदय, धर्मात्मा, परोपकारी,. 
भ्रमणकारी तथा निज उद्यम एवं पुरुषार्थ से व्यवसाय में धन लाभ व उन्नति प्राप्त करने वाला, भाई-बहिन एवं माता, भूमि, 
मकान एवं वाहन आदि सुखों से युक्त होता है, व्यय भी विशेष अधिक होता है कुण्डली में यदि चन्द्र व गुरु भी शुभस्थ 
हों, तो जातक भाग्यशाली, उच्च विद्या, सुन्दर व सुशील स्त्री व सन्‍्तान, धन, वाहन आदि सुखों से सम्पन्न होता है। इसके. 
भाग्योदय में प्राय: स्त्रियां सहायक सिद्ध होती हैं। विदेश में भाग्योदय होने की अधिक सम्भावना होती है। जातक को. 
कम्पयूटर, ज्योतिष, धर्म, मंत्र आदि विषयों में भी रुझान होता है। है . 
दब्ाम भाव-में सिंह राशि पर शनि के प्रभाव से जातक को मकान, भूमि, वाहन आदि सुखों की प्राप्ति संघर्ष के 
बाद होती है | व्यवसाय में भी आय कम तथा खर्च अधिक होते हैं | विघ्न/बाधाएं अधिक होती हैं | पैतुक सुख विशेष नहीं 
होता। जातक परिश्रमी एवं संघर्षशील होता है। भाई/बहिन होने पर भी उनके सुख में कमी होती है। यदि गुरु, चन्द्रादि 
का योग या दृष्टि हो, तो गुज्ञारे योग्य आय के साधन बनते रहते हैं किन्तु यदि शनि वक्री, अस्त या पापग्रह दृष्ट हो, तो 
' शनि की दशा में व्यवसाय में धन हानि, माता/पिता को कष्ट आदि दुख होते हैं। 
एकांदब्लां भाँव-में कन्या राशि पर स्थित शनि के प्रभाव से जातक पराक्रमी, साहसी, मेहनती तथा अपने परिश्रम 
के बल पर उच्च विद्या, कैरियर एवं व्यवसाय में धीरे-धीरे धन लाभ एवं उन्नति प्राप्त करता है। यहां से शनि तीसरी दृष्टि. 
से लग्न भाव (बृश्चिक) को देखता है, जिससे जातक के स्वास्थ्य एवं सौन्दर्य में कुछ कमी होती है। परन्तु उसे भाई- 
बहिन, माता एवं भूमि-मकान, वाहन व दीर्घायु आदि सुखों की प्राप्ति होती है तथा उच्च विद्या एवं सन्‍्तान आदि का सुख 
कुछ कठिनाईयों के बाद प्राप्त होता है। यदि कुण्डली में गुरु की स्थिति शुभ हो, तो उच्च शिक्षा एवं सन्‍्तान सुख अच्छा. 
मिलता है। ऐसा जातक तकनीकि व्यवसाय एवं विदेश आदि क्षेत्रों भी सफल होता है। देखें उदा. कुं. नं. 87 


बश्चिक लग्नमेंराहुफल _ _________|_|_[_[औ[औ[औ “॒[|आऔ _॒औ[॒झ॒॒._. _[॒_[]“ “97 
द्वांदघां भाँव॑- में तुला राशिगत (उच्च राशि) में शनि होने से जातक सुन्दर एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व वाला, चतुर 
एवं कुशाग्र बुद्धि, उद्यमी, भ्रमणशील, परिवारिक सुख में कुछ कमी परन्तु भाई-बहिनों एवं माता का सुख यथेष्ठ होता है। 
भूमि, मकान, वाहन आदि सुखों की प्राप्ति कुछ कठिनाईयों के बाद होती है। लघु एवं दीर्घ लाभाकारी यात्राएं होती हैं। 
परिवारिक एवं व्यवसाय सम्बन्धी खर्च भी बहुत अधिक होंगे। यदि धनेश गुरु भी शुभस्थ हो; तो विभिन्न योजनाओं एवं 
युक्तियों द्वारा धनार्जन भी अच्छा होता है। ऐसे जातक को ज्योतिष, धर्म, मंत्र, तंत्र आदि गूढ़ विद्याओं की ओर भी विशेष 
रूचि होगी देखें उदाहरण कुं: नं. 80 | । के आटा 
यदि शनि के साथ चन्द्र, भौम का भी का सम्बन्ध हो जातक का विदेश में भाग्योदय होता है। देखें उदा. कुं. नं. 76 


ब्श्चिक लग्न-द्वादश भावों में राहु का फल 

नोट: बृश्चिक लग्न में अकेले राहु के फल का निर्णय करते समय राहु के साथ _ बृश्चिक लग्ने राहु फल 
अन्य ग्रहों के योग व उस पर दृष्टि आदि का भी विवेचन करना युक्ति संगत होगा- उरह 7-5 र्त तो 
प्रथम भांव॑-में बृश्चिक राशि पर राहु होने से जातक/जातिका परिश्रमी, साहसी, 
स्वाभिमानी, कुछ तेज स्वभाव, लम्बा कद, किन्तु स्वास्थ्य और सौन्दर्य में कमी होती है, 
जातक स्वार्थ पूर्ति कराने में चतुर होता है। ऐसा-जातक अपनी धुन का पक्का, अर्थात्‌ 
अपने वचन का पालन करने वाला, स्वतंत्र विचारक, भौतिक उन्नति के लिए अत्यधिक 
कठिन परिश्रम करने वाला, शरीर में क्लिष्ट रोगों के कारण चिन्तित, मस्तिष्क रोग का 
भय, कभी-कभी उसे मृत्यु तुल्य कष्ट का भी सामुना करना पड़ता है । परिवारिक जीवन 
भी परेशानी युक्त होता है। व्यवसाय में अत्यधिक संघर्ष एवं गुप्त-युक्तियों से धनार्जन करने वाला होता है। आकस्मिक 

खर्च अधिक होते हैं। शरीर कष्ट भी अधिक होता है। देखें उदा. कुं. 79 तथा 84 
द्वितीय भांव-में धनु राशि पर राहु होने से जातक को राहु की दशा/अन्तर्दशा में अपने कुट्म्ब के सम्बन्ध में चिन्ता 
एवं आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। व्यवसाय में धनार्जन के लिए भी कठिन परिश्रम एवं संघर्ष करने . 
वाला तथा अनेक प्रकार की गुप्त युक्तियों का आश्रय लेने वाला होता है। नाक, मुख, गला एवं श्वास एवं घुटनों आदि में 
कष्ट की सम्भावना होती है। राहु की दशा अवधि में अत्यधिक दौड़धूप एवं परिश्रम के बावजूद अधिक लाभ एवं धन 
संचय नहीं हो पाए। यदि गुरु शुभस्थ हो, तो उसकी दशा में समुचित धन लाभ तथा भूमि, वाहन आदि सुखों की प्राप्ति 
होती है। अपने जन्म से. अतिरिक्त विदेश में भाग्योन्नति होती है। ऐसे जातक को धर्म, ज्योतिष, मंत्र, तंत्र आदि विषयों में. 

भी रूचि होती है। देखें उदा. कुं. नं. 76 तथा कुं. नं. 80. । 
तृतीय भाँव-में मकर राशि पर राहु होने से जातक पराक्रमी, उद्यमशील, परिश्रमी, भ्रमणशील तथा जातक अपने 
निज उद्यम द्वारा कठिन परिस्थितियों में भी धनोपार्जन करने वाला, भूमि, मकान, वाहन आदि खुखों से युक्त, लघु भ्रातृ सुख 
' में कमी होती है अथवा भाई/बहिनों के सहयोग में कमी होती है। ऐसे जातक को भ्रमण करने के अच्छे अवसर प्राप्त होते 
हैं । विदेश भ्रमण से भी लाभान्वित होने की सम्भावना हो। सप्तम भाव पर दृष्टि होने से तथा शुक्र भी अशुभस्थ हो, तो स्त्री 
सुख में कमी एवं दाम्पत्य जीवन असुखद होता है। देखें उदा. कुं. नं. 84 । ऐसे जातक को पत्रकारिता, ज्योतिष, मंत्र-तंत्र 
आदि विषयों का ज्ञान भीरहोंता है। सामान्यतः 3, 6 एवं 7वें भावों में राहु, शनि एवं भौम अनेक अरिष्टों का नाश करके 
सुखों में वृद्धिकारक माने जाते हैं। । हे 

ं चतुर्थ भाँव-में कुम्भ राशि पर राहु होने से जातक बुद्धिमान, परिश्रमी, धर्मपरायण एवं परोप्रकारी स्वभाव का 
होता है। अपने थैर्य एवं पराक्रम द्वारा व्यवसाय में निर्वाह योग्य धनार्जन कर लेता है। परन्तु ऐसे जातक को माता/पिता, 
भूमि, मकान आदि के सुखों में कुछ कमी रहती है। प॑रिवारिक एवं घरेलू वातावरण भी परेशानियों से युक्त रहता है । देखें 
उदा. कुं. 75। विवाह आदि घरेलू सुखों में विलम्ब होता है। देखें उदा, कुं. 83। यदि कुण्डली में सूर्य, चन्द्र या शनि 
























72 | ______________[______बृश्चिकलम्मेंराहुफल 
अशुभस्थ हों, तो माता/पिता में से एक की अकाल मृत्यु (या मृत्यु तुल्य कष्ट) बचपन में होती है। 
पंचम भांव-में मीन राशि पर राहु होने से जातक तीकब्र बुद्धि, उच्च विद्या में विघ्नों एवं कठिनाईयों के बॉदः 
सफलता प्राप्त होती है। जातक व्यवसाय में गुप्त युक्तियों द्वारा धनार्जन करता है। सन्‍्तान सम्बन्धी चिन्ता रहती है। प्रथम 
_सन्‍्तान प्राय: कन्या सन्‍्तति होती है । गुरु, सूर्य आदि ग्रह शुभ हों, तो पुत्र सन्‍्तति होती है । ऐसे जातक को धर्म, ज्योतिष 
मंत्र-तंत्र, शेयरों आदि में भी विशेष रूचि होती है। ' 
बष्ठ भांव॑-में मेष राशि पर राहु होने से जातक पराक्रमी, साहसी, अस्थिर बुद्धि और चतुर प्रकृति का होता हैं 
ऐसा जातक शज्नु पर विजय प्राप्त करने वाला, जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में संघर्ष एवं कठिनाईयों के बाद सफलता प्राप्त होती' 
है। विलास, ऐश्वर्य आदि कार्यों पर अधिक खर्च करने वाला होता है । यदि राहु के साथ शनि आदि अशुभ ग्रह का योग 
हो, तो जातक व्यसनों आदि से ग्रस्त, शिर पीड़ा, दांत एवं नेत्रादि रोग से पीड़ित होता है। 
सामान्यतः: छटे राहु अरिष्ट नाशक माना जाता है। ह ०४ 
ब्लप्तंम॑ भाँव॑-में वृष राशि पर राहु के प्रभाव से जातक साहसी, धैर्यवान तथा कुशल बुद्धि वाला होता है 
व्यवसाय में अत्यन्त विषम परिस्थितियों एवं कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है, परन्तु जातक अपने गुणों एवं चारतुर्य 
से सफलता प्राप्त करता है। स्त्री सुख में अड़चनें या विलम्ब होता है:। देखें उदाहरण कुं.नं. 74 ह 
यदि सप्तमेश शुक्र 2, 6, 8 या १2वें भावों में हो, तो जातक को प्रमेह, मधुमेह एवं गुप्त रोगों का भय होता है। 
अष्टम भाँव॑-में मिथुन राशि पर राहु होने से जातक बुद्धिमान, स्वाभिमानी, साहसी, दीर्घायु तथा विभिन्न स्रोतों 
एवं गुप्त युक्तियों द्वारा धनार्जन करने वाला, स्पष्टवादी परन्तु अपनी कार्य प्रणाली को गुप्त रखने में कुशल, प्रारम्भिकं 
जीवन अत्यन्त संघर्षपूर्ण एवं कठिन परिस्थितियों से युक्त होगा। गुरु युक्त या दृष्ट हों, तो ऐसा जातक जीवन में धीरे- 
धीरे लाभ व उन्नति प्राप्त करता है। उत्तरार्ध भाग में भूमि, मकान, वाहन आदि सुखों से युक्त होगा। यदि राहु के साथ 
शनि, मंगल ग्रहों का भी योग हो, तो जातक को गले, छाती एवं पेट सम्बन्धी रोग भय हो। जातक को मंत्र, धर्म 
ज्योतिष आदि विषयों में भी विशेष रूचि होती है। देखें उदा. कुं. नं. 77 तथा 82 
नंवंम भांव॑-में कर्क राशि पर राहु होने से जातक की भाग्योन्नति में बार-बार विघ्न/बाधाएं उत्पन्न होती रहती हैं, 
फिर भी ऐसा जातक. अपने परिश्रम एवं साहस से निर्वाह योग्य आय के साधन बना लेता है। जातक उदार हृदय, 
परोपकारी एवं भ्रमण आदि पर अधिक खर्च करने वाला होता है। यदि यहां कर्क राशि पर गुरु, चन्द्र आदि का योग हो 
तो जातक विदेश गमन से विशेष लाभान्वित होता है। । ॒ ः 
दद्याम भाँव-में सिंह राशि "२ राहु होने से जातक उच्च शिक्षित, अत्यन्त बुद्धिमान, उच्चाभिलाषी एवं परिश्रमी 
होता है। ऐसा जातक अपने परिश्रम एवं उद्यम द्वारा उच्च प्रतिष्ठा एवं उच्च पद प्राप्त कर लेता है। प्रारम्भिक अवस्था में 
व्यवसाय में अत्यन्त कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। परन्तु ऐसा जातक अपने बुद्धि चातुर्य एवं मेहनत से लाभ व 
उन्नति प्राप्त कर लेता है। ऐसा जातक राजनीति में भी विशेष रूचि रखने वाला एवं 42वें वर्ष भाग्योदय होता है। जातक 
उच्च शिक्षक, प्राध्यापक, उच्च-प्रतिष्ठित सरकारी अफसर आदि हो सकता है। पिता को कष्ट अथवा पिता के सुख में * 
कमी रहती है। देखें उदा. कुण्डली न॑. 78 क्‍ कर | 
इसके साथ गुरु-मंगल का योग हो, तो दन्त चिकित्सा, मैडीकल विभाग आदि में सफल होता है। 
देखें ड़दा. कुँ .नं. 8 
एकादद्या भांव-में कन्या राशि पर राहु होने से जातक बुद्धिमान, उच्चाकांक्षी, परिश्रमी तथा बाधाओं के बाद 
उच्च शिक्षा प्राप्त करता है । ऐसा जातक स्वावलम्बी तथा गुप्त युक्तियों एवं बौद्धिक कार्यों द्वारा धनार्जन करने में सफल 
होता है। अधिक लाभ प्राप्त करने के लिए कई बार उचित/अनुचित ढंगों का भी प्रयोग कर लेता है। ऐसे जातक को 
' शेयर, सट्टा, लाटरी, ज्योतिष, योग, मंत्र, तंत्र आदि विद्याओं की ओर भी रूचि रहती है। मकान, वाहन एवं सन्‍्तान आदि 
सुखों की प्राप्ति होती है। गुरु शुभस्थ हो तो पुत्र सन्‍्तति भी होती है। सामान्यतः: एकादश भाव में राहु लाटरी आदि से . 








उक्क बन जम भी कर इत है तब कह रू सवार कक सन जतघ ]>््््ये 








आकस्मिक धन लाभ भी करवा तथा यहां राहु नाशक माना जाता है। ' | 

द्वादशा भांव-में तुला राशि में राहु के प्रभाव से जातक स्वछन्द प्रकृति का, भावुक, विलास प्रिय एवं स्वतंत्र 
विचारों वाला होगा । व्यवसाय के क्षेत्र में अत्यधिक परिश्रम एवं गुप्त युक्तियों द्वारा धनार्जन करने वाला, परन्तु वृथा खर्च 
भी अधिक करने वाला होता है। अत्यधिक खर्च के कारण कई बारं आर्थिक संकटों का भी सामना करना पड़ता है। 
ज्योतिष, मंत्र-तंत्र एवं योगादि विद्याओं की ओर भी विशेष रूचि रहे | गुप्त रोग एवं वायु प्रकोप तथा शत्रुओं के कारण 
. मानसिक तनाव एवं गुप्त चिन्ताएं बनी रहती हैं। यदि कुण्डली में गुरु, चन्द्र, सूर्यादि ग्रह शुभस्थ हों, तो जातक को 
देशान्तर (विदेश) सम्बन्धी कार्यों से भी लाभ होने के योग होते हैं। | 


है 
[बृश्चिक लग्न : द्वादश भावों में केतु का फल) 
नोट : अकेले केतु ग्रह के फल का निर्णय करते समय, अन्य सभी ग्रहों के बृश्चिक लग्ने, केतु फल ._ 
तुलनात्मक प्रभाव का भी विवेचन कर लिया जाए, तो फल कथन में स्पष्टता प्राप्त होगी। 
प्रथम भांव-में बृश्चिक राशि पर केतु होने से जातक शीकघ्र उत्तेजित होने 
वाला, क्रोधी, बातचीत करने में चतुर, कृश शरीर, व्यवहार कुशल, मेहनती तथा 2 
जातक व्यवसाय के क्षेत्र में अत्यन्त परिश्रम के बाद निर्वाह योग्य आय के साधन 
प्राप्त करता है। सांझेदारी के कामों में हानि, वैवाहिक सुख में कमी अथवा 
विलम्ब हो | चेहरे पर कोई चोटादि का चिन्ह हो। कमर में दर्द या पेट में विकार 
एवं हाथों में पसीना आने के संकेत, यदि भौम, गुरु आदि ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो तो 
जातक भूमि, मकान, स्त्री, वाहन आदि सुखों से युक्त होता है। देखें उदा. कुण्डली नं. 74 आई, 
' » द्वितीय भांव-में धनु राशि पर केतु होने में जातक तीव्र बुद्धिमान, परिश्रमी, परन्तु कटु वक्ता, अनेक गुप्त युक्तियों 
द्वारा धनार्जन करने वाला, विध्नों के बाद उच्च विद्या प्राप्ति, परिवारिक सुख में कुछ कमी रहे। धर्म, ज्योतिष, मंत्र आदि 
: विद्याओं में रूचि रहे । ऐसा जातक व्यवसाय में कई बार धोखा एवं अनीतिषूर्वक आचरण भी करता है। देखें उदा. कुं.नं. 
82 | यदि यहां केतु गुरु द्वारा दृष्ट हो, तो जातक उच्च प्रतिष्ठित, शिक्षित एवं व्यवसायिक विद्या द्वारा समुचित धनार्जन 
करता है। आवास, वाहन आदि सुखों से सम्पन्न होता है। देखें उदा. कुण्डली नं. 77 ऐसा जातक बैंकिंग, फाईनैंस आदि 
कार्यों से भी सम्बन्धित होता है। कह 
तूतीय भांव-में मकर राशि पर केतु होने से जातक परिश्रमी, साहसी एवं भ्रमणशील होता है। भाई-बन्धुओं के 
सुख में कमी रहे, नेत्र पीड़ा एवं कर्ण रोग का भय हो । बाजूओं 'पर या हाथ पर तिल या चोटादि का निशान हो। कार्य- 
व्यवसाय में अत्यधिक परिश्रमी एवं दौड़-धूप अधिक रहे तथा परिश्रम के अनुसार विशेष धन लाभ न हो पाए, ज्योतिष, 
योग आदि गूढ़ विषयों में रूचि रहे, खर्च अधिक रहे तथा भाग्योन्नति में बार-बार विध्न रहे । यदि यहां: भौम' या गुरु आदि 
शुभ ग्रहों का योग या दृष्टि हो, तो जातक को भूमि, आवास, वाहन एवं स्त्री सुख आदि प्राप्त होते हैं। कल 
चतुर्थ भाव-में कुम्भ राशि पर केतु होने से जातक परिश्रमी, उच्चाभिलाषी तथा कार्य/व्यवंसाय में अत्यधिक संघर्ष : 
. करने वाला उद्यमशील होता है, परन्तु जातक को मनोवांछित सफलता नहीं मिलती । मन अशांत रहता है। मातृ एवं पैतृक 
सम्पत्ति व सुखों में कमी रहे । ऐसा जातक अपनी पैतृक भूमि से अन्यत्र स्थान (विदेश आर्दि) में भाग्योन्नति एवं लाभ प्राप्त 
करता है। मंगल, गुरु भी शुभस्थ हों, तो जातक उच्च प्रतिष्ठित एवं भूमि, वाहंन आदि सुखों से युक्त होता है। देखें उदा. 
के, 78, तथा 8। | । ु 
डे पंचम भाँव-में मीन राशि पर केतु होने से जातक तीत्र बुद्धि, दृढ़ निश्चयी, अपनी धुन का पक्षा, परिश्रमी एवं 
साहसी प्रकृति का होता है। उच्च विद्या में विष्न/बाधाओं के बाद सफलता प्राप्त करने वाला तथा गुप्त युक्तियों द्वारा 
धनार्जन करने वाला होता है। शेयर्ज़, लाटरी, सट्टा आदि द्वारा आकस्मिक धन लाभ की भी सम्भावना, स्त्री एवं सन्तान 











7404 « «४. ७ 5 ये हे 5 को 0 बज 025 ।09/|झ-  अश्चिकललांनापाका 4 लग्न में केतु फल 


सम्बन्धी विशेष चिन्ता हो, ज्योतिष, योग, धर्म, “मंत्र, तंत्रादि गूढ़ विषयों की ओर भी रूचि रखे.। 
बष्ठ भाँव-में मेष राशि पर केतु होने से जातक तेज बुद्धि, परिश्रमी, परन्तु अस्थिर स्वभाव वाला, भावुक, 
कामुक एवं विलास आदि वस्तुओं पर अधिक खर्च करने वाला, मातुल पक्ष (नानके, मामे आदि) के सुख में कमी, 
शत्रुनाशक, मुकदमे, झगड़े आदि में विरोधी/शत्रु पर विजय पाने वाला, व्यवसाय में कठिन परिश्रम एवं गुप्त युक्तियों का 
आश्रय लेने वाला होता है । केतु यदि शनि युक्त हो, तो जातक मिथ्याभिमानी, वृथा दौड़ धूप एवं अकारण भटकने वाला, 
व्यसनों से ग्रस्त निनन्‍्द्य कर्म करने वाला होता है | यदि मंगल युक्त हो, तो जातक साहसी, पराक्रमी और दूसरों को तुच्छ 
एवं स्वयं को महान्‌ समझने वाला होता है। 
जनप्तंग भांव॑-में वृष राशि पर केतु होने से जातक अत्यन्त परिश्रमी, स्वास्थ्य एवं शारीरिक सौन्दर्य में कमी हो, 
जातक कुछ चिड़चिड़े स्वभाव, अशान्त मन, कामुक एवं विलासप्रिय प्रकृति का होता है । दाम्पत्य सुख में कमी अथवा 
विवाह आदि सुख. में विलम्ब एवं विघ्न होते हैं | व्यवसाय के क्षेत्र में भी अत्यन्त कठिन परिस्थितियों एवं परेशानियों का 
सामना रहता है। ऐसा जातक अपने निश्चय का पक्का और स्वार्थ पूरा करवाने में कुशल होता है । देखें. उदा. कुं. नं. 
84 | केतु के साथ सूर्य, भौमादि ग्रह योग या दृष्टि हो, तो जातक को स्वयं विचित्र एवं गुप्त रोग, पेट विकार तथा स्त्री 
को कष्ट आदि का भय होता है। देखें. उदा. कुं. नं. 79 
अंष्टम भाँव॑-में मिथुन पर केतु होने से जातक उच्चाभिलाषी, अस्वस्थ, परिवारिक एवं आर्थिक उलझनों के 
कारण चिन्ताओं का सामना रहे | जीवन का प्रथम भाग विशेषकर संघर्षपूर्ण रहे । जीवन निर्वाह के लिए अत्यन्त कठिन 
परिश्रम एवं संघर्ष का सामना रहता है। जातक अनेक गुप्त युक्तियों का आश्रय भी लेता है । देखें. कुण्डली 76, 80। 
यदि केतु शनि, मंगल आदि ग्रहों से पीड़ित हो तो दुर्घटना से चोट आदि का भय हो । जातक को दन्त पीड़ा, रक्त विकार 
एवं किसी गुप्त रोग का भय हो । स्त्री कुण्डली में मासिक धर्म में गड़बड़ी या खराबी के संकेत हैं । 
ज॑ंव॑म भाँव॑-में कर्क राशि पर केतु होने से जातक को अपने व्यवसाय एवं भाग्योत्नति के लिए अत्यन्त कठिन 
परेशिनियों का सामना करना पड़ता है। धनार्जन के लिए दौड़- धूप अधिक करनी पड़ती है। देश-विदेश में दूर-दूर 
तक भ्रमण के अवसर प्राप्त होते हैं । बाह्य तौर पर जातक धार्मिक होता है। भाई/बन्धुओं के सुख में कमी होती है | 
भाग्य में अनेक बार उतार-चढ़ाव पैदा होते हैं। परन्तु जातक अपनी हिम्मत एवं उत्साह नहीं छोड़ता। शुक्र अशुभ 
भावस्थ या अस्तगत हो तो पत्नी (स्त्री) के कारण परेशानियों का सामना होता है। ऐसा जातक कभी-कभी गम्भीर 
संकटों में भी फंस जाता है। ै 
कप भाँव॑-में सिंह राशि पर केतु होने से जातक गुणी, धार्मिक आस्थावान्‌, तेजस्वी, परोपकारी एवं सरल 
हृदय होता है। आरम्भिक अवस्था अत्यन्त संघर्षपूर्ण होती है। आय के साधनों में अस्थिरता रहती है। पिता को 
अरिष्टकर अथवा पिता द्वारा सुख में कमी होती है। व्यवसाय में भी विघ्न/बाधाओं का सामना करना पड़ता है। 
जातक का भाग्योदय अपने जन्म स्थान से अतिरिक्त स्थान पर होता है। व्यवसायिक एवं घरेलू जीवन में भी 
परेशानियां एवं अशान्ति अधिक रहती है । सूर्य व चन्द्र भी अशुभस्थ हो, तो जातक के माता/पिता में से, किसी एक 
कौ अपपमृत्यु बचपन में होती है। ऐसे जातक को धर्म, ज्योतिष, तन्त्र आदि विद्याओं का भी ज्ञान होता है। देखें 
उदा. कुं. नं. 75 तथा 83 
एकांदथ्ां भाँव॑-में कन्या राशि पर केतु के प्रभाव से जातक बुद्धिमान, परोपकारी एवं परिश्रमी होने पर 
व्यवसाय में विशेष लाभ एवं उन्नति नहीं प्राप्त कर सकता | जातक साधारण शिक्षित, उच्च शिक्षा प्राप्ति और धनार्जन में 
अनेक विघ्न/बाधाएं आती हैं | गुरु, चन्द्र शुभ हों, तो ऐसा जातक अपने गुणों एवं बुद्धि-चातुर्य द्वारा निर्वाह-योग्य कुछ 
आय के साधन बना लेता है। धन, भूमि, मकान, वाहन, शिक्षा, पुत्र सन्‍्तति आदि सुखों का लाभ प्राप्त कर लेता है ।- 
जातक बौद्धिक कामों से विशेष लाभान्वित होता है। यदि चन्द्र, गुरु आदि ग्रह अशुभस्थ हों, तो आर्थिक एवं सन्‍्तान 
सम्बन्धी चिन्ता हो तथा जातक नासमझी के कारण अपनी ही हानि कर बैठता है। 35 वर्ष की आयु के बाद आर्थिक 


तन 


ब॒श्चिक लग्न में द्वि-त्रिग्रहों का फल 
स्थिति में सुधार आता है। ह 
द्वादघ्रां भांव-में तुला राशि पर केतु के प्रभाव से जातक चंचल बुद्धि एवं अस्थिर प्रकृति, कामुक एवं शीघ्र क्रोध 
करने वाला होता है | परिवारिक एवं व्यवसाय के सम्बन्ध में खर्च अधिक होते हैं | देश-प्रदेश की यात्राएं करने के अवसर 
भी प्राप्त होते हैं। जातक चुस्त, चालाक, व्यवहार कुशल एवं समयानुसार आचरण करने वाला होता है । यहां केतु,,मंगल, 


75 


शुक्र आदि ग्रहों से युक्त हो, तो जातक मनोरंजन, शराब-तम्बाकू आदि व्यसनों एवं सौन्दर्य, विलासादि कार्यों पर अधिक 


व्यय करता है। जातक को नेत्र, दन्‍त, शिरादि एवं उदर आदि रोगों का भी भय होता है। यदि केतु, गुरु युक्त या दृष्ट हो 
एवं धर्म कार्यों पर खर्च अधिक होते हैं। 


नोट :-बृश्चिक लग्न में ग्रहों कौ स्थिति व विविध योगों के सम्बन्ध में उदाहरण कुण्डलियां आगामी पृष्ठों में देखें 





बृश्चिक लग्न में शुभाशुभ योगों के फल का निर्णय करते समय योगकारक ग्रह की दशाउन्तर दशा तथा उस ग्रह की 
तत्कालीन गोचर स्थिति को भी ध्यान में रखना चाहिए। बृश्चिक लग्न में कुछ विशेष ग्रह योग इस प्रकार से होंगे। अन्य 
सभी योगों के बारे में पुस्तक के अंत में अवलोकन करें :- 

सूर्य-धन्द्र - भाग्येश व कमेंश ग्रहों का यह योग अत्यन्त शुभ होता है। विशेषकर यह योग द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, 
नवम व दशम भावों में शुभ तथा शेष स्थानों में भाग्य की दृष्टि से अच्छा नहीं माना जाता। शुभ भावस्थ इस योगे के प्रभाव 
स्वरूप जातक उच्च प्रतिष्ठित, पराक्रमी, भाग्यवान, कुशल शिल्प व्यवसायी, भाग्यवश पैतृक धन सम्पदा एवं वाहनादि 


: सुखों से युक्त होगा। ऐसा जातक लोहा, पत्थर आदि धातुओं से सम्बन्धित व्यवसाय से अच्छा लाभ उठा सकता है। 
जातक कार्य-कुशल, स्त्री के वशीभूत भी हो सकता है। 


सूर्च-मगल- लग्नेशं व दशमेश का योग होने से जातक तेजस्वी, परिश्रमी एबं राजसिक प्रवृत्ति, साहसी तथा पिता से 
एवं सरकारी क्षेत्रों से सहायता व लाभ प्राप्त, अधिकार की भावना से युक्त परन्तु अपने भाई-बन्धुओं से प्रेम करने वाला _ 
होता है। ' 
सूर्य-बुध- बृश्चिक लग्न में यह योग कर्मेश एवं लाभेश का सम्बन्ध होने से जातक विद्वान, धनी, भूमि, जायदाद, - 
वाहन आदि सुखों से युक्त एवं प्रतिष्ठित होता है। जातंक निज पुरुषार्थ द्वारा धुन लाभ व उन्नतिं करता है, परन्तु बुध 
अष्टमेश भी होने से सामान्यतः यह. योग उच्च विद्या, कुशाग्र बुद्धि, उच्च व्यवसाय आदि प्रदान करता है। अत्यधिक संघर्ष ' 
के बाद लाभ देता है। पैतृक सुख में भी कमी करता है। देखें कुण्डली नं. 74, 76, 77 व 78। 
मूर्व-गुरु- जातक उच्च शिक्षित, श्रेष्ठ परिवार वाला, अच्छे मित्रों से युक्त, धर्म परायण, परोपकारी, धर्म-ज्योतिष 
आदि शास्त्रों में रूचि रखने वाला, उच्च प्रतिष्ठित धन सम्पदा, वाहन आदि सुखों से युक्त होगा। देखें उदाहरण कुण्डली 
संख्या न. 77 
सूर्य-शुक्र- यदि यह योग 2, 3, 4, 7, 8, । या १2वें भावों में हो, तो ज्ञतक विलास प्रिय, कामुक एवं ऐश्वर्य युक्त 
वस्तुओं पर अधिक एवं वृथा खर्च करने वाला होता है। स्त्री को कष्ट अथवा स्त्री के कारण परेशानियों का सामना रहे | 
4, 5, ? या 0 भावों में यह योग हो, तो जातक को संगीत, कला, साहित्य एवं ज्योतिष आदिविषयों का.ज्ञात्र हों; वह 
उच्च प्रतिष्ठित, धनी एवं मान्य व्यक्ति होता है। ऐसा योग द्वि-विवाह की संभावना भी करता है। देखें उदा. कुं. नं. 87 
मूर्य-शनि- के-योग से जातक कार्य-कुशल, तकनीकि बुद्धि, सोना, चान्दी, लोहा आदि धांतुओं के कार्यों सै लाभ 
प्राप्त करने वाला, परन्तु पैतृक सम्बन्धों के कारण सुखी होता है। योगों में अधिक विस्तार के लिए पुस्तक के अन्तिम 
पृष्ठों का अवलोकन करें। 
चन्द्र-मंगल- का योग होने से जातक परिश्रम एवं भाग्य से कार्य-व्यवसाय में लाभ व उन्नति प्राप्त करने वाला 
पराक्रमी, धर्म-कर्म में रूचि रखने वाला तथा भूमि, वाहन आदि भौतिक सुखों से युक्त होगा। 





0. 


76 आस आम 0 ।/।.._ लश्चिक लात 3 नेगी का लग्न में द्वि-त्रिग्रहों का फल 


तीक्ष्ण निर्णय शक्ति प०-+ 7. +छ/बाधाएं पट २.7 
चन्द्र-द्ुध- का योग जातक को बुद्धि, तेजस्वी, तीक्ष्ण निर्णय शक्ति, परन्तु कार्य क्षेत्र में विघ्न/बाधाएं पड़ने के संकेत 


हैं । इस योग सम्बन्धी अधिक विस्तार हेतु पुस्तक के अन्तिम पृष्ठों में देखें। 
घन्द्र-गुक- का योग होने से जातक धर्म परायण बुद्धि, परोपकारी स्वभाव, भाग्यवान्‌ू, उच्चशिक्षित, सुशील स्त्री एवं 
पुत्र आदि संतान से युक्त होता है। धर्म, ज्योतिष, मन्त्र आदि शास्त्र को जानने वाला, ब्राह्मण आदि विद्वानों की सेवा करते 
वाला, आन्तरिक शक्ति प्रबल होगी, विनयशील होता है | बृश्चिक कुण्डली में यह योग , 2, 3, 5, 7, 9, 0 एवं ॥! वें 
भावों में विशेष प्रशस्त होता है। 
पद्ध-ग़ुक्र- सुन्दराकृति, वस्त्राभूषण, धन-धान्य सम्पदा, वाहन, सुन्दर व सुशील पत्नी आदि सुखों से युक्त परन 
जातक कामुक प्रवृत्ति का होता है। विलास आदि कार्यों पर खर्च करता है। अधिक विस्तार हेतु अंतिम पृष्ठों में देखें | 
चब्द्र-शनि- योग होने से जातक परिश्रमी एवं तीक्ष्ण बुद्धि होते हुए भी आन्तरिक सुख में कमी रहती है। यदि वह 
योग सप्तम भाव में हो, तो प्रथम स्त्री को कष्टकारी अथवा ट्वि-विवाह योग होता है। अनेक सुख/साधन होते हुए भी 
जातक के भाग्य में सुख शान्ति नहीं रहती | जातक प्राय: तनाव ग्रस्त एवं चिन्तनशील रहता है । मधुमेह आदि गुप्त रोगों 
का भय | देखें उदा. कुं. 87 
मंगल-ब्रुध- का योग होने से जातक कुशाग्र बुद्धि, शिल्प कला एवं तकनीकि कार्यों में कुशल, बोलने में चतु० 
अत्यन्त संघर्ष एवं कठिनाईयों के बाद कार्य व्यवसाय में आय के साधन बन पाते हैं । यह योग १, 3, 4, 5, 6, 9, ॥0 
१7वें भाकों में कुछ शुभ फल करता है, परन्तु 2, 7, 8 एवं १2वें भावों में अशुभ होता है| देखें उदा. कुं. नं. 75 
मंगल-गुछ- का योग होने से जातक उच्चशिक्षित, पराक्रमी, परिश्रमी, स्वावलम्बी अर्थात्‌ अपने पुरुषार्थ द्वारा स्वयं 
अपना भाग्य बनाने वाला, परन्तु जीवन का प्रारम्भिक भाग विशेषकर 34 वर्ष तक कार्य व्यवसाय में विशेष संघर्ष * 
कठिनाईयां रहती हैं । परन्तु तदुपरान्त व्यक्ति अपने बुद्धि कौशल से व्यवसाय में अच्छा लाभ व उन्नति करता है। यह या 
व भावों यो देखें लाभ व करता है । यह 
, 2, 3, 5, ?, 0 एव 2 वें भावों में विशेष प्रशस्त होता है । देखें उदा, कुं, न॑ 2 ज्योतिष, मन्त्र, अध्यॉर्टी 
आदि गूढ़ विषयों में भी रूचि रखता है। : 76. ऐसा जातक !“मप 
मगल-शुक्र- यदि ।, 3, 5, 7, 40 आदि शुभ गृह में यह योग हो तो 
ध॑र्नाजन करने वाला, कामुक वृत्ति, संगीत कला, स्त्री एवं मादक वस्तुओं 
मंगल-शनि- बृश्चिक कुण्डली में अच्छा फल नहीं करता 
परिस्थितियों में गुज़रता है। आय कम व खर्च अधिक होते हैं। 


मंगल-राहु, मंगल-कैतु, बुध-गुरु, बुध-शुक्र, ब॒ध- 
अधिक लोक को ५) जुध-शुक्र, जुध-शनि, गुरु-शुक्र आदि ग्रहों के योग फल हेतु पुस्तक * 


था किया छाया दया छयाड। या जया जया. धमाका पिया छथ। हथथ। प्रयय। छत बायथा। क्रय प्च्ज 


 अ्ेशताब्द पंचोग 77777] 


जातक व्यवहार कुशल, विभिन्न साधनों द्वा! 
पर अधिक खर्च करने वाला होता है। 
' जीवन का आरम्भिक भाग संघर्षपूर्ण एवं कर्टिं 


गया है| दैनिक ग्रह स्पष्ट सहित इस वृहदूर्कीर 
[नगरों के अक्षांश-रेखांश के अतिरिक्त प्रमुख विदेशी नगरों (880: ५2४ योग, करणादि दे दिए गए हैं| भारत के | 
जय तिबियों हे मु नगरों के अक्षांश- 33 ।" 
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बृश्चिक लग्न-उदाहरण कुण्डलियाँ _ 8060 / 0० 5 / ४78  अद । थे की 2,800 7 2॥ ॥ 77 





उप-प्रधानमंत्री, श्री लाल कृष्ण अडवानी 

भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख नेता तथा भारत सरकार के वर्तमान उप-प्रधानमन्त्री एवं. उदा. कुण्डली नं. 74 
केन्द्रीय गृह मन्त्री श्री लाल कृष्ण अडवानी का जन्म 8 नवम्बर 927 को कराची (पाक). जन्म 8 नवं. 927 ई. 
में बुश्चिक लग्न में हुआ था। जन्मकालीन अश्विनी (गण्डमूल) नक्षत्र एवं केतु की दशा ,_?:00 *-ध- कराची ( पाक ) 
(3 वर्ष, ] महीने) भोग्य थी, तदुपरानत 8 अक्तू. 95 ई. तक शुक्र की दशा रही। 
जन्म कुण्डली में शुक्र अशुभ भावेश होकर नीच राशिस्थ होने से शुक्र महादशा का अन्तिम 
भाग-विशेषकर शनि, बुध व केतु की अन्तर्दशाएं (947 ई. से 8 अक्तू. 795 के 
मध्य) विशेष संघर्षपूर्ण रहीं। जैसा कि सर्वविदित है कि 947 ई. भारत विभाजन एवं 
उसके बाद के कुछ वर्ष अडवानी जी तथा उनके परिवार वालों के लिए अत्यन्त 
संघर्षशील, कठिन एवं कष्टमय व्यतीत हुए। 8 अक्तू. 957 से चन्द्रमा की दशा में ही 
उन्हें विवाह, सन्‍्तान आदि सुख प्राप्त हुए। इसी दशा में उन्हें राजनीति में भी प्रवेश किया । 
मंगल की दशा (१8 अक्तू. 74) से सक्रिय राजनीति में आए तथा राहु मध्ये गुरु के अन्तर 
(977 ई.) में प्रथम बार सूचना व प्रसारण मन्त्री बने | परन्तु शनि की अन्तर्दशा तक (30 
सितं. 982 ई. तक) कार्यकाल पूरा न कर सके | 

गुरु मध्ये बुध की अन्तर्दशा (सन्‌ 999 ई.) कालीन वह भारत के केन्द्रीय मन्त्री 

मण्डल में गृह-मन्त्री बने तथा 2002 ई. में उप-प्रधान मन्त्रित्व के पद पर भी सुशोभित 
_हुए। 2004 ई. में केन्द्रीय भाजपा सरकार के कार्यकाल तक इसी पद पर बने रहने के 
योग हैं | श्री अडवनी की जन्म कुं. में ज्योतिष सम्बन्धी कुछ प्रमुख योग इस प्रकार से हैं- 

. श्री अडवानी की जन्म कुण्डली में बुश्चिक तथा नवांश कुण्डली में भी बृश्चिक लग्न होने से वर्गोत्तम लग्न हुआ 
है । जिसके फलस्वरूप जातक अपने कार्य क्षेत्र (राजनीति) में अग्रणी, कुल में मुखिया, सुप्रतिष्ठित, पराक्रमी, प्रसिद्ध 
तथा स्त्री, सन्‍्तान, आवास, वाहन आदि सुखों से युक्त हुआ है। 

2. लग्न कुण्डली में द्वितीयेश व पंचमेश गुरु पंचम में स्वराशिगत होकर लग्न भाव को देख रहा है, जिससे जातक 
उच्च शिक्षित, अत्यन्त बुद्धिमान, विद्वान, वाक्‌ शक्ति एवं भाषण कला में कुशल हुआ है । नवांश कुण्डली में भी गुरू स्बफेच्छ 
राशि में होने से उत्तम फल देने वाला हुआ है। इसी कारण गुरु की दशा अन्तर्दशाओं में विशेष शुभ फल प्राप्त हुए। 

(3) नवांश कुण्डली में गुरु के अलावा सूर्य व चन्द्र भी उच्च राशिस्थ हैं तथा बुध स्वराशिगत है । जिनके प्रभावस्वरूप 
जातक को इनकी दशा एवं उपदशा में शुभ फल प्राप्त हुए। 

उच्च प्रतिष्ठित विद्वान/प्रकाशक 

संलग्न जन्म कुण्डली एक प्रसिद्ध ज्योतिषी एवं गणितकर्ता की है। इन्होंने अपने. उदा. कुण्डली न कर 

जीवन काल में अनेक धार्मिक एवं ज्योतिष सम्बन्धी पुस्तकों का लेखन (उर्दू-हिन्दी कृत्रिका [[,॥.45 रात्रि 
भाषाओं में) तथा प्रकाशन किया। बृश्चिक लग्न में जन्में यह जातक तीन भाईयों में 
अग्रज, प्रतिष्ठित लेखक, संस्कृत, हिन्दी, उर्दू आदि भाषाओं के विद्वान तथा धर्म परायण 
महापुरुष थे। विभिन्न पुस्तक लेखन के अतिरिक्त पंचांग दिवाकर व मुफीद आलम जंत्री 
के कुशल गणितकर्ता एवं सफल सम्पादक भी रहे। अपने कार्यकाल में उन्होंने अनेक 
सटीक एवं सत्य-भविष्यवाणियां भी कीं । उनकी जन्म एवं नवांश कुण्डलियों में ज्योतिषीय 7 
योग इस प्रकार से पाए जाते हैं- 

















उठ 















ज्योतिषीय समीक्षा: , 

(१) जन्म कुण्डली में राशि स्वामी शुक्र उच्च राशिस्थ (मीन) है। नवांश में भी 
उच्चस्थ होने से वर्गोत्तम स्थिति में हुआ है। जिससे स्त्री सुख यथेष्ट हुआ है । पत्री सुशील 
व भाग्यशालिनी हुई। विवाह के पश्चात्‌ विशेष भाग्योत्रति हुई। 

(2) भाग्येश चन्द्र उच्च राशि का होकर केन्द्र में शनि युक्त है तथा उन पर गुरु की 
विशेष पंचम दृष्टि पड़ रही है, जिससे जातक अत्यंत बुद्धिमान, धर्मपरायण, पूजा-पाठ, 
दान आदि कार्यों में विशेष रूचि रखता था। । 

(3) नवांश कुण्डली में नवांश पति गुरु उच्च राशिस्थ हो जाने से जन्म कुण्डली में नीच राशि के गुरु का नीच फल 
क्षीण हुआ है। नवांशपति भी गुरु उच्च्चस्थ होने से जातक शिक्षित, विद्वान, लेखक, बुद्धिमान, उदार हृदय, परोपकांरी, 
ज्योतिष, धर्मादि विषयों का ज्ञाता हुआ है। 

(4) गुरु पर लग्नेश मंगल की दृष्टि भी जातक को उच्च प्रतिष्ठित विद्वान व धार्मिक वृत्ति वाला बनाती है। गुरु 
ही दशा में (3 सितं. 953 से 43 सितं. 969 ई.) तक जातक को लेखन आदि कार्यों में विशेष प्रसिद्धि प्राप्त हुईं 

969 ई. के प्रारंभ में शनि मध्ये शनि की अन्तर्दशा में हृदय रोग एवं उच्च रक्तचाप रोगाक्रान्त हुए। 

(5) नवंबर 970 में शनि मध्येशनि की उपदशा काल में तथा जन्म राशि पर शनि साढ़ेसति कालीन मस्तिष्क आधघोत 

के कारण लगभग 57 वर्ष की आयु में जातक की आकस्मिक अकाल मृत्यु हुई। । 


द्वि-विवाह एवं विदेश में सुप्रतिष्ठित योग 


.. बुश्चिक लग्न एवं कर्क के नवांश में उत्पन्न यह जातक भाग्य स्थान पर उच्चस्थ गुरु कुण्डली संख्या नं. 76. 
मंगल के योग के फलस्वरूप प्रभावशाली एवं आकर्षक व्यक्तित्व वाला, तीब्र बुद्धमान,. आज १२०० 
विद्वान, भाग्यशाली, धार्मिक विचारों से युक्त, पराक्रमी, उच्चाकांक्षी एवं स्वावलम्बी तथा __ ल.स्‍्प. -७/३/२ जालन्धर , 
जीवन में अपने निजी पुरुषार्थ द्वारा लाभ व उन्नति प्राप्त करने वाला होता.है। इस जातक का 
एक बड़ा भाई तथा एक छोटा भाई है। उच्च शिक्षा प्राप्ति के बाद यह पच्चीस (25) वर्ष की 
आयु जून 4980 को सूर्य की दशा के आरंभ विदेश (अमेरिका) में गया। 985 में वापिस 
आकर सित॑ं. 987 को (चन्द्र की दशा में) विवाह करवाकर पुन: अमेरिका जाकर स्थापित 
(5९॥॥60) हुआ है| वहां पर यह जातक निजी आवास, निजी वस्त्र उद्योग, दो पुत्र सन्‍्तति एवं 
वाहन आदि सुखों से सम्पन्न है। संनू 2004 ई. में इसकी प्रथम पत्नी का देहान्त हो गया। सन्‌ 
2002 के प्रारंभ में ( भौम मध्ये चन्द्रान्तर) जातक का पुर्नविवाह हुआ है। 
ज्योतिष-समीक्षा : ह 
(१) जातक की जन्म कुण्डली में राशि-स्वामी व लग्नेश (मंगल) तथा भाग्येश 
(चन्द्र) दोनें का स्थान विपर्यय योग भाग्यस्थान एवं चर राशि में ही हुआ है, जिससे 
जातक के भाग्य की उन्नति विदेश में ही हुई है। | 
: *केन्द्रेश व त्रिकोणेश ग्रहों का सम्बन्ध योग भाग्य स्थान में होने से राजयोग का 
निर्माण करता है| 
(2) चंद्र, मंगल, गुरु, शनि ये प्रमुख ग्रह जन्म कुण्डली में चर राशिगत है तथा नवांश 
कुण्डली में भी कर्क (चर) राशि उदित होने से जातक के भाग्य का उदय विदेश में हुआ है। 
(3) पंचमेश गुरु भाग्य स्थान में उच्च राशिस्थं होकर लग्न भाव को मैत्री दृष्टि.से देख रहा है, जिससे जातक कुशाग्र 
बुद्धि, धर्मपरायण, धनवान, मकान, सन्तान एवं वाहन आदि सुख साधनों से सम्पन्न हुआ है। 
(4) जन्म कुण्डलीमें सप्तमेश शुक्र अष्टम भाव में केतु-युक्त हो कर पड़ा है स्त्री कारक चन्द्रमा पर भी शनि की शम्रु 









































ज्योतिष तत्त्व ( फलित ) 79 


दृष्टि है तथा मंगल नीच राशिगत है। इसी कारण मंगल मध्ये चन्द्र की अन्तर्दशां सन्‌ 2004 में जातक की प्रथम स्त्री का 
स्वर्गवास हुआ तथा उसी की दशा में पुनर्विवाह हुआ। 


उच्च प्रतिष्ठित चार्टेड एकाऊंटेंट एवं धनी जातक 


संलग्न कुण्डली का जातक एक प्रसिद्ध एवं सफल चार्टेड-एकाऊंटैंट है। इसके पिता कुण्डली संखया नं 77 
रिटा. बैंक मैनेजर हैं, तथा जातक की दो बहिनें व कोई भाई नहीं। जातक का गेहुआं वर्ण जय 3 लए 7264॥ 


सवा. ( 2) 0 7?.श. लुधियाना 


एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व, अत्यन्त बुद्धिमान, व्यवहार कुशल, स्वाभिमानी, कुछ जिद्दी एंवं. 
कठोर प्रकृति का है। 25वें वर्ष गुरु की दशा में विवाह हुआ, तदुपरान्त शनि की दशा में दो 
लड़कियां व एक लड़के का जन्म हुआ। पत्नी सुशील, सुन्दर एवं पति के साथ सहयोग 
करने वाली हुई। आरम्भिक अवस्था में जातक का अपनी पत्नी के साथ दाम्पत्य सम्बन्ध 
कट एवं तनावपूर्ण रहे । जातक भूमि, जायदाद, मकान, वाहन आदि सुख साधनों से युक्त | ( ४ 
चार्टिड एकाऊंटैंट के व्यवसाय के अतिरिक्त आयात निर्यात तथा प्रापर्टी के लेन देन के॥ .“स्‌ बु के, 
कार्यों से लाभान्वित होता रहता है। 

ज्योतिषीय समीक्षा:- 

(१) पंचमेश व धनेश गुरु तथा षष्ठेश व लग्नेश मंगल के मध्य स्थान विपर्यय योग बना है जिससे जातक उच्च 
शिक्षित (चार्टिड एकाऊंटस), गुप्त युक्तियों द्वारा धनार्जन करने वाला हुआ। 

(2) नवांश कुण्डली में भी गुरु उच्चस्थ (कर्क का) होने से व्यवसायिक विद्या में उच्च प्रतिष्ठित एवं धनवान्‌ व्यक्ति 
हुआ है। 

(3) चन्द्र से केन्द्र, सप्तम भाव में सूर्य, बुध, गुरु का योग होने से जातक धन, सम्पदा, पुत्र सन्‍्तति एवं. वाहन आदि 
सुखों से सम्पन्न हुआ है। 


(4) सप्तम भाव में शुक्र पापाक्रान्त हुआ है तथा नवांश में शुक्र नीच राशिगत है। अतएवं स्त्री के साथ वैमनस्थयपूर्ण 
- सम्बन्ध रहे हैं। 








उच्च प्रतिष्ठित संस्कृत स्कालर (गोल्ड मैडलिस्ट) 


ु प्रस्तुत जन्म कुण्डली एक उत्कृष्ट संस्कृत एवं अंग्रेज़ी भाषा के विद्वान की है, जिन्होंने कुण्डली संख्या नं. 78 
युवा काल में हीं. संस्कृत एवं अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर (४...) की डिग्रियां प्राप्त्की.. शा जा 2672 


पुष्य, जाल. दुष्ट ५०/५५ 


तथा दोनों भाषाओं की अन्तिम परीक्षा में सर्वप्रथम श्रेष्ठ स्थाने ग्रहण कर स्वर्ण पंदक ग्रहण 
किए। बाद में ?.प्त.0. भी क्वालिफाई करके जालन्धर के एक प्रतिष्ठित कालेज में |सू 
प्रोफेसर का पद ग्रहण किया | तत्पश्चात्‌ संस्कृत विभाग के अध्यक्ष पद पर सुशोभित हुए। के 
इनका विवाह भी 97 ई. में सुशील, सुन्दर एवं सुपठित कन्या से शुक्र मध्ये शुक्र की 
अन्तरदशा में हुआ तथा शुक्र की अन्तर्दशाओं में ही क्रमश: दो कन्याओं का जन्म हुआ।॥| 42 
तथा पुत्र सन्‍्तति के सुख का अभाव रहा। 

जातक ने अपने जीवन काल में संस्कृत एवं अंग्रेज़ी साहित्य सम्बन्धी अप 
अनेक पुस्तकों का सफलपूर्वक लेखन एवं प्रकाशन किया तथा अन्तर्देशीय ख्याति प्राप्त की। 

ज्योतिषीय योग- _ कं 


() नवम (भाग्य) स्थान में स्वराशिगत चन्द्र पर सूर्य, बुध व शुक्र ग्रहों की शुभ दृष्टि होने से जातक स्त्री, संन्तान 
धन-धान्य आदि सुखों से सम्पन्न, नीतिज्ञ एवं उच्च प्रतिष्ठित होता है। 


(2) तृतीय भावस्थ सूर्य, बुधादि ग्रहों पर पंचमेश गुरु की शुभ नवम दृष्टि पड़ने से जातंक॑ अत्यन्त समृद्ध विद्वान, . 














80 . ज्योतिष तत्त्व ( फलित ) 
परिवार की पालना करने वाला, यशस्वी, प्रसिद्ध, बुद्धिमान तथा धर्मादि श्रेष्ठ कर्म करने वाला होता है- 
सत्कर्मकर्त्ता मतिमान्बदूनां समाश्र यश्चारूयशा मनस्वी। 
स्यान्मानवो भानुसुतालयस्थे भानौ च वाचस्पतिना प्रदृष्टे ॥ । 

(3) त्रिकोणेश (पंचमेश) गुरु द्वारा सप्तम भाव में पड़ना तथा लग्न को गुरु तथा मंगल ग्रहों का (मैत्री व स्वराशि) 
दृष्टि से देखना उच्च विद्या तथा देव-विद्या संस्कृत में विशेष रूचि व कुशलता प्रदान कराता है- 

शास्त्राम्यासासक्त चित्तो विनीतः कांतावितात्यन्तसंजात सौख्य:। 
मंत्री मर्त्यः काव्यकर्त्ता प्रसूती जायाभावे देवदेवाधिदेवे ॥ 

(4) द्वि-कन्या योग-जन्म कुण्डली अनुसार जातक का विवाह शुक्र की दशा एवं शुक्र की अन्तर्दशा में होने से तथा 
इन्हीं दशाओं में कन्या सन्तति उत्पन्न हुई। शुक्र जन्म व नवांश दोनों में प्रबल है। 
जम्भीर रूप से शरीर कष्टी एवं अरिष्टकर योण 

प्रस्तुत जातिका अत्यन्त बुद्धिमान, उच्चशिक्षित (/.5.(..), स्वाभिमानी एवं देखने में. कुण्डली संख्या नं. 79 
आकर्षक व्यक्तित्व की स्वामिनी है। यह अपने माता-पिता की एकाकी सन्तान है। जन्म अतगिया, 48:06 । 
काल से राहु की दशा ] महीने भोग्य थी, तदुपरान्त 7 वर्ष की आयु तक (26 अक्तू, 
975 ई.) तक अवधि गुरु दशा स्वास्थ्य एवं शिक्षा की दृष्टि से उत्तम रही तत्पश्चात्‌ 23 
वर्ष की आयु पर्यन्त (0 दिस. 997 ई. शनि मध्ये बुधान्तर तक), तो जातिका का 
स्वास्थ्य सामान्य एवं उच्च शिक्षा प्राप्ति में सफल रहीं। परन्तु 24 वर्ष की आयु के प्रारम्भ 
से अर्थात्‌ 3 दिसं. 997 ई. को शनि की महादशा एवं केतु की अन्तर्दशा के आरम्भ से 
जातिका के शरीर में तीत्र ज्वर का प्रकोप प्रारम्भ हुआ, जिसके प्रभाव का क्रम 5/6 वर्षों 
से नियमित रूप से आज भी जारी है। दिल्ली के शीर्षस्थ डाक्टरों द्वारा लगातार दी जाने 
वाली दवाई से अस्थायी तौर पर बीमारी कण्ट्रोल होती है, परन्तु दवाई छोड़ देने से रोग 
पुनः प्रकट होने लगता है। ग्रहों के परिपेक्ष्य में इसका विवेचन इस प्रकार होगा- 

ज्योतिषीय समीक्षा- 

(१) जिस वर्ष काल से जातिका को रोग का आक्रमण हुआ, उस समय शनि मध्ये 
केतु की अन्तर्दशा प्रारंभ हो चुकी थी। जन्म कुण्डली में शनि व केतु मध्ये द्वि-द्वादश 
स्थिति है, तथा केतु भी शत्रु राशिगत है। जिसके प्रभावस्वरूप जातिका के शरीर में बात- 
पित्तादि के कारण तीव्र ज्वर आदि क्लिष्ट रोग एवं मानसिक व्याकुलता होती है। शनि की 
दृष्टि मीन राशि पर होने से सर्वप्रथम पांव में कंपन शुरु हुआ। 

(2) जातिका के जन्म नक्षत्र शतभिषा का स्वामी राहु भी जन्म कुण्डली में लग्न भाव में क्लिष्ट रोगकारक हुआ है। 
यहां लग्नस्थ राहु मानसिक अशांति एवं विकलता प्रदान करता है। 

(3) लग्नेश मंगल द्वादश भाव में तथा द्वादशेश शुक्र लग्न भाव में होने से, दोनों ग्रहों ( मंगल-शुक्र ) का अशुभ स्थान- 
विपर्यय योग बना है, जो कि स्वास्थ्य की दृष्टि से अशुभ है। 

*द्वादश भाव में मंगल-बुध का योग भी शरीर कष्टी हो रहा है। 
(4) चतुर्थ भाव में भाग्येश चन्द्र व पंचमेश गुरु का सम्बन्ध होने से गजकेसरी योग बना है जिससे जातिका को भूमि 
: आवास, वाहन आदि सुखों की प्राप्ति हुई है। न 

(5) गुरु नवांश कुण्डली में भी कुम्भ राशिगत होने से वर्गोत्तम स्थिति में है जिससे जातिका.को उच्च शिक्षित तथा 

होनहार एवं उच्च प्रतिष्ठित जीवन साथी (?80767) की प्राप्ति हुई है। 























ज्योतिष तत्त्व ( फलित ) ह ह 87 


(6) चन्द्र से दशम भाव में सूर्य व सप्तमेश शुक्र होने से जातिका को सुप्रतिष्ठित माता-पिता एवं सुयोग्य पति 
का सुख प्राप्त हुआ। इस जातिका का वर्षकुंडली के अनुसार ज्योतिषी विश्लेषण मैंने अपनी पुस्तक वर्षकाल 
चंद्रिका मैं भी किया है। । 


प्रिंटिंग एवं प्रकाशन उद्योग में उच्च प्रतिष्ठित 

प्रस्तुत जन्म कुण्डली प्रिटिंग एवं प्रकाशन उद्योग से सम्बन्धित उच्च प्रतिष्ठित उद्योगपति. उदा. कुण्डली नं. 80 
की है। यह जातक अत्यन्त बुद्धिमान, परिश्रमी, पराक्रमी, आकर्षक व्यक्तित्व वाला 25 अक्तू, 954 ई. 
धर्मपरायण और अपने परिवारिक दायित्वों के प्रति ईमानदार पूर्ण रहा है। पिता जी _ हस्त ५, 9.30 4:॥(, जम्मू 
संस्कृत पाठशाला में कार्यरत रहे हैं। जातक स्वयं तीन भाइयों और दो बहिनों में सबसे 
बड़ा होने से परिवारिक कर्त्तव्यों के प्रति गम्भीर, निष्ठावान एवं संघर्षशील रहा तथा धीरे- 
धीरे अपने परिश्रम तथा भाइयों के सहयोग से शिक्षा एवं प्रिंटिंग के क्षेत्र में व्यापक स्तर हा 
पर लाभ व उन्नति को प्राप्त हुआ है। 978 ई. में सुशील, सुघड़ स्त्री के साथ विवाह हुआ 
तथा 984 व १983 में क्रमश: दो पुत्रों का जन्म हुआ। वर्तमान काल में जातक भूमि, 
मकान, सन्‍्तान, वाहन एवं व्यवसाय में उत्तम कोटि की कम्प्यूटर मशीनरी आदि सुख- 
सुविधाओं से सम्पन्न है।._.# 

ज्योतिषीय समीक्षा- (१) बृश्चिक लग्न में शुक्र लग्नस्थ होने. से जातक श्वेत वर्ण एवं आकर्षक व्यक्तित्व वाला 
मृदुभाषी, शिल्पकला एवं सहित्य की ओर विशेष॑ प्रवृत्ति और व्यवहार कुशल हुआ है। (2) लग्नेश मंगल तृतीय भाव में 
उच्चराशिस्थ होने से जातक पराक्रमी, उद्यमशील, परिश्रमी, लघु एज्रं दीर्घ यात्राएं तथा परिवार में अग्रज (बड़ा) एवं 
परिवार. का पोषक हुआ है। इस पर भाग्यस्थान में पंड़े (उच्चराशिस्थ गुरु की विशेष शुभ दृष्टि पड़ने से (4) जातक 

48303 धर्मपरायण, शिक्षित स्त्री, सन्‍्तान, भूमि आदि सुखों से युक्त तथा जातक के सम्बन्ध उच्च प्रतिष्ठित लोगों के । 
साथ । | 
. *जांतक ने गुरु की महादशा में 5 अक्तू, 498 से 5 अक्त. 997 के मध्य विशेष लाभ व उन्नति प्राप्त की । इसी दशा 

में क्रमशः 2. पुत्रों का जन्म हुआ। * राहु की दशा 5 अक्तू, 4963 से 5 अक्तू, 498] तक विशेष संघर्षपूर्ण रही । । 

*आगामी 5 अक्तू. 4997 से अक्तू, 2000 तक शनि मध्येशन्यन्तर तथा तदुपरान्त शनि मध्ये बुधान्तर (7 अक्त. 200 
से जून 2003 ज्ञक) अवधि में भी उल्लेखनीय लाभ ब उन्नति प्राप्त की। ध्यान रहे, कि जातक की जन्म कुण्डली में द्वादश 
भाव में तुलु#क्वाःशनि भी उच्चस्थ होकर सूर्य, बुध के साथ योग कारक है। ह 


एक कुशल दनन्‍्त विशेषज्ञ डाक्टरस्ज्््ज्आआआओओईओईई-े 
प्रस्तुक्त जन्म कुण्डली दन्त सम्बन्धी तकनीकिं एवं व्यवसायिक क्षेत्र में उच्च शिक्षित उदा. कुण्डली नं. 84 । 
जातक को हैकैंद्स जातक. ने अपने परिश्रम, पराक्रम एवं बौद्धिक योग्यता के बल पर 42 दिस. 4979 _ ' 
, ५दन्त निर्माण एवं चिकित्सा सम्बन्धी निजी लैबोरिट्री लगाई है, जिससे दन्त रोग सम्बन्धी द 
अनेक़ डांक्टरों एवं रोगियों को लाभ पहुंचता है। जातक का एक भाई और दो बड़ी बहनें थ् 40 
है कक के कार्य क्षेत्र की सफलता में उसके माता-पिता एवं मातुल पक्ष का विशेष 
रहा है। जातक का ऊंचा कद एवं आकर्षक व्यक्तित्व का स्वामी है। 
ज्योतिषीय समीक्षा 
(4) जातक ने मंगल मध्य सूर्य के अन्तर अर्थात्‌ जन. 200 में अल्पायु में ही अपनी 
लैबोरटरी का शुभारम्भ किया। 4 2 हक 
(2) जन्म कुण्डली में सूर्य व मंगल का केन्द्र भावों में परस्पर स्थान परिवर्तन होने से विशेष योग बना-है। . 
(3) मंगल का दशम स्थान में धनेश व पंचमेश गुरु व राहु के साथ योग होना भविष्य में विशेष लाभप्रद रहने की 
सम्भावना है। 
(4) लाभस्थान शनि का भाग्येश चन्द्र के साथ योग होना भी जातक को तकनीकि (दन्त विशेषज्ञ) क्षेत्र में लाभ व 
उन्नति कारक है। 








ः । 


डे रे हि . 


82 ज्योतिष तत्त्व ( फलित ):. ॒ 
ससपपरमम++तत८+-ह पुत्र संतति अभाव एवं एक कन्या योग 
प्रस्तुत जन्म कुण्डली पैकिंग मैटीरियल एवं बुक-बाईडिंग के उद्योग से जुड़े एक. उदा. कुण्डली नं. 82 ॥ 
कुशल जातक की है। पिता का निधन जातक की अल्पायु में ही हो गया। माता, एक. 8मार्च, 4946ई. जाल... 
छोटा भाई व बहन का सुख प्राप्त हुआ। बाल्यकाल से ही जातक स्वावलम्बी, परिश्रमी _कैतिका (2 ), .5.7. 24-50 
एवं हस्त कलाओं में कुशल था परन्तु शिक्षा के क्षेत्र में भाग्यशाली नहीं रहा परन्तु सामान्य गु.(ब)/| 
ज्ञान में विशेष कुशल है। सवार्जित धन से भूमि, मकान, वाहन आदि सुखों की प्राप्ति हुई। || 0 
सन्‌ 4979 में राहु मध्ये शुक्रान्तर में सुन्दर, सुशील कन्या से विवाह हुआ जो कि अपने 
पति के कार्यों में विशेष तौर पर सहायिका रही है। जुलाई 98 ई. में राहु मध्ये शुक्रान्तर | हे 
कालीन ही सुन्दर कन्या सनन्‍्तति का जन्म हुआ। जातक को ज्योतिष, तंत्र आदि गूढ़ || व 
विद्याओं में रूचि है। कन्या का कोई बहिन, भाई नहीं हुआ। इस सम्बन्ध में कुछ मुख्य | > 
ज्योतिषीय कारण इस प्रकार से बनते हैं। 
(१) पंचमेश गुरु वक्री होकर शुक्र की राशि.में तथा व्ययेश शुक्र पंचम भाव में होने से जातक कन्या सनन्‍्तति का जन्म 
हुआ है। ह 
(2) जन्म कुण्डली में शुक्र की अन्तरर्दशा का होना, पंचम में शुक्र स्त्री राशि (मीन) में होना एवं नवांश में भी शुक्र 
स्त्री राशि (कर्क) में होने से शुक्र का प्रभाव अधिक हुआ है जिस कारण कन्या सनन्‍्तति का जन्म हुआ। ' 
(3) पंचम भाव में अष्टमेश बुध का होना तथा नवांश कुं. में मंगल-केतु का योग पुत्र सन्‍्तति सुख में बाधक हुआ है। 


विदेश में भाग्योदय योग 
जातक उच्चशिक्षित, तीत्र बुद्धिमान, प्रभावशाली एवं आकर्षक व्यक्तित्व का स्वामी है।. उदा. कुण्डली नं. 83 
भारतीय प्राच्य विद्याओं एवं योग आदि विद्याओं में उच्चप्रशिक्षित है। सितं. 2000 ई, तक 2 सित॑. 970 ई. 
निजी कार्य क्षेत्र से जुड़े रहे तथा विभिन्न संस्थाओं में योग सम्बन्धी प्रशिक्षण देते रहे हैं |[-+----+- दुपे, चण्डीगढ़ 
अक्तू. 2000 ई. में पुलिस वि रे में योगा और व्यायाम के प्रशिक्षक के तौर पर कार्यरत बे 
हुए परन्तु जुलाई. 2002 ई. में राहु मध्ये चन्द्र की दशा में विदेश ( आस्ट्रेलिया) में उच्चतर हक 
शैक्षणिक आधार पर चुने गए तथा अगस्त 2002 ई. में स्थायी विजा के आधार पंर विदेश के, 
रवाना हुए। इस कुण्डली में दशम भाव पर सूर्य-मंगल का अति उत्तम योग बना हुआ है।|| 42 
भाग्येश, पंचमेश व सप्तमेश सभी चर राशि एवं द्वादश भाव में है। | 


























] "आ 


 अ्््जियउथउथ,ड?ः: खबड़ उद्योग में सफल उद्योगपति 


प्रस्तुत कुण्डली का जातक अत्यन्त बुद्धिमान, परिश्रमी एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व का उदाहरण कुं. 84 
| है 20 जन., 956 ई. 


स्वामी है। शिक्षा मध्यम स्तरीय हुई है । जुला. 98 में शुक्र की दशा में विवाह हुआ तथा 


साथ रबड़ इण्डस्ट्री में कार्यरत हुए। इस सम्बन्ध में देश-विदेश जाते रहते हैं। भूमि- 
जायदाद, वाहन आदि सुखों से युक्त हैं ।6 अप्रै. 2003 ई. में मंगल की दशा में भाइयों से 
सांझेदारी के व्यवसाय से अलग होकर स्वतन्त्र रूप से व्यवसाय करने लगे हैं। 











ज्योतिष तत्त्व ( फलित ) ह ह 83 


धर्मेन्द्र - हिन्दी. फिल्‍मों का सफल हीरो >- 
१960 तथा 970 के दशाकों में सफलतम हीरो श्री धर्मेन्द्र की बृश्चिक कुण्डली में. - बा के लक 
अपने व्यवसायिक जीवन में सफलता के अनेक योग पाए जाते हैं, जैसे- । 8-१2-१935 ई. 
१. लग्नेश मंगल का तृतीय भाव में उच्च राशि का होकर दशम भावस्थ चन्द्र को मित्र 
दृष्टि से देखना। 9 । 
2. शशक योग :- शनि का चतुर्थ (केन्द्र) स्थान में स्वराशि का होकर; लग्न वचंद्र॥ ; 
दोनों से केन्द्र में होना शुभ है, जो जातक को भूमि, वाहन, धन, सम्पदा आदि सुखों को 
देता है। 
3. गज केसरी योग :- चन्द्र से गुरु केन्द्र में आना। 
4. द्वादश भाव में स्वराशि का शुक्र जातक को सुरा व सुन्दरी आदि सुखों की और 
प्रवृत्त करता है। 
गुरु दशमेश सूर्य युक्त पंचम व भाग्य भाव को अत्यंत शुभ दृष्टि से देखने से संतान, धन एवं भाग्यादि के बारे सुखी 
हुआ है। 


6. द्वादश भाव में शुक्र :- धमेन्द्र की कुण्डली में द्वादश भाव में स्वगृही शुक्र होने से जातक को शुक्र की दशा _ 
(24वें वर्ष) में युवावस्था में ही सिनेमा एवं अभिनय की और आकर्षित किया तथा धन, धान्य, स्त्री सुख एवं अन्य + 


सांसारिक सुखों की उपलब्धि हुई | उत्तरकालामृत में स्वराशिगत १2वें शुक्र को प्रशस्त माना गया है। 
स्वोच्चे, स्वर्क्ष शुक्रो द्वादश संस्थितो5पि शुभदो॥ 


''अद्धंशवाब्दि पंचांग 


(गत 50 वर्षों में उत्पन्न किसी भी जातक को जन्मपत्री मिंटों में बनाएँ) 


पं. देवी दंयाल्रु ज्योतिष संस्थांन, जालन्धर द्वारा गत वर्षों के पंचांगों को (_न्‌ 79443. 

से सन्‌ 7/993-94 ई. तक अथाति संक्‍त्‌ 2007 से 2050 तक) एक ही ४ 

8 वृहद्‌ पुस्तक में संकलित कर दिया गया है |दैनिक ग्रह स्पष्ट सहित इस वृहदाकार « 
: पुस्तक में ग्रहों के राशि प्रवेश घंटा मिंटों में, दैनिक सूर्योदयास्त , नक्षत्र, तिथि, योग, १ 

* करणादि दे दिए गए हैं। भारत के प्रसिद्ध नगरों के अक्षांश-रेखांश के अतिरिक्त ८ 


* प्रमुख विदेशी नगरों के अक्षांश-रेखांश भी दिए गए हैं। 
ज्योतिषियों एवं जन्मपत्री निर्माण वालों के लिए एक संग्रहणीय ग्रंथ है.। 
मूल्य 600 रुपये + 40 रुपये 5 640 रुपये का मनीआर्डर भेजकर रजिस्टर्ड पैकेट द्वारा पुस्तक मंगवाएं। 


डाक द्वारा पुस्तक मंगवाने का पता- ... (?) 2457959 
जनरल बुक डिपो, अडडा होशियारपुर , जालन्धर-। 44008 








प्‌ 





न ज्योतिष तत्त्व ( फलित ) 5 | 





(यदि किसी व्यक्ति के पास अपने जन्म की तारीख, वार, समय आदि का 
विवरण नहीं है, तो वह अपने नाम के प्रथमाक्षर के आधार पर अपनी राशि का 
निर्धारण कर सकता है ) द 

धनुर्लग्न समुत्पत्नो नीतिमान्‌ धनवान्‌ सुधी:। 
लोके मान्य:कुले श्रेष्ठ: पुत्र पौत्रादि संयुतः॥१॥ 
बहुकलाकु शलः, सत्यप्रतिज्ञ: सुतरां मनोज्ञ:। 
धनुविधिज्ञश्च धर्नुधरगे नरो धनकरो5पि न करोति बहुव्ययम्‌ | 
अर्थात्‌ धनु लग्न में उत्पन्न मनुष्य नीतिकुशल, धनी, बुद्धिमान, लोगों में सम्मानित, कुल में श्रेष्ठ, धन, वाहन, पुत्रे- 
यौत्र आदि सुखों से युक्त होता है। ऐसा जातक शिल्पादि अनेक कलाओं में कुशल, निर्मल बुद्धि, सत्यनिष्ठ, सुन्दर रूप 
विद्वान, धनु विद्या (अर्थात्‌ शस्त्रादि चालन में कुशल), धनवान होने पर भी कृपणता से धन का व्यय करता है। 


राशिचक्र में धनु नौवीं राशि है। भचक्र में इस राशि का विस्तार 240" से 270" तक है। इस राशि का अधिपति ' 


(स्वामी) ग्रह गुरु (॥णुआ०) है, जो सौरमण्डल में सर्वाधिक बड़ा ग्रह है। गुरु की यह त्रिकोण राशि है। लग्न के रूप 
में यह प्रथम एवं चतुर्थ भाव का स्वामी हो जातों है। कालपुरुष में इस राशि का निवास (सम्बन्ध) जंघाओं, नसों तथा 
नितम्ब स्थान है। यह राशि मूला नक्षत्र के 4 चरण-( ये, यो, भा, भी,) पूर्वाषाढ़ा के 4 चरण (भ, धा, फ, ढ)एवं 


उत्तराषाढ़ा का एक चरण (भे) से मिलकर बनी है। मूला का स्वामी केतु, पूर्वाषाढ़ा का शुक्र तथा उत्तरीषाढ्ंं का स्वामी 


सूर्य है। 


किसी जातक के जन्म समय का लग्न स्पष्ट जिस नक्षत्र के अंशश्या पाद चरण पर होता है, उस नक्षत्र भाग के | 
स्वामी के अनुरूप भी जातक के व्यक्तित्व पर प्रभाव पड़ता है। इस सम्बन्ध में तुला लग्न का प्रारम्भिक भाग भी अवश्य | 








पढ़ें। वहां उदाहरण सहित इस सम्बन्ध में लिखा गया है। धनु लग्न में नवम भाग (26"-40' से 30"-00'-वक) का | 


. |नवांश लग्न धनु ही होगा जोकि वर्गोत्तम होगा। 


धनु राशि इन्द्रधनुषीय कामनाओं और आशाओं की प्रतीक है। यह विषम राशि मध्यमाकार पुरुष राशि, धनुष धारण | 


किए कटि से ऊपर मनुष्य और नीचे अश्व (घोड़े) के सामान आकार की, अल्प प्रसवी, उग्र प्रकृति, सतोगुणी राशि | 


है। यह अग्नि तत्त्व;द्विस्वभावा, बाल्यावस्था, रात्रि बली, पित्त प्रकृति, क्षत्रिय जाति, पृष्ठोदयी, पूर्वदिशा की स्वामिनी | 


है। इसका प्राकृतिक स्वभाव मर्यादा पालन करना, आदर्श एवं अधिकार प्रियता है। वाहनों के प्रति विशेष लगाव रहता | 


है। कोई भी ग्रह इस राशि में नीच या उच्च. का नहीं होता। परन्तु कुछ विद्वान राहु को इस राशि में नीच एवं केतु को 
उच्च मानते हैं| गुरु इस राशि पर 5 से 0 अंश तक मूल त्रिकोणस्थ माना जाता है। 
._निरयण सूर्य गोचरवश प्रतिवर्ष प्राय:5 दिसम्बर से 3 जनवरी तक इस राशि पर संचार करता है। 


धनु राशि के अन्य पर्याय (गाम)-अश्व, अस्त्री, चाप, धनुष्क, धनुष्मान, अश्वकाय, शरासन आदि। | 


द अंग्रेज़ी में इसे 'सैजिटेरियस' (5928॥8705$) कहते हैं । 


गुण एव म्ञामान्य विशेषताएं -धुन राशि का स्वामी गुरु है। धनु जातक का स्वभाव इस राशि के प्रतीक |: हु 
धनुर्धारी से अभिव्यक्त किया जा सकता है। जिस प्रकार धनुर्धारी सीधा लक्ष्य-बेध करता है, उसी प्रकार धनु लग्न |- - 
जातक का लक्ष्य की तरफ ध्यान केन्द्रित रहता है। जातक सोच-विचार कर कार्य करता है। गुरु-बुध की स्थिति शुभ 
हो तो जातक बुद्धिमान, सौम्य, सरल स्वभाव, धार्मिक प्रकृति, उदार हृदय, परोपकारी, संवेदनशील, करुणा, दया आदि | - 
भावनाओं से युक्त होगा। दूसरों के मनोभावों को जान लेने की विशेष क्षमता होगी, इस राशि के व्यक्ति में वैद्धिक एवं | 





रु 


- पीत्त वर्ण, (यदि लग्न में मंगल की दृष्टि आदि का योग हो,तो श्वेत लालिमा मिश्रित वर्ण), 


धनुलग्नमेंयोगकारक ग्रह _ __[_[_[३औ॒॒औ[३॒][]॒]_[]॒__॒_॒_॒_॒॒॒_॒ ॒_._ 55 में योगकारक ग्रह 85 
मानसिक शक्ति प्रबल होती है। ह 





भावों में हो तो जातक धार्मिक, आस्थावान एवं भाग्यशाली होगा। सूर्य की दशा में शुभ 
फल घटित होंगे। 

चन्द्रमा-अष्टमेश होने से यद्यपि स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छा नहीं किन्तु कल्पनाशक्ति 
एवं विद्वता की दृष्टि से जातक विद्वान, प्रतिष्ठित एवं अध्ययनंशील होगा। अड़्चनों के बाद 
सफलता होगी। 

मंजल-पंचमेश होने से जातक को बौद्धिक क्षमता, सन्तान (पुत्र संतति) एवं शिक्षा के 
सम्बन्ध में शुभ फलदायक परन्तु व्ययेश भी होने से आकस्मिक विघ्न बाधाएं, धन का अपव्यय तथा तनाव देता है। अपनी 
दशा में मिश्रित फल देता है। 





बुध-सप्तमेश व कर्मेश होने से विवाह एवं व्यवसाय आदि की दृष्टि से प्रायः शुभ फल देता है परन्तु केन्द्रैश दोष होने - 


से उसके शुभकारकत्व गुणों एवं फल में कमी आ जाती है। अपनी दशाअचन्तर्दशा में शुभाशुभ फल बुध की स्थिति पर 
निर्भर करेगा। 

जुरु-लग्न एवं चतुर्थ (सुख) भावों का स्वामी होने से शुभफली होता है | केन्द्राधिपत्य दोष युक्त भी होता है परन्तु 
लग्नेश होने के कारण मारकत्व आदि दोष नहीं होंगे तथा अशुभ फल कम ही देगा। गुरु यदि कुण्डली में अशुभस्थ हो 
तो अपनी दशा में कष्टों के बाद सफलता देगा। 

शुक्र-त्रिषडायपति अर्थात्‌ छटे व 7वें भाव का स्वामी होने से प्राय: इस लग्न में अशुभ फल देता है। किन्तु 2, 3 


.4,7, 8, ॥7वें भावों में अपनी दशा में किंचित शुभफल प्रदान करेगा। 


शनि-धनेश एवं तृतीयेश होने से अपनी दशा में मिश्रित प्रभाव करता है। , 3, 5, 7, 8, 9, 0, 2वें भावों में शुभ 
तथा शेष भावों में अशुभफली होता है। फलदीपिका के अनुसार शनि पंचम भाव में नीच का होने पर भी लाभ स्थान व 
धन स्थान को उच्च एवं स्वराशि से देखने से अपनी दशा में शुभ फल करता है। देखें कुं. नं. 87-92 

राहु-2, 3, 5, 6, 8, 9, 0, , १2वें भाव में शुभ, शेष अन्य भावों में अशुभ फल करता है। दृष्टि योग्य आदि से 
फल में परिवर्तन भी संभव। 

केतु-2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, एवं १2वें भावों में शुभ तथा अन्य स्थानों में अशुभ फल करता है। 

नोट : दो, तीन या अधिक ग्रहों स्थिति में अथवा ग्रहों की शुभाशुभ अवस्थाओं एवं पारस्परिक दृष्टियों के कारण 
उपरोक्त ग्रहों के शुभाशुभ फलों के सम्बन्धमें न्यूनाधिकता की सम्भवना भी होती है। 


बी 
धनु लग्न-गुण स्वभाव, व्यवसाय/विवाह सुख आदि 


शारीरिक गठन एवं व्यक्तित्व-घनु लग्न कुण्डली में गुरु एवं सूर्य शुभस्थ (-- 
हों, तो जातक का ऊंचा (लम्बा) कद, संतुलित (8&॥००१०) एवं सुगठित शरीर, | 
सुन्दर गेंहुआ रंग, किंचित-चौड़ी एवं अण्डाकार (0ए2॥ &727०0) मुखाकृति, चौड़ा॥. ८० > 
एवं ऊंचा माथा, प्राय: लम्बी नाक.एवं लम्बी पुष्ट गर्दन, बादाम जैसी आकृति की॥< 
चमकदार आंखें, बड़े किन्तु सुन्दर मजबूत दान्त, बौद्धिकता के प्रतीक बड़े कान, श्वेत- | .. 


तथा सौम्य, हंसमुख, आकर्षक, सुन्दर एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व वाला होगा। 








86 _ _  €€€॒<<॒ ॒॒॒२॒॒॒॒7औ_7२7२7२7२777र_7_7_र_२_€€॒॒॒ऊ_ऊऊ7२_८_टटनु लग स्वभाव एवं स्वास्थ्य एवं स्वास्थ्य ःह 
चारित्रिक एवं स्वभावगत विशेषताएं-(८#ब्चा3०९४४50० ॥७0९/९75) 
धनु लग्न अग्नि तत्त्व राशि तथा लग्न स्वामी गुरु शुभ होने से जातक अत्यन्त बुद्धिमान, परिश्रमी, स्वाभिमानी ($0[. 





: 855270 ५८), पराक्रमी, सहासी, धर्म-परायण, अच्छे बुरे एवं दूसरों के भावों को जान लेने की विशेष क्षमता होगीं। 


जातक स्पष्टवक्‍्ता (800), ईमानदार, न्यायप्रिय, व्यवहार-कुशल, उदार-हृदय, मिलनसार, नर्म दिल, सिद्धान्तवादी एवं 
अध्ययनशील प्रकृति का होता है। यदि सूर्य भी शुभस्थ हो, तो जातक कुल में श्रेष्ठ, भाग्यशाली तथा बौद्धिक एवं मानसिक 
शक्ति प्रबल होगी, जिस कार्य को करने का संकल्प कर लेता है उसे पूरा किये बिना नहीं छोड़ता। ऐसा जातक धन, . 
सम्पदा एवं वाहन आदि सुख-साधनों से युक्त तथा निज पराक्रम एवं पुरुषार्थ द्वारा लाभ व उन्नति प्राप्त करने वाला होगा।.. 
धर्म परायण, परोपकारी स्वभाव तथा लोगों की भलाई का ख्याल बहुत रखे। जातक उच्च एवं श्रेष्ठ विचारों से युक्त, 
शिक्षित तथा उच्च-प्रतिष्ठित लोगों के साथ मेल-जोल अधिक रखे। परन्तु शनि यदि अशुभ हो, तो जातक को भाई 
बन्धुओं के सुख में कमी रहे तथा कार्य/व्यवसाय के सम्बन्ध में अत्यधिक संघर्ष व कठिनाईयों का सामना रहता है। 32 
वर्ष की आयु के बाद विशेष भाग्योदय होता है। 
धनु लग्न काल पुरुष के राशिचक्र में नवमी राशि होने से जातक को योग, दर्शन, आध्यात्म, चिकित्सा आदि बौद्धिक 
विषयों में विशेष अभिरुचि होती है। आध्यात्म एवं जीवन सम्बन्धी रहस्यों को जानने में प्रयत्नशील रहते हैं । मंगल-गुरु 
के प्रभाव से जातक अध्ययनशील, आत्मविश्वास की भावना से युक्त, चुस्त, आशावादी दृष्टिकोण रखने वाला, दूसरों से 
सहानुभूति पूर्वक व्यवहार रखने वाला, महत्त्वकांक्षी, कठिन से कठिन समस्याओं को अपने धैर्य और साहस से ठीक कर 
लेने वाला होता है। देश-विदेश की यात्राओं के भी अवसर प्राप्त होते हैं। .. 
धनु राशि-द्वि-स्वभाव की राशि है। इसलिए ऐसे जातक शीघ्र कोई निर्णय नहीं कर पाते हैं, परन्तु जब खूब सोच 
समझ के बाद निर्णय लेते हैं, तो अपने कार्य को पूरा उत्साह एवं जोश के साथ प्रारम्भ कर देते हैं। वैसे तो धनु जातकों 
को जल्दी क्रोध नहीं आता, परन्तु यदि किसी कारण विशेष से आ जाए, तो देर तक क्रोधावेश में रहते हैं । केवल प्रेम व 
शान्ति से वशीभूत होते हैं। सूक्ष्म बुद्धि होने के कारण किसी भी विषय की गहराई तक जाने में कुशल होते हैं। कुण्डली 


. में मंगल-शुक्र का योग हो, तो विपरीत योनि (0750,॥० $०५) के प्रति विशेष आकर्षण होता है । यदि लग्न में पापग्रह 


हो अथवा पाप ग्रहों की दृष्टि हो, तो जातक ईर्षालु, हठी, जिद्दी, शीघ्र क्रोधित होने वाला, कठोर-स्वभाव, स्वार्थ-परक 
कामुक एवं स्वचेछाचारी स्वभाव का होता है। ऐसा जातक दूसरे लोगों की आलोचना एवं व्यंग्यात्मक बाणी का प्रयोग 
करने वाला भी होता है। 

स्वास्थ्य एवं रोग (प्र०भ & 705००5०५)-धनु लग्न जातक की कुण्डली में गुरु, सूर्य, मंगल आदि ग्रह 
शुभस्थ हों, तो जातक का स्वास्थ्य अच्छा एवं श्रेष्ठ होता है । परन्तु यदि लग्न व लग्नेश (गुरु) अशुभ हो तथा शनि, मंगल, 
शुक्र एवं राहु आदि ग्रहों का लग्न या लग्नेश के साथ अशुभ सम्बन्ध हो, तो जातक को कमर में या जोड़ों में दर्द, रक्‍्त- 


. विकार, लीवर एवं उदर-विकार, नेत्र, स्नायु रोग, प्रमेह, उच्च-रक्तचाप, जिगर, ज्वर, यौन रोग, गुप्त एवं पेचीदा रोगों की. 


सम्भावना रहती है। स्वास्थ्य में सावधानीवश धनु जातक को बहुत॑ अधिक ऊष्ण एवं गरिष्ठ एवं तला हुआ भोजन नहीं. 
लेना चाहिए। मादक वस्तुओं एवं मांस, मछली आदि तामसिक भोजन के सेवन से भी परहेज़ करना चाहिए। अत्यधिक _ 
क्रोध तथा उत्तेजना व आवेशपूर्ण व्यवहार भी आपके स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं। पौष्टिक एवं संतुलित भोजन एवं . 
नियमित व्यायाम आपके स्वास्थ्य जीवन के लिए सुखप्रद होंगे। | 


शिक्षा एवं कैरिअर-धनु लग्न में गुरु पंचम भाव से एवं पंचमेश मंगल के साथ शुभ सम्बन्ध बनाता हो, अथवा. 


गुरु-मंगल की दशा अन्‍्तर्दशा हो, तो जातक उच्च-शिक्षित, विख्यात्‌ एवं उच्च-पद प्रतिष्ठित होता है। देखें उदा. कुं. नं. 86 
(श्री लाल बहादुर शास्त्री) 


धनु जातक गुरु व बुध के प्रभाव से प्रायः अध्ययनशील प्रकृति के होते हैं । जीवन में किसी भी व्यवसाय से सम्बन्धित : 








धनु लग्नमें केरिबय वव्यवसाय__________  __ _  “जखमखम-ख - - 0ऑ$फख$ऑहऑञस्‍ऊञछ | 87 
हों, वह धर्म, ज्योतिष गूढ़ विषयों के अध्ययन से जुड़े रहते हैं। मंगल, बुध, सूर्यादि ग्रह स्वराशिस्थ या शुभस्थ हों तो 
जातक डाक्टर अथवा चिकित्सा क्षेत्र में सफल होता है। देखें उदा. कुं. (87) 

यदि चन्द्र, मंगल, बुधादि ग्रहों का योग केन्द्र-त्रिकोण में हो, तो जातक इलैक्ट्रिक इंजीनियर होता है। देखें उदा. कु. 
नं.(92) 

पंचम में गुरु एवं केन्द्र/त्रिकोण में सूर्य-बुध का योग होने से जातक वकालत के क्षेत्र में विशेष सफल रहता है। देखें 
उदा. कु. न. (89) 

चन्द्र-शुक्र एवं शनि ग्रहों के योग जातक या जातिका को अभिनय/कला एवं फिल्म क्षेत्र में सफलता दिलाता है। देखें 
उदा. कुं. नं. (93) (माधुरी दीक्षित) 

सामान्य: धनु जातक अपनी बौद्धिक योग्यता के बल पर उच्च व्यवसायिक विद्या:म्राप्त करने- में सक्षम होते हैं। धनु 

जातक की कुण्डली में सूर्य-बुध, सूर्य-मंगल, सूर्य-गुरु तथा गुरु-मंगल, गुरु-बुंध एवं बुध-शुक्र के योग कैरिअर की 

दृष्टि से विशेष प्रशस्त माने जाते हैं। 

आध्यात्मिक पक्ष-धनु लग्न राशि से कालपुरुष की नवमी राशि, उच्च लक्ष्य साधे धनुर्धारी पुरुष तथा कटिभाग 
से नीचे अर्ध अश्व की आकृति ग्रहण की हुई राशि मानी जाती है। इस प्रकार धनु.जातक वाले यदि योग साधना के बल 
पर पाशविक वृत्तियों पर विजय प्राप्त कर लें, तो वह ध्यान और योग की उच्च स्थितियों को प्रात्त कर सकते हैं। 

आर्थिक सम्र्थिति-धनु लग्न के जातक उच्चाभिलाषी, परिश्रमी एवं बौद्धिक क्षेत्र में विशेष योग्यता होने से अपने 
कार्य-व्यवसाय में विशेष लाभ व उन्नति प्राप्त कर लेते हैं । चाहे निजी व्यवसाय में हों, अथवा सर्विस में हों, दोनों स्थितियों 
में वह किफायतसार एवं समझकर खर्च करने वाले होते हैं। धनु जातक की कुण्डली में यदि सूर्य, गुरु, शनि, एवं बुध ग्रह 
शुभ हों तथा ग्रहदशा भी इन्हीं ग्रहों में से हो, तो जातक की आर्थिक स्थिति (विशेषकर 40 वर्ष की आयु के बाद) अच्छी 


._ होती है तथा अपने परिवार के लिए उदारपूर्वक व्यय करते हैं। 


प्रारम्भिक जीवन में आपके साधन चाहे अल्प रहें हों, किन्तु धनु जातक अपने पुरुषार्थ एवं शुभ ग्रहों के प्रभावस्वरूप 
भूमि, जायदाद, मकान, वाहन आदि सुख के साधन बना लेता है। यदि कुण्डली में केन्द्र गत चंद्र-गुरु एवं बुध हो, तो 
जातक की धरनार्जन में स्त्री का भी विशेष सहयोग होता है। देखें उदा. कुं. नं. 93,-94, यदि शनि स्वक्षेत्री हो तो जांतक 
धीरे-धीरे विलुप धन का स्वामी होता है। देखें उदा. कुं. 94, धनु कुण्डली में (केन्द्र-त्रिकोण में) सूर्य-बुध का योग 
जातक को बौद्धिक कार्यों से विशेष धन लाभ करवाता है। 

अनुकूल व्यवम्नाय (?7०८४आं०४३। (४०००)-धनु जातक की कुंडली में यदि सूर्य, बुध एवं गुरु शुभस्थ 
हों, तो जातक बौद्धिक कार्यों में विशेष सफल होता है जैसे प्रोफेसर, अध्यापक, वकील, जजं; ज्योतिषी, दार्शनिक, 
चिकित्सक, धर्म गुरु (उपदेशक) कर्मकाण्ड, पण्डितं, कलाकार, अंभिनेता/अभिनेत्री, व्यापारी, खिलाड़ी, करियाना या 
जनरल स्टोर, समाज सेवक, राजनीतिज्ञ, बैंकिंग, गुप्तचर, एकाऊंटैंट, मैनेजर, सम्पादक, प्रकाशक होता है। यदि कुंडली 
में चन्द्र-शुक्रादि भी शुभस्थ हों, तो जातक/जातिका अभिनय, नृत्य, ग़ायंन, फैशन-डिज़्ाईनिंग, सौन्दर्य प्रसाधन आदि के . 
क्षेत्र में विशेष लाभ व उन्नति प्राप्त करती है। (देखें उदा. कुं. माधुरी दीक्षित) । धनु जातक की कुंडली में शनि दूसरे भाव 
में स्वक्षेत्री हो, तो जातक उच्चस्तरीय उद्योग अथवा उच्चस्तरीय व्यवसाय में सफल होता है, देखें उदा. कुं. 94, इसके - 
जातक शिल्प, क्रय-विक्रय, कम्प्यूटर विशेषज्ञ, इंजीनियरिंग आदि क्षेत्रों में भी विशेष उन्नत एवं लाभान्वित होते देखे गए 
हैं। 

प्रेम और वैवाहिक सुर्च ([,0०५७ ००१ |(४५7०० 7/6)-प्रेम और विवाह के सम्बन्ध में धनु जातक अत्यन्त 
संवेदनशील, मैत्रीपूर्ण एवं उदार होते हैं। अपने उत्साहशील, आशावादी एवं विवेकपूर्ण व खुले व्यवहार तथा सहज मधुर 
मुस्कान लिए धनु जातक विपरीत सैक्स के युवक/युवतियों के लिए शीघ्र आकर्षण का केन्द्र बन जाते हैं। धनु जातक 











200 मी आज 8 2 5 ।//  तए7थघतुलग्न-सत्री जातिलाद 
जीवन में आदर्श प्रेम और बलिदान को विशेष महत्त्व देते हैं | प्रेम के वशीभूत होकर वह निजी स्वार्थ का भी बलिदान कर 
देते हैं । परन्तु धनु द्विस्वभाव राशि होने के कारण धनु जातक प्रेम के प्रसंगों में भी जल्दबाजी नहीं करते, अपितु खूब 
सोच-विचार एवं ऊहा-पूह के उपरांत किसी के प्रेम में समर्पित हो पाते हैं | परन्तु जब प्रेम एवं मैत्री में तब वह पूरी 
ईमानदारी, उत्साह एवं गहराई से न्‍्यौछावर होते हैं । विवाह सम्बन्धों के बारे में भी धनु जातक शीघ्रता एवं अत्यन्त 
भावुकता से काम नहीं लेते, बल्कि गम्भीर चिन्तन एवं सोच विचार के बाद ही जीवन साथी का चुनाव कर पाते हैं | इसी 
असमंजसपूर्ण प्रकृति के कारण कई बार जातक के विवाह की उपयुक्त आयु भी निकल जाती है| यदि धनु जातक की 
कुंडली में गुरु, सूर्य, बुध एवं शुक्र शुभस्थ हों, तो जातक का वैवाहिक जीवन सुखमय होता है | पत्नी सुशील, बुद्धिमान 
तथा आर्थिक क्षेत्र में भी सहयोगिनी होती है | देखें उदा. कुं. 87, 88 

यदि कुण्डली में सप्तम भाव में राहु, भौमादि क्रूर ग्रह हो तथा बुध, शुक्र आदि अशुभ हों तो दाम्पत्य जीवन असुखद 
तथा पत्नी रोगिनी अथवा विरुद्ध स्वभाव की होती है। 

सावधानी-गृहस्थ एवं सामाजिक जीवन में सफलता के लिए अधिक क्रोध, जिद्द एवं आलोचनात्मक ( नुक्ता- 
चीनी) के स्वभाव पर यथासम्भव नियन्त्रण रखने का प्रयास करें। धनु लग्न जातक की पत्नी को भी पति के क्षणिक क्रोध 
की उपेक्षा करके धैर्य एवं शांति का परिचय देना चाहिए। 

अनुकूल राशि मैत्री-धनु राशि-लग्न जातक को प्राय: मेष, मिथुन, सिंह, कन्या, तुला, कुम्भ व मीन लग्न 
राशि के जातकों के साथ विवाह, व्यापार आदि सम्बन्ध लाभप्रद होंगे। कर्क, धनु व मकर राशि वालों के साथ सामान्य 
तथा वृष व बृश्चिक, मकर राशि वालों के साथ सम्बन्ध लाभप्रद नहीं होंगे। 

विवाह में तात्त्विक एवं राशि मैत्री के अतिरिक्त पारस्परिक कुण्डली मिलान (मंगलीक आदि विचार) तथा गुण 
मिलान का भी विचार कर लेना चाहिए। 


धनु लग्न को कन्या/जातिका ($बष्टा(क्षातंश्ा (ञ) 


धनु लग्न (राशि) की कन्या कुछ लम्बे कद की, सुन्दर, सुगठित एवं संतुलित (]39]8॥0९0 ) 
शरीर, अण्डाकार चौड़ाई लिए लम्बा चेहरा, कुछ गेहुँआ वर्ण, चमकदार बड़ी (बादामी) आंखें, | ५ पं | 
गहन (घनी) भौंहें, सुन्दर मजबूत दांत, कुछ चौड़ा मस्तक, खूबसूरत, सुन्दर एवं आकर्षक|[॥ / | 
व्यक्तित्व वाली होती है। 4 
स्वाभावगत विशेषताएं / |! 
चापोदये या वनिताभिजाता सा बुद्धिशूरा बहुकला कुशला। ७ 
पुण्यकर्मरता ,धर्मशीला , धन, पुत्रवती जाता पति-सुखान्विता ॥ त 
अर्थात्‌ धनु लग्न में उत्पन्न जातिका अत्यन्त बुद्धिमान, गायन, संगीत, साहित्य नृत्य, अभिनय 
आदि कलाओं में कुशल, परोपकारी, दया-दान आदि पुण्य कर्मों में रूचि रखने वाली, धनवान, श्रेष्ठ पति एवं सन्‍्तान आदि 
सुखों से संम्पन्न होती है। इसके अतिरिक्त यदि गुरु, मंगल, सूर्य शुभ हों, तो धनु जातिका अध्ययनशील प्रकृति, हंसमुख 
नर्म दिल, उदार हृदय, ईमानदार, सत्यप्रिया, धर्मपरायणा होते हुए भी दूसरों से सहानुभूति पूर्ण व्यवहार करने वाली एवं 
स्वतन्त्र चिन्तन करने वाल, स्वाभिमानिनी, न्‍्यायशील, साहसी, आत्मविश्वास की भावना से युक्त होती है । जिस काम को 
करने का निर्णय कर ले, उसे हर स्थिति में पूरा करके ही छोडेगी। 
यद्यपि अपने लक्ष्य के लिए निर्णय करने में विलम्ब हो सकता है परन्तु जब किसी कार्य के लिए गम्भीरता से निश्चय 
कर ले, तो उसमें अवश्य सफलता प्राप्त कर लेती है। ऐसी जातिका प्रायः उच्च शिक्षा प्राप्त करने में सफल होती है। धनु 
लग्न की जातिका की कुण्डली में मंगल, बुध आदि ग्रह शुभस्थ हों, तो जातिका उच्चाभिलाषी, परिश्रमी एवं जीवन के 
प्रत्येक क्षेत्र में उत्साहशील एवं सक्रिय रहती है। जातिका अभिनय, नृत्य, कास्मैटिक्स, ड्रैस-डिज़ाईनिंग, कम्प्यूटर 








धनुलग्नमेंदशाउन्तर्दशा ग्रह __ "/ _._ऊअ.__|||||[।[।[ऋ।[।[।[ै[ [[[ [#$#॒॒ 89 में दशाउन्तर्दशा ग्रह -. 89 


डिज़ाईनिंग, आफिस-कलर्क, अध्यापन (शिक्षा) खेल-कूद, चिकित्सा आदि बौद्धिक क्षेत्रों में विशेष सफल होती है 
इसके अतिरिक्त शिक्षा, व्यवसाय एवं कैरियर के लिए गत पृष्ठों में लिखे गए पुरुष धनु जातक के व्यवसाय सम्बन्धी 


विवरण का भी अवलोकन कर सकते हैं। 

मंगल, गुरु एवं बुध आदि ग्रहों के प्रभावस्वरूप धनु जातिका गुणवती, चरित्रवान्‌, उच्च-शिक्षा, पठन-पादन, लेखन, 
सम्पादन आदि कार्यों में विशेष रुचि रखने वाली, अपने गुणों द्वारा समाज एवं परिवार में प्रतिष्ठा प्राप्त करने वाली, बौद्धिक, 
कलात्मक एवं रचनात्मक विषयों में विशेष रुचि रखने वाली होगी । कम पढ़ी-लिखी होने पर भी धर्म एवं लोक व्यवहार 
के सम्बन्ध में अच्छा ज्ञान रखेगी। 

स्वास्थ्य एवं रोग-धनु जातिका का स्वास्थ्य बाह्य तौर पर देखने से अच्छा लगता है। परेंन्तु यदि जन्म कुंडली में 
चन्द्र, मंगल, शुक्र ग्रह अशुभ हों, अथवा षष्ठ, सप्तम एवं अष्टम भावों में शनि, मंगल, चंन्द्र, केतु, राहु आदि क्रूर ग्रह पड़े 
हों, तो जातिका को उदर या रक्त विकार, अनियमित मासिक धर्म, रक्तत्नाव आदि गुप्त रोग, पत्थरी, गला, नज़ला, 
जुकाम, शिर या नेत्र पीड़ा रोगों का भय रहता है। अधिक विवरण के लिए धनु पुरुष जातक देखें। 

प्रेम और दाम्पत्य सुख्-प्रेम के सम्बन्ध में धनु जातिका व्यवहार कुशल, स्पष्टवादी, सहदया एवं सहानुभूति 
पूर्वक व्यवहार करने वाली, मधुर मुस्कान, स्वछन्द व्यवहार एवं आकर्षक व्यक्तित्व के कारण धनु जातिका अपना काम 
करवाने में कुशल होती है । प्रेम प्रसंगों में भी भावुकतावश बहुत जल्दबाजी नहीं करती बल्कि गहन सोच-विचार के बाद 
ही विपरीत योन (097०४॥० 5०००) के प्रति प्रेम भावना प्रकट करती है। परन्तु अपने स्वाभिमान और आदर्शों के विरुद्ध 
समझौता नहीं करती । यदि कुंडली में गुरु, बुध शुभस्थ हों, एवं सप्तम भाव शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो, और दशा भी शुभ 
ग्रह की हो तो जातिका का विवाह उच्चप्रतिष्ठित सुयोग्य लड़के के साथ होता है। पति धन, सम्पदा एवं सुख साधनों से 
सम्पन्न होगा तथा परस्पर दाम्पत्य जीवन भी सुखमय होगा। विवाह के बाद जातिका अपने पति के परिवार एवं आर्थिक 
क्षेत्र में भी विशेष सहयोगिनी होती है। 


यदि सप्तम भाव में मंगल, राहु, केतु, शनि आदि क्रूर ग्रह हों एवं अशुभ नवांश हो, तो दाम्पत्य सुख में कमी होती है। 


अनुकूल मैत्री राशियाँ-धनु लग्न (राशि) की जातिका बौद्धिक, शैक्षणिक एवं आर्थिक क्षेत्र में अप्रने से 
श्रेष्छर जीवन साथी को अधिमान ([287०॥०८) देती है।जातिका का मैत्री एवं विवाह सम्बन्ध प्राय: मेष, मिथुन, सिंह, 
कन्या, तुला, कुम्भ व मीन लग्न राशियों के साथ शुभ एवं लाभदायक होगा। कर्क, धनु और मकर लग्न राशि वालों के 
साथ मध्यमफली तथा वृष व बृश्चिक लग्न राशि वाले जातक के साथ अशुभफली रहने की सम्भावना होगी। फिर भी 
परस्पर जन्मपत्रियों मिलान करके विवाह सम्बन्ध करना शुभ एवं कल्याणकारी होगा। 

सावधानी-धनु लग्न (राशि) की जातिका को जीवन साथी चुनाव करते समय बहुत अधिक तर्क-वितर्क, ऊहा- 
पोह एवं आलोचनात्मक दृष्टिकोण नहीं रखना चाहिए। कई बार वृथा हठधर्मी के कारण मांगलिक विवाह की उपयुक्त 


आयु निकल जाती है तथा स्वयं तथा माता-पिता एवं साथी को अनेक प्रकार की दुश्वारियों का सामना करना पड़ता है। . 


दशा5डन्तर्दशाओं में ग्रढों का फल 


किसी भाव सम्बन्धी फलादेश ज्ञात करने के लिए ग्रहों की दशा-अन्तर्दशा, प्रत्यन्तर दशा तथा गोचर ग्रहों को शुभाशुभ 
स्थिति को भी ध्यान में रखना होता है। सभी ग्रह अपनी दशा, अन्तर्दशा आदि के काल-में (कुण्डली में स्थिति अनुसार) : 


अपना शुभाशुभ फल प्रदान करते हैं। ग्रहों की दशाअन्तर्दशा के फलादेश का निर्णय करने से पूर्व ग्रहों के कारकत्व, स्थान 


आदि बल, वक्री-मार्गी; उच्च-नीचादि अवस्थाओं को भी ध्यान में रखना उचित होगा। प्रत्येक लग्न में ग्रहदशा फल में 
भिन्नता आने की सम्भावना होती है। शुभ एवं उदित ग्रह अपनी दशा-अन्तर्दशा में धन, वाहन, भूमि, विवाह, सन्तान, विद्या. 


आदि सुखों की प्राप्ति तथा सोची हुई योजनाओं में सफलता प्राप्त करवाता है। द 
.. जबकि अशुभ भावस्थ एवं नीच शन्नु राशिगत पापीग्रह अपनी दशा में धन हानि, शत्रु एवं सेग पीड़ा, प्रियजनों से 








90 _ |  _______॒[॒[॒[॒_॒[॒[_[[_[॒॒_ धनु लग्न में उपयोगी उपाय 
अनबन, क्लेश व बनते कार्यों में अड़चनें पैदा करता है । 
धनु लग्न जातक की कुण्डलीमें सूर्य, बुध, गुरु, मंगल ग्रह शुभ फल, अन्यग्रह-चन्द्र, शुक्र व शनि ग्रह शुभांशुभ 


अर्थात्‌ मिश्रित फल प्रदान करेंगे। राहु-केतु कुण्डली में स्थिति के अनुसार फल करेंगे। इस सम्बन्ध में इस लग्न के आरम्भ ' 
में “धनु लग्न में शुभाशुभ एवं योगकारक ग्रह '' शीर्षक के अन्तर्गत लिखे विवरण का भी अध्ययन करना चाहिएं। 


धनु लग्न सम्बन्धी कुछ उपयोगी उपाय 


शुभ रंग (,ए०८५ ८०0००७)-पीला, गुलाबी, हल्का हरा , संगतरी, हल्का नीला (480॥/ 8]06, 0762८॥) 
अशुभ रंग-काला, लाल, गहरा हरा 
शुभ वार (98४००:४०१९ 722५5)-रविवार, बुधवार, बीरवार, शुक्रवार तथा शनिवार 
भाग्यशाली नग (.पटा८४ $007०)-माणक (२७७५) तथा पुखराज दोनों में से कोई एक नग (ग्रहदशा एवं 
आवश्यकता अनुसार) सोने या ताम्र-सुवर्ण मिश्रित अंगूठी में क्रमश: रविवार अथवा गुरुवार को विधिपूर्वक धारण करें। 
नगर सहित अंगूठी पर 3 माला बीज मन्त्र का पाठ करके शुद्ध करके शुभ मुहूर्त्त में धारण करें | विस्तृत विधि एवं मुहूर्त 
हेतु हमारी प्रकाशित पंचांग दिवाकर कृत पंडित पन्ना लाल ज्यो. का अवलोकन करें। 
. सूर्य बीज मन्त्र-% हां हीं हों सः सूर्याय नमः । 
गुरु बीज मन्त्र-3# ग्रां ग्रीं ग्रां सः गुरवे नमः । 
वीरवार का व्रत विधिपूर्वक रखना तथा उस दिन एक बार मिष्ठान युक्त भोजन करना तथा गौओं को हरा चारा एवं गुड़ 
सहित चपातियां डालना शुभ होगा। 
शुभ अंक-व, 3, 5, व 9 के अंक क्रमानुसार शुभ एवं भाग्यकारी होते हैं। 


भाग्वोननतिकारक वर्ष-32वां, 36, 37, 39, 4। एवं 45वां 47वां एवं 50वां वर्ष शुभ एवं भाग्योन्नतिकारक होंगा . 


नोट- अपने लग्न से सम्बन्धित तथा विस्तृत जानकारी के लिए हमारी शीघ्र प्रकाश्य “'अनिष्ट ग्रहों के सुनहरी 
उपाय '”” नामक उपयोगी पुस्तक मंगवा कर लाभ उठाएं । पं. पन्ना लाल ज्यो 


[धनु लग्न के द्वादश भावों में सूर्य का फल] 


नोट : प्रत्येक भाव पर सूर्यादि ग्रहों के फल का निर्णय करते समय कुण्डली में अन्य ____ थनु लग्ने सूर्य फल 
ग्रहों की स्थिति, योग, दृष्टि आदि की भी समीक्षा कर लें, तो ग्रहफल अधिक स्पष्ट 
प्रकट होंगे। धनु लग्न में सूर्य भाग्येश होने के कारण जातक के जीवन में सूर्य का विशेष 
महत्व होता है। 

प्रथम भाँव- में मित्र ग्रह की राशि (धनु) पर सूर्य के प्रभाव से जातक सम्पुष्ट 
शरीर, आकर्षक व्यक्तित्व, भाग्यशाली, माता-पिता व अग्रजों का आदर करने वाला, 
अध्ययनशील, पढ़ने में रूचि, दृढ़-निश्चय वाला, ईमानदार, परांक्रमी, बुद्धिमान, उच्चस्तरीय 
, “ रहन-सहन, व्यवहार कुशल, धन-धान्य, भूमि एवं वाहन आदि सुखों से युक्त, शीघ्र 
उत्तेजित होने वाली प्रकृति, परन्तु धार्मिक एवं परोपकारी मनोवृत्ति होगी। ऐसा जातक उच्चाभिलाषी, धनी एवं उच्च 





. प्रतिष्ठित होता है। स्त्री सुन्दर, कार्यशील एवं परिवार में सहयोग करने वाली होगी। गुरु या बुध का शुभ योग या दृष्टि हो 








धनुलग्नमेंसूयफल_ ___[_[&  “ौ_[औौ_ौ_ौऔ[औ[औ/ ““ .. 9 
तो जातक उच्चाधिकारी, धर्म गुरू-प्राध्यापक या वकौल, जज आदि हो सकता है। देखें उदाहरण कुंडली नं. 89, यदि 

-च. योग हो, तो धनवान होता है। देखें उदाहरण कुंडली नं. 94. 

द्वितीय भांव-में मकर राशि पर सूर्य के प्रभाव से या सूर्य की दशा में जातक को कार्य/व्यवसाय में अत्यन्त संघर्ष 
एवं कठिनाइयों के पश्चात निर्वाह योग्य आय के साधन बनते हैं | पारिवारिक क्षेत्र में भी अनेक परेशानियों एवं तनाव का 
सामना-रहता है । यदि शनि अशुभ हो तो स्त्री को कष्ट एवं आर्थिक संकट सम्बन्धी समस्याओं के कारण मन विश्लुब्ध रहता 
है। ऐसा जातक कई बार कटुभाषी, मुख रोगी एवं नेत्र रोग आदि के कारण कष्ट उठाता है। यदि शनि शुभ हो, तो जातक 
व्यवहार कुशल, उच्चस्थ लोगों से सम्मान प्राप्त, तकनीकी एवं शिल्पकला विद्या जानने वाला तथा क्रय-विक्रय से धनार्जन 


- , करने वाला होगा। देखें उदाहरण कुंडली नं. 88 





तुतीय भाँव-में शत्रुग्रह की कुम्भ राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक धैर्यवान, भाग्यवान्र, साहसी, परोपकारी, 
परिश्रमी एवं प्रतिष्ठित होता है। भाई-बहनों के सुख में कमी अथवा इसका कोई भाई बहुत उच्च-प्रतिष्ठित होने पर भी 
उससे कोई विशेष लाभ न हो। जातक का स्वयं भी उच्च प्रतिष्ठित लोगों के साथ सम्पर्क होगा। धार्मिक एवं ज्योतिष आदि 
विषयों में भी विशेष रूचि होगी। ऐसा जातक धर्म और नियमों का पालन करने वाला तथा निजी प्रयासों के बल पर 
धनार्जन करने वाला, सुख-साधमनों से युक्त होता है। वायु तत्त्व राशि होने से जातक को विदेश गमन आदि की संभावना 
होगी। 

चतुर्थ भाँव-में मित्र राशि मीन पर सूर्य के प्रभाव से जातक को भूमि, जायदाद एवं वाहन का सुख प्राप्त होता है। 
जातक को माता-पिता के प्रति विशेष आसक्ति एवं सत्कार रहे। शनि-गुरु यदि शुभस्थ हो, तो जातंक आवास, भूमि 
वाहनादि सुखों से सम्पन्न हो, कारोबार में विज्न-बाधाओं के बावजूद निर्वाह योग्य आय के साधान बनते रहेंगे। यद्यपि 
व्यवसाय में उतार-चढ़ाव की परिस्थितियां आती रहेंगी। यदि सूर्य राहु-शनि आदि अशुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो तो धन- 
हानि, तनाव एवं उपरोक्त सुखों में कमी तथा माता-पिता को कष्ट होने की संभावना रहती है। 

पंचम भांव-में उच्च राशि मेष पर सूर्य होने से जातक कुशाग्र बुद्धि, उच्चाभिलाषी, भाग्यवान, उच्च विद्या प्राप्ति एवं 
कम्पीटीशन इत्यादि में सफल, उच्च प्रतिष्ठित एवं सम्मानित व्यक्ति, धार्मिक कार्यों में भी विशेष रूचि रखने वाला एवं 
स्वतन्त्र व स्वाभिमानी प्रकृति का होगा। अपनी प्रतिक्षका विशेष ध्यान रखे। किसी भी प्रकार की अधीनता पसन्द नहीं 
होती। गुरु, बुधादि ग्रहों का योग या सम्बन्ध हो, तो जातक भूमि, उच्च-विद्या, संतान, अच्छा व्यवसाय, जायदाद, वाहन 
आदि सुखों से सम्पन्न होगा। यंदि राहु-शनि आदि अशुभ ग्रहों की युति या दृष्टि होगी, तो जातक को भाग्योन्नति में अड़चनें 
व चित्त में अशांति होगी। । | 

बछ्ठ भांव-में शत्रु राशि वृष पर सूर्य के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति एवं व्यवसाय में बार-बार विघ्र-बाधाएं हों 
तथा कठिन परिश्रम के बाद निर्वाह योग्य आय के साधन बनें। परन्तु धन का व्यय भी अधिक रहे । मातुल पक्ष (नानके ) 
के सुख में कमी, शत्रुओं के कारण मन में परेशानी अधिक रहे | गुरु, शनि स्वराशिस्थ या उच्चस्थ हों तो जातक को विदेश 
आदि कार्यों में विशेष सफलता हो। | 

कऋअंत्तम भाँव-में मित्र मिथुन राशि पर सूर्य के प्रभाव से जातक बुद्धिमान, शिक्षित, प्रभावशाली, विवाह के बाद 
भाग्य में विशेष परिवर्तन परन्तु व्यवसाय में उन्नति करने वाला, यदि सूर्य-बुध हो तो उच्च प्रतिष्ठित लोगों से सम्पर्क तथा 
: उनके द्वारा विशेष सहायता प्राप्त करने वाला, व्यवसायिक क्षेत्र में तथा पारिवारिक सुख में कुछ अड़चनों के बाद कामयाबी 
प्राप्त हो । विवाह सुख में भी विलम्ब एवं विष्न होने के संकेत तथा भाग्य में 34 वें वर्ष के बाद सफलता के योग। ऐसा 
जातक न्यायपालिका से सम्बन्धित या कानून आदि का जानकार भी होता है। 


अंश्टम भाव-में कर्क राशि पर सूर्य होने से जातक के जीवन का प्रारम्भिक भाग विशेष संघर्षपूर्ण रहता है। 





92 |___॒/॒[॒ई॒ई॒_॒[३॒_॒[॒[ई॒ईऔ॑औ £_£_॒०औ०औ०॒_॒_॒_॒_॒_[_धनुलग्नमें सूर्यफल 
भाग्योन्नति में बहुत सी रूकावटें आती हैं। पारिवारिक सुख में कमी तथा व्यवसाय एवं आर्थिक क्षेत्र में भी विशेष 





परेशानियां बनी रहती हैं | संघर्ष अधिक व आय सीमित रहती है। भाग्य के सम्बन्ध में विशेष परिवर्तन होते रहते हैं। यदि ४: 
सूर्य, शनि, राहु आदि से युक्त या दृष्ट हो,तो जातक को शरीर कष्ट, मानसिक तनाव, पिता को कष्ट, वृथा खर्च तथा दौड़--: : न्‍ 


धूप अधिक रहती है। 

नंवमग भांव॑-में स्वराशि सिंह राशि पर सूर्य के प्रभाव से जातक बुद्धिमान, उच्चशिक्षित, उच्चाभिलाषी, भाग्यशाली, 
स्वाभिमानी प्रकृति एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व का स्वामी होता है। ऐसा जातक परोपकारी, उदार हृदय एवं मंत्र-ज्योतिष 
आदि गूढ़ विषयों में रुचि, धर्म-कर्म में श्रद्धावान तथा श्रेष्ठ बुद्धि वाला, अच्छा आवास, धन, वाहन एवं पुत्रादि सुखों से 
युक्त तथा ख्यातिवान होता है | गुरु, बुध, भौमादि ग्रह शुभस्थ हों तो जातक उच्चप्रतिष्ठित, डाक्टर, इंजीनियर आदि उच्च पद 
प्राप्त व्यक्ति होता है। देखें उदाहरण कुंडली नं. 87 तथा 90. सूर्य, चन्द्र, मंगल इक्ट्ठे हो, तो जातक इंजीनियरिंग के क्षेत्र में 
सफल होता है। यदि सूर्य, शनि आदि शत्रु राशि युक्त हों तो उक्त सुखों में कमी होती है | देखें उदाहरण कुं. नं. 95 

दर्ग्गनाम भांव-में मित्र राशि कन्या पर भाग्येश सूर्य होने से जातक उद्यमी, उच्चशिक्षित, भाग्यशाली, उच्च-प्रतिष्ठित 
पदाधिकारी अथवा सरकारी क्षेत्रों से लाभ उठाने वाला, धार्मिक प्रवृत्ति एवं कानून-नियमों का जानकार एवं अनुशान प्रिय 
होगा, उच्च-निम्रादि अनेक मित्रों से युक्त, पिता के द्वारा सुख एवं सहयोग प्राप्त करने वाला, उच्चस्तरीय जीवन यापन करने 
वाला, स्त्री, भूमि, मकान एवं वाहन आदि सुखों से युक्त, उच्च प्रतिष्ठित तथा साधन सम्पन्न होता है | यदि भौमादि क्रूर ग्रहों 
का योग भी हो तो पैतृक सुख में कमी होती है । ऐसे जातक को चिकित्सा सम्बन्धी भी विशेष ज्ञान होता है। देखें उदाहरण 
कुंडली नं. 86, 9, 92 

एकांदध्ां भाँव-में नीच राशिस्थ सूर्य के प्रभाव से जातक उच्चशिक्षित, परिश्रमी, बुद्धिमान, गुणी, स्वाभिमानी, 
विद्वान व्यक्ति होता है। परन्तु जीवन के प्रारम्भिक भाग में व्यवसाय एवं धनार्जन करने के सम्बन्ध में विशेष कठिनाइयों व 
संघर्ष का सामना करना पड़ता है। आर्थिक क्षेत्र में एवं भाग्योननति में विघ्न-बाधाएं अधिक होती है। यद्यपि सन्‍्तानोत्पत्ति 
के बाद कुछ सुधार शुरु होता है। विदेशों में भाग्योन्‍्नति के विशेष अवसर प्राप्त छेते हैं । ऐसा जातक गुप्त युक्तियों से भी 
धनार्जन करता है। 

द्वादश भांव-में मित्र ग्रह की राशि बृश्चिक पर सूर्य होने से जातक धार्मिक एवं परोपकारी स्वभाव का तथा 
विभिन्‍न साधनों द्वारा धनार्जन करने वाला, परिश्रमी तथा कठिन से कठिन काम करने में कुशल होता है। परन्तु निकट 
बन्धुओं के कारण जातक चिन्तित एवं परेशान होता है। सूर्य यदि राहु, शनि आदि अशुभ ग्रह युक्त हो तो धन का खर्च 
विशेष अधिक होता है। आंखों में कष्ट एवं उदर विकार का भय, मामा को कष्ट अथवा सुख में कमी | यदि बुध, शनि, गुरु 
आदि ग्रहों का भी सम्बन्ध हो, तो जातक का भाग्योदय विदेश में होता है । यद्यपि भाग्योदय विलम्ब से या 37 वर्ष की आयु 
के बाद होता है। 














धनु लग्न में चन्द्रमा का द्वादशश भावगत फल 


धनु लग्ने चन्द्र फल 


नोट : धनु लग्न कुंडली में चन्द्र अष्टमेश अर्थात आयु का कारक होने से विशेष 
महत्व का है । यदि निर्बल होकर किसी अशुभ ग्रह (शनि, भौम, राज आदि) के साथ योग 
करता हो, तो जातक के स्वास्थ्य, आयु आदि के लिए ठीक नहीं होता, किन्तु बुद्धि एवं 
विद्वता की दृष्टि से जातक को अच्छा होता है। ध्यान रहे, सूर्य से । 2 से कम अंशों का 
अन्तर रहने से चन्द्र क्षीण माना जाता है, जो वांछित शुभ फल नहीं दे पाता | 

प्रथम भाँव- में धनु राशि पर चन्द्र होने से जातक आकर्षक व्यक्तित्व वाला, 
चंचल परन्तु सात्विक प्रकृति, बुद्धिमान, धार्मिक विचार, परिश्रमी, शिल्प एवं दस्तकारी 











धनुलग्न में चचफल _____________|_|_|_[_[३[_[औ[औ]ञ_“_“_८_८_८_“___“_“ऑ॥!। 93 में चन्द्रफल 93 


धनु 
के कामों में कुशल, लेखन एवं अध्ययन आदि कार्यो में रूचि, शीघ्र क्रुद्ध परन्तु प्रेम से वश में होने वाला, यदि चन्द्र . 


बलान्वित हो, तो दीर्घायु । संगीत, कला, धार्मिक, ज्योतिष आदि विद्याओं में रुचि हो। यदि किसी अशुभ ग्रह का योग एवं 
दृष्टि होने से जातक के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य में कमी, मानसिक तनाव, माता या स्त्री को कष्ट अथवा उनके सुख 
में कमी रहे | कार्य-व्यवसाय में भी कठिनाइयों एवं परेशानियों के बाद सफलता हो। जातक का आध्यात्मिक विषय की 
ओर भी विशेष रुझान होता है। यदि भाग्येश सूर्य का योग हो, तो जातक अत्यन्त धनी व प्रसिद्ध व्यक्ति होता है। देखें 
कुंडली नं. 94 

द्वितीय भांव-में मकर राशि पर चन्द्र हो, तो अष्टम भाव पर चन्द्र की स्वगृही दृष्टि होने से जातक दीर्घायु, हंसमुख 
मृदुभाषी, सुन्दर आवास, वाहन आदि सुखों से युक्त, व्यवहार कुशल, गुप्त युक्तियों द्वारा धन लाभ, धार्मिक एवं परोषकार 
भावना से युक्त होता है, परन्तु धन का संचय कम होता है तथा रहन-सहन आदि पर व्यय अधिक होता है। पारिवारिक 
सुखों में कमी रहती है। यदि चन्द्र, शनि, राहु या भौमादि ग्रह से दृष्ट हो, तो जातक के धन का अपव्यय, नेत्र, दंत आदि 
रोग एवं जातक उलझनों के कारण चिन्तित रहता है। देखें कुंडली नं. 9॥ 

तृतीय भाव-में कुम्भ राशि पर चन्द्र होने से जातक परिश्रमी, उच्चाभिलाषी, निज परिश्रम एवं उद्यम से जीवन में 
लाभ व उन्नति प्राप्त करने वाला, पराक्रमी, अध्ययनशील, सेंगीत-कला एवं बौद्धिक कार्यो में विशेष रूचि रखने वाला 


जीवन का प्रारम्भिक भाग विशेष संघर्षपूर्ण रहता है। यात्राएं अर्थात भ्रमण अधिक होते है । भाई-बहन के सुखों में भी कुछ . 


कमी रहे । जातक लोक कल्याण, आतिथ्य सत्कार एवं परोपकार की भावना विशेष रखे | कार्य/व्यवसाय में भी संघर्षों एवं 
कठिनाइयों के बाद सफलता प्राप्त हो । जातक को वकालत, प्रतिनिधि, सेल्समैन, क्रय-विक्रय, पत्रकारिता आदि के कार्यों 
में विशेष सफलता की संभावना हो। 32 वर्ष की आयु के बाद विशेष भाग्योदय होँ। 


चतुर्थ भाव-में मीन राशि पर चन्द्रमा होने से जातक/जातिका सुन्दर एवं आकर्षक व्यक्तित्व, तीत्र बुद्धिमान 


प्रसन्‍न-वदन (हंसमुख), परिश्रमी, उच्चविद्या, विनयशील, मधुरभाषी एवं ऐश्वर्यशाली होता है। प्रारम्भिक जीवन में 


कार्य-व्यवंसाय में कुछ संघर्ष व कठिनाइयों के बाद सफलता मिलती है। यदि चन्द्र के साथ यहां शुक्र, शनि आदि ग्रहों का 

भी संयोग हो, तो जातक/जातिका धनी, अत्यन्त सुन्दर, अभिनय, नृत्य, संगीत-कला, फिल्म आदि क्षेत्र में सफल, माता- 

पिता, भूमि, जायदाद, धन, सवारी, स्त्री आदि सुख प्राप्ति में सफल होता है। विवाह के उपरांत अपने जन्म स्थान से दूर 
भाग्योननति होती है। देखें उदाहरण कुंडली नं. 93 (माधुरी दीक्षित) 


पंचम भांव-में मेष राशि पर चन्द्रमा होने से जातक बुद्धिमान होते हुए भी चिन्तित रहने वाला, अस्थिर मन। यदि _ 


गुरु आदि शुभ योग हो, तो परिवर्तनशील, शीघ्र प्रसन्‍न होने वाला, भ्रमणशील अर्थात यात्राएं करने का शौकीन, उच्च विद्या 
में विध्अ/बाधाओं के बाद सफलता, जातक भावुक हृदय, कन्या सन्तति अथवा सन्‍्तान के सम्बन्ध में चिन्तित, ज्योतिष 


संगीत, कला, साहित्य-की ओर रूचि, किसी विशेष दस्तकारी (हुनर) का जानकार हो। कार्य व्यवसाय में गुप्त युक्तियों 


द्वारा धनार्जन तथा अन्य कार्य करने वाला। व्यवसाय में अपने स्वार्थ के प्रति सावधान, लाटरी से अचानक धन प्राप्ति के भी 
. योग है। यदि यहां चन्द्र, शनि आदि ग्रह से युक्त या दृष्ट हो, तो विन्न/बाधाएं एवं आर्थिक परेशानियां अधिक होती हैं । 
बहछ्ठ भांव-में वृष राशि पर चन्द्रमा होने से जातक कल्पनाशील प्रत्येक कार्य में गंभीर सोच विचार करने-वाला 
धनादि के सम्बन्ध में विभिन्‍न प्रकार की योजनाएं बनाने में कुशल, परन्तु अधिकांश योजनाएं कार्यशील न होकर मन में ही 
रह जाएं। अत्यन्त संघर्ष व कठिनाइयों से धनार्जन करने वाला हो, कामुक एवं विलासपूर्ण प्रवृत्ति, अनावश्यक खर्च बहुत 
रहें | यहां वृषस्थ चन्द्र मामा, मौसी, फूफी के लिए शुभकारक होता है। यदि चन्द्र मंगल-शनि आदि ग्र से युक्त या दृष्ट हो 
तो कृश शरीर,उदर विकार, मन्दाग्नि, गुर्दे का रोग, विवाह सुख में विलम्ब आदि अशुभ फल होते हैं। ह 
सप्तम भाव-में मिथुन राशि पर चन्द्रमा होने से जातक तीक्र बुद्धिमान, वाणी में चातुर्य एवं तर्क-वितर्क करने में 








94 _  __________ __________॒_॒_ धनु लग में चल्रफल 
कुशल, कामुक, प्रभावशाली व्यक्तित्व, गेहुंआं वर्ण, भूमि, आवास, स्त्री एवं वाहन आदि सुखों से युक्त हो, परन्तु व्यवसाय 
एवं आजीविका में कठिनाइयों एवं संघर्ष के बाद सफलता हो | कुंडली में सूर्य, बुध आदि ग्रह शुभ हों, तो 32 वर्ष के बाद 
भाग्य में विशेष लाभ व उन्नति हो | यदि चन्द्र के साथ भौम का योग हो, तो जातक वकालत के पेशे में विशेष सफलता प्राप्त 
करता है। इसके अतिरिक्त बैकिंग, मैडिकल आदि में भी सफल होता है। यदि सूर्य, बुध केन्द्रगत शुभस्थ हों, तो जातक 
उच्च प्रतिष्ठित राजनेता होता है | देखें उदाहरण कुंडली 86, 89 
अंष्टम भांव-में कर्क राशि पर चन्द्रमा हो, तो जातक दीर्घायु, परन्तु चन्द्र निर्बल या अशुभ ग्रह से युक्त हो, तो 
जातक का अस्वस्थ शरीर, व्यवसाय के सम्बन्ध में अत्यन्त संघर्ष एवं कठिनाइयों से गुजारे योग्य आय के साधन बनते हैं। 
पारिवारिक एवं आर्थिक परेशानियां अधिक होंगी। यदि चन्द्र के साथ यहां गुरु का योग या दृष्टि हो, तो जातक का भाग्य 
अपने जन्म स्थान से अतिरिक्त (विदेश आदि) स्थान में उदय होता है । ऐसा जातक कठिनाइयों के बावजूद रईसी ढंग से - 
जीवन व्यतीत करता है। | 
जंवम भाँव-में सिंह राशि पर चन्द्रमा के प्रभाव से जातक स्वरूपवान, आकर्षक व्यक्तित्व वाला, भाग्यशाली, 
बुद्धिमान, तीव्र स्मरणशक्ति, धार्मिक एवं परोपकारी स्वभाव, संगीत, कला एवं प्राकृतिक सौन्दर्य का शौकीन, धर्म-ज्योतिष 
आदि गूृढ़ विषयों में भी रुचि, भाइयों के सुख में कमी, बहन का सुख यथेष्ट होगा । देश-विदेश में दीर्घ यात्राओं के अवसर 
प्राप्त होने की संभावना, यदि यहाँ मंगल, बुध आदि ग्रहों का योग हो तो जातक हस्त कलाओं, विद्युत विशेषज्ञ या 
इलैक्ट्रीकल इंजीनियर होता है । यदि शुक्र शुभस्थ हो, तो स्त्री सुन्दर, सुशील एवं सुपठित होती है। देखें उदाहरण कुण्डली 
नं. 90 
दघ्यराम भाँव॑-में कन्या राशि पर चन्द्रमा के प्रभावस्वरूप जातक प्रभावशाली एवं आकर्षक व्यक्तित्व वाला 
बुद्धिमान, व्यवहार-कुशल, वाकपटु एवं हंसमुख व विनोदी-स्वभाव, लज्जाशील, तीव्र स्मरणशक्ति, अपने व्यवसाय के 
प्रति सावधान, छोटे-मोटे प्रत्येक विषय पर सूक्ष्म विवेचना करने वाला, वर्तमान परिस्थितियों से असंतुष्ट होने पर भी 
व्यवसाय में अपने कर्त्तव्य के प्रति निष्ठावान होता है। ऐसा जातक सुन्दर आवास, वाहन आदि सुख साधनों को कुछ 
कठिनाइयों के बाद प्राप्त करता है। यदि चन्द्र के साथ सप्तमेश बुध एवं गुरु का भी शुभ योग हो, तो जातक की स्त्री सुन्दर, 
सुशील तथा धनार्जन, व्यवसाय आदि प्रत्येक क्षेत्र में सहायिका होती है। देखें उदाहरण कुंडली नं. 87 
एकादद्यां भांव-में तुला राशि पर चन्द्रमा के प्रभाव से जातक तीकब्र बुद्धिमान, लोकप्रिय, पराक्रमी, धनवान, 
अपने कार्य में कुशल, विभिन्‍न स्रोतों एवं साधनों के द्वारा धनार्जन करने वाला तथा उच्च-प्रतिष्ठित लोगों के साथ 
सम्बन्ध रखने वाला होगा। जातक व्यवसाय के क्षेत्र में गुप्त युक्तियों के द्वारा विपुल धनार्जन करने वाला होता है। 
भूमि, धन, आवास, सवारी आदि सुखों से सम्पन्न होता है। संतान के सम्बन्ध में चिन्तित अथवा अल्प संतति सुख 
प्राप्त होता है। यदि चन्द्रमा, राह, शनि आदि अशुभ ग्रहों से युक्त हो तो संतान सुख में कमी होती है तथा गुप्त 
चिन्ताओं के कारण व्यथित रहता है। 
द्वादघा भाँव-में बृश्चिक (नीच) राशि पर चन्द्रमा होने से जातक को आय कम तथा खर्च अधिक रहते हैं। 
शत्रुओं के कारण मानसिक परेशानियों का सामना रहता है। यदि द्वादश चन्द्रमा पर मंगल की दृष्टि हो तो जातक 
इंजीनियरिंग, ठेकेदारी आदि के कामों से अच्छा लाभ कमाता है। परन्तु भाई-बहनों एवं सम्बन्धियों के सुख में कमी रहती 
है | दुर्घटना के कारण चोटादि लगने का भय भी होता है। शनि की दृष्टि हो तो आकस्मिक व्यय अधिक होते है। विद्रेश में. 
भाग्योदय की संभावनाएं होती है । गुरु की दृष्टि से जातक उदार एवं दानशील होता है।.._ । 











धनुलग्नमें मंगल फल ____ [|| | | | | | | ऋ£ [३ “£॥[औऋ[औआऋ[औ ् ऋआ३[औ[औआऔ[आ[आऔआऔ[औआञऋऔऋऔऑ[ू[ू[ू[ू895 में मंगल फल ॥ 95 





धनु लग्न में मंगल पंचमेश व द्वादशेश होने में शुभ कारक माना जाता है। शुभ भावों 
में होने से जातक उच्चशिक्षा, संतान, भूमि, जायदाद एवं विदेश आदि सुखों को प्रदान 
करता है, अशुभ होने से स्वास्थ्य हानि; दुर्घटना, भाई एवं पुत्र संतति आदि से सम्बन्धी 
परेशानियां करता है। अकेला मंगल के फल का निर्णय करते समय अन्य ग्रहों के 
योगादि का भी विचार कर लेना युक्ति संगत होगा। 

प्रथम भाँव॑-में मित्र राशि धनु पर मंगल के प्रभाव से जातक पराक्रमी, साहसी 
परिश्रमी, प्रभावशाली व्यक्तित्व का स्वामी होता है। ऐसा जातक स्पष्टवक्ता,' निडर 
विनोदफप्रिय, भ्रमणप्रिय एवं शीघ्र उत्तेजित होने वाला, ववाभिमानी, उच्चाभिलाषी तथा 
बुद्धिमान एवं निज पुरुषार्थ से जीवन में लाभ व उन्नति प्राप्त करने वाला होता है। गुरु की राशि होने से जातक धार्मिक वृत्ति 
वाला एवं अच्छी-बुरी बात की पहचान रखने वाला होगा। जातक भूमि, मकान एवं वाहन तथा संतानदि सुखों से युक्त 
होगा। बुध यदि अशुभ हो तो स्त्री के सुख में कमी हो। ध्यान रहे, इस भाव में मंगल होने से मंगलीक दोष भी होता है। 
जोकि वैवाहिक सुख में विलम्ब अथवा बाधाकारक होता है। देखें उदाहरण कुंडली नं. 87, 88 

द्वितीय भाव-में मकर (उच्च) राशि पर मंगल के प्रभाव से जातक कुशाग्र बुद्धि, परिश्रमी; महत्वाकांक्षी 
अधिकारपूर्ण वाणी का प्रयोग करने वाला धनार्जन एवं संचय करने में कुशल, परन्तु यदि शनि अशुभस्थ हो तो धन का 
अपव्यय भी अधिक रहे | पंचम भाव पर विशेष दृष्टि होने से जातक उच्चशिक्षित, स्वाभिमानी, उच्चाकांक्षी एवं कुछ तेज 
प्रकृत्ति का होगा। पारिवांरिक ज़ीवन में भी कुछ तनाव एवं उलझनों. का सामना रहे। धन लाभ एवं भाग्योन्नति में भी 
अडचनों के बाद सफलता प्राप्त हो। अष्टम में कोई शनि, राहु आदि अशुभ ग्रह हो, तो दुर्घटना से चोटादि का भय हो | 

तृतीय भाव-में कुम्भ राशि पर मंगल के प्रभाव से जातक पराक्रमी, साहसी, जल्दबाजी से कार्य करने वाला 
पुरुषार्थी तथा अपने भुजबल द्वारा धनार्जन करने वाला, नए-नए मित्र बनाने से कुशल, परन्तु भाई-बहनों के सुख में कुछ 
कमी रहे | उच्च विद्या एवं संतान आदि सुखों में भी अड़चनों के बाद सफलता हो। कार्य/व्यवसाय एवं भाग्य में भी उतार- 
चढ़ाव अधिक रहें । परन्तु ऐसा जातक अपने उद्यम द्वारा निर्वाह योग्य आय के साधन बना लेता है। जातक को धर्म, योग 
ज्योतिष, मंत्र आदि विद्याओं की ओर भी रुचि रहे । जातक तकनीकी कार्यों में भी कुशल हो।. 

चतुर्थ भाँव-में मीन राशि पर मंगल के प्रभाव से जातक उच्चाभिलाषी, स्वाभिमानी, उच्च विद्या में अड़चनें, माता- 
पिता के शरीर के लिए कष्टकारी, व्यवसाय में भी अत्यन्त संघर्षपूर्ण एवं कठिन परिस्थितियों का सामना हो, मकान, वाहन 
एवं स्त्री आदि के सम्बन्ध में भी परेशानियों के बाद सफलता, गृहस्थ के प्रति अशांत मन, चतुर्थस्थ मंगल होने से मंगलीक 
दोषकारक भी होता है। यदि कुंडली मिलान ठीक न हुआ हो, तो दाम्पत्य जीवन कलहपूर्ण एवं असुखद रहता है। 

पंचम भांव-में स्वराशि मेष में मंगल होने से जातक तीश्ष्ण बुद्धि, उत्साहशील एवं साहसी, परन्तु शीघ्र आवेश में 
आ जाने वाला होता है। उच्चशिक्षा, कला आदि क्षेत्र में कुछ संघर्षों के बाद सफलता, धनार्जन एवं व्यवसाय के क्षेत्र में 
संघर्ष के बाद विशेष सफलता प्राप्त हो तथा खर्च अधिक रहें | मंगल पर अशुभ प्रभाव हो, तो जातक को संतान के कारण 
कष्ट हो। 34 वर्ष की आयु के बाद विशेष भाग्योदय। मंगल के साथ बुध भी हो, तो जातक का विवाह के पश्चात विदेश 
में भाग्योदय होता है। देखें उदाहरण कुंडली नं. 93 

बछ्ठ भांव-में वृष राशि पर मंगल के प्रभाव से जातक साहसी, शत्रुजितू, उच्च विद्या के सम्बन्ध में विघ्न बाधाओं का 

सामना रहे | मामा के सुख में कमी, सेना, पुलिस आदि के क्षेत्र में सफल, विवाह एवं संतान के पक्ष में विष्लों के पश्चात्‌ 





कक“ 





96 _ _ _ ___॒_______ धनु लग्न में मंगल फल 
सफलता हो। धन का आकस्मिक खर्च अधिक होते है। यदि अशुभ ग्रह से युक्त या दृष्ट हो तो मन्दाग्नि, गुप्त रोगों की 
संभावना होती है । लग्न भाव पर मंगल की विशेष दृष्टि होने के कारण जातक शीघ्र क्रोधित होने वाला परन्तु शीघ्र ही शांत 
होने का स्वभाव भी रखता है। 
ब्ञप्तम भाव-में मिथुन राशि पर मंगल के प्रभाव से यद्यपि मंगलीक दोष-कारक होता है जोकि वैवाहिक सुख में: * 
विप्नकारक होता है। परन्तु सप्तम भाव में मित्र राशि (धनु) को देखने से जातक परिश्रमी, बुद्धिमान, उच्चाभिलाषी एवं: - 
प्रभावशाली व्यक्तित्व का स्वामी होता है। पारिवारिक सुख यथेष्ठ होता है तथा जातक धन, भूमि, आवास एवं बाहनादिं 
सुखों से युक्त होता है । कार्य व्यवसाय में विप्नों एवं कठिनाइयों के पश्चात सफलता प्राप्त होती है। लेन-देन अथवा सांझेदारी . . 
के कामों में हानि की र भावना होती है | दाम्पत्य-सुख में क्रमी, यदि बुध, गुरु आदि शुभ ग्रह का योग हो या भली प्रकार 
कुंडली मिलान किया गया हो तो वैवाहिक सुख अच्छा होता है तथा विवाह के बाद विशेष भाग्योननति होती है। देखें 
उदाहरण कुंडली नं. 89 
अंष्टम भाव-में कर्क (नीच) राशि में होने से जातक चंचल बुद्धि, पराक्रमी, स्वाभिमानी एवं भ्रमणशील होता हैं। 
जीवन का प्रारम्भिक भाग संघर्षपूर्ण होता है। जातक को शरीर-कष्ट, पेट-विकार, गुप्त चिन्ताएं, घरेलू एवं आर्थिक 
परेशानियों का सामना रहता है। शिक्षा के क्षेत्र में अड़चनें तथा व्यवसाय में भी विष्न एवं कठिनाइंयों का सामना रहता हैं 
परन्तु जातक गुप्त युक्तियों द्वारा निर्वाह योग्य आय के साधन कर लेता है। अष्टम भावस्थ मंगल होने से मंगलीक योग भी 
बनता है जोकि वैवाहिक सुख में बाधाकारक हो सकता है। यदि यहां मंगल पर शनि-राहु का दृष्टि आदि का सम्बन्ध हो, 
तो जातक को गुप्त रोग अथवा दुर्घटना से चोटादि का भय होता है। देखें उदाहरण कुंडली नं. 95 ु 
जंवम्‌ भाँव-में मित्र ग्रह की राशि सिंह पर मंगल के प्रभाव से जातक बुद्धिमान, स्वाभिमानी, पराक्रमी, स्वतंत्र एवं 
हठी प्रकृति का, धार्मिक प्रवृत्ति का तथा धर्म, ज्योतिष-योग-मंत्रादि गूढ़ विषयों में रुचि रखने वाला, भाई-बहन होने परे 
भी उनके सुख में कमी, जीवन का आरम्भिक भाग विशेष कठिन एवं संघर्षपूर्ण एवं पुरुषार्थ के बल पर लाभ व उन्नति. 
प्राप्त कर लेता है। यदि चन्द्र, केतु, बुधादि ग्रह युक्त हो तो जातक इंजीनियरिंग आदि तकनीकी क्षेत्र में सफल होता है। 
कुंडली नं. 92। यदि गुरु युक्त या दृष्ट हो, तो जातक उच्चप्रतिष्ठित, विख्यात राष्ट्र नेता होता है। देखें उदाहरण कुंडली - .. 
(86), कुंडली में शनि स्वक्षेत्री हो तो जातक विपुल धनी होता है। देखें उदाहरण कुंडली सं. नं. (94) 
दद्याम भाँव-में कन्या राशि होने से जातक कुशाग्र बुद्धि, स्वाभिमानी, साहसी, उद्यमी, सुगठित एवं आकर्षक 
व्यक्तित्व का स्वामी होगा। ऐसा जातक उच्चशिक्षित, सूक्ष्म बुद्धि, स्मरण शक्ति अच्छी, स्त्री, संतान आदि सुखों से युक्त, 
परिश्रमी, स्वावलम्बी, कार्य व्यवसाय में अत्यन्त कठिनाइयों के बाद अपने पराक्रम से धनार्जन एवं सफलता पाने वाला 
भूमि, जायदाद, मकान एवं वाहन आदि सुख साधनों से सम्पन्न, पैतृक सुख में कमी, प्रौढ़ावस्था में स्वास्थ्य सम्बन्धी 
परेशानी हो। यदि सूर्य, बुध का योग हो, तो जातक उच्च प्रतिष्ठित, उच्च पद, सरकारी क्षेत्र में लाभान्वित, धन, संतान के 
सम्बन्ध में भाग्यशाली, बौद्धिक कार्यों में कुशल तथा ज्योतिष, वैद्यक, धर्मादि शास्त्रों में विशेष रूचि रखने वाला होता ै । 
देखें उदाहरण कुंडली नं. 9 
एकाद्दा भांव-में तुला राशि पर मंगल होने से जातक पराक्रमी, उच्चाभिलाषी बुद्धिमान, उच्चशिक्षित, चुस्त 
किन्तु भावुक, विलासप्रिय एवं कामुक प्रवृत्ति, प्रभावशाली वाणी, न्यायप्रिय, पारिवारिक सुखों से युक्त, आवास, वाहन एवं 
सन्‍्तान आदि सुख साधनों से सम्पन्न होता है। कार्य/व्यवसाय में कठिनाइयों के बावजूद ऐसा जातक अपने पुरुषार्थ एवं 
परिश्रम से अच्छा धनार्जन कर लेता है। यद्यपि खर्च भी अधिक रहते हैं। मनोरंजन आदि कार्यों पर खर्चे अधिक हों। 
लाटरी, शेयर, सट्टा एवं जायदाद के कामों द्वारा भी लाभ की संभावना रहे, जातक योग, धर्म, ज्योतिष, मंत्र आदि विषयों 
में भी विशेष रुचि रखे। 











धनुलग्नमेंबुधधल___ ______ . “99 
द्वादघ्मां भांव॑-में स्वगृही बृश्चिक राशि पर मंगल होने से जातक स्वाभिमानी, चंचल एवं तेज अथवा उग्रस्वभाव, 


व्यवहार कुशल, कभी-कभी कूटनीति का प्रयोग करने वाला, उच्च विद्या में विज्न-बाधाएं, भाई-बहनों के सुख में कमी, - 


परन्तु निज पुरुषार्थ के बल पर धन लाभ एवं उन्नति करने वाला, परन्तु व्यवसायं में भी कठिन परिस्थितियों एवं विध्र/ 
बाधाओं का सामना रहे। इस भाव में मंगल के कारण मंगलीक दोष भी होता है, जोकि दाम्पत्य सुख में कमी अथवा 


वैवाहिक सुख में विलम्बकारी होता है। यदि मंगल पर राहु या शनि की दृष्टि हो तो नेत्र रोग या रक्त विकार, गुप्त रोग आदि. 


का भय होता है। मंगल-केतु का योग हो, तो विदेश में भाग्योन्नति करवाता है। देखें उदाहरण कुंडली नं. 90 
[धनु लग्न के द्वादश भावों में बुध का फल): 

धनु लग्न में बुध स्त्री कारक एवं व्यवसाय (कर्म) भावों का प्रतिनिधित्व करने से धनु लग्ने बुध फल 
यह ग्रह विशेष महत्व का है। सूर्य के साथ हो, तो राजयोग होता है | इसके प्रभाव से 
. जातक कार्य व्यवसाय में प्रतिष्ठित, विशेषकर बौद्धिक कार्यों द्वारा लाभ व उन्नति प्राप्त 
करता है। बुध के साथ अन्य ग्रहों के योग एवं शुभाशुभ फलों का विचार करना 
चाहिए | यद्यपि सौम्य केन्द्रेश दोष होने से बुध इस लग्न में उत्कृष्ट फल नहीं दे पाता। 

प्रथम भांव॑-में धनु राशि पर बुध होने से जातक प्रभावशाली व्यक्तित्व, उच्चविचार, 
उदारहदय, परोपकारी, तर्क-वितर्क करने में कुशल, गुणवान, मधुरभाषी, न्‍्यायशील, 
तीब्रबुद्धि एवं अच्छी स्मरणशक्ति वाला होता है। उसे राजनीति, राज्य एवं व्यवसाय के बा 
क्षेत्र में संघर्षो के पश्चात्‌ अच्छी सफलता प्राप्त होती है। स्त्री सुन्दर, सुशील एवं परिवार से सहयोग करने वाली तथा 
ससुराल पक्ष से भी लाभ एवं सहयोग प्राप्त होता है। सूर्य, बुध का योग हो, तो जातक प्राध्यापन, अकाऊंट्स, बैकिंग एवं 
वकालत आदि के कामों में विशेष सफल होता है | देखें उदाहरण कुंडली नं. (89) यदि मंगल-बुध का योग हो, तो जातक 
राजनीतिज्ञ एवं उच्चपद प्रतिष्ठित होता है। यदि बुध के साथ शुक्र का योग हो तो जातक धनी होता है। 

द्वितीय भांव-में मित्र मकर राशि पर बुध होने से जातक बुद्धिमान, अध्ययनशील, लेखन, ज्योतिष, मंत्र, योगादि 
विषयों में रुचि रखने वाला, तर्क-वितर्क एवं वार्तालाप करने में चतुर, ऐसा जातक अपने बुद्धिबल एवं पुरुषार्थ से धनार्जन 
करने वाला, वकालत, अध्यापन, प्रतिनिधि, क्रय-विक्रय (व्यापार), इश्योरैंस एजैंट आदि के कार्यों में सफल, दाम्पत्य 
जीवन में एकरसता की कमी अथवा अड्चनों के बाद सुख प्राप्त होता है। व्यवसाय में भी विप्नों के बाद सफलता प्राप्त हो। 
दूसरे सूर्य-बुध का योग हो तो प्रमुख संस्थान में आर्थिक सलाहकार होता है । देखें कुंडली नं. 88 ु 

तृतीय भाव-में कुम्भ राशि पर बुध होने से जातक पराक्रमी, परिश्रमी, धार्मिक आस्थाओं से युक्त, व्यवहार 
कुशल, क्रय-विक्रय से लाभ पाने वाला, ज्योतिष मंत्र योगादि गृढ़ विषयों में रुचि रखने वाला, भाई-बहनों से प्रीति रखने 
वाला, विवाह के बाद उन्नति करने वाला होता है। ऐसा जातक अपनी बौद्धिक योग्यता, परिश्रम एवं विवेक द्वारा प्रत्येक 
क्षेत्र में कुछ संघर्ष के बाद सफलता प्राप्त कर लेता है। यदि शुक्र का योग एवं भौम दृष्टि हो तो सरकारी क्षेत्रों से लाभान्वित 
होता है। | ह 

चतुर्थ भाव-में मीन (नीच) राशि पर बुध होने से जातक को भूमि अथवा अच्छे मकान आदि के सुख में कुछ 
कमी रहती है। माता का स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता। व्यवसाय में कठिनाइयों के बाद सफलता प्राप्त होती है तथा जातक॑ 
संघर्ष के बावजूद निर्वाह योग्य आय के साधन बना लेता है। जातक को स्त्री या गृहस्थ सम्बन्धी सुखों में कुछ कंमी: रहे । 





ट 


जातक के मन में घरेलू परिस्थितियों के प्रति असंतोष रहता है।._ । 
पंचम भाव-में मेष राशि पर बुध होने से जातक मिलनसार, बातचीत करने में कुशल, चतुर एवं बुद्धिमान होता 








98 | _ _ _____[_[_३॒ईऔ०]॒][]_]३[॒_॒[॒][॒]॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒___ धनु लग्नमें बुधफल 
- है । ऐसा जातक स्वाभिमानी, आवेशपूर्ण स्वभाव वाला, उच्चशिक्षा, सुशील, सुयोग्य एवं शिक्षित पत्नी एवं संतान आदि सुख़ों 
से युक्त होता है। ऐसा जातक समाज में अपने कार्य करवाने में कुशल, परन्तु संघर्ष के बाद गुजारे योग्य आय के साधन 
बनाता है। न्यायाधीश, वकालत, शिक्षक, लेखन, क्रय-विक्रय, प्रकाशन, अभिनय आदि कार्यों (जिनमें बौद्धिक विशेषता 
की आवश्यकता हो) में विशेष सफल रहते हैं। यदि मंगल-बुध का योग हो, तो जातक/जातिका को अभिनय, नृत्य, 
फिल्म, संगीत, कला आदि क्षेत्रों में विशेष सफलता प्राप्त होती है। देखें उदाहरण कुंडली नं. 93 (माधुरी दीक्षित) - 
बछट्ठ भांव-में वृष राशि पर बुध होने पर जातक चंचल, कामुक, विलासी एवं धैर्यहीन होता है । जातक को संगीत, 
सौन्दर्य एवं कला की ओर विशेष रुचि रहे । सौन्दर्य, सजावट, प्रदर्शन एवं विलास आदि कार्यों पर खर्च अधिक रहे। ऐसा 
जातक व्यवसाय में संघर्ष एवं गुप्त युक्तियों से धनार्जन करता है। परन्तु सरकारी क्षेत्रों से कुछ परेशानियां एवं हानि की 
संभावना होती है। | 
ब्वप्तम भाँव-में स्वराशि मिथुन पर बुध होने की स्थिति में जातक चंचल एवं अस्थिर स्वभाव, विनयशील, 
बातचीत करने में चतुर, सुन्दर एवं सुशील पत्नी का सुख, विवाह के बाद विशेष धन-लाभ एवं उन्नति के योग हैं। उच्च. 
विद्या एवं बौद्धिक क्षेत्र में भी सफलता प्राप्त करता है। यदि शुक्र, बुध के साथ हो तो जातक विलासी एवं कामुक वृत्ति 
वाला तथा मनोरंजन एवं व्यसन आदि कार्यों पर खर्च करने वाला होता है। अध्ययनशील तथा ज्योतिष, योग, मंत्र-तंत्र 
आदि विद्याओं में भी रुचि रखने वाला होता है। 
अंष्टम भांव॑-में कर्क राशि पर बुध होने से जातक को व्यवसाय के क्षेत्र में विघ्र-बाधाओं एवं परेशानियों का 
सामना रहता है। धनार्जन में भी अस्थिरता रहती है। ऐसे जातक को अपने परिवार में धर्नाजन के लिए बिशेष कठिनाइयों 
का सामना रहता है। सांझेदारी के कामों में हानि, पत्नी के साथ विचारों में मतान्तर होने की सम्भावना | यदि इस भाव पर 
गुरु की शुभ दृष्टि हो, तो जातक गुप्त युक्तियों के द्वारा अकस्मात्‌ धन लाभ के साधन प्राप्त कर लेता है । यदि राहु या मंगल 
आदि अशुभ ग्रह का योग या दृष्टि हो तो अकस्मात्‌ धन हानि एवं आर्थिक परेशानियों का सामना होता है । ह 
नंवम भांव-में सिंह राशि पर बुध होने से जातक उच्चाभिलाषी, तर्क-वितर्क करने में कुशल, उच्चशिक्षिते, 

: धर्मपरायण, धार्मिक विचारों वाला, परोपकारी, संगीत-साहित्य, ज्योतिष, योग आदि विद्याओं में रुचि रखने वाला होता है। 
माता-पिता, उच्च विद्या, भूमि-मकान, वाहनादि सुख साधनों से युक्त होगा। कार्य-व्यवसाय में कुछ कठिनाइयों के पश्चात्‌. 
सफलता प्राप्त करने वाला होगा। यदि यहां पर चन्द्र-मंगल एवं केतु का सम्बन्ध हो, तो जातक बिजली, कम्प्यूटर - 
अकाऊंट्स, इंजीनियरिंग आदि तकनीकी विषयों में कुशलता प्राप्त करता है। देखें कुंडली नं. 90, 92 | यदि बुध के साथ... 
गु. मंगल, केतु आदि ग्रह हो, तो स्त्री रूग्न रहती है। देखें कुंडली नं. 95 

दद्यांम॑ भाँव॑-में कन्या स्वोच्च राशि पर बुध के प्रभाव से जातक सृजनात्मक एवं तीब्र बुद्धिमान, उच्च-शिक्षित, 
सुन्दर एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व, ओजपूर्ण एवं गंभीर वाणी, पैतृक सहयोग, धन आदि से लाभान्वित, माता को शरीर कष्ट, 
धर्म, ज्योतिष, योगादि विषयों में विशेष रुचि, व्यवसाय में बौद्धिक योग्यता द्वारा सफलता अथवा उच्च-पद प्रतिष्ठित, 
सरकारी क्षेत्र से लाभान्वित, ऐसा जातक प्राय: उच्चाभिलाषी एवं वैभवशाली तथा उच्चस्तरीय जीवन व्यतीत करता है। 
मकान, भूमि, जायदाद सम्बन्धी कुछ परेशानियां भी आती हैं। यदि चन्द्र, भौमादि ग्रह युक्त हो, तो जातक कुछ गर्वान्वित ._. 
तथा बड़ी-बड़ी ऊंची (उच्चादर्श कौ) बातें करने वाला होता है। पत्नी सुशील, पतिब्रता एवं आर्थिक एवं पारिवारिक क्षेत्र - 
में सहयोग करने वाली होती है देखें उदाहरण कुंडली नं. 86, 87, 94 | ऐसा जातक इंजीनियरिंग, मैडीकल, कामर्स आदि. 
क्षेत्र में भी सफल हो सकता है। हा 
- एकांदद्यां भाँव-में तुला रशि पर बुध होने से जातक कुशल बुद्धि, व्यवहारशील, विद्वान, उच्चाकांक्षी, परिश्रमी, . 
ठउच्चशिक्षा एवं बौद्धिक कार्यों में कुशल होता है । ऐसा जातक बौद्धिक योग्यता एवं युक्तियों द्वारा व्यवसाय में धनार्जन करता - 





। 








धनुलग्नमेंगुुफल | || |||[|[|।£|[।[।[।£[।।।||।||||ऋ|__ [ई$ई$ई$«$ ह७$ई[ _ै]_[ 9 
है। जातक समाज में सम्मानित एवं प्रतिष्ठित होता है । तर्क-वितर्क करने में कुशल, ज्योतिष, गणित, योग, धर्म, मंत्र आदि 
विद्याओं में कुशल, नौकरी की अंपेक्षा निजी व्यवसाय में अधिक सफल होता है । जातक भूमि, जायदाद, स्त्री, संतान एवं 
वाहन, धन आदि सुखों से समन्वित होता है। देश-विदेश में यात्राओं के भी अवसर प्राप्त होते हैं । । 

द्वींदघ्ां भाँव॑- में स्वराशि बुश्चिक पर बुध होने से जातक का भाग्य अपने जन्म स्थल से अन्यत्र सफल होता है। 
जातक परिश्रमी, तीव्र बुद्धिमान, नई-नई योजनाएं बनाने में कुशल, विघ्न-बाधाओं के बावजूद जीवन के उत्तरार्ध भाग में 
विशेष धन लाभ व उन्नति प्राप्त करने वाला, स्वावलम्बी अर्थात्‌ अपने भाग्य का स्वयं निर्माता होता है। जीवन का 
प्रारम्भिक भाग विशेष कठिनाइयों से भरा एवं संघर्षपूर्ण होता है । यदि यहां पर मंगल की स्वगृही दृष्टि पड़ती हो, तो जातक 
स्वतन्त्र विचारक तथा जातक अपने बुद्धि, कौशल एवं परिश्रम से जीवन में विशेष उन्नति, समृद्धि एवं प्रसिद्धि प्राप्त कर 
लेता है। सूर्य का योग हो तो जातक भाग्यशाली एवं उच्च प्रतिष्ठित एवं अध्यात्मिक रूप से उन्नत, यदि शुक्र का योग हां, 
तो विपुल धन सम्पदा का योग होता है। देखें उदाहरण कुंडली नं. 94 (अम्बानी) | 

[धनु लग्न के द्वादश भावों में जुरु का शुभाशुभ फल] 

विशेष-धनु लग्न में गुरु लग्न एवं सुख भावों का स्वामी होने से महत्त्वपूर्ण है।___ धनु लग्ने, गुरुफल 
पाराशर ऋषि अनुसार गुरु, शुक्र आदि शुभ ग्रहों को केन्द्राधिपात्य दोष होने से वह 
कई बार केन्द्रादि शुभ ग्रहों में भी पूर्ण वांछित फल नहीं दे पाते । परन्तु धनु में गुरु 

लग्नाधिपति होने से अच्छे फल, विद्वता, अध्यात्म, धर्म एवं बौद्धिक गुण, भूमि, वाहन 
. आदि सुख भी अवश्य प्रदान करता है। ड़ ' 

प्रथम भांव-में स्वगृही धनु राशि पर गुरु के प्रभाव से जातक प्रभावशाली 
व्यक्तित्व, उदार हृदय, विनम्र, मधुरभाषी, गुणी, अपनी आयु की अपेक्षा अधिक बुद्धिमान, 
विद्वान, स्वाभिमानी, ईमानदार, विद्वान, धैर्यशील, उच्चशिक्षित, माता, भूमि, मकान, वाहन,स्त्री एवं संतान आदि सुखों से 
युक्त तथा दीर्घायु, सात्विक, धार्मिक एवं गूढ़ विषयों में प्रवृत्ति रखने वाला होता है। ऐसा जातक निजी उद्यम एवं पुरुपार्थ 
द्वारा व्यवसाय एवं भाग्य में सफलता प्राप्त करता है । जातक धर्म, योग, चिकित्सा, ज्योतिष, मंत्र आदि विषयों में भी विशेष _ 
रुचि रखता है। यदि गुरु के साथ सूर्य हो तो जातक के भाग्य के लिए उन्नति कारक, मंगल साथ होने से जातक तीक्र बुद्धि 
तथा अत्याधिक खर्च होता है। शनि साथ हो, तो जातक महत्त्वाकांक्षी, आय के साधनों से युक्त, निश्चयात्मक बुद्धि होता 
है। देखें उदाहरण कुंडली नं. 88, 90 एवं 9॥ | 

द्वितीय भांव-में मकर (नीच) राशि पर गुरु होने से जातक को स्वास्थ्य,सौन्दर्य एवं शारीरिक सुख में कमी होती 
है । जातक परिश्रमी एवं चतुर बुद्धि होने से गुजारे योग्य आय के साधन बना लेता है, परन्तु आर्थिक परेशानियां बहुत आती 
है । घरेलू पारिवारिक जीवन में भी उलझनें तथा असंतोष, माता को कष्ट तथा भूमि-मकान सम्बन्धी कठिनाइयों का सामना 
रहता है। नर्म स्वास्थ्य के बावजूद आयु लम्बी होगी। सरकारी क्षेत्रों से भी लाभ, 34 वर्ष की आयु के बाद विशेष 
. भाग्योन्नति हो परन्तु अधिक धन संचय नहीं हो पाए। रा 

तृतीय भाव-में कुम्भ राशि पर गुरु होने से जातक परिश्रमी, पुरुषार्थी, उद्यमशील, उच्चशिक्षित, धार्मिक, ज्योतिष, 
योग, मंत्र आदि विद्याओं में अभिरूचि, व्यवसाय में संघर्ष एवं कठिनाइयों के बाद ही निर्वाह आय के साधन बनते हैं । 
जातक अध्ययनशील, लेखन, सम्पादन, प्रतिनिधित्व, वकालत, अध्यापन आदि कार्यों में विशेष सफल होने की सम्भावना 
हो। स्त्री सुख सामान्य रहे । यदि बुध शुभस्थ हो, तो स्त्री सुन्दर, सुशील एवं घरेलू व आर्थिक क्षेत्रों में सहयोग करने वाली 
होगी। यहां सूर्य, गुरु या गुरु-शनि का योग अच्छा फल देता है। देश-विदेश में यात्राओं के भी अवसर प्राप्त होते हैं। 
















400 _ _ ___  ______॒_[_[_॒[॒[॒[३[३[३[॥३॥३॥औ॥$३$ई$ _[॒_॒][]०]_  थनु लग्नमें गुरुफल 
चतुर्थ भाँव-में स्वगृही मीन राशि पर॑ गुरु के प्रभाव से जातक उच्चशिक्षित, परिश्रमी, पराक्रमी, स्वाभिंमानी 
कामुक वृत्ति, वैभव युक्त, भूमि या मकान, वाहन एवं माता-पिता के सुख एवं सहयोग से लाभान्वित एवं दीर्घायु होता है। 
ऐसा जातक व्यवसाय में गुप्त युक्तियों द्वारा अच्छा धनार्जन करता है तथा माता-पिता का सत्कार करने वाला, आकस्मिक 
खर्च भी बहुत रहेंगे। यहां गुरु के साथ चन्द्र, भौम या सूर्य का योग हो, तो शुभ फल होते हैं । जातक भूमि, जायदाद से 
समृद्ध एवं उच्च प्रतिष्ठित व्यक्ति होता है। 3 
पंचम भाँव-में मेष राशि पर गुरु होने से जातक अत्यंत बुद्धिमान, स्वाभिमानी, उदार हृदय, धर्मपरायण; 
उच्चशिक्षित एवं न्यायप्रिय एवं योजनाएं बनाने में कुशल होगा। यहां से नवम भाव को मैत्री दृष्टि से तथा लग्न को स्वगृहीं 
दृष्टि से देखने से जातक भाग्यशाली, प्रभावशाली व्यक्तित्व, दीर्घायु, परोपकारी, व्यवहार कुशल, उच्च विद्या में सफलता 
एवं उच्च प्रतिष्ठित, न्‍्याय, वकालत, राजनीति, अध्यापन, ज्योतिष, सम्पादन, प्रबन्धन, राजमंत्री एवं उच्चक्षेत्रीय व्यवसाय 
के क्षेत्र में विशेष संघर्ष के बाद सफल होते हैं । ऐसा जातक सुशील स्त्री, संतान, जायदाद एवं वाहन आदि सुखों से सम्पन्न * 
होता है। गुरु के साथ सूर्य, चन्द्र या मंगल का दृष्टि, योगादि का सम्बन्ध हो अथवा सूर्य, मंगल, बुध या शनि स्वयं शुभ 
भावस्थ हो; तो जातक उच्च प्रतिष्ठित एवं विख्यात व्यक्ति होता है। देखें उदाहरण कुंडली नं. 86 व 89 । 
बह भांव-में वृष राशि पर गुरु होने से जातक को आर्थिक क्षेत्र में तथा परिवार के सम्बन्ध में विविध परेशानियों 
का सामना रहता है। वृथा कलह-क्लेश, विवाद, रोग एवं शरीर कष्ट तथा वृथा खर्च के कारण तनाव एवं चिन्ताएं बनी 
रहती हैं । माता को कष्ट या सुख में कमी, भूमि-मकान आदि के सम्बन्ध में भी असंतोष रहता है । ज्योतिष, तंत्र, योग आदि 
विषयों में रुचि रखने वाला, कार्य-व्यवसाय में अत्यन्त विषम एवं कठिन परिस्थितियों का सामना रहे, परन्तु ऐसा जातक 
. गुप्त युक्तियों व कठिनाइयों से निर्वाह योग्य आय के साधन बना लेता है | 
ब्ंतम भांव-में मिथुन राशि पर गुरु के प्रभाव से जातक/जातिका का आकर्षक सुन्दर रूप एवं प्रभावशाली . 
व्यक्तित्व, भाग्यवान, मधुर वाणी, अत्यन्त बुद्धिमान, परिश्रमी, स्वाभिमानी, परोपकारी स्वभाव, सुशिक्षित एवं व्यवहार 
१ कुशल होता है। जातक को माता का सुख, भूमि, मकान एवं वाहन आदि के सुख यथेष्ठ होते हैं । जातक कार्य-व्यवसाय के 
क्षेत्र में अत्यन्त परिश्रम एवं संघर्ष के बाद सफलता प्राप्त करता है। धर्म, योग, ज्योतिष, तंत्र, मंत्र आदि विषयों में भी रुचि, 
संगीत, साहित्य एवं ललित कलाओं में भी विशेष रुचि, सौन्दर्यानुभूति विशेष होती है । यदि यहां गुरु के साथ मंगल, राहु, 
केतु, शनि, सूर्यादि ग्रहों में से कोई ग्रह हो, तो वैवाहिक सुख में कमी या विलम्ब होता है । यदि चतुर्थ भाव में चन्द्र-शुक्र 
का भी यीग हो तो जातक-जातिका को अभिनय, संगीत, सिनेमा, कला आदि के क्षेत्र में विशेष प्रसिद्धि मिलती है। देखें 
उदाहरण कुंडली नं. 93 (माधुरी दीक्षित) 
अंध्टम भाव-में (उच्च) कर्क राशि पर गुरु होने से जातक के स्वास्थ्य में कुछ कमी, माता, भूमि, मकान, वाहन 
आदि सुख के साधनों की कठिनाइयों के बाद प्राप्ति होती है । विवाह के बाद विशेष लाभ व उन्नति के अवसर प्राप्त होंगे। 
जातक ज्योतिष, यंत्र, मंत्र, तंत्र आदि विषयों में विशेष रूचि रखे । कार्य व्यवसाय में गुप्त युक्तियों द्वारा धनार्जन करने वाला, 
परन्तु धर्न का खर्च भी अत्याधिक हो। तीर्थ आदि शुभ कामों पर अधिक खर्च रहे तथा पारिवारिक सुखों में कुछ कमी 
. रहे। यहां गुरु के साथ सूर्य, चन्द्र, मंगल आदि ग्रह हों तो शुभ फलों में वृद्धि होगी, जबकि बुध, शुक्र, शनि, राहु आदि ग्रह 
हो, तो जातक को शरीर कष्ट, उदर विकार या गुप्त रोगों का भय रहता है। मंगल लाभ में हो तथा चन्द्र-गुरु का योग होने 
से जातक विदेश में सफल होता है। 
मंव॑म॑ भाँव-में सिंह राशि पर गुरु होने से जातक कां प्रभावशाली व्यक्तित्व, समाज में प्रसिद्ध एवं प्रतिष्ठित, अत्यंत ५ 
बुद्धिमान, भाग्यशाली, साहसी, धार्मिक प्रवृत्ति, उदारहदय, परोपकारी, साहसी, आत्मविश्वासी, स्वाभिमानी, उच्चशिक्षित, 
गम्भीर विचारक, भाई-बहन के सुख में कुछ कमी, माता, भूमि, मकान, वाहन, धन एवं संतान आदि सुखों से सम्पन्न हो, 
जातक को राजनीति, धर्म, योग, ज्योतिष, मंत्र, तंत्र आदि गूढ़ विषयों में भी रुचि रहे । ऐसा जातक प्राध्यापन, वकालत, :. 
चिकित्सा, डाक्टर, बैंकिंग, फाइनैंस, राजनीति एवं उच्च सरकारी पद आदि के सम्बन्धों में विशेष सफलता प्राप्त कर 











धनुलग्नमेंगुसुफल _ _ || |_|_|_[_[_[_[_[|[|[।[। _[  _ ॒ ॒॒॒॒॒__॥04 
सकता है। 32 वर्ष की आयु के बाद विदेशी सम्बन्धों से भी लाभ की संभावना, यदि नवम गुरु के साथ शुक्र, मंगल, चन्द्र 
- ग्रह भी शुभस्थ हों तो जातक सर्वोच्च पद प्रतिष्ठित होता है। देखें उदाहरण कुंडली नं. 95 

दाम भाँव॑- में कन्या राशि पर गुरु होने से जातक तीव्र बुद्धिमान, आकर्षक व्यक्तित्व, विवेकशील, स्वतंत्र- 
विचारक, स्वाभिमानी, परिश्रमी, पराक्रमी एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व का स्वामी होता है। माता-पिता का सुख सामान्य, 
परन्तु ऐसा जातक व्यवसाय में अपने परिश्रम एवं बौद्धिक चातुर्य से उल्लेखनीय लाभ एवं उन्नति प्राप्त करता है। माता, 
भूमि, जायदाद एवं वाहन आदि सुखों की प्राप्ति यथेष्ठ होती है। जीवन के पूर्वार्द्ध भाग में कार्य/व्यवसाय के सम्बन्ध में. 
विशेष संघर्ष एवं कठिनाइयों का सामना रहता है। परन्तु उत्तरार्ध भाग में विशेष सफलता प्राप्त करता है तथा जातक प्रसिद्ध 
तथा उच्च स्तरीय जीवन जीता है। ऐसा जातक अध्यापन, चिकित्सा, वकालत, व्यापार, लेखन, प्रकाशन आदि क्षेत्रों में 
विशेष सफल होता है। देखें उदाहरण कुंडली नं. 87 व 94 ह 

एकादद्यां भांव- में तुला राशि में गुरु होने से जातक बुद्धिमान, सुन्दर व्यक्तित्व, उच्च-शिक्षित, पराक्रमी, परिश्रमी 
होता है। ऐसा जातक अपने परिश्रम एवं बौद्धिक योग्यता के बल पर व्यवसाय में लाभ व उन्नति करता है तथा भूमि, 
मकान, धन-सम्पदा, वाहन, स्त्री एवं संतान आदि सुखों को प्राप्त करता है । व्यवसायिक ([श0०(2$६४079/ ) विद्या के क्षेत्र 
में विशेष सफलता प्राप्त करता है। इसके अतिरिक्त अन्य शुभ योग हों, तो जातक वकालत, मैडीकल, इंजीनियरिंग या 
अध्यापन आदि क्षेत्र में भी सफल हो सकता है। यदि गुरु-शुक्र का योग हो, एवं चन्द्र-मंगल का योग हो, तो जातक 
इंजीनियरिंग के क्षेत्र में सफल होता है। देखें उदाहरण कुंडली नं. 92 - 

एक सामान्य सिद्धान्तानुसार कहा जाता है कि गुरु जिस भाव में स्थित होता है, उस भाव सम्बन्धी फल की हानि और 
जिस भाव पर दृष्टि डालता है, उस भाव के फल की वृद्धि करता है तथा शनि जिस स्थान में बैठता है ,वहां की वृद्धि करता 
है और जिस भाव पर दृष्टि डालता है, उस भाव फल की हानि करता है- | 

स्थान हानि करोति जीव: स्थान वृद्धि करो शनि: । गुरु विशेषकर अपने कारक भावों (2, 5, 7 एवं १) में परन्तु 
यह नियम सभी शास्त्राकारों में मान्य नहीं । । | ः 

द्वांदधां भाव- में बृश्चिक राशि पर गुरु होने से जातक परिश्रमी, धार्मिक, परोपकारी, विधघ्न-बाधाओं के बाद उच्च 
शिक्षा प्राप्त करने वाला, शारीरिक स्वास्थ्य में कुछ निर्बलता, देश-विदेश में भ्रमण करने वाला, माता का भक्त, भूमि, मकान 
एवं वाहन आदि सुखों से युक्त, प्रायः शुभ कार्यों पर खर्च करने वाला, जीवन का पूर्वार्द्ध भाग विशेष संघर्षपूर्ण रहता है। 
प्रायः 42 वर्ष की आयु के बाद विशेष भाग्योदय हो। गुरु यहां से अष्टम भाव को उच्च दृष्टि से देखने से जातक को 
अध्यात्म, ज्योतिष, मंत्र, यंत्र आदि गूढ़ विषयों में भी रुचि रखे तथा जातक की दीर्घायु के योग बनते हैं ।इस भाव में मंगल, 
बुध या शनि का साथ हो, तो व्यवसाय में अस्थिरता, धन हानि एवं पारिवारिक अशांति के संकेत हैं । केतु का योग हो, तो 
जातक को देश-विदेश में व्यापार से लाभ होता है। | 


( धनु लग्न में शुक्र का द्वादश भावों में शुभाशुभ फल] 


. . धनु लग्न में शुक्र सामान्यतः त्रिषडाय (६,११) पति होने से अशुभ फल प्रदायक धनु लग्ने शुक्र फल 


माना जाता है | परन्तु इस लग्न में शुक्र मित्र राशियों (३ ,१०,११) स्व एवं उच्च राशियों ्््ट्छ हू श्‌ 
रे (< > 


(१२, २,७) में तथा शुभ ग्रहों की दृष्टि होने से अच्छे फल भी अनुभव किए जाते हैं। 













इसके अतिरिक्त बुध-शुक्र , शनि-शुक्र के योग भी शुभफल प्रदायक होते हैं। 
प्रथम भाँव- में धनु राशि पर शुक्र होने से जातक आकर्षक एवं सुंदर व्यक्तित्व 
वाला, विनयशील, परिश्रमी, प्रियभाषी, हंसमुख एवं विनोदप्रिय व्यक्ति होता है। ऐसा 
जातक शिल्प कला में निपुण, कामुक, विलासी, ऐश्वर्यववान, मकान-वाहन आदि सुख 
साधनों से युक्त, उच्च प्रतिष्ठित लोगों के साथ मित्रता हो, यदि सूर्य, मंगल या राहु आदि 















4020 _ _ _ _ _____[_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒___ धनु लग्नमें शुक्रफंल 
किसी क्रूर ग्रह से सम्बन्ध हो, तो जातक का शरीर अस्वस्थ रहेगा। व्यवसाय में भी अत्यन्त संघर्ष के बाद सफलता मिले 
यदि बुध-शुक्र व सूर्य का भी योग हो तो विस्तृत उद्योग एवं व्यवसाय से विपुल धन सम्पदा के सुख हों। गुरु-शनि साथ 
हों तो धनार्जन में स्त्री का भी सहयोग प्राप्त हो, देखें उदाहरण कुंडली नं. 88 
द्वितीय भाव-में मकर राशि पर शुक्र के प्रभाव से जातक कठिन परिश्रम एवं उद्यम द्वारा धन का अर्जन करता है।' 
पारिवारिक सुख में कमी अथवा परिवार के सदस्यों से मनमुटाव की संभावना हो | स्त्री के सम्बन्ध में भी कुछ परेशानियों। 
के बाद सम्बन्ध सामान्य हों। बहन-भाई होते हुए भी उनके सुख में कमी रहे | जातक प्रियभाषी, विलासी, संगीत-कलों. 
एवं साहित्य आदि में रुचि, चतुरवक्ता एवं गुप्त युक्तियों के द्वारा विशेष धनार्जन करने में कुशल होता है। ऐसा जातक 
वकालत, क्रय-विक्रय, मैडीकल, सौन्दर्य-प्रसाधन, [727707-702007800०॥,कम्प्यूटर आदि क्षेत्रों में विशेष सफल होनेः 
के योग होंगे । देखें उदाहरण कुंडली नं. 89 ह ५ हे, 
तृतीय भाँव-में कुम्भ राशि पर शुक्र के प्रभाव से जातक पराक्रमी, पुरुषार्थी एवं उद्यमी होता है। ऐसा जातक 
अपने उद्यम द्वारा जीवन में लाभ व उन्नति प्राप्त करता है। भाई-बहनों के सुख में कुछ कमी तथा भाग्य के सम्बन्ध में भी... 
कुछ कठिनाइयों का सामना रहे । जीवन का प्रारम्भिक भाग विशेष संघर्षपूर्ण व कठिनाइयों से भरा रहे । परन्तु मध्यमायु के 
पश्चात्‌ मकान, वाहनादि सुख-साधनों की प्राप्ति हो। ऐसे जातक को लेखन, पठन-पाठन, प्राध्यापन, क्रय-विक्रय के 
प्रतिनिधित्व के सम्बन्ध में विशेष सफलता मिलती है। धर्म के बारे में स्वतंत्र विचार होते हैं । शुक्र-बुध का योग हो तो .. 
सरकारी क्षेत्रों से विशेष लाभ होने की सम्भावना होती है। 
चतुर्थ भाव॑-में मीन (उच्च) राशि पर शुक्र होने से जातक/जातिका सुन्दर मुख, आकर्षक व्यक्तित्व, माता का 
सुख, भूमि-जायदाद, मकान, वाहनादि सुख साधनों से युक्त, ऐश्वर्य युक्त एवं उच्चस्तरीय शैली का जीवन व्यतीत करने ह 
वाला, व्यवसाय में अत्यन्त कठिनाइयों और संघर्ष के बाद सफलता प्राप्त करने वाला होगा। सुन्दर, सुशील एवं परिवार में .. 
सहयोग करने वाली स्त्री का सुख होगा। संगीत, सौन्दर्य, अभिनय एवं कला की ओर विशेष रुचि रहे। ऐसा जातक. 
सिनेमा, टैलीविजन, चित्रकला, फोटोग्राफी, गायन, ब्यूटी-पार्लर, श्रृंगारिक-प्रसाधन, कम्प्यूंटर, कोल्ड-ड्रिंक्स, मदिरा. . 
आदि का क्रय-विक्रय करने वाला, कला, बैंकिंग, शिल्पादि क्षेत्रों में विशेष सफलता प्राप्त करेगा । इसके साथ यदि चन्द्र- < 
शनि का साथ में योग हो तो जातक/ जातिका प्रसिद्ध अभिनेता/अभिनेत्री होती है। कला क्षेत्र में विशेष सफलता मिलती है। 
देखें उदाहरण कुंडली नं. 93 ह 
पंचम भांव-में मेष राशि पर शुक्र होने से जातक अस्थिर मन परन्तु बुद्धिमान होता है। उच्चशिक्षा में कुछ विष्न- . 
बाधाओं के पश्चात सफलता प्राप्त होती है। जातक संगीत, काव्य एवं कला आदि क्षेत्र में रूचि रखने वाला, भोगविलास 
आदि में आसक्ति, कम्प्यूटर डिजाइनिंग, पेंटिंग आदि में रूचि रहे | यदि मंगल व बुध भी शुभ हो, तो जातक को स्त्री एवं 
सन्‍्तान सुख अच्छा होता है। संतानोपत्ति के पश्चात्‌ भाग्योन्‍्नति होगी। जातक को स्वयं भी सुरापान की ओर प्रवृत्ति की 
संभावना हो, ज्योतिष आदि में भी रुचि हो। | 
बष्ठ भाव॑-में स्वगृही वृष राशि पर शुक्र होने से जातक गुणवान, सवारी, भूमि-जायदाद आदि सुखों से युक्त, 
परिश्रमी, गुप्त युक्तियों से धनार्जन करना एवं अनेक मित्रों से युक्त होगा । जातक उलझनों में फंसा रहता है । तरल पदार्थ एवं ._ 
सुरापान आदि में रूचि रहे । मंत्र-तंत्र और ज्योतिष में भी रूझान हो । जातक कामुक एवं विलासप्रिय प्रवृत्ति, संगीत-कला, .. 
सौन्दर्य प्रसाधन, इत्र-खुशबु, स्त्री प्रसंग आदि विषयों की ओर विशेष रुचि होगी तथा उन पर खर्च भी अधिक होंगे। - 
व्ञप्तम भाँव-में मिथुन राशि पर शुक्र होने से जातक आकर्षक व्यक्तित्व, कामुक, गायन, संगीत, कला एवं 
विपरीत सैक्स के प्रति विशेष आकर्षण रखने वाला तथा आजीविका एवं व्यवसाय के क्षेत्र में संघर्ष एवं परेशानियों 
के पश्चात्‌ सफलता मिलती है स्त्री सुख एवं दाम्पत्य जीवन में भी विज्न/बाधाओं का सामना होता है| यदि बुध 












धनुलनमेंशुक़ुफल_.._._._._....!!फृतह्हझ्ॉ्ॉ़ई्जन्ई्_3_्मई्डईह_्ट्कर्र्प्छ 
शुभ हो तो स्त्रियों के साथ शीघ्र मैत्री करने वाला, पत्नी सुन्दर, सुशील एवं हर प्रकार से संहायिका होगी। विवाह 
. के बाद विशेष लाभ एवं भाग्योननति हो । यदि यहां पर सूर्य-मंगलादि क्रूर ग्रहों का योग हो, तो वैवाहिक जीवन में 

असंतोष एवं सुख की कमी होगी। | 

अंष्टम भाँव-में कर्क राशि पर शुक्र होने से जातक का कृश शरीर, कामुक एवं चंचल वृत्ति, मिलनसार, व्यवहार- 
कुशल, तामसिक भोजन का शौकीन, कठिन परिश्रम द्वारा धनार्जन करने वाला, स्वच्छन्द एवं विलासप्रिय प्रकृति वाला 
होगा। शत्रुओं से विघ्न-बाधाएं और धन का अधिक खर्च व्यर्थ के कार्यों पर करेगा। गुप्त शत्रु भी सरगर्म रहे | मंगल-शुक्र 
» का योग (अष्टम) होने से जातक अनैतिक प्रणय में संलिप्त होता है।-राहु-केतु आदि पापग्रह ग्रह हों, तो प्रमेह, स्त्री 
सम्बन्धी गुप्त रोगों की आशंका रहती है। बुध शुभस्थ हो, तो विवाह के बाद लाभ अथवा स्त्री भी आर्थिक क्षेत्र में विशेष 
सहयोग करती है। देखें उदाहरण कुंडली नं. 87 ु 

नंवम्‌ भाँव॑-में सिंह राशि पर शुक्र होने से जातक को जीवन में कठिनाइयों एवं परिश्रम के पश्चात्‌ भाग्योदय और ' 
उन्‍नति.होगी। धार्मिक विचार होते हुए भी धर्म-कर्म में आस्था कम रहेगी। विवाह के पश्चात्‌ पत्नी एवं ससुराल पक्ष से 
लाभ व सहायता मिले। अपनी बुद्धि और चातुर्य से शत्रु पक्ष से भी लाभ प्राप्त करने में सफल होगा। भाई-बन्धुओं से 
मतभेद व सुख में कमी रहेगी । जातक दीर्घायु, सन्तान एवं वाहनादि सुखों से युक्त होगा। यदि चन्द्र, बुध, मंगल आदि ग्रहों 
का भी सम्बन्ध हो, तो जातक तीर्थ यात्राएं, परोपकार, धार्मिक उत्सवों पर भी खर्च करता है। 

दम भाँव-में कन्या राशि पर शुक्र होने से जातक व्यवहार कुशल, मिलनसार, विभिन्‍न साधनों द्वारा धन प्राप्त 
करने वाला, परन्तु व्यवसाय में अत्यन्त कठिनाइयों एवं संघर्ष के पश्चात्‌ धन लाभ एवं उन्नति होगी। गुप्त-शत्रु हानि. 
पहुंचाने की भी चेष्टा करेंगे। परन्तु ऐसा जातक गुप्त युक्तियों द्वारा अपना कार्य निकालने में कुशल होता है। अत्याधिक 
दौड़-धूप एवं परिश्रम के बावजूद अधिक धन लाभ एवं संचय नहीं हो पाता। चतुर्थ भाव को उच्चदृष्टि से देखने पर जातक 


को माता, भूमि, आवास, वाहनादि का यथेष्ट सुख प्राप्त होता रहेगा। चन्द्रादि का योग हो, तो जातक कामुक-वृत्ति, विलासी._., 


एवं मदिरा सेवन करने में उत्सुक होता है। देखें उदाहरण कुंडली नं. 90 

एकांदपा भाँव-में स्वगृही तुला राशि पर शुक्र होने से जातक बुद्धिमान, परन्तु कामुक वृत्ति, उच्च विद्या, भूमि, 
धन, मकान, सवारी आदि सुविधाओं से युक्त, सुन्दर एवं सुशील स्त्री व संतान आदि सुखों से युक्त होगा। कन्या संतति का 
विशेष सुख होने के योग। ऐसे जातक को स्त्री, मित्र वर्ग अथवा श्वेत वस्तुओं व रल्ादि के व्यवसाय से लाभ हो। ऐसा 
जातक स्त्रियों के संग में विशेष प्रसन्‍न रहने वाला, संगीत, कला, ज्योतिष-मंत्रादि विद्याओं में रूचि रखने वाला होता है। 
मंगलादि का योग हो तो जातक विशेष रूप से कामुक, विलासप्रिय एवं आवेशपूर्ण व्यवहार करने वाला होगा। यदि गुरु का 
योग हो तो धर्मपरायण, उच्च प्रतिष्ठित एवं सिद्धान्तिक होता है। देखें उदाहरण कुंडली नं. 86, 9, 92 

द्वादघां भांव-में बृश्चिक राशि पर स्थित शुक्र होने से जातक कल्पनाशील, योजनाएं. बनाने में कुशल, परन्तु 
अधिकांश योजनाएं फलीभूत न हो पाएं। जातक शीघ्र क्रोधित होने वाला, प्रारम्भिक आयु में शरीर कष्ट, अत्याधिक 
परिश्रम के पश्चौंत्‌ निर्वाह योग्य आय के साधन प्राप्त करने वाला परन्तु ऐसे जातक के चृथा खर्च भी बहुत अधिक होते हैं। 
विशेषकर रोगों एवं विलास आदि कार्यों पर खर्च करने वाला, गुप्त प्रेम, विदेश यात्राओं की भी सम्भावना.। शुक्र: यदि 
पापग्रह से युक्त हो, तो स्त्री कष्ट अथवा विवाह सुख में कमी रहे। बुध-शुक्र का योग हो, तो व्यवसाय के क्षेत्र में 
उल्लेखनीय सफलता प्राप्त होती है। देखें उदाहरण कुंडली नं. 94 












404 ___€_€_€_€_॒_॒]॒_.०[औ०॒॒॒॑₹[  . ..................  यनुलग्न मं शनि फल 











धनु लग्न में शनि का द्वादश भावों में शुभाशुभ फल 


विशेष : धनु लग्न में शनि द्वितीयेश (धनेश) एवं पराक्रमेश होने के कारण (यदि १, 
३,५,७, ८, ९, १० व १२वें) भावों में शुभ । ।वें भाव में मिश्रित तथा अन्य भावों में 
अशुभ फल प्रदान करता है। द्वितीयेश (मारकेश) होने से शनि कई बार स्थिति: 
अनुसार अपनी दशा/अन्तर्दशा में मृत्यु तुल्य कष्ट भी देने लगता है। 

प्रथम भांव॑-में धनु राशि पर शनि होने से जातक सुन्दर आंखों वाला, बुद्धिमान, 
विद्वान, पराक्रमी, दूरदर्शी, दीर्घ यात्राएं करने वाला तंथा अपने परिश्रम से धनार्जन करने 
वाला होता है। भाई-बहन का सुख हो, वैवाहिक सुख में कमी अथवा विध्र रहें। 
व्यवसाय में भी अत्यन्त संघर्ष के बाद लाभ एवं सफलता मिले, ऐसा जातक शिल्पकला 
तकनीकी, कम्पयूटर, क्रय-विक्रय, भूमि, जायदाद, पत्थर, तेल, सीमैंट, शेयरों, रबड़ एवं लोहे से सम्बन्धित वस्तुओं के 
व्यापार में विशेष लाभान्वित हो सकता है। यदि यह गुरु, शुक्रादि ग्रह योग भी हो तो जातक प्रबन्धन (४७॥82॥8) 
आदि कार्यों में कुशल होता है । देखें उदाहरण कुंडली नं. 88 

द्वितीय भांव-में स्वराशि मकर पर शनि के प्रभाव से जातक परिश्रमी, स्पष्टवक्ता, अति बुद्धिमान, पारिवारिक एवं 
आर्थिक उन्नति के लिए विशेष परिश्रम एवं संघर्ष करने वाला, स्वाभिमानी, भूमि, मकान एवं वाहन आदि सुखों से युक्त, 
ऐसा जातक/जातिका दूरदर्शी, सूक्ष्म-बुद्धि एवं दूरगामी योजनाएँ बनाने में कुशल, अपने लक्ष्य एवं कर्त्तव्य के प्रति 
निष्ठावान एवं समर्पित होता है। ऐसा जातक गहन युक्तियों एवं परिश्रम द्वारा व्यवसाय में विशेष धन लाभ एवं उन्नति प्राप्त 
कर लेता है। लेकिन प्रारम्भिक अवस्था में संघर्ष अधिक होता है| देखें उदाहरण कुंडली नं. 94 (विपुल धनी अम्बानी) 
यदि लग्न भाव पर गुरु की स्वगृही.शुभ दृष्टि भी हो, तो जातक उच्चप्रतिष्ठित राजनीतिज्ञ एवं मंत्री होता है। देखें उदाहरण 
कुंडली नं. 86 (प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ), चन्द्र अशुभ हो, तो आकस्मिक निधन होने के भी संकेत होते हैं। 

तूंतीय भांव-में स्वगृही कुम्भ राशि पर शनि होने से जातक पराक्रमी, परिश्रमी, कुशाग्र बुद्धिमान तथा अपने - 
पुरुषार्थ से जीवन में लाभ व उन्नति प्राप्त करने वाला, व्यवहार कुशल, बहु-मित्रों से युक्त, विघ्र-बाधाओं के बाद भाग्य में 
उन्नति, जातक अध्ययनशील, ज्योतिष, योग, तंत्र, चिकित्सा आदि विषयों में विशेष रूचि रखने वाला, संवेदनशील, उच्च- 
विद्या में अड़चनें तथा संतान के सम्बन्ध में परेशानी अथवा अल्प सुख होने की सम्भावना, जातक अत्यन्त परिश्रम एवं 
संघर्ष के बाद निर्वाह योग्य धनार्जन करता है, परन्तु खर्च भी बहुत होते हैं। | 

चतुर्थ भांव-में मीन राशि पर शनि होने से जातक/जातिका परिश्रमी, बुद्धिमान, सत्यवादी, पारिवारिक चिन्ता, 
जातक का स्वास्थ्य बाल्यवस्था में अस्थिर रहता है। माता के सुख में कमी या शरीर कष्ट परन्तु भूमि, मकान, वाहन आदि 
का सामान्य सुख, आर्थिक स्थिति बारे भी असन्तोष रहे | व्यवसाय में विशेष संघर्ष के बाद सफलता हो घरेलू सुख में 
अशांति हो | यदि यहां चतुर्थ भाव में शुक्र, चन्द्र का भी योग हो, तो जातक/जातिका को अभिनय, संगीत, सिनेमा, नृत्य 
आदि काला क्षेत्र में विशेष ख्याति एवं सफलता प्राप्त होती है। देखें उदाहरण कुंडली नं. 93 (माधुरी दीक्षित), यदि गुरु 
(मकर में) शनि के क्षेत्र में तथा शनि चतुर्थ गुरु के क्षेत्र में हो, तो जातक लौह उद्योग से अत्यन्त धनी होता है। | 

पंचम भांव-में मेष राशि पर शनि होने से जातक की सूक्ष्म बुद्धि, व्यवहार कुशल, स्वाभिमानी, दार्शनिक प्रवृत्ति, : 
विध्नों के पश्चात्‌ उच्च व्यवसायिक विद्या में सफलता, भाई-बहन एवं पारिवारिक सुख की प्राप्ति, सुन्दर, सुशील एवं... 
सुशिक्षित पत्नी, यदि बुध शुभस्थ हो, तो विवाह के पश्चात्‌ यथेष्ठ धन लाभ एवं उन्नति हो। ऐसा जातक धरनार्जन में गुप्त : 
युक्तियों का आश्रय लेकर सफल होता है। संतान सम्बन्धी चिन्ता, मंगल, गुरु, सूर्यादि ग्रह शुभस्थ हो, तो पुत्र संतति सुख - 





धनु लग्ने शनि फल : 














धनुलग्नमेंशनिफल _____ __  _॒॒॒[॒]॒[ई॒_॒._.॒॒ ॒॒॒ _[_/  ॒  3व05 में शनिफल 405 


ह 
होता है | देखें उदाहरण कुंडली नं. 87, 92 । यदि पंचमेश मंगल नीचस्थ होकर अष्टम भाव में हो, तो उच्च शिक्षा तथा पुत्र 


संतति सुख में कमी होगी । देखें उदाहरण कुंडली नं. 95 " 


बछ्ठ भांव-में वृष राशि पर शनि होने से ज्ञातक परिश्रमी, साहसी, स्वाभिमानी, शत्रुओं पर विजय पाने वाला अर्थात द 


चुनाव, मुकद्दमा, विवाद आदिंक्षें जीत हासिल करने वाला, उच्च शिक्षा एवं पारिवारिक सुख प्राप्ति में भी बाधाएँ, व्यवसाय 
के क्षेत्र में भी अत्यन्त संघर्ष एवं कठिनाइयों के बाद सफलता पाने वाला होता है। ऐसा जातक वकालत, राजनीति, 
चिकित्सा, प्रतिनिधित्व आदि क्षेत्रों में सफल होता है । जातक धरनार्जन में गुप्त युक्तियों का आश्रय लेता है । यदि शनि, राहु, 
शुक्र आदि ग्रहों के योग में हो, तो जातक को प्रमेह, मधुमेह अथवा गुप्त रोगों का भय रहता है। वैसे ३, ६ या ११वें भावों 
में शनि, मंगल या राहु. अरिष्टों का नाश करके सुख सम्पन्नता में वृद्धि करते हैं। 


ब्प्तम भाँव-में मिथुन राशि पर शनि होने से बाल्यकाल में शरीर कुछ अस्वस्थ रहे, माता को भी शरीर-कष्ट 


अथवा सुख में कमी हो । जातक को भूमि-मकान एवं वाहनादि सुखों की प्राप्ति कठिनाइयों के बाद हो | उच्च विद्या में विध्र- 
बाधाओं के बावजूद जातक तेज बुद्धि, पराक्रमी एवं परिश्रमी होता है। सांझेदारी के कामों में हानि उठाने वाला, व्यवसाय 
के क्षेत्र में भी अस्थिरता रहे । जातक तर्क-वितर्क करने में कुशल तथा राजनीति, वकालत, प्राध्यापन तथा क्रय-विक्रय 
आदि के कार्यों में विशेष सफलता प्राप्त करने की योग्यता हो। भाग्योन्नति में रूकावटों के बाद सफलता हो | यदि कुंडली 
में गुरु नवम भाव में हो तो जातक उच्चपद-प्रतिष्ठित, विद्वान एवं विख्यात महापुरुष होता है। | 
अष्टम भांव-में कर्क राशि पर शनि के प्रभाव से जातक साहसी, पराक्रमी, अस्थिर बुद्धि, दीर्घायु एवं गुप्त युक्तियों 
द्वारा धनार्जन कर लेता है। उच्च-शिक्षा प्राप्ति में अड़चने रहें। पुत्र-सन्तान प्राप्ति में विघ्र-बाधाओं के पश्चात्‌ सुख मिले। 
जातक अध्यात्म, योग, दर्शन, ज्योतिष, यंत्र-मंत्र आदि गूढ़ विषयों में रुचि रखने वाला तथा जीवन संघर्षमय चुनौतियों में 
से गुजरता है व्यवसाय में कठिनाइयों के पश्चात्‌ सफलता मिलती है। मन में अशांति तथा गुप्त शत्रुओं का भय रहता है। 
यदि राहु-केतु या मंगल आदि ग्रेहों का योग या दृष्टि हो तो जातक को दुर्घटना आदि के कारण चोट भय रहता है। 
'नवम भांव-में सिंह राशि पर शनि के प्रभाव से जातक पराक्रमी, स्वाभिमानी, कर्मठ,-शत्रुनाशक, निज बाहुबल 


एवं उद्यम द्वारा धर्नाजन करने वाला, भ्रमणशील अर्थात देश-विदेश में भ्रमण करने के अवसर प्राप्त करने वाला, तीब्र - 


बुद्धिमान, उच्चाभिलाषी, धर्म-नीति, ज्योतिष आदि गूढ़ विषयों में रूचि रखने वाला होता है। भाई-बहन का सुख यशथेष्ठ 
होता है | व्यवसाय के क्षेत्र में अत्यंत संघर्ष के पश्चात्‌ समुचित लाभ व॑ उन्नति प्राप्त करता है। यहां से शनि लाभ स्थान में 
उच्चराशि को देखने से जातक को शेयर-लाटरी अथवा व्यवसाय में अकस्मात्‌ धन लाभ होने की भी संभावनाएं होती हैं। 
37वें वर्ष के पश्चात्‌ विशेष भाग्योननति होती है। । 
दाम भाँव-में कन्या राशि पर शनि होने से जातक अत्याधिक परिश्रमी, राजनीतिज्ञ, बुद्धिमान, भूमि, धन, मकान, 
वाहनादि सुखों से युक्त होता है | परन्तु मकान के सम्बन्ध में कुछ परेंशानियां बनी रहती हैं। व्यवसाय में भी कुछ संघर्ष के 
बाद लाभ घ उन्नति के साधन बनते हैं। माता को कष्ट अथवा मातृ सुख में कमी हो। आय के साथ-साथ धन के खर्च भी 


अधिक होंगे। जातक एक से अधिक साधनों द्वारा धनार्जन करने का प्रयास करता है। कुछ विप्रों के पश्चात स्त्री/पति के. 


सुख की प्राप्ति होती है। विवाह के पश्चात्‌ धन लाभ एवं उन्नति के विशेष अवसर प्राप्त होते हैं। जातक को कम्पयूटर, 
- दूरसंचार, इंजीनियरिंग एवं तकनीकी क्षेत्रों में विशेष सफलता प्राप्ति के योग बने। क्‍ क्‍ 
एकादश भाव-में शुक्र की तुला (उच्च राशि) पर शनि होने से जातक दीर्घायु, परिश्रमी, चिन्तनशील, दूर- 
अंदेशी, स्वास्थ्य के सम्बन्ध में चिन्तित, वाद-विवाद में कुशल, आस्तिक विचारों वाला एबं पुरुषार्थी होता है। ऐसा जातक 
निजी पुरुषार्थ एवं पराक्रम द्वारा जीवन में लाभ व उन्नति प्राप्त करने वाला होता है। उच्च शिक्षा में विष्न-बाधाएं रहें । यदि 
कुंडली में शनि के साथ शुक्र का योग हो, तथा गुरु भी केन्द्रगत हो तो जातक उच्च प्रतिष्ठित, धर्मपरायण, सुयोग्य सन्तान, 








॥6 _ _ _ __ ____ ___॒_॒_[_[_[_[_[_[_[_[_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒____थनुलग्नमेंराहुफलं 
आवास, धन, वाहन आदि सुखों की प्राप्ति तथा धर्म-ज्योतिष चिकित्सा आदि के क्षेत्रों में विशेष रूचि रहती है। देखें 

कुंडली नं. 90... है 

दीघायु: स्थिराविधव:शू र:शिल्पाश्रयो वियत रोग: । 

आयस्थे भानुसुते धन जन सम्पवयुतो भवाति।। सारावली ० 

द्वादगा भांव-में ब॒ुश्चिक राशि पर शनि के प्रभाव से जातक कठोर परिश्रमी, पारिवारिक उलझनों से युक्त, अनेक... 

युक्तियों से निर्वाह योग्य धर्नाजन करने तथा अत्याधिक व्यय करने वाला होता है । ऐसे जातक का धन अधिक संचित नहीं " 





हो पाता। कुटुम्ब एवं भाई-बहनों के सुख में कमी रहती है | यदि राहु या मंगल एवं शुक्र आदि ग्रहों का भी योग हो, तो . 55 


जातक का व्यय विलासादि कार्यों पर अधिक होता है। धर्म के सम्बन्ध में स्वतंत्र विचारों वाला, नीतिज्ञ, गुप्त-विद्याओं की 
ओर अभिरुचि, यदि द्वादश में मंगल-शनि का योग हो तो दाम्पत्य सुख में कमी रहती है। यदि केतु का योग हो, तो जातक 
वकालत, चिकित्सा आदि क्षेत्र में विशेष लाभान्वित रहता है। देखें उदाहरण कुंडली नं. 89 
धनु लग्न में राहु का द्वादश भावों में शुभाशुभ फल 
विशेष : धनु लग्न में राहु शत्रु राशिगत होने के कारण शुभफली नहीं माना धनु लग्ने राहु फल 
जाता | विशेषकर यह १, २, ४, ५, ७, ९ भावों में अशुभ तथा ३, ६, ८, १०, ११, 
१२वें भावों में शुभफल प्रदायक माना जाता है | सामान्यतः: ३, ६ व ११वें भावों में राहु 
अनेक अरिष्टों का नाशक एवं सौभाग्य आदि में वृद्धिकारक माना जाता है। 
प्रथम भांव॑-में गुरु कौ राशि धनु पर राहु होने से जातक चतुर बुद्धि, होशियार, 
संदेहशील स्वभाव, स्वास्थ्य में कमी तथा धर्नाजन के लिए अत्याधिक संघर्ष एवं परिश्रम 
करने वाला, व्यवसाय में भी गुप्त युक्तियों द्वारा लाभ व उन्नति प्राप्त करने वाला, व्यर्थ की 
चिंता एवं परेशान रहने वाला होगा। ऐसा जातक बाहरी तौर पर यद्यपि सज्जन परन्तु 
भीतर से चांलाक प्रवृत्ति का होगा। जीवन का पूर्वार्द्ध भाग शारीरिक कष्टों से भरा होता है। 
द्वितीय भांव-में मकर राशि पर राहु होने से जातक गुप्त चिन्तन करने वाला, आर्थिक परेशानियां, कौटुम्बिक सुख 
में कमी, परिवार से अलग रहने वाला, धन सम्बन्धी चिन्ता एवं ऋण लेने की आवश्यकता, कभी-कभी अत्यधिक संघर्ष 
और अपने परिश्रम व गुप्त युक्तियों से धन कमाने में सफल होता है । भूमि, वाहन आदि सुखों की प्राप्ति के लिए प्रयासंरत 
रहता है। कभी-कभी मुख सम्बन्धी रोग, गले व श्वास सम्बन्धी परेशानी उत्पन्न हो । 
तृतीय भाव-में कुम्भ राशि पर राहु होने से जातक पराक्रमी, साहसी, परिश्रमी, उद्यमी, देशविदेश की यात्राएं करने 
वाला तथा निजी उद्यम एवं परिश्रम द्वारा व्यवसाय में लाभ व उन्नति प्राप्त करने वाला होता है। ऐसा जातक भाई-बन्धुओं . 
के सुखों से युक्त तथा भूमि-आवास एवं वाहनादि सुखों से सम्पन्न होता है। इनका सम्पर्क एवं सम्बन्ध उच्च-प्रतिष्ठित _ 
लोगों के साथ भी रहता है। जिनसे जातक लाभान्वित भी होता है। ऐसा जातक़ कर्मशील, कर्मठ, धार्मिक एवं अध्यात्म, 
योग, ज्योतिष एवं तन्त्र आदि विद्याओं की ओर भी विशेष अभिरूचि रखता है। देखें उदा. कुं. नं. 87, 92, 94 
सामान्यतः राहु 3, 6, 7 वें भावों में अनेक अरिष्टों का नाशक तथा सुख सम्पदा का वृद्धिकारक माना जाता है। .. 
चतुर्थ भाव-में मीन राशि पर राहु के प्रभाव से जातक के माता-पिता को कष्ट अथवा माता के सुख में कमी, कार्य 
व्यवसाय के सम्बन्ध में कठिन-परिश्रम करने वाला, भूमि-मकान एवं वाहनादि सुख साधनों की प्राप्ति उलझनों एवं 
परेशानियों के बाद होती है। जातक घरेलू परिस्थितियों के प्रति असन्तुष्ट तथा अपने जन्म-स्थल से अतिरिक्त स्थान पर 
भाग्य लाभ एवं उन्नति होती है। व्यवसाय में अनेक उतार-चढ़ाव के पश्चात्‌ सफलता मिलती है। प्रारंभिक जीवन में 
आर्थिक परेशानियां अधिक होती हैं। देखें उदा. कुं. नं. 95 5 
पंचम भांव॑-में मेष राशि पर राहु के प्रभाव से जातक कुशाग्र-बुद्धि, परिश्रमी परन्तु उच्चविद्या में विघ्न-बाधाएँ 




















धनुलग्नमेंराहुफल _  _[_औ[३औ]___॥______7_7३_7_7_7्८<//-.उ 707 407 
होती हैं अथवा अधूरी शिक्षा रहती है। संतान सुख में भी कमी अथवा संतान सम्बन्धी चिन्ताएं रहती हैं। ऐसा जातक - 
अनेक परेशानियों से युक्त, चिन्तनशील होता है। जातक व्यवसाय में गुप्त युक्तियों एवं बुद्धि-चातुर्य द्वारा निर्वाह योग्य 
धनार्जन करने में सफल होता है| मंगल-राहु योग होने से कूटनीति का प्रयोग करने में कुशल होता है । देखें उदा. कुं. 86 

बहड्ठ भांव॑-में वृष राशि पर राहु होने से जातक बुद्धिमान, कुशाग्र बुद्धि, पराक़नमी, धैर्यवान एवं न्‍्यायप्रिय, तर्क- 
वितर्क करने में कुशल, अपने बुद्धि चातुर्य एवं गुप्त युक्तियों के बल पर शत्रुओं को परास्त करने वाला, मातुल एवं मामा 


के सुख में कुछ कमी रहे परन्तु भूमि, जायदाद, धन-सम्पत्ति, वाहन आदि सुख साधनों से सम्पन्न, राहु यहां से दशम भाव .. 


पर शुभ दृष्टि डालने से जातक अपने व्यवसाय एवं कार्य क्षेत्र में अग्रणी होगा। ऐसा जातक अध्यापन, प्रकाशन, वकालत, 
अभिनय, शिल्प-कला, बौद्धिक कार्य आदि के क्षेत्र में सफल होता है। देखें उदा. नं. 89, 90, 93 | का 
ब्प्तम भांव-पर मिथुन राशि पर राहु होने से जातक चंचल मन, अस्थिर एघं कामुक प्रवृत्ति, भोग, विलासादि 
कार्यों पर अधिक खर्च करने वाला, भाई-बन्धुओं के सहयोग में कमी, सांझेदारी के कार्यों में हानि, गृहस्थी एवं व्यवसाय 
के क्षेत्र में अत्यधिक कठिनाइयों का सामना रहे । यद्यपि जातक संघर्ष के बाद निर्वाह योग्य आय के साधन बनाने में सफल 
हो जाता है । वैवाहिक सुख में कमी अथवा स्त्री कष्ट, यदि राहु के साथ मंगल, चन्द्र आदि अशुभ ग्रह योग हो तो जातक 
को प्रमेह, पत्थरी या मधुमेह आदि गुप्त रोगों का भय होता है। 
अष्टम भांव-में कर्क राशि पर राहु होने से जातक परिश्रमी, स्वाभिमानी, सम्वेदनशील स्वभाव, धन एंव परिवार 
- के सम्बन्ध में चिन्तित रहने वाला, जातक अपने उद्यम एवं परिश्रम से निर्वाह योग्य धन एवं आय के साधन बना लेता है। 
इसको पैतृक धन व सम्पत्ति का सुख कम मिलता है। प्रारम्भिक जीवन काल अत्यन्त संघर्षपूर्ण होता है। ऐसा जातक गुप्त 
युक्तियों द्वारा भी कार्य करता है। यदि द्वितीय भावस्थ चन्द्र की इस भाव पर स्वराशि दृष्टि हो, तो जातक दीर्घजीवी होता 
है तथा जीवन के उत्तरार्द्ध में भूमि, मकान, वाहन एवं सुयोग्य सन्तान आदि सुखों से युक्त होता है। देखें उदा. कुं. नं. 97 
£ ,गव॑म्‌ भांव-में सिंह राशि पर राहु होने से जातक स्वतन्त्र एवं उच्चृंखल प्रवृत्ति वाला, मममाना आचरण करे में 
. .प्रवृत्त; भ्रमणशील, स्वाभिमानी, जादू, यंत्र-तंत्र, ज्योतिष, लाटरी-शेयर आदि विषयों में रुचि रखने वाला, भाग्योन्नति में 
विशेष-रूप से उतार-चढ़ाव एवं विघ्न रहे। कार्य-व्यवसाय के सम्बन्ध में विशेष संघर्ष व परिश्रम करना पड़े। यदि राहु 
पर या राहु के साथ पंचमेश मंगल का योग एवं गुरु की शुभ दृष्टि पड़ती हो, तो जातक श्रेष्ठ चरित्र वाला, आदर्शवादी, 
परोपकारी एवं उच्च आदर्श के लिए निष्ठावान होता है। > 
दाम भांव-में कन्या राशि पर राहु होने से जातक पराक्रमी, परिश्रमी, बुद्धिमान एवं उद्यमशील होता है। 
प्रारम्भिक अवस्था में अत्यन्त संघर्ष एवं कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। पिता को कष्ट अथवा पैतृक सुख में कमी 
रहती है परन्तु ऐसा जातक अपने बुद्धि चातुर्य एवं परिश्रम के द्वारा जीवन में लाभ व उन्नति प्राप्त कर लेता है। यदि 
कुण्डली में मंगल-गुरु केन्द्रादि भावों में शुभस्थ हों, तो जातक उच्च प्रतिष्ठित संस्थान में महत्त्वपूर्ण पद प्राप्त करता है तथा 
अपनी योग्यता के बल भूमि, आवास, स्त्री-संतान आदि सुखों को प्राप्त करता है। देखें उदा. कुं. नं. 88 | 
एकादघा भांव-में तुला राशि पर राहु के प्रभाव से जातक भ्रमणप्रिय, बुद्धिमान, परिश्रमी एवं उच्चाकांक्षी होता है । 
कार्य व्यवसाय में उचित-अनुचित तरीकों से लाभ कमाने वाला और धैर्यशील व हिम्मत से कार्य करने वाला होता है । ऐसा. 
जातक शेयर, संट्टा, लाटरी, ज्योतिष, यंत्र-मंत्र-तंत्र आदि गूढ़ विद्याओं में भी रुचि रखता है। जातक को अचानक धन 
लाभ की भी सम्भावनाएं होती हैं। ध्यान रहे, एकादश भाव में राहु (3, 6, ॥१ वें) अरिष्टनाशक एवं सौभाग्य में . 
वृद्धिकारक होता है। ह 
. द्वादघ्ां भांव-में बृश्चिक राशि पर राहु के प्रभाव से जातक निर्बल स्वास्थ्य वाला, व्यवसाय.एवं आय के सांधनों 
में अस्थिरता, कामुक एवं विलासप्रिय प्रवृत्ति वाला, गुप्त चिन्ता एवं परेशानियां तथा जातक परिश्रम एवं गुप्त युक्तियों के 
बल पर धनार्जन करने वाला होता है। ऐसा जातक किसी अवांछित व्यक्ति द्वारा विश्वासघात अथवा धोखा भी प्राप्त करता 
है। धन का अपव्यय भी अधिक रहता है । जिसके कारण आर्थिक परेशानियां व गुप्त चिन्तायें होती हैं। जातक कुसंगती के 
कारण व्यसन आदि का भी शिकार हो सकता है। . 










4308 _[_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒[॒_॒_॒_॒_[_:_ ___ धनुलगनमेंकेतुफल 08 हे लग्न में केतु फल 


के गा क का हर 
(धनु लग्न : द्वादश में केतु का फल) 

विशेष:- अकेले केतु ग्रह के फल का निर्णय करते समय अन्य सभी ग्रहों के धनु लग्ने केतु फल 
तुलनात्मक प्रभाव का भी विवेचन कर लिया जाए तो फल कथन में स्पष्टता होगी। 
सामान्यतः: केतु पंचम, नवम एवं द्वादश भावों में अरिष्टनाशक एवं सौभाग्य में वृद्धिकारक 
माना जाता है| 

प्रथम भाँव-में धनु राशि पर केतु होने से जातक बुद्धिमान, चतुर, व्यवहार 
कुशल, दीर्घायु, यात्राएं करने वाला, पिता या पितामह से लाभ प्राप्त करने वाला, मुख पर 
तिल या चोट का निशान, स्वास्थ्य में कुछ कमी रहे | ऐसा जातक मन में चिन्तित होने 
पर भी अपनी चिन्ताओं को प्रकट नहीं करता। जातक अपने पराक्रम एवं परिश्रम से 
निर्वाह योग्य आय के साधन प्राप्त कर लेता है। गुप्त युक्तियों का प्रयोग करने वाला होता है। जातक के माथे एवं जांघ के 
पास तिलादि का चिन्ह होगा। भूमि-मकान-वाहनादि सुखों से युक्त तथा धर्म-ज्योतिष, योग आदि विद्याओं में रूचि होती 





है। । 
द्वितीय भांव-में मकर राशि पर केतु के प्रभाव से जातक बुद्धिमान परन्तु कटुभाषी, शीघ्र उत्तेजित होने वाला, नेत्र 
अथवा मुख सम्बन्धी रोग, चित्त में व्याकुलता, अत्यन्त संघर्ष एवं परिश्रम के बाद निर्वाह योग्य आय के साधन बनते हैं। उच्च 
विद्या में विघ्न-बाधाएं, परन्तु मानसिक तनाव एवं चिन्ता रहेगी। जातक के ठोड़ी, माथे अथवा घुटनों पर तिल या चोटादि का 
निशान होगा। जातक तम्बाकु, मदिरा आदि व्यसनों में अपव्यय होने की सम्भावना भी होती है। देखें कुं. नं. 97 
तृतीय भांव-में कुम्भ राशि पर केतु होने से जातक पुरुषार्थी, बुद्धिमान और पराक्रमी होता है। भाई-बहिनों के 
सुख में कुछ कमी होती है। जातक परोपकारी स्वभाव का और उदारहदय होता है। जातक साहसी, भ्रमणशील और 
धार्मिक विचारों वाला होता है। जातक कों धर्म, ज्योतिष, दर्शनशास्त्र आदि विषयों में भी रूचि रहे । जातक अपने उद्देश्य 
के प्रति दृढ़-संकल्प रहता है| प्रारम्भिक जीवन अत्यन्त संघर्षपूर्ण होता है। परन्तु ऐसा जातक बड़ी-बड़ी कठिनाइयों का 
बड़े धैर्य एवं साहस से सामना करता है। लग्न पर लग्नेश गुरु यदि शुभ त्रिकोण भाव में हो तो जातक संघर्ष एवं 
कठिनाइयों के पश्चात्‌ उच्चप्रतिष्ठित देशभक्त व नेता होता है। देखें उदा. कुं. नं. 86 
चतुर्थ भाव-में मीन राशि पर केतु होने से जातक परिश्रमी, धैर्यवान, साहसी, मकान, भूमि, वाहनादि सुखों से 
युक्त, माता या पिता के सुख में कुछ कमी अथवा कष्ट होने की संभावना हो। ऐसे जातक का रहन-सहन अच्छा एवं 
उच्चस्तरीय होता है। जातक व्यवसायिक विद्या में उच्चशिक्षा प्राप्त, कुशाग्र-बुद्धि, योजनाबद्ध विधि से कार्य करने वाला, 
.._ गणित, कामर्स, साईंस एवं शिल्पादि तकनीकी कार्यों में शीघ्र कुशलता प्राप्त करने वाला होता है | यदि यहां चंद्र-गुरु आदि 
का योग हो, तो जातक भूमि-सम्पदा आदि सुखों से युक्त तथा माता की आयु दीर्घ होती है। अपने पैतृक जन्म स्थान से 
अन्यत्र स्थान पर विशेष भाग्योदय होता है। जातक की छाती के पास एवं पांव में तिल आदि का चिन्ह होता है। देखें कुं. 
नं. 88 ॥ 
पंचम भाव॑-में मेष राशि पर केतु के प्रभाव से जातक की चंचल एवं अस्थिर बुद्धि, उच्चाभिलाषी, मैस्मरेजम, 
ज्योतिष, योग, मंत्र, तंत्रादि गूढ़ विद्याओं की ओर अभिरूचि रखने वाला, उच्चित/अनुचित युक्तियों द्वारा धनार्जन करने 
० शेयर, सट्टा, लाटरी आदि साधनों द्वारा आकस्मिक लाभ की संभावना हो | उच्चविद्या में अत्यन्त कठिनाइयों एवं 
विघ्नों के पश्चात्‌ सफंलता, संतान सुख में कमी अथवा संतान सुख भी कठिनाईयों के बाद मिले एवं गुप्त चिन्ताओं के 
कारण परेशानियां अधिक रहें । ु 
बषष्ठ भांव-में वृष राशि पर केतु होने से जातक का अस्थिर स्वास्थ्य, ज्वर प्रकोप अथवा दुर्घटना से चोटादि का 
भय, शत्रुओं पर प्रभावी तथा मुकद्दमे आदि विवादों में विजयी (सफल) होता है। गुप्त युक्तियों एवं योजनाओं द्वारा काम 
निकाल लेने में कुशल, अत्यन्त कठिन संकट आ जाने पर भी अपना साहस एवं हिम्मत नहीं छोड़ता । रक्त-विकार या प्रेत 
जनित प्रकोप से शरीर कष्ट एवं मानसिक कष्ट | यदि चंद्र-मंगल आदि ग्रहों का शुभ योग भी हो, तो जातक के विदेश 











धनुल्नमेंकीतूफल_ _ ||. ैऑफखञसखञखञखखख्ख  ि07 
आदि भ्रमण को संभावना होती है। जातक को उदर, नाभि के पास या पीठ पर तिलदि का चिन्ह होता है। 
ब्ञप्तम भाँव-में मिथुन राशि पर केतु होने से जातक विशेष परिश्रमी, स्वास्थ्य में कमी रहे। जातक कामुक एवं 
विलासप्रिय एवं कुछ चिड़चिड़े स्वभाव का होता है । विवाह आदि सुखों में विलम्ब, कमी अथवा विष्न होते हैं। व्यवसाय 
के क्षेत्र में अत्यन्त कठिनाइयों केपश्चात्‌ सफलता प्राप्त करता है। यदि सप्तम्‌ भावस्थ केतु पर गुरु की दृष्टि हो तो जातक 
चिकित्सा क्षेत्र में विशेष लाभ व उन्नति करता है। सांझेदारी के कामों में हानि हो। 
अष्टम भांव॑-में कर्क राशि पर केतु के प्रभाव से जातक गुप्त रूप से परिश्रम करने वाला, कटुभाषी, शीघ्र उत्तेजित 
होने वाला एवं क्रोधी स्वभाव का होता है| व्यवसाय में आर्थिक लाभ के लिए अत्यधिक संघर्ष एवं गुप्त-युक्तियों का 
प्रयोग करने वाला होगा। ऐसा जातक धन का संचय नहीं कर पाता। परन्तु गुजारे योग्य आय के साधन बनते रहते हैं। 
तथापि परिवारिक परिस्थितियों के कारण मानसिक तनाव एवं अशान्ति रहती है। गुप्त रोगों का भी भय होता है। 
महिलाओं को क्लिष्ट रोग से गुप्त परेशानियों का सामना होता है। 
नवम्‌ भाव-में सिंह राशि पर केतु के प्रभाव से जातक संघर्ष एवं कठिनाइयों के बाद सफलता प्राप्त करता है। 
जातक गुणी, परिश्रमी तथा भ्रमणशील, समुचित धनार्जन करने वाला, व्यवसाय में अस्थिरता तथा भाई बन्धुओं के सुख में 
कुछ कमी रहती है | व्यवसाय में अत्यन्त परिश्रम के बाद सफलता मिलती है। जातक गुप्त चिन्ताओं से भी ग्रस्त रहता है। 
यदि यहां पर चंद्र-मंगल-बुध का योग हो तो जातक इंजीनियरिंग तथा सूर्य का योग हो तो चिकित्सा क्षेत्र में सफल होता 
है। देखें कुं. नं. 87 तथा 92 तथा.नं. 94 
दष्राम भाँव-में कन्या राशि पर केतु के प्रभाव से जातक बुद्धिमान, परिश्रमी, संघर्षशील तथा अत्यन्त कठिनाइयों 
के बाद ही व्यवसाय में लाभ व उन्नति प्राप्त कर पाता है। पैतृक पक्ष से भी विशेष लाभ नहीं मिल पाता। जातक का 
भाग्योदय अपने जन्मस्थान से अन्यत्र स्थान पर होता है। 37 वर्ष की आयु के बाद भाग्योदय होता है। प्रारम्भिक घरेलू 
जीवन में भी परेशानियां एवं अशान्ति रहती है । ऐसा जातक अपने परिश्रम एवं उद्योग द्वारा जीवन में विशेष लाभ व उन्नति 
प्राप्त कर लेता है। देखें उदा. कुं. नं. 95 
एकांदग्ा भाव-में तुला राशि पर केतु के प्रभाव से जातक परिश्रमी, बुद्धिमान, विध्नों के बाद उच्च-व्यवसायिक 
शिक्षा प्राप्त यदि जातक की कुंडली में गुरु भी शुभ हो, तो वह इंजीनियरिंग आदि तकनीकी विद्या में विशेष सफलता प्राप्त 
कर लेता है। ऐसा जातक उचित/अनुचित तरीकों से समुचित धन लाभ प्राप्त कर लेता है। कभी-कभी स्वयं की भूल के 
कारण धन हानि भी होती है। यदि यहां गुरु-बुध-शुक्र का योग हो तो जातक सरकारी क्षेत्रों से अच्छा लाभ/मुनाफा प्राप्त 
कर लेता है। 
द्वादप्ा भांव-में बृश्चिक राशि पर केतु के प्रभाव से जातक का बाल्यकाल में स्वास्थ्य कुछ नर्म रहता है। परन्तु 
आयु वृद्धि के साथ-साथ स्वास्थ्य में सुधार होता है परन्तु व्यवसाय में अस्थिरता रहती है। जातक अत्यन्त बुद्धिमान तथा . 
नई-नई योजनाएं बनाने में कुशल होता है | तर्क-वितर्क करने वाला, अभिनय, वकालत, चिकित्सा, अध्यापन, राजनीतिज्ञ, 
सेना, विदेश गमन आदि क्षेत्रों में सफल होता है। देखें कुं. नं. 89, 90, 93 


धानु लग्न मैं दी गाहीं कै कुछ प्रसिद्ध यौंगा 


(॥) सूर्य-बुध- धनु लग्न में भाग्येश (सूर्य) तथा कर्मश व सप्तमेश बुध का योग ८ कोण में होने से जातक 
प्रभावशाली एवं भाग्यशाली व्यक्ति, बुद्धिमान, विद्वान, दीर्घायु, तर्क-वितर्क करने में कुशल, पैतृक साख से लाभान्वित एवं 
सम्मानित, प्रियभाषी, अधिक (बहु) वार्तालाप करने वाला, बड़े प्रतिष्ठित लोगों से सम्पर्क, भूमि, धन, जायदाद, बाहन 

आदि सुखों से सम्पन्न होता है। ऐसा जातक चिकित्सा, वकालत आदि क्षेत्र में विशेष सफल होता है। 

दशम भाव- में यह योग विशेष प्रशस्त होता है। ऐसा जातक राजतुल्य सुख-सांधनों से युक्त, मंत्री आदि उच्च 
प्रतिष्ठित एवं विख्यात होता है। त्रिषुलोकेषु ख्यातों गजाश्वनाथो भहेन्महीपाल: ॥ 

(2) सूर्य-जुरु- का योग केन्द्र/त्रिकोण में होने से जातक उच्चशिक्षित, अत्यन्त बुद्धिमान, उच्चाभिलाषी, विद्वान 
स्वाभिमानी एवं भाग्यवान होता है । माता, भूमि, जायदाद.एवं वाहन आदि सुखों से सम्पन्न, धर्म परायण, परोपकारी स्वभाव ? 
एवं समाज में उच्च प्रतिष्ठित व्यक्तित्व होता है। ऐसे जातक को चिकित्सा, धर्म, योग, ज्योतिष, मन्त्र आदि विषयों में भी 
रूचि होती है। 


१09 














4340_ _ _ _ _______॒_॒_[_[_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒_॒[॒_ धनुलम्नमेंद्वि-त्रिग्रहीयोग 
(3) सूर्य- मंगल- का योग केन्द्र या त्रिकोण में हो तो जातक सूक्ष्म एवं तेज्ञ बुद्धि वाला, साहसी, दूसरों पर : 
अधिकार को भावना रखने वाला, स्वाभिमानी, पित्त प्रकृति, क्रोधी, सुख-सुविधाओं से सम्पन्न, बहुधा चिन्तित रहने वाला _ 
होता है। देखें उदा. कुं. 9] । 
(4) यूर्य-चन्द्र का योग- केन्द्र/त्रिकोण में हो तो जातक परिश्रमी, कुशाग्र बुद्धि, पराक्रमी, उच्चाभिलाषी, क्रय- - 
विक्रय एवं कार्य-व्यवसाय में कुशल, गुप्त युक्तियों द्वारा समुचित धनार्जन करने वाला, दूरदर्शी एवं योजनाबद्ध तरीके से 
कार्य करने वाला, गुप्त संसाधनों से युक्त एवं भाग्यशाली होता है । देखें उदा. कुं. नं. 94 ॥ यदि यह योग अशुभ भावों में हो 
तो जातक को मानसिक विकार तथा वह माता-पिता के दुख से परेशान होता है। िः 
(5) चन्द्र-मंगल- केन्द्र/त्रिकोण में योग हो तो जातक बौद्धिक कार्यों द्वारा धनार्जन करने वाला, तर्क-वितर्क करने 
में कुशल, प्रभावशाली वाणी वाला, पराक्रमी, तीक्ष्ण बुद्धि, निज परिश्रम एवं उद्योग द्वारा आय के साधन बनाने में सक्षम 
होता है। सूर्य, बुधादि मित्र ग्रहों की दृष्टि हो तो जातक प्रसिद्ध वकील, प्राध्यापक, मंत्री, चिकित्सक भी हो सकता है। 
देखें उदा. कुं. 89, 92 
(6) चन्द्र-बुध- का योग हो तो जातक बुद्धिमान, सुन्दर-मुख, चतुर, वाचाल (बहु-भाषी ), हंसमुख, गुणी, 
ज्योतिष, धर्म, संगीत एवं गूढ़ विषयों की ओर प्रवृत्ति, जमीन-जायदाद, धन सम्पदा एवं भाई-बन्धुओं के सुख से युक्त 
. होता है। पत्नी सुन्दर, सुशील तथा परिवारिक एवं आर्थिक क्षेत्रों में सहयोग करने वाली होती है । ऐसा जातक अपने कार्य 
में कुशल तथा प्राय: स्त्री के अधीन रहने वाला होता है। देखें कु. 87... 
(7) कक 2 - धनु लग्न में (केन्द्र-त्रिकोण) में इस योग का फल शुभ होता है। इसके प्रभावस्वरूप जातक 
: सात्विक एवं विचारों वाला, जमीन-जायदाद, वाहन आदि सुखों से युक्त, योग, दर्शन, ज्योतिष, मनोविज्ञान आदि 
गूढुं विषयों में रुचि रखने वाला, गुप्त युक्तियों से धर्नाजन करने वाला, सरकारी क्षेत्रों से लाभान्वित होता है । श्रेष्ट मित्रों से 
युक्त एवं माता-पिता का आदर सत्कार करने वाला होता है। देखें कुं. नं. 87 
(8) धनु लग्न में चंद्र-शुक्र, चन्द्र-शनि एवं चन्द्र-राहु या चन्द्र-केतु के योग शुभ फलदायक नहीं होते। जीवन 
संघर्षपूर्ण एवं चिन्तनशील रहता है। 
(9) मंगल-बुध- केन्द्र-त्रिकोण का सम्बन्ध होने से इस योग का फल शुभ होता है| परन्तु मंगल द्वादशेश होने से 
जातक को विशेष संघर्ष के बाद कलादि कार्य क्षेत्र में सफलता मिलती है। आकर्षक एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व वाला, 
अत्यम्त बुद्धिमान, परोपकारी स्वभाव, धार्मिक प्रवृत्ति, ईमानदार, गुणी व परिश्रमी होता है। जातक अपने पराक्रम व निष्ठा 
से विशेष उत्तकृष्ट स्थान प्राप्त कर लेता है। धन.एवं सुख सम्पदाओं से सम्पन्न होता है। लग्न में यह योग विशेष प्रशस्त होता 
है। देखें उदा. कुं. नं. 93 
(0) मंगल+गजुरु- लग्नेश व पंचमेश का सम्बन्ध होने से यह योग भी अच्छा फल करेगा। इसके फलस्वरूप 
जातक प्रभावशाली व्यक्तित्व, बुद्धिमान, उच्च व्यवसायिक विद्या प्राप्त, गुणवान, धार्मिक आस्थाओं से युक्त, भूमि-धन, 
सा वाहन आदि सुखं साधनों से युक्त तथा निजी उद्यम एवं पुरुषार्थ से जीवन में लाभ व उन्नति करने वाला होता है। 
उदा. कुं. 88।. | ा 
फशुक्र+शनि- अत्यन्त परिश्रमी, स्पष्टवादी, कूटनीति का प्रयोग करने वाला, बुद्धिमान, अनेक युक्तियों से धन का. 
की करने वाला होता है । विवाह के पश्चात्‌ विशेषकर 34 वर्ष की आयु के बाद विशेष लाभ व उन्नति करने वाला होता 
| 
#सूर्य+मंगल+बुध- धनु लग्न में यह तीनों ग्रह केन्द्र या त्रिकोण में हो तो जातक भाग्यशाली, अत्यन्त बुद्धिमान, 
साहसी, परिश्रमी, कुछ निष्ठुर प्रकृति, सरकारी क्षेत्रों से लाभान्वित, जायदाद, धन, सुशील स्त्री एवं श्रेष्ठ सन्तान से युक्त 
होता है | देखें उदा. कुण्डली नं. 9] 
फसूर्य+बुध+जुरु- केन्द्र में यह योग होने से विशेष प्रशस्त होता है। जातक उच्च व्यवसायिक विद्या के क्षेत्र में - 
सफल, भाग्यशाली, मैडीकल क्षेत्र में सफल, भूमि, जायदाद आदि सुखों से सम्पन्न होता है। 
फऐसूर्य+चन्द्र+बुध- तीनों ग्रहों का योग हो तो जातक तीक्ष्ण बुद्धि, कम्प्यूट, गणित आदि कार्यों में कुशल, 
विदेश में भाग्योदय होता है । देखें उदा. कुं. नं. 90 
हःचंद्र+मंगल+बुध- होने से जातक इलैक्ट्रीकल, तकनीकी आदि इंजीनियरिंग के क्षेत्र में विशेष कुशल होता है। 
निज पुरुषार्थ के बल पर जीवन में लाभ व उन्नति प्राप्त करता है ' देखें उदा. कुं. नं. 92 ह 





धनुलग्न-उदाहहण कुण्डलियां _ अ#ऋ/ऋऋ_ऋ[ऋ[ऋ[ऋ[ऋ[ऑ[(ऑ</<ञ<ञऑ_३/्ऋख/्/<7<३[३्<्खञञ्ञ्र्र्र् ्<आ३आ३+ ३ स३ ल्‍३उटिा | १47 


आतपूर्व प्रधानमंत्री श्रीं नान बढादुर थास्‍्त्रीं 

पंडित जवाहर लाल नेहरू जी की आकस्मिक मृत्यु के पश्चात्‌ श्री लाल-बहादुर कुण्डली संख्या नं. 86 
शास्त्री एक जून 964 ई. को भारत के दूसरे प्रधानमंत्री बने। इससे पहले वह केन्द्रीय... इलाहाबाद ् 
रेलवे मंत्री रह चुके थे। केन्द्रिय मन्त्रीमंडल में श्री शास्त्री जी ही एकमात्र ऐसे रेलमंन्त्री 
रहे हैं जिन्होंने मात्र एक रेल दुर्घटना होने के कारण अपनी नैतिक जिम्मेदारी समझते हुये 
मन्त्रीपद से त्यागपत्र दे दिया था। श्री शास्त्री जी । जनवरी 964 ई. से ] जन. 966 
ई. तक के अल्पकाल तक ही प्रधानमंत्री के पद पर सुशोभित रहे । इन्होंने अल्पकाल में 
ही देश की भलाई के लिए उल्लेखनीय कार्य किए। इनके कार्यकाल मे ही भारत-पाक 
युद्ध में शास्त्री जी ने अद्वितीय साहस का परिचय दिया। इसी युद्ध के दौरान भारत 
वासियों को ““जय जवान जय किसान '' का नारा दिया। श्री लाल-बहादुर शास्त्री जी 
अपने अभूतपूर्व आत्मबल के आधार पर ही साधारण परिवार से ऊपर उठकर प्रधानमंत्री जैसे उच्च-पद पर आसीन हुए 
तथा जन्मकुंडली में कुछ प्रमुख ज्योतिष सम्बन्धी योग इस प्रकार से मिलते हैं। 

3. लग्नेश गुरु पंचम (त्रिकोण) भाव में बैठकर भाग्यस्थान एवं लग्न भाव को स्वक्षेत्री दृष्टि से देखता है। जिसके 
फलस्वरूप जातक अत्यन्त साहसी, पराक्रमी, सत्यप्रिय, ईमानदार तथा अपने लक्ष्य के प्रति निष्ठावान होता है। 

2. बुधादित्य योग- दशम्‌ भाव में बुध उच्चराशिस्थ होकर भाग्येश सूर्य के साथ होने से केन्द्रत्रिकोण का सम्बन्ध 
बना है जोकि राजयोगकारक भी है। इस योग के प्रभाव से जातक उच्च-प्रतिष्ठित, भाग्यशाली तथा सरकारी क्षेत्र में उच्च 
पद प्राप्त करता है । 

3. इनकी कुंडली में भद्र नामक पंचमहापुरुंष योग भी पाया जाता है। जोकि लग्न एवं चन्द्रमा से बुध केन्द्रगत 
होकर उच्चराशि में पड़ा है जिसके फलस्वरूप अत्यन्त बुद्धिमान, विद्वान, निडर, आत्मविश्वास से भ॑रपूर, महानकार्य 
करने वाला और विख्यात महापुरुष होता है। 

4, इसके अतिरिक्त इनकी कुंडली में श्रीनाथयोग भी पाया जाता है। जब सप्तमेश दशम में उच्चराशिस्थ होकर भाग्येश 
से युक्त हो, तो श्रीनाथ योग बनता है। इस योग से भी जातक समर्थवान एवं भाग्यशाली होता है। 
्ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज््स्स्स्प्पटि एक उच्चप्रतिष्िंत जकक्‍्टर 

प्रस्तुत जन्म कुण्डली एक मेधावी डाक्टर की है। इनके माता-पिता दोनों ही सुशिक्षित. कुण्डली संख्या नं. 87 
परिवार से सम्बन्धित हैं। बड़ा भाई उच्च प्रतिष्ठित इंजीनियर है। जातक ने सन्‌ 4995 में चित्रा ( अ से 
मैडीकल क्षेत्र में उच्च-श्षेत्र में शिक्षा प्राप्त करके मैडीकल क्षेत्र में मैडोकल आफिसर 
बने | लगभग 32 वर्ष की आयु के पश्चात्‌ सुन्दर, सुशिक्षित एवं सुशील कन्या से विवाह 
हुआ। वह कन्या भी सुप्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान में कार्यरत है। शादी के समय गुरु मध्य 
शुक्र की अन्तर्दशा चल रही थी तथा सूर्य की अन्तर्दशा के आरम्भ में ही अक्तू. 2002 ई 
को पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई। जातक को सूर्य की अन्तर्दशा 5 अग. 2003 ई. तक रहेगी। 
वर्तमान काल में जातक भूमि-जायदाद, सुन्दर आवास, वाहन तथा माता-पिता के सुखों 
से समन्वित है । उपरोक्त जन्म कुंडली के अनुसार ज्योतिषीय योग इस प्रकार मिलते हैं 

4. जन्मकुंडली में भद्र नामक पंचमहापुरुष योग पाया जाता है। जिसके फलस्वरूप जातक बुद्धिमान, परिश्रमी, अपने . 
कैरियर के प्रति सतर्क एवं सावधान, अध्ययनशील, तर्क-वितर्क करने में कुशल होता है। 

2. लग्नेश गुरु दशम भाव में चंद्र, बुध आए ग्रहों से युक्त होकर चतुर्थ भाव को स्वगृही दृष्टि द्वारा देखने से जातक 

















442 है ज्योतिष तत्त्व ( फलित: 
मकान, वाहन एवं श्रेष्ठ माता-पिता के सुखों से सम्पन्न हुआ है।। चंद्र-गुरु का सम्बन्ध होने से जातक परोपकारी, दयालु 
तथा धर्मपरायण हुआ। ह 

3. सप्तमेश बुध स्वोच्च राशि होने से जातक को परिवारिक एवं आर्थिक क्षेत्र में सहयोग करने वाली पत्नी का सुख 
प्राप्त हुआ है। ह | 

4. भाग्येश सूर्य भाग्यस्थान में होने से जातक को धर्म, योग, ज्योतिष एवं पौराणिक साहित्य में विशेष रुचि रखने 
वाला, सरकारी क्षेत्रों से लाभान्वित होता है। | 

5. लग्नभाव में मंगल के प्रभाव से जातक यद्यपि पराक्रमी, साहसी, परिश्रमी एवं आकर्षक व्यक्तित्व, स्वाभिमानी, 
अश्रमणप्रिय, अच्छी बुरी बात की शीघ्र पहचान करने वाला हुआ है । परन्तु अग्निराशि में होने से जातक कभी शीघ्र क्रोधित 
एवं उत्तेजित होने वाला तथा प्रेमवश ही नियंत्रित होने वाला स्वभाव होगा। यहां मंगल नेत्रों के लिए कष्टकारी होने की भी 
संभावना करता है। 


उच्च संस्थान में चींफ मैनेनर 
प्रस्तुत कुंडली का जातक उच्चस्तरीय एवं प्रतिष्ठित संस्थान के आर्थिक विभाग में. कुण्डली संख्या नं. 88. 
कार्यरत प्रमुख ((]८०) मैनेजर की है । इनका एक बड़ा भाई तथा 3 बहिनें हैं | पिता की श्बवी कह 340 
मृत्यु के समय जातक अल्पायु का था। यह जातक अत्यन्त बुद्धिमान, कर्त्तव्यशील, स्न्ल्ल्ल्त्ट 
मेधावी, परिश्रमी, व्यवहार कुशल, श्वेंत वर्ण एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व का स्वामी है। 
इन्होंने अपने निजी परिश्रम एवं पुरुषार्थ द्वारा उच्च व्यवसायिक शिक्षा प्राप्त की तथा 
अपने आत्मविश्वांस एवं बौद्धिक योग्यता के बल पर उच्च-प्रतिष्ठित संस्थान में एक 
उच्च-पद पर कार्य कर रहे हैं। सितं. 984 ई. में शुक्र की महादशा के आरम्भ में एक 
सुशील एवं सुशिक्षित प्राध्यापिका से विवाह हुआ तथा शुक्र की दशा में ही प्रथम कन्या 
एवं तत्पश्चात लड़के का जन्म हुआ। शुक्र की' महादशा मार्च 2002 ई. तक रही। 
' वर्तमान काल में सूर्य की दशा में और भी अधिक पदोन्‍नति एवं.धन लाभ हुए हैं। 
जातक धन, सम्पदा, वाहन आदि सुख साधनों से सम्पन्न है। प्रमुख ज्योतिषीय योग इस प्रकार से हैं- 
3. धन स्थान में बुधादित्य योग अत्यन्त शुभ बना हुआ है। । 
जप (केन्द्र) में मंगल, बुध, गुरु, शनि, ग्रहों का चतु्ग्रही योग होने से जातक स्वावलम्बी, दृढ़ निश्चयी, धनी 
हुआ है। . ' 
3. गुरु की पंचम व नवम दृष्टि होने से जातक भाग्यशाली एवं तीक्ष्ण बुद्धि हुआ है। 
4. शनि की दशम भाव पर क्रूर दृष्टि पिता के सुख में अरिष्टकारक हुई है। 





एक प्रसिद्ध उच्चकोटिं के वकीन 
- प्रस्तुत जन्म कुण्डली एक प्रसिद्ध एवं उच्चकोटि के वकौल साहिब की है। यह कुण्डली संख्या नं. 89 
अपने नगर के ही नहीं, बल्कि पंजाब भर में अपनी योग्यता के बल पर प्रसिद्ध हैं। 27-2-928 
इनके दो लड़के एवं एक लड़की है। इनकी कुण्डली में कुछ विशेष योग इस प्रकार से 8 &./. लाहौर 


हैं:- 
. (१) राज योग- भाग्येश एवं कर्मेश (सूर्य-बुध) का योग लग्न-केन्द्र भाव में होने 
से जातक को अपने कार्य क्षेत्र में श्रेष्ठ पोजीशन प्राप्त हुई है। यहां बुधादित्य योग भी बना 
है। परंतु अग्नि राशि में सूर्य होने से शीघ्र उत्तेजित एंव क्रोधित होने का भी स्वभाव 
 होगा। ह ॒ 
(2 ) लग्नेश गुरु पंचम भाव में पड़कर भाग्य एवं लग्न भावों को शुभ एवं स्वक्षेत्री [५ 





ज्योतिष तत्त्व ( फलित ) | कै 473 
दृष्टि से देखने से जातक तीब्र बुद्धिमान, विवेकशील, धर्मपरायण एवं तर्क-वितर्क करने में कुशल हुआ है।.... 

(3 ) धनेश एवं पराक्रमेश शनि द्वादश भाव में पड़कर द्वितीय भाव को स्वगृही दृष्टि से देखने से जातक भूमि, मकान, 
वाहन आदि सुखों से युक्त तथा शत्रु (विपक्षी) पर प्रभावी होने के संकेत हैं। । 

(4 ) चंद्र-मंगल योग- सप्तम भाव में चन्द्र-मंगल का योग भी जातक द्वारा शत्रु (विपक्ष) पर तर्क-वितर्क द्वारा 
प्रभाव एवं विजय दिलाने में सहायक हुआ। द 

(5) मंगल कौ द्वितीय भाव पर उच्च दृष्टि होने से जातक धन-धान्य सम्पदा आदि सुखों से सम्पन्न हुआ है। इत्यादि ॥ 
च््च्च््््््््स विदेश में भाग्योदय वाना नातक ज्क्््/"्")्]-0्प््ट््य 

प्रस्तुत जन्म कुण्डली भारत में जन्में और विदेश (अमरीका) में स्थाई विद्या प्राप्त __ कुण्डली संख्या नं. 90 
करके अध्ययन करने वाला जातक की है। इसका एक बड़ा भाई भी है। यह जातक >> 
ऊंचे पद का आकर्षक व्यक्तित्व वाला, तीव्र बुद्धिमान (78॥0॥8०77), गणित आदि में 
होशियार, तीव्र स्मरण शक्ति और सामान्य ज्ञान में भी कुशल है । इसकी कुण्डली में निम्न 
योग प्रमुख हैं- । 

(१) लग्नेश गुरु लग्न में होकर पंचम एवं भाग्य स्थान में पड़े चंद्र सूर्य को शुभ 
दृष्टि से देखने सो जातक बुद्धिमान , भाग्यशाली, उच्च विद्या प्राप्ति में सफल हुआ है। 

(2 ) भाग्येश सूर्य का चंद्र बुध के साथ विशेष योग बना है। माता-पिता की 
सहायता एवं उनके आर्शीवाद से विशेष रूप से लाभान्वित। ह 

( 3 ) तृतीयेश शनि उच्च राशि का होने से जातक उद्यमी, धन, धान्य सम्पदा, वाहन आदि सुखों से युक्त है। 

( 4 ) पंचमेश मंगल द्वादश भाव में स्वगृही होकर मित्र केतु के साथ है। इसी से विदेश में सफल हुआ है। अमरीका 
. का वीज़ा इसको अक्तूबर 2002 ई. (चन्द्र मध्य मंगल की अन्तर्दशा) में प्रा्त हुआ। 
-"-- निष्काम सेवा में समर्पित उच्च प्रतिष्धित चिकित्सक ऊँ 


प्रस्तुत जन्म कुण्डली एक प्रतिभाशाली, धर्म-परायण एवं मेधावी आर्युवैदिक एवं. कुण्डली संख्या नें. 9 





27 सितं. 925 ई. 
होम्योपैथिक चिकित्सक, बुद्धिजीवी महापुरुष हैं। जातक श्रेष्ठ कुल में उत्पन्न हैं तथा उ.षा. 3.45 ॥.5.7. अमृतसर _ 
अपनी युवावस्था से ही सरकारी विभाग में कार्यरत रहते हुए भी निष्काम भाव से लोगों कोच "2 >३ 4८2 










धर्म एवं चिकित्सा के क्षेत्र में सेवा करते रहे । सन्‌ 983 ईं. में सरकारी सेवा से पदमुक्त होने 
के बाद सक्रिय रूप से लोगों की निष्काम सेवा कार्य प्रवृत्त हो रहे हैं। इनके दो सुयोग्य बेटे 
एवं कन्या तथा धर्मपरायण, सुशील व सुशिक्षित धर्मपत्नी भी विशेष रूप से इनके आध्यात्मिक 
एवं समाज सेवा के कार्यों में पूर्ण सहयोग करने वाली. है। वर्तमान काल में भी जातक 
परिवार सहित योग एवं चिकित्सा के क्षेत्र में लोगों की निष्काम सेवा करते हुए परोपकारी 
कार्यों में संलग्न हैं। जातक धर्म, योग, ज्योतिष आदि गूढ़ विषयों का भी विशेष ज्ञान रखते 
हैं। उनकी कुण्डली में कुछ प्रमुख ज्योतिषीय योग इस प्रकार से पाए जाते हैं :- 

(१) जातक की जन्म कुं. में दो ग्रह स्वोच्च राशि में तथा दो ग्रह स्वराशि मे हैं। 
जिससे जातक उच्चप्रतिष्ठित, धर्म-परायण तथा सुख साधनों तथा परिवारिक सुखों से 
युक्त हुआ है। । 

(2) भद्रयोग- कुण्डली में बुध केन्द्रगत होकर उच्च राशिस्थ होने से भद्र नामक 


ती 2 0 0020 ४४ ८: ७ ।ू. योतिवत ला फलित ) 
योग बना है जिससे जातक प्रभावशाली व्यक्तित्व, तीत्र बुद्धिमान, मधुरभाषी, सात्विक एवं परोपकारी स्वभाव, धर्म, 
ज्योतिष योग आदि शास्त्रों का जानकार तथा दीर्घ जीवी बनता है। 

(3) लग्न भाव में स्वराशि का गुरु होने से जातक धर्मात्मा, गुणी, विद्वान, आत्मबली, शास्त्रज्ञ, सात्विक, दश्ालु, 
भाग्यशाली, श्रेष्ठ सन्‍्तान व सुख-साधनों से सम्पन्न हुआ है | चिकित्सा शास्त्र में भी विशेष कुशल हुआ है:- क्‍ 

“'विद्या समेतो5भिमतो हि राज्ञां कृतज्ञो नितरामुदार: ॥' 

(4) पंचम नवांश (सिंह) में जन्म होने से जातक शुभ लक्षणों से युक्त, धर्म परायण स्त्री, पुत्रादि सन्‍्तति, धन-संपदा । 
आदि सुखों से युक्त व सुप्रतिष्ठित हुआ है। 

(5) लाभ स्थान में शनि-शुक्र की युति जातक को धर्म, ज्योतिष, चिकित्सा व योगादि गूढ़ विषयों में विशेष रूचि देती है। 

(6) परंतु लग्न पर शनि की दृष्टि तथा एवं 5 भावों पर मंगल की दृष्टियां जातक को यदा-कदा क्रोधित या उत्तेजित 
अथवा उद्विग्नता के भाव करती हैं। शनि के कारण जातक अन्तर्मुखी, उदासीन एवं चिन्तनशील प्रवृत्ति भी देता है। 

(7) जातक को अधिकांश सुख (सर्विस, विवाह, पुत्र आदि सन्‍्तति) राहु मध्ये बुधान्तर 952 से 4 मई 955 तथा 
शनि की महादशा 4978 ई. से 997 ई. के मध्य प्राप्त हुए। . 

(8) जन्म कुण्डली में कालसर्प योग के कारण सर्विस के दौरान (952 से 983 ई. तक) संघर्ष अधिक रहा। 


>-एक उत्यप्रतिंष्छिंत मेधावीं इंनींनियर 
प्रस्तुत जन्म कुण्डली एक उच्चशिक्षित एवं क्वालिफाईड ईंजीनियर की है। इनकी. कुण्डली संख्या न॑. 22 
कट 28 सितंबर 970 ई. 

एक छोटी बहन के अतिरिक्त कोई भाई-बहिन नहीं। 996 ई. में इन्होंने चन्द्रमा की .5 7.५. ।.5.., 
महादशा एवं गुरु की अन्तर्दशा में (जुला. 996 ई. को) ईंजीनियंरिंग की उच्च उपाधि 
प्राप्त की तथा चन्द्र मध्ये शनि.के अन्तर (997ई.) में केन्द्र के सरकारी विभाग में निजी 
योग्यता के बल पर सर्विस प्राप्त की तथा 26 जन. 999 ई. को सुन्दर, सुशील एवं 
सुशिक्षित कन्या से विवाह हुआ। विवाह के लगभग पांच महीनों के बाद पत्नी को 
गम्भीर शरीर कष्ट रहा। परन्तु अक्तू. 200 ई. से चन्द्र मध्ये सूर्यान्तर तथा 4 अप्रै. 
2002 ई. से (मंगल की दशा से) हालात में क्रमशः सुधार होना प्रारंभ हुआ है | वर्तमान 
काल में मंगल मध्ये राहु के अन्तर (अप्रै. 2003) में जातक को अपने विभाग में पदोन्नति एवं विशेष धन लाभ श्राप्त हुए 

हैं । ; 

ज्योतिषीय समीक्षा- जातक की नवांश कुण्डली में चन्द्र सिंह राशि का तथा जन्म कुण्डली में भी सिंह राशि का 
होने से चन्द्रमा वर्गोत्तम स्थिति में हुआ है जिससे जातक को अधिकांश शुभ फल चन्द्र मध्ये गुरु की अन्तर्दशा में ही प्राप्त 
हुए अर्थात्‌ 44 मार्च 95 से 44 जुला 996 ई. के मध्यान्तर में उच्च शिक्षा एवं शनि के अन्तर में सरकारी सर्विस प्राप्त हुईं। 
(2) शनि तृतीयेश होकर पंचम में नीचस्थ हो गया है, जिसके फलस्वरूप जातक कोजुलाई, 03 तक सनन्‍्तान सुख का 
अभाव तथा पत्नी का स्वास्थ्य खराब रहा है। परन्तु पंचमेश मंगल नवम में शुभस्थ होने से शनि भी शुभफल प्रदायक होगा। 
(3) सूर्य व बुध में परस्पर स्थान परिवर्तन योग हुआ है तथा भाग्यस्थान में चन्द्र, मंगल, बुध का योग भी भाग्य में 





ऊझाझियणे  अ िट टखएखए /फऊ्_ि-__्___5५ 








- वृद्धिकारक बना है| जिससे बुध की अन्तर्दशा में (जन. 999) में विवाह हुआ है। 


(4) मंगल मध्ये राहु के अन्तर में अप्रैल 2003 ई. को पदोन्नति व विशेष धन लाभ हुए हैं | चूंकि कुण्डली में राहु पर 


लग्नेश गुरु की शुभ दृष्टि पड़ रही है। 








ज्योतिष तत्त्व ( 'फलित ) ( 5 । 


भारतीय फिल्म जगत की प्रख्यात एवं लोकप्रिय ग्लैमर गर्ल, हिरोईन-माधुरी दीक्षित .._ कुण्डली संख्या नं. 93 
का जन्म 5 मई, 966, उ. भा नक्षत्र कालीन धनु लग्न में हुआ। जबकि नवांश कुण्डली उंलाओं 85 मिटा हट 
में तुला लग्न उदित है । इसंके जन्म कालीन १4 वर्ष, 9 मास शनि की दशा भोग्य थी। > 
चन्द्र-शुक्र के योग के कारण इसको बचपन में ही नृत्य, अभिनय, संगीत आदि कलाओं 
का शौक था। 7.वर्ष की अल्पायु में ही इन्होंने फिल्मों में प्रवेश किया था, उस समय 
इन्हें बुध की महादशा प्रारम्भ हो चुकी थी। इनकी प्रारम्भिक फिल्में तेजाब, सैलाब, 
दिल, जवांई राजा विशेष तौर पर उल्लेखनीय हैं। 985 से 989 ई. के मध्य (बुध 
मध्ये शुक्र एवं सूर्यन्तर) में विशेष सफलता प्राप्त हुई। 

आगे बुध मध्ये गुर्वन्तर (993 से जुला. 996 के म